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Monday, May 31, 2021

बिना परमिट कोहिमा

'बिना परमिट कोहिमा' :- यात्रा 1

असग़र वजाहत


डीमापुर (नागालैंड) में एक हिंदी सेवी संस्था ने हम लोगों के ठहरने का बंदोबस्त जिस कमरे में किया था उसकी दीवारों को देखकर लगता था कि काफी लंबे समय से बहुतेरे लोगों ने सभी सम्भावित तरीक़ों से इस कमरे का इतना इस्तेमाल कर लिया है कि अब किसी भी तरह से इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता। मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले किसी भी क्रियाकलाप से संबंधित कोई न कोई दाग़, धब्बा या चिन्ह दीवार पर देखा जा सकता था। ये दीवारें किसी मानव विज्ञानी (Anthropologist) के लिए शोध का विषय भी हो सकती थीं। मतलब यह कि दीवारों पर इतनी 'संभावना' बिखरी पड़ी थी कि हिंदी का कोई प्रयोगधर्मी उपन्यासकार अगर चाहता तो चार पांच सौ पेज का उपन्यास लिख सकता था।

मुझे और जैन साहब को कमरा पसंद नहीं आया। हम लोग एक अच्छे से होटल में आ गए और डीमापुर की घुमाई शुरू कर दी । जैन साहब ने सबसे पहले एक शाकाहारी मारवाड़ी भोजनालय का पता लगा लिया जहाँ ठेके पर खाना खिलाया जाता था। यह भोजनालय जैन साहब को आदर्श लगा था और मुझे काम  चलाऊ।

उत्तर भारत के अपने संपर्क से जब हम लोगों ने यह कहा कि हम डीमापुर के सप्ताहिक बाजार जाना चाहते हैं तो वे लगभग कांपने लगे। उन्होंने कहा कि वे 5 साल से डीमापुर में है लेकिन आज तक डीमापुर के साप्ताहिक बाजार नहीं गए हैं। वहाँ जाना बहुत खतरनाक हो सकता है। जब हम लोगों ने वहाँ जाने का पर बहुत जोर डाला तो उत्तर भारत के अधिकारी ने अपने दफ्तर के नागा गॉर्ड को बुलाकर उससे कहा कि वह हमें ले जाकर बाजार घुमा दे।

डीमापुर के सप्ताहिक बाजार में हर तरह के मांस की बड़ी बड़ी दुकानें थीं। यहाँ बकरों की तरह कुत्ते बिक रहे थे। उनका मांस भी बिक रहा था। कुछ लोग कुत्ते का मांस खाने को बुरा समझते हैं । मेरे विचार से किसी के लिए किसी जानवर का मांस खाना न खाना व्यक्तिगत पसंद या नापसंद की बात हो सकती है। लेकिन अगर कोई किसी जानवर का मांस खाता है तो उसे गिरी हुए नजर से देखना या उसकी आलोचना करना या उसे बुरा समझना ठीक नहीं है। संसार में लोग ऊंट, घोड़े, गधे, सांप, छछूंदर, मेढ़क तक का मांस खाते हैं। नागालैंड में अगर कुत्ते का मांस खाया जाता है तो उसमें क्या बुराई है? यह उनके इतिहास और उनकी जीवन शैली का हिस्सा है । 

बाज़ार में छोटे-छोटे पीले रंग के कुछ कीड़े भी बिक रहे थे। खेती-बाड़ी और घर गिरस्ती में काम आने वाले तमाम सामान बेचे और खरीदे जा रहे थे। मैं कैमरे से तस्वीरें ले रहा था। मुझे यह लग रहा था कि मैं किसी भी दुकानदार की तस्वीर लेने की कोशिश करता हूँ तो वह अपना मुँह मोड़ लेता है। मतलब फोटो खिंचवाना पसंद नहीं करता या यह पसंद नहीं करता कि उत्तर भारत का आदमी उनका चित्र ले। जो कुछ भी हो हम लोगों ने अपने प्रति एक अजीब तरह की असहमति और अस्वीकार का भाव देखा।

यूरोप की तरह भारत के नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में भी शराब भोजन का एक हिस्सा है। इसका कारण भौगोलिक हो सकता है। यहाँ बहुत ठंड पड़ती है । लेकिन अजीब बात यह है की भारत के इन राज्यों को ड्राई बनाया गया  है। मतलब यह कि वहाँ शराब  बेचना और खरीदना जुर्म है। ऐसा क्यों किया गया है जबकि दिल्ली और मुंबई में शराब आसानी से बेची और खरीदी जा सकती है।

शाम को जैन साहब ने कहा की यार रम खत्म हो गई है चलो कहीं से खरीदी जाए।

मैंने कहा , भैया यह ड्राई स्टेट है यहाँ कहाँ मिलेगी।

 लेकिन जैन साहब के आग्रह पर हम दोनों बाहर निकले और बाजार में पूछना शुरू किया। लोगों ने बताया इधर चले जाओ, हम चले गए। फिर बताया उधर चले जाओ, हम चले गए। फिर बताया एक गली में चले जाओ, हम चले गए । फिर बताया एक सीढ़ियाँ हैं उतर कर नीचे तहखाने में चले जाओ, हम चले गए। वहाँ देखा एक आदमी सेना या अर्धसैनिक जैसे जवानों की वर्दी पहने रम बेच रहा है। सामने लोगों की भीड़ है। और वह हर उठे हुए हाथ को एक-एक बोतल पकड़ा रहा है। पूछने पर पता चला पचास की बोतल है। जैन साहब ने कहा यार इतनी सस्ती है कि दो ले लेते हैं। हम लोग दो बोतल ले लेकर बाहर आ गए।

हमारा इरादा डीमापुर से कोहिमा जाने का था लेकिन कोहिमा जाने के लिए इनर लाइन परमिट चाहिए होता है। यह परमिट डीमापुर के पुलिस  कार्यालय से मिलता है । यह इत्तेफाक की बात थी कि हम लोग क्रिसमस के आसपास डीमापुर में थे और क्रिसमस की छुट्टियों में सरकारी ऑफिस कई दिनों के लिए बंद थे।

हमारा प्रोग्राम डीमापुर में ज्यादा रुकने का इरादा न था । अब हमारे सामने चॉइस यह थी कि या तो हम बिना परमिट के ही कोहिमा जाएं या न जाएं। जैन साहब किसी भी तरह बिना परमिट के कोहिमा जाने के लिए तैयार नहीं थे। जबकि मैंने उन्हें बहुत समझाया था । मैंने उनसे कहा था कि देखो अगर हमें रास्ते में भारत की सेना या अर्ध सैनिक बल के लोग पकड़ते हैं तो हम यह सिद्ध कर सकते हैं कि हम भारतीय  हैं।  लेकिन अगर हमें नागा विद्रोही पकड़ते हैं तो वे हमसे किसी तरह का कोई कागज नहीं मांगेंगे । उन्हें जो करना है कर देंगे। जैन साहब हमेशा की तरह मेरे तर्क से प्रभावित नहीं हुए और उन्होंने कहा कि वे किसी भी सूरत बिना परमिट के कोहिमा नहीं जाएंगे और उनकी जिद में मैंने यह ठान लिया कि चाहे जो हो जाए मैं बिना परमिट के कोहिमा जाऊंगा।

(जारी.......)


'असगर वज़ाहत' की दीवार से....।

Saturday, May 29, 2021

मौत की परछाई

 मौत की परछाईं - यात्रा प्रसंग

असग़र वजाहत


ज़िंदगी में तीन बार मुझे लगा है कि मौत परछाईं की तरह बहुत पास से निकल गयी। आप यह भी कह सकते हैं कि मैं जिंदगी में तीन बार बहुत डरा हूँ। इनमें से एक घटना में बारे में  बताता हूँ।

ये सब घूमने के चक्कर में ही हुआ है। मित्र एस. के. जैन के साथ दो बार नार्थ ईस्ट गया हूँ। घटनाओं और रोमांच से भरी इन यात्राओं के अनेकों प्रसंग है। 

शिलांग में एक- दो ही तीन दिन रहने के बाद हम लोगों को यह लगने लगा कि यहाँ अब देखने लायक कुछ नहीं है। यह शिमला या मसूरी जैसा एक बड़ा पहाड़ी शहर है जहाँ आपको सब कुछ मिल सकता है लेकिन मौलिकता के नाम पर कुछ नहीं बचा। हमने अपनी दिक्कत केंद्रीय हिंदी संस्थान के स्थानीय निदेशक प्रोफेसर तिवारी को बताई तो उन्होंने सलाह दी कि हम अगर मेघालय में कुछ मौलिक देखना चाहते हैं तो हमें उनकी एक छात्रा शैने के साथ उसके कस्बे 'तुरा' जाना चाहिए। 

तुरा जाने के लिए वही हाईवे है जो बांग्लादेश को जाता है। इस हाईवे पर लगभग दिन भर चलने के बाद सुमो एक पतली सड़क पर आई जिसके दोनों तरफ ऐसी हरियाली थी कि तबीयत हरी हो गई। शाम होते होते तुरा पहुँचे और एक होटल में ठहर गए।

मेरे और जैन साहब के बीच कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर के एग्रीमेंट है। उनमें से एक यह है कि हम जहाँ भी जाते हैं और जितना पैसा खर्च होता है उसे हम आधा-आधा बाँट लेते हैं। हिसाब किताब रखने का काम जैन साहब ही करते हैं लेकिन कभी-कभी कुछ मुश्किलें पैदा हो जाती है । मिसाल के तौर पर तुरा में जैन साहब ने खाने का आर्डर दिया, मूंग की दाल और आलू पालक की सब्जी। मैंने आर्डर दिया चिकन करी और सीक कबाब। खाने का बिल आया जिसे आधा-आधा बटना था । 

बिल को जैन साहब काफी देर तक देखते रहे। मैं समझ गया कि बात क्या है।

मैंने कहा, देखो यार अपने बीच जो एग्रीमेंट हुआ है उसी के हिसाब से बिल बाँटा जाएगा। जैन साहब ने कहा - और सब खर्चों में तो ये ठीक है लेकिन ये खाने वाला मामला थोड़ा टेढ़ा है । अभी यही देखो तुम्हारी चिकन करी और सीक कबाब का बिल इतना है कि मैं उससे चार दिन आलू पालक और मूंग की दाल खाता रहूँ तो भी पैसे  खत्म नहीं होंगे।

- हां यह तो तुम ठीक कहते हो... चलो 60-40 कर लेते हैं।

- नहीं यह भी ज्यादा है।

-  तो चलो 70 - 30 कर लेते हैं ।

जैन साहब हंसने लगे।

कहने लगे -  नहीं यार मैं मजाक कर रहा था... 50-50 ही रखते हैं। 

जैन साहब दरियादिल आदमी हैं.... पर कभी-कभी सिद्धांत आड़े आ जाते हैं जिसकी कई कहानियां हैं।

यह तो सुना था कि आत्मनिर्भर गांव हुआ करते थे। लेकिन शैने का घर देखने से पहले यह पता नहीं था कि आत्मनिर्भर घर भी होते हैं। एक पहाड़ की तलहटी में बने शैने के घर में क्या नहीं था। घर के पीछे एक बगीचा था जिसमें जरूरत के फल और सब्ज़ियां लगी हुई थीं। एक तरफ कुछ जानवर पले थे जिनसे बुनियादी जरूरतें पूरी होती थीं। बगीचे के पीछे पहाड़ों से निकले साफ ठंडे  बहते पानी का  स्रोत था जिससे  घर में इस्तेमाल के लिए पानी लिया जाता था।

शैने ने हमें अपनी जीवन शैली के बारे में बहुत कुछ बताया और अपने किचन में तरह-तरह की पत्तियों से बनाए गए अचार दिखाए थे और कुछ दिए भी थे। उससे इलाके के सामाजिक जीवन के बारे में काफी जानकारियां मिलीं।

अगले दिन सुबह गुवाहाटी से हमारी वापसी की फ्लाइट थी। हम सुबह-सुबह सामान लेकर सुमो के अड्डे पहुँचे ताकि शाम तक गुवाहाटी पहुंच जाए और फिर अगले दिन सुबह फ्लाइट ले लें। सुमो के अड्डे पर बताया गया कि आज मेघालय बंद है। बंद की कॉल आतंकवादी गिरोह उल्फा ने दी है। कोई गाड़ी नहीं चल रही ।

हम बहुत परेशान हो गए। कुछ लोगों ने बताया कि एक हेलीकॉप्टर सर्विस है, हो सकता है वह मिल जाए। हम लोग हेलीकॉप्टर स्टेशन गए लेकिन पता चला कि आज वह सर्विस नहीं है। फिर कुछ लोगों ने बताया कि आतंकवादी एंबुलेंस को नहीं रोकते। आप लोगों में से एक मरीज़ बन जाए और दूसरा अटेंडेंट बन जाए तो आप एंबुलेंस से जा सकते  हैं। जैन साहब  मरीज बनने के लिए  फौरन तैयार हो गए । मेरे लिए  अटेंडेंट  बन जाने के अलावा  और कोई चारा न था। हम लोग एंबुलेंस लेने के लिए कई अस्पतालों में गए  लेकिन निराशा हाथ लगी। कोई एंबुलेंस नहीं मिली।

इस पूरी भाग दौड़ में आधा दिन निकल गया था । अब अगले दिन सुबह गुवाहाटी पहुंचना लगभग असंभव लग रहा था। हम लोगों ने  प्रो. तिवारी को शिलांग फोन किया तो उन्होंने कहा कि वे  किसी ड्राइवर को भेज देंगे जो हमें  गुवाहाटी एयरपोर्ट पहुंचा देगा।

एक उम्मीद की किरण जगी। हम सामान बांध कर होटल में बिल्कुल तैयार बैठे थे। लगभग चार बजे ड्राइवर आया और हम लोगों से बोला, फौरन, अभी निकलिए, तुरंत चलिए। जल्दी से जल्दी।' 

हम तैयार थे। सामान लेकर गाड़ी में बैठ गए।

- आप हमें कैसे ले जाएंगे अगर हाईवे बंद है? जैन साहब ने ड्राइवर से पूछा

 ड्राइवर  ने कहा -  मैं कच्चे रास्ते से ले चलूंगा । यह कच्चा रास्ता हाईवे के नीचे जंगल में है।

कुछ देर बाद अंधेरा हो गया। चारों तरफ बिल्कुल सन्नाटा था। जंगल की सांय - सांय भी नहीं सुनाई देती थी। रास्ता दर हकीकत कच्चा था । कहीं किसी तरफ कोई रोशनी न थी। ड्राइवर ने हेड लाइट भी नहीं जलाई थी। फिर भी वह गाड़ी खासी रफ्तार से चला रहा था। शायद रास्ता उसका देखा हुआ था लेकिन फिर भी अंधेरे में इतनी तेज  गाड़ी चलाना खतरे से खाली नहीं था।

- ड्राइवर साहब हेड लाइट क्यों नहीं चला रहे'? जैन साहब ने पूछा।

-  ड्राइवर बोले आप लोग जानते नहीं... यह बहुत खतरनाक रास्ता है... आतंकवादी बांग्लादेश जाने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं ...और उनकी छोटी-छोटी टोलियां इधर उधर रहती हैं.... हेड लाइट जलाते ही उन्हें पता चल जाएगा कि कोई गाड़ी जा रही है।

- इसका मतलब है यह रास्ता 'सेफ' नहीं है।

ड्राइवर बोला -  सर बिल्कुल नहीं है ...वह तो कहिए तिवारी जी के कहने से मैं आ गया........ उनसे मुझे बराबर काम मिलता रहता है...... बड़े बढ़िया आदमी है..... कोई और कहता और दस हजार भी देता तो मैं न आता।

मैंने जैन साहब की तरफ देखा और उन्होंने मेरी तरफ ।हम दोनों  एक दूसरे का चेहरा तो ठीक से नहीं देख पाए लेकिन इतना जरूर पता चल गया कि  स्थिति की गंभीरता का दोनों को एहसास हो गया है।

-  यार यह तो सोचने वाली बात  है।"जैन साहब में कुछ फुसफुसा कर कहा। 

- अब क्या हो सकता है, न तो लौट सकते हैं और न कहीं रुक सकते हैं...जो होना है वह होगा"।

कहने को तो मैंने बहादुरी से यह सब कह दिया था लेकिन अंदर ही अंदर एक  डर समा गया था।

ड्राइवर  बोला -  अगर उन्हें पता चल जाएगा तो बड़ा  लट्ठा डालकर  गाड़ी को रुकवा लेंगे। - - - क्या करते हैं ड्राइवर साहब ....  लूट -  लाट के छोड़ देते हैं?

