आदिकालीन साहित्य
● अमीर खुसरो :- इनका वास्तविक नाम "अबुल हसन" था।इनका जन्म एटा में 1255 ई.में हुआ था। इनके पिता का नाम सैफुद्दीन महमूद था जो तुर्की के लाचीने कबिले के सरदार थे।इनके गुरु का नाम निजामुद्दीन औलिया था जिनसे इन्हें घनिष्ठ प्रेम था। अपने गुरु की मृत्यु पर इन्हें लम्बे समय तक दुख रहा था जिससे प्रभावित होकर इन्होंने ये पँक्ति कही थी :-
"गोरी सोवे सेज पर मुख पर डाले केस.....।
गुरु की मृत्यु से आहत होकर उनके विलाप में लगातार रहने के चलते आगामी 6 माह में इनकी हालत बिगड़ती गयी और उसके परिणामस्वरूप अमीर खुसरो की भी मृत्यु 1325 ई. में हो गयी थी।
● इन्होंने कई तरह की रचनाएं की हैं जैसे:-
शिष्ट काव्य - फ़ारसी में
गीत,कव्वाली - ब्रज में
खालिकबारी शब्दकोश - फ़ारसी में
दोहे, मुकरियां, ढकोसला - खड़ीबोली में
इन्हें हिन्दू-तुर्क का मिश्रित कवि माना जाता है। इन्होंने कई राजाओं का समय देखा था, जैसे गयासुद्दीन बलबन,अलाउद्दीन खिलजी, बुगरा खां आदि।
"सुल्तानी" और "तुर्क" इनके बचपन के नाम थे। इसके अलावा "तूती-ए-हिंदी" ,"अमीर" जैसी पदवियाँ इन्हें बादशाहों ने दी थी।
"नूरे सिपहर" पर प्रसन्न होकर कुतुबुद्दीन खिलजी ने इन्हें एक हाथी के भार के बराबर सोना दान किया था।
"खालिकबारी" शब्दकोश तैयार करने वाले हिंदी के प्रथम शब्दकोशकार थे।
भाषा शास्त्री "बाबूराम सक्सेना" इन्हें "उर्दू का अविष्कारक" और लाला श्रीराम उन्हें "उर्दू का मुग्गा" मानते हैं।
● विद्यापति :- इनका जन्म 14वी शती में बिहार के दरभंगा जिले के विपसी नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम "गणपति ठाकुर" और माता का नाम "हासिनी देवी" था। इनके गुरु का नाम "प. हरिमिश्र" था। ये तिरहुत के राजा "शिवसिंह" के और "कीर्तिसिंह" के दरबारी कवि थे। ये अवहट्ट और मैथिली के बड़े कवियों में माने जाते हैं। इनके आदर्श कवि "जयदेव" थे जिनसे प्रभावित होकर इन्होंने "पदावली" की रचना की थी।
इनकी प्रसिद्ध रचना "कीर्तिलता और कीर्तिपताका" है जिसमें महाराजा कीर्तिसिंह के शौर्य का वर्णन है। इसकी भाषा अवहट्ट व अपभ्रंश मिश्रित है। इसके अतिरिक्त "पदावली" से इनको न केवल मैथिली में बल्कि सम्पूर्ण हिंदी सहित्य में ख्याति मिली। और इन्हें अपनी इस कृति के लिए "मैथिल-कोकिल" की उपाधि से भी जाना जाता है।
●आचार्य शुक्ल द्वारा इनकी दो प्रकार की भाषा थी:-
1 साहित्यिक भाषा - अपभ्रंश
2 देसीभाषा -अवहट्ट व देसीभाषा मिश्रित (मैथिली)।
●अनेक विद्वानों द्वारा इनके बारे में कही गई बातें:-
1. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "विद्यापति में वैष्णव की मर्यादा और शैव का तादात्म्य दोनों एक साथ मिलता है"...।
2. बच्चन सिंह के अनुसार "हिंदी के जातीय कवि" और "अपरूप के कवि" अर्थात इनका प्रेम न तो रोमांटिक है और न ही भक्तों की तरह वायवीय।वे तो अपरूप के कवि हैं"....।
3. इनकी भाषा में पूर्वी अपभ्रंश का प्रयोग पाया जाता है। शुक्ल जी इनके लिए एक व्यंग्यात्मक पंक्ति का प्रयोग करते हैं :-"आध्यात्मिक रंग के चश्मे इतने सस्ते हो गए हैं कि उन्हें चढाकर कोई भी जैसे गीतगोविन्द के पदों को आध्यत्मिक मान लेता है वैसे ही विद्यापति के भी"....।
4. "हजारीप्रसाद" ने इन्हें श्रृंगार का सिद्धराज कवि कहा है। इसके अतिरिक्त वह पदावली के लिए कहते हैं कि "आगे चलकर इस पुस्तक के पदों ने बंगाल, आसाम और उड़ीसा में वैष्णव भक्तोँ को प्रभावित किया और उन प्रदेशो के भक्त साहित्य में नई प्राणधारा संचारित हुई। इसलिए यह पूर्वी प्रदेशों में धर्मग्रंथ का महत्व पा सकी"....।
5. बच्चन सिंह के अनुसार निराला ने पदावली के पदों को "नागिन की लहर " कहा है।
6. विद्यापति को अभिनय जयदेव, कविशेखर आदि उपनामों से भी जाना जाता है।
7. चन्द्रबली पांडे के अनुसार "विद्यापति काम ,कला और रस के पथिक" हैं।
8. डॉ रामकुमार वर्मा के अनुसार "विद्यापति का अंतर्जगत उतना हृदयग्राही नही है जितना बाह्य "...।
● ऐसा माना जाता है कि जिस गांव में विद्यापति पैदा हुए थे वहाँ के राजा शिवसिंह ने उन्हें दान कर दिया था और उनके वंशजो के पास वो ताम्रपत्र अभी तक सम्भाल के रखा था परंतु उन्हें अंग्रेजो ने हथिया लिया था।
सहायक ग्रन्थ :-
1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
7. प्राचीन व पूर्व मध्यकालीन हिंदी काव्य, डॉ दीनदयाल, के.एल. पचौरी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2012