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Tuesday, July 28, 2020

दिनकर: व्यक्तित्व व कृतित्व

"राष्ट्रकवि दिनकर" को नमन। दिनकर मेरे सबसे प्रिय साहित्यकारों में से एक हैं जिनकी राष्ट्रवादी और मानवतावादी विचारधारा ही मुझे उनकी तरफ आकर्षित करती है। उनकी तरफ आकर्षण होने का कारण मुझे आज भी याद है जब स्नातक के दिव्तीय या तृतीय वर्ष में मेरे एक सहपाठी "केशव" द्वारा दिनकर की रश्मिरथी के "तीसरे सर्ग" को सुनने का सुअवसर प्रदान हुआ था और तभी से इच्छा हुई थी कि दिनकर को पढ़ा जाए। केशव ने जिस शैली में वह सर्ग सुनाया था वो पूरे ओजगुण का आनंद दिला रहा था। मन को बड़ी प्रसन्नता मिली और केशव का मैंने शुक्रियादा भी किया। एक विशेष बात और स्मरण आती है कि हमारे हिंदी के एक अध्यापक "जसवीर त्यागी जी" ने केशव के द्वारा इस सर्ग को सुनने पर केशव के लिए जो उपमा दी थी वह सुनकर हँसी भी आई और एक नया उपमान सुनने का भी मौका मिला था। सर के कथन में एक निरालापन और प्रशंसीय भाव था। केशव ने जिस लय और अंदाज़ के साथ कवितापाठ किया था उसकी तुलना "भारतीय क्रिकेट टीम" के धुंआधार बल्लेबाज "वीरेंद्र सहवाग" से की गई थी। सर का मानना था कि जैसे वो लगातार और जिस तेजी के साथ छक्के मारता है ठीक वैसा ही लग रहा है कि तुम (केशव) भी उसी तेजी और लय के साथ, उसी निरन्तरता के साथ कविता सुना रहे हो"। एक वह दिन था और एक आज का दिन है जब मैं समय रहते दिनकर जी को पढ़ लेता हूँ। 

हिंदी साहित्य के ये वह साहित्यकार थे जिनकी ओजगुण की कविताओं से समाज में न केवल युगांतरकारी परिवर्तन आया बल्कि ऐसे लेखन का भी निर्माण हुआ, कि जिस समय बड़े-से-बड़े नेता और साहित्यकार भी अंग्रेजी सरकार की दमनकारी व्यवस्था के विरुद्ध खुलकर नहीं आ पा रहे थे, वहीं दिनकर निरन्तर देश और जनता के अधिकार के लिए, स्वराज के लिए, उसके स्वाभिमान के लिए, देश की माटी के लिए निर्भीक रूप से लिख रहे थे। यह देखकर अंग्रेजी हुकूमत के पाँव लड़खड़ाने लगे थे। गौरतलब यह है कि अंग्रेजीराज में कार्यरत होने के बावजूद उन्होंने अपनी नौकरी को राष्ट्रसेवा और सरकार की दमनकारी नीतियों के विरोध के बीच कभी आने नहीं दिया। उन्होंने कभी भी देशहित के लिए , देशसेवा के लिए अपनी नौकरी की परवाह नहीं की। अंग्रेजी सरकार जब उनकी सरकार विरोधी कविताओं के बारे में पूछती तब वह सहज ही स्वीकार करते कि, " हाँ मैंने ही ये कविता लिखी है" । उनकी लेखनी शुरुआत से ही राष्ट्र को समर्पित थी। किसानों, मजदूरों और भोली-भाली जनता के दुखदर्द को न केवल वह देखते और अनुभव करते थे बल्कि उनकी समस्याओं, उनकी चिंताओं आदि को अपनी कलम से आवाज़ भी देते व बहरी सरकार के कानों तक भी पहुँचाते। दिनकर पर माखनलाल चतुर्वेदी, भगवतीचरण वर्मा और बालकृष्ण शर्मा "नवीन" का प्रभाव पड़ा है। विशेष रूप से माखनलाल जी का प्रभाव दिनकर पर पड़ा क्योंकि उनकी राष्ट्रीय भावना से कहीं-न-कहीं वह भी प्रेरित हो रहे हो। (1)
 
