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Friday, January 29, 2021

भक्तिकाल भाग :- 2


(भक्तिकाल)


प्रस्तुत ब्लॉग पर भक्तिकाल के सम्बन्ध में जो अंतिम  पोस्ट किया गया था उसके बाद कि चर्चा यहाँ की जा रही है। अभी तक जितने भी विद्वानों के मत भक्तिआन्दोलन की पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखें गए हैं उनमें से सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण और विचार-विमर्शी आचार्य शुक्ल और द्विवेदी जी के मतों को मान्यता मिली है। जिनके बीच लम्बे समय से विवाद चला आ रहा है कि किसके मत को ज्यादा अहमियत दी जाए या किसका मत तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल भक्ति आन्दोलन के लिये उचित ठहरता है। दोनों ही हिंदी साहित्य के अग्रणी आलोचक है जिनके गहन अध्ययन के उपरांत ही उन्होंने साहित्य सम्बन्धी किसी भी विधा, परिस्थिति, विशेष घटना व प्रसंगादि पर अपने मत प्रस्तुत किये हैं। समय-समय पर गोष्ठियों, अन्य कार्यक्रमों में भी इनके मतों की पुष्टि के लिए तर्क-वितर्क और तथ्यों को प्रस्तुत किया जाता रहा है फिर भी आजतक कोई एक मत स्वीकार्य नहीं हुआ है। फलतः आज भी ये विवाद का मसला बना हुआ है। तो आइए एक बार इन दोनों आचार्यो के मत पर एक निष्पक्ष दृष्टि फेर लेते हैं:- 


● भक्तिआन्दोलन पर शुक्ल के मत:-

1. भक्तिआन्दोलन की पृष्ठभूमि के संदर्भ में आचार्य शुक्ल का मत "इस्लामिक प्रभाव" के रूप में देखा जाता है। जिसके बढ़ते प्रभाव के कारण हिन्दू जाति को अपनी संस्कृति के नष्ट होने के ख़तरे दिखने शरू हो गए थे, जिसे बचाने के लिए उन्होंने भक्ति के गीत गाए। इस संदर्भ में शुक्ल जी कहते हैं कि "उनके सामने ही उनके देव मंदिर और मूर्तियां तोड़ी जा रही थी, पूज्य लोगों का अनादर होता था और वह कुछ भी नही कर पा रहे थे...."। "अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त और मार्ग ही क्या था"..।

2. "जिस समय मुसलमान भारत में आए उस समय सच्चे धर्म-भाव का बहुत कुछ ह्रास हो गया था। परिवर्तन के लिए बहुत बड़े धक्के की जरूरत थी..."(61पृ) । अर्थात लोगो के भीतर पुनः भक्ति भावना के बीज को अंकुरित करने की आवश्यकता थी। जिससे शुष्क पड़ती हुई जनता के भीतर उत्साह का संचार हो सके।

3. "कालदर्शी भक्तकवि जनता के हृदय को संभालने और भक्ति में उन्हें लीन रखने के लिए दबी हुई भक्ति को जगाने लगे थे। क्रमशः भक्ति का प्रवाह ऐसा विकसित और प्रबल होता गया कि उसकी लपट में केवल हिंदू ही नहीं, देश में बसने वाली सह्रदय मुसलमान भी न जाने कितने आ गए। प्रेमस्वरूप ईश्वर को सामने लाकर भक्त कवियों ने हिंदुओ और मुसलमानों दोनों को मनुष्य के सामान्य रूप में दिखाया और भेदभाव के दृश्यों को हटाकर पीछे कर दिया"...।

अर्थात आगे चलकर भक्तिआन्दोलन में सूफियो का भी योगदान देखा गया। उन्होंने भारतीय संस्कृति और लोककथाओं के उद्धरणों को उठाकर गीत गाने शुरू किए और प्रेम के माध्यम से ईश्वर की भक्ति करने पर ज़ोर दिया।

4. "भक्ति का जो सोता दक्षिण से उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ती हुई जनता के हृदय क्षेत्र में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला"...।

5. "भक्तिआन्दोलन की जो लहर दक्षिण से आई उसने उत्तर भारत की परिस्थिति के अनुरुप हिन्दू- मुसलमान दोनों के लिए एक सामान्य भक्तिमार्ग की भावना कुछ लोगों में जगाई"....।           

7.  "जनता पर चाहे जो भी प्रभाव पड़ा हो, उन भक्तों ने जितने भी पद गुनगुनाये उसने मुरझाते हुए हिन्दुओं को प्रफुल्ल किया".....।

• आचार्य शुक्ल के इस्लामिक मत की पुष्टि करते हुए रामस्वरूप चतुर्वेदी और विश्वनाथ त्रिपाठी यह मानते हैं कि " शुक्ल जी इस बात को मानते थे कि दक्षिण से ही भक्तिआन्दोलन कि शुरुआत हुई परन्तु उसे जो तेजी मिली वो इस्लाम के प्रभाव से मिली"...। 


8. इसी के अतिरिक्त शुक्ल जी सिद्ध-नाथों पर व्यंग कसते हुए कहते हैं कि" उनका उद्देश्य, कर्म को उस गड्ढे से निकाल कर प्रकृत धर्म के खुले क्षेत्र में लाना न था बल्कि एकबारगी किनारे ढकेल देना था। जनता की दृष्टि को आत्मकल्याण और लोककल्याण विधायक सच्चे कर्मो की ओर ले जाने के बदले उसे वे कर्मक्षेत्र से ही हटाने में लगे थे"...।         

