(छायावादी चतुष्टय स्तम्भ)
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "छायावाद" भी है। आज हम "छायावाद चतुष्टय स्तम्भ " पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर आप छायावादी चतुष्टय स्तम्भों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
1. महाकवि जयशंकर प्रसाद :-
• आधुनिक काल के विशेष साहित्येतिहासकार "बच्चन सिंह" के अनुसार "रीतिकालीन प्रवृति से कविता को मुक्त रखने के लिए प्रसाद ने माना कि उसे दरबारीपन से मुक्त करना होगा। इसी से जुड़ी हुई 1909 में वह एक बात कहते हैं :- " अब समय दूर नहीं जब "सरस्वती" नवल रूप धारण करके प्रभातिक उषा को भी लजावेगी". ।
● प्रसाद की रचनाएँ :-
1. प्रसाद की प्रथम कविता " सावन-पंचक" 1906 में "भारतेंदु पत्रिका" में उनके उपनाम "कलाधर" नाम से प्रकाशित हुई थी।
2. 1909 में आई "उर्वशी" इनकी चम्पूकाव्य है।
3. बच्चन सिंह के अनुसार "प्रेम पथिक" सबसे पहले ब्रजभाषा 1909 में "इंदु" में प्रकाशित हुई थी जिसे 1915 में खड़ीबोली में बदल दिया था।
4. चित्राधार :- हिंदी साहित्य लोचन आपको बताता है कि , प्रसाद पहले ब्रज भाषा में "कलाधर" नाम से लिखा करते थे। इनकी ब्रजभाषा में रचित 10 काव्य ग्रँथों का संकलन "चित्राधार" नाम से 1918 में प्रकाशित हुआ। जिसमें :- कानन कुसुम, करुणालय, प्रेम पथिक, महाराणा का महत्व, सम्राट चन्द्रगुप्त, छाया, उर्वशी, राज्यश्री, प्रायश्चित, और कल्याणी परिणय थी।
5. झरना :- प्रसाद की प्रथम छायावादी कविता "प्रथम प्रभात" व प्रथम काव्य संग्रह "झरना" 1918 था। इसी संग्रह में यह कविता संकलित थी। इस संग्रह का दिव्तीय संस्करण 1927 में प्रकाशित हुआ जिसमें 33 रचनाएँ जोड़ी गयी। दिव्तीय संस्करण में ही छायावादी कहे जाने वाली कविताएँ संकलित हुई।
• महाकवि प्रसाद की प्रथम प्रसिद्ध रचना "झरना" को छायावाद की 'प्रथम प्रयोगशाला' भी कहा जाता है।
6. आँसू :- "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार प्रसाद की रचना "आँसू" एक विरह मुक्तक काव्य है। जिसमे 133 छंद हैं।
इस का कथानक अतीत के विषादपूर्ण प्रसंगों को लोकमंगल की भावना से जोड़कर दिखाने से सम्बद्ध है। इसका प्रकाशन 1925 में हुआ था। यह प्रसाद की प्रथम कृति है जिसके प्रति 'पाठकों का सबसे ज्यादा आकर्षण' रहा था। इसी के साथ इसमें 'नियतिवाद और दुखवाद' का विषण्ण स्वर भी सुनाई देता है। इस विधि का पालन कामायनी तक हुआ है। इसका 'संशोधित प्रकरण' 1933 में आया।
• प्रसाद की लोकप्रिय रचना "आँसू" पर रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार फ़ारसी-उर्दू शायरी का भी प्रभाव देखा गया है।
• बच्चन सिंह के अनुसार "आँसू के प्रथम संस्करण में आत्म संकोच है तो दिव्तीय संस्करण में आत्म-प्रसार"..। इसकी जमीन भी कामायनी के जैसी ही है"...।
• बच्चन सिंह मानते हैं कि " आँसू मानवीय विरह का काव्य है। इसमें प्रिय की सुंदर देह-यष्टि का आकर्षण है, आलिंगन-परिरम्भण की मधुर स्मृतियाँ हैं, प्रेमजन्य पीड़ा है, दुखानुभव है। पर यह सब एक यूटोपिया है, मानसिक है, स्वप्न जन्य है"...।
"हिंदी साहित्य लोचन" आपको बताता है कि विशेष रूप से "बच्चन सिंह" आँसू को न ही खण्डकाव्य मानते हैं और न ही प्रबन्ध काव्य।