अपने बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व के लिए उन्हें कई सम्मान जैसे "साहित्य अकादमी" और हिंदी के शिखर पुरुस्कार "ज्ञानपीठ पुरस्कार" से भी सम्मानित किया गया। और इस तरह से दिनकर लगभग आधी शती तक हिंदी साहित्य और देश की सेवा में कार्यरत रहे। तो आइए दिनकर जी के बारे में थोड़ी सी और जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं जो परीक्षा के स्तर पर और हिंदी के ज्ञानवर्धन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगी।


"राष्ट्रकवि दिनकर" का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार राज्य के बेगूसराय जिले के एक साधारण से गाँव "सिमरिया" में हुआ था। इसी मिट्टी में ओज की कविता का एक सूर्य जन्मा था।जिस तरह से पूर्व की ओर से सूर्य का उदय होता है उसी तरह भारत के पूर्वी प्रदेश में दिनकर का जन्म हुआ था। दिनकर की माता का नाम "मनरूप देवी" और पिता का नाम "बाबू रवि सिंह" था। उनके बचपन के दिन बहुत ही तंगी और आर्थिक बदहाली में गुजरे थे। जहाँ घर के नाम पर केवल एक मिट्टी की चारदीवारी थी और प्रकाश के नाम पर आँगन में आती हुई धूप। जिस स्थान से उन्होंने अपनी शिक्षा का शुरुआती अध्ययन शुरू किया था वह "पारो" गाँव का मिडिल स्कूल था और वह भी कई गाँवो के बच्चों के लिए एकलौता ही था। परिवार जहाँ एक तरफ आर्थिक तंगी का बोझ झेल रहा था तो वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार की यातनापूर्ण व्यवस्था की मार पूरे भारत में दिख रही थी और इसी समय मात्र 2 साल की उम्र में दिनकर को पिता के देहावसान का बोझ भी उठाना पड़ा। 13 साल की उम्र में दिनकर के जीवन में एक नया मोड़ आया जब उनका विवाह "श्यामवती देवी" से हुआ और वह 2 पुत्रों "रामसेवक सिंह" और "केदारनाथ सिंह" तथा 2 पुत्रियों "विनीता देवी" और "विभा देवी" के पिता बने। उम्र का 20वां वर्ष दिनकर के लिए खुशियाँ लेकर आया जब उन्होंने पूरे प्रांत में मेट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की और "भूदेव स्वर्ण पदक" से सम्मानित हुए। इसी वर्ष दिनकर का 34 कविताओं से संकलित प्रथम काव्य संग्रह "विजय सन्देश" नामक प्रकाशित हुआ। जिसमें "बारडोली सत्याग्रह" जिसमें सरदार पटेल की विजयगाथा का वर्णन किया गया था, वह पूरे सिमरिया में प्रसिद्ध हो चुका था। 24 वर्ष की आयु में दिनकर पटना से "इतिहास विशेष" में स्नातक कर चुके थे। 

दिनकर को जिस ओजगुण की कविता के लिए जाना जाता है उसकी शुरुआत 1933, बिहार के भागलपुर में "बिहारी हिंदी साहित्य सम्मेलन" में काव्यपाठ करने से शुरू हुई जब उन्हें आमन्त्रित किया गया था। जहाँ "हिमालय" नामक विषय पर कविता पाठ करना था। यह अक्टूबर-नवम्बर का माह था जब दिनकर "लालूचट मोहल्ले" में अपने एक मित्र के घर ठहरे थे और उसी रात को हिमालय पर कविता लिखी थी। अगली सुबह अपनी प्रसिद्ध कविता "हिमालय के प्रति"का पाठ किया जिसकी पंक्तियाँ कुछ इस तरह से थी:- 
      
मेरे नगपति मेरे विशाल
साकार गौरव दिव्य विराट
पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल
मेरी जननी के हिम किरीट
मेरे भारत के दिव्य भाल
मेरे नगपति मेरे विशाल....।

