(प्रयोगवाद)
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "प्रयोगवाद" भी है। आज हम 'प्रयोगवाद के कवियों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर आप प्रयोगवादी कवियों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
● प्रयोगवाद :- एक परिचय
प्रयोगवाद हिंदी साहित्य खासकर कविता की उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिसकी तरफ अज्ञेय ने दूसरा सप्तक की भूमिका में संकेत किया था। प्रयोग अपने आप में इष्ट नहीं है बल्कि वह साधन और दोहरा साधन है। वह एक ओर तो सत्य को जानने का साधन है दूसरी तरफ वह उस साधन को भी जानने का साधन है। यह स्पष्टीकरण तार सप्तक की कविताओं को प्रयोगवादी कहे जाने पर दिया गया था। प्रयोगवाद में कविता में शिल्प और संवेदना के स्तर पर सर्वथा नवीन प्रयोग मिलते हैं। प्रयोगवाद ने साहित्य में पहली बार व्यक्तिक अस्मिता, निजी व्यक्तित्व और निजता को बहुत महत्व दिया। इसमें क्षण को महत्व देकर जीवन को भरपूर ढंग से जीने की चाह है। प्रयोगवादी कवि व्यक्तिक प्रेम की सहज स्वीकृति पर बल देता है।
प्रयोगवाद फ्रायड के दर्शन से प्रभावित है।
बच्चन सिंह के मत :-
1. बच्चन सिंह के अनुसार प्रयोगवाद से ही आधुनिकतावाद की शुरुआत होती है। इसे प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया मानना चाहिए।
2. बच्चन सिंह भी प्रयोगवाद का आरम्भ सन 1943 से माना जाता है। जिसके प्रवर्तक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" के सम्पादकत्व में "तार सप्तक" के प्रकाशन से मानी जाती है। जहाँ वह तार सप्तक की भूमिका में "सातों कवियों को राही नहीं, राहों के अन्वेषी बताते हैं"..। वह सातों कवि किसी एक स्कूल के नहीं हैं। चाहे लोकतंत्र हो या उद्योगों का समाजीकरण इन सब विषयों पर सभी कवियों के मत भिन्न हैं। उनकी रचनाएँ प्रयोगशीलता के नमूनी नहीं हैं"...।
3. बच्चन सिंह के अनुसार तार सप्तक के कवियों ने प्रयोगशील और प्रयोग शब्द का उल्लेख किया है, प्रयोगवाद का नहीँ। सबसे पहले नंदुलारे वाजपेयी ने अपने निबन्ध " प्रयोगवादी रचनाएँ" में इसका प्रयोग किया था। इस निबन्ध में तार सप्तक की समीक्षा की गई है। अज्ञेय ने "दूसरा सप्तक" की भूमिका में वाजपेयी जी के आरोपो का उत्तर देते हुए कहा है कि " हमें प्रयोगवादी कहना उठा ही अनुचित है जितना हमें कवितावादी कहना"..। आगे वह कहते हैं " प्रयोग अपने आप में इष्ट नहीं है, वह साधन है। दोहरा साधन है। क्योंकि एक तो वह उस सत्य को जानने का साधन है जिसे कवि प्रेषित करता है, दूसरे वह इस प्रेषण की क्रिया को और उसके साधनों को जानने का साधन है ; अर्थात प्रयोग द्वारा कवि अपने सत्य को अधिक अच्छी तरह जान सकता है। वस्तु और शिल्प दोनों के क्षेत्र में प्रयोग फलप्रद होता है"..।
● अज्ञेय ने अपने "दूसरे सप्तक" की भूमिका में कहा था "प्रयोग का कोई वाद नहीं होता। हम वादी नहीं रहे और न ही हैं। न प्रयोग अपने आप में इष्ट या साध्य है। ठीक इसी तरह से कविता का भी कोई वाद नहीं होता है, कविता भी अपने आप मे इष्ट या साध्य नहीं है। अतः हमें प्रयोगवादी कहना उतना ही असंगत है जितना किसी कवि को कवितावादी कहना"...।
