(मैथिलीशरण गुप्त व रामनरेश त्रिपाठी)
"हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप आज हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "द्विवेदी युग" के नाम से भी जानी जाती है। आज हम इसी के बारे में यहाँ कुछ विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। उसमें भी खासतौर पर हिंदी के प्रथम राष्ट्रीय कवि "श्री मैथिलीशरण गुप्त" जी और हिंदी में प्रथम ग्राम गीतों के संकलन कर्ता "श्री रामनरेश त्रिपाठी" जी की रचनाओं व उनके साहित्यिक कर्म के बारे में कुछ तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी साझा करने जा रहे हैं। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी।
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1. "मैथिलीशरण गुप्त"
● "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप हिंदी के प्रथम राष्ट्रीय कवि "मैथिलीशरण गुप्तजी" की ख्याति, यशकीर्ति का आधार , उनकी लोकप्रियता के स्तम्भों में से सबसे प्रथम रचना के बारे में जानेंगे। जिसके दमखम्ब पर आज भी वह हिंदी साहित्य के महान रचनाकारों में गणनीय हैं। इसके अतिरिक्त गुप्तजी ने अन्य भी कुछ प्रसिद्ध और महान कृतियों को जन्म दिया है जिसका भी क्रमानुसार वर्णन हम आगे करेंगे।
● गुप्तजी की "भारत भारती" 1912 में आई राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत लम्बी कविता है जिसमें 3 खण्ड है। बच्चन सिंह के अनुसार इस पर "मुसहास-मददो-जजे-इस्लाम" या "मुसददसे हाली" का प्रभाव है। इस पुस्तक में मुस्लिमो के भूत, वर्तमान और भविष्य की बात कही थी। "हाली" की प्रतिक्रिया में भारत-भारती के 7 वर्ष पूर्व "ब्रजमोहन दत्तात्रेय कैफ़ी" की पुस्तक "भारत दर्पण" आ गयी थी।
• बच्चन सिंह का मत है कि "गुप्त जी ने शैली हाली से और जमीन कैफ़ी से"..।
भारत-भारती" से प्रभावित होकर गाँधी जी ने गुप्तजी को राष्ट्रीय कवि की उपाधि दी थी।
● शुक्लानुसार "इस पुस्तक में मार्मिक तथ्यों का समावेश बहुत साफ और सीधी-सादी भाषा में होने से यह प्रस्तुत स्वदेश की ममता से पूर्ण नवयुवकों को बहुत प्रिय हुई"...।
जैसाकि हमने ऊपर कहा था कि आप "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर गुप्तजी की अन्य महान व प्रसिद्ध रचनाओं के बारे में भी जानकारी ग्रहण कर सकेंगे। उसी क्रम में हम गुप्तजी की द्वितीय महान रचना जोकि 1931 में प्रकाशित "साकेत" है, यहाँ उसकी चर्चा कर रहे हैं। मूलरूप से यह रचना रामकथा है परन्तु इस रचना की खासियत , लक्ष्मण की पत्नी "उर्मिला" के विरह वर्णन और उसके एकांत में छिपी है।
इस पुस्तक के लिए गुप्तजी को प्रेरणा महावीरप्रसाद जी के निबन्ध "कवियों की उर्मिला" से मिली थी, जिसे द्विवेदी जी ने रवींद्रनाथ टैगोर के एक लेख "काव्य की उपेक्षिताएँ" से प्रभावित होकर अपने इस लेख को "भुजंगभूषण भट्टाचार्या" नाम से सरस्वती में छापा था।
• साकेत शब्द पालि का है जिसका अर्थ होता है अयोध्या।
• शुक्लजी के अनुसार रचना का साकेत नाम रखने के पीछे अयोध्या में होने वाली परिस्थितियों व घटनाओं का ही वर्णन प्रधान है। इसके अलावा शुक्लजी ने मैथिलीशरण गुप्त को "सामंजस्यवादी कवि" की उपाधि दी है।