इसी के कुछ वर्षों बाद जब धीरे-धीरे दिनकर अपनी पहुँच बना रहे थे,जनता और साहित्यकारों से जुड़ने की कोशिशें चल रही थी, तब अपनी विशेषता के आधार पर छायावादी व्यक्तिगत काव्य संसार में, द्विवेदीयुगीन सामूहिकता और सजगता के साथ अपनी ओजगुण से लबरेज़ कविताओं के माध्यम से साहित्य में अपनी जगह को बनते देखा। 1935 के काव्यसंग्रह "रेणुका"और 1939 के काव्यसंग्रह "हुंकार" ने इस विशेषता पर मुहर लगाने का कार्य किया। 

जैसे-जैसे देश में क्रांतिकारी व्यक्तित्वों का निर्माण हो रहा था उसी समय अंग्रेजी सरकार के कानों में एक ऐसे राष्ट्रवादी व्यक्तित्व की धमक सुनाई पड़ी जिसने अंग्रेजी सरकार की हुकूमत को खुलेआम चुनौती देने की हिमाकत की थी और वह व्यक्तित्व और कोई नहीं  दिनकर ही थे। अपनी इसी क्रांतिकारी विचारधारा के कारण उन्हें 4 साल में लगभग 22 बार ट्रांसफर का भी सामना करना पड़ा जब उन्हें 1933-34 तक परबीघा हाईस्कूल का प्रधानाचार्य बनाया गया। उसके बाद 1934-42 तक सीतामढ़ी "सब रजिस्ट्रार" के पद पर कार्यरत किया गया। 1943-45 तक युद्ध प्रचार के लिए भेजा गया। 

एक तरफ जहाँ ब्रिटिश सरकार दिनकर की लेखनी पर रोक लगाने के तमाम प्रयास किये जा रही थी, उन्हें अपना गुलाम समझ कर लगातार उनका ट्रांसफर करना और अन्य तरह की यातनाएं देकर उन्हें दबा देना चाह रही थी वहीं दिनकर केवल शरीर से ही सरकार के गुलाम थे मन से वह पूरी तरह से राष्ट्र के कवि थे। वह लगातार गुलामी के विरुद्ध लेखनी ही नहीं चलाते थे बल्कि स्वतंत्रता के कार्यक्रमों में भी शामिल हुआ करते थे। लगातार सत्ता पक्ष की क्रूर व्यवस्था पर कलम के कोड़े बरसाना उनके व्यक्तित्व की पहचान थी।

तू वैभव मन में इठलाती
परकीया सी सैन चलाती
री ब्रिटेन की दासी
किसको इन आँखों पर है ललचाती..।

दिनकर न केवल राष्ट्रहित और स्वतंत्रता सैनानियों के लिए ही कलम चलाते थे बल्कि उन आडम्बरों व सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध भी अपने पैनी नजर गड़ाए रखते थे जिससे भारतीय समाज का अहित होता हो। प्रस्तुत पंक्तियों में कुछ ऐसा ही स्वर देखने को मिलता है...।

जाग उठ, आडम्बर में आग लगा दे
पतन पाप का दंड जले 
जग में ऐसी ज्वाला सुलगा दे..।

भारतीय किसानों के प्रति दिनकर को काफी सहानुभूति थी। उनके परिश्रम को सम्मान के साथ दिनकर ने याद किया है जहाँ उनका उगाया हुआ प्रत्येक दाना हमारे लहू में दौड़ रहा है। दिनकर की "हमारे कृषक" कविता इसी भाव के साथ रची है:-

जेठ हो कि पूस हो, हमारे कृषकों को आराम नहीं है
छूटे कभी संग बैल का ऐसा कोई याम नहीं है
मुख में जीभ,शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है
वसन कहाँ? सुखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है..।

हिंदी साहित्य में कविता की भाषाई परिवर्तन पर भी दिनकर को विशेष रूप से याद किया जाता है जहाँ उन्होंने सामान्य भाषा का इस्तेमाल किया। केदारनाथ सिंह के शब्दों में " दिनकर और बच्चन यह दोनों एक साथ आये थे और दोनों ही छायावाद के उत्तरार्ध के कवि हैं। इन दोनों ने ही कविता की भाषा को संस्कृतनिष्ठ रूप से स्वतंत्र कराने में बड़ी भूमिका निभाई। जिसमें उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी यत्र-तत्र प्रयोग होता रहता था। और इस तरह से छायावादी काव्य भाषा जो बर्फ की तरह जमी हुई थी उसे पिघलाने का कार्य इन दोनों कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से किया है। इसी कारण उनकी कविता दूरदराज तक सफल हुई"।