- नहीं जी कभी-कभी तो  गाड़ी से उतरने भी नहीं देते... पेट्रोल की टंकी खोलकर  आग लगा देते हैं।

- यार हम बुरे फंसे ...अरे फ्लाइट ही छूट जाती न .. दो चार  हजार का नुकसान हो जाता है... चलो ठीक है ....जान पर  तो न बनती ।

- देखो अब यह सब कहने का कोई फायदा नहीं है अब तो बस बैठे रहो।

-  फ्लास्क लाए हो ? 'जैन साहब ने कांपती आवाज में कहा।

- हाँ..ये लो...

कुछ देर बाद जैन साहब गुमसुम हो गए। मैं भी बिल्कुल खामोश हो गया। हमारे बीच बातचीत करने को कुछ न बचा था।

अचानक ड्राइवर ने कहा -   इसी रास्ते पर चलते रहे तो सुबह तक गुवाहाटी न पहुंच पाएंगे।

-  फिर क्या करोगे? मैंने पूछा।

-  आगे से गाड़ी ऊपर चढ़ा देंगे, दो बज चुका है ....हाईवे से निकल चलेंगे...

हाईवे का नाम सुनते ही हमारी सिट्टी पिट्टी और गुम हो गई।

- ले..ले.. लेकिन  हाईवे पर तो ज्यादा खतरा होगा?

ड्राइवर ने कहा -  जैसा आप लोग कहो... ऐसे ही चलते रहे  तो आपकी फ्लाइट छूट जाएगी सुबह तक पहुंच नहीं पाएंगे।

मतलब यह मुश्किल फैसला अब हम लोगों को करना था । जैन साहब इस पक्ष में थे की कच्चे रास्ते पर ही चलते रहें। मेरा यह कहना था कि कच्चे रास्ते पर भी आतंकवादी मिल सकते हैं और हाईवे पर भी मिल सकते हैं । इसलिए क्यों न हम हाईवे  से जाएं.... फ्लाइट मिलने की उम्मीद तो रहेगी।

हम यह बहस कर ही रहे थे कि ड्राइवर ने गाड़ी ऊपर चढ़ाना शुरू कर दी और हम 10 - 15 मिनट में ही हाईवे पर आ गए। यह वही हाईवे है जो बांग्लादेश को जाता है और रात दिन इस पर ट्रैफिक रहता है। बहुत चलता हुआ हाईवे है ।लेकिन इस वक्त मुकम्मल सन्नाटा था। बिल्कुल सन्नाटा था। बहुत डरावना सन्नाटा था। भयानक सन्नाटा था। चीखता  हुआ  सन्नाटा था। हाईवे पर सिर्फ हमारी गाड़ी थी और उसकी रफ्तार  भी सौ से कम न होगी। इतनी तेज रफ्तार के बावजूद लग रहा था कि गाड़ी नहीं चल रही। 

हमें लग  रहा था कि सड़क के दोनों तरफ घने पेड़ों के नीच  फैले अंधेरों में आतंकवादी  छिपे बैठे हैं। लगता था बस  अगले मोड़ पर सड़क के ऊपर लकड़ी के बड़े-बड़े  लट्ठे पड़े होंगे।

गाड़ी की रफ्तार इतनी तेज थी कि अगर एक पत्थर भी पहिए के नीचे आ जाता तो गाड़ी कहीं की कहीं चली जाती ।ड्राइवर पता नहीं किस जुनून में गाड़ी चला रहा था। हम दोनों बिल्कुल चुप थे। मैंने जैन साहब को आवाज दी तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। इतना तो मुझे यकीन था कि वो सो नहीं रहे हैं।

करीब तीन घंटे तक हम लोगों की यही हालत रही। अकेली गाड़ी सुनसान हाईवे पर बेतहाशा भागती रही। हम लोग बिल्कुल चुप इस तरह बैठे रहे जैसे सांप सूंघ गया हो । अचानक हाईवे पर आगे सड़क के किनारे कुछ रोशनी दिखाई दी। कुछ और पास आए तो देखा अर्धसैनिक बलों की गाड़ियां खड़ी है।

ड्राइवर ने कहा - सीआरपीएफ वालों ने कोई चाय का ढाबा खुलवा लिया है।आप लोग चाय पिएंगे ?

हम लोग जैसे एक भयानक  सपने से जाग गए।

हमने फौरन कहा-  पिएंगे।

चाय पीते हुए हम लोगों ने सीआरपीएफ के जवानों से पूछा कि अब आगे तो खतरनाक इलाका नहीं है?

जवानों ने बताया कि आगे ही खतरनाक इलाका है। 

गुवाहाटी एयरपोर्ट एयरपोर्ट नहीं बल्कि हमारी जान लग रहा था। लगता था हमें नया जीवन मिल गया हो।


"असग़र वजाहत" की दिवार से.....।

Thursday, May 27, 2021

पाकिस्तान में ट्रेन का सफर हिस्सा -3

 पाकिस्तान में ट्रेन का सफ़र 

तीसरा हिस्सा :-

सर्दी इतनी बढ़ गई थी कि मैं कूपे में टहलने पर मजबूर हो गया था। एक स्टेशन पर  ट्रेन रुकी।  बाहर प्लेटफार्म से 'चाय चाय' की आवाजें आने लगीं । मैंने चाय वाले को आवाज दी लेकिन कोई नहीं आया। मैंने कुछ और ऊंची आवाज में  चाय वाले को पुकारा  लेकिन कोई नहीं आया।  फिर मैं चीखने लगा  लेकिन कोई चाय वाला नहीं आया।

ट्रेन  रेंगने लगी। इतना चीखने चिल्लाने से  सर्दी और ज्यादा लगने लगी थी  लेकिन कूपे के अंदर टहलने के अलावा  और कोई रास्ता न था।  शायद मैं सभी कपड़े  पहन चुका था  क्योंकि बैग  काफी खाली लग रहा था। अगले स्टेशन पर भी यही हुआ। बात समझ में आई कि चाय वाले हैं फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट की तरफ नहीं आते। इसका मतलब यह था की पूरी रात मुझे चाय न मिल सकेगी और कूपे में टहलते हुए रात गुजारनी पड़ेगी।

लेकिन चाय के मामले में किस्मत इतनी खराब नहीं थी। एक बड़े स्टेशन पर चाय वाला आया मैंने उसे सौ का नोट दिया और पांच चाय मांगी। उस जमाने में पाकिस्तान में बीस रुपये की एक चाय मिला करती थी। चाय वाले ने मेरी तरफ कुछ अजीब नजरों से देखा लेकिन जल्दी ही खिड़की पर उसने छोटे-छोटे चाय के पांच कप रख दिए। एक कप मैंने फौरन हलक में उंडेल लिया। लगा गला ऊपर से नीचे तक किसी ने चाकू से काट दिया हो। चाय सकरीन में बनाई गई थी ।लेकिन इस तकलीफ के बावजूद मैं चार कप चाय और  पी गया। सोचा हलक का जो हाल होगा सो देखा जाएगा फिलहाल सर्दी से बचने का इंतजाम जरूरी है।

बहावलपुर स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो कूपे में एक साहब आ गए ।अधेड़ उम्र वाले दुबले पतले सज्जन ने ऊपर की सीट पर अपना बिस्तर बिछाया और सामने बैठ गए । मुझसे पूछने लगे,  क्या मैं सिगरेट पी सकता हूं? 

मैंने कहा, जरूर जरूर पियें। 

मैं उनसे यह कह नहीं सकता था कि उनके आ जाने से मैं इतना खुश हूं कि अगर वो कुछ और भी कहते तो मैं उसके लिए भी तैयार हो जाता।

सिगरेट पीने के बाद सज्जन ऊपर चले गए। लेट गए और शायद जल्दी ही सो गए। मैं उनको दिखाने के लिए सीट पर लेट गया लेकिन नींद आने का सवाल न था। छोटी-छोटी  झपकियां आती रहीं। इसी दौरान किसी स्टेशन पर तीन लोग कूपे में और आए। इनमें दो आदमी थे और एक महिला। आते ही तीनों ने लंबी तानी। सूरज नहीं निकला था लेकिन हल्का सा उजाला हो गया था। मैंने खिड़की से बाहर देखा। दूर एक तालाब दिखाई दिया जिसका पानी चमक रहा था। तालाब के किनारे एक दो मंजिला कच्चा मकान नजर आया जिसकी एक खिड़की से रोशनी आ रही थी। दूसरी तरफ खजूर के कुछ पेड़ भी खड़े थे। मैंने कैमरा निकाला और सोचा, रात भर तकलीफ उठाने के बाद अगर सुबह एक अच्छी तस्वीर मिलती है तो यह घाटे का सौदा न होगा।

मैंने कई बार कैमरा क्लिक किया। सामने की सीट पर लेटी महिला जाग गयीं। 

उन्होंने मुझसे कहा -  लगता है आपको फोटोग्राफी का बड़ा शौक है?

मैंने कहा -  मैं जो कुछ देख रहा हूं वह शायद दोबारा न देख सकूंगा.... इसलिए चाहता हूं कि  जो कुछ अच्छा नजर आ रहा है उसे कैमरे में कैद कर लूं।

महिला ने कहा -  आप कहां से आए हैं?

पाकिस्तान में जिन लोगों ने मुझसे यह सवाल किया था कि आप कहां से आए हैं उनको मैंने एक ही जवाब दिया था और वह यह कि मैं दिल्ली से आया हूं।

इस जवाब के पीछे छिपी धारणा, विश्वास और विचार को जो लोग समझ लेते थे ले मुस्कुरा देते थे और जो नहीं समझते थे उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ता था।

दिल्ली सुनते ही ऊपर सोए दोनों आदमी नीचे उतर आए और हम लोगों के बीच बातचीत शुरू हो गई। महिला ने एक बड़ा सा फ्लास्क खोला गरम गरम चाय अपने दो साथियों को देने के बाद मेरी तरफ भी बढ़ाई। वाह मजा आ गया। कुछ खाने को भी था।        बातचीत पाकिस्तानी रेलवे पर होने लगी।

मैंने पूछा - सीटों पर जो रकसीन चढ़ा है उस पर ER क्यों लिखा है?

उनमें से एक ने कहा, यह पार्टीशन के टाइम मिला हुआ डिब्बा है।

इतना पुराना अब तक चल रहा है?

एक ने कहा -  पाकिस्तान रेलवे का हाल  न पूछिए।

दूसरा बोला -  रेलवे की न जाने कितनी ज़मीन बेंच कर खा गए।

पहले ने कहा -  ज़मीन.... अरे साहब जमीन तो छोटी चीज है इन्होंने  पटरिया बेच डालीं... सिग्नल बेंच डालें.... रेलवे को बिल्कुल खोखला कर दिया..

मैंने मैंने कहा -  कोई पूछताछ करने वाला नहीं है ।

एक बोला -  जनाब  इस पूरे मुल्क में किसी की काउंटेबिलिटी नहीं है, कोई जवाबदेही नहीं है। - लोग बैंकों से करोड़ों का  लोन लेकर वापस नहीं करते कोई पूछने वाला नहीं।

फौज इस मुल्क को खा गई ....पहले दो टुकड़े करवा दिए और अब दीमक की तरह लगी हुई है 

मैं यह सब सुनकर  बहुत हैरान न था। क्योंकि मुझे पता था कि ये लोग जो कह रहे हैं वह सच है। मुझे डॉ आयशा सिद्दीका की किताब याद आ गई जो उन्होंने पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जाने वाले  व्यापार पर लिखी है। उन्होंने एक नया टर्म दिया है - Milbus  यानी मिलिट्री बिजनेस। उन्होंने  बहुत गंभीरता से, शोध करने के बाद, आंकड़े और उदाहरण देते हुए यह साबित किया है कि पाकिस्तान की सेना देश की सब से बड़ी लैंडलॉर्ड  ( ज़मीन की मालिक /भूस्वामी) है। सेना जमीन बेचने का कारोबार ही नहीं करती बल्कि उसके  अन्य व्यापार भी हैं जिसमें सिटी मॉल वगैरा भी शामिल है। सेना द्वारा किए जाने वाले इस  व्यापार का मुनाफा सबसे ऊंची अधिकारी से लेकर  सैनिक तक को मिलता है।

कुछ देर के बाद बातचीत भारत-पाकिस्तान की तुलना पर आ गई। बांग्लादेश बनने से पहले पाकिस्तान से आए लोग भारत और पाकिस्तान की तुलना करते हुए पाकिस्तान को बड़ा और अच्छा सिद्ध करने की कोशिश करते थे। यह कोशिश काफी बचकानी होती थी लेकिन मध्यम वर्ग को आकर्षित करती थी।  जैसे पाकिस्तान में 'टेरिलीन' बहुत सस्ता है, जापानी गाड़ियां कितनी सस्ती है, खाना-पीना कितना सस्ता है, कितनी आसानी से मकान बनाया जा सकता है। कितनी आसानी से नौकरियां मिलती हैं।

बांग्लादेश बन जाने के बाद स्थिति बिल्कुल बदल गई है अब कोई पाकिस्तानी कभी यह नहीं कहता कि पाकिस्तान भारत से अच्छा है।  सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत का एक रुपया पाकिस्तान के दो रुपए के बराबर है। भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में जो काम हुआ है (जो अपर्याप्त है और जिसकी हम सब आलोचना करते हैं) वह पाकिस्तान की तुलना में बहुत उल्लेखनीय है।

उनमें से एक ने कहा -  आप चाहे जो कहें, भारत में लाख कमियां हो  सकती हैं ..लेकिन भारत  ने तरक्की की है.... और कोई मुल्क जब तरक्की करता है तो उसका फायदा सबको होता है...

महिला ने कहा-  मेरी तो भारत जाने की बड़ी ख्वाहिश है।

एक आदमी बोले-  पाकिस्तान में तो हर दूसरा आदमी भारत जाना चाहता है... देखने के लिए घूमने के लिए....

मैंने कहा -  भारत में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो एक बार पाकिस्तान आना, देखना और घूमना चाहते हैं 

उनमें से एक ने कहा- लेकिन दोनों तरफ की सरकारें यह नहीं चाहतीं।

दूसरे ने कहा-  देखिए किसी भी मुल्क के अवाम किसी भी दूसरे मुल्कों के अवाम के दुश्मन नहीं होते... अब पाकिस्तानी अवाम को भारत दुश्मनी से क्या मिल जाएगा? हां दोस्ती से बहुत कुछ मिल सकता है..... लेकिन अफसोस यह है कि सरकारों को दुश्मनी से बहुत कुछ मिलता है.....

मुझे रघुवीर सहाय की कविता 'पैदल आदमी' याद आ गयी।

कराची कंटोनमेंट रेलवे स्टेशन पर वे उतर गए। मैं अकेला रह गया। ट्रेन लगता था अपने गंतव्य पर पहुंचने के प्रति बहुत उदासीन है। इस तरह चल रही थी जैसे कोई ठेल रहा हो।

कराची रेलवे स्टेशन पर इतना सन्नाटा था कि मुझे बहुत बुरा लगा। स्टेशन तो बड़ा था लेकिन कोई चहल-पहल नजर न आती थी। न तो ट्रेनें ही खड़ी थीं, न मुसाफिर। यह लगता था जैसे इस स्टेशन का बहुत कम इस्तेमाल होता है।

अलीगढ़ के पुराने दोस्त डॉ जमाल नकवी जरूर मुझे लेने के लिए खड़े थे।

(समाप्त)

(असग़र वजाहत की दीवार से...)

Tuesday, May 25, 2021

काशीनाथ सिंह और 'काशीनामा'

 

• व्याकरणिक संसोधन के साथ


क़िस्सा काशीनाथ सिंह और "काशी नामा"...


