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Tuesday, December 29, 2020

गोदान


● गोदान में आये मुख्य गाँव व उनसे जुड़े मुख्य पात्र :- 

सेमरी - रायसाहब और अमरपाल सिंह 

बेलारी - होरी 


● पात्र योजना:-

1. कामता - बड़ा बेटा 

2. जंगी - छोटा बेटा   (भोला के बेटे)

3. सोभा - छोटा भाई

4. हीरा - बड़ा भाई     (होरी के भाई)

5. पुन्नी - हीरा की पत्नी 

6. गोविंदी - मिस्टर खन्ना की पत्नी

7. मिस्टर खन्ना - बैंक मैनेजर 

8. मि. तन्खा - वकील , बीमा दलाल 

9. ओंकारनाथ  - बिजली पत्रिका के सम्पादक

10. पं. गोसेराम - कारकुन साहब

11. झिंगुरीसिंह - नोहरी से दूसरा विवाह करने वाले 

12. सुंदरिया - गाय का नाम

13. मटरू - गाय के कल्पित बछड़े का नाम  

14. गण्डासिंह - दरोगा

15.  पंडित नोखेराम

16. मालती, सरोज और वरदा, मीनाक्षी - राय साहब की बेटियाँ

17. भीष्म - गोविंदी और खन्ना का बेटा

18.  लल्लू - झुनिया का पहला बेटा

19. दोहरी - झुनिया का प्रसव कराने वाली महिला

20. मथुरा - सोना का पति

21. रुद्रपाल सिंह - सरोज का पति, मालती की बहन

22. मीनाक्षी - दिग्विजय की पत्नी

23.  मंगल - झुनिया का दूसरा बेटा

24.  रामू- सिलिया का बेटा

25. नोहरी - भोला की दूसरी पत्नी

26. सिलिया चमारिन

26.  पं. दातादीन

27 मातादीन - दातादीन का बेटा और सिलिया का पति


● गोदान : प्रमुख कथन

1. " जिस घर में पेट भर रोटियाँ भी न मिले उसकी इतनी खुशामद क्यों? "...। (धनिया)

2. " जो मालिक प्रजा को न पालें , वह कोई आदमी है? " (होरी)

3. " अपना धर्म यह नहीं है कि मित्रो का गला दबायें"..। (होरी- भोला से गाय लेने से इनकार करने पर)

4. " यह तुम रोज रोज मालिको की खुशामद करने क्यूँ जाते हो?"...। (गोबर- होरी को कहता है)

5. " हमारा जन्म तो इसलिए हुआ है कि अपना रक्त बहाएं और दूसरों का घर भरे "...। (रामलीला के दौरान पैसे देने की चिंता-होरी)

6. " औरत को सबकुछ दे पर रूप न दे"...। (चौधरी- होरी से - जो बांस काटने आया होता है)

7. " नारी का धर्म है कि गम खाए"..। (दातादीन - धनिया से)

8. " मुझे उन लोगों से कोई दिलचस्पी नही जो बातें तो कम्युनिस्ट सी करते हैं परंतु रहते हैं एकदम रईस की तरह"...। (मेहता)

9. " मैं इसे स्वीकार करता हूँ की किसी को भी किसी दूसरे के श्रम पर मोटा होने की जरूरत नही"....। (रायसाहब - मेहता से)

10. " मैं नकली जिंदगी का घोर विरोधी हूँ"...। (मेहता)

11. " मैं इस सिद्धांत का हमेशा समर्थक हूँ कि संसार में छोटे- बड़े हमेशा रहते हैं और होने चाहिए, अन्यथा मानवजाति का सर्वनाश हो जाएगा"....।  (मेहता)

12. " जिन्होंने धन और भोग विलास को जीवन का अंग बना लिया वो क्या लिखेंगे"...।(ओंकारनाथ - मालती के लिए)

13. "साहित्य की सेवा अपने जीवन का ध्येय है और रहेगा"..।(ओंकारनाथ)

14. " दौलत के पुजारी तो गली-गली मिलेंगे , मैं सिद्धान्त का पुजारी हूँ"...। (ओंकारनाथ -मालती से)

15." राजनीति के सामने न्याय को कौन पूछता है?"..।   (ओंकारनाथ)

16. " मैं उस आदमी को आदमी नहीं समझता जो देश के लिए उद्योग और बलिदान न दे"...।  (रायसाहब- स्वयं को)

17. " गड़े रुपये न निकले चाहे कितना ही सूद बढ़ता रहे"..।(झिंगुरीसिंह- होरी से)

18. " जेल से सुराज न मिलेगा, सुराज मिलेगा धर्म और न्याय से"...। (धनिया- गाय मरने पर दरोगा को पैसे न देने पर)

19. "हमको कुल प्रतिष्ठा इतनी नही प्यारी की एक जीव की हत्या कर डालते। उसकी बाँह पकड़ी है मेरे बेटे ने"..। (धनिया - दातादीन से)

20. " लड़की तो हमारे बिरादरी में कुँवारी नही रही, पर मैं बेटी की हत्या नही कर सकता"...। (होरी- पटेश्वरी से झुनिया को बाहर न निकलने पर)

21. " नीच जात लतियाये अच्छा"...। (दातादीन)

22. "संसार तो भय के बल से चलता है। समाज का अंकुश जाता रहे तो देखो क्या क्या होता है"...। (दातादीन- धनिया के लिए झुनिया को न निकलने पर)

23. " पंचो गरीब को सताकर सुख न पाओगे"...। (धनिया)

24. "बिरादरी का वह आतंक था कि अपने पीठ पर  लादकर अनाज ढोह रहा था"...। (होरी के लिए)

25. "आदमी का बहुत सीधा होना भी बुरा है"..। (धनिया)

26. "काम सबको प्यार होता है चाम नही"...। (गोबर)

27 " नई सभ्यता का आधार धन है। (लेखक)

28. " मुझे आज नया अनुभव हुआ कि महिला की सहानुभूति हार को जीत बना सकती है"..। (मेहता- कब्बडी के समय मिर्जा खुर्शीद से)

29. " सत्य की चिंगारी असत्य को भस्म कर देती है। (मेहता- वुमेन्स लीग में)

30. " कुत्ता अगर हड्डी की रखवाली करे तो खाये क्या?"..।(रायसाहब- ओंकारनाथ से)

31. " न जाने इन महाजनों से गला छूटेगा की नही"..। (शोभा)

32. " हम जाल में फंसे हैं, जितना फड़फड़ाएंगे उतना फसेंगे"...। (होरी)

33. " सिंहनी से उसका शिकार छीनना आसान नही"..।(गोविंदी- मेहता से)

34. " उसकी वाणी में बल था। डरपोक आदमियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है।"..। (गोबर के लिए - जब वह महाजनों को होली के बाद धमका आता है)

35. " जीवन का सुख दूसरों को सुखी करने में है दुखी करने में नही"...। (गोविंदी - खन्ना से)

36. "प्रेम सीधी सादी गाय नही, खूंखार शेर है। जो अपने शिकार पर किसी को आँख भी नही गड़ाने देता"....। (मेहता- मालती से)

37. " जब तक मनुष्य रहेगा उसकी पशुता भी रहेगी"..।  (सुर्यप्रताप सिंह)


सहायक ग्रन्थ :-

1 गोदान, प्रेमचंद, वाणी प्रकाशन।     

Monday, December 28, 2020

हिंदी भाषा : भाग 7

हिंदी भाषा का विकास :

 

                                (लिपि)

● कामताप्रसाद गुरु के अनुसार :- "लिखित भाषा में मूल ध्वनियों के लिए जो चिन्ह मान लिया गया है वह भी वर्ण है परन्तु वह जिस रूप में लिखें जाते हैं वह लिपि कहलाता है"..।