कुछ ऐसा ही नजरिया "विश्वनाथप्रसाद तिवारी" का भी है " दिनकर के अनुभव का जो लोक है वह अपने समाज के आजादी के उद्वेलन का चित्रण है।इसलिए उनके अनुभव की भाषा भी ऐसी ही थी। दिनकर जी को अपने पाठकों तक पहुँचने के लिए बड़ी गरिमा और सहजता को चुनना पड़ता था"।

"अशोक वाजपेयी" जी के अनुसार दिनकर की भाषा शुरू से अंत तक एक जैसी नहीं रही, उसमें निरन्तर परिवर्तन हुए हैं। उनके सम्बोधन की शैली से उनकी छवि बनी है जिसमें सामान्य जन के लिए कविता करना ही उनका ध्येय है। शुरुआती समय में उनकी भाषा "स्वन्त्रता संग्राम" से जुड़ी नजर आती है और उसके बाद "उर्वशी" के रचनाकाल में फिर से एक मोड़ आता हुआ दिखाई देता है। इसके बाद "हारे को हरिनाम" में एक और बदलाव आता है। उनकी भाषा में रीति भी है, छायावाद भी है,  छायावादोत्तर भी है, नई कविता की भी झलक है"...।

दिनकर की भाषा ऐसी है कि जिसे पाठक वर्ग, न केवल पढेलिखे लोगों से सम्प्रेषण कर सकता है बल्कि निरक्षर लोगों से भी अपनी बात को पहुँचा सकता है।

समय का चक्र चलता रहा और जब दूसरे विश्वयुद्ध के समय पूरा विश्व एक-दूसरे देशों पर अपनी विजय पताका फहराने की अंधीदौड़ में मानवता की बलि देने में लगा था, हथियार बंद सैनिकों के रूप में दानव वृति छाई हुई थी तब दूसरे विश्वयुद्ध के अंधकार को दिनकर ने काफी नजदीक से महसूस किया था। इसी से प्रभावित होकर युद्ध और शांति पर गहन रूप से अध्ययन करने के पश्चात महाभारत को आधार बनाकर "भीष्म और युधिष्ठिर के संवाद" के माध्यम से अपने प्रबन्ध काव्य "कुरुक्षेत्र" 1946 की रचना की। जहाँ युद्ध की मनाही है। दिनकर का मत था कि सदैव विजय के पीछे मत भागो, कभी-कभार भुजबल के स्थान पर मनोबल से भी युद्ध को जीता जा सकता है और हारकर भी मानवता के लिए विजयी बना जा सकता है। जिससे मानव जाति का सर्वनाश न हो, प्रकृति को नुकसान न पहुँचे।

जानता कहीं परिणाम महाभारत का
तनबल छोड़ मैं मनोबल से लड़ता
तप से, सहिष्णुता से, त्याग से सुयोधन को जीत 
नई नींव इतिहास की मैं धरता...।

इस सम्बन्ध में नामवर सिंह जी कहते हैं कि " सीधा सपाट सन्देश नहीं है कुरुक्षेत्र का,वह थोड़ा घुमावदार ढंग से पेश किया गया है। क्योंकि पृष्ठभूमि में दिव्तीय महायुद्ध को आधार बनाया गया है। उस समय सीधा कहा जाना उतना आसान नहीं होता क्योंकि दिनकर जी अंग्रेजी सेना में युवकों की भर्ती कराने के लिए भी प्रचार प्रसार कर रहे थे"। इसके आगे नामवर जी कहते हैं कि "युद्ध कोई नहीं चाहता परन्तु युद्ध अनिवार्य हो जाये तो उससे भागा भी नहीं जा सकता और ऐसा ही कुछ महाभारत में भी हुआ था इसलिए महाभारत का सन्दर्भ दिखाकर युद्ध और शांति पर नए तरीके से कुरुक्षेत्र को लिखा गया है"..।

कुरुक्षेत्र को विश्व के 100 श्रेष्ठ काव्यों में 74वां स्थान प्राप्त है। (2)

