(कृष्णकाव्य)
● शास्त्रों के अनुसार विष्णु भगवान के अवतारों में से एक अवतार कृष्ण जी भी थे। जिनके 2 रूप प्रचलित हैं : लोकरक्षक व लोकरंजक।
लोकरक्षक महाभारत और गीता के सम्बंध में कहा जाता है। साथ ही जब जब कृष्ण भगवान ने संसार को किसी भी मुसीबत से बचाया हो, दानवों से युद्ध किया हो, दुष्टों का नाश किया हो आदि। वहीं लोकरंजन का अर्थ कृष्ण जी की बाललीलाओं से जुड़ा है। उनके बाल्यकाल में मथुरा, वृंदावन में अपनी मैया के साथ, गाँव की गोपियों के साथ और अपने सहपाठियों के साथ की गयी नटखट पन्तियाँ, खेलकूद, माखन खाना और गोपियों के वस्त्र चोरी करके भाग जाना और फिर कृष्ण जी की शिकायत यशोदा माँ तक पहुँचना आदि प्रसंग कृष्ण जी के लोकरंजन रूप को वर्णित करते हैं।
● कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख :-
कृष्ण के रूप सौन्दर्य का वर्णन और प्रचार देश के कई हिस्सों में हुआ। कुछ जगहों पर नगर की लड़कियाँ खुद को कृष्ण के मंदिर में दान कर देती थी और श्रीनाथ जी के साथ उनका विवाह कर दिया जाता था। दक्षिण की "आंडाल" नामक स्त्री इसी तरह की थी।
इसी संदर्भ में अंडाल कहती है कि :-"अब मैं पूर्ण यौवन को प्राप्त हो गई हूँ और कृष्ण के अतिरिक्त अब कोई भी मेरा स्वामी नही हो सकता".....।
• हिंदी साहित्य के अंतर्गत कृष्ण काव्य का सबसे श्रेष्ठ कवि या प्रस्तोता अगर किसी को कहा जा सकता है तो वह महान वात्सल्य रस के सम्राट "सूरदास" ही कहे जा सकते हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में कृष्णा के बालपन के मधुर प्रसंगों को वर्णित किया है। कृष्ण - दाऊ के बीच नोकझोक, मैया यशोदा के साथ नटखटपन, गोपियों के साथ खेलना कूदना और उन्हें तंग करना, चोरी छिपे माखन खाना और गोपियों की पानी की मटकियाँ फोड़ देना, अपने बालपन के सखाओ के साथ मटरगसती करना इत्यादि। सूरदास द्वारा कृष्ण जी के लीलारूप का वर्णन इनकी रचित "सूरसागर " में और उसके मुख्य भाग "भ्रमरगीत सार " में उल्लिखित है।
(सूरदास)
● सूरदास के सम्बंध में एक घटना मुख्य प्रचलित है जोकि उनके नेत्रहीन होने से जुड़ी है। कोई उन्हें जन्म से ही नेत्रविहीन समझता है तो कोई उन्हें जन्म के पश्चात कुछ वर्षों बाद नेत्र खोने के मैटल को लेकर चलता है।
इस सन्दर्भ में एक घटना देख सकते हैं । एक बार सूर कुँए में गिर गए थे तो 6 दिन तक वही पड़े रहे ,बाद में भगवान ने उन्हें दर्शन दिया और उनकी आँख लौट आयी। इसके बाद ईश्वर कहते हैं की "तू सब विद्याओ में गुणी होगा और शत्रुओं का नाश होगा"..।
तिस पर सूर कहते हैं कि "अब मैंने आपके दर्शन कर लिए हैं, अब और कुछ देखने की लालसा नही"..। तब भगवान ने उन्हें पहले जैसा ही बना दिया।
सूर "साहित्यलहरी" में भी कहते हैं :-
" प्रबल दछिन विप्रकुल तें सत्रु ह्वैहै नास...।
कृष्ण ने वरदान दिया था कि शत्रुओं का नाश होगा।
• सूरदास ने खुद को चन्द्रबरदाई के वंश का बताया है।
• "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार सूरदास की लोकप्रियता का कारण उनका साहित्यिक- क्षेत्र में गृहस्थ जीवन से और परिवार से जुड़े रहना है....। शायद सूर कृष्ण के बालपन से ज्यादा प्रभावित थे , बजाय उनके वयस्क जीवन के। विशेषकर महाभारत के कृष्ण चरित्र से प्रभावित नहीं थे। क्योंकि शायद सूर को हिंसा का क्षेत्र प्रिय न रहा हो।