● लिपि का विकास :- चित्रलिपि - प्रतिलिपि - भावलिपि - ध्वनिलिपि..।

● ध्वनिलिपि के 2 रूप हैं :- 

1 अक्षरात्मक लिपि - भारत की सारी लिपियाँ इसी रूप में है।

2 वर्णात्मक - रोमनलिपि वर्णात्मक रूप में है।


● भारत की प्राचीन लिपियाँ सिंधुघाटी लिपि, खरोष्ठी लिपि और ब्राह्मी लिपि है। ब्राह्मी लिपि की उत्तरी शैली से ही "देवनागरी लिपि" निकली है।

A "सिंधुघाटी लिपि" का प्राचीन नमूना हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता की शिलाओं पर मिलता हैं।

B "खरोष्ठी लिपि" का प्राचीन नमूना पंजाब के मानेसर और अशोक के अभिलेखों में मिलता है। यह दाएँ से बाएँ की तरफ लिखी जाती है। इसे ब्राह्मी लिपि का प्राचीन रूप भी कहा जाता है।

C "ब्राह्मी लिपि" के प्रचीन नमूने बस्ती जिले के पिपराला के स्तूप में मिलता है। यह बाएँ से दांएँ की और लिखी जाती है।इसके अर्थ और उतपत्ति के भी विभिन्न मत हैं। कोई इसे भारत से उत्पन्न मानता है तो कोई इसे विदेशी।


● ब्राह्मी लिपि के निर्माण सम्बंधी मत :-

1 यह ब्रह्मा द्वारा बनाई गई है।

2 ब्रह्म वेद(ज्ञान) की रक्षा के लिए बनाई गयी थी।

3 ब्राह्मणों द्वारा निर्मित लिपि।

4 चीनी विश्वकोश द्वारा यह किसी ब्रह्म ऋषि के आधार पर बनाई गई है।


◆ ब्राह्मी लिपि के भारत में उत्तपन्न होने पर मत :-

1. भोलानाथ तिवारी के अनुसार  "हडप्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता से निकली"..।

2. राजबलि पांडेय के अनुसार "सिंधुघाटी सभ्यता से उतपन्न"..।

3. कनिघम व डाउनसन के अनुसार  "आर्यो की पुरानी चित्रलिपि से विकसित..।


◆ ब्राह्मी लिपि के विदेश में उतपन्न होने पर मत :-

1. डॉ वुलर के अनुसार "उत्तरी सामी से विकसित"..।

2. जेम्स पिपेस के अनुसार "यूनानी से उतपन्न"..।


●देवनागरी लिपि के नामकरण पर अनेक मत:-

1पाटलिपुत्र को नागर और चन्द्रगुप्त को देव कहने से देवनागरी नाम पड़ा।

2 गुजरात के नागर ब्राह्मणों के नाम पर पड़ा।

3 "धीरेंद्र वर्मा" के अनुसार मध्ययुग के स्थापत्य की एक शैली का नाम नागर होने से "नागरी" नाम पड़ा।

4 सर्वप्रथम 7-8वी शती गुजरात के राजा "जयभट्ट" के एक शिलालेख में मिलता है।


 ●लिपि सुधार सम्बन्धी सुझाव:-

1. सर्वप्रथम बम्बई राज्य के "महादेव गोविंद रनाडे" ने लिपि सुधार समिति गठित की और सुधार का प्रस्ताव पेश किया।

2. महाराष्ट्र साहित्य परिषद पुणे ने लिपि सुधार योजना बनाई।

3. बालगंगाधर तिलक ने अपने पत्र "केसरी" 1904 में देवनागरी लिपि के सुधार की बात कही।

4. सावरकर बन्धुओ ने 12 खड़ी की शुरुआत की।

5. श्यामसुंदर दास ने पंचम वर्ण के साथ पर "अनुस्वार" (.) के प्रयोग पर बल दिया।

6. हिंदी साहित्य के इंदौर अधिवेशन 1935 में  "नागरीलिपि सुधार समिति" की स्थापना गाँधी के सभापतित्व में हुई।

7 "नागरीलिपि सुधार समिति" का निर्माण 1947 आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में हुआ। इस समिति की 9 बैठक हुई जिसकी रिपोर्ट 1949 में पेश की।

8 सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 1953 की "लिपि सुधार परिषद" का गठन हुआ।

9 शिक्षा मंत्रालय के देवनागरी लिपि सम्बन्धी प्रकाशन 

• मानक देवनागरी वर्णमाला (1966)  

• हिंदी वर्तनी का मानकीकरण (1967) 

• देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण (1983)


●देवनागरी लिपि का हिंदी भाषा में अधिकृत लिपि के रूप में विकास:-

देवनागरी लिपि को आधिकारिक स्थान मिलने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। इसके लिए न सिर्फ अंग्रेज़ो ने बल्कि हमारे देश के लोगों ने भी पूरा पूरा समर्थन भी दिया और उसकी आधिकारिक स्वीकृति के लिए तत्पर रहे। अंग्रेज़ो द्वारा हिंदी का फ़ारसी लिपि में प्रचार करना सही मायने में उर्दू का प्रचार था क्योंकि उनका सारा कार्यालयी काम फारसी में होता था और एक दम से नई लिपि को लाना और सीखना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता था। इसलिए वह फ़ारसी के समर्थन में ही रहते थे। लेकिन कुछ समय बाद से उनकी तरफ से देवनागरी लिपि के प्रयोग के लिए भी प्रयास होने लगे और लंबे समय बाद 1900 में मदनमोहन मालवीय जी के अथक प्रयासों से अदालती भाषा और राजकाज की भाषा के लिए देवनागरी लिपि को भी साथ अपनाया गया।

1. फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रथम अध्यक्ष "जॉन गिलक्राइस्ट" के समय में 3 तरह की शैलियाँ बोली जाती थी।  दरबारी या फारसी शैली, हिंदुस्तानी शैली, हिंदवी शैली। फारसी शैली इनके लिए दुरूह (मुश्किल) थी क्योंकि प्रयोगकर्ता सीमित थे। हिंदवी को यह गँवारु भाषा मानते थे इसलिए उन्होंने हिंदुस्तानी का चयन किया। वैसे सही दृष्टि से यह उर्दू का ही प्रचार था क्योंकि इस भाषा में अरबी फारसी की शब्दावली बहुत थी।

2. "कैप्टन विलियम प्राइस" की नियुक्ति फोर्ट विलियम कॉलेज, हिंदी विभाग के लिए 1823 में हुई थी और उन्होंने ही सबसे पहले नागरी लिपि में लिखने पर बल दिया। इन्होंने जॉन गिलक्राइस्ट द्वारा भाषा सम्बन्धी भ्रांति को दूर किया।

3. अदालत सम्बन्धी विज्ञप्ति (1837) :- 1830 ई. में अदालत ने देशी भाषाओं को भी अदालत में मंजूरी दे दी। वास्तव में इस विज्ञप्ति के इस्तेमाल के बाद से ही अदालतों में देशी भाषाओं को सम्मान मिला। परन्तु लिपि के आधार पर फ़ारसी ही कायम थी। देवनागरी लिपि के लिए न केवल अदालत बल्कि शिक्षा क्षेत्र से भी उसे हटाने के लिए आंदोलन होने लगे और आगे चलकर हिंदी और उर्दू के 2 भेद हो गए। जिसे बढ़ाने में केवल उर्दू के समर्थक ही मुसलमान ही नहीं थे बल्कि अंग्रेज़ो ने भी इस विवाद को बढ़ाने में कली कसर नहीं छोड़ी। जो आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम के समय में साम्प्रदायिक रूप लेने लगा और दंगे होने लगे जिसका प्रभाव आजतक बना है। 

इस विज्ञप्ति के दैरान हिंदी का प्रचार तो हुआ परन्तु उसकी लिपि को स्वीकारा नहीं गया बल्कि विरोध भरपूर तरीके से हुआ।

4. सितारे हिंद का लिपि सम्बन्धी प्रतिवेदन :- सर्वप्रथम "शिवप्रसाद सितारे हिन्द" ने नागरी लिपि के लिए 1868 में लिपि सम्बन्धी "मेमोरेण्डम कोर्ट कैरेक्टर इन द अपर प्रोविन्स ऑफ इंडिया" से आरम्भ हुआ।

