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Sunday, December 27, 2020

हिंदी भाषा : भाग 6

हिंदी भाषा का विकास :-


● राजभाषा विकास से सम्बंधित संस्थाएं:-

 (केन्द्रीय हिंदी समिति) , नई दिल्ली, 1967।

भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा हिंदी का प्रचार-प्रसार करना इसका उद्देश्य है। इसके अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते हैं।


A शिक्षा मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. साहित्य अकादमी, 1954, नई दिल्ली। साहित्य को बढ़ावा देने वाली शीर्षस्थ संस्था।

2. नेशनल बुक ट्रस्ट, 1957, नई दिल्ली।  विज्ञान व साहित्य की पुस्तकें कम मूल्य में देती है।

3. केंद्रीय हिंदी निदेशालय, 1960, नई दिल्ली। शब्दकोश, विश्वकोश, अहिन्दी भाषी पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन करती है।

4. वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, 1961, नई दिल्ली। विज्ञान तथा तकनीकी से जुड़ी शब्दकोश का प्रकाशन करती है।


B ग्रह मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति  :- 

1. राजभाषा विधायी आयोग, 1965-75 ।  केंद्रीय अधिनियमों के  हिंदी पाठ का निर्माण करना।

2. केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, 1971 ।  देश में अनुवाद की सबसे बड़ी संस्था।

3. राजभाषा विभाग, 1975 । संघ के विभिन्न कार्यों के लिए हिंदी के मामले देखने वाली संस्था।


C कानून मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. राजभाषा विधायी आयोग, 1975 । यह संस्था पहले ग्रह मंत्रालय के अधीन थी। प्रमुख कानूनों के हिंदी पाठ का निर्माण करने वाली संस्था।


D सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. प्रकाशन विभाग- 1944

2. फ़िल्म प्रभाग- 1948

3. पत्र सूचना मंत्रालय- 1956

4. आकाशवाणी -1957

5. दूरदर्शन - 1976


● राजभाषा सम्बन्धी विविध तथ्य:-

1. संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव "गोपाल स्वामी आयंगर" ने रखा था जिसका समर्थन "शंकरराव देव" ने किया।

2. संविधान सभा में "हिंदुस्तानी" को 77 और "हिंदी" को 78 वोट मिले थे जिसके आधार पर हिंदी को राजभाषा बनाया गया।


 ● 8वी अनुसूची :- 

संविधान के तहत 8वी अनुसूची में मूल भाषाएँ 14 ही थी परन्तु संविधान के 21वें संशोधन के तहत "सिंधी" को 1967 में जोड़ा गया और 1992 में 71वें संसोधन के तहत "मणिपुरी", "नेपाली", "कोंकणी" को भी जोड़कर इसकी संख्या 18 की गई। 2003 में संविधान के 92वें संसोधन के तहत 4 और भाषाओं को जोड़कर, जिसमें "बोडो" "डोगरी", "मैथिली" और "संथाली" है, उसकी संख्या 22 कर दी गई। 


● हिंदी आंदोलन से जुड़ी साहित्यिक संस्थाएं:-

1. नागरी प्रचारिणी सभा - काशी - 1893 ई.

2. हिंदी साहित्य सम्मेलन - प्रयाग - 1910 ई.

3. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा - मद्रास - 1918 ई.

4. गुजरात विद्यापीठ - अहमदाबाद - 1920 ई.

5. बिहार विद्यापीठ - पटना - 1921 ई.

6. हिंदुस्तानी एकेडमी - इलाहाबाद - 1927 ई.

7. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा - 1927 ई.

8. हिंदी विद्यापीठ - देवघर - 1929 ई.

9. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति - वर्धा - 1936 ई.

10. महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा - पुणे - 1937 ई.

11. बम्बई हिंदी विद्यापीठ - 1938 ई.

12. असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति - गुवाहाटी - 1938 ई.

13. राष्ट्रभाषा सभा, पुणे- 1945 ई.

14. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद - पटना - 1951 ई.

15. अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ - नई दिल्ली - 1964 ई.

16. नागरी लिपि परिषद - नई दिल्ली - 1975 ई.

