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Wednesday, June 16, 2021

आधुनिक काल भाग 10

 

                (अन्य सप्तक के कवि )


"हिंदी साहित्य लोचन" , hindisahityalochan, sahityahindilochan.blogspot.com


● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "प्रयोगवाद" भी है। आज हम  'प्रयोगवाद के दूसरे व तीसरे सप्तक के कवियों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप प्रयोगवादी कवियों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।


1. शमशेर :-

प्रयोगवादी कवियों में शमशेर की गिनती एक अनोखे कलाकार के रूप में कई जाती है। यह कला उनकी लेखनी में देखी जा सकती है जहाँ उन्होंने शब्दों का चयन बड़ी सूझबूझ और इत्मीनान से किया है। इसके अलावा बिम्बों की रचना उनकी इस कला में चार चाँद लगाने का उद्योग करती है। मानो ऐसा लगता है कि शमशेर अपनी कलम के माध्यम से शब्दों में रंग भर रहे हों इसी आधार पर उन्हें एक चित्रकार के रूप में भी देखा जाता है। शमशेर की इसी कलात्मकता पर कुछ विद्वानों ने अपने मत प्रस्तुत किये हैं जो निम्नांकित हैं -

अ. "विश्वनाथ त्रिपाठी" के अनुसार शमशेर ने फ्रांसीसी प्रतिकवादियों के प्रभाव में आकर कविताएँ लिखी थी इसलिए उन्हें "कवियों का कवि" कहा जाता है।

ब.  "बच्चन सिंह" के अनुसार शमशेर मूलतः प्रयोगवादी कवि हैं। इस दृष्टि से वह अज्ञेय के निकट पाए जाते हैं।

"हिंदी साहित्य लोचन" hindisahityalochan के मंच पर आप जान पाएंगे कि , शमशेर की रचनाओं में सम्वेदना पक्ष कितना ठोस और मजबूती से जुड़ा है उसको बच्चन सिंह इस आधार पर सिद्ध करते नजर आते हैं। उनके अनुसार शमशेर का सम्वेदना पक्ष कोई हवाई खेल नहीं है कि मानो कोई कविता पढ़ी और उसमें से निकलने वाला भाव कहीं दूर ही आसमान में उड़ता नजर आ रहा हो। इसे और भी आसानी से समझने के लिए ऐसे भी देख सकता हैं  जब भी कोई कलाकार किसी कला की रचना करता है तो उसे एक ठोस आधार की आवश्यकता होती है। भवन निर्माण के समय सबसे पहले उसकी नींव तैयार की जाती है जिस पर पूरा भवन टिका होता है। यदि इस नींव में ही कहीं कोई कमी या कमजोरी आ गयी तो भवन धड़ाधड़ गिर जाएगा। ठीक ऐसे ही कलाकार को भी कल्पना व सम्वेदना का सहारा उतना ही लेना चाहिए जिससे उसका मर्म मौलिक लगे न कि हवाई। इसी संदर्भ में बच्चन सिंह आगे कहते हैं, " शमशेर के प्रयोगवाद का रथ संवेदना का धरातल नहीं छोड़ता है लेकिन जिस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर का रथ धरती से चार अंगुल ऊपर चला करता था उसी प्रकार अज्ञेय का प्रयोगवादी रथ भी संवेदना के धरातल से चार अंगुल ऊपर चलता है।"

वह शमशेर को प्रेम के कवि बताते हुए उन्हीं की बातों मे कहते हैं " मेरी असली जमीन तो रोमानी ही थी, रोमानी बनी रही"..।वह त्रिलोचन की तरह या अन्य कवियों की तरह सबकुछ कह देने के पक्ष में नहीं हैं, वह बिंबो के माध्यम से शब्दों को अनायास बिखेर देते हैं।

बच्चन सिंह के अनुसार शमशेर प्रेम और प्रकृति-सौंदर्य के कवि हैं- कहीं दोनों अलग हैं और कहीं दोंनो एक साथ। दोनों का अद्भुत रासायनिक घोल है। अपने चित्रों को बनाने में वह कई रंगों का प्रयोग करते हैं। रंग कई हैं- पर एक भी चटकीला नहीं है- सब किंचित मटमैले, धुँधले, साँवले, उदास"...।

बच्चन सिंह के अनुसार टी.एस इलियट की तरह शमशेर भी धार्मिक और यौन-बिंबों को एक साथ रखकर नया प्रभाव पैदा करते हैं । और उनका संघर्ष निजी है, प्राइवेट है"..।

स. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार अज्ञेय और शमशेर बात के कवि हैं। शमशेर ने अपने काव्य-संकलन "कुछ और कविताएँ" की भूमिका में लिखा है "हर भाषा की जान होता है मुहावरा"..।


शमशेर अपनी निजी अनुभतियों, उनकी बारीक बुनावट और प्रायः दुरूहता के कारण भी लोगों का ध्यान आकृष्ट करते हैं।

