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Tuesday, July 6, 2021

शेर को गोद लें-पुस्तक अंश

 शेर को गोद लें

असग़र वजाहत

(हंगरी प्रवास (1992-1997) पर आधारित "स्वर्ग में पांच दिन",राजपाल  द्वारा प्रकाशित पुस्तक का एक अंश।)

सत्ता परिवर्तन के बाद हंगरी के समाज में बड़े रोचक परिवर्तन आ रहे हैं। सरकार के पास साधनों की कमी है और दूसरी ओर निजीकरण का बोलबाला है। सरकारी संपत्तियाँ कौड़ियों के मोल बेची जा रही हैं। कहा जा रहा है कि कम्युनिस्ट सरकार ने जिनका राष्ट्रीयकरण किया था वे संपत्तियाँ उनके मालिकों को वापस कर दी जायेंगी। खेती के क्षेत्र में जो सरकारी संस्थाएं बनायी गयी थीं और जो बहुत सफल थीं उन्हें तोड़ दिया जायेगा। ज़मीन निजी संपत्ति बन जायेगी। निजीकरण का प्रभाव शहर के चिड़िया घर पर भी पड़ा है। सरकार के पास चिड़िया घर चलाने के लिए पैसे की कमी है और चिड़िया घर से कहा गया है कि वह अपने साधनों से पैसा कमाए। टिकट लगाने के अलावा चिड़िया घर के पास और क्या रास्ता हो सकता है? लेकिन केवल टिकट लगाकर कितना पैसा कमाया जा सकता है? इसलिए चिड़िया घर ने एक योजना शुरू की है। वह योजना यह है कि चिड़िया घर के जानवरों को 'गोद' लिया जा सकता है।

उदाहरण के लिए यदि कोई एक महीने के लिए शेरों के भोजन और देख-रेख पर खर्च होने वाला पैसा देता है तो एक महीने के लिए शेर उसके हो जायेंगे। शेरों के कटहरे पर यह लिख दिया जायेगा कि यह शेर एक महीने के लिए फ़लां का है। इसी तरह दूसरे जानवरों, चिड़ियों, साँप, बिछुओं आदि-आदि को भी अगर कोई चाहे तो गोद ले सकता है। 

मैं चिड़िया घर में यह तमाशा देख रहा था कि अचानक एक कटहरे पर नज़र पड़ी जिसमें गधा बंद था। चूंकि योरोप में गधे कम होते हैं इसलिए योरोप वासियों के लिए ऐशियन गधा एक रोचक जानवर है। गधे के कटहरे पर जो जानकारियाँ दी गयी थीं उनमें ये भी लिखा था कि गधा भारत से लाया गया था। गधे के कटहरे पर यह नहीं लिखा था कि उसे किसी ने ‘एडाप्ट’ किया है। जबकि दूसरे जानवरों को काफी ‘एडाप्ट’ किया गया था। एक भारतीय होने के नाते मुझे दुःख हुआ कि हमारे देश से आये गधे की विदेश में बड़ी उपेक्षा हो रही है।

अगले दिन मैं भरतीय राज दूतावास गया। राजदूत महोदय से सीधी-सीधी बातचीत तो नहीं की लेकिन चिड़िया घर के भारतीय गधे का पूरा प्रसंग बताया और कुछ ये संकेत दिया कि राजदूत महोदय यदि चाहें तो भारतीय गधे को  ‘एडाप्ट’ कर सकते हैं। राजदूत महोदय मेरा आशय समझ गये और बोले- मेरे पास बहुत हैं।“

मैं निराश हो गया और लगा कि भारतीय गधे का जीवन संकट में है।

बुदापैश्त में पता नहीं कैसे पाकिस्तानी दूतावास के एक अधिकारी से भी परिचय हो गया था जो शहर में इधर-उधर घूमते हुए मिल जाते थे। उन्होंने एक बार बातचीत के दौरान बताया था कि पाकिस्तानी राजदूत तो ये कहते हैं कि हंगरी में पाकिस्तानी दूतावास बंद कर देना चाहिए। जब मैंने कारण पूछा था तो उन्होंने बताया था कि हंगरी में कोई भी भारत के खिलाफ कुछ नहीं सुनना चाहता।

गधे वाले प्रसंग के बाद पाकिस्तानी डिप्लोमैट अचानक बाज़ार में मिले। मुझे ध्यान आया कि गधा भारत से ज़रूर लाया गया था लेकिन यह जानकारी नहीं है कि कब लाया गया था। मतलब यह है कि यदि वह भारत विभाजन से पहले लाया गया था तो उसकी जिम्मेदारी जितनी भारत पर बनती है उतनी ही पाकिस्तान पर भी बनती है। यह सोचकर मैंने पाकिस्तानी डिप्लोमैट को पूरी बात बतायी और कहा कि आप लोग उस गधे को गोद क्यों नहीं ले लेते। 

डिप्लोमैट महोदय सोच में पड़ गये और कुछ देर बाद बोले-अगर कहीं से यह साबित हो सके कि वह गधा कश्मीर से है तब हम उसे एडाॅप्ट कर सकते हैं।

मैंने उनसे कहा- आप किस हवा में हैं। अगर यह शक भी हो गया कि वह गधा कश्मीर से है तो भारत सरकार उसे ‘एयर-लिफ्ट’ करा लेगी।“

1994

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