7. लहर :- hindi sahitya lochan आपको बताता है कि प्रसाद की एक अन्य प्रसिद्ध रचना "लहर" का नामकरण किस प्रकार से हुआ।
शुक्लानुसार "लहर" 1933 नाम से पहले एक कविता दी गयी थी जिसे बाद में लहर नाम से एक संकलन का रूप दे दिया गया। इस शीर्षक से लेखक का अभिप्राय है कि " उस आनंद की लहर से जो मनुष्य के मांस में उठा करती है और उसके जीवन को सरस करती रहती है। उसे ठहराने की पुकार अपने व्यक्तिगत नीरस जीवन को भी सरस करने के लिए कही जा सकती है और अखिल मानव जीवन को भी"..।
8. कामायनी :- महाकवि जयशंकर प्रसाद की हिंदी साहित्य जगत में ख्याति का सबसे ठोस आधार स्तम्भ उनकी प्रबन्धकाव्य "कामायनी" जोकि 1936 में प्रकाशित हुई थी। इसी रचना के पश्चात छायावाद के अंत की घोषणा भी हम देख सकते हैं। छायावाद की समय-सीमा जिस मुकाम पर खत्म होती है उस समय की महत्वपूर्ण रचनाओं में प्रसाद की "कामयानी" भी शामिल है।
• इसका कथानक मानव के बाह्य और आंतरिक विकास का कथा-काव्य है, जिसमें वह अंततः शैव आनंदवादी दर्शन में समाधान ढूँढता है।
• इस कृति में शुक्लानुसार "श्रद्धा विश्वास समन्वित रागात्मिका वृति और इड़ा व्यवसायात्मिका बुद्धि"..।
• बच्चन सिंह के अनुसार "प्रसाद की कामायनी उनकी प्रसिद्धि में एक लंबी छलांग-सी प्रतीत होती है"..।
• शुक्ल जी कामायनी के रूपक की प्रशंसा करते हुए कहते हैं " हृदय बुद्धि और कर्म का जो सामंजस्य अंत मे दिखाया गया है वह कामायनी में अन्यत्र कहीं नहीं मिलता" ।
• डॉ नगेंद्र का ध्यान कामायनी के रूपक-तत्व व शैवागम की रक्षा पर केंद्रित है।
• बच्चन सिंह ऐसा मानते हैं कि "मुक्तिबोध का कामायनी के सम्बंध में अध्ययन फूहड़ मार्क्सवाद का नमूना है। कुछ लोग इसमें शैवागम ढूँढते है तो मुक्तिबोध इसमें वर्ग-संघर्ष, पूँजीवादी व्यक्तिवाद, वर्गहीन यूटोपिया देखते हैं"...।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी कामायनी पर लिखी अपनी आलोचनात्मक कृति "कामायनी: एक पुनर्मूल्यांकन" में उसका मूल्यांकन करते हुए उसे एक "कम्पोजिशन" कहते हैं। उनके अनुसार यह शुद्ध रूपवादी दृष्टि है।
इसके अलावा अपने इतिहास में इन्होंने इसके सम्बन्ध में कहा कि "कामायनी का रचाव जैसा जटिल है विधान वैसा ही व्यापक तथा महत्वाकांक्षी। इसमें एक ओर मानव संस्कृति के विकास का आख्यान है, और साथ ही साथ आदिम पुरूष का उत्तरोत्तर जटिल और संघटित रूप"..।
आगे वह कहते हैं "इसमें मध्यकालीन हीन भावना से ग्रसित देव जाति को भी नए आधुनिक भावबोध से जोड़ दिया गया है। इसमें अद्वैतवाद का चरम रूप है।
• रामधारी सिंह 'दिनकर' अपने निबन्ध " दोष रहित दूषण सहित" में कामायनी के सम्बंध में कहते हैं कि " इस विलक्षण कथा के संधान मात्र को मैं आधा या उससे अधिक कविता मानता हूँ। मेरे मतानुसार कामायनी कर्म का संदेश व वैराग्य मत का खंडन है। इसके अतिरिक्त वह "श्रद्धा को औरतानी औरत के समीप है पर इड़ा नहीं"...।
• शांतिप्रिय द्विवेदी जी ने "कामायनी" को छायावाद का उपनिषद कहा है।
● बच्चन सिंह शुक्ल द्वारा, प्रसाद की कुछेक रचनाओं के आधार पर प्रसाद को छायावाद का प्रवर्तक मानने का विरोध करते हैं। उनका मत है कि एक कविता के आधार पर किसी को किसी युग का प्रवर्तक घोषित नहीं किया जा सकता।
2. महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' :-