5. बंगाल गवर्नर ऐशले का आदेश पत्र (1870)  :- इस पत्र के आधार पर देवनागरी लिपि का समर्थन किया गया था जिसमें कहा गया था कि अदालत की भाषा ऐसी हो कि जिस हिंदुस्तानी को पूर्णता फारसी नहीं आती उसके लिए भी ऐसी भाषा का प्रयोग हो जो कम से कम बोली जाती हो। वह उसको समझ भी पाता हो। और 1873 में बंगाल सरकार ने पटना, भागलपुर, और छोटा नागपुर डिवीजनों के लिए ऐसी भाषाओं के इस्तेमाल के लिए पत्र जारी किया।

1881 तक मध्यप्रदेश और बिहार जैसे प्रांतों में भी देवनागरी लिपि और हिंदी को सरकारी आज्ञा मिली। उत्तरप्रदेश में नागरी आंदोलन को बड़ा सम्बल मिला।

6. मेरठ के प.गौरीदत्त ने देवनागरी के प्रचार के लिए कई पत्र निकाले जैसे - 1874 "नागरी प्रकाश", 1888 में "देवनागरी गजट" , 1891 में "देवनागर" , "देवनागरी प्रचारक" 1892 आदि।

7. अधुनिक हिंदी साहित्य की चाहे कोई सी भी विधा हो, कोई आंदोलन हो, किसी तरह की जन जागरूकता सम्बन्धी बात हो , पत्रकारिता से जुड़ी कोई बात हो या देवनागरी लिपि के प्रयोग के लिए किये गए प्रयास, उन सभी में भारतेंदु हरिश्चन्द्र का सहयोग अविस्मरणीय माना जाता रहा है। ठीक इसी तरह से 1882 में शिक्षा आयोग के प्रश्न पत्र का जवाब देते हुए भारतेंदु कहते हैं कि " सभी सभ्य देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग होता है। और यहाँ पर न उस भाषा को बोला जाता है जो न तो यहाँ की प्रजा की बोली है और न ही अदालत के शासकों की मातृभाषा"..।

8. प्रतापनारायण मिश्र ने "हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तानी" का नारा दिया।

9. नागरी प्रचारिणी सभा व मदनमोहन मालवीय :-  1893 काशी में नागरी लिपि और हिंदी भाषा के संवर्धन के लिए इस संस्था की स्थापना की थी। सर्वप्रथम कचहरी में हिंदी और देवनागरी लिपि के प्रवेश को ही अपना मुख्य काम माना। सभा ने "नागरी कैरेक्टर" नामक पुस्तक अंग्रेजी में तैयार की जिसमें भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि की अनुपयुक्तता पर प्रकाश डाला गया था।

1898 ई. में मालवीय जी के नेतृत्व में 17 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल द्वारा लेफ्टिनेंट गवर्नर एंटोनी मैकडानल को याचिका या मेमोरियल दिया।

मालवीय जी ने एक स्वतंत्र पुस्तक 1897 में "कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजुकेशन इन नार्थ- वेस्टर्न प्रोविंसेज" निकाली जिसका बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। उसी समय 1898 में तत्कालीन लेफ्टिनेंट गर्वनर काशी आने पर मालवीय जी के नेतृत्व में सभा द्वारा हजारों हस्ताक्षरों द्वारा एक मेमोरेंडम पास करवाया तब जाकर अंततः 18 अप्रैल 1900 में देवनागरी लिपि को और हिंदी को भी अदालत का आधिकारिक दर्जा प्राप्त हुआ।  परन्तु इसके बाद भी एक बड़ी लड़ाई जीतनी थी। हाँ खुशी की बात यह थी कि राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए अब एक राष्ट्रीय भाषा मिल चुकी थी।

10. शारदा चरणमित्र :- ये देवनागरी लिपि के प्रथम प्रचारक थे। कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश "शारदा चरण" ने अगस्त 1907 में "एक लिपि विस्तार परिषद" का गठन किया। इसी के अतिरिक्त 1907 में "देवनागर" पत्र निकाल कर भारत की सभी भाषाओं के साहित्य को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करने का उपक्रम रचा। इस पत्र से प्रोत्साहन पाकर भिन्न भिन्न भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखा जाने लगा। 

11. नेहरू रिपोर्ट : 1928 में आई नेहरू रिपोर्ट के अनुसार हिंदी या हिंदुस्तानी जो भी भाषा बोली जाती है वह देश की राजभाषा होगी। परन्तु सही मायने में यह द्वैत की स्थिति थी और विवादस्पद भी।

12. हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर 1949 को मिला जिसके अनुच्छेद343 (1) में स्पष्ट लिखा है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी और देवनागरी लिपि"..। 1800 से 1949 तक के 150 साल के लंबे प्रयास के बाद हिंदी को संवैधानिक रूप से स्वीकृति मिली।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Sunday, December 27, 2020

हिंदी भाषा : भाग 6

हिंदी भाषा का विकास :-


● राजभाषा विकास से सम्बंधित संस्थाएं:-

 (केन्द्रीय हिंदी समिति) , नई दिल्ली, 1967।

भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा हिंदी का प्रचार-प्रसार करना इसका उद्देश्य है। इसके अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते हैं।


A शिक्षा मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. साहित्य अकादमी, 1954, नई दिल्ली। साहित्य को बढ़ावा देने वाली शीर्षस्थ संस्था।

2. नेशनल बुक ट्रस्ट, 1957, नई दिल्ली।  विज्ञान व साहित्य की पुस्तकें कम मूल्य में देती है।

3. केंद्रीय हिंदी निदेशालय, 1960, नई दिल्ली। शब्दकोश, विश्वकोश, अहिन्दी भाषी पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन करती है।

4. वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, 1961, नई दिल्ली। विज्ञान तथा तकनीकी से जुड़ी शब्दकोश का प्रकाशन करती है।


B ग्रह मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति  :- 

1. राजभाषा विधायी आयोग, 1965-75 ।  केंद्रीय अधिनियमों के  हिंदी पाठ का निर्माण करना।

2. केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, 1971 ।  देश में अनुवाद की सबसे बड़ी संस्था।

3. राजभाषा विभाग, 1975 । संघ के विभिन्न कार्यों के लिए हिंदी के मामले देखने वाली संस्था।


C कानून मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. राजभाषा विधायी आयोग, 1975 । यह संस्था पहले ग्रह मंत्रालय के अधीन थी। प्रमुख कानूनों के हिंदी पाठ का निर्माण करने वाली संस्था।


D सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. प्रकाशन विभाग- 1944

2. फ़िल्म प्रभाग- 1948

3. पत्र सूचना मंत्रालय- 1956

4. आकाशवाणी -1957

5. दूरदर्शन - 1976


● राजभाषा सम्बन्धी विविध तथ्य:-

1. संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव "गोपाल स्वामी आयंगर" ने रखा था जिसका समर्थन "शंकरराव देव" ने किया।

2. संविधान सभा में "हिंदुस्तानी" को 77 और "हिंदी" को 78 वोट मिले थे जिसके आधार पर हिंदी को राजभाषा बनाया गया।


 ● 8वी अनुसूची :- 

संविधान के तहत 8वी अनुसूची में मूल भाषाएँ 14 ही थी परन्तु संविधान के 21वें संशोधन के तहत "सिंधी" को 1967 में जोड़ा गया और 1992 में 71वें संसोधन के तहत "मणिपुरी", "नेपाली", "कोंकणी" को भी जोड़कर इसकी संख्या 18 की गई। 2003 में संविधान के 92वें संसोधन के तहत 4 और भाषाओं को जोड़कर, जिसमें "बोडो" "डोगरी", "मैथिली" और "संथाली" है, उसकी संख्या 22 कर दी गई। 


● हिंदी आंदोलन से जुड़ी साहित्यिक संस्थाएं:-

1. नागरी प्रचारिणी सभा - काशी - 1893 ई.

2. हिंदी साहित्य सम्मेलन - प्रयाग - 1910 ई.

3. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा - मद्रास - 1918 ई.