4. बच्चन सिंह के अनुसार प्रयोगवाद का मूलाधार वैयक्तिकता या व्यक्तिवाद है । छायावादी वैयक्तिकता से यह बिल्कुल भिन्न अर्थ में है कि छायावाद में भावुकता का प्राधान्य था तो प्रयोगवाद में बौद्धिकता का। यह मुख्यतः शहरी जीवन की जटिलता से जुड़ा हुआ है जहाँ यथार्थवाद नहीं, उसका अमूर्तन रूप दिखाई देता है।
5. बच्चन सिंह की नजरों में केवल शमशेर और निराला ही "सच्चे प्रयोगशील कवि" रहे हैं। किंतु व्यक्तिनिष्ठता और आधुनिकता शमशेर में ही मिलती है।
6. बच्चन सिंह के अनुसार तार दूसरे सप्तक में एक भी कवि प्रगतिवादी नहीं है। बावजूद उसके शमशेर प्रगतिवादी न कहलाकर प्रयोगवादी ही कहलाये। रघुवीर सहाय अर्ध प्रगतिवादी और भवानीप्रसाद गाँधीवादी। इन सप्तक में न तो राजनीतिक व्यंग्य है और न आत्मग्रस्त वैयक्तिकता। पर प्रत्येक कवि प्रगतिशील व प्रयोगवादी जरूर है।
इसी के आगे वह कहते हैं कि " दूसरे सप्तक की टेक्नीक सधी हुई , भाषा बोलचाल के निकट और भावानुभूति, मर्मस्पर्शी तथा प्रकृति की ताजा छवियों से युक्त है"...।
तीसरे सप्तक में काव्य-परम्परा समाप्त हो जाती है और चौथे सप्तक में उसका सुरक्षा कवच होकर रह जाता है।
● विजेन्द्र स्नातक के अनुसार "तार सप्तक" की मूल परिकल्पना प्रभाकर माचवे और नेमीचंद जैन से हुई थी।
विजेन्द्र स्नातक के अनुसार प्रयोगवाद का मूल मन्तव्य था " संगृहीत सभी कवि ऐसे होंगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हैं। जो यह दावा नहीं करते कि उन्होंने काव्य का सत्य पा लिया, वे केवल अन्वेषी हैं"..।
● रामविलास शर्मा का मत है कि " प्रयोगवादी कविता में युग से उतपन्न अनास्था, शंका, घुटन, भग्नाशा में से एक नए मार्ग का अनुवेषण की भावना दिखाई पड़ती है। ये कवि एक नए मार्ग का अनुसन्धान करने लिए व्याकुल है"..।
● विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार "प्रयोगवाद में मोहभंग और उससे उतपन्न व्यंग्य विद्रूपता की मनःस्थिति प्रमुख है"..।
● प्रयोगवाद के संदर्भ में कहे गए विद्वानों के कथन:-
1. प्रयोगवाद शैलीगत विद्रोह है..। नगेंद्र
2. प्रयोगवाद दृष्टिकोण का अनुसंधान है..। केसरी कुमार
3. प्रयोग कलात्मक अनुभव का क्षण है..। रघुवीर सहाय
4. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने "समाज के हित मे जैसी क्रांति का सतत प्रक्रिया काम्य है, वैसे ही रचना के हित में प्रयोग की...।
5. "बैठे ठाले का धंधा" - नंदुलारे वाजपेयी।
अ . महाकवि अज्ञेय :-
• बच्चन सिंह के अनुसार अज्ञेय के "भगन्दूत" 1933 पर निराला के गीतों और प्रसाद के आँसू का प्रभाव है। इसके आगे वह कहते हैं कि 'उनके काव्य संग्रह चिंता में समर्पण, पीड़ा, आत्मदमन को पुराने ढंग से नारी के मत्थे मढ़ा गया है।'
"इत्यल्म" 1946 में यौन वर्जनाओं के विरुद्ध जिहाद छेड़ा गया है।
"हरी घास पर क्षण भर" 1949 से अज्ञेय की नई कविता यात्रा आरम्भ होती है।
"असाध्य वीणा" में प्रियंवद की तरह साधना में आत्म शोध करना पड़ता है और अहम का विसर्जन करना पड़ता है।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "आधुनिक साहित्य में मानवीय व्यक्तित्व और उसकी सर्जनात्मकता की सबसे गहरी और सार्थक चिंतना अज्ञेय के कृतिव में मिलती है।
• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार अज्ञेय "निजता की सुरक्षा" के प्रतिनिधि कवि हैं।
ब. महाकवि भवानी दादा :-