 17. केरल हिंदी प्रचार सभा - त्रिवन्तपुरम।


 ●विश्व हिंदी सम्मेलन :- 

यह भारत सरकार के "विदेश मंत्रालय" के तहत और जिस देश में यह कार्यक्रम होता है उस देश की सरकार के सहयोग से कराया जाता है। 

• उद्देश्य - UNO की भाषाओं में हिंदी का प्रचार करना और स्थान दिलाना।


विश्वभर में हुए हिंदी सम्मेलनों की सूची:-

1  जनवरी 10-14 तक, 1975-  भारत- नागपुर- अध्यक्ष तत्कालीन मॉरीशस के राष्ट्रपति "शिवसागर राम गुलाम"।

2. अगस्त 28-30 तक, 1976- मॉरीशस- पोर्ट लुई ।
3. अक्टूबर 28-30 तक, 1983- भारत- नई दिल्ली ।
4. दिसम्बर 2-4 तक , 1993- मॉरीशस- पोर्ट लुई ।
5. अप्रैल 4-8 तक, 1996- पोर्ट ऑफ स्पेन ।
6. सितम्बर 14-18 तक, 1999-लन्दन-ब्रिटेन ।
7. जून 5-9 तक, 2003- पारामारिबो- सूरीनाम ।
8. जुलाई 13-15 तक,  2007- न्यूयॉर्क- अमेरिका ।
9. सितंबर 22-24 तक, 2012- जोहान्सबर्ग- साउथ अफ्रीका ।
10. सितंबर 10-12 तक, 2015- भोपाल- भारत ।
11. अगस्त 18-20 तक, 2018- मॉरीशस -पोर्ट लुई ।


● अन्य जानकारी :- 

1. भाषा :- भाषा संस्कृत के शब्द "भाष" धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्यक्त वाणी । मूलरूप से और भाषा के मानक रूप में "भाषा" उसे कहते हैं जो व्यक्त वाणी के रूप में अभिव्यक्त की जाती है।

2. उपभाषा :- अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और उसके प्रयोग क्षेत्र का विस्तार हो जाता है तो वह बोली न रहकर "उपभाषा" बन जाती है।

3. बोली :-  एक छोटे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा "बोली" कहलाई जाती है। यहाँ पर भाषा शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि बोली भी भाषा की तरह एक माध्यम  है जिसके आधार पर हम अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं। इसके साथ ही यह भी भाषा की एक अभिन्न इकाई है।इसका क्षेत्र सीमित होता है।

4. सम्पर्क भाषा :- भोलानाथ तिवारी के अनुसार जो भाषा अन्य लोगों से संपर्क के काम आए वह भाषा "संपर्क भाषा" कहलाती है।

5. मानक भाषा : - मानक का अभिप्राय है "आदर्श, श्रेष्ठ या परिनिष्ठित" से है। भाषा का जो रूप उसके प्रयोक्ताओं के अतिरिक्त अन्य भाषा-भाषियों के लिए आदर्श होता है, जिसके माध्यम से उस भाषा को सीखते हैं, जिस भाषा रूप का व्यवहार पत्राचार, शिक्षा, सरकारी कामकाज एवं सामाजिक- सांस्कृतिक आदान-प्रदान में समान स्तर पर होता है वह भाषा का "मानक रूप" कहलाता है।

हर मानक भाषा का अपना एक समय और रूप रहता है जो उसे साहित्यिक रूप में दर्शाता है। चाहे वह अपभ्रंश हो, ब्रज, अवधी या खड़ीबोली हो। जब यह आम बोलचाल से हटकर विशेषपन को ग्रहण करती है, जोकि सीमित दायरे और नियमावली के तहत कार्य करती है।

आज हम जिस हिंदी के मानक रूप को पहचानते हैं वह खड़ीबोली के रूप में हिंदी कही जाती है। इस भाषा को मानकीकृत करने में बहुत से लोगों, संस्थाओं, पत्रिकाओं आदि का लंबा योगदान रहा है। जैसे फोर्ट विलियम कॉलेज से प्रक्रिया शुरू होना और फिर "शिवप्रसाद" सितारे हिंद , "लल्लू लाल" , "भारतेंदु मंडल" , "महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती" का अहम योगदान आदि। उसके बाद यह मानकीकृत प्रक्रिया समय- समय पर और तेज होती गई जोकि सिलसिलेवार ढंग से आज भी चल रही है।

6. भारतीय हिंदी परिषद-  भाषा के सर्वांगीण मानकीकरण का प्रश्न सबसे पहले 1950 में "इलाहाबाद विश्वविद्यालय" के हिंदी विभाग ने उठाया। डॉ धीरेंद्र वर्मा, हरदेव बाहरी, और डॉ माताप्रसाद गुप्त आदि इसके सदस्य थे। धीरेंद्र वर्मा ने देवनागरी लिपि चिन्हों में एकरूपता, हरदेव बाहरी ने वर्ण विन्यास की समस्या, माताप्रसाद गुप्त ने हिंदी शब्द भंडार विषय पर अपने मत प्रस्तुत किये।

7. केंद्रीय हिंदी निदेशालय :-  इसकी स्थापना 1960 में हुई थी और इस संस्था ने देवनागरी लिपि के मानकीकरण के लिए "देवनागरी लिपि" तथा "हिंदी वर्तनी का मानकीकरण" 1983 में प्रकाशन किया।