4. गुजरात विद्यापीठ - अहमदाबाद - 1920 ई.

5. बिहार विद्यापीठ - पटना - 1921 ई.

6. हिंदुस्तानी एकेडमी - इलाहाबाद - 1927 ई.

7. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा - 1927 ई.

8. हिंदी विद्यापीठ - देवघर - 1929 ई.

9. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति - वर्धा - 1936 ई.

10. महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा - पुणे - 1937 ई.

11. बम्बई हिंदी विद्यापीठ - 1938 ई.

12. असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति - गुवाहाटी - 1938 ई.

13. राष्ट्रभाषा सभा, पुणे- 1945 ई.

14. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद - पटना - 1951 ई.

15. अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ - नई दिल्ली - 1964 ई.

16. नागरी लिपि परिषद - नई दिल्ली - 1975 ई.

 17. केरल हिंदी प्रचार सभा - त्रिवन्तपुरम।


 ●विश्व हिंदी सम्मेलन :- 

यह भारत सरकार के "विदेश मंत्रालय" के तहत और जिस देश में यह कार्यक्रम होता है उस देश की सरकार के सहयोग से कराया जाता है। 

• उद्देश्य - UNO की भाषाओं में हिंदी का प्रचार करना और स्थान दिलाना।


विश्वभर में हुए हिंदी सम्मेलनों की सूची:-

1  जनवरी 10-14 तक, 1975-  भारत- नागपुर- अध्यक्ष तत्कालीन मॉरीशस के राष्ट्रपति "शिवसागर राम गुलाम"।

2. अगस्त 28-30 तक, 1976- मॉरीशस- पोर्ट लुई ।
3. अक्टूबर 28-30 तक, 1983- भारत- नई दिल्ली ।
4. दिसम्बर 2-4 तक , 1993- मॉरीशस- पोर्ट लुई ।
5. अप्रैल 4-8 तक, 1996- पोर्ट ऑफ स्पेन ।
6. सितम्बर 14-18 तक, 1999-लन्दन-ब्रिटेन ।
7. जून 5-9 तक, 2003- पारामारिबो- सूरीनाम ।
8. जुलाई 13-15 तक,  2007- न्यूयॉर्क- अमेरिका ।
9. सितंबर 22-24 तक, 2012- जोहान्सबर्ग- साउथ अफ्रीका ।
10. सितंबर 10-12 तक, 2015- भोपाल- भारत ।
11. अगस्त 18-20 तक, 2018- मॉरीशस -पोर्ट लुई ।


● अन्य जानकारी :- 

1. भाषा :- भाषा संस्कृत के शब्द "भाष" धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्यक्त वाणी । मूलरूप से और भाषा के मानक रूप में "भाषा" उसे कहते हैं जो व्यक्त वाणी के रूप में अभिव्यक्त की जाती है।

2. उपभाषा :- अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और उसके प्रयोग क्षेत्र का विस्तार हो जाता है तो वह बोली न रहकर "उपभाषा" बन जाती है।

3. बोली :-  एक छोटे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा "बोली" कहलाई जाती है। यहाँ पर भाषा शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि बोली भी भाषा की तरह एक माध्यम  है जिसके आधार पर हम अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं। इसके साथ ही यह भी भाषा की एक अभिन्न इकाई है।इसका क्षेत्र सीमित होता है।

4. सम्पर्क भाषा :- भोलानाथ तिवारी के अनुसार जो भाषा अन्य लोगों से संपर्क के काम आए वह भाषा "संपर्क भाषा" कहलाती है।

5. मानक भाषा : - मानक का अभिप्राय है "आदर्श, श्रेष्ठ या परिनिष्ठित" से है। भाषा का जो रूप उसके प्रयोक्ताओं के अतिरिक्त अन्य भाषा-भाषियों के लिए आदर्श होता है, जिसके माध्यम से उस भाषा को सीखते हैं, जिस भाषा रूप का व्यवहार पत्राचार, शिक्षा, सरकारी कामकाज एवं सामाजिक- सांस्कृतिक आदान-प्रदान में समान स्तर पर होता है वह भाषा का "मानक रूप" कहलाता है।

हर मानक भाषा का अपना एक समय और रूप रहता है जो उसे साहित्यिक रूप में दर्शाता है। चाहे वह अपभ्रंश हो, ब्रज, अवधी या खड़ीबोली हो। जब यह आम बोलचाल से हटकर विशेषपन को ग्रहण करती है, जोकि सीमित दायरे और नियमावली के तहत कार्य करती है।

आज हम जिस हिंदी के मानक रूप को पहचानते हैं वह खड़ीबोली के रूप में हिंदी कही जाती है। इस भाषा को मानकीकृत करने में बहुत से लोगों, संस्थाओं, पत्रिकाओं आदि का लंबा योगदान रहा है। जैसे फोर्ट विलियम कॉलेज से प्रक्रिया शुरू होना और फिर "शिवप्रसाद" सितारे हिंद , "लल्लू लाल" , "भारतेंदु मंडल" , "महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती" का अहम योगदान आदि। उसके बाद यह मानकीकृत प्रक्रिया समय- समय पर और तेज होती गई जोकि सिलसिलेवार ढंग से आज भी चल रही है।

6. भारतीय हिंदी परिषद-  भाषा के सर्वांगीण मानकीकरण का प्रश्न सबसे पहले 1950 में "इलाहाबाद विश्वविद्यालय" के हिंदी विभाग ने उठाया। डॉ धीरेंद्र वर्मा, हरदेव बाहरी, और डॉ माताप्रसाद गुप्त आदि इसके सदस्य थे। धीरेंद्र वर्मा ने देवनागरी लिपि चिन्हों में एकरूपता, हरदेव बाहरी ने वर्ण विन्यास की समस्या, माताप्रसाद गुप्त ने हिंदी शब्द भंडार विषय पर अपने मत प्रस्तुत किये।

7. केंद्रीय हिंदी निदेशालय :-  इसकी स्थापना 1960 में हुई थी और इस संस्था ने देवनागरी लिपि के मानकीकरण के लिए "देवनागरी लिपि" तथा "हिंदी वर्तनी का मानकीकरण" 1983 में प्रकाशन किया।

8. हिंदवी, हिंदुई :- मध्यकाल में मध्यदेश के हिंदुओं की भाषा, जिसमें अरबी- फारसी शब्दों का अभाव है। सर्वप्रथम "अमीर ख़ुसरो" ने देशभाषा को हिंदी या हिंदवी कहा। जिसका उदहारण हमें उनके हिंदी-फ़ारसी शब्दकोष "खालिकबारी" में 30 बार हिंदवी और 5 बार हिंदी के इस्तेमाल होने से पता चलता है।

9. भाखा/भाषा :- विद्यापति, कबीर, तुलसी, केशवदास आदि ने हिंदी देशभाषा के लिए "भाखा" का प्रयोग किया है। फोर्ट विलियम कॉलेज के अध्यापकों के लिए भी भाषा मुंशी या भाखा मुंशी शब्द इस्तेमाल होता रहा है।

10. हिंदुस्तानी :- हिंदी-उर्दू मिश्रित व आमजनता द्वारा इस्तेमाल शब्दों की भाषा का नाम हिंदुस्तानी है। यह नाम अंग्रेज़ो ने दिया था क्योंकि उन्हें तत्कालीन समय में एक यही भाषा सबसे सुलभ और प्रशासन जमाये रखने के नज़र से सही लगी होगी। जिससे हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजों पर वर्चस्व  रखा जा सके और उनसे संपर्क भी बनाया जा सके।

11.  हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान:- "प्रतापनारायण मिश्र" जी ने यह नारा दिया था कि हिंदी ही हिंदुस्तान और हिंदुओं की भाषा है।

