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Saturday, May 29, 2021

मौत की परछाई

 मौत की परछाईं - यात्रा प्रसंग

असग़र वजाहत


ज़िंदगी में तीन बार मुझे लगा है कि मौत परछाईं की तरह बहुत पास से निकल गयी। आप यह भी कह सकते हैं कि मैं जिंदगी में तीन बार बहुत डरा हूँ। इनमें से एक घटना में बारे में  बताता हूँ।

ये सब घूमने के चक्कर में ही हुआ है। मित्र एस. के. जैन के साथ दो बार नार्थ ईस्ट गया हूँ। घटनाओं और रोमांच से भरी इन यात्राओं के अनेकों प्रसंग है। 

शिलांग में एक- दो ही तीन दिन रहने के बाद हम लोगों को यह लगने लगा कि यहाँ अब देखने लायक कुछ नहीं है। यह शिमला या मसूरी जैसा एक बड़ा पहाड़ी शहर है जहाँ आपको सब कुछ मिल सकता है लेकिन मौलिकता के नाम पर कुछ नहीं बचा। हमने अपनी दिक्कत केंद्रीय हिंदी संस्थान के स्थानीय निदेशक प्रोफेसर तिवारी को बताई तो उन्होंने सलाह दी कि हम अगर मेघालय में कुछ मौलिक देखना चाहते हैं तो हमें उनकी एक छात्रा शैने के साथ उसके कस्बे 'तुरा' जाना चाहिए। 

तुरा जाने के लिए वही हाईवे है जो बांग्लादेश को जाता है। इस हाईवे पर लगभग दिन भर चलने के बाद सुमो एक पतली सड़क पर आई जिसके दोनों तरफ ऐसी हरियाली थी कि तबीयत हरी हो गई। शाम होते होते तुरा पहुँचे और एक होटल में ठहर गए।

मेरे और जैन साहब के बीच कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर के एग्रीमेंट है। उनमें से एक यह है कि हम जहाँ भी जाते हैं और जितना पैसा खर्च होता है उसे हम आधा-आधा बाँट लेते हैं। हिसाब किताब रखने का काम जैन साहब ही करते हैं लेकिन कभी-कभी कुछ मुश्किलें पैदा हो जाती है । मिसाल के तौर पर तुरा में जैन साहब ने खाने का आर्डर दिया, मूंग की दाल और आलू पालक की सब्जी। मैंने आर्डर दिया चिकन करी और सीक कबाब। खाने का बिल आया जिसे आधा-आधा बटना था । 

बिल को जैन साहब काफी देर तक देखते रहे। मैं समझ गया कि बात क्या है।

मैंने कहा, देखो यार अपने बीच जो एग्रीमेंट हुआ है उसी के हिसाब से बिल बाँटा जाएगा। जैन साहब ने कहा - और सब खर्चों में तो ये ठीक है लेकिन ये खाने वाला मामला थोड़ा टेढ़ा है । अभी यही देखो तुम्हारी चिकन करी और सीक कबाब का बिल इतना है कि मैं उससे चार दिन आलू पालक और मूंग की दाल खाता रहूँ तो भी पैसे  खत्म नहीं होंगे।

- हां यह तो तुम ठीक कहते हो... चलो 60-40 कर लेते हैं।

- नहीं यह भी ज्यादा है।

-  तो चलो 70 - 30 कर लेते हैं ।

जैन साहब हंसने लगे।

कहने लगे -  नहीं यार मैं मजाक कर रहा था... 50-50 ही रखते हैं। 

जैन साहब दरियादिल आदमी हैं.... पर कभी-कभी सिद्धांत आड़े आ जाते हैं जिसकी कई कहानियां हैं।

यह तो सुना था कि आत्मनिर्भर गांव हुआ करते थे। लेकिन शैने का घर देखने से पहले यह पता नहीं था कि आत्मनिर्भर घर भी होते हैं। एक पहाड़ की तलहटी में बने शैने के घर में क्या नहीं था। घर के पीछे एक बगीचा था जिसमें जरूरत के फल और सब्ज़ियां लगी हुई थीं। एक तरफ कुछ जानवर पले थे जिनसे बुनियादी जरूरतें पूरी होती थीं। बगीचे के पीछे पहाड़ों से निकले साफ ठंडे  बहते पानी का  स्रोत था जिससे  घर में इस्तेमाल के लिए पानी लिया जाता था।

शैने ने हमें अपनी जीवन शैली के बारे में बहुत कुछ बताया और अपने किचन में तरह-तरह की पत्तियों से बनाए गए अचार दिखाए थे और कुछ दिए भी थे। उससे इलाके के सामाजिक जीवन के बारे में काफी जानकारियां मिलीं।

