(प्रगतिवाद)
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "प्रगतिवाद" भी है। आज हम 'प्रगतिवाद के कवियों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर आप प्रगतिवादी कवियों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
प्रगतिवाद- एक शुरुआत :-
मार्क्सवादी विचारधारा का साहित्य में प्रगतिवाद के रूप में उदय हुआ। यह समाज को शोषक और शोषित के रूप में देखता है। प्रगतिवादी शोषक वर्ग के खिलाफ शोषित वर्ग में चेतना लाने तथा उसे संगठित कर शोषण मुक्त समाज की स्थापना की कोशिशों का समर्थन करता है। यह पूँजीवाद, सामंतवाद, धार्मिक संस्थाओं को शोषक के रूप में चिन्हित कर उन्हें उखाड़ फेंकने की बात करता है।
● भारत में साहित्य के अंतर्गत प्रगतिशील लेखन की शुरुआत लखनऊ में अप्रैल 1936 ई. के दौरान प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना और प्रथम अधिवेशन के समय से हुई है। इस सभा के सबसे पहले सभापति "प्रेमचंद" थे। जिसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने की। जहाँ उन्होंने अपना अंतिम व्याख्यान " साहित्य का उद्देश्य कहा था। वेसे इस प्रकार के लेखन की शुरुआत कुछ पहले पश्चिम में हो चुकी थी। जिसके आधार पर भारत में इसकी नींव रखी गयी थी।
यह लेखन पूर्णतः मार्क्सवादी चिंतन का केंद्र है। जिसमें समाज को 2 इकाईयों में बांट दिया जाता है। यह समाज शोषक और शोषित वर्ग का विभाजनकारी परिणाम होता है जिसमें शोषित वर्ग अपने हकों के लिए लड़ता है इसके प्रतिनिधि के रूप में समाज के कई क्षेत्रों से तमाम बुद्धिजीवियों का हुजूम खड़ा हो जाता है और इनके अधिकारों की बात समाज के उस वर्ग के समक्ष रखता है जो सदियों से इनका शोषण करते आ रहे हैं।
प्रगतिवादी धारा के साहित्यकारों में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह सुमन, त्रिलोचन, रांघेय राघव
हिंदी साहित्य लोचन, sahityaHindilochan.blogspot.com , hindi sahitya lochan पर आप प्रगतिशील लेखक संघ के बारे में कुछ विस्तृत जानकारी हासिल कर सकेंगे। जो निम्नांकित है -
● सन 1934 में पश्चिम के प्रेमचंद कहे जाने वाले "मैक्सिम गोर्की" के नेतृत्व में रूस में "सोवियत लेखक संघ" की स्थापना हुई थी। यह विश्व का पहला लेखक संगठन था। इसी को और आगे बढाते हुए -
1935 में "हेनरी बाबूरस" के नेतृत्व में संसार के प्रगतिशील लेखकों को संगठित करने का प्रयास पेरिस में किया गया। इसी वर्ष संस्कृति की रक्षा के लिए एक अधिवेशन बुलाया गया। इसके अध्यक्ष अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार और विचारक "ई.एम फॉर्स्टर" थे। इन दोनों ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी।
• उसी लेखक संघ में मुल्कराज आनंद, सज्जाद जहीर, ज्योति घोष, हीरेन मुखर्जी, एस सिन्हा, मोहम्मद दीन तासीन ने भारत की तरफ से इंग्लैंड, जुलाई 1935 में "भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ" का गठन किया था। यहीं पर प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणा पत्र भी तैयार किया गया जिसका सारांश प्रेमचंद ने हंस में प्रकाशित किया था।
प्रगतिवादी साहित्य का सैद्धान्तिक आधार 'मार्क्सवाद का द्वन्द भौतिकवाद' है।
इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि "राजनीति के क्षेत्र में जो समाजवाद या साम्यवाद का नाम है उसी प्रकार से साहित्य में प्रगतिवाद नाम है.....।"
● "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप जान पाएंगे कि किस तरह से हिंदी साहित्य में प्रगतिवाद शब्द की अवधारणा आयी :-
बच्चन सिंह के अनुसार साहित्य में प्रगतिवाद शब्द की शुरुआत कब से हुई है इस विषय पर कोई निश्चित समय दिखता नहीं पड़ता है। 1936 के प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण में "प्रगतिवाद" शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। शिवदान सिंह चौहान के "विशाल भारत" में प्रकाशित "प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता" नामक लेख में भी इस शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। इसमें केवल मार्क्सवादी सिद्धान्तों की चर्चा हुई है। 1938 के "रूपाभ" में भी पन्त ने इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है जबकि यह प्रगतिशील विचारधारा का पत्र था। 1940 हिंदी साहित्य सम्मेलन "पूना अधिवेशन" में नंदुलारे वाजपेयी जी ने इसी विषय पर भाषण दिया था परंतु उस भाषण में भी यह शब्द नहीं आया है।