सूर कृष्ण को लोकरंजन रूप में ज्यादा पसन्द करते है बजाय लोकरक्षक के।
• "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार परिवार को सीमित रखने के कारण उन्होंने बाह्य जीवन के संघर्षों के चित्रण कम किया है, गृहस्थ जीवन की तन्मयता अधिक है।
● सूरदास की मृत्यु पर विट्ठलनाथ ने कहा था :-
"पुष्टिमार्ग को जहाज जात है, जो कछू हो सो ले लियो"..।
● "सूरसागर" में भागवत के दशम स्कंध का संक्षेप में वर्णन है - जिसके बारे में शुक्ल कहते हैं कि :-"यह इतनी प्रगल्भ और काव्यपूर्ण है कि आगे के आने वाले कवियो की श्रृंगारिक और वात्सल्य उक्तियाँ जूठी सी जान पड़ती है"......।
●" नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा "नंदुलारे जी" द्वारा सम्पादन किया हुआ सूरसागर ही अभी तक सबसे प्रमाणिक है और इसी से सब सहायता लेते हैं। जिसमे 5000 पद संकलित हैं। 12 स्कंध है।
• सूरदास की महत्वपूर्ण रचनाएँ :-
सूरसारावली- 1544
सूरसागर - 1546 इसमें 4936 पद 12 स्कंध हैं
साहित्यलहरी - 1550 नायिकाभेद ग्रँथ
● शुक्ल, मिश्रबन्धु, नंदुलारे वाजपेयी के अनुसार साहित्य लहरी और सूरसारावली" प्रामाणिक और बच्चन सिंह के अनुसार अप्रमाणिक है।
● सूरदास पर कहे गए कथन:-
1. शुक्लानुसार "जिस प्रकार से रामभक्तो में तुलसी का स्थान सबसे ऊपर है उसी तरह से सूर का स्थान भी कृष्ण भक्तो में सबसे ऊपर है"..।
2. शुक्लानुसार "श्रृंगार और वात्सल्य के क्षेत्र में जहाँ तक इनकी दृष्टि पहुची है वहाँ तक किसी और कि नही"...।
3. शुक्लानुसार "कृष्णचरित के गान में गीतकाव्य की जो धारा पूरब में जेयदेव और विद्यापति ने बहाई थी उसी का अवलम्ब ब्रज में सूर ने किया है".।
4. शुक्लानुसार "सूर का सबसे मर्मस्पर्शी और वाग्वेदग्ध्यपूर्ण अंश "भ्रमरगीत" है। गोपियों की वचन वक्रता अत्यंत मनोहारिणी है"..।
5. शुक्लानुसार "सूर के श्रृंगारी पदों की बहुत कुछ रचना "विद्यापति" के आधार पर की गई है व जगह जगह दृष्टिकूट वाले पद मिलते हैं। यह भी विद्यापति का अनुकरण है..।
6. शुक्लानुसार सूरदास पर जयदेव और चंडीदास का प्रभाव भी है।
7. हजारीप्रसाद के अनुसार ये "ब्रज के प्रथम कवि" थे।
8 . बच्चन सिंह के अनुसार सूर का काव्य किसी चली आती हुई गीत परम्परा का चाहे मौखिक ही रही हो, पूर्ण विकास से प्रतीत होता है"..।
9. "बच्चन सिंह" के अनुसार सूरसागर में सबसे अधिक पद बाललीला के हैं। इस पर वल्लभ मत का प्रभाव है। इसी का एक अंश "भ्रमरगीत सागर" है।
10. बच्चन सिंह के अनुसार " सूर का भ्रमरगीत वियोग श्रृंगार का सर्वोच्च शिखर है। विरह की इतनी वैविध्यपूर्ण मानसिक दशाएँ शायद कहीं न मिले। पूरा भ्रमरगीत वक्रोक्ति से भरा है"..।
11. बच्चन सिंह के अनुसार "उद्धव का संदेश जले पर नमक छिड़कने का काम करता है"..।
12. बच्चन सिंह के अनुसार " भ्रमरगीत सार के बहाने निर्गुणमत की धज्जियां उड़ाने में सूर ने कोई कमी नहीं की"...।
13. बच्चन सिंह के अनुसार " भ्रमरगीत में गोपियों के विरह का कोलाहल और व्यंग बाण है तो दूसरी ओर राधा के मौत की तरह मौन का ठंडा सन्नाटा"..।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018