• भवानीप्रसाद मिश्र भाषा के चलतेपन और भावों के खुलेपन के कवि हैं।
"सतपुड़ा के जंगल" में उनकी प्रबन्ध की प्रतिमा दिखती है।
• उदयप्रकाश ने भवानीप्रसाद मिश्र को कविता का गाँधी कहा है लेकिन कवि स्वयं को "गाँधी का बेटा" कहते हैं।
• कवि को "सहजता के कवि" कहा जाता है।
स. महाकवि मुक्तिबोध :-
• मुक्तिबोध अमानवीय व्यवस्था में पनपे और उन्होंने प्रचलित रुग्ण सौंदर्य बोध के स्थान पर नए मानवीय प्रगतिशील सौंदर्य बोध का निर्माण किया है।
• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार "मुक्तिबोध की कविताएँ स्वाधीन भारत की इस्पाती दस्तावेज हैं।
• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार इनके संकलन "चाँद का मुँह टेढ़ा है" 1964 में चांद गतकालिक सौंदर्य का बोध कराता है। जब उसकी, यानी मानवीयता व्यवस्था की कुरूपता पहचान ली गयी है इसलिए उसका मुँह टेढ़ा है।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार इस संकलन का रुप एक बड़े कलाकार के स्कैच-बुक की तरह लगता है।
• बच्चन सिंह के अनुसार मुक्तिबोध की कविता प्रयोगवादी और प्रगतिवादी का रासायनिक मिश्रण है। एक साथ प्रयोगवादी और प्रगतिवादी भी हैं । किंतु दोनों की अतिरेकवादी प्रवृतियाँ उन्हें मान्य नहीँ हैं। वह "आत्ममंथन के कवि" हैं।
• बच्चन सिंह के अनुसार मुक्तिबोध के काव्य संग्रह "भूरी-भूरी खाक धूल" 1980 का प्रकाशन बाद का है परन्तु उसमें संकलित कविताएँ चाँद का मुँह टेढ़ा है से पहले की हैं।
• बच्चन सिंह के अनुसार "अंधेरे में" अत्यंत दीर्घ कविता है। इसमें पूरी सभ्यता डूबी हुई है। इसमें न अस्मिता की खोज की कविता है और न ही अस्तित्ववाद-रहस्यवाद की। इसमें अंधेरे के विरुद्ध प्रकाश का संघर्ष हुआ है।
इस कविता में बुद्धिवर्ग से उसे किसी तरह की आशा नहीं है " बुद्धिवर्ग है क्रीतदास/किराए के विचारों का उद्भास"..।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार अँधेरे में से गुजरना एक काव्य- यात्रा है..। इसका ध्वंस इलियट के "वेस्ट लेंड" की भी याद दिला देता है।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार 'अंधेरे में का चित्रण निराला के काव्य में लम्बी अवधि तक फैले अंधकार की याद दिलाता है। साथ ही "निराला के अंधेरे का प्राथमिक संकेत आध्यात्मिक है, जबकि मुक्तिबोध में अँधेरे का रूप सामाजिक है"..।
इस संग्रह का पहले नाम " आशंका के द्वीप अँधेरे में" था।
● "अंधेरे में" कविता पर कहे गए कथन:-
1. रामविलास शर्मा - अपराध भावना का अनुसन्धान व अरक्षित जीवन की कविता।
2. नामवर सिंह - अस्मिता की खोज।
3. इंद्रनाथ मदान - आत्म संसोधन का अनुसन्धान।
4. निर्मला जैन - अंतस्थल का विप्लव।
5. प्रभाकर माचवे - लावा।
भूल गलती, ब्रह्मराक्षस और दिमागी गुहान्धकार आदि कविता बुद्धिजीवी वर्ग की ट्रेजेडी है।
● बच्चन सिंह ने मुक्तिबोध को भयानक खबरों का कवि कहा है।
● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "मुक्तिबोध का ठाट किसी से मिलता है तो कबीर से। वैसी ही बैचेनी और कभी-कभी वैसा ही कोमलता और फहकडपन"...।
मुक्तिबोध ने सत चित आनंद के स्थान पर सत चित वेदना को रखा है।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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