(काव्यशास्त्र)
हिंदी साहित्य लोचन
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर काव्यशास्त्र व महत्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय कथनों पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
(कुंतक व वक्रोक्ति सिद्धान्त)
● वक्रोक्ति का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-
वक्रोक्ति शब्द "वक्र" तथा "उक्ति" से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है 'सीधा सपाट न बोलकर तिरछा बोलना।'
• परिभाषा:- इसकी पहली परिभाषा भामह ने अपने काव्यालंकार में लोकोत्तर वचन या अनूठी उक्ति के रूप में स्पष्ट की थी।
• कुंतक के अनुसार वक्रोक्ति लोक प्रचलित सामान्य कथनों से भिन्न, अनूठी और विचित्र अभिव्यक्ति का अर्थ है।
● आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति सिद्धान्त की स्थापना 10वीं शती में इसे "काव्य की आत्मा" घोषित करते हुए अपने ग्रँथ "वक्रोक्ति जीवितम" में इसके महत्व को प्रतिपादित किया था।तभी से काव्यशास्त्र के अंतर्गत वक्रोक्ति के महत्व को और भी सम्मान मिलने लगा।
कुंतक के अनुसार, कथन की वक्रता या भाषा की भंगिमा नैसर्गिक है जो शुरू से ही काव्य का तत्व रहा है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि " प्राचीन ग्रँथों में भी इसके उदाहरण मिल जाएंगे जहाँ पात्र अपनी बात को एक अलग अंदाज में कहते हुए मिल जाएंगे। जैसे रामायण और महाभारत आदि।
वक्रता के पहले पहल उदाहरण भामह के "काव्यालंकार" में मिल जाएंगे जहाँ उन्होंने वक्रता पर चर्चा करते हुए काव्य की मूलाधार वक्रता को ही माना ।
वामन ने वक्रोक्ति को अर्थालंकार के रूप में देखा तो वहीं रुद्रट ने उसे शब्दालंकार कह कर उसके 2 भेद बताए हैं :-
1. काकू वक्रोक्ति ।
2. श्लेष वक्रोक्ति।
• दण्डी ने शब्द और अर्थ समन्वित सौन्दर्य को वक्रोक्ति कहा और इसी को काव्य-शोभा का नाम दिया।
● आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति के 6 भेद माने है:-
1.वर्ण-विन्यास वक्रता
2.पद-पूर्वार्ध वक्रता
3.पद-परार्ध वक्रता
4.वाक्य वक्रता
5.प्रकरण वक्रता
6.प्रबन्ध वक्रता
(क्षेमेन्द्र व औचित्य सिद्धान्त)
● औचित्य का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-
"उचित" विशेषण से औचित्य बना है जिसका अर्थ है कविता रचते समय या किसी भी रचना करते समय उचित तत्वों का संकलन व प्रयोग।
● परिभाषा :- काव्य के विभिन्न उपादानों जैसे रस, अलंकार, रीति, वाक्य, वस्तु आदि का संतुलित उपयोग किया जाए तो वह औचित्य कहलाएगा।
औचित्य मुख्य रूप से काव्य के सभी तत्वों का संतुलित इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है, यह कोई स्वतंत्र तत्व नहीं।
● आचार्य क्षेमेन्द्र द्वारा 11वीं शती में "औचित्य सिद्धान्त" की स्थापना करके अपने ग्रन्थ "औचित्य विचारचर्चा" में उसे काव्य की आत्मा सिद्ध किया गया।
औचित्य सिद्धान्त के सबसे पहले लक्षण भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलते हैं जहाँ कविता में उसकी उपयुक्तता, अनुपयुक्तता, संतुलित तत्वों पर विचार किया गया। इसके आगे आनन्दवर्धन ने औचित्य को रस का मूलाधार बताकर आगे आने वाले आचार्यो के लिए बड़ा कार्य किया।
11वीं शती में आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रँथ "औचित्य विचार चर्चा" में इस सिद्धान्त का पहला व्यवस्थि प्रतिपादन किया।
• क्षेमेन्द्र ने औचित्य के 27 भेद माने है।
● आधार व सहायक ग्रन्थ :-
1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।
2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
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