जैसे-जैसे देश मे स्वतंत्रता से जुड़े आंदोलन और सत्याग्रह होते गए देश की अखंडता और विजय के सन्देश और मजबूत होते गए। आखिरकार देश की जनता और हजारों स्वन्त्रता सैनानियों के बल से देश को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिल ही गयी। दिनकर ने इस आजादी का सबसे ज्यादा श्रेय जनता को दिया। आगे चलकर दिनकर 1952 से लेकर 64 तक राज्यसभा के सांसद भी रहे और दिल्ली का सच भी देखते रहे। यह अनुभव हुआ कि आजादी के बाद भी देश का हाल बदला नहीं है। जनता को मोहभंग की स्थिति से गुजरते हुए भी दिनकर ने देखा था। उनका मत था कि अंग्रेजी सरकार में भी जनता की बदहाली थी और अपने नेताओं की हुकूमत में भी जनता की वही दुर्गति हुई जा रही है। ब्रिटिश साम्राज्य में भी वह देश की दुर्व्यवस्था के कारण दिल्ली पर अपनी कलम से कोड़े बरसाते थे तो अपने देश के नेता उनकी इस नजर से कहाँ बच सकते थे। उन पर भी बराबर दिनकर प्रहार करते नजर आए हैं:-

लेख लिखने वालों, तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो, हुए हो ?
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने में तुम भी घर भर क्या पेट बाँध कर क्या सोए हो ?
असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में या अनायास जल में बह जाते देखा है ?
क्या खाएंगे, ये सोच निराशा से पागल, बेचारों को नीरव रह जाते देखा है ?
ऐसा टूटेगा मोह एक दिन के भीतर इस राग-रंग की पूरी बर्बादी होगी

दिनकर की कृतियों में ऐसे पात्रों की भी रचना हुई है जो किसी भी परिस्थिति में डटकर दुश्मन दल से लोहा लेना जानते हैं। ऐसे पात्र अपनी जिजीविषा और अपने कर्म के प्रति बिल्कुल वफादार रहते हैं। इसके अलावा दलितों, अछूतों, असहायों, मुख्यधारा से अलग होने के बावजूद अपनी जगह बनाने वाले पात्रों के प्रति भी दिनकर को गहरी सहानुभूति थी।कर्ण के माध्यम से दिनकर कहते हैं":-

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतलाक़े
पाते हैं प्रशस्ति अपना करतब दिखला के
हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक
वीर खींचकर ही रहते हैं इतिहासों में लीक


ऐसे ही महाभारत के एक पात्र "कर्ण" को केंद्र में रखकर दलितों के प्रति अपनी सहानुभूति का परिचय दिनकर ने अपनी लोकप्रिय व प्रसिद्ध कृति "रश्मिरथी" जिसका प्रकाशन 1952 में हुआ था, में दिया है। इस कृति के माध्यम से वह स्थापित करना चाहते हैं कि अवर्ण भी वरणीय है उसे भी समाज में उतना ही अधिकार है जितना कि सवर्ण को। यह युग दलितों के उद्धार का युग है जहाँ कर्ण हजारों साल से उपेक्षित अवर्णो का प्रतिनिधित्व करते हुए कहता है।(3)
 

मैं उनका आदर्श जो व्यथा न खोल सकेंगे
पूछेगा जग,किंतु पिता का नाम न बोल सकेंगे
जिनका निखिल विश्व में कोई कहीं न अपना होगा
मन में लिए उमंग जिन्हें चिरकाल कल्पना होगा

जाति के नाम पर मानवता को बाँटने वालों पर प्रहार करते हुए दिनकर कर्ण के माध्यम से कहते हैं कि 

जाति, हाय री जाति! कर्ण का हृदय क्षोभ से डोला
कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला
जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषंड
मैं क्या जानूँ जाति? जाति है मेरे भुजदंड 

