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Sunday, June 27, 2021

उपन्यास भाग -3

 

        (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. पांडेय बेचैन शर्मा 'उग्र' :-

 'उपन्यासकार अश्क',  पृ 184 में जोकि 1960  में प्रकाशित हुई थी उसके अनुसार 'उग्र जैसा लेखक नारी के विषय मे थोड़ा असंवेदन शील और रूढ़िवादी हो गया है। वह अपने उपन्यास "जीजीजी" पृ128 में कहते हैं :- " बाहर स्त्री घूमेगी तो पुरुष से उसे खतरा रहेगा, बात-बात में गर्भ करने और रक्त माँस से स्वतंत्रता का मोल चुकाने का"...। इसी के प्रतिवाद में 'जीजीजी' कहती है कि :- " कुल मिलाकर मुझे मालूम पड़ा है कि उत्तमतम नारी के लिए मानव-समाज में व्यभिचारी पुरुष की अंक शायिनी बनने के सिवा और कोई गति नहीं..पृ 47' ।  ऐसा माना जाता है कि जीजीजी का व्यक्तित्व जो ऐसा बना है वह सदियों से पीड़ित होकर निराशावादी और नियतिवादी हो गयी है।

माना जाता है कि प्राकृतवादी उपन्यासों अर्थात नग्न-दृश्य उपन्यासों का जनक "जोला"  है। उनका मत है कि जीवन के गंदे से गन्दे और कुरुप चित्र खींचे...।

2. उपेन्द्रनाथ अश्क़ :-  

अश्क ने मध्यवर्ग पर मूल रूप से लेखन किया है। अश्क़ जी के प्रसिद्ध उपन्यास व उनकी कथावस्तु -

"गिरती दीवारें" 1947 में, जलंधर के "चेतन" नामक की कथा है जो निरन्तर  समाज में बिना किसी ठोस आधार के भटकता रहता है। (आजीविका के लिए काम नहीं मिलता )। चेतन उसी कमज़ोर दीवार की तरह है जो दिन -दिन झड़ कर गिरती रहती है।

"शहर में घूमता आईना" 1963 में , उपन्यास  "गिरती दीवारे" की कथा को आगे लेके चलता है। घटनास्थल भी जलन्धर ही है और पात्र भी वही। 

बच्चन सिंह के अनुसार लेखक के "गिरती दीवारें", "शहर में घूमता आईना" और "बाँधो न इस ठाँव बंधु" 'गाल्सवर्दी' के सागा उपन्यासों से अभिप्रेरित हैं। 

3. जैनेन्द्र कुमार :- 

बच्चन सिंह के अनुसार जैनेंद्र हिंदी के पहले आधुनिकतावादी कथाकार हैं।

बच्चन सिंह के अनुसार "परख" 1929 में आया उपन्यास में उसका "प्रेम अशरीरी और प्लेटोनिक" है।

"त्यागपत्र" 1937 में आया नारी की सीमित जिंदगी व अन्य समस्याओं, वर्जनाओं से सम्बंधित है। जहाँ वह खुलकर भी अपना जीवन यापन नहीं कर पाती। समाज की बनी-बनाई परिपाटी जोकि रुढियों सी प्रतीत होती है उसके अनुसार जीने को मजबूर है। जिसके पीछे झूठी सामाजिक मर्यादा का आवरण ढका पड़ा है।

4. इलाचन्द्र जोशी :-  

जोशी जी पर फ्रायड, युंग और एडलर का विशेष प्रभाव पड़ा है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-

"घृणामयी" 1929 में प्रकाशित, जो अब 'लज्जा' नाम से प्रकाशित है उसमे आधुनिक शिक्षाप्राप्त नारी की काम- चेष्टाओं को दिखाया गया है। इस प्रकार जोशी जी ने अपने मनोविश्लेषणवाद का परिचय दिया है।

" सन्यासी" 1940 में आत्मकथात्मक शैली में लिखा उपन्यास है। जहाँ अंत मे "नंदकिशोर" अपने आप को सन्यासी बनाकर देशभक्ति करने लग जाता है।

"पर्दे की रानी" 1942 में नायिका "निरंजना" खूनी पिता और वैश्या माता की पुत्री का पता चलने पर वह हीन भावना से ग्रसित होने लग जाती है और समाज से घृणा करने लगती है।