एक बार विजय मोहन सिंह से मेरी बहुत बहस हुई थी। मैंने उनसे स्पष्ट कहा था। जब तक संस्मरणों में यथार्थ के नाम पर गली गलियारों में दी जाने वाली गालियां जीवित रहेंगी भारतीय सभ्य समाज में तब तक भारतीय स्त्री को पितॄ सत्ता द्वारा दी गई झूठी प्रतिष्ठा को जीना पड़ेगा। हम 'हंस' मे प्रकाशित हो रहे संस्मरण को लेकर बात कर रहे थे । उन-सा स्वाभिमानी जीनियस हिंदी साहित्य में दुर्लभ है। क्योंकि अधिकांश गालियाँ स्त्री को ही संबोधित हैं, स्त्री को लेकर ही हैं। यह गलियारी जीवंतता पितॄ सत्ता को यह अधिकार देती है कि देहरी के भीतर अपनी मां बहन की इज्जत करें, उसकी  प्रतिष्ठा के लिए खून की नदियाँ बहा दे और देहरी के बाहर अपने क्रोध और क्षोभ को व्यक्त करने के लिए उसे गाली बना ले। 

यह बातचीत निर्माण अपार्टमेंट मयूर विहार एक्सटेंशन में रह रहे विजय मोहन के जी साथ तब की है, जब वह मयूर विहार एक्सटेंशन में रह रहे थे और उषा गांगुली काशीनाथ सिंह के संस्मरण, पांडे कौन कुमति तोहे लागीं, पर काशीनामा शीर्षक से नाटक की पटकथा तैयार कर रही थी। हम दोनों गालियों को लेकर चर्चा कर रहे थे। आदरणीय नामवर जी का भी कहना था इसके बिना बनारस, बनारस नहीं लगेगा। नाटक में जान नहीं आ पाएगी। काशी जी भी कहानी में किसी प्रकार के परिवर्तन के लिए तैयार नहीं थे। उषा ने कहा मैं नाटक छोड़ दूँगी मगर गालियों का इस्तेमाल नहीं करूंगी। काशी जी की अव्यक्त इच्छा थी कि उषा जी यह नाटक अवश्य करें।

 तय हुआ। आखरी फैसला करने से पहले विजय मोहन जी से परामर्श कर लिया जाए। यह मेरा सुझाव था और उषा तैयार हो गई। मैं स्वयं गालियों के पक्ष में नहीं थी न कभी रही हूँ। 

काशीनाथ जी के लिए उषा गांगुली का नाम भी बहुत महत्वपूर्ण था। 

विजय मोहन सिंह ने सारी बात सुनते हुए सिर्फ एक वाक्य कहा- नाटक कौन कर रहा है ? उषा जी कर रही हैं ना ! काशी ने तो संस्मरण लिखा है नाटक नहीं। और

'पांडे कौन कुमति तोहे लागी' ,- काशीनाथ सिंह का 'काशीनामा', हो गया।...

गालियाँ नाटक से बहिष्कृत हो गई।

काशीनामा ने अप्रतिम सफलता पाई। स्वयं उषा के बनाए कई प्रतिमानों को तोड़ दिया। काशी के अस्सी घाट पर जब काशीनामा आरंभ होता है तो सुशील भारती की बुलंद आवाज जब नाटक को उठाती है तो काशी का आकाश गुंजायमान हो उठता है और दर्शक नाटक के सम्मोहन में कैद।

उषा गाँगुली रचित 'काशीनामा' के बारे में

 

(चित्रा मुद्गल जी की दीवार से....)


Monday, May 24, 2021

पाकिस्तान में ट्रेन का सफर' हिस्सा -2

 'पाकिस्तान में ट्रेन का सफ़र'....

• दूसरा हिस्सा

सफर करने के दौरान मैं बार-बार जेब से टिकट निकाल कर चेक करता रहता हूं। मुझे लगता है कि टिकट, टिकट नहीं है, कोई चिड़िया है जिसे मैंने जेब में  रखा हुआ है और वह मौका पाते ही उड़ जाएगी।

मैंने तीसरी बार मुल्तान से कराची जाने का टिकट निकाल कर बहुत ध्यान से पढ़ना शुरू किया। टिकट के पीछे उर्दू में साफ-साफ लिखा हुआ था की टिकट चेकर आईडी चेक करेगा। मैंने  अपने टिकट पर लिखी आईडी देखी तो मेरे होश उड़ गए। जाफरी साहब के नौकर ने टिकट खरीदा था और  टिकट पर अपनी आईडी लिखवा दी थी। अब टिकट चेकर जब देखेगा कि टिकट पर लिखी आईडी दूसरी है और मेरी आईडी एक हिंदुस्तानी पासपोर्ट है तो वह क्या करेगा?  फौरन पुलिस को रिपोर्ट करेगा कि एक हिंदुस्तानी या भारती फेक आईडी पर यात्रा कर रहा है । पुलिस को जैसे ही यह जानकारी मिलेगी वह मुझे ट्रेन से उतार लेगी। फेक आईडी पर कौन सफर करते हैं? जासूस या अपराधी या भगोड़े ।और इन तीनों को सजा दी जाती है। मुझे गिरफ्तार करते ही पुलिस किसी स्टेशन के  हवालात में बंद कर देगी।

ट्रेन के फर्स्ट  क्लास कूपे का जब यह हाल है तो हवालात कैसा होगा इसकी कल्पना करना बहुत मुश्किल न था।

पुलिस जब यह पूछेगी कि आपको वीजा तो दिया गया था लाहौर में फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' के जन्म शताब्दी समारोह में शामिल होने का।आप मुल्तान में क्या कर रहे थे? क्यों गए थे? और फिर कराची क्यों जा रहे हैं? क्या करेंगे ? इन सब सवालों का मेरे पास कोई जवाब न होगा तब  मेरे ऊपर मुकदमा शुरू हो जाएगा। पता नहीं कितना लंबा चलेगा। फिर सजा होगी। वह भी पता नहीं कितनी होगी। मोहनलाल भास्कर की किताब 'मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था' मेरी निगाहों के सामने से गुजरने लगी। मोहनलाल भास्कर को जितना टॉर्चर किया गया था उसका पांच परसेंट भी मुझे किया गया तो मैं पाकिस्तान से ही नहीं दुनिया से गुज़र जाऊंगा। ये  यह सब सोचकर चक्कर आने लगे । सबसे बड़ी मुश्किल तो यह थी कि अब कुछ न किया जा सकता था। मैं अगर जाफरी साहब को फोन भी करता तो वह क्या कर सकते थे?

मैं सिर पर कफ़न बांधे बैठा था कि टिकट चेकर आ गए। उन्होंने बैठते ही अपना चार्ट फैला दिया। मैंने अपना टिकट बढ़ाया। उन्होंने चार्ट पर ज्यादा गौर किया मेरे टिकट पर कम । और फौरन ही टिकट पर हिंदी के चार जैसी लाइन खींच कर टिकट मुझे वापस कर दिया और  बग़ैर कुछ कहे उठ कर चले गए। मेरी जान में जान आई।

मुझे लगा आस्थावान हो जाने का एक मौका मैंने खो दिया है। अगर टिकट चेकर के आने से पहले कोई मन्नत, मनौती मान ली होती तो कितना अच्छा होता है।


जैसे-जैसे रात बढ़ रही थी वैसे वैसे सर्दी लगना शुरू हो गयी थी । मेरे पास कोई गरम कपड़ा न था इसलिए एक कमीज के ऊपर दूसरी कमीज पहन ली। कुछ देर बाद फिर सर्दी लगने लगी तो तीसरी कमीज पहन ली। एक पेंट के ऊपर दूसरी पैंट पहन ली। 

इतना सब कुछ पहनने के बाद मैंने सोचा कि अगर इस कूपे में कोई दूसरा मुसाफ़िर आया तो मुझे यकीनी तौर पर पागल समझेगा। 

लेकिन मुश्किल यह थी कि मैं और कुछ न कर सकता था। वैसे कूपे की रोशनी मेरा साथ दे रही थी।

रात आधी से ज़्यादा गुज़र चुकी थी। अब तक कूपे में अकेला मैं किसी संभावित खतरे की शंका से मुक्त नहीं हो पाया था। कराची बहुत दूर थी।


( "असगर वज़ाहत" की दीवार से ..)

पाकिस्तान में ट्रेन का सफ़र"

 'पाकिस्तान में ट्रेन का सफ़र'

पहला हिस्सा


सन 2011 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन्म शताब्दी समारोह में पाकिस्तान जाना हुआ था। लौटकर मैंने  40 दिन की सघन यात्रा पर एक किताब लिखी थी जो  रवींद्र कालिया ने ज्ञानोदय में छापी थी  और उसे  ज्ञानपीठ ने  किताब की शक्ल में  छापा था।  उस किताब में  'पाकिस्तान में ट्रेन के सफर' का जिक्र भी है। लेकिन लॉकडाउन के दिनों में जब करने को कुछ नहीं है तो सोचा पाकिस्तान में ट्रेन के सफर को फेसबुक के दोस्तों के साथ शेयर कर दिया जाए।

मेरे पाकिस्तान जाने से पहले कई दोस्तों ने पाकिस्तान में दो काम न करने की सलाह दी थी। पहली सलाह  यह थी कि मैं पाकिस्तान में रेल यात्रा न करूं । दूसरी सलाह थी कि मैं कराची के डाउनटाउन इलाके में पैदल घूमने की कोशिश न करूं। शुभचिंतकों और दोस्तों  की सलाह के विपरीत मैंने यह दोनों काम किए।


पाकिस्तान में मेरी ट्रेन यात्रा को केवल मेरा व्यक्तिगत अनुभव माना जाए। इस आधार पर कोई बड़े निष्कर्ष न निकाले जाएं।


मुल्तान (मूल स्थान) का रेलवे स्टेशन एक शाहकार है, एक मास्टरपीस है। उसकी एक दिलचस्प तस्वीर मिली है जो  पार्टीशन से पहले की है। लेकिन तस्वीरों में मुल्तान रेलवेस्टेशन  की भव्यता ठीक से नजर नहीं आती।


स्टेशन पहुंचने पर पता लगा की बहाउद्दीन एक्सप्रेस जो मुल्तान  से कराची जाती है चार घंटा लेट है। अपने लोकल गाइड जाफरी साहब के साथ चाय पीते और गप्प मरते चार घंटे बिता दिए। ट्रेन आई। फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट के कूपे में बैठकर यह लगा के पूरा कोच बहुत पुराना है। 

सर्दियों के दिन थे। मैंने जाफरी साहब से पूछा कि क्या यहां बिस्तर वगैरह मिलेगा?  

जाफरी साहब ने कहा, यहां आपको एक रुमाल भी न मिलेगा।

मैंने कहा, तब तो रात में बहुत सर्दी लगेगी ।

जाफरी साहब ने बताया कि जैसे-जैसे ट्रेन कराची की तरफ बढ़ेगी वैसे-वैसे  सर्दी कम होती चली जाएगी...


कुछ देर के बाद जाफरी साहब चले गए और मैं डिब्बे का मुआयना करने लगा। छः बर्थ वाला कूपे  था । सीटों पर जो रक्सीन चढ़ा हुआ था  उस पर जगह जगह  सिलाई  की हुई थी  और  उस पर ER लिखा था। मैंने मतलब लगाया ईस्टर्न रेलवे । लेकिन पाकिस्तान में तो ईस्टर्न रेलवे जैसी कोई चीज  है नहीं। फिर ये क्या है?

डिब्बे की छत पर लाइट के पांच पॉइंट थे लेकिन चार पॉइंट्स से तारों के गुच्छे लटक रहे थे। पांचवें पॉइंट से एक तार लटक रहा था जिसमें एक बल्ब लगा था। स्विच बोर्ड से भी तारों का गुच्छा लटक रहा था। मतलब यह  कि बल्ब जलाने बुझाने या पंखा चलाने के लिए तारों को जोड़ना पड़ता है और जो नहीं जानता किस-किस तार से कौन सा तार जुड़ेगा वह बैठा रहे। खिड़कियों के जो शीशे बंद थे उन्हें खोलना और जिनके खुले थे उन्हें बंद करना मुझे अपने बस की बात नहीं लग रही थी। खिड़की के शीशों से बाहर देखने के लिए काफी कल्पना करना पड़ती थी जो मेरे लिए मुश्किल न था।


कूपे का एक टॉयलेट भी था। मैंने टॉयलेट का दरवाजा खोल कर देखा तो सीट की जगह एक इतना बड़ा 'होल' था कि पूरा आदमी नीचे चला जाय। इतना तय था कि टॉयलेट का इस्तेमाल टॉयलेट के अंदर जाकर नहीं किया जा सकता। हां टॉयलेट का दरवाजा खोल कर टॉयलेट के बाहर खड़े होकर  कुछ कोशिश की जा सकती थी। लेकिन दूसरे यात्रियों की मौजूदगी में ऐसा करना शायद अपराध  माना जाए।  मैं पाकिस्तान में सब कुछ कर सकता था लेकिन अपराध नहीं।


ट्रेन छूटने का नाम नहीं ले रही थी। मैं कूपे में अकेला था। अचानक कूपे के दरवाजे के अंदर आता मानव शरीर का एक ऐसा अंग नजर  आया जो पहले कभी नहीं देखा था। कुछ ही क्षण बाद पता चला कि यह एक भिखारी का कटा और सूजा हुआ  हाथ था जिसे उसने दरवाजे के अंदर डालकर मेरे अंदर भय और दया  का भाव पैदा करने की कोशिश की थी।  कुछ क्षण बाद उसका सिर भी दिखाई दिया। मैंने हाथ जोड़कर उससे माफी मांग ली और वह आगे बढ़ गया। इसके बाद एक - दो भिखारी और आये लेकिन मैंने किसी को कुछ नहीं दिया ।


ट्रेन बेमन से चलने लगी। ट्रेन के चलते ही टॉयलेट से चुड़ियों के चहचहाने जैसी आवाजें आने लगी। यह बात समझ में नहीं आई। क्या टॉयलेट की छत पर चिड़ियों ने अपना घोंसला बना रखा है ? और अगर ऐसा है तो ट्रेन चलने से पहले उनकी आवाज क्यों नहीं सुनाई दी? और फिर लगातार उनके बोलने की आवाज कैसे आ रही है? कुछ जांच करने पर पता चला कि ये चिड़ियों की आवाज नहीं है बल्कि लोहा लोहे से या तार तार से है या लकड़ी लकड़ी से या ये सब एक दूसरे से टकराते हैं तो यह आवाज़ पैदा होती है।


ट्रेन इतनी मंद गति से चली जा रही थी कि कोई भी बड़ी आसानी से चढ़ या उतर सकता था। सोचा, डिब्बे में अकेला हूं। कोई एक आदमी छोटा सा चाकू ले कर भी अगर आ गया तो मुझे अपना फोन और पर्स देना पड़ेगा। इसलिए मुझे लुट जाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। मैंने अपना पर्स खोल कर बड़ी रकम निकाल ली और उसे सामान के थैले में छुपा दिया । यह तय कर पाना थोड़ा मुश्किल था कि पर्स में लुटने के लिए कितनी रकम छोड़ी जाए ।अगर पर्स में लुटेरे को बहुत कम पैसे मिले तो हो सकता है उसे गुस्सा आ  जाए और वह मुझे मारना पीटना शुरू कर दे । इस तरह के किस्से मैंने सुने थे। इसलिए पर्स में पहले मैंने दो सौ छोड़े ....लगा बहुत कम हैं , फिर पांच सौ रखे,  उसके बाद हज़ार रख दिए।  मैंने सोचा  पाकिस्तानी एक हजार रुपया हमारे पांच सौ के बराबर होता है। अगर लुटेरा हजार रुपया ले भी गया तो यह मानकर मुझे कुछ तस्कीन मिलेगी कि वह सिर्फ पांच सौ ले गया है। मोबाइल फोन निकाल कर कुछ जरूरी नंबर एक कागज पर नोट किए। पर्स और  मोबाइल को बिल्कुल अपने बराबर इस तरह रख लिया कि अगर लूटने वाला आए तो उसे बहुत तकलीफ न हो और उसे तकलीफ नहीं होगी तो मुझे भी तकलीफ नहीं होगी।

(असग़र वजाहत की दीवार से -)

Friday, May 21, 2021

आधुनिक काल भाग - 6

 

                 (छायावादी चतुष्टय स्तम्भ)


"हिंदी साहित्य लोचन" , hindisahityalochan, sahityahindilochan.blogspot.com


● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "छायावाद" भी है। आज हम  "छायावाद चतुष्टय स्तम्भ " पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी। 

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"हिंदी साहित्य लोचन" पर आप छायावादी चतुष्टय स्तम्भों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।


1. महाकवि जयशंकर प्रसाद :-

• आधुनिक काल के विशेष साहित्येतिहासकार "बच्चन सिंह" के अनुसार "रीतिकालीन प्रवृति से कविता को मुक्त रखने के लिए प्रसाद ने माना कि उसे दरबारीपन से मुक्त करना होगा। इसी से जुड़ी हुई 1909 में वह एक बात कहते हैं :- " अब समय दूर नहीं जब "सरस्वती" नवल रूप धारण करके प्रभातिक उषा को भी लजावेगी". ।


● प्रसाद की रचनाएँ :-

1. प्रसाद की प्रथम कविता " सावन-पंचक" 1906 में "भारतेंदु पत्रिका" में उनके उपनाम "कलाधर" नाम से प्रकाशित हुई थी। 