आगे चलकर दिनकर जी ने विशालकाय इतिहास ग्रन्थ जिसमें भारतीय संस्कृति के मुख्यतः उन चार पड़ावों का विशद वर्णन करके न केवल भारतीय संस्कृति से पाठकों को अवगत कराने की अच्छी कोशिश की गई है बल्कि अपनी व्यापक वैचारिकी का भी प्रमाण दिया। जिन्हें अभी तक केवल ओजगुण और माधुर्यगुण का कवि समझा जाता था, समाज को यह अंदाज़ा नहीं था कि वह इतना विशालकाय ग्रँथ भी लिख सकता है और अपनी सांस्कृतिक चेतना के अंश भी अभिव्यक्त करा सकता है। "संस्कृति के चार अध्याय" न केवल भारतीय संस्कृति को समझने में सहायक ग्रँथ है बल्कि दिनकर इस ग्रँथ के माध्यम से किस संस्कृति को अपनाना चाहिए और किसका बहिष्कार करना चाहिए इसका भी सन्देश देते हैं। इसी की पुष्टि हिंदी साहित्य के नवीन आलोचक "विश्वनाथप्रसाद तिवारी" करते हुए कहते हैं कि" यह जो जिस संस्कृति को हम शुद्ध रूप में प्रस्तुत करते हैं इस संस्कृति का विश्लेषण होना चाहिए क्योंकि इसकी बहुत ही लम्बी यात्रा रही है और यह बहुत से मिलावटों के बीच से यह धारा बही है। संस्कृति पर गहरा चिंतन दिनकर की इस कृति में देखने को मिलता है। संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर की ध्वनि यह है कि संस्कृति में सहिष्णुता होनी चाहिए, कट्टरता नहीं होनी चाहिए। संस्कृति में जब कट्टरता के तत्व आते हैं तब वह संस्कृति नहीं रह जाती है वह एक तरह की विकृति हो जाती है"...।

नामवर सिंह जी भी इस ग्रँथ पर अपने विचार रखते हुए कहते हैं कि " संस्कृति के चार अध्याय, वैसे तो भारतीय संस्कृति पर अनेकों पुस्तकें प्रकाशित हुई है परंतु इस पुस्तक में भारतीय संस्कृति के चार युगों का वर्णन है जिसके पीछे दिनकर का बहुत गहरा अध्ययन देखने को मिलता है और इस कृति को इसलिए ही 1959 में "साहित्य अकादमी" भी मिला। और यह बात भी विशेष है कि इस कृति की भूमिका जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने शायद ही हिंदी की किसी कृति में भूमिका लिखी होगी, इस कृति की लंबी भूमिका लिखी थी"। 

जवाहरलाल नेहरू संस्कृति के चार अध्याय की प्रस्तावना में संस्कृति की परिभाषा बताते हुए कहते हैं " संस्कृति क्या है? शब्दकोश टटोलने पर पता चला कि संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गयी है, उनमें अपने आप को परिचित कराना ही संस्कृति है"...। इस कृति के लिए अपने मित्र दिनकर का धन्यवाद करते हुए इस पुस्तक की सराहना भी करते हैं और पाठकों के लिए इस लाभान्वित कृति भी घोषित करते हैं। (4)