12.  उर्दू :- आज के समय में उर्दू उसे कहा जा रहा है जो मुसलमान की भाषा है और फारसी में लिखी जाती है। परंतु इसका इतिहास केवल यही नहीं। हिंदी और उर्दू यह दोनों ही भाषाएँ अपने वर्तमान समय में खड़ीबोली से निकली हुई भाषाएँ हैं जो कुछ शब्दों और व्याकरणिक नियमावली के चलते कुछ हदतक पृथक हैं। विद्वान इसे "आपसी बहनों का रिश्ता" कहते हैं।

"उर्दू" खड़ीबोली की वह शैली है जिसमें अरबी फारसी के शब्द कुछ अधिक हैं।

उर्दू की प्रथम पुस्तक "बानो बहार" है जो 18वी शती में लिखी थी।

13.  दक्खनी :- मध्यकाल में दक्कन के मुसलमानों द्वारा लिखी गयी हिंदी "दक्कनी या दक्खिनी" कहलाई गयी।

दक्कनी को उत्तरी भारत मे लाने का श्रेय "शायर वली दक्कनी" को जाता है जिन्होंने मुगलकाल में दक्कनी को उत्तरी भारत में लाकर इसे लोकप्रिय बनाया।
  
14. रेख़्ता  :- रेख़्ता का शाब्दिक अर्थ है- गिरा हुआ। जिस प्रकार से संस्कृत को सरल बनाकर प्राकृत भाषा अस्तित्व में आई उसी तरह से अरबी फारसी को सरल करके "रेख़्ता" का रूप सामने आया।

 उर्दू-फ़ारसी-अरबी के बोलचाल के शब्द रूप को "रेख़्ता" कहा जाता है। जिसे शुरू में हीन दृष्टि से देखा जाता था पर बाद में कई शायरों ने इस भाषा का इस्तेमाल किया।

धीरेंद्र वर्मा रेख़्ता को "उर्दू की नवीन शैली" कहते हैं।

●भारत में रेख़्ता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग छंद और संगीत के क्षेत्र में हुआ। 

18वी से लेकर 19 शती तक यह भाषा उर्दू के लिए इस्तेमाल हुई। बाद में इसका एक अलग अस्तित्व कायम हुआ जब बड़े बड़े शायरों ने इसमें गजलें गाना शुरू किया और वह आम जनता से जुड़े।

15. जनभाषा, देसीभाषा, आमभाषा, बोलचाल की भाषा, भाखापन, लोकल भाषा  ये सभी एक दूसरे की पर्याय हैं। जिसका अर्थ है साहित्य की भाषा, राजभाषा,  परिनिष्ठित भाषा, मानक भाषा, आदि से इतर। जो किसी भी क्षेत्रीयता को दर्शाती है। यह भाषा जनता अपनी सुविधानुसार आसन शब्दों के माध्यम से , गाँव- देहात में प्रयोग शब्दों से अपना वैचारिक आदान प्रदान करती है।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।






Friday, December 25, 2020

हिंदी भाषा: भाग -5


हिंदी भाषा का विकास


                              (राजभाषा)


● राजभाषा:- इसका शाब्दिक अर्थ है- "राज काज की भाषा"..। जो भाषा देश के राजकीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होती है, वह "राजभाषा" कहलाती है। राजाओं, नवाबों के समय में इसे दरबारी भाषा कहा जाता था। इसका क्षेत्र सीमित होता है, यह केवल सरकारी दफ्तरों, प्रशासनिक स्तर पर ही कार्य करती है। इसे औपचारिक भाषा का दर्जा मिला हुआ है। 

14 सितंबर 1949 को संविधान के भाग 17 के अध्याय 1 में धारा 343 (1)  के अनुसार हिंदी देश की राजभाषा बनायी गयी थी किंतु 1950 से लेकर आने वाले 15 वर्षों तक के लिए अंग्रेजी को भी सहायक भाषा के रूप में इस्तेमाल किया गया। तदुपरांत 1965 से आजतक अंग्रेजी भाषा एक सहकारी भाषा के रूप में राजभाषा के कार्यों में इस्तेमाल की जा रही है।

●हिंदी को देश की राजभाषा बनाये जाने के उपलक्ष में पूरे भारत में 14 सितंबर को "हिंदी दिवस" मनाया जाता है।


● राजभाषा के अध्याय :- 

अध्याय 1 : संघ की भाषा - अनुच्छेद 343 और 344 आते हैं।

अध्याय 2 : प्रादेशिक भाषाएँ - अनुच्छेद 345, 346 और 347 आते हैं।

अध्याय 3 : सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय की भाषा - अनुच्छेद 348, 349 आते हैं।

अध्याय 4 : जनता की शिकायत सम्बन्धी अनुच्छेद 350 और हिंदी के प्रचार हेतु भारत की संस्कृति से जोड़ने हेतु 351 अनुच्छेद है।


●संविधान में हिंदी भाषा सम्बन्धी उपबन्ध:-

संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 तक 4 अध्यायों में राजभाषा सम्बन्धी नियमावली दी है।

1. अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी होगी।

2. अनुच्छेद 344 में राष्ट्रपति 5 वर्ष के बाद और संसद उसके 10 वर्ष बाद राजभाषा आयोग का गठन करेगा और वह गठन हिंदी भाषा के लिए राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा।

3. अनुच्छेद 345 में किसी भी राज्य का विधानसभा उस राज्य की किसी एक भाषा, जो हिंदी या हिन्दीतर भी हो सकती है उसका चयन कर पूरे राज्य के व्यक्तियों के लिए संचार-सम्प्रेषण की कमी को पूरा करेगा।

4. अनुच्छेद 346 में किसी भी 2 राज्यों के बीच शासकीय कार्यो को पूर्ण करने के लिए अंग्रेजी को पत्रादि की भाषा बनाना होगा। अगर दोनों राज्य चाहे तो आपस में सलाह करके हिंदी को भी पत्रादि की भाषा बना सकते हैं।

5. अनुच्छेद 347 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि किसी राज्य की ज्यादात्तर जनसंख्या के आधार पर वहाँ की किसी भाषा को शासकीय प्रयोजनों की भाषा बना दिया जाए।

6. अनुच्छेद 348 में, जबतक संसद उपबन्ध न करे तबतक उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी रहेगी। इसके अलावा सभी सरकारी काम भी अंग्रेजी में होंगे। परन्तु किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की अनुमति से सरकारी कार्यों को हिंदी में करवा सकता है। परन्तु सभी आदेश अंग्रेजी में होंगें।

7. अनुच्छेद 349 में प्रशासनिक कार्यो के लिए इस्तेमाल की जाने वाली किसी अन्य भाषा या संपर्क भाषा के लिए राष्ट्रपति की अनुमति के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं कर सकता।

8. 350 में जनता और अधिकारियों की भाषाई शिकायत को दूर करना और भाषाई रक्षा करने का नियम बनाया गया।

किसी राज्य के अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाना भी है।

9. 351 में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए विधान बनाया गया। जिससे कि वह भारत की संस्कृति का भाग बन सके। इसी में हिंदी एवं हिंदुस्तानी के भेद को भी खत्म किया गया। पर जहाँ आवश्यक हो अन्य भाषाओं बोलियों को भी आत्मसात किया जाए यह प्रावधान किया गया। 


●विधान मंडलो की भाषा:-

1. संसद की भाषा का उपबन्ध संविधान के भाग 5 के अनुच्छेद 120 में किया है । इसके तहत हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी या मातृभाषा का इस्तेमाल करने की मंजूरी सदन का पीठासीन दे सकता है।

2. विधानसभा की भाषा का उपबन्ध संविधान के भाग 6 के अनुच्छेद 210 में दिया गया है। उसके तहत हिंदी,अंग्रेजी में कार्य किया जाएगा। किसी सदस्य को अपने राज्य की मातृभाषा में बोलने का हक सदन का पीठासीन दे सकता है।


●1950 के बाद हिंदी की संवैधानिक प्रगति:-

1. राष्ट्रपति का संविधान आदेश 1952:-  राज्यपालों व SC, HC के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए हिंदी के अधिपत्रों का प्रयोग किया जाए।

2. राष्ट्रपति संविधान आदेश 1955:- जनता के साथ पत्राचार, प्रशासनिक कार्य, संसदीय रिपोर्ट, संकल्प व विधायी नियम आदि अंग्रेजी के साथ हिंदी में हो।