हिंदी साहित्य जगत निराला जी को हिंदी में 'मुक्त छंद' का प्रवर्तक के रूप में जानता है। इस छंद के लिए हिंदी के आलोचकों ने इस नवीन छंद को "केंचुआ" और "रबड़ छंद" जैसे तुच्छ नामों से उसकी आलोचना की थी।
• शुक्लानुसार इनके मुक्तछंद पर अमेरिका के "वॉल्ट हिटमैन" की कविताओं की नकल दिखाई देती है, जो पहले बाँग्ला में थोड़ी बहुत हुई थी। इस प्रकार बिना किसी छंदोव्यवस्था की प्रथम रचना "लीव्स ऑफ ग्रास" 1855 में आई थी।
• शुक्लानुसार जिस अंग्रेजी ढंग की शैली की कविताओं का चलन पहले-पहल बंगाल में हुआ था। उसका जो असर निराला पर पड़ा उससे हिंदी कविता को यह लाभ हुआ कि निराला ने ही सबसे पहले 'कविता को संगीत' से जोड़ा। इसके प्रमाण के लिए इनके गीतों को देखा जा सकता है। चाहे वह "राम की शक्ति पूजा" हो जा "गीतिका" काव्यसंग्रह आदि।
• निराला ने "कवित" को हिंदी का जातीय छंद कहा है।
● 'निराला' की रचनाएँ -
"हिंदी साहित्य लोचन" आपको जानकारी देता है कि हिंदी साहित्य जगत के अंतर्गत निराला की प्रथम रचना के बारे में विद्वानों में एकमतता नहीं है। और यह एकमतता छायावादी प्रथम रचना को लेकर है।
निराला ओज, विद्रोह और औदात्य के कवि हैं। इन पर "रामकृष्ण परमहंस" व "विवेकानंद" का प्रभाव था। इन्होंने बादल को 'वीर का विप्लव' कहा है।
• कोई निराला की "जूही की कली" 1916 में आई को प्रथम छायावादी रचना मानता है तो कोई पन्त की "भारत माता की वंदना" 1920 में आई को।
1. परिमल :- 1928 काव्य संग्रह में मुक्तछंद की परिभाषा देते हुए उसकी भूमिका में निराला ने लिखा है " मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होनी चाहिए"..। इस छंद के प्रयोग पर निराला के छंद को 'रबड़ छंद' या 'केंचुआ छंद' कहा गया।
• "धारा" कविता में वह अपने यौवनजन्य के साथ उसी राष्ट्रीय भावधारा को संकेतित कर रहे हैं जो ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ कहते हैं :-
"बहने दो, रोक-टोक से कभी नहीं रुकती है
यौवन मद की बाढ़ नदी की, किसे देख झुकती है"...।
• "महाराज शिवाजी का पत्र" कविता में निराला औरंगजेब के सहायक जयसिंह को अत्याचार और साम्राज्यवाद के प्रतिपक्ष में जाने के लिए कहा गया है। इसमें शिवाजी का उद्देश्य ही देश का उद्देश्य है।
• "आवाहन" में अत्याचार के विरुद्ध शक्ति के अकुंठ नृत्य का आह्वान है।
2. सरोज स्मृति :- hindisahityalochan आपको सूचित करता है कि महाकवि निराला की बहुचर्चित रचना "सरोज स्मृति" जोकि 1935 में आई थी, इस को हिंदी का सबसे बड़ा "शोक गीत" कहा जाता है। इस रचना में निराला जी ने अपनी पुत्री 'सरोज ' की मृत्युओप्रान्त उसके जीवन को याद करते हुए एक स्मृति- रचना के रूप में भी इसे निर्मित करने की भावना परिलक्षित की है।
3. राम की शक्ति पूजा :- इस क्रम में निराला की अन्य सबसे महत्वपूर्ण व लोकप्रिय, बहुचर्चित रचना "राम की शक्तिपूजा" जोकि 1936 में छायावाद की समाप्ति के साथ ही हिंदी साहित्य जगत में प्रवेश करती है। इस रचना को 'निराला का महाकाव्य' माना जाता है जिसका आधार बंगला की रामकथा "कृतवासी रामायण" से लिया गया है। इस रचना का कथानक बुराई पर अच्छाई की जीत, अन्याय पर न्याय की जीत, अंधेरे पर रोशनी की जीत, आदि प्रतीकों में रचित है।