1961 में प्रकाशित दिनकर की सर्वश्रेष्ठ कृति "उर्वशी" का प्रकाशन हुआ जिसके लिए उन्हें साहित्य के सबसे उत्कृष्ट सर्वोच्च पुरुस्कार "भारतीय ज्ञानपीठ" से 1972 में सम्मानित किया गया। यह कृति काम जैसे मनोभाव के महत्व को स्वीकारने और उसको आध्यात्मिक गरिमा तक पहुँचाने में जिस साहस की आवश्यकता चाहिए थी वह दिनकर के पास उपलब्ध थी। कृति की "भूमिका" में ही बताया गया है कि "इस कथा का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जिसमें बताया गया है कि पुरुरवा की उतपत्ति इला और चन्द्रमा के पुत्र बुध के आपसी प्रेम और उसके बाद कि प्रक्रिया के बाद हुआ। और उर्वशी की उतपत्ति के सम्बंध में 2 मत दिए गए हैं। पहला यह है कि जब अमृत मंथन के समय कई अप्सराओं का जन्म हुआ था उसी समय उर्वशी का भी जन्म हुआ था। दूसरा मत "ऋषि नारायण" के यज्ञ को भंग करने के लिए इंद्र ने अप्सराओं को धरती पर भेजा था तभी ऋषि नारायण ने अपने "उर" (जाँघ) को ठोक कर उर्वशी को उतपन्न किया था जोकि उन अप्सराओं से भी ज्यादा रूपवान थी"..। इसके अतिरिक्त प्रेम के सम्बंध में दिनकर जी एक विशेष बात यह बताते हैं कि "मनुष्य में बुद्धि और कल्पना की शक्ति है जो पशुओं में नहीं है"..। इसी के आधार पर हम प्रेम और काम जैसे मनोभावों को सही मायनों में समझ सकते हैं। उसके पवित्र रुप को समझ सकते हैं, प्रेम को व्यापक बनाकर जी सकते हैं। इन्ही सब विचारों की पुष्टि दिनकर अपनी इस कृति के माध्यम से दिखाना चाहते हैं। इस कृति में दिनकर अर्धनारीश्वर का अर्थ समझाते हुए कहते हैं" जिस पुरुष में नारीत्व नहीं वह अधूरा है और जिस नारी में पुरुषत्व नहीं वह भी अधूरी है"...। प्रस्तुत पंक्ति दिनकर के व्यक्तित्व के पौरुष और स्त्रीत्व की पहचान कराता है। अर्थात वे केवल ओजगुण के ही कवि नहीं थे उनकी कविताई में प्रेम और माधुरी गुण के भी तत्व यथासम्भव दृष्टव्य होते रहे हैं। (5)

दिनकर की कृति 1963 में "परशुराम की प्रतीक्षा" भारत चीन के "नेफायुद्ध" पर आधारित है जहाँ भगवान परशुराम के माध्यम से उन्होंने बताया है कि "जिस प्रकार उन्होंने अपने कुठार को लोहित कुंड में स्नान कराके पापमुक्त कराकर 100 वर्षों तक अन्याय के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी और प्रतिशोध शांत होने के बाद अपने कुठार को कोंकण (वर्तमान का केरल प्रदेश) के पास समुन्द्र में फेंक दिया था आज उसी कुठार की पुनः आवश्यकता आन पड़ी है जिससे कि शत्रुओं का विनाश किया जा सके। जिससे कि आने वाले समय में कभी भी कोई भी देश भारतवर्ष से टकराने और उसके साथ छलकपट करने से पहले कई बार सोचे। और ऐसी ही आशा के साथ दिनकर कहते हैं
 
"तांडवी तेज फिर से हुंकार उठा है
लोहित में था जो गिरा, कुठार उठा है"..।(6)

जहाँ एक तरफ दिनकर अपनी कलम के माध्यम से देश की सेवा कर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ सक्रिय राजनीति में उतर कर भी वह वही कार्य कर रहे थे जो एक साहित्यकार होने के नाते करते थे। सक्रिय राजनीति में आकर उन्होंने बाकी नेताओं की तरह भोग-विलासिता को अपने व्यक्तित्व का अंग नहीं बनाया बल्कि जब तक वह अपने पद पर आसन रहे तब तक निःस्वार्थ रूप से देश की सेवा की और सदैव जनता और राष्ट्र के हित के लिए सोचा। और ऐसा नहीं था कि वह संसद के सदस्य थे और नेहरू जी के अच्छे मित्र थे तो उनकी नीतियों का विरोध नहीं करते थे। वह बराबर नेहरू जी से विचार-विमर्श और बीच-बहस किया करते रहते थे। ऐसा ही एक दृश्य तब घटा जब 1962 के युद्ध में भारत को परास्त होना पड़ा। तब नेहरू सरकार की गलत नीतियों पर संसद सभा से ही दिनकर ने यह कविता पढ़कर नेहरू सरकार पर प्रहार किया था। 

रे रोक युधिष्ठिर को, न यहाँ जाने दे उनको स्वर्गधीर
फिरा दे हमें गाण्डीव, गदा लौटा दी अर्जुन भीम वीर

इस कविता के बाद पूरे संसद में मौन छा गया और नेहरू जी का मुँह शर्म के मारे नीचे झुक गया।  (7)

दिनकर 1952-64 तक "राज्यसभा सांसद" रहे।1964 में "भागलपुर विश्विद्यालय के कुलपति" बने परन्तु वहाँ के जातिवादी जमावड़े की उंगलियों पर नाचने से दिनकर ने साफ इनकार करके इस्तीफा दे दिया।उसके उपरांत भारत सरकार ने उन्हें "हिंदी सलाहकार बोर्ड" में सदस्यता दी। 