"प्रेत और छाया" 1944 में नायक "पारसनाथ" को पता चलता है कि उसकी माँ वैश्या है और उसे समस्त नारी जाति से घृणा होने लग जाती है।

" जहाज का पंछी" 1954 एक शिक्षिक नवयुवक की कथा का वर्णन करता है। जो कलकत्ता में काम ढूंढने की तलाश करता हुआ कई तरह के कामो में अपना संघर्षशील परिचय देता है।

"कवि की प्रेयसी" 1976 कालिदास के द्वारा "मालविकाग्निमित्रम" नाटक में उल्लिखित कवि सौमिल्लिक के जीवन की काल्पनिक सृष्टि की है।

5. सचिदानंद हीरानंद वात्स्यायन -'अज्ञेय' :- 

हिंदी साहित्य की  मनोवैज्ञानिक औपन्यासिक परम्परा में जितनी ख्याति महाकवि अज्ञेय को मिली है उतनी शायद दूसरे किसी को नहीं। इनका मनोवैज्ञानिक अध्ययन बहुत गूढ़ अर्थों में छिपा रहता है जिसके लिए पाठक को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। अज्ञेय का सबसे प्रसिद्ध व पाठकप्रिय उपन्यास 'शेखर - एक जीवनी' रहा है जिसे तरह-तरह की प्रशंसा के साथ आलोचकीय लेखों व तंज का भी सामना करना पड़ा है। माना जाता है कि कोई भी रचना तभी उच्चतम सफलता हासिल करती है जबकि उसकी कमी व खूबियों पर जितना हो सके लिखा-पढा-बोला जाए, विचार विमर्श किया जाए, बहस की जाए। इस अर्थ में शेखर - एक जीवनी उच्चतम सफलता हासिल कर पाती है 

 "शेखर-1 जीवनी " 1941 पर "रोमा रोला" पाश्चत्य लेखिका के "जॉन क्रिस्टॉफ " का प्रभाव स्प्ष्ट है, जिसे लेखक स्वीकार भी करता है। इस बात की पुष्टि अज्ञेय ने अपने "आत्मनेपद" निबन्ध संग्रह के पृ 64 पर भी करी है।

शेखर-एक जीवनी पर विद्वानों के मत :-

• इस रचना को डॉ. नगेन्द्र 'प्रकाशमान पुच्छल तारा' कहते हैं।

• निर्मल वर्मा को यह उपन्यास अपने जीवन की कथा से प्रतीत होता है। जो उन्होंने 2002 की पुस्तक वार्ता में कहा था।

• मैथिलीशरण गुप्त को यह 'नैतिकता और मर्यादा के विरुद्ध' लगा है।

• रामविलास शर्मा शेखर को 'एक कट्टर सोवियत संघी, मार्क्सवादी, मानवद्रोही, नारी से करुणा की भीख मांगने वाला, आत्मपीड़ा का अभिनयकर्ता, निक्कमा, कुंठावाद का प्रतीक आदि कहते हैं।'

"नदी के द्वीप" 1951 में यौन-भावना प्रधान उपन्यास है। बच्चन सिंह के अनुसार " यह प्रेमाख्यान नहीं कामाख्यान है: आधुनिक बौद्धिक और अदिवतीय"...।

"अपने-अपने अजनबी " 1961 में अस्तित्ववाद का प्रभाव स्प्ष्ट देखा जा सकता है। बच्चन सिंह के अनुसार इसमें अस्तित्ववाद का खंडन किया गया है।                                

6. डॉ. देवराज:-  

हिंदी साहित्य की औपन्यासिक विधा के मनोवैज्ञानिक रचनाओं में देवराज का नाम भी बड़े आदर के साथ याद किया जाता है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -

"पथ की खोज" 1951 मध्यवर्गीय परिवार में आने वाली समस्या का मनोविश्लेषण चित्रण है। जिसमेे वह समाधान ढूंढ रहे हैं।                                        

7. यशपाल :- 

हिंदी उपन्यासों में मार्क्सवादी दृष्टिकोण सम्बन्धी उपन्यास लिखे जाने वालों में यशपाल का नाम सर्वोपरि लिया जाता है। यशपाल ने क्रांतिकारी जीवन व्यतीत किया था और देश भ्रमण भी। वह मार्क्स के पक्के समर्थक थे। इसी आधार पर उनकी रचनाओं में मार्क्सवाद खुलकर आता है 