●  राजभाषा आयोग -7 जून 1955 राजेन्द्र प्रसाद और बालगंगाधर खेर की अध्यक्षता में इसका गठन हुआ। इसमें 21सदस्य थे। इसने अपना प्रतिवेदन 1956 में दिया जो 1957 में संसद के समक्ष रखा गया।


◆ राजभाषा आयोग की सिफारिश :-

1. सारे देश में माध्यमिक स्तर तक हिंदी अनिवार्य हो।

2. न्यायालय की भाषा देश की भाषा हो।

3. सार्वजनिक स्तर पर, प्रशासन, पत्राचार की भाषा अंग्रेजी रखना अनुचित है।


राजभाषा आयोग की समीक्षा के लिए 1957 में जी.बी.पन्त की अध्यक्षता में "संयुक्त संसदीय राजभाषा समिति" का गठन हुआ। इसमें लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्य थे। इसने अपना प्रतिवेदन 1959 में दिया।


◆ जी.बी. पन्त समिति की सिफारिश:-

1. हिंदी संघ की राजभाषा का स्थान जल्द से जल्द लें।

2.1965 तक अंग्रेजी को राजभाषा और हिंदी को सहायक भाषा बनाया जाए और 1965 के बाद हिंदी को राजभाषा और अंग्रेजी को सहायक भाषा बना दिया जाए। 

वैसे तो हिंदी को संघ की राजभाषा 1949 में ही बना दिया था परन्तु सम्भव है कि लंबे समय तक हिंदी में राजकाज का कार्य सुलभता से न हो पा रहा हो तभी इस समिति ने शुरुआती सालों में अंग्रेजी को मुख्य भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह दी और आने वाले समय में हिंदी को मुख्य राजभाषा बनाने की माँग रखी होगी।

◆ 1976 में राजभाषा आयोग को ख़त्म कर दिया गया था।


● राष्ट्रपति का आदेश 1960:- इसमे ग्रह मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, विधि मंत्रालय, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा सांस्कृतिक कार्य मंत्रालय को हिंदी को राजभाषा के रूप में विकसित करने के निर्देश हैं।


●"राजभाषा अधिनियम" :- यह अधिनियम 1963 में आया। इसमें 9 धाराएं है। यह अधिनियम भी राजभाषा के चयन के लिए लाया गया था क्योंकि हिंदी को राजभाषा का अधिकार मिलने के बाद भी उसका कई जगह विरोध हुआ जैसे दक्षिण (तमिलनाडु) और बंगाल में। हिंदी भाषा के कट्टर समर्थकों के कारण हिंदी को लाभ तो नहीं परन्तु नुकसान जरूर हुआ। इस पर नेहरू जी ने आश्वासन दिया कि हिंदी को एकमात्र राजभाषा का दर्जा देने से पहले अहिन्दी भाषी राज्यों से सम्मति प्राप्त की जाए और तबतक अंग्रेजी को नहीं हटाया जाए। इस पर तत्कालीन राजभाषा के विधेयक लाल बहादुर शास्त्री जी ने मोहर लगाई।

1965 के बाद हिंदी पूरी तरह से राजभाषा का अधिकार पा सकी परन्तु आजतक अंग्रेजी को सहायक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है।

"राजभाषा अधिनियम संसोधन" 1967 (इंदिरा गांधी) में हुआ। जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया था कि जो भी राज्य अंग्रेजी भाषा की समाप्ति पर रुख़ अपनाते हैं उन्हें अपने विधानमंडल में हिंदी के लिए संकल्प लेना होगा और ऐसा न होने पर अंग्रेजी पूर्व की तरह रहेगी।


● संसद द्वारा पारित संकल्प :- 

1 राजभाषा हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं की प्रगति को सुनिश्चित करें।

2 त्रिभाषा सूत्र को लागू करना जिससे कि हिंदी व अंग्रेजी के साथ किसी अन्य हिन्दीतर भाषा को पढ़ाने की व्यवस्था की जाए। परन्तु यह पूरी तरह से सफल न हो सका।


● "राजभाषा नियम"1976 :- इस में 12 नियम हैं। जिनमें हिंदी के प्रयोग के संदर्भ में भारत के राज्यों का 3 वर्गीय विभाजन किया गया है। जैसे (क) राज्य- उत्तरप्रदेश, बिहार,राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, और संघ प्रदेश दिल्ली।

(ख) राज्य-पंजाब,गुजरात, चंडीगढ़ अंडमान निकोबार। 

(ग) राज्य- शेष राज्य जैसे दक्षिण के व संघ प्रदेश। 


1. क- वर्ग में सभी राज्यों को भेजे जाने वाले पत्र देवनागरी में भेजे जाएँगे। यदि कोई अंग्रेजी का पत्र भेजा भी जा रहा है तो उसका अनुवाद भी भेजना होगा।

2. ख वर्ग वाले राज्यों में पत्र-व्यवहार हिंदी और अंग्रेजी दोनों में कर सकते हैं।

3. ग वर्ग वाले राज्यों में पत्र-व्यहवार अंग्रेजी में होगा।

इसके अलावा इस अधिनियम में प्रधान राजभाषा, सहयोगी राजभाषा और प्रादेशिक भाषा हेतु नियम दिए गए । परन्तु आज भी द्विभाषिक नीति का अनुपालन हो रहा है।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Saturday, December 12, 2020

हिंदी भाषा : भाग - 4

हिंदी भाषा का विकास :


● हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अन्य धार्मिक- समाजिक संस्थाओं व समाज सुधारकों का योगदान:-

1. ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में हुई। जिसके संस्थापक कलकत्ता में "राजाराम मोहनराय" ने कहा था कि " इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है'..।

2. बंगाल के जस्टिस ब्रह्मसमाजी "केशवचंद्र सेन" ने 1857 ई.में  कहा था कि "भारतीय  एकता के उपाय के लिए भारत में एक ही भाषा का व्यवहार हो। यह हिंदी ही एकमात्र भाषा है जिससे सारे काम सम्पन्न और शीघ्र किये जा सकते हैं"..।

3. "नवीनचन्द्र राय" ने पंजाब में हिंदी का प्रचार प्रसार किया।

4. आर्य समाज जिसकी स्थापना 1875 बम्बई में हुई थी। इसके संस्थापक "दयानंद सरस्वती" थे जोकि मूल रूप से गुजराती थे।  उन्होंने हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान होने के बाद भी अपना सारा धार्मिक साहित्य जोकि  "सत्यार्थ प्रकाश" नामक पुस्तक के रूप में है, उसे हिंदी में लिखा। उनका मत था कि "हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है"..। इसके अलावा वह कहते थे कि " मेरी आँखें उस दिन को देखना चाहती है जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लगे"...।

5.  अरविंद दर्शन के प्रवर्तक "अरविंद घोष" का मत था कि "सभी लोग अपनी मातृभाषा की रक्षा करके सामान्य तौर पर हिंदी को ग्रहण करें"।

6. थियोसोफिकल सोसाइटी (मद्रास) जिसकी स्थापना 1875 में हुई थी उसकी संचालिका "ऐनी बेसेंट" ने कहा था कि  "भारतवर्ष की भिन्न-भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह हिंदी भाषा है'...।

इसी के अतिरिक्त ऐनी बेसेंट का मत "भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए" को लेकर भी था।

17 जून 1878 में होमरूल कार्यालय सी.पी. रामस्वामी अय्यर की अध्यक्षता में एनी बेसेंट ने प्रथम हिंदी वर्ष का उदघाटन किया।

7. रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में दक्षिण भारत के एक क्षेत्र बेलूर में "स्वामी विवेकानंद" जी ने हिंदी के प्रचार के लिए की थी।

8. राजा शिवप्रसाद "सितारे हिन्द" ने ही हिंदी को सबसे पहले स्कूल में प्रवेश करवाया जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ो के कृपापात्र उर्दू के कट्टर समर्थक सर सैयद अहमद खान से टकराना पड़ा।