2.  1909 में आई "उर्वशी" इनकी चम्पूकाव्य है।

3. बच्चन सिंह के अनुसार "प्रेम पथिक" सबसे पहले ब्रजभाषा 1909 में "इंदु" में प्रकाशित हुई थी जिसे 1915 में खड़ीबोली में बदल दिया था।

4. चित्राधार :- हिंदी साहित्य लोचन आपको बताता है कि , प्रसाद पहले ब्रज भाषा में "कलाधर" नाम से लिखा करते थे। इनकी ब्रजभाषा में रचित 10 काव्य ग्रँथों का संकलन "चित्राधार" नाम से 1918 में प्रकाशित हुआ। जिसमें :- कानन कुसुम, करुणालय, प्रेम पथिक, महाराणा का महत्व, सम्राट चन्द्रगुप्त, छाया, उर्वशी, राज्यश्री, प्रायश्चित, और कल्याणी परिणय थी।

5.  झरना :- प्रसाद की प्रथम छायावादी कविता "प्रथम प्रभात" व प्रथम काव्य संग्रह "झरना" 1918 था। इसी संग्रह में यह कविता संकलित थी। इस संग्रह का दिव्तीय संस्करण 1927 में प्रकाशित हुआ जिसमें 33 रचनाएँ जोड़ी गयी। दिव्तीय संस्करण में ही छायावादी कहे जाने वाली कविताएँ संकलित हुई।

• महाकवि प्रसाद की प्रथम प्रसिद्ध रचना "झरना" को छायावाद की 'प्रथम प्रयोगशाला' भी कहा जाता है।


6. आँसू :- "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार प्रसाद की रचना "आँसू" एक विरह मुक्तक काव्य है। जिसमे 133 छंद हैं। 

इस का कथानक अतीत के विषादपूर्ण प्रसंगों को लोकमंगल की भावना से जोड़कर दिखाने से सम्बद्ध है। इसका प्रकाशन 1925 में हुआ था। यह प्रसाद की प्रथम कृति है जिसके प्रति 'पाठकों का सबसे ज्यादा आकर्षण' रहा था। इसी के साथ इसमें 'नियतिवाद और दुखवाद' का विषण्ण स्वर भी सुनाई देता है। इस विधि का पालन कामायनी तक हुआ है। इसका 'संशोधित प्रकरण' 1933 में आया।

• प्रसाद की लोकप्रिय रचना "आँसू" पर रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार फ़ारसी-उर्दू शायरी का भी प्रभाव देखा गया है। 

• बच्चन सिंह के अनुसार "आँसू के प्रथम संस्करण में आत्म संकोच है तो दिव्तीय संस्करण में आत्म-प्रसार"..। इसकी जमीन भी कामायनी के जैसी ही है"...।

• बच्चन सिंह मानते हैं कि " आँसू मानवीय विरह का काव्य है। इसमें प्रिय की सुंदर देह-यष्टि का आकर्षण है, आलिंगन-परिरम्भण की मधुर स्मृतियाँ हैं, प्रेमजन्य पीड़ा है, दुखानुभव है। पर यह सब एक यूटोपिया है, मानसिक है, स्वप्न जन्य है"...।

"हिंदी साहित्य लोचन" आपको बताता है कि विशेष रूप से "बच्चन सिंह" आँसू को न ही खण्डकाव्य मानते हैं और न ही प्रबन्ध काव्य।


7.  लहर :- hindi sahitya lochan आपको बताता है कि प्रसाद की एक अन्य प्रसिद्ध रचना "लहर" का नामकरण किस प्रकार से हुआ। 

शुक्लानुसार "लहर" 1933 नाम से पहले एक कविता दी गयी थी जिसे बाद में लहर नाम से एक संकलन का रूप दे दिया गया। इस शीर्षक से लेखक का अभिप्राय है कि " उस आनंद की लहर से जो मनुष्य के मांस में उठा करती है और उसके जीवन को सरस करती रहती है। उसे ठहराने की पुकार अपने व्यक्तिगत नीरस जीवन को भी सरस करने के लिए कही जा सकती है और अखिल मानव जीवन को भी"..।

8. कामायनी :-  महाकवि जयशंकर प्रसाद की हिंदी साहित्य जगत में ख्याति का सबसे ठोस आधार स्तम्भ उनकी प्रबन्धकाव्य "कामायनी" जोकि 1936 में प्रकाशित हुई थी। इसी रचना के पश्चात छायावाद के अंत की घोषणा भी हम देख सकते हैं। छायावाद की समय-सीमा जिस मुकाम पर खत्म होती है उस समय की महत्वपूर्ण रचनाओं में प्रसाद की "कामयानी" भी शामिल है। 

• इसका कथानक मानव के बाह्य और आंतरिक विकास का कथा-काव्य है, जिसमें वह अंततः शैव आनंदवादी दर्शन में समाधान ढूँढता है। 

• इस कृति में शुक्लानुसार "श्रद्धा विश्वास समन्वित रागात्मिका वृति और इड़ा व्यवसायात्मिका बुद्धि"..।

• बच्चन सिंह के अनुसार "प्रसाद की कामायनी उनकी प्रसिद्धि में एक लंबी छलांग-सी प्रतीत होती है"..।

• शुक्ल जी कामायनी के रूपक की प्रशंसा करते हुए कहते हैं " हृदय बुद्धि और कर्म का जो सामंजस्य अंत मे दिखाया गया है वह कामायनी में अन्यत्र कहीं नहीं मिलता"  ।

• डॉ नगेंद्र का ध्यान कामायनी के रूपक-तत्व व शैवागम की रक्षा पर केंद्रित है।

• बच्चन सिंह ऐसा मानते हैं कि "मुक्तिबोध का कामायनी के सम्बंध में अध्ययन फूहड़ मार्क्सवाद का नमूना है। कुछ लोग इसमें शैवागम ढूँढते है तो मुक्तिबोध इसमें वर्ग-संघर्ष, पूँजीवादी व्यक्तिवाद, वर्गहीन यूटोपिया देखते हैं"...।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी कामायनी पर लिखी अपनी आलोचनात्मक कृति "कामायनी: एक पुनर्मूल्यांकन" में उसका मूल्यांकन करते हुए उसे एक "कम्पोजिशन" कहते हैं। उनके अनुसार यह शुद्ध रूपवादी दृष्टि है। 

इसके अलावा अपने इतिहास में इन्होंने इसके सम्बन्ध में कहा कि "कामायनी का रचाव जैसा जटिल है विधान वैसा ही व्यापक तथा महत्वाकांक्षी। इसमें एक ओर मानव संस्कृति के विकास का आख्यान है, और साथ ही साथ आदिम पुरूष का उत्तरोत्तर जटिल और संघटित रूप"..।

आगे वह कहते हैं "इसमें मध्यकालीन हीन भावना से ग्रसित देव जाति को भी नए आधुनिक भावबोध से जोड़ दिया गया है। इसमें अद्वैतवाद का चरम रूप है।

•  रामधारी सिंह 'दिनकर' अपने निबन्ध " दोष रहित दूषण सहित" में कामायनी के सम्बंध में कहते हैं कि " इस विलक्षण कथा के संधान मात्र को मैं आधा या उससे अधिक कविता मानता हूँ। मेरे मतानुसार कामायनी कर्म का संदेश व वैराग्य मत का खंडन है। इसके अतिरिक्त वह "श्रद्धा को औरतानी औरत के समीप है पर इड़ा नहीं"...।

• शांतिप्रिय द्विवेदी जी ने "कामायनी" को छायावाद का उपनिषद कहा है। 


● बच्चन सिंह शुक्ल द्वारा, प्रसाद की कुछेक रचनाओं के आधार पर प्रसाद को छायावाद का प्रवर्तक मानने का विरोध करते हैं। उनका मत है कि एक कविता के आधार पर किसी को किसी युग का प्रवर्तक घोषित नहीं किया जा सकता।   

                                                              

2. महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' :-

हिंदी साहित्य जगत निराला जी को हिंदी में 'मुक्त छंद' का प्रवर्तक के रूप में जानता है। इस छंद के लिए हिंदी के आलोचकों ने इस नवीन छंद को "केंचुआ" और "रबड़ छंद" जैसे तुच्छ नामों से उसकी आलोचना की थी।

• शुक्लानुसार इनके मुक्तछंद पर अमेरिका के "वॉल्ट हिटमैन" की कविताओं की नकल दिखाई देती है, जो पहले बाँग्ला में थोड़ी बहुत हुई थी। इस प्रकार बिना किसी छंदोव्यवस्था की प्रथम रचना "लीव्स ऑफ ग्रास" 1855 में आई थी।

•  शुक्लानुसार जिस अंग्रेजी ढंग की शैली की कविताओं का चलन पहले-पहल बंगाल में हुआ था। उसका जो असर निराला पर पड़ा उससे हिंदी कविता को यह लाभ हुआ कि निराला ने ही सबसे पहले 'कविता को संगीत' से जोड़ा। इसके प्रमाण के लिए इनके गीतों को देखा जा सकता है। चाहे वह "राम की शक्ति पूजा" हो जा "गीतिका" काव्यसंग्रह आदि।

• निराला ने "कवित" को हिंदी का जातीय छंद कहा है।


● 'निराला' की रचनाएँ -

"हिंदी साहित्य लोचन" आपको जानकारी देता है कि हिंदी साहित्य जगत के अंतर्गत निराला की प्रथम रचना के बारे में विद्वानों में एकमतता नहीं है। और यह एकमतता छायावादी प्रथम रचना को लेकर है।   

निराला ओज, विद्रोह और औदात्य के कवि हैं। इन पर "रामकृष्ण परमहंस" व "विवेकानंद" का प्रभाव था।  इन्होंने बादल को 'वीर का विप्लव' कहा है।

• कोई निराला की "जूही की कली" 1916 में आई को प्रथम छायावादी रचना मानता है तो कोई पन्त की "भारत माता की वंदना" 1920 में आई को।

1. परिमल :- 1928 काव्य संग्रह में मुक्तछंद की परिभाषा देते हुए उसकी भूमिका में निराला ने लिखा है " मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होनी चाहिए"..। इस छंद के प्रयोग पर निराला के छंद को 'रबड़ छंद' या 'केंचुआ छंद' कहा गया।

• "धारा" कविता में वह अपने यौवनजन्य के साथ उसी राष्ट्रीय भावधारा को संकेतित कर रहे हैं जो ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ कहते हैं :-

"बहने दो, रोक-टोक से कभी नहीं रुकती है

 यौवन मद की बाढ़ नदी की, किसे देख झुकती है"...।

• "महाराज शिवाजी का पत्र" कविता में निराला औरंगजेब के सहायक जयसिंह को अत्याचार और साम्राज्यवाद के प्रतिपक्ष में जाने के लिए कहा गया है। इसमें शिवाजी का उद्देश्य ही देश का उद्देश्य है।

• "आवाहन" में अत्याचार के विरुद्ध शक्ति के अकुंठ नृत्य का आह्वान है।


2. सरोज स्मृति :- hindisahityalochan आपको सूचित करता है कि महाकवि निराला की बहुचर्चित रचना "सरोज स्मृति" जोकि 1935 में आई थी, इस को हिंदी का सबसे बड़ा "शोक गीत" कहा जाता है। इस रचना में निराला जी ने अपनी पुत्री 'सरोज ' की मृत्युओप्रान्त उसके जीवन को याद करते हुए एक स्मृति- रचना के रूप में भी इसे निर्मित करने की भावना परिलक्षित की है।

3. राम की शक्ति पूजा :-  इस क्रम में निराला की अन्य सबसे महत्वपूर्ण व लोकप्रिय,  बहुचर्चित रचना "राम की शक्तिपूजा" जोकि 1936 में छायावाद की समाप्ति के साथ ही हिंदी साहित्य जगत में प्रवेश करती है। इस रचना को 'निराला का महाकाव्य' माना जाता है जिसका आधार बंगला की रामकथा "कृतवासी रामायण" से लिया गया है।  इस रचना का कथानक बुराई पर अच्छाई की जीत, अन्याय पर न्याय की जीत, अंधेरे पर रोशनी की जीत, आदि प्रतीकों में रचित है। 

रावण के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य पर राम की विजय को स्वाधीनता आंदोलन की जीत में दिखाने की आकांशा रखी है।

• बच्चन सिंह के अनुसार बंगला की रामायण जितनी बहिर्मुखी है शक्ति पूजा उतनी ही अंतर्मुखी।

• बच्चन सिंह के अनुसार शक्तिपूजा का युद्ध निराला का अपना युद्ध है"..।


4. गीतिका -  निराला की यह रचना 1936 में उनके गीतों का संग्रह है जिसमें कवि का ध्यान संगीत की ओर अधिक है, अर्थ समन्वय की ओर कम। इस सँगीत पर पश्चिमी संगीत का भी प्रभाव देखा गया है।

5. दिव्तीय अनामिका :- 1938 में निराला की सबसे प्रौढ़ रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं जैसे शक्ति पूजा व सरोज स्मृति। सँ 35 से 38 तक निराला के आत्म संघर्ष का काल था जिसकी अभिव्यक्ति उनकी उस समय की कविताओं में भी हुई है।

 इसी संग्रह में इनकी इन सभी रचनाओं का संकलन है। 

• बच्चन सिंह ऐसा मानते हैं कि "दिव्तीय अनामिका" संग्रह में संकलित कविताओं से पहले निराला का व्यंग्य अनुपस्थित था। इस संग्रह से उनके व्यंग्य की शुरुआत भी होती है और अपनी प्रतिभा से वह सामने वालों को परास्त भी करते हैं। ये एक ही मानसिकता के दो पहलू थे। इस संग्रह में मृत्युबोध से सम्बंधित कविताएँ भी लिखी गयी है।


7.  तुलसीदास :- निराला की यह रचना 1938 में एक खण्डकाव्य के रूप में प्रकाशित हुई थी। जिसमें  101 छंद हैं। यह 'आत्मचेतना का विश्व चेतना में लय का काव्य' है जिसमें भारतीय संस्कृति और औदात्म्य अपनी पूरी गरिमा में अभिव्यक्त है। 

तुलसीदास निराला के प्रिय कवियों में से एक थे और उनका अध्ययन उन्होंने "समन्वय" के सम्पादकत्व से ही शुरू कर दिया था। 1922 में तुलसीदास पर इनका पहला लेख आया और इसके बाद 5 और लेख आये।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "तुलसीदास का तात्कालिक परिवेश भले ही मुगलकालीन है परन्तु वह अंग्रेजी हुकूमत की दासता के काल में प्रक्षिप्त है जहाँ तुलसी के रूप में निराला स्वयं को कल्पित कर रहे हैं"..।


• बच्चन सिंह के अनुसार "तोड़ती पत्थर" प्रगतिशील कविता का मॉडल है। यह दिव्तीय अनामिका में संकलित है।

• निराला कृत कविता "महंगू महंगा रहा" में समाज के निम्न वर्ग की दारुण कथा कही है।

• "स्नेह निर्झर बह गया" कविता में 17 पंक्तियाँ हैं।


● महाकवि निराला को दी गयी संज्ञाएँ व उनपर कहे कथन :- 

• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार निराला अकुंठ व वयस्क श्रृंगार दृष्टि तथा तृप्ति के कवि हैं।

• बच्चन सिंह के अनुसार इनका समस्त साहित्य 'आत्मचरितात्मक' है। यदि हम इनको क्रम से पढ़े तो हम पाएँगे की यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ रहा है-"तमसो म ज्योतिर्गमय"...।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "भाषा और संवेदना के जितने रंग निराला में हैं उतने और किसी कवि में नहीं"..। और "शक्तिपूजा का संघर्ष व्यापक धरातल पर है, सरोज स्मृति का संघर्ष घोषित रूप में वैयक्तिक स्तर पर"..।


3. महाकवि सुमित्रानंदन पंत -                                                  

● कवि पन्त छायावाद कवियों में सबसे सहज व तत्काल स्वीकार्य और लोकप्रिय होने वाले कवि थे। पन्त मूल रूप से प्रकृति प्रेमी व संवेदनशील इन्द्रिय-बोध के कवि हैं। इसके अलावा यह 'अरविंद दर्शन' से प्रभावित थे।

हिंदी साहित्य जगत के अंतर्गत पन्त को 'शब्द शिल्पी' कहा जाता है।

• शुक्ल जी ने पन्त को 'आधुनिक युग की नई धारा का सबसे महत्वपूर्ण कवि' माना है। यह अलग बात है कि परवर्ती आलोचना ने प्रसाद और निराला के बाद पन्त को स्थान दिया।


● पंत की रचनाएँ :-

1. "मोह" और "प्रथम रश्मि" में कवि ने प्रकृति और मानव जीवन के सम्बंध का ही प्रश्न सबसे पहले उठाया है।

2. पन्त का प्रथम छायावादी काव्य संग्रह "उच्छवास" 1919 में आया था और अंतिम "युगांत" 1936 में है।

3. बच्चन सिंह के अनुसार "ग्रन्थि" 1920  पुरानी परिपाटी की प्रेमकथा है और "पल्लव" 1928 में कवि का मराल मुखर हुआ है। 

4. "पल्लव" में प्रेम का वियोग पक्ष वर्णित हुआ है तो "गुंजन" में संयोग पक्ष।

5. "वीणा" और "पल्लव" दोनों ही काव्य संग्रहो में अंग्रेजी कविताओं से लिये हुए भाव व भाषा के लाक्षणिक प्रयोग मिल जाएंगे। 

पन्त कृत "पल्लव" की भूमिका को छायावाद का मेनिफेस्टो कहा जाता है जोकि 40 पृष्ठों की थी, तो इसी तरह "युगांत" को छायावाद के अंत का घोषणा पत्र कहा जाता है। जहाँ कवि का मुख प्रगतिवादी विचारधारा की तरफ हो गया है -

 द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र, हे स्त्रस्त ध्वस्त! 