रावण के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य पर राम की विजय को स्वाधीनता आंदोलन की जीत में दिखाने की आकांशा रखी है।
• बच्चन सिंह के अनुसार बंगला की रामायण जितनी बहिर्मुखी है शक्ति पूजा उतनी ही अंतर्मुखी।
• बच्चन सिंह के अनुसार शक्तिपूजा का युद्ध निराला का अपना युद्ध है"..।
4. गीतिका - निराला की यह रचना 1936 में उनके गीतों का संग्रह है जिसमें कवि का ध्यान संगीत की ओर अधिक है, अर्थ समन्वय की ओर कम। इस सँगीत पर पश्चिमी संगीत का भी प्रभाव देखा गया है।
5. दिव्तीय अनामिका :- 1938 में निराला की सबसे प्रौढ़ रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं जैसे शक्ति पूजा व सरोज स्मृति। सँ 35 से 38 तक निराला के आत्म संघर्ष का काल था जिसकी अभिव्यक्ति उनकी उस समय की कविताओं में भी हुई है।
इसी संग्रह में इनकी इन सभी रचनाओं का संकलन है।
• बच्चन सिंह ऐसा मानते हैं कि "दिव्तीय अनामिका" संग्रह में संकलित कविताओं से पहले निराला का व्यंग्य अनुपस्थित था। इस संग्रह से उनके व्यंग्य की शुरुआत भी होती है और अपनी प्रतिभा से वह सामने वालों को परास्त भी करते हैं। ये एक ही मानसिकता के दो पहलू थे। इस संग्रह में मृत्युबोध से सम्बंधित कविताएँ भी लिखी गयी है।
7. तुलसीदास :- निराला की यह रचना 1938 में एक खण्डकाव्य के रूप में प्रकाशित हुई थी। जिसमें 101 छंद हैं। यह 'आत्मचेतना का विश्व चेतना में लय का काव्य' है जिसमें भारतीय संस्कृति और औदात्म्य अपनी पूरी गरिमा में अभिव्यक्त है।
तुलसीदास निराला के प्रिय कवियों में से एक थे और उनका अध्ययन उन्होंने "समन्वय" के सम्पादकत्व से ही शुरू कर दिया था। 1922 में तुलसीदास पर इनका पहला लेख आया और इसके बाद 5 और लेख आये।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "तुलसीदास का तात्कालिक परिवेश भले ही मुगलकालीन है परन्तु वह अंग्रेजी हुकूमत की दासता के काल में प्रक्षिप्त है जहाँ तुलसी के रूप में निराला स्वयं को कल्पित कर रहे हैं"..।
• बच्चन सिंह के अनुसार "तोड़ती पत्थर" प्रगतिशील कविता का मॉडल है। यह दिव्तीय अनामिका में संकलित है।
• निराला कृत कविता "महंगू महंगा रहा" में समाज के निम्न वर्ग की दारुण कथा कही है।
• "स्नेह निर्झर बह गया" कविता में 17 पंक्तियाँ हैं।
● महाकवि निराला को दी गयी संज्ञाएँ व उनपर कहे कथन :-
• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार निराला अकुंठ व वयस्क श्रृंगार दृष्टि तथा तृप्ति के कवि हैं।
• बच्चन सिंह के अनुसार इनका समस्त साहित्य 'आत्मचरितात्मक' है। यदि हम इनको क्रम से पढ़े तो हम पाएँगे की यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ रहा है-"तमसो म ज्योतिर्गमय"...।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "भाषा और संवेदना के जितने रंग निराला में हैं उतने और किसी कवि में नहीं"..। और "शक्तिपूजा का संघर्ष व्यापक धरातल पर है, सरोज स्मृति का संघर्ष घोषित रूप में वैयक्तिक स्तर पर"..।
3. महाकवि सुमित्रानंदन पंत -
● कवि पन्त छायावाद कवियों में सबसे सहज व तत्काल स्वीकार्य और लोकप्रिय होने वाले कवि थे। पन्त मूल रूप से प्रकृति प्रेमी व संवेदनशील इन्द्रिय-बोध के कवि हैं। इसके अलावा यह 'अरविंद दर्शन' से प्रभावित थे।
हिंदी साहित्य जगत के अंतर्गत पन्त को 'शब्द शिल्पी' कहा जाता है।