अगले दिन सुबह गुवाहाटी से हमारी वापसी की फ्लाइट थी। हम सुबह-सुबह सामान लेकर सुमो के अड्डे पहुँचे ताकि शाम तक गुवाहाटी पहुंच जाए और फिर अगले दिन सुबह फ्लाइट ले लें। सुमो के अड्डे पर बताया गया कि आज मेघालय बंद है। बंद की कॉल आतंकवादी गिरोह उल्फा ने दी है। कोई गाड़ी नहीं चल रही ।

हम बहुत परेशान हो गए। कुछ लोगों ने बताया कि एक हेलीकॉप्टर सर्विस है, हो सकता है वह मिल जाए। हम लोग हेलीकॉप्टर स्टेशन गए लेकिन पता चला कि आज वह सर्विस नहीं है। फिर कुछ लोगों ने बताया कि आतंकवादी एंबुलेंस को नहीं रोकते। आप लोगों में से एक मरीज़ बन जाए और दूसरा अटेंडेंट बन जाए तो आप एंबुलेंस से जा सकते  हैं। जैन साहब  मरीज बनने के लिए  फौरन तैयार हो गए । मेरे लिए  अटेंडेंट  बन जाने के अलावा  और कोई चारा न था। हम लोग एंबुलेंस लेने के लिए कई अस्पतालों में गए  लेकिन निराशा हाथ लगी। कोई एंबुलेंस नहीं मिली।

इस पूरी भाग दौड़ में आधा दिन निकल गया था । अब अगले दिन सुबह गुवाहाटी पहुंचना लगभग असंभव लग रहा था। हम लोगों ने  प्रो. तिवारी को शिलांग फोन किया तो उन्होंने कहा कि वे  किसी ड्राइवर को भेज देंगे जो हमें  गुवाहाटी एयरपोर्ट पहुंचा देगा।

एक उम्मीद की किरण जगी। हम सामान बांध कर होटल में बिल्कुल तैयार बैठे थे। लगभग चार बजे ड्राइवर आया और हम लोगों से बोला, फौरन, अभी निकलिए, तुरंत चलिए। जल्दी से जल्दी।' 

हम तैयार थे। सामान लेकर गाड़ी में बैठ गए।

- आप हमें कैसे ले जाएंगे अगर हाईवे बंद है? जैन साहब ने ड्राइवर से पूछा

 ड्राइवर  ने कहा -  मैं कच्चे रास्ते से ले चलूंगा । यह कच्चा रास्ता हाईवे के नीचे जंगल में है।

कुछ देर बाद अंधेरा हो गया। चारों तरफ बिल्कुल सन्नाटा था। जंगल की सांय - सांय भी नहीं सुनाई देती थी। रास्ता दर हकीकत कच्चा था । कहीं किसी तरफ कोई रोशनी न थी। ड्राइवर ने हेड लाइट भी नहीं जलाई थी। फिर भी वह गाड़ी खासी रफ्तार से चला रहा था। शायद रास्ता उसका देखा हुआ था लेकिन फिर भी अंधेरे में इतनी तेज  गाड़ी चलाना खतरे से खाली नहीं था।

- ड्राइवर साहब हेड लाइट क्यों नहीं चला रहे'? जैन साहब ने पूछा।

-  ड्राइवर बोले आप लोग जानते नहीं... यह बहुत खतरनाक रास्ता है... आतंकवादी बांग्लादेश जाने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं ...और उनकी छोटी-छोटी टोलियां इधर उधर रहती हैं.... हेड लाइट जलाते ही उन्हें पता चल जाएगा कि कोई गाड़ी जा रही है।

- इसका मतलब है यह रास्ता 'सेफ' नहीं है।

ड्राइवर बोला -  सर बिल्कुल नहीं है ...वह तो कहिए तिवारी जी के कहने से मैं आ गया........ उनसे मुझे बराबर काम मिलता रहता है...... बड़े बढ़िया आदमी है..... कोई और कहता और दस हजार भी देता तो मैं न आता।

मैंने जैन साहब की तरफ देखा और उन्होंने मेरी तरफ ।हम दोनों  एक दूसरे का चेहरा तो ठीक से नहीं देख पाए लेकिन इतना जरूर पता चल गया कि  स्थिति की गंभीरता का दोनों को एहसास हो गया है।

-  यार यह तो सोचने वाली बात  है।"जैन साहब में कुछ फुसफुसा कर कहा। 

- अब क्या हो सकता है, न तो लौट सकते हैं और न कहीं रुक सकते हैं...जो होना है वह होगा"।

कहने को तो मैंने बहादुरी से यह सब कह दिया था लेकिन अंदर ही अंदर एक  डर समा गया था।

ड्राइवर  बोला -  अगर उन्हें पता चल जाएगा तो बड़ा  लट्ठा डालकर  गाड़ी को रुकवा लेंगे। - - - क्या करते हैं ड्राइवर साहब ....  लूट -  लाट के छोड़ देते हैं?