...झरे जाति कुल वर्ण प्रण धन"....।

• शुक्लानुसार पल्लव में कवि अपने व्यक्तित्व से बंधा हुआ, गुंजन में कभी-कभी उसके बाहर और युगांत में लोक के बीच दृष्टि फैलाकर आसन जमाता हुआ दिखाई पड़ता है। गुंजन तक वह जगत से अपने लिए सौंदर्य और आनंद का चयन प्रतीत होता है, युगांत में आकर वह सौंदर्य और आनन्द का जगत में पूर्ण प्रसार देखना चाहता है।

• युगांत के बाद पन्त का काव्य दो सोपानों "मार्क्सवाद -गाँधीवाद और अरविंद दर्शन" पर चलता है।

6. पन्त की रचना "चिदम्बरा" जोकि 1958 में प्रकाशित है। उसे 1968 में "भारतीय ज्ञानपीठ" से सम्मानित किया गया है।

7. पन्त ने "लोकायतन" 1964 में नामक महाकाव्य महात्मा गाँधी के जीवन पर लिखा है। 

विजेंद्र स्नातक के अनुसार "लोकायतन आध्यात्मिक चेतना का महाकाव्य" है।

                                                              

4. महकवियित्री महादेवी वर्मा - 

● शुक्ल जी ने जहाँ महादेवी को सच्ची रहस्यवादी माना है वहीं बच्चन सिंह उनके मत का खंडन करते हुए महादेवी को "अँधेरे में जूझती हुई दीपशिखा की प्रतिमा बताते हैं" । बच्चन सिंह के अनुसार 'प्रिय और प्रियतम परमात्मा के प्रतीक न होकर उनके व्यक्तिगत जीवन के प्रतिक हैं।'

● महादेवी की रचनाएँ :-

1.  महादेवी कृत "यामा" 1940 में  उनकी चार काव्य संग्रहो जैसे :- निहार, रश्मि, नीरजा और सांध्यगीत का संकलन है। यामा पर इन्हें 1982 में "भारतीय ज्ञानपीठ" मिला था। महादेवी पर बौद्ध धर्म का भी प्रभाव है।

• बच्चन सिंह के अनुसार "यामा अंधकार है और दीपशिखा प्रकाश की मद्धिम लौ"..।

2. महादेवी की "सप्तवर्णा" रचना में ऋग्वेद के मंत्रों का हिंदी काव्य-अनुवाद हुआ है।

3. "निहार" की भूमिका हरिऔध जी ने 1930 में लिखी थी।

• बच्चन सिंह ने माना है कि मुक्तिबोध के अनुसार महादेवी ने दुखवाद को धर्म (कल्ट) बना लिया जो वास्तविक न होकर कल्पनाजन्य है"...।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार महादेवी ने अपनी कविताओं का माध्यम पूरी तरह से गीत को बनाया है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


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Tuesday, May 18, 2021

आधुनिक काल भाग- 5

  

                           (छायावाद)


"हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "छायावाद" के नाम से भी जाना जाता है। आज हम इसी के बारे में यहाँ कुछ विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। खासतौर छायावाद पर कहे गए कथन । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी। 

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● नामकरण :-   

पोस्ट की शुरुआत छायावाद के नामकरण को लेकर की जा रही है। छायावाद नाम को लेकर अनेक विद्वानों में एकमतता नहीं है।  "हिंदी साहित्य लोचन" hindisahityalochan के मंच पर आप समझ सकेंगे कि छायावाद नाम के पीछे विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न क्यों हैं।

1. "बच्चन सिंह" ने छायावाद को "स्वछंदतावाद" नाम देते हुए उसके पीछे के कारणों को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार "आधुनिक काल का साहित्य लिखते समय छायावाद नाम बाधक सिद्ध हुआ क्योंकि उससे केवल पद्य की रचनाओं को ही स्वीकारा गया है, पर इसी काल में गद्य को छायावादी गद्य का नाम नहीं दिया गया। इतिहास की अपनी विवशता होती है कि प्रवृति के आधार उसे काल का नामकरण करना होता है। लिहाज़ा इस युग का एक ही नाम हो सकता है " स्वछंदतावाद"..। 

इससे 2 समस्याएँ हल हो जाएंगी।

• इस युग के गद्य-पद्य के लिए एक ही नाम हो जाएगा।

• अन्य भारतीय साहित्यों और भारतीयेतर साहित्यों के स्वछंदतावादी से जुड़ जाता है।

2. आचार्य शुक्ल ने आधुनिक काल के किसी भी समय विशेष को किसी नाम-विशेष में न वर्गीकृत करते हुए उसके उत्थान रूप में देखा है। फलतः आचार्य शुक्ल ने छायावाद के स्थान पर "तृतीय उत्थान" नाम दिया है।


● छायावाद का अर्थ :-

1. चतुर्वेदी के अनुसार "महाकवि जयशंकर प्रसाद" ने छाया शब्द का अर्थ " मोती के भीतर छाया की जैसी तरलता" से निकाला है। इसका अर्थ - चमक, आब, कांति आदि से जोड़कर देखा जा सकता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि "छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है"..।

2. शुक्लानुसार सामान्य अर्थ में छायावाद का अर्थ हुआ" प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करने वाली छाया के रुप में अप्रस्तुत का कथन। इस शैली के भीतर किसी वस्तु या वर्ण्य का वर्णन किया जा सकता है।

• शुक्लानुसार एक अन्य रूप से भी छायावाद शब्द का अर्थ दो अर्थों में किया जाना चाहिए :-

1.  रहस्यवाद, जहाँ कवि उस अनन्त व अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकत कविताएँ लिखता है। 

2.  प्रयोग के काव्यशैली/ पद्धतिविशेष के व्यापक अर्थ में है। 1885 में फ्रांस में रहस्यवाद कवियों का एक दल खड़ा हुआ जो प्रतीकवाद कहलाया। व अपनी रचनाओं में अप्रस्तुत प्रतीकों का इस्तेमाल किया करते थे। 

उनके अनुसार न केवल छायावादी कविताओं में यह लक्षण देखे गए बल्कि अन्य प्रकार की रचनाओं में भी यह लक्षण देखे गए। 


● हिंदी में सर्वप्रथम " प.मुकुटधर पांडेय" ने जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका में सँ 1920 में "हिंदी में छायावाद " शीर्षक से चार किस्तों में एक लेख प्रकाशित करवाया। परन्तु इससे पहले छायावाद नाम आ चुका था। और अपने इस लेख में छायावाद की 5 विशेषता भी बताई हैं : वैयक्तिकता, स्वातंत्र्य, रहस्यवादिता, शैलीगत विशेषता आदि।

• हिंदी साहित्य लोचन आपको बताता है कि , शुक्लानुसार "मुकुटधर पांडेय" को छायावाद का 'प्रथम प्रयोक्ता' माना जाता है। यह "लोचनप्रसाद पांडेय" के अनुज थे।


● छायावाद के प्रवर्तक :-

शुक्ल - मैथिलीशरण गुप्त व मुकुटधर पांडेय

नंदुलारे वाजपेयी - सुमित्रानंदन पंत

प्रभाकर माचवे - माखनलाल चतुर्वेदी

इलाचन्द्र जोशी - जयशंकर प्रसाद।


● शुक्लानुसार छायावाद की पृष्ठभूमि:- 

"हिंदी साहित्य लोचन" आपसे साझा करना चाहता है कि किस प्रकार से छायावाद की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी। हिंदी साहित्य के अंतर्गत छायावाद का आगमन किन कारणों से हुआ था इसके बारे में तथ्यात्मक-वर्णनात्मक चर्चा करके हम आपतक इस जानकारी को प्रसारित करने की कोशिश करेंगे।

"रवींद्रनाथ ठाकुर" की उन कविताओं की धूम उठी जो अधिकतर पाश्चातय ढाँचे को आधार बनाकर चल रही थी, परन्तु इसाई संतो के छायाभास (फैंटामासा) तथा योरोपीय काव्यक्षेत्र में प्रवर्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद (सिम्बोलिज़्म) के अनुकरण पर रची जाने के कारण बंगला में ऐसी कविताएँ छायावादी कहलाई गई।

छायावाद नाम चल पड़ने का परिणाम यह हुआ कि बहुत से कवि रहस्यात्मक, अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्रय, वस्तुविन्यास की विश्रृंखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्पना को ही साध्य मानकर चले। शैली की इन्हीं दूरारूढ़ साधना में ही लीन हो जाने के कारण अर्थभूमि की ओर उनकी दृष्टि न रही। प्रणयवासना का यह उद्गार आध्यात्मिक पर्दे में ही छिपा रहता है। हृदय की सारी कामवासनाएँ, इंद्रियों की सुखविलास की मधुर और रमणीय समग्र के बीच एक बंधी हुई रूढ़ि पर व्यक्त होने लगी। इस प्रकार रहस्यवाद से सम्बन्ध न रखने वाली कविताएँ भी छायावादी कहलाने लगी।अतः छायावाद शब्द का प्रयोग रहस्यवाद तक ही न रहकर काव्यशैली के सम्बंध में भी प्रतीकवाद के अर्थ में होने लगा।

छायावादी की प्रथम कविता की दौड़ तो बंगभाषा की रहस्यमयी व कोमल सजीली कविताओं से हुई। पर उन कविताओं की बहुत कुछ गतिविधि अंग्रेजी वाक्य खंडों के अनुवाद द्वारा संघटित देख, अंग्रेजी कवियोँ से परिचित हिंदी कवि सीधे अंग्रेजी से ही तरह तरह के लाक्षणिक प्रयोग करके ज्यों-त्यों अनुवाद के जगह अपनी रचनाओं में जड़ने लगे।

छायावाद जहाँ तक आध्यात्मिक प्रेम लेकर चला है तबतक तो वह रहस्यवाद के अंतर्गत ही रहा। उसके आगे वह चित्रभाषा व प्रतीकवाद नाम की काव्यशैली के रूप में गृहीत होकर भी वह अधिकतर प्रेमगान ही करता रहा है। हर्ष की बात यह है कि अब कई कवि उस संकीर्ण क्षेत्र से बाहर आकर जगत,जीवन और मार्मिक पक्षों की ओर भी बढ़ रहे हैं।


● "हिंदी साहित्य लोचन" hindisahityalochan के मंच पर आप (छायावाद पर शुक्ल के मत) को देख सकते हैं :- 

शुक्लानुसार "जब रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताओं की धूम उठी तब कई कवि रहस्यवाद और प्रतीकवाद/चित्रभाषा- वाद को ही एकांत ध्येय बनाकर कविताएँ करने लगे और उसमें लौकिक व अलौकिक प्रेम को ही लक्ष्य करके जब कविताएँ करने लगे तब छायावाद का नाम ग्रहण किया गया।

जब ऐसी कविताओं में रहस्य और अभिव्यंजना की नई धारा को जिंदा किया गया तो उसमें एक नई बात यह भी देखी गयी कि कल्पना का भी अतिशय प्रयोग होने लगा है। इस पर शुक्ल जी का प्रश्नावली शैली में मत है कि" यदि भावनाओ को भी कल्पना के सहारे दिखाया जाएगा तो वह अपनी शक्ति को खो देगी और तब उसकी वस्तुयोजना भी अस्वाभाविक लगेगी"..।

• शुक्लानुसार छायावाद का आगमन द्विवेदी युग की रूखी इतिवृत्तात्मक प्रतिक्रिया में हुआ था।

• शुक्लानुसार छायावाद का पहला या मूल अर्थों में हिंदी क्षेत्रों में प्रयोग करने वाली महादेवी ही हैं, प्रसाद, पन्त व निराला या अन्य कवि तो अपनी शैलियों से ही छायावादी कहलाये हैं।


● छायावाद की परिभाषाएँ :-

1. शुक्ल - छायावाद शब्द का प्रयोग 2 अर्थ में किया जा सकता है। एक तो 'रहस्यवाद' के अर्थ में जहाँ इसका सम्बंध काव्यवस्तु से है, अर्थात जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है...। और दूसरा 'प्रयोग काव्य-शैली' या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है।

2.  "बच्चन सिंह" के अनुसार शुक्ल जी ने छायावाद की असली परिभाषा यह दी है " आंतरिक प्रभाव-साम्य के आधार पर लाक्षणिक और व्यंजनात्मक पद्धति का प्रगल्भ और प्रचुर विकास छायावाद काव्य शैली की असली विशेषता है"..।

3. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार छायावाद का अर्थ " रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताओं के प्रभाव से आया हुआ मानकर इसका सम्बन्ध ईसाई संतो के फेंटसमाटा (छायाभास) व चित्रभाषा शैली से है। 

4. जयशंकर प्रसाद - जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगे तब हिंदी में उसे छायावाद का नाम दे दिया जाता है।

बच्चन सिंह के अनुसार प्रसाद ने अपने 2 लेखों "रहस्यवाद और यथार्थवाद" व "छायावाद" लिखे हैं। जिसमें से प्रथम में शुक्ल जी के रहस्यवाद में अभारतीयता देखना उन्हें अखरता है, वह इसका विरोध करते हैं। दूसरे लेख में वह छायावाद की निर्मुक्तिमुल्क परिभाषा देते हैं।

प्रसाद 'रहस्यवाद की सौंदर्य' को ही छायावाद मानते हैं। उनके अनुसार "यथार्थवाद दुखवादी है और छायावाद आनंदवादी। यथार्थवाद द्वैतावादी है और छायावाद अद्वैतवादी"..। आगे वह लिखते हैं " ध्वयनयात्मक, लाक्षणिक, सौंदर्यमय प्रतीक विधान ही छायावाद की विशेषता है।

5. महादेवी वर्मा - छायावाद तत्वतः प्रकृति के बीच जीवन का उद्गीथ है...। उसका मूल दर्शन सर्वात्मवाद का है।

6. नंदुलारे वाजपेयी - "मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म, किंतु व्यक्त सौंदर्य से आध्यात्मिक छाया का भान मेरे विचार से छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या हो सकती है"..।

 बच्चन सिंह इसे शुक्ल जी से मिलती हुई परिभाषा ही मानते हैं।

7. नगेंद्र - छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।

8. रामविलास शर्मा - छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह नहीं है।

9. नामवर सिंह - छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की अभिव्यक्ति है, जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से। 

10.  रामस्वरूप चतुर्वेदी - छायावाद मूलतः शक्ति काव्य है, पुनर्जागरण चेतना का व्यापक और सूक्ष्म रूप है और अपनी अर्थ प्रक्रिया में मानव व्यक्तित्व को गहरे स्तरों पर समृद्ध करता है।

11. सुमित्रानंदन पन्त - छायावाद काव्य न रहकर अलंकृत संगीत बन गया...। (विजेन्द्र स्नातक के अनुसार)

12.  रामकुमार वर्मा - प्रकृति का क्षेत्र ही इन कवियों की कविता का क्षेत्र है। ऐसी स्थिति में इन कविता को यदि प्रकृतिवाद कहा जाए तो गलत नहीं"..।

13. बच्चन सिंह - "छायावाद शब्द अपने आप में ही उलझा हुआ है। इसके स्थान और स्वछंदतावाद शब्द रख दिया जाए तो समस्या का हल हो जाएगा साथ ही बंगाल में किसी भी तरह की कविताओं को छायावादी कविता नहीं कहा गया। यह वाद किसी बाहरी परिवेश से प्रभावित नहीं बल्कि "अपनी ही जमीन का पौधा है"।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