• "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप देख पाएँगे कि किस प्रकार से शुक्ल जी ने साकेत और यशोधरा दोनों रचनाओं पर गुप्तजी के प्रबंध तत्व की कमी होने पर कुछ आलोचनात्मक अंदाज में अपनी बात रखी है। उनके अनुसार "साकेत" और "यशोधरा" भले ही प्रबन्ध काव्य है परन्तु गुप्त जी की इन दोनों कृतियों में उनकी काव्यात्मक शैली का तो पूरा-पूरा असर दिखा है परन्तु प्रबन्ध की कुछ कमी सी रह गयी है"..।
• ऐसा ही कुछ आलोचनात्मक अंदाज बच्चन सिंह भी रखते हैं। उनके अनुसार "साकेत में गुप्तजी ने पारम्परिक प्रबन्ध काव्य की रूप-पद्धति को तोड़ा है। साथ ही इस प्रबन्ध का नायक साकेत है। इस पर आर्य समाज का भी प्रभाव है।
• बच्चन सिंह के अनुसार इसमें 12 सर्ग है जिसके शुरुआती 8 सर्ग चित्रकूट तक है। 9वां उर्मिला के विरह वर्णन का है। 10वें में उर्मिला सरयू को सम्बोधित करती है। यहाँ भी उर्मिला का विरहवर्णन ही दिखता है जोकि फ्लैशबैक पद्धति पर आधारित है। 11वें सर्ग में लक्ष्मण शक्ति लगने की कथा और 12वें में साकेत निवासी का युद्ध के लिए तैयार होना।
● "हिंदी साहित्य लोचन" अपनी वर्णनात्मकता शैली के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पर हम बच्चन सिंह के शब्दों में आधुनिक आलोचक नंदुलारे वाजपेयी जी का मत है रख रहे हैं। उनका मत है कि " साकेत में महाकाव्य सम्बन्धी नया आदर्श और प्रतिमान स्थिर करने का प्रयत्न जानबूझकर भले ही न किया गया हो, परन्तु महाकाव्य विषयक क्रमागत व्यवस्था और परिपाटी से यह अनजाने ही इतना दूर चला गया है कि आधुनिक युग का नया साहित्यिक परिवर्तन उसे स्वभावतः अपने विकास की प्रारंभिक कड़ी मानकर चलता है"..।
• डॉ नगेंद के अनुसार साकेत "जनवादी काव्य" है।
• बच्चन सिंह के अनुसार माइकेलसूदन दत्त के "मेघनाद वध" में रावण धर्मनिरपेक्ष और विज्ञान तथा टैक्नोलॉजी से युक्त है। राम यहाँ पर नॉन सेक्युलर हैं। राम का चरित्र रावण के आगे हीन है। इस कृति से मैथिलीशरण गुप्त जी का हृदय दुखता है और वह राम को अनार्यो पर आर्यों की विजय का प्रतीक हैं।
गुप्त जी ने माइकेल मधुसूदन दत्त के "मेघनाद वध" का अनुवाद 'मधुप' नाम से किया है। जो अतुकांत रूप में है। इसके बाद कई और रचनाएँ भी इसी नाम से की थी।
● गुप्त जी के प्रबंध काव्य-
1. रंग में भंग - 1909 में राजपूती आन की कथा कही है।
2. किसान 1917 - किसान जीवन के संघर्ष की कथा है।
3. गुरुकुल 1929 - गुरुओं की कथा है।
4. साकेत 1931 - लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला को केंद्र में रखकर लिखा गया है जहाँ उसकी विरहाकुलता को दिखाया है।
5. यशोधर 1932 - नायिका गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा की कथा है।
6. द्वापर 1936 - यशोधरा, राधा, नारद, कंस, कुब्जा आदि कुछ विशिष्ट व्यक्तियों की मनोवृतियों का अलग-अलग मार्मिक चित्रण किया गया है।
7. जयभारत 1952 - महाभारत की कथा है।
8. विकट भट- जोधपुर के राजपूत सरदार की 3 पीढ़ियों तक चलनेवाली कथा है, जिसमें वचन निभाना है।
9. वैतालिक- इसमें गुप्त जी के गीतों का संकलन है।
10. "जयिनी"- मार्क्स की पुत्री "जैनी" पर रचित जयनी नामक काव्यकृति है। जिसमें पूँजीवादी का विरोध हुआ है।
● गुप्तजी की रचनाओं में 3 अवस्थाएँ लक्षित होती हैं"
1. भाषा की सफाई
2. ब्रजभाषा की कविताओं का अनुशीलन
3. अन्य ग्रँथों-पुस्तकों का अनुवाद