9. हिंदी के प्रसार के लिए नागरी प्रचारिणी सभा का योगदान :-

  1893 में कुछ उत्साही छात्रों श्यामसुंदर दास, प.रामनारायण मिश्र, ठाकुर शिवकुमार सिंह के उद्योग से इस संस्था की स्थापना की गई। इसके सभापति भारतेंदु के फुफेरे भाई "राधाकृष्ण दास" थे। इस सभा का कार्य हिंदी साहित्य को समृद्ध करना और नागरी अक्षरों का प्रचार करना उद्देश्य था।

इस सभा ने पुस्तकों की खोज का कार्य अपने हाथों में लिया। सरकार द्वारा आर्थिक सहायता भी समय समय पर मिली जिससे हिंदी साहित्य लिखने के लिए प्रमाणिक सामग्री सामने आ गयी थी। इस सभा के विशिष्ट योगदान में कुछ रचनाएँ प्रसिद्ध हैं जैसे हिंदी शब्द सागर की भूमिका, वैज्ञानिक कोष, नागरी प्रचारिणी पत्रिका आदि ।

10.  हिंदी साहित्य सम्मेलन -प्रयाग -1910 में  "पुरुषोत्तम दास टण्डन" ने इसकी स्थापना की थी। जिसका कार्य अहिन्दी भाषी लोगों को हिन्दी सिखाना था। इसमें 3 स्तर की परीक्षाएँ होती थी जिसे पास करके ही कोई हिंदी सीखने योग्य हो पाता था।

11. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा- मद्रास -1918 में गांधी इसके अध्यक्ष व संस्थापक थे। यह सभा अंग्रेजी भाषा के विरोध में खड़ी हुई थी क्योंकि भारत में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को अहिंदी भाषियों पर से कम करके भारत को एकता के सूत्र में बाँधना व भाषाई स्तर पर भी भारत एकरूपता देना या सभा का उद्देश्य था।

12. हिंदी प्रचार सभा, वर्धा -1936 में इस सभा की स्थापना भी गाँधी ने ही कि थी। इस संस्था का मुख्य लक्ष्य हिंदी के माध्यम से राष्ट्रीय भावना जगाना था।  

इसके संदर्भ में गांधी कहते हैं :- "एक हृदय भारत जननी"...। यह इस सभा में गाँधी द्वारा कही गई मुख्य पँक्ति थी।

13. फैजपुर अधिवेशन 1936 और हरिपुरा अधिवेशन 1938 में कांग्रेस ने राष्ट्रभाषा सम्मेलन आयोजित किया जिसकी अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद एवं जमना लाल बजाज ने की थी।

इसके अलावा बम्बई, विद्याधर, बिहार, असम आदि में भी इसी तरह के हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए सम्मेलन हुए। और केवल सभाएँ ही नहीं ,पत्रिकाओं , अन्य विद्वानों , सामाजिक सभाओ व साहित्यकारों आदि ने भी हिंदी के विकास के लिए योगदान दिया।


●हिंदी प्रचार प्रसार हेतू कॉंग्रेस के नेताओं का योगदान:-

1. "लोकमान्य तिलक" ने 1917 में कहा था " यद्दपि मैं उन लोगों में से हूँ जो यह चाहते हैं कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है"...।

2  "महात्मा गाँधी" का मत था कि "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है और हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है"..। यह बात उन्होंने 1917 के "भड़ौच गुजरात शिक्षा परिषद" से सभापति पद से कही थी। उन्होंने एक राष्ट्रभाषा के लिए जो लक्षण बताये थे उस आधार पर हिंदी ही केवल उससे मिलती थी। वह लक्षण थे:-


1 अमलदारों के लिए वह भाषा सरल हो।

2 भारतवर्ष के आपसी आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक व्यवहार हो सके।

3 भारतवर्ष के बहुत से लोग उसे बोलते हो।

4 राष्ट्र के लिए आसान हो।


 3. हिंदी साहित्य सम्मेलन इंदौर अधिवेशन 1918 के मंच से "गाँधी" कहते हैं " हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है"..। इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव रखा कि प्रतिवर्ष 6 युवक उत्तर भारत के दक्षिण जाकर वहाँ की भाषा सीखें और हिंदी का प्रचार करें और इसी तरह से दक्षिण के 6 युवक उत्तर में आकर हिंदी सीखें। हिंदी पढ़ने की बात इसी अधिवेशन में कही गयी थी और वह ऐसी हो जो फ़ारसी शब्दों से लदी न हो और न ही संस्कृतमयी हो।

दक्षिण में सर्वप्रथम गाँधी जी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास को 1918 में हिंदी प्रचारक के रूप में दक्षिण भेजा। उसी समय सत्यदेव उनकी सहायता के लिए आ गए। "हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रचार कार्यालय" 1918 के रूप में हिंदी का प्रचार किया गया।

1918 में ही हरिहर शर्मा, शिवराम शर्मा को प्रयाग भेजा गया जिन्होंने लौटकर दक्षिण में प्रचार कार्य सम्भाला। स्वामी सत्यदेव ने हिंदी सीखने के लिए "हिंदी की पहली पुस्तक" लिखी। 1922 तक इतना प्रसार हो गया था कि वहाँ प्रेस भी खोलना पड़ा। 

4. "मोटूरि सत्यनारायण" की सहायता से ही नेल्लूर आंध्रा शाखा खुली। उत्तर और दक्षिण के बीच सांस्कृतिक समन्वय का प्रारम्भ मोटूरि सत्यनारायण के माध्यम से हुआ।

5. कानपुर अधिवेशन 1925 में गाँधी जी ने कहा कि " कांग्रेस का कार्यकारिणी समिति का कामकाज हिंदी में होगा"..।

6. गाँधी जी के प्रयास से ही 1927 में दक्षिणी भारत हिंदी प्रचार समिति (मद्रास) और वर्धा 1936 में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएँ स्थापित हुई।

7. 1927 में दक्षिण भारत के लोगों के लिए गाँधी लिखते हैं कि "ये अंग्रेजी बोलने वाले लोग हैं जो आमजनता में हमारा काम आसान नहीं होने देते। इसी से प्रभावित होकर "सी.राज गोपालाचारी" कहते हैं " हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतन्त्रात्मक भारत में राजभाषा भी होगी"...।

8. नेहरू रिपोर्ट 1928 में कहा कि " देवनागरी या फारसी में लिखी जाने वाली हिंदुस्तानी भारत की राजभाषा होगी"...। परन्तु कुछ समय के लिए अंग्रेजी भी सहायक राजभाषा होगी जिसे आगे चलकर भारत के संविधान में अपना लिया।

9. 1929 में सुभाषचंद्र बोस ने कहा था " प्रांतीय ईर्ष्या को दूर करने में जितनी सहायता हिंदी से मिलेगी उतनी और किसी से नहीं"..।

10.  1931 में गाँधी कहते हैं " यदि स्वराज अंग्रेजी पढेलिखों के लिए है तो संपर्क भाषा अंग्रेजी होगी। यदि वह दलितों, निरक्षरों, स्त्रियों-बच्चों-करोड़ो लोगों के लिए है तो उसकी भाषा केवल हिंदी होगी"।

11.  वर्ष 1936 में गाँधी जी ने कहा था " अगर हिंदुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता"...।

और यह भाषाई आंदोलन स्वाधीनता के अंतिम समय तक चलता रहा जिसमें हिंदी के समर्थन में सभी ने सहयोग किया।


●बंगाल के अन्य जन नेताओं का योगदान:-

 1. सबसे पहले  1805 में "चरिणी दास" ने बेताल पचीसी का सम्पादन कराया और विभिन्न विषयों पर हिंदी में लेखन कार्य किया। 1826 में "राजाराम मोहनराय" ने वेदांत सारनात्मक ग्रन्थ का हिंदी अनुवाद किया। "ईश्वरचंद्र विद्यासागर" के लिखे अनेक सहित्यपरक लेख कविवचन सुधा में प्रकाशित हुए।