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आधुनिक काल भाग - 4


                      (द्विवेदी युग)


 "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "द्विवेदी युग" के नाम से भी जानी जाती है। आज हम इसी के बारे में यहाँ कुछ विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। उसमें भी खासतौर पर द्विवेदीयुगीन एमी महत्वपूर्ण कवियों की रचनाओं व उनके साहित्यिक कर्म के बारे में कुछ तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी साझा करने जा रहे हैं। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी। 

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1. कवि "जगन्नाथ दास" जिनका उपनाम 'रत्नाकर' था, इन्होंने अंग्रेजी कवि "पोप" के समालोचना सम्बन्धी प्रसिद्ध काव्य "एस्से ऑन क्रिटिसिज़्म" का अनुवाद 'समालोचनादर्श' नाम से किया है।

इनकी प्रसिद्ध कृति "गंगावतरण" जोकि 1927 में प्रकाशित हुई थी। उसमें गंगा के धरती पर उतरने और शिव द्वारा उन्हें संभालने के लिए सन्नद्ध होने का वर्णन ओजगुण में किया है। रचना में किये गए ओजगुण का वर्णन ऐसा है कि वह पाठकगण को आनंदित होने को बेकरार कर देता है।

"हिंदी साहित्य लोचन" अपने मंच पर यह स्पष्ट करना चाहता है कि, कवि रत्नाकर जी की अन्य महत्वपूर्ण रचना "उद्धव शतक" जोकि 1929 में आई थी उस पर बिहारी सतसई का अनुकरण नहीं है। स्वयं बच्चन सिंह के अनुसार "उद्धव शतक" में दुलारेलाल भार्गव की रचना  "दुलारे दोहावली" की तरह बिहारी सतसई की तरह अनुकृति नहीं है बल्कि उद्धव शतक की टेक्नीक और कसावट सतसई से ली गयी है"..।

कवि रत्नाकर "जकी" नाम से उर्दू में लिखते थे।

                                                          

2. द्विवेदीयुगीन अन्य महत्वपूर्ण कवि " नाथूराम शर्मा" जिनका उपनाम 'शंकर' था। इन्हें इनके साहित्यिक योगदान से प्रभावित होकर हिंदी साहित्य के बड़े-बुजुर्गों ने अथवा तत्कालीन विद्वानों ने इनको "कविता-कामिनी-कांत",  "भारतेंदु प्रज्ञ" , "साहित्य सुधाकर" आदि उपाधियों से नवाज़ा था। 

इनकी प्रसिद्ध रचना "गर्भरण्डा रहस्य" नामक एक प्रबन्धकाव्य है। जिसमें विधवाओं की बुरी परिस्थिति और देव मंदिरों पर हुए अनाचारों आदि का वर्णन दिखाने के उद्देश्य से लिखा है। 

नाथूराम शर्मा "शंकर" ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, रूढ़ि और पाखंड का विरोध करने जैसी कथावस्तु को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया है। तथा इन सबके प्रति व्यंग्य विनोद का भाव मिलता है। 

 जिस तरह से भारतेंदु युग में अम्बिकादत्त व्यास समस्यापूर्ति रचनाओं के लिए मशहूर थे ठीक उसी प्रकार से द्विवेदी युग में नाथूराम शंकर भी समस्यापूर्ति रचनाओं के लिए मशहूर थे।

3. "सत्यनारायण कवितरत्न" ने ब्रज में रचनाएँ की है जोकि रीतिकालीन शैली पर न होकर भक्तिकालीन कृष्णभक्तों जैसी प्रतीत होती है।

इन्होंने मैकाले की रचना "होरेशस" का पद्यबद्ध अनुवाद किया है।

4. "दुलारेलाल भार्गव" जोकि बिहारी परंपरा के कवि माने जाते हैं इन्हें इनकी "दुलारे दोहावली" पर टीकमगढ़ राज्य की ओर से 2000 रुपये का "देव पुरुस्कार" मिला था।

आचार्य शुक्ल इनके बारे में कहते हैं कि " बिहारी की प्रतिभा जिस ढाँचे की थी उसी ढाँचे की दुलारेलाल की भी है, इसमें कोई संदेह नहीं"...।

5. " हिंदी साहित्य लोचन"  आपको यहाँ बताना चाह रहा है कि हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के भीतर यदि किसी कवि ने पशुओं की दारुण स्थिति को समझा तो उनमें "लोचनप्रसाद पांडेय" जी का नाम रखा जा सकता है। इन्होंने न केवल उन मूक -असहाय पशुओं के दर्द को समझा बल्कि उनसे सम्बन्धी एक मार्मिक कृति का भी सृजन कर दिया। 

 "मृगी दुखमोचन" इसी तरह की रचना है, जिसमें इन्होंने खड़ीबोली के सवैयों में एक मृगी की अत्यंत दारुण परिस्थिति का वर्णन सरस भाषा में किया है। जिससे पशुओं तक पहुँचने वाली इनकी व्यापक और सर्वभूत दयापूर्ण काव्यदृष्टि का पता चलता है।


(द्विवेदीयुगीन वीररस के कवि)


"हिंदी साहित्य लोचन" जैसाकि अपनी पूर्ववर्ती पोस्टों में भी यह साझा कर चुका है कि यह एक तथ्यात्मक-वर्णनात्मक साहित्यिक मंच है। जिसके अंतर्गत कुछ विषयों व बिंदुओं पर लेखक अपने विचार भी समय समय रखता है। इसी क्रम में हम यहाँ वीर रस सम्बन्धी कुछ वर्णन करने जा रहे हैं। 

यदि आधुनिककाल के अंतर्गत वीररस अथवा ओजगुण का स्वर्णकाल अगर किसी युग को कहा जा सकता है तो वह द्विवेदी युग ही था। इस युग के सबसे अग्रणी वीररस अथवा ओजगुण के कवि महाकवि "मैथिलीशरण गुप्त" जी ही थे। जिनके साहित्यिक कर्म के लिए इन्हें हिंदी का प्रथम राष्ट्रकवि घोषित किया गया। इनसे प्रभावित होकर और तत्कालीन उपनिवेशवादी परिस्थितियों को देखकर अन्य कवि भी स्वतः ही वीररस के ऐसे-ऐसे छंद बुनने लगे जिनसे स्वाधीनता की सोंधी महक आ रहा थी।

इन छंदों का एक ही उद्देश्य था। अतीत के उन महापुरुषों को याद करना जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना बलिदान दे दिया। उनकी गाथाओं को पुनः नए सिरे से रचकर वर्तमान भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाना। इसी क्रम में हम यहाँ कुछ द्विवेदीयुगीन वीररस के कवियों का वर्णन करने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के कथानकों को ओजगुण का केंद्र बनाया। इतिहास के ऐसे पात्रों व घटनाओं का चयन किया जिनकी गाथा सुन जनता में एक नई ऊर्जा का संचार हो सकता था और अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ वह उठ सकने की हिम्मत जुटा सकते थे। ऐसी गाथाएँ उन्हें एक आत्मबल देती थी।

6. द्विवेदीयुगीन कवि "वियोगी हरि" के "वीर सतसई" में भारत के अनेक वीरों की प्रशस्तियाँ लिखी गयी हैं जिस के लिए इन्हें प्रयाग के हिंदी साहित्य सम्मेलन में 1200 रुपये का पुरस्कार मिला था।

7. लोचनप्रसाद पांडेय ने चितौड़ के भीमसेन के अपूर्व स्वत्व तर्ज की कथा नंददास के रास पंचाध्यायी के ढंग पर की है। इन्हें "काव्य-विनोद" व "साहित्य-वाचस्पति" की उपाधि प्राप्त थी।

8. "गयाप्रसाद शुक्ल" भी द्विवेदीयुगीन वीर रस के अग्रणी कवियों में गणनीय हैं। यह श्रृंगारिक कविताएँ 'स्नेही' नाम से और राष्ट्रीय कविताएं 'त्रिशूल' नाम से लिखते थे। 

9.  वीररस की कविताओं का बोलबाला ऐसा चला कि उससे ब्रज जैसी मधुर भाषा वाले कवि भी अछूते न रहे। "लाला भगवानदीन" जो पहले ब्रज में लिखा करते थे, बाद में "लक्ष्मी" के सम्पादक होने के पश्चात खड़ीबोली में भी रचनाएँ करने लगे। खड़ीबोली में इन्होंने वीरों के चरित्र को लेकर जोशीली कविताएँ लिखी जैसे - "वीर क्षत्राणी, वीर बालक, वीर पंचरत्न"..।

10. "श्यामनारायण पांडेय" की सर्वश्रेष्ठ कृति "हल्दीघाटी का जौहर" नामक महाकाव्य है जिसमें 17 सर्गो का विभाजन दिया हुआ है। इसमें मुगलकालीन मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के वीरतापूर्ण और साहस से लबरेज़ रूप को बड़ी ही खूबसूरती के साथ दर्शाया है। इसका कथानक "महाराणा प्रताप" के नेतृत्व वाली सेना और मुगलों की तरफ से  आमेर के राजा "मान सिंह " के युद्ध पर आधारित है। इस कृति पर इन्हें देव पुरुस्कार मिला है।

वीर रस को लेकर पांडेजी की कलम यहीं ही नहीं रुकी। इसके आगे भी इन्होंने अपनी इस शैली को जारी रखा। आगे चलकर "त्रेता के दो वीर" नामक एक छोटा सा काव्य लिखा है जिसमें "लक्ष्मण व मेघनाद युद्ध" के कई प्रसंग लेकर दोनों वीरों का महत्व चित्रित किया गया है। यह रचना हरिगीतिका तथा संस्कृत के कई वर्णवृतों में रची गयी है।


● द्विवेदी युग पर कहे गए कथन:-

1. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार" यह साहित्य में पहला प्रयास था जब रीतिकालीन वृत्तियों का इतना विरोध हुआ और उसे जनाश्रय तक जोड़ा गया"..।

2.  रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार भारतेंदु युग में प्रतीक रूप में खड़ीबोली का प्रयोग किया जा रहा था , द्विवेदी युग में क्रमश पूरे कविता की भाषा बन जाती है।



● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


"हिंदी साहित्य लोचन" sahitya hindi lochan.blogspot.com पर आने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आप इसी तरह से "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आते रहे और हिंदी साहित्य से सम्बंधित अन्य तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी यहाँ पाते रहें।


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Saturday, May 15, 2021

आधुनिक काल भाग- 3

 

          (मैथिलीशरण गुप्त व रामनरेश त्रिपाठी)


"हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप आज हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "द्विवेदी युग" के नाम से भी जानी जाती है। आज हम इसी के बारे में यहाँ कुछ विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। उसमें भी खासतौर पर हिंदी के प्रथम राष्ट्रीय कवि "श्री मैथिलीशरण गुप्त" जी और हिंदी में प्रथम ग्राम गीतों के संकलन कर्ता "श्री रामनरेश त्रिपाठी" जी की रचनाओं व उनके साहित्यिक कर्म के बारे में कुछ तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी साझा करने जा रहे हैं। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी। 

कृपया करके ब्लॉग को फॉलो और जरूरी कमेंट करना न भूलें।


1. "मैथिलीशरण गुप्त"


● "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप हिंदी के प्रथम राष्ट्रीय कवि "मैथिलीशरण गुप्तजी" की ख्याति, यशकीर्ति का आधार , उनकी लोकप्रियता के स्तम्भों में से सबसे प्रथम रचना के बारे में जानेंगे।  जिसके दमखम्ब पर आज भी वह हिंदी साहित्य के महान रचनाकारों में गणनीय हैं। इसके अतिरिक्त गुप्तजी ने अन्य भी कुछ प्रसिद्ध और महान कृतियों को जन्म दिया है जिसका भी क्रमानुसार वर्णन हम आगे करेंगे।

● गुप्तजी की "भारत भारती" 1912 में आई राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत लम्बी कविता है जिसमें 3 खण्ड है। बच्चन सिंह के अनुसार इस पर "मुसहास-मददो-जजे-इस्लाम" या "मुसददसे हाली" का प्रभाव है। इस पुस्तक में मुस्लिमो के भूत, वर्तमान और भविष्य की बात कही थी। "हाली" की प्रतिक्रिया में भारत-भारती के 7 वर्ष पूर्व "ब्रजमोहन दत्तात्रेय कैफ़ी" की पुस्तक "भारत दर्पण" आ गयी थी।

• बच्चन सिंह का मत है कि "गुप्त जी ने शैली हाली से और जमीन कैफ़ी से"..।

भारत-भारती" से प्रभावित होकर गाँधी जी ने गुप्तजी को राष्ट्रीय कवि की उपाधि दी थी।

● शुक्लानुसार "इस पुस्तक में मार्मिक तथ्यों का समावेश बहुत साफ और सीधी-सादी भाषा में होने से यह प्रस्तुत स्वदेश की ममता से पूर्ण नवयुवकों को बहुत प्रिय हुई"...।

जैसाकि हमने ऊपर कहा था कि आप "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर गुप्तजी की अन्य महान व प्रसिद्ध रचनाओं के बारे में भी जानकारी ग्रहण कर सकेंगे। उसी क्रम में हम गुप्तजी की द्वितीय महान रचना जोकि 1931 में प्रकाशित "साकेत" है, यहाँ उसकी चर्चा कर रहे हैं। मूलरूप से यह रचना रामकथा है परन्तु इस रचना की खासियत , लक्ष्मण की पत्नी "उर्मिला" के विरह वर्णन और उसके एकांत में छिपी है।

इस पुस्तक के लिए गुप्तजी को प्रेरणा महावीरप्रसाद जी के निबन्ध "कवियों की उर्मिला" से मिली थी, जिसे द्विवेदी जी ने रवींद्रनाथ टैगोर के एक लेख "काव्य की उपेक्षिताएँ" से प्रभावित होकर अपने इस लेख को "भुजंगभूषण भट्टाचार्या" नाम से सरस्वती में छापा था। 

• साकेत शब्द पालि का है जिसका अर्थ होता है अयोध्या। 

• शुक्लजी के अनुसार रचना का साकेत नाम रखने के पीछे अयोध्या में होने वाली परिस्थितियों व घटनाओं का ही वर्णन प्रधान है। इसके अलावा शुक्लजी ने मैथिलीशरण गुप्त को "सामंजस्यवादी कवि" की उपाधि दी है। 

• "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप देख पाएँगे कि किस प्रकार से शुक्ल जी ने साकेत और यशोधरा दोनों रचनाओं पर गुप्तजी के प्रबंध तत्व की कमी होने पर कुछ आलोचनात्मक अंदाज में अपनी बात रखी है। उनके अनुसार "साकेत" और "यशोधरा" भले ही प्रबन्ध काव्य है परन्तु गुप्त जी की इन दोनों कृतियों में उनकी काव्यात्मक शैली का तो पूरा-पूरा असर दिखा है परन्तु प्रबन्ध की कुछ कमी सी रह गयी है"..।

• ऐसा ही कुछ आलोचनात्मक अंदाज बच्चन सिंह भी रखते हैं। उनके अनुसार "साकेत में गुप्तजी ने पारम्परिक प्रबन्ध काव्य की रूप-पद्धति को तोड़ा है। साथ ही इस प्रबन्ध का नायक साकेत है। इस पर आर्य समाज का भी प्रभाव है।

• बच्चन सिंह के अनुसार इसमें 12 सर्ग है जिसके शुरुआती 8 सर्ग चित्रकूट तक है। 9वां उर्मिला के विरह वर्णन का है। 10वें में उर्मिला सरयू को सम्बोधित करती है। यहाँ भी उर्मिला का विरहवर्णन ही दिखता है जोकि फ्लैशबैक पद्धति पर आधारित है। 11वें सर्ग में लक्ष्मण शक्ति लगने की कथा और 12वें में साकेत निवासी का युद्ध के लिए तैयार होना।

● "हिंदी साहित्य लोचन" अपनी वर्णनात्मकता शैली के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पर हम बच्चन सिंह के शब्दों में आधुनिक आलोचक नंदुलारे वाजपेयी जी का मत है रख रहे हैं। उनका मत है कि " साकेत में महाकाव्य सम्बन्धी नया आदर्श और प्रतिमान स्थिर करने का प्रयत्न जानबूझकर भले ही न किया गया हो, परन्तु महाकाव्य विषयक क्रमागत व्यवस्था और परिपाटी से यह अनजाने ही इतना दूर चला गया है कि आधुनिक युग का नया साहित्यिक परिवर्तन उसे स्वभावतः अपने विकास की प्रारंभिक कड़ी मानकर चलता है"..।