शमशेर ने माना है कि " टेक्नीक में एजरा पाउंड शायद मेरा आदर्श बन गया है। इसके आगे कहते हैं कि  " मैं उर्दू और हिंदी का दोआब हूँ।

शमशेर की लंबी कविता "अमन राग" प्रगतिवादी सरोकारों से सम्बद्ध है।


● शमशेर पर कहे गए कथन:-

1. मलयज के अनुसार 'शमशेर मूड्स के कवि' हैं।

2. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार ये 'बात के कवि' हैं।

3. अज्ञेय के अनुसार ये 'कवियों के कवि' हैं।

4. मुक्तिबोध के अनुसार कवि की 'मूल दृष्टि इम्प्रेशनिस्टिक' की है। इसके आगे वह कहते हैं कि इनकी अभिव्यक्ति एक प्रभावशाली भवन है जिसमें जाने में डर लगता है। यह प्रणय जीवन के रससिद्ध कवि हैं।

5. विष्णु खरे ने 'शमशेर की शमशेरियत' कहा है।

6. रामचंद्र तिवारी के अनुसार 'शमशेर का गद्य हिंदी का जातीय गद्य' है।

   

2. नरेश मेहता :-

नरेश मेहता की शुरुआती कविताओं में ऋग्वैदिक ऋचाओं का आदिम बिंबो का प्रभाव गहराई से दिखाया है। दूसरा सप्तक में संकलित " किरण धेनुएँ" और "उषस" ऐसी ही कविताएँ हैं।

इनकी प्रसिद्ध रचना "मेरा समर्पित एकांत" कविता को नरेश मेहता ने नई कविता की 'पहली लम्बी कविता' कहा है।

इनकी "समय देवता" कविता में दुनिया भर के देशों की सांस्कृतिक राजनीतिक गतिविधियों का दृश्यांकन हुआ है । इसके माध्यम से कवि विभिन्न भूखंडों के भूगोल, इतिहास और संस्कृति पर कुछ इस ढंग से प्रकाश डालता है कि वहाँ के निवासियों की रीति-नीति और आशा- आकांक्षाएं उद्घाटित हो उठती है। लम्बी कविता होने के कारण इसके चरणों मे विलम्बित तय का विधान किया गया है।


3. धर्मवीर भारती :- 

मूलतः दूसरे सप्तक के महत्वपूर्ण कवि धर्मवीर भारती का हिंदी साहित्य में नाटकों के लिए विशेष रूप से योगदान माना गया है, बहुत हदतक उपन्यास में भी। फिर भी इनकी कुछेक कविताएँ काफी प्रसिद्ध हुई जिसके कारण कुछ-कुछ कविताओं में भी इनका नाम चल पड़ा। इनकी प्रसिद्व कविताओं का वर्णन नीचे दिया जा रहा है -

बच्चन सिंह के अनुसार धर्मवीर भारती व्यक्ति-स्वातंत्र्य के कवि हैं। इनका "ठंडा लोहा" 1952 काव्य संग्रह कैशोर भावुकता से भरा है।

"सात गीत वर्ष" में उन्होंने अपनी किशोर भावुकता को भी तोड़ने की कोशिश की है। "प्रमथ्यु गाथा" इस काव्य संग्रह की लंबी कविता है जिसमें एक यूनानी मिथक है। प्रमथ्यु स्वर्ग स्थित द्युतिपुर को कठोर दंड देने का निश्चय किया। प्रमथ्यु को एक शिलाखण्ड से बाँध दिया गया। उसके हृदय मास-पिंड को नोंच-नोंच कर खाने के लिए बूढ़े गिद्ध को तैनात कर दिया गया है।

"कनुप्रिया" 1959 में कवि ने महाभारत की कथा को आधार बनाकर युद्ध के बाद कृष्ण उसकी थकान से राधा के पास जाकर अपनी थकान मिटाने जाएंगे। यह थकान प्रेम प्रसंग से जुड़ी है।


4. कुँवर नारायण :- 

इनकी सबसे प्रसिद्ध कविता जोकि लमबी कविता है वह आत्मजयी है जिसमें जीवन-मृत्यु जैसे गम्भीर विषय पर चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त नचिकेता द्वारा यमराज के समक्ष अपने अस्तित्व को लेकर भी प्रश्न दागे गए हैं 

 बच्चन सिंह के अनुसार कुँवर नारायण चिंतक कवि हैं। इनके काव्य संग्रह " चक्रव्यूह" 1956 में "रहना आदमी की नियति है तो उसे तोड़ना उसका धर्म"..। यही कविता का कथ्य है।