2.  सुभाषचंद्र बोस:- 1936 महाराष्ट्र प्रांत के एक क्षेत्र (वर्धा) में वह कहते हैं कि "हिंदी का प्रचार इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वह बहुत ही व्यापक रूप में बोली जाती और सरल भी है। हमें मिश्रित भाषा का निर्माण नहीं करना बल्कि उत्तर भारत की सामान्य भाषा का प्रचार करना चाहिए"..।

3. वंदे मातरम के रचयिता "श्री बंकिमचंद्र" ने हिंदी भाषा पर बल दिया था। इस गीत का गायन राष्ट्रीय कॉंग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के प्रारम्भ में रवींद्रनाथ ठाकुर ने ही किया था।

4. रवींद्रनाथ टैगोर:- हमें उस भाषा को राष्ट्रभाषा ग्रहण करना चाहिए जो देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने के लिए महात्मा जी ने हमसे आग्रह किया है अर्थात हिंदी"..।


● संविधान में राजभाषा:- (एक विकासयात्रा)

1. सन 1946 में संविधान सभा का गठन होता है जिसमें मुख्यतः कांग्रेस के नेता थे। उसके अतिरिक्त स्वतंत्र पार्टियों के नेता और मुस्लिम लीग के नेता भी शामिल थे। विभाजन के बाद लीग के नेता हट गए शेष रह गए थे।

2. 14 जुलाई 1947 को संविधान सभा के चौथे सत्र के दूसरे दिन ही यह संसोधन प्रस्तुत किया गया कि " हिंदुस्तानी" के स्थान और "हिंदी" शब्द रखा जाये। मतदान में 63 हिंदी भाषा के लिए, 32 हिंदुस्तानी भाषा के लिए व देवनागरी लिपि के लिए 63 पक्ष में और विपक्ष में 18 मतदान हुए थे।

3. फरवरी 1948 में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया उसमें राजभाषा विधेयक कोई धारा नहीं थी। मात्र यह था कि संसद की भाषा हिंदी या अंग्रेजी होगी। उस पर खूब पक्ष-विपक्ष हुआ। नेहरू ने हिंदी पर बल दिया तो वहीं कुछ नेताओं ने संविधान की भाषा को हिंदी के लिए माना। 

4. अगस्त 1949 में कॉंग्रेस की वर्किंग कमेटी ने भाषा पर बहस करके द्विभाषिक स्थिति को प्रस्ताव किया और स्टेट लैंग्वेज की भी अवधारणा रखी।

5. अगस्त 6,  1949 को हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में हिंदी को एकमत स्वीकारा गया और नागरी लिपि को भी स्वीकृति मिली। अंग्रेजी भाषा के राजभाषा सम्बन्धी प्रयोग को लेकर 10 और 15 वर्ष के लिये सदस्यों के अपने अपने मत बने रहे।

6. अगस्त 1949 को राजभाषा सम्बन्धी प्रारूप समिति तैयार की गई जिसके अध्यक्ष "पट्टाभि सीतारमैया" और "महामंत्री जुगलकिशोर" थे। जिसमें अय्यर, अम्बेडकर, सुभाष बाबू, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, मौलाना आजाद, पुरुषोत्तमदास टण्डन, आयंगर,अमृता कौर, मोटूरि सत्यनारायण, घनश्याम गुप्त आदि थे। इस समिति में कई लम्बी बहसें चली और अंग्रेजी के प्रयोग करने वाले वर्षों पर विवाद कायम था।

7. अगस्त 22, 1949 को अम्बेडकर जी ने नया फ़ॉर्मूला रखा जिसमें 15 वर्ष की अवधि का प्रस्ताव रखा गया, जिसे संसद आगे बढ़ा भी सकती है। अंतरराष्ट्रीय अंक, उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी, भाषा आयोग आदि सम्बन्धी भी प्रस्ताव थे।

8. राजभाषा सम्बन्धी मसौदा पेश करने में कई लोग बाधा डाल रहे थे और बेमतलब की बहस कर रहे थे जिसको ख़त्म करने के लिए मौलाना आजाद और श्यामाप्रसाद मुखर्जी काफी प्रयास कर रहे थे।

9. मुख्य बहस 11 से 14 सितंबर तक चलती है जहाँ 45 पृ में 400 से अधिक संसोधन आ चुके थे। 14 सितंबर को ही दोनों पक्षों में राजीनामा हुआ और दोपहर 1 बजे बैठक स्थगित हुई। 3 बजे संविधान सभाई पार्टी में समझौते हुए। लगभग 5 बजे तक कुछ सहमति हुई अतएव उन्होंने (मुंशीजी) ने आकर 1 घण्टा अतिरिक्त माँगा। 6 बजे तक सभी पहलुओं पर विचार-विमर्श कर मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला को कुछ सुधारकर स्वीकार कर लिया गया और आशा की गई कि सभी 400 संसोधन वापस ले लिए जाएँगे। अंततः 5 संसोधन नहीं लिए गए जिसमें कॉंग्रेस के सक्सेना, टण्डन, ब्रजेश्वर प्रसाद थे। लीग के नेता अहमद तथा जेड.एच. लारी भी थे। पुरुषोत्तमदास टण्डन जी ने इस्तीफा देकर संसोधन पेश किया जिसे 16 सितंबर को पार्टी के अनुरोध से वापस ले लिया गया।

10. इस प्रकार भारी तालियों की गड़गड़ाहट में मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला स्वीकार कर हिंदी को राजभाषा बनाया गया। मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला के नाम से विख्यात भाषा सम्बन्धी अनुच्छेद संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक है और परिशिष्ट में अष्टम सूची है।


●हिंदी की संवैधानिक स्थिति व उसकी समीक्षा:- 

वैसे तो स्वाधीनता से पहले ही कुछ हिन्दीत्तर और हिंदी भाषी छोटे-बड़े नेताओं ने हिंदी को सभी तरह से समर्थन देना शुरू कर दिया था, परन्तु स्वाधीनता के बाद कुछ अहिंदी भाषी नेताओं का रुख़ बदलने लगा। इसी वजह से न केवल संविधान सभा में हिंदी का ही फैसला हुआ बल्कि राजभाषा जैसे मसले को भी सुलझाने की कोशिश की। राजभाषा के नाम पर जो बहस 11 से 14 सितंबर 1949 तक चली उसमें वैसे तो हिंदी के अलावा संस्कृत, हिंदुस्तानी, अंग्रेजी के दावे पर विचार किया गया लेकिन हिंदी और अंग्रेजी का विवाद बहुत दिनों तक चला। 

इसके लिए हिंदी में भी 2 गुट थे :- 

एक देवनागरी लिपि वाली हिंदी के समर्थन में था तो दूसरा हिंदुस्तानी जिसमें फारसी लिपि भी आ रही थी। इस समस्या को समझने के लिए तत्कालीन भाषाई जनता के आंकड़े को देखना जरूरी है जोकि उस समय 1-2% अंग्रेजी बोलने वाले या व्यवहार में लाने वाले थे , 46% हिंदी भाषी व शेष जनता अन्य भाषा व बोलियों को बोलने वाली थी जिसमें कई सारी भाषाएँ स्थानीय बोलियाँ थी। जिस आधार पर इन्हें राजभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए था वह आधार मुसीबत से खाली नहीं था इसलिए ही इन पर इतना ध्यान नहीं दिया गया। हिंदी को राजभाषा बनाने का दावा न्यायसंगत रहा पर राजकीय भाषाओं का भी सम्मान रखा गया।

इन सब बातों पर ध्यान देते हुए संविधान निर्माताओं ने राजभाषा की समस्या को हल करने के लिए संविधान सभा के भीतर और बाहर हिंदी के विपुल समर्थन को देखकर संविधान सभा ने हिंदी के पक्ष में अपना फैसला दिया। यह फैसला हिंदी विरोधी एवं हिंदी समर्थकों के बीच "मुंशी-आयंगार फार्मूले" के द्वारा समझौते के परिणामस्वरूप आया।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

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