• डॉ नगेंद के अनुसार साकेत "जनवादी काव्य" है।

• बच्चन सिंह के अनुसार माइकेलसूदन दत्त के "मेघनाद वध" में रावण धर्मनिरपेक्ष और विज्ञान तथा टैक्नोलॉजी से युक्त है। राम यहाँ पर नॉन सेक्युलर हैं। राम का चरित्र रावण के आगे हीन है। इस कृति से मैथिलीशरण गुप्त जी का हृदय दुखता है और वह राम को अनार्यो पर आर्यों की विजय का प्रतीक हैं। 

गुप्त जी ने माइकेल मधुसूदन दत्त के "मेघनाद वध" का अनुवाद 'मधुप' नाम से किया है। जो अतुकांत रूप में है। इसके बाद कई और रचनाएँ भी इसी नाम से की थी।


● गुप्त जी के प्रबंध काव्य-

1. रंग में भंग - 1909 में राजपूती आन की कथा कही है।

2. किसान 1917 - किसान जीवन के संघर्ष की कथा है।

3. गुरुकुल 1929 - गुरुओं की कथा है। 

4. साकेत 1931 - लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला को केंद्र में रखकर लिखा गया है जहाँ उसकी विरहाकुलता को दिखाया है।

5. यशोधर 1932 - नायिका गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा की कथा है।

6. द्वापर 1936 - यशोधरा, राधा, नारद, कंस, कुब्जा आदि कुछ विशिष्ट व्यक्तियों की मनोवृतियों का अलग-अलग मार्मिक चित्रण किया गया है। 

7. जयभारत 1952 - महाभारत की कथा है।

8. विकट भट- जोधपुर के राजपूत सरदार की 3 पीढ़ियों तक चलनेवाली कथा है, जिसमें वचन निभाना है। 

9.  वैतालिक- इसमें गुप्त जी के गीतों का संकलन है।

10.  "जयिनी"-  मार्क्स की पुत्री "जैनी" पर रचित जयनी नामक काव्यकृति है। जिसमें पूँजीवादी का विरोध हुआ है।


● गुप्तजी की रचनाओं में 3 अवस्थाएँ लक्षित होती हैं" 

1. भाषा की सफाई

2. ब्रजभाषा की कविताओं का अनुशीलन

3. अन्य ग्रँथों-पुस्तकों का अनुवाद

 

● "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर मैथिलीशरण गुप्त जी की रचनाओं सम्बन्धी आचार्य शुक्ल व अन्य विद्वानों के मत पढ़ सकते हैं,जोकि निम्नांकित हैं -

1. शुक्लजी के अनुसार "मैथिलीशरण गुप्त की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण कि क्षमता अर्थात उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्यों प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। इस दृष्टि से हिंदी भाषा जनता के प्रतिनिधि कवि ये निस्संदेह कहे जा सकते हैं"। 

2. शुक्ल जी के अनुसार " गुप्त जी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य-प्रणालियों को ग्रहण करने की शक्ति। इस दृष्टि यह निस्संदेह हिंदी भाषी जनता के प्रतिनिधि कवि कहे जा सकते हैं"...।

3.  रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार " हरिऔध यदि द्विवेदी युग के पहले कवि हैं तो मैथिलीशरण गुप्त जी इस युग के प्रतिनिधि कवि...।

4. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार हिंदी में सबसे ज्यादा प्रबन्ध काव्य मैथिलीशरण गुप्त जी ने ही लिखे हैं। इनके कथानक पौराणिक, ऐतिहासिक हैं। जिसमें नए भावबोध को दर्शाने की कोशिशें की गई है।

5. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार "हिंदी साहित्य में कविता से जन-जागरण का काम यदि किसी ने सबसे ज्यादा किया है तो वो गुप्त जी ने ही किया है"...। 

 6. अपनी रचना साकेत के लिए इन्हें आधुनिककाल का तुलसी कहा जाता है। साथ ही द्विवेदी युग में इन्हें "हरिगीतिका छंद का बादशाह" कहा जाता है। इन्होंने गीत भी लिखे हैं।


2. "रामनरेश त्रिपाठी"


● इनके काव्यों में श्रीधर पाठक सी स्वछंदता भी मिलती है। इन्होंने ने भी प्रबन्ध काव्य लिखे हैं जिसमें राजनीतिक वातावरण के अनुसार कथा, कल्पना के आधार पर कही है। इसी कल्पना कथा को स्वछंदतावाद कहा गया है।

● रामनरेश त्रिपाठी ने अपने काव्य संग्रह "कविता कौमुदी" को आठ भागों में वर्गीकृत करके 'ग्रामगीतों का संकलन' किया है। जिसमें हिंदी, उर्दू, बंगला, आदि काव्य भाषाओं का आलोचनात्मक अध्ययन है। 

• बच्चन सिंह के अनुसार यह हिंदी साहित्य में ग्राम गीतों के संकलन का 'प्रथम प्रयास' था।

• रामनरेश त्रिपाठी के प्रबंध काव्य :-

1. "मिलन" - 1917 में विदेशी शासन से उद्धार हेतु।

2. "पथिक" - 1920 में उपनिवेशवाद से मुक्ति व दक्षिण भारत का वर्णन।

3. "मानसी" - 1927 में राष्ट्रीय कविताएँ हैं।

4. "स्वप्न" - 1929 में विदेशी आक्रमणकारियों से सुरक्षा का भाव व उत्तर भारत का चित्र व्यंजित किया है।

● "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप रामनरेश त्रिपाठी पर हिंदी के विद्वानों के उक्त कथनों को भी देख सकते हैं- 

1. बच्चन सिंह के अनुसार रामनरेश त्रिपाठी दूसरे बड़े स्वछंदतावादी कवि हैं।

2. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "त्रिपाठी जी में जहाँ स्वछंदतावाद का सहज उल्लास है, वहीं भाषा का अनुशासन भी पूरा है"..। इसी के आगे जोड़ते हुए कहते हैं कि " इनकी भाषा पूरी तरह से व्यवस्थित खड़ीबोली ही है, परन्तु महावीरप्रसाद जी जैसी इतिवृत्तात्मक नहीं"..।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


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Sunday, May 9, 2021

आधुनिक काल भाग - 2

          

                          (द्विवेदी युग)

● हिंदी साहित्य के अंतर्गत आधुनिक काल के द्वितीय चरण "द्विवेदी युग"  को डॉ नगेंद्र ने "जागरण सुधार काल" नाम दिया है।

● शुक्ल ने द्विवेदी युग को "नई धारा : द्वितीय उत्थान"  नाम दिया है। 

● भारतेंदु युग में जो स्वदेशी क्रांति व अनुराग के जो बीज अंकुरित हुए थे वह इस काल में पल्लवित हुए और उन्हें पल्लवित करने में इस काल के राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत कवियों का बड़ा योगदान है। इसलिए "रामविलास शर्मा" इस युग को 'भारतीय जाति का जागरण" युग बताते हैं।


● महावीरप्रसाद द्विवेदी :- इस युग को द्विवेदी युग के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि महावीरप्रसाद द्विवेदी जी ने "सरस्वती" पत्रिका के माध्यम से वर्ष 1903 से 1920 तक 17 वर्ष तक हिंदी साहित्य की सेवा की थी। व साहित्यकारों की भाषा को भी परिष्कृत किया था। जिस गद्य लेखन की शुरुआत भारतेंदु युग में हुई थी वह अभी तक अपनी गति को नहीं पकड़ पाया था इसलिए इस युग के प्रतिनिधि लेखक, आलोचक, साहित्यकार , साहित्य-भाषा मर्मज्ञ "महावीरप्रसाद जी" ने इसकी बागडोर संभाली और भाषा से अरबी-फारसी-अंग्रेजी-संस्कृत के प्रयोग हो रहे शब्दों के धड़ल्लेपन पर रोक लगानी चाही। लेखकों को भाषाई स्तर पर बहुत हदतक सावधान भी किया। 

सरस्वती" में आती हुई रचनाओं व पुस्तकों के व्याकरण को काफी हदतक द्विवेदी जी ने परिष्कृत किया।

सरस्वती में इस समय विविध प्रकार के लेख छपते थे जिससे कि लेखकों को ज्यादा-से-ज्यादा जानकारी प्राप्त हो सके। 

इस युग में साहित्यिक रीतिकालीन प्रवृति की दरबारीपन का विरोध हुआ था। इसके स्थान पर हिंदी साहित्य उस राष्ट्रीय स्वाधीन चेनता का आधार बन गया था जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा हुआ था। इस काल में नई जानकारियों का संचय हो रहा था।

इस युग में दो कवि वर्ग थे। एक द्विवेदी मंडल और एक उसके बाहर का ।

"द्विवेदी मंडल के कवि" मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, नाथूराम शंकर, रामचरित उपाध्याय आदि। इस युग का प्रतिनिधित्व "महावीरप्रसाद" जी कर रहे थे।  

द्विवेदी मंडल के बाहर के कवियों में स्वछंदतावादी कवि जैसे श्रीधर पाठक, मुकुटधर पांडेय, लोचन प्रसाद पांडेय, रामनरेश त्रिपाठी, रूपनारायण पांडेय आदि। इस युग का प्रतिनिधित्व "श्रीधर पाठक" कर रहे थे।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार स्वछंदतावादी काव्यधारा द्विवेदी युग में एक भूमिका तैयार करता है जो छायावाद में और गहरा हो जाता है"..। 

• अनुशासन का नेतृत्व द्विवेदी जी कर रहे थे तो स्वछंदतावाद का श्रीधर पाठक"..।

इस काव्यधारा को आगे बढ़ाने का कार्य मुकुटधर पांडेय और लोचनप्रसाद पांडेय जैसे कवियों ने किया जिसकी निष्पत्ति रामनरेश त्रिपाठी में होती है।

● शुक्ल जी के शब्दों में द्विवेदी के बारे में " सरस्वती के सम्पादक के रूप में उन्होंने आई हुई पुस्तकों के भीतर व्याकरण और भाषा की अशुद्धियाँ दिखाकर लेखकों को बहुत कुछ सावधान किया"..।

अपने काव्यखण्ड प्रकरण 4 में शुक्ल जी द्विवेदी युग के संदर्भ में कहते हैं "भारतेंदु युग में जिस स्वदेश गौरव व स्वदेश की जो भावना प्रथम उत्थान में जगाई गयी थी उसका अधिक प्रसार दिव्तीय उत्थान में हुआ और "भारत-भारती" जैसी पुस्तके प्रकाशन में आयी"..।

● इस युग में द्विवेदी जी ने माना कि अब श्रृंगारी कविताओं का समय नहीं है, उसके अलावा कितनी ही बातें कविताओं में कही जा सकती है। साथ ही कविता के बिगड़ने व उसकी सीमा परिमित होने से साहित्य पर भारी आघात होता है।

● द्विवेदी जी के भाषा परिष्कार पर शुक्ल जी कहते हैं"  हम द्विवेदी जी को पद्यरचना की एक प्रणाली के प्रवर्तक के रूप में पाते हैं। खड़ीबोली के पद्य विधान पर द्विवेदी जी का पूरा-पूरा असर पड़ा। बहुत से कवियों की भाषा शिथिल और अव्यवस्थित थी। xxx उनकी भाषा को दुरुस्त करके सरस्वती में छपवाते थे....। ऐसे ही गद्य की भाषा के लिए भी कहते हैं " गद्य भाषा पर द्विवेदी जी के इस शुभ प्रभाव का स्मरण जब तक भाषा के लिए शुद्धता आवश्यक समझी जाएगी, तबतक बना रहेगा"..।

• अपने साहित्येतिहास के आधुनिककाल के काव्य प्रकरण 4 में शुक्ल जी ने द्विवेदी जी के एक कथन को रखकर ये दिखाने की कोशिश की है कि, नए छंदों के व्यवहार व तुक के बंधन के त्याग की सलाह के बारे में कहा था कि " तुले हूए शब्दों में कविता करने और तुक, अनुप्रास आदि ढूँढ़ने से कवियों के विचारस्वतंत्रय में बाधा आती है"...।


● महावीरप्रसाद द्विवेदी कविता के विषय के लिए मनोरंजन व उपदेश जैसे तत्वों को आवश्यक मानते हैं। इसी के आगे जोड़ते हुए अपने निबन्ध संग्रह  "रसज्ञ रंजन" में कविता के विषयवस्तु पर बात करते हुए कहते हैं कि " चींटी से लेकर हाथी पर्यंत तक, भिक्षुक से लेकर राजा पर्यंत तक, बिंदु से लेकर समुन्द्र पर्यंत तक, जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत आदि सभी पर कविता हो सकती है"...।

• महावीरप्रसाद जी पर मराठी साहित्य का भी कुछ-कुछ असर पड़ा है।

महावीरप्रसाद द्विवेदी और बालमुकुंद गुप्त जी के बीच चाहे किसी भी प्रकार से मतभेद हों परन्तु बालमुकुंद गुप्त जी की हिंदी की प्रशंसा हमेशा ही किया करते थे। इसी संदर्भ में वह कहते हैं "अच्छी हिंदी बस बालमुकुंद गुप्त ही लिखता था"..।


● श्रीधर पाठक :-  नए भावबोध का पहला लक्षण स्वछंदता की प्रवृति थी जो "श्रीधर पाठक" के काव्य में प्रकट हुई। रीतिबद्धता एवं प्रणाली निर्दिष्ट के विरोध और उसके प्रति विद्रोह का यह स्वाभाविक परिणाम था जब जड़ शास्त्रीयता भावधारा को जड़, उबाऊ, व गतकालिक बना देती है, तब काव्य धारा का विकास स्वछंद मार्ग पर चलकर होता है। यह मार्ग लोक जीवन और प्रकृति के बीच से होकर जाता है। इस प्रवृत्ति को स्वछंदतावाद या रोमांटिसिज्म कहते हैं"..। 

कविता में व्यापक रूप से खड़ीबोली को प्रयोग करने का श्रेय "श्रीधर पाठक" को जाता है। भले ही महावीरप्रसाद द्विवेदी जी ने सरस्वती के माध्यम से खड़ीबोली को प्रयोग करने के लिए बहुत परिश्रम करा पंरतु उनसे भी पहले श्रीधर पाठक इस समस्या से जूझ चुके थे। वह कहते भी है कि " लिखो, न लेखनी करो बंद, श्रीधर सम सब कवि स्वछंद। 

स्वच्छन्दतावादी कविता की पहचान प्रकृति परिचय, प्रेम की स्वछंद भंगिमाओं से जुड़ी होती है, और यही प्रवृति आगे चलकर छायावाद का रूप लेती है।

• श्रीधर पाठक की ब्रज में प्रथम मौलिक कृति 1904 में "कश्मीर सुषमा" आयी थी। और खड़ीबोली की प्रथम पुस्तक "एकांतवासी योगी" है जिसका अनुवाद गोल्डस्मिथ की "हरमिट" से किया है।

"स्वर्गीय वीणा" में श्रीधर पाठक ने उस परोक्ष दिव्य संगीत की ओर रहस्यपूर्ण संकेत किया जिसके ताल-सुर पर यह सारा विश्व नाच रहा है".. ।

गोल्डस्मिथ की रचना "हरमिट" का अनुवाद "एकांतवासी योगी" के नाम से 1886 में खड़ीबोली में किया है जिसमें 'ख्याल' या 'लावणी' की लय है। शुक्ल के अनुसार इसमें किसी के प्रेम में योगी होना और उसकी याद में प्रकृति के निर्जन क्षेत्र में कुटी में जाकर बैठ जाना दिखाया है।

गोल्डस्मिथ की रचना "द डेसर्टेड विलेज" का अनुवाद "उजड़ग्राम" 1889 की रचना ब्रजभाषा में की है। इसमें गाँव के उजड़ जाने से प्रभावित वहाँ के लोगों का वर्णन है।

गोल्डस्मिथ की रचना "द ट्रेवलर" का अनुवाद "श्रांत पथिक" नाम से 1902 में रोला छंद व खड़ीबोली में की है।

"ऋतुसंहार" में ब्रज और खड़ीबोली दोनों ही का प्रयोग किया गया है।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "श्रीधर पाठक उन विरले रचनाकारों में से एक हैं जिनकी प्रशंसा सबसे बड़े सम्पादक द्विवेदी जी और सबसे बड़े आलोचक शुक्ल जी ने भी की है। यानी अपने युग की रचना - शीलता को सम्पादक और आलोचक ने सही समझा, जिसने इन प्रमुख गद्यकारों में कवित्व संक्रमित किया"..। 