- नहीं जी कभी-कभी तो  गाड़ी से उतरने भी नहीं देते... पेट्रोल की टंकी खोलकर  आग लगा देते हैं।

- यार हम बुरे फंसे ...अरे फ्लाइट ही छूट जाती न .. दो चार  हजार का नुकसान हो जाता है... चलो ठीक है ....जान पर  तो न बनती ।

- देखो अब यह सब कहने का कोई फायदा नहीं है अब तो बस बैठे रहो।

-  फ्लास्क लाए हो ? 'जैन साहब ने कांपती आवाज में कहा।

- हाँ..ये लो...

कुछ देर बाद जैन साहब गुमसुम हो गए। मैं भी बिल्कुल खामोश हो गया। हमारे बीच बातचीत करने को कुछ न बचा था।

अचानक ड्राइवर ने कहा -   इसी रास्ते पर चलते रहे तो सुबह तक गुवाहाटी न पहुंच पाएंगे।

-  फिर क्या करोगे? मैंने पूछा।

-  आगे से गाड़ी ऊपर चढ़ा देंगे, दो बज चुका है ....हाईवे से निकल चलेंगे...

हाईवे का नाम सुनते ही हमारी सिट्टी पिट्टी और गुम हो गई।

- ले..ले.. लेकिन  हाईवे पर तो ज्यादा खतरा होगा?

ड्राइवर ने कहा -  जैसा आप लोग कहो... ऐसे ही चलते रहे  तो आपकी फ्लाइट छूट जाएगी सुबह तक पहुंच नहीं पाएंगे।

मतलब यह मुश्किल फैसला अब हम लोगों को करना था । जैन साहब इस पक्ष में थे की कच्चे रास्ते पर ही चलते रहें। मेरा यह कहना था कि कच्चे रास्ते पर भी आतंकवादी मिल सकते हैं और हाईवे पर भी मिल सकते हैं । इसलिए क्यों न हम हाईवे  से जाएं.... फ्लाइट मिलने की उम्मीद तो रहेगी।

हम यह बहस कर ही रहे थे कि ड्राइवर ने गाड़ी ऊपर चढ़ाना शुरू कर दी और हम 10 - 15 मिनट में ही हाईवे पर आ गए। यह वही हाईवे है जो बांग्लादेश को जाता है और रात दिन इस पर ट्रैफिक रहता है। बहुत चलता हुआ हाईवे है ।लेकिन इस वक्त मुकम्मल सन्नाटा था। बिल्कुल सन्नाटा था। बहुत डरावना सन्नाटा था। भयानक सन्नाटा था। चीखता  हुआ  सन्नाटा था। हाईवे पर सिर्फ हमारी गाड़ी थी और उसकी रफ्तार  भी सौ से कम न होगी। इतनी तेज रफ्तार के बावजूद लग रहा था कि गाड़ी नहीं चल रही। 

हमें लग  रहा था कि सड़क के दोनों तरफ घने पेड़ों के नीच  फैले अंधेरों में आतंकवादी  छिपे बैठे हैं। लगता था बस  अगले मोड़ पर सड़क के ऊपर लकड़ी के बड़े-बड़े  लट्ठे पड़े होंगे।

गाड़ी की रफ्तार इतनी तेज थी कि अगर एक पत्थर भी पहिए के नीचे आ जाता तो गाड़ी कहीं की कहीं चली जाती ।ड्राइवर पता नहीं किस जुनून में गाड़ी चला रहा था। हम दोनों बिल्कुल चुप थे। मैंने जैन साहब को आवाज दी तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। इतना तो मुझे यकीन था कि वो सो नहीं रहे हैं।

करीब तीन घंटे तक हम लोगों की यही हालत रही। अकेली गाड़ी सुनसान हाईवे पर बेतहाशा भागती रही। हम लोग बिल्कुल चुप इस तरह बैठे रहे जैसे सांप सूंघ गया हो । अचानक हाईवे पर आगे सड़क के किनारे कुछ रोशनी दिखाई दी। कुछ और पास आए तो देखा अर्धसैनिक बलों की गाड़ियां खड़ी है।

ड्राइवर ने कहा - सीआरपीएफ वालों ने कोई चाय का ढाबा खुलवा लिया है।आप लोग चाय पिएंगे ?

हम लोग जैसे एक भयानक  सपने से जाग गए।

हमने फौरन कहा-  पिएंगे।

चाय पीते हुए हम लोगों ने सीआरपीएफ के जवानों से पूछा कि अब आगे तो खतरनाक इलाका नहीं है?

जवानों ने बताया कि आगे ही खतरनाक इलाका है। 

गुवाहाटी एयरपोर्ट एयरपोर्ट नहीं बल्कि हमारी जान लग रहा था। लगता था हमें नया जीवन मिल गया हो।


"असग़र वजाहत" की दिवार से.....।

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