• शुक्ल जी ने पन्त को 'आधुनिक युग की नई धारा का सबसे महत्वपूर्ण कवि' माना है। यह अलग बात है कि परवर्ती आलोचना ने प्रसाद और निराला के बाद पन्त को स्थान दिया।
● पंत की रचनाएँ :-
1. "मोह" और "प्रथम रश्मि" में कवि ने प्रकृति और मानव जीवन के सम्बंध का ही प्रश्न सबसे पहले उठाया है।
2. पन्त का प्रथम छायावादी काव्य संग्रह "उच्छवास" 1919 में आया था और अंतिम "युगांत" 1936 में है।
3. बच्चन सिंह के अनुसार "ग्रन्थि" 1920 पुरानी परिपाटी की प्रेमकथा है और "पल्लव" 1928 में कवि का मराल मुखर हुआ है।
4. "पल्लव" में प्रेम का वियोग पक्ष वर्णित हुआ है तो "गुंजन" में संयोग पक्ष।
5. "वीणा" और "पल्लव" दोनों ही काव्य संग्रहो में अंग्रेजी कविताओं से लिये हुए भाव व भाषा के लाक्षणिक प्रयोग मिल जाएंगे।
पन्त कृत "पल्लव" की भूमिका को छायावाद का मेनिफेस्टो कहा जाता है जोकि 40 पृष्ठों की थी, तो इसी तरह "युगांत" को छायावाद के अंत का घोषणा पत्र कहा जाता है। जहाँ कवि का मुख प्रगतिवादी विचारधारा की तरफ हो गया है -
द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र, हे स्त्रस्त ध्वस्त!
...झरे जाति कुल वर्ण प्रण धन"....।
• शुक्लानुसार पल्लव में कवि अपने व्यक्तित्व से बंधा हुआ, गुंजन में कभी-कभी उसके बाहर और युगांत में लोक के बीच दृष्टि फैलाकर आसन जमाता हुआ दिखाई पड़ता है। गुंजन तक वह जगत से अपने लिए सौंदर्य और आनंद का चयन प्रतीत होता है, युगांत में आकर वह सौंदर्य और आनन्द का जगत में पूर्ण प्रसार देखना चाहता है।
• युगांत के बाद पन्त का काव्य दो सोपानों "मार्क्सवाद -गाँधीवाद और अरविंद दर्शन" पर चलता है।
6. पन्त की रचना "चिदम्बरा" जोकि 1958 में प्रकाशित है। उसे 1968 में "भारतीय ज्ञानपीठ" से सम्मानित किया गया है।
7. पन्त ने "लोकायतन" 1964 में नामक महाकाव्य महात्मा गाँधी के जीवन पर लिखा है।
विजेंद्र स्नातक के अनुसार "लोकायतन आध्यात्मिक चेतना का महाकाव्य" है।
4. महकवियित्री महादेवी वर्मा -
● शुक्ल जी ने जहाँ महादेवी को सच्ची रहस्यवादी माना है वहीं बच्चन सिंह उनके मत का खंडन करते हुए महादेवी को "अँधेरे में जूझती हुई दीपशिखा की प्रतिमा बताते हैं" । बच्चन सिंह के अनुसार 'प्रिय और प्रियतम परमात्मा के प्रतीक न होकर उनके व्यक्तिगत जीवन के प्रतिक हैं।'
● महादेवी की रचनाएँ :-
1. महादेवी कृत "यामा" 1940 में उनकी चार काव्य संग्रहो जैसे :- निहार, रश्मि, नीरजा और सांध्यगीत का संकलन है। यामा पर इन्हें 1982 में "भारतीय ज्ञानपीठ" मिला था। महादेवी पर बौद्ध धर्म का भी प्रभाव है।
• बच्चन सिंह के अनुसार "यामा अंधकार है और दीपशिखा प्रकाश की मद्धिम लौ"..।
2. महादेवी की "सप्तवर्णा" रचना में ऋग्वेद के मंत्रों का हिंदी काव्य-अनुवाद हुआ है।
3. "निहार" की भूमिका हरिऔध जी ने 1930 में लिखी थी।
• बच्चन सिंह ने माना है कि मुक्तिबोध के अनुसार महादेवी ने दुखवाद को धर्म (कल्ट) बना लिया जो वास्तविक न होकर कल्पनाजन्य है"...।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार महादेवी ने अपनी कविताओं का माध्यम पूरी तरह से गीत को बनाया है।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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