1942 में मुक्तिबोध का एक लेख "प्रगतिवाद:एक दृष्टि" पत्रिका "आगामी कल" में प्रकाशित हुआ। तार सप्तक 1943 के अपने "वक्तव्य में" प्रभाकर माचवे ने भी प्रगतिवाद का उल्लेख किया है। अतः कहा जा सकता है कि भले ही 1942 से पूर्व हिंदी साहित्य में प्रगतिशील विचारधारा के दर्शन शुरू हो गए थे परंतु प्रगतिवाद शब्द पहले-पहल 1942 में ही प्रयोग हुआ।
• विजेन्द्र स्नातक के अनुसार प्रगतिवाद के सम्बंध में पन्त कहते हैं " छायावादी काव्य पके फल की भाँति धरती पर गिर कर चकूर हो गया और अब इसने नवीन चेतना के लिए स्थान रिक्त कर दिया"..।
• बच्चन सिंह ने पन्त की रचना "युगवाणी" को प्रगतिवाद की प्रथम रचना माना है।
● प्रगतिवाद के कवि:-
1.केदारनाथ अग्रवाल :-
केदारनाथ अग्रवाल अपनी काव्य यात्रा के आरम्भिक दौर में "बालेन्दु" नाम से लिखा करते थे। इस नाम से उन्होंने ब्रज में कवित्त,सवैये आदि लिखे हैं।
बच्चन सिंह के अनुसार केदारनाथ अग्रवाल ने मुक्तिबोध के बारे में कहा है कि 'उन्होंने जनतांत्रिक चेतना का मार्ग प्रशस्त नहीं किया'।
बच्चन सिंह का मत है कि 'जहाँ तक प्रकृति चित्रण का सम्बंध है, केदार छायावादोत्तर कविता के सुमित्रानंदन पंत हैं। पन्त की प्रकृति कोमल और ऐंद्रजालिक है तो केदार की किसानी व आत्मीय।'
2. नागार्जुन :-
नागार्जुन का प्रथम साहित्यिक नाम "यात्री" था वह इस नाम से "संस्कृत" और "मैथिली" में लिखा करते थे।
नागार्जुन की खड़ीबोली की प्रथम रचना "राम के प्रति" है जिसे 1935 में लिखा गया था। यह लाहौर से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका "विश्वबन्धु" में प्रकाशित हुई थी।
बच्चन सिंह के अनुसार केदारनाथ अग्रवाल पर लिखी कविता "ओ जन मन के सजग चितेरे" भावनात्मक तन्मयता में डूबकर, शुक्लजी के शब्दों में जिस भावयोग की सृष्टि करता है वह अद्वितीय है।
"सिंदूर तिलांकित भाल" में वे अपनी पत्नी के साथ पूरे गाँव को याद करते हैं।
"गुलाबी चूड़ियाँ" में वात्सल्य रस है तो तन गयी रीढ़ और यह तुम थी आदि कविताओं में श्रृंगार रस है।
"भस्मांकुर" इनका एक खण्डकाव्य है जो बरवै छंद में लिखा है।
• इनकी मैथिली में "पत्रहीन नग्न गाछ" नामक रचना के लिए साहित्य अकादमी 1968 में मिला था। इसमें 52 कविताएँ संकलित है।
• इन्होंने अपनी रचना "प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव" के संदर्भ में लिखा है:- यह तो "नागार्जुन साहित्य का मेनिफेस्टो" है।
• बच्चन सिंह ने नागार्जुन की कविताओं को "नुक्कड़ नाटक" की संज्ञा दी है।
3. त्रिलोचन :-
त्रिलोचन मुख्यतः आत्म विश्लेषण के कवि हैं। इसके माध्यम से उन्होंने किसानी जीवन और परिवेश के चित्रण किया है।त्रिलोचन को हिंदी में "सॉनेट" लिखने के लिए प्रसिद्ध माना जाता है।
"शब्द" कविता में कवि के 3 सॉनेट हैं:- माओ पर, गाँधी पर और सुभाष बाबू पर।
वे चीन के प्रसंग में "माओ" की प्रशंसा करते हैं, पर भारत के प्रसंग में कहते हैं कि " माओजी आपने चीन को जगाया आप उसके जननायक हैं। पर भारत को भी अपनी सीमा की रक्षा करनी है। अब उसका दर्प जाग चुका है, उसके स्वाभिमान की कुंडलिनी जागृत है"...।
"सुभाषचंद्र" के बारे में उनका कथन है " यदि कोई अपना सिर देकर सार कमाए तो कुछ समता सुभाषबाबू से आ पाएगी"..।
"गाँधी" की विचारधारा के विरोध में कवि एक कविता लिखता है जिसका नाम है " उस जनपद के कवि हूँ"। लेकिन इस कविता से गाँधी जी के सम्मान में कहीं भी किसी तरह की आँच नहीं आयी है। कवि गाँधी के मरण पर नहीं उनके कर्म पर बल देता है।
• बच्चन सिंह के अनुसार त्रिलोचन का "अरघान" जायसी और निराला से भिन्न है। ठेठ गंवई होने के कारण वह जायसी के नजदीक मालूम होता है।
• बच्चन सिंह के अनुसार त्रिलोचन की कविताओं में 2 गाँव दिखते हैं -
एक वह जो स्मृतिशेष हो चुके हैं और दूसरा आज की मारधाड़, दौड़-धूप, और अतीत से कट गए हैं।
• त्रिलोचन को मुक्तिबोध ने "अवध का किसान" कहा है।
4. शिवमंगल सिंह 'सुमन' :-
"विजेन्द्र स्नातक" के अनुसार शिवमंगल सिंह सुमन की कविता 'मिट्टी की बारात' जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू के प्रेम-सम्बन्ध पर लिखी है।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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