● "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर मैथिलीशरण गुप्त जी की रचनाओं सम्बन्धी आचार्य शुक्ल व अन्य विद्वानों के मत पढ़ सकते हैं,जोकि निम्नांकित हैं -
1. शुक्लजी के अनुसार "मैथिलीशरण गुप्त की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण कि क्षमता अर्थात उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्यों प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। इस दृष्टि से हिंदी भाषा जनता के प्रतिनिधि कवि ये निस्संदेह कहे जा सकते हैं"।
2. शुक्ल जी के अनुसार " गुप्त जी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य-प्रणालियों को ग्रहण करने की शक्ति। इस दृष्टि यह निस्संदेह हिंदी भाषी जनता के प्रतिनिधि कवि कहे जा सकते हैं"...।
3. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार " हरिऔध यदि द्विवेदी युग के पहले कवि हैं तो मैथिलीशरण गुप्त जी इस युग के प्रतिनिधि कवि...।
4. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार हिंदी में सबसे ज्यादा प्रबन्ध काव्य मैथिलीशरण गुप्त जी ने ही लिखे हैं। इनके कथानक पौराणिक, ऐतिहासिक हैं। जिसमें नए भावबोध को दर्शाने की कोशिशें की गई है।
5. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार "हिंदी साहित्य में कविता से जन-जागरण का काम यदि किसी ने सबसे ज्यादा किया है तो वो गुप्त जी ने ही किया है"...।
6. अपनी रचना साकेत के लिए इन्हें आधुनिककाल का तुलसी कहा जाता है। साथ ही द्विवेदी युग में इन्हें "हरिगीतिका छंद का बादशाह" कहा जाता है। इन्होंने गीत भी लिखे हैं।
2. "रामनरेश त्रिपाठी"
● इनके काव्यों में श्रीधर पाठक सी स्वछंदता भी मिलती है। इन्होंने ने भी प्रबन्ध काव्य लिखे हैं जिसमें राजनीतिक वातावरण के अनुसार कथा, कल्पना के आधार पर कही है। इसी कल्पना कथा को स्वछंदतावाद कहा गया है।
● रामनरेश त्रिपाठी ने अपने काव्य संग्रह "कविता कौमुदी" को आठ भागों में वर्गीकृत करके 'ग्रामगीतों का संकलन' किया है। जिसमें हिंदी, उर्दू, बंगला, आदि काव्य भाषाओं का आलोचनात्मक अध्ययन है।
• बच्चन सिंह के अनुसार यह हिंदी साहित्य में ग्राम गीतों के संकलन का 'प्रथम प्रयास' था।
• रामनरेश त्रिपाठी के प्रबंध काव्य :-
1. "मिलन" - 1917 में विदेशी शासन से उद्धार हेतु।
2. "पथिक" - 1920 में उपनिवेशवाद से मुक्ति व दक्षिण भारत का वर्णन।
3. "मानसी" - 1927 में राष्ट्रीय कविताएँ हैं।
4. "स्वप्न" - 1929 में विदेशी आक्रमणकारियों से सुरक्षा का भाव व उत्तर भारत का चित्र व्यंजित किया है।
● "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आप रामनरेश त्रिपाठी पर हिंदी के विद्वानों के उक्त कथनों को भी देख सकते हैं-
1. बच्चन सिंह के अनुसार रामनरेश त्रिपाठी दूसरे बड़े स्वछंदतावादी कवि हैं।
2. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "त्रिपाठी जी में जहाँ स्वछंदतावाद का सहज उल्लास है, वहीं भाषा का अनुशासन भी पूरा है"..। इसी के आगे जोड़ते हुए कहते हैं कि " इनकी भाषा पूरी तरह से व्यवस्थित खड़ीबोली ही है, परन्तु महावीरप्रसाद जी जैसी इतिवृत्तात्मक नहीं"..।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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