रामविलास शर्मा उन पर 'भाभीवाद होने का आरोप' लगाते हुए कहते हैं कि" जैनेंद्र जी ने "सुनीता" से जो भाभीवाद शुरू किया था, यशपाल ने वही सूत्र "दादा कामरेड" में पकड़ लिया है। 

• इनके प्रसिद्ध उपन्यास इस प्रकार हैं -

"दादा कामरेड" 1941 से हिंदी उपन्यास में 'पहली बार रोमांस के साथ राजनीति' भी आई है।    

"देशद्रोही" 1943 में कम्युनिस्ट पार्टी की उस गलत नीति के समर्थन में लिखा गया था जिसके तहत पार्टी ने कांग्रेस के "भारत छोड़ो" आंदोलन के विरुद्ध विश्वयुद्ध में रूस के शामिल हो जाने के कारण अंग्रेज़ो की मदद की थी।                 

"दिव्या" 1945 में लेखक ने प्राचीन कथानक उठाकर नारी हित की बात की है।

हिंदी साहित्य के अंतर्गत यशपाल की ख्याति का आधारस्तम्भ उनका उपन्यास झुठासच है जिसमें देश विभाजन का दंश मौजूद हैं। यह 2 भागों में विभाजित है जिसका प्रथम अंश 'देश और वतन' 1958 में आया था और दूसरा अंश 'देश और भविष्य ' 1960 में। इसके दूसरे भाग में पाकिस्तान से आये हुए शरणार्थियों की समस्याओं को केंद्र में रखकर नए आर्थिक, समाजिक, राजनीतिक संकटो को उठाया है।


"मेरी तेरी उसकी बात" 1974 में 1919 से लेकर 1945 तक कि राजनीतिक घटनाओं और इस अवधि की शिक्षित जनता और राजनीतिक दलों का जो प्रभाव पड़ा उसका विवेचन भी किया गया है।

8. नागार्जुन :- 

नागार्जुन की विशेषता मिथिला की धरती की गंध, गाँवों के दुखियों, निरीहों, उपेक्षित के प्रति सहानुभूति है। वह समाज के कुम्भीपाक (नरक) को समाप्त कर देना चाहते हैं। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -

"रतिनाथ की चाची" 1948 एक कुलीन किंतु विधवा नारी की करुण कहानी है। जिसमें मिथिला के सामाजिक जीवन के अंतरर्विरोधों को दिखाया गया है।

"बलचनमा" 1952 परिश्रमी और ईमानदार किसान के प्रति अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष की गाथा है।

"नई पौध" 1953 अंसगत विवाह की समस्या को केंद्र में रखकर लिखा है।

"बाबा बटेसरनाथ" 1954 में  बरगद के पेड़ को बचाने के लिए  "जैकिशन" और अन्य लोग निरन्तर विरोध कर रहे हैं।

" वरुण के बेटे" 1957 मछुआ संघ की स्थापना होती है।जिसमे "गढ़ हमार पोखर ह" का नारा बुलंद होता है।

" कुंमभीपाक" 1960 में ऐसे समझदार लोगो की कल्पना की गई है जहाँ कोइ भी किसी को धोखा नही देता और किसी तरह की बेबसी का फायदा उठाता है।"जहाँ पुरुष ज्ञान है तो स्त्री शक्ति है"......।

"इमरतिया" 1968 में बिहार के उत्तरी भाग में जमींदारों और व्यापारियों द्वारा तस्करी की सुविधा के लिए स्थापित जमनिया मठ होने वाले भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया है।

"पारो" 1975 खड़ीबोली में मैथिली के 1946 से रूपांतरित हुआ है। इसमें बाल विवाह जैसी कुरीति की वेदी पर अपना ओरा जीवन होम करने देने वाली युवती की कथा है।

"गरीबदास" 1979 में अंतिम उपन्यास है जिसमें स्वतंत्र भारत के ग्रामीण जीवन के सामाजिक आर्थिक अंतर्विरोधों को उजागर किया है।

                                                       

9. रांगेय राघव :- यह भी मूलतः मार्क्सवादी रचनाकार हैं। जिनके उपन्यासों का कथानक इस प्रकार है -

मुर्दो का टीला- 1948, सिन्धु घाटी की सभ्यता

चीवर -1951, हर्षकालीन बौद्ध धर्म का उत्थान

कब तक पुकारू -1951, राजस्थान के करनटो का जीवन

बन्दूक और बीन- 1957,  युद्ध की समस्या का वर्णन

धरती मेरा घर         राजस्थानी लोहापीटो की कथा

                                                   

                                                      

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


"हिंदी साहित्य लोचन" sahitya hindi lochan.blogspot.com पर आने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आप इसी तरह से "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आते रहे और हिंदी साहित्य से सम्बंधित अन्य तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी यहाँ पाते रहें।

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उपन्यास भाग -2

   

                             (उपन्यास)


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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. प्रेमचंद :-

प्रेमचंद का कथा साहित्य गाँधी के सत्य-अहिंसा की जीवन प्रणाली का प्रबल समर्थक है। उनमें आर्य समाज की तार्किकता, गाँधी की विनयशीलता और तिलक की तेजस्विता का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने नशाखोरी दूर करना, स्त्रियों की उन्नति, अस्पृश्यता निवारण, दहेज प्रथा खत्म करना, बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य-सफाई, किसान-मजदूरों के लिए बहुत सा काम किया है।

प्रेमचंद के उपन्यास कला की महत्ता हजारीप्रसाद जी सिद्ध करते हुए कहते हैं कि" यदि आपको उत्तर भारत की सारी जनता के आचार विचार, भाषा, भाव, रहन-सहन, आशा-आकांशा, दुख-सुख और सूझबूझ जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद के उपन्यासों से उत्तम परिचायक कहीं ओर नहीं मिलेगा"...।

विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार ' प्रेमचंद के उपन्यासों में सभी वर्ग सिमट आये हैं। इन पर गाँधी का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है परन्तु गोदान तक आते आते उनका यह गाँधीवादी प्रभाव व आदर्श रूप टूटता हुआ नजर आता है और वह उससे मुक्त होकर मूलतः यथार्थवादी बन जाते हैं इसलिए गोदान अंततः दुखांत उपन्यास है..।'


● प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यास :-

• "सेवासदन" 1918 में प्रकाशित उपन्यास में वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ कथानक को दिखाया गया है। विश्वनाथ त्रि. के अनुसार प्रेमचंद का ऐसा मत है कि " सवर्ण वर्ग में स्त्रियों का ज्यादा शोषण होता है क्योंकि वहाँ पुरुषों पर आर्थिक स्थिति से निर्भर रहना पड़ता है। मुख्यतः इस रचना में वैश्यावृत्ति की समस्या को उभारा गया है।

इस उपन्यास की महिला पात्र "सुमन" है जिसके माध्यम से पहली बार हिंदी उपन्यास में स्त्री का पुरुषों पर आश्रित होना यह बात समझती है और उसके विरुद्ध खड़ी होती है।

बच्चन सिंह इसे "हिंदी का बेहतरीन नॉवेल" की संज्ञा देते हैं।

• "प्रेमाश्रम" 1922 और "रंगभूमि" 1925 में किसान जीवन को उभारा है कि 'वह अपनी जमीन के लिए कितनी आत्मीयता रखता है। ब्रिटिश साम्राज्य, बड़े व्यापारी, जमींदार आदि किसानों को तरह-तरह की यातना देकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देते हैं। और यह किसानी जीवन किस तरह से मजदूर बनकर अंततः मृत्यु को प्राप्त हो जाता है जिसका जीता जागता प्रमाण "गोदान" 1936 में और उसका मुख्य पात्र (नायक) "होरी" है।

"प्रेमाश्रम" गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित है जिसमें हृदय परिवर्तन के साथ रामराज्य स्थापित करने की कल्पना भी शामिल हैं। बच्चन सिंह के अनुसार "प्रेमाश्रम" हिंदी का पहला "राजनीतिक उपन्यास" है और इस पर बोल्शेविक क्रांति का भी प्रभाव है...।

"रंगभूमि" का "सूरदास" पूँजीपतियों से सीधा संघर्ष करता है।

• "कायाकल्प" 1926 में अलौकिक और अतिरंजनापूर्ण परम्परा से जुड़े प्रसंगों को दिखाया है जैसे बाबाओं के चमत्कार, पूर्वजन्म की कल्पना, वृद्धा को तरुणी में बदली करना आदि।

• "निर्मला" 1927 में अनमेल विवाह की समस्या