सन 1974 में तिरुपति की एक काव्यगोष्ठी में जाने पर दिनकर जी से पद्मा सचदेवा ने पूछा कि "आप कहाँ जा रहे हैं तब उन्होंने कहा था कि मैं मरने जा रहा हूँ"। शायद उन्हें पता था कि वह अब वह ज्यादा जी नहीं पाएंगे क्योंकि लंबे समय से वह बीमार भी चल रहे थे। शायद यह पहली और आख़िरी बार था कि तिरुपति के मंदिर में दिनकर जी का काव्यपाठ हुआ था जहाँ उन्होंने रश्मिरथी के तीसरे सर्ग के "भगवान के विराट रूप" का वर्णन किया था और यह दिनकर जी का अंतिम काव्यपाठ माना गया। 24 अप्रैल 1974 की रात दिनकर को दिल का दौरा पड़ा और वह उसी रात वह भगवान के विराट रूप में समा गए। पटना के बाँसघाट पर दिनकर जी का पार्थिव शरीर पूरे राजकीय सम्मान के साथ पंचतत्वों में विलीन किया गया। और इस तरह से हिंदी साहित्य के उस तेज की चमक में एक धुंधली छाई जिसे कभी पूरा देश सम्मान की नजरों से देखता था। 

भले ही दिनकर की मृत्यु हो गयी है परन्तु वह फिर भी गूंज रहे थे..

धन्यवाद, मैं सचमुच नहीं मरूँगा
मरणकोटि पर चढ़ जीवन की ध्वजा उड़ा कर
मैं मृत्युंजय कवि, प्रकाश की जय का गान करूँगा

दिनकर की एक खास विशेषता होती है कि वह कभी अस्त नहीं होता उसी तरह से कवि दिनकर आज भी  हमारे साथ बने हुए हैं। वह कभी अस्त नहीं हो सकते

दिनकर के लगभग 50 वर्षों के कार्यकाल से प्रभावित होकर उन्हें समय समय पर कई सम्मानों से नवाज़ा गया है  जैसे:-

1 राजेन्द्र प्रसाद जी द्वारा 1959 में भारतीय नागरिक सम्मान "पदम् विभूषण" से सम्मानित किया गया।

2 1959 में ही संस्कृति के चार अध्याय के लिए "साहित्य अकादमी" से सम्मानित किया गया।

3 राजस्थान विद्यापीठ द्वारा 1968 में "साहित्य चूड़ामणि" से सम्मानित किया गया।

4 उर्वशी के लिए 1972 में साहित्य के शिखर पुरुस्कार "भारतीय ज्ञानपीठ" से सम्मानित किया गया।

5 भागलपुर विश्विद्यालय के कुलाधिपति डॉ जाकिर हुसैन जी ने उन्हें डी. लिट् की उपाधि से सम्मानित किया।

6 "कुरुक्षेत्र" काव्य संग्रह के लिए साहित्यकार संसद, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार ने सम्मानित किया।

7 राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने सरस्वती की हीरक जयंती पर राजस्थान विद्यापीठ से सम्मानित किया।

8 भारत सरकार द्वारा 1999 में उनके सम्मान में डाक टिकट भी निकाला गया।


प्रस्तुत जानकारी की सन्दर्भ सूची दी जा रही है:-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृ - 404 से 407 तक।

2 Top famous epics of the world 
3 रश्मिरथी, लोकभारती प्रकाशन, भूमिका से।

4 संस्कृति के चार अध्याय, उदयाचल प्रकाशक, पटना, प्रथम संस्करण 1956, प्रस्तावना से।

5 उर्वशी, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1961, भूमिका से।

6 परशुराम की प्रतीक्षा, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1963, भूमिका से।

7 EIV भारत न्यूज चैनल की रिपोर्ट, (बिहार)

अन्य जानकारियां ली हैं  साहित्य अकादमी द्वारा "दिनकर: व्यक्तित्व और कृतित्व " वृतचित्र व दिनकर विकिपीडिया से।

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