8. हिंदवी, हिंदुई :- मध्यकाल में मध्यदेश के हिंदुओं की भाषा, जिसमें अरबी- फारसी शब्दों का अभाव है। सर्वप्रथम "अमीर ख़ुसरो" ने देशभाषा को हिंदी या हिंदवी कहा। जिसका उदहारण हमें उनके हिंदी-फ़ारसी शब्दकोष "खालिकबारी" में 30 बार हिंदवी और 5 बार हिंदी के इस्तेमाल होने से पता चलता है।

9. भाखा/भाषा :- विद्यापति, कबीर, तुलसी, केशवदास आदि ने हिंदी देशभाषा के लिए "भाखा" का प्रयोग किया है। फोर्ट विलियम कॉलेज के अध्यापकों के लिए भी भाषा मुंशी या भाखा मुंशी शब्द इस्तेमाल होता रहा है।

10. हिंदुस्तानी :- हिंदी-उर्दू मिश्रित व आमजनता द्वारा इस्तेमाल शब्दों की भाषा का नाम हिंदुस्तानी है। यह नाम अंग्रेज़ो ने दिया था क्योंकि उन्हें तत्कालीन समय में एक यही भाषा सबसे सुलभ और प्रशासन जमाये रखने के नज़र से सही लगी होगी। जिससे हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजों पर वर्चस्व  रखा जा सके और उनसे संपर्क भी बनाया जा सके।

11.  हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान:- "प्रतापनारायण मिश्र" जी ने यह नारा दिया था कि हिंदी ही हिंदुस्तान और हिंदुओं की भाषा है।

12.  उर्दू :- आज के समय में उर्दू उसे कहा जा रहा है जो मुसलमान की भाषा है और फारसी में लिखी जाती है। परंतु इसका इतिहास केवल यही नहीं। हिंदी और उर्दू यह दोनों ही भाषाएँ अपने वर्तमान समय में खड़ीबोली से निकली हुई भाषाएँ हैं जो कुछ शब्दों और व्याकरणिक नियमावली के चलते कुछ हदतक पृथक हैं। विद्वान इसे "आपसी बहनों का रिश्ता" कहते हैं।

"उर्दू" खड़ीबोली की वह शैली है जिसमें अरबी फारसी के शब्द कुछ अधिक हैं।

उर्दू की प्रथम पुस्तक "बानो बहार" है जो 18वी शती में लिखी थी।

13.  दक्खनी :- मध्यकाल में दक्कन के मुसलमानों द्वारा लिखी गयी हिंदी "दक्कनी या दक्खिनी" कहलाई गयी।

दक्कनी को उत्तरी भारत मे लाने का श्रेय "शायर वली दक्कनी" को जाता है जिन्होंने मुगलकाल में दक्कनी को उत्तरी भारत में लाकर इसे लोकप्रिय बनाया।
  
14. रेख़्ता  :- रेख़्ता का शाब्दिक अर्थ है- गिरा हुआ। जिस प्रकार से संस्कृत को सरल बनाकर प्राकृत भाषा अस्तित्व में आई उसी तरह से अरबी फारसी को सरल करके "रेख़्ता" का रूप सामने आया।

 उर्दू-फ़ारसी-अरबी के बोलचाल के शब्द रूप को "रेख़्ता" कहा जाता है। जिसे शुरू में हीन दृष्टि से देखा जाता था पर बाद में कई शायरों ने इस भाषा का इस्तेमाल किया।

धीरेंद्र वर्मा रेख़्ता को "उर्दू की नवीन शैली" कहते हैं।

●भारत में रेख़्ता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग छंद और संगीत के क्षेत्र में हुआ। 

18वी से लेकर 19 शती तक यह भाषा उर्दू के लिए इस्तेमाल हुई। बाद में इसका एक अलग अस्तित्व कायम हुआ जब बड़े बड़े शायरों ने इसमें गजलें गाना शुरू किया और वह आम जनता से जुड़े।

15. जनभाषा, देसीभाषा, आमभाषा, बोलचाल की भाषा, भाखापन, लोकल भाषा  ये सभी एक दूसरे की पर्याय हैं। जिसका अर्थ है साहित्य की भाषा, राजभाषा,  परिनिष्ठित भाषा, मानक भाषा, आदि से इतर। जो किसी भी क्षेत्रीयता को दर्शाती है। यह भाषा जनता अपनी सुविधानुसार आसन शब्दों के माध्यम से , गाँव- देहात में प्रयोग शब्दों से अपना वैचारिक आदान प्रदान करती है।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।






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