• आचार्य शुक्ल श्रीधर पाठक की खड़ीबोली की अपेक्षा ब्रज की कविताओं को ज्यादा सरस् मानते हैं।

• शुक्ल के अनुसार श्रीधर पाठक ही स्वछंदतावाद (रोमटिसिज़्म) के प्रवर्तक हैं।

• शुक्लानुसार "यह अपने समय के कवियों में प्रकृति का वर्णन पाठकजी ने सबसे ज्यादा किया है, इससे हिंदी में यह प्रकृति के उपासक कहे जा सकते हैं"..।

• विश्वनाथ त्रिपाठी इन्हें "खड़ीबोली का प्रथम कवि" मानते हैं।


● "अयोध्यासिंह उपाध्याय"  :- इनका "हरिऔध" नाम उस समय पड़ा जब वह अपने निवास स्थान निजामाबाद में सिख सम्प्रदाय के महंत बाबा "सुमेरसिंह" के पास जाकर हिंदी की पूर्तियाँ पढा करते थे। खड़ीबोली के लिए इन्होंने पहले यह उर्दू के छंदों या ठेठबोली को ही उपयुक्त समझा, क्योंकि उस समय तक उर्दू में खड़ीबोली अच्छी तरह मंझ चुकी थी। 

● "प्रियप्रवास" 1914 में खड़ीबोली का प्रथम महाकाव्य है जिसमें कृष्ण जी के मथुरा गमन पर समस्त वृंदावन की गोपियाँ, राधा, यशोदा आदि विरह से पीड़ित हो रहे हैं। यह 17 सर्गो में विभक्त है। इसका मूल नाम "ब्रजांगना विलाप" था। इस महाकाव्य के लिए उन्हें "मंगला पारितोषिक सम्मान" मिला है।

इसमें कृष्ण को जननायक के रूप में दिखाया है और राधा के दुःख को समाज का दुःख बताया है जहाँ वह समाज सेवा का व्रत लेती है। 

इसमें 'नवधा भक्ति' की व्याख्या की गई है। साथ ही संस्कृत छंदों का प्रभाव है। इन संस्कृत छंदों का परिमाण में रचना करना कठिन काम है। इसकी भूमिका में हरिऔध लिखते हैं कि " अब मुझे केवल इतना ही कहना है कि समय का प्रवाह खड़ीबोली के अनुकूल है, इस समय खड़ीबोली में कविता करने से अधिक उपकार की आशा है...।

इसकी भूमिका के "ग्रँथ का विषय" शीर्षक में हरिऔध कहते हैं कि " मैंने श्रीकृष्ण चन्द्र को इस ग्रँथ में एक महापुरुष की भांति अंकित किया है, ब्रह्म करके नहीं"..।

● "शुक्ल जी" के अनुसार "इस कृति में कई जगह संस्कृत शब्दो की ऐसी लड़ी बाँधी है कि हिंदी को है, था, किया, दिया आदि ऐसी दो क्रियाएँ के भीतर सिमट कर रह जाना पड़ा है। पर सर्वत्र यह बात नहीं है"..।  अधिकतर पदों में बड़े ढंग से हिंदी अपनी चाल पर चली दिखी है।

 यह काव्य अधिकतर भावनात्मक और वर्णात्मक है। कृष्ण के चले जाने पर ब्रज की दशा का वर्णन बहुत अच्छा है। विरह वेदना से क्षुब्ध वचनावली प्रेम की अनेक अंतर्दशाओं की व्यंजना करती हुई बहुत दूर तक चली जाती है। शुक्ल 'इसे महाकाव्य तो क्या अच्छा प्रबन्ध भी नहीं मानते हैं' ।

● "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार "ईश्वर अब व्यक्तिगत आस्था का विषय है, चित्रण का नहीं। इस दृष्टि की पहली पुस्तक सशक्त उद्घोषणा "प्रियप्रवास" में ही होती है।

अपने "चुभते चौपदे" और "चोखे चौपदे" में मुहावरों और बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया है।

"रसकलश" 1940 की रचना रस सिद्धान्त और उसके शास्त्र को समझने के लिए की है।

"वैदेही वनवास" में राम के द्वारा सीता के निर्वासन की कथा कही है।

● "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार " अनुशासन की धारा का नेतृत्व महावीरप्रसाद जी ने किया परन्तु इसके पहले बड़े कवि हरिऔध ही कहलाये " ...।

● "गणपतिचन्द्र गुप्त" ने हरिऔध को आधुनिक काल का सूरदास कहा है।

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

Saturday, May 1, 2021

आधुनिक काल भाग : 1

                         

                          (भारतेंदु युग)


● हिंदी साहित्य में आधुनिक काल को आचार्य शुक्ल ने "गद्यकाल" का नाम दिया है। 

● "रेनेसॉ" जिसका अर्थ नवजागरण या पुनर्जागरण होता है। इसका सबसे पहले इस्तेमाल फ्रांसीसी इतिहासकार "मिशीसेट" ने 19वी सदी में किया था। इसी आधार पर भारतीय आलोचकों द्वारा भक्तिकाल को "नवजागरण" और आधुनिककाल "पुनर्जागरण" का नाम दिया गया है।

● रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण को 2 भागों में बाँटते हैं:- 

1. लोक जागरण (भक्ति आंदोलन)

2. नवजागरण (हिंदी नवजागरण या आधुनिक काल)

रामविलास शर्मा "लोकजागरण" की परिभाषा देते हुए कहते हैं "लोकजागरण प्रथम जातीय निर्माण को व्यक्त करने वाला सांस्कृतिक आंदोलन है, जिसका मुख्य स्वर सामन्त विरोधी तथा मानवतावादी है। भक्ति आंदोलन का काव्य ही "लोक जागरण" का काव्य है"...।

"नवजागरण या हिंदी नवजागरण" की परिभाषा देते हुए रामविलास शर्मा कहते हैं " यह राष्ट्रीय स्वाधीनता के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलन है, जिसका मुख्य स्वर साम्रज्यवाद विरोधी तथा सामंतवाद के विरुद्ध है"..।    

• रामविलास शर्मा की नवजागरण पर दी गयी परिभाषा से प्रभावित होकर "मैनेजर पांडेय" कहते हैं कि " रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण और उसके साहित्य की विशेषताओं का सशक्त, स्वतंत्र और प्रमाणिक विवेचन करने वाले पहले व्यक्ति हैं"..।  

• रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत है कि " पुनर्जागरण दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उतपन्न रचनात्मक ऊर्जा है"..। 

रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार पुनर्जागरण का भारतीय साहित्य में पहला प्रतिफलन माइकेल मधुसूदन दत्त के बंगला काव्य " मेघनाद वध" 1861 को माना गया है।

इसी के आगे चतुर्वेदी जी कहते हैं कि " आधुनिक काल में आकर मनुष्य सारे चिंतन का केंद्र बनता है, और ईश्वर की धारणा व्यक्तिगत आस्था के रूप में स्वीकृत होती है"..।


                           (भारतेंदु युग)

 ● इस युग का नामकरण आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक "भारतेंदु" के नाम पर किया गया है जिन्हें हिंदी नवजागरण का "अग्रदूत" माना जाता है। इसी आधार पर डॉ नगेन्द्र इस युग को "पुनर्जागरण काल" कहते हैं ।

रामविलास शर्मा ने आधुनिककाल को "नवजागरण" कहा है।


● भारतेंदु जी सही अर्थों में हिंदी के जनक कहे जा सकते हैं। क्योंकि उनकी भाषा सदासुखलाल, लल्लूलाल, सदल मिश्र, सितारे हिंदी आदि की एकपक्षीय नजरिये से भिन्न थी। उनकी भाषा जनता की सामान्य बोली के रूप में थी इसीलिए वह ज्यादा प्रभावी हुई।

भारतेंदु के विद्या गुरु भले ही "शिवप्रसाद" 'सितारे हिन्द' थे परंतु भाषानीति को लेकर आगे गुरु-शिष्यों में मतभेद हो जाता है।

भारतेंदु में राज भक्ति और राष्ट्र भक्ति दोनों अपने स्थान और खड़ी है।

• भारतेंदु "कविता वर्धनी सभा" के नाम से समस्यापूर्ति आयोजन करते थे। इसी सभा का प्रभाव कानपुर के रसिक समाज और आजमगढ़ के कवि समाज मे भी पड़ा।

भारतेंदु ने "नारद भक्ति सूत्र" और "शांडिल्य भक्ति सूत्र " का अनुवाद क्रमश "तदीए सर्वस्व" और "भक्ति सूत्र वैजंती" के नाम से किया है।

● "विजेन्द्र स्नातक" के अनुसार भारतेंदु के भक्ति लेखनशैली में वल्लभाचार्य का प्रभाव है।

"विजयनी विजय" नामक रचना मिस्र में भारतीय सेना की विजय प्राप्ति पर लिखी गयी थी।

भारतेंदु के शुरुआती शेरो-शायरी "इंदर सभा" नामक शीर्षक में प्रकाशित हुए थे। यह हिंदी साहित्य में "पैरोडी" का प्रथम रचना है। पैरोडी उसे कहते हैं जो नाटक न होकर उसका आभास कराने वाली रचना हो।

● शुक्ल जी के अनुसार भारतेंदु ने जिस प्रकार गद्य की भाषा का स्वरूप स्थिर करके गद्य साहित्य को देशकाल के अनुसार नए-नए विषयों की ओर लगाया, उसी प्रकार कविता की धारा को भी नए-नए क्षेत्रों की ओर मोड़ा। इस रंग में सबसे ऊँचा स्वर देशभक्ति का था। उसी से लगे हुए विषय लोकहित, समाजसुधार व मातृभाषा का उद्धार था"..।

इसके आगे शुक्ल कहते हैं कि " हमारे जीवन और साहित्य के बीच में जो विच्छेद बढ़ रहा था, उसे उन्होंने दूर किया। हमारे साहित्य को नए-नए विषयों की ओर प्रवृत्त करने वाले हरिश्चंद्र ही थे"..।

शुक्ल के अनुसार " उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नए मार्ग पा लेकर खड़ा कर दिया था। साहित्य के नए युग के प्रवर्तक हुए"...।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत है कि " भारतेंदु विचारों से जितने आधुनिक थे उतने संस्कारों से नहीं"...।

रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "भारतेंदु का व्यक्तित्व संक्रांतिकालीन चेतना का रूप है"..। इसी के आगे वह कहते हैं " कविता में उनका संस्कार है तो गद्य में उनका विचार। एक के लिए ब्रजभाषा को वे पकड़े हुए हैं और दूसरे के लिए खड़ीबोली को अपनाते हैं"।  यही हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण के प्रवर्तक माने जाते हैं।

● प्रेमघन उर्दू में "अब्र" नाम से लिखा करते थे। 

"जीर्ण जनपद" में प्रेमघन अपने गाँव की दूर्दशा का यथार्थवादी चित्रण करते हैं। इसका एक अन्य नाम "दुर्दशा दत्तापुर" भी है। यह एक "लघुखण्ड काव्य" है। बच्चन सिंह के अनुसार इन कविता पर  गोल्डस्मिथ के "डेर्जेट विलेज" का प्रभाव पड़ा है।

बच्चन सिंह के अनुसार हिंदी में  "लघुखण्ड काव्य" लिखने की शुरुआत यही से होती है।

प्रेमघन ने दादा भाई नौरोजी को काला कहे जाने पर क्षोभपूर्ण कविता लिखी थी।

प्रेमघन की काव्य भाषा में पुराने ढंग की झलक दिखाई पड़ती है।र

● भारतेंदु युग में प्रकृति प्रेमी "ठाकुर जगमोहन सिंह" थे। वह प्रकृति के मनोरम दृश्य की कविताएँ लिखा करते थे। इनके काव्य में अनुप्रसिकता की झलक दिखाई पड़ती है 

शुक्ल जी के अनुसार "जगमोहन सिंह जी भले ही अपनी कविता को नए विषयों की ओर नहीं ले गए, पर प्राचीन संस्कृत काव्यों के प्राकृतिक वर्णनों का संस्कार मन में लिए हुए, अपनी प्रेमचर्या की मधुरस्मृति से समन्वित विंध्यप्रदेश के रमणीय स्थलों को जिस सच्चे अनुराग की दृष्टि से देखा है, वह ध्यान देने योग्य है"..।


● विजेन्द्र स्नातक के अनुसार अम्बिकादत्त व्यास ने अंग्रेजी कवि बायरन का "शीलन का बंदी" नाम से अनुवाद किया।

अम्बिकादत्त व्यास को उनकी शुरुआती कविता " चिरजीवी रहौ विक्टोरिया रानी" पर समस्यापूर्ति लेखन करके "सुकवि" की उपाधि से सम्मानित होने का गौरव हासिल हुआ।

 विजेन्द्र स्नातक के अनुसार भारतेंदु ने इन्हें महज 12 वर्ष की उम्र में ही "सुकवि" की संज्ञा दे दी थी।


● अयोध्याप्रसाद खत्री ने खड़ीबोली आंदोलन के लिए "खड़ीबोली आंदोलन" नामक पुस्तक निकाली थी जिसमें यह बड़े जोर-शोर के साथ कहते कि "आज तक जो कविता हुई थी वह ब्रजभाषा में हुई, हिंदी में नहीं। हिंदी में भी कविता हो सकती है"..।

इनकी नजर में खड़ीबोली ही हिंदी थी। अपनी पुस्तक में इन्होंने पद्य की 5 शैलियों के का जिक्र किया है। यह खड़ीबोली में कविता करने के लिए लोगों से अनुरोध किया करते रहते थे।

इसी के अतिरिक्त भारतेंदु के ही समकालीन लेखक, कवि "चन्द्रशेखर मिश्र" जोकि संस्कृत के साथ हिंदी के भी अच्छे ज्ञाता थे। वह अयोधयाप्रसाद जी के बारे में कहते हैं कि " मैं समझता हूँ कि हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में संस्कृत वृतों में खड़ीबोली के कुछ पद्य पहले-पहल मिश्र जी ने ही कहे"...। 

चंद्रशेखर मिश्र से खत्री जी ने बहुत सी हिंदी भी सीखी थी। इसी तरह से, जहाँ कहीं भी खड़ीबोली के बारे में जो भी जानकारी मिलती उसे अपने गुटका में शामिल कर लेते और जहाँ भी मौका मिलता खड़ीबोली की उन्नति और उसका बखान करने लगते। इसके साथ एक दूसरे व्यक्ति भी खड़ीबोली के प्रचार प्रसार में दिनरात लगे थे। वह थे "प. गौरीदत्त"..।


● भारतेंदु युग पर कहे गए कथन :-

1. रामविलास शर्मा के अनुसार " भारतेंदु युग का साहित्य गदर से प्रभावित है। इसका पहला प्रमाण किसानों को लक्ष्य करके लिखा जाना जितना हिंदी में हुआ उतना किसी अन्य भारतीय भाषा में नहीं"...।

वह भारतेंदु युग की जनवादिता के बारे में कहते हैं कि " भारतेंदु युग के साहित्य का जनवादी अर्थ यह है कि, वह भारतीय समाज के पुराने ढाँचे से संतुष्ट न रहकर उसमें सुधार हैं"..।

2. हजारीप्रसाद जी के अनुसार " भारतेंदु युग से पूर्व का साहित्य कबीर की कुटिया से निकलकर राजा-रईसों के दरबार मे घुस गया था। उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मंदाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ दरबारीपन से निकाल कर लोक जीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया"..।

3. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार" इस युग में काव्य की भाषा गद्ययोन्मुख हो गयी थी, यद्दपि वह ब्रज ही बनी रही। गद्य पहली बार साहित्य का प्रधान माध्यम बन रहा था। साथ ही कविता की भाषा भी गद्य की ओर झुक रही थी।

4. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार" भारतेंदु युग के एक और माध्यम को द्विवेदी युग के कुछ लेखकों ने पकड़े रखा, वह था समस्या-पूर्ति का माध्यम। भारतेंदु मंडल के लेखकों ने अधिकतर ब्रजभाषा में समस्या-पूर्ति लिखे हैं और इनका गढ़ काशी था। यह समस्या पूर्ति कवि-सम्मेलनों में सार्वजनिक रूप से पढ़े जाते थे।

5. भारतेंदु मंडल के लेखकों ने जहाँ एक तरफ ब्रिटिश राज की प्रसंशा की है तो उनकी बुरी आदतों व व्यवस्था की बुराई भी की है। इसलिए यह राजभक्ति और देशभक्ति का युग था। साथ ही इसमें रीतिवाद के साथ स्वछंदता भी एकसाथ ही था।

6. खड़ीबोली में कविता करने की समस्या व शुरुआत इसी युग से हुई।

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

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