"आत्मजयी" 1965 की कथा वस्तु कठोपनिषद की यम-नचिकेता कहानी पर है। उपनिषद काल वैदिक काल के भौतिकवाद के विरुद्ध एक आध्यात्मिक प्रतिक्रिया है। इस वृति में भी भौतिकता के विरुद्ध इसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है। किंतु इसे जीने की सार्थकता या सर्जनात्मकता से जोड़कर आधुनिक बना दिया गया है। इसमें अस्तित्ववाद की झलक भी दिखाई देती है।

                                                   

5. रघुवीर सहाय :- 

रघुवीर सहाय की गणना हिंदी कविताओं में एक तेजस्वी , लोकतांत्रिक व मानव मूल्यों के संरक्षक कवि के रूप में कई जाती है। इन्होंने आजादी के बाद भारत की बनती-बिगड़ती तस्वीर को अपनी कलम का माध्यम बनाया। कॉंग्रेस के राज में जिस तरह से जनता का मोहभंग हुआ और भारतीय राजनीति ने किस प्रकार से देश को लूटने का कुकृत्य किया उसका ताज़ा उदाहरण भी इनकी कविताओं से मिल जाता है।

प्रकृति और जीवन की संश्लिष्टता कवि के काव्य-विद्वजन का स्वभाव है।

रघुवीर सहाय की कविता रामदास की हत्या संत्रास को दिखाने वाली कविता है। इनके प्रमुख काव्य संग्रह निम्नांकित हैं - 

"सीढ़ियों पर धूप में" 1960 एक अनाहत जिजीविषा, मध्यवर्गीय जीवन का दबाव और लोकतंत्र की विडम्बनाएँ चित्रित हैं । साथ ही बाद क संकलनों के मुकाबले यहाँ कवि का रुख़ कुछ हदतक कोमल है।

"आत्महत्या के विरुद्ध" 1967 में यह संग्रह जीवन में होने वाली आत्महत्याओं के विरुद्ध ही नहीं है बल्कि साहित्य की हत्या करने वाले वीटनिको और अकवितावादियों क विरुद्ध भी है। वह लोकतंत्र की विडम्बनाओ से सीधे साक्षात्कार करता है।इसमें एक शब्दवेषी छात्र मारा गया है।

"हंसों-हँसो जल्दी हँसो" 1975 में आपातकाल से सम्बद्ध कविताओं का संग्रह है। जहाँ भूमिका नहीं है, कवि मौन है, बोलने की मनाही है। व्यक्ति स्वातंत्र्य के अभाव में केवल हँसा जा सकता है बोला नहीं जा सकता।

"लोग भूल गए हैं" 1982 का मूलाधार भी व्यंग्य और विडम्बना का हिस्सा है।

"मेरा प्रतिनिधि" राममनोहर लोहिया के लिए लिखी गयी है।


6. केदारनाथ सिंह :-

 इनके "यहाँ से देखों" काव्य संग्रह में बच्चन सिंह के अनुसार केदारनाथ सिंह का कविता को देखने का बिंदु बदल जाता है। यह कविता का नया प्रस्थान बिंदु है। इसमें "जमीन पक रही है" काव्य संग्रह में एलिनियेशन इफेक्ट नहीं है और न वाक्यों के स्पीड ब्रेकर"..।

"बनारस"  "यहाँ से देखो" संग्रह की सबसे उत्तम रचना है।

"अकाल में सारस" कवि के अनुभवों का अगला चरण है।

                                             

7. बच्चन सिंह के अनुसार रामविलास शर्मा ऐसा मानते हैं कि  "गिरिजाकुमार माथुर" का किशोर मन न वयस्क होता है, न प्रौढ़, वार्धक्य तू दूर की बात है"..।

8. "श्रीकांत वर्मा" की कविता "मगध" में मगध, कौशाम्बी, हस्तिनापुर, मथुरा, नालंदा, तक्षशिला, अजातशत्रु, शकटार आदि का जादुई वर्णन किया गया है। इसमें एक मायालोक भी है और नहीं भी।

9. बच्चन सिंह के अनुसार "लीलाधर जगूड़ी" वामपंथी विचारधारा के कवि हैं। कहा जाता है कि उनकी आरम्भिक कविताओं पर धूमिल के मुहावरेबाजी और खिलंदड़ापन का प्रभाव है।

इनका "नाटक जारी है" काव्य संग्रह अकवितावाद से मुक्त नहीं है।

10. बच्चन सिंह के अनुसार "चन्द्रकान्ता देवताले" पीड़ा के कवि हैं। कविता को बुलेट बनाने की बड़बोली स्पृहा उनमें नहीं है। आज की दुनिया को सही दिशा में न ले जाने की कविता की अक्षमता उन्हें दुखी कर देती है- और यह जानते हुए भी की भ्रष्ट परिवेश में व्यर्थ हो गयी है कविता, मुझे उसी में मरना है"...।

11. "विनोदकुमार शुक्ल" की कविताओं और उपन्यासों पर लातानी जादुई यथार्थवाद का प्रभाव है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


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