इसी क्रम में तुलसीदास आगे कहते हैं कि :-

"गोरख जगायो जोग भगति भगायो लोग"...।


● हजारीप्रसाद जी के मत:-


1. हजारीप्रसाद जी शुक्ल जी के इस्लामिक मत का खंडन करते हुए उसे भारतीय संस्कृति के स्वाभाविक विकासक्रम से जोड़ते हुए "हिंदी साहित्य की भूमिका" में कहते हैं कि "बोद्धतत्ववाद, जो निश्चय ही बौद्धआचार्यो की देन था, मध्ययुग के हिंदी साहित्य के उस अंग पर अपना निश्चित पद चिन्ह छोड़ गया जो निश्चय ही सन्त-साहित्य के नाम से जाना गया। मैं जोर देकर कहना चाहता हूं, क्रमशः बौद्ध धर्म लोकधर्म का रूप लेकर आगे बढ़ रहा था जिसकी झलक हम हिंदी सहित्य में भी पाते हैं"..। 

2.  इसी के आगे वह इस्लामिक प्रभाव को नकारते हुए "हिंदी साहित्य की भूमिका" (पृ 2) में कहते हैं कि "लेकिन ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि यदि इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बाहर आना वैसा ही होता जैसा आज है"....।

3. "जिस समय मुसलमान उत्तर भारत के मंदिरों को तोड़ रहे थे उसी समय निरापद दक्षिण में भक्तलोगों ने भगवान की शरण की प्रार्थना की, जोकि वर्णाश्रम के विरुद्ध खड़े हुए थे। मुसलमानो की चढ़ाई से यदि भक्ति का उदय होना होता तो वह पहले उत्तर भारत के सिंध से निकलता परन्तु वह दक्षिण में निकला"..।                                

क्योंकि दक्षिण में पहले ही वर्णाश्रम और ब्राह्मणों की कुरीतियों के विरुद्ध आलवार और नायनार भक्तकवि खड़े हो चुके थे। जिसमें कई अवर्ण जाति के लोग भी थे। जिन्हें अपनी सामाजिक मर्यादा को सुदृढ़ करना था और इसके पीछे उनके आर्थिक स्थिति के मजबूत होने का कारण था जिसकी पुष्टि इरफान हबीब और रामशरण वर्मा जैसे इतिहासकार भी कर चुके हैं।   

4.  इसी के आगे "हिंदी साहित्य की भूमिका" में हजारीप्रसाद कहते हैं कि "इस्लाम के प्रभाव को केवल प्रभाव के रूप में देखना चाहिए ना कि प्रतिक्रिया के रूप में"...(पृ29)।

5.  इसके अलावा हजारीप्रसाद जी एक अन्य तथ्य को भी भक्तिआन्दोलन से जोड़ते हुए अपनी पुस्तक "मध्यकालीन बोध स्वरूप" में कहते हैं कि "अत्यधिक प्राकृत-केंद्री कविता की प्रतिक्रिया का अवसान सहज भगवत्प्रेम में हुआ। संत-सगुण मार्गी भक्तों ने नए रसबोध को बढ़ाया। यद्दपि रीतिकाल में संस्कृत की प्रवृत्ति को जिलाये रखा, पर भक्ति के आदर्श उसे भी चालित करते रहे".....(पृ119)।

हजारीप्रसाद जी भक्ति साहित्य को "हतदर्प जाति का साहित्य " नहीं मानते।

                        

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार हजारीप्रसाद जी भक्तिकाव्य के लिए 2 तर्क देखते हैं:-

1. बौद्ध तत्ववाद का स्वाभाविक विकास।

2. प्राकृत-अपभ्रंश की श्रृंगारिकता के विरुद्ध प्रतिक्रिया।

इन सभी मतों को देखने के बाद "बच्चन सिंह" शुक्ल और हजारीप्रसाद जी के मतों को आधा सच मानते हैं और उसे पुनः विचारने का प्रस्ताव पेश करते हैं। वह कहते हैं कि "मन्दिरो के तोड़े जाने और जबरन मुस्लिम बनाये जाने का प्रभाव भक्तों पर न पड़ता ,यह अमनोवैज्ञानिक जान पड़ता है। लेकिन साथ ही उस समय मुसलमान- हिन्दू एकसाथ भी रह रहे थे जिससे आत्मीय सहोदर की भावना भी समाज में पल्लवित हो रही थी। इतिहास भले ही इसकी पुष्टि न करता हो पर साहित्य ज़रूर करता है"....। 

बच्चन सिंह हजारीप्रसाद जी के मत को इस तरह से पुष्ट करते हैं "यदि मुसलमान न आये होते तो संत-सूफी साहित्य नहीं लिखा जाता"...। जिसकी पुष्टि शुक्ल जी भी करते हैं।

●रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास में "जनता" शब्द का इस्तेमाल करके समाज के हर वर्ग को शामिल किया है वहीं हजारीप्रसाद जी ने "लोक" शब्द का प्रयोग करके निम्नवर्ण के लोगों को महत्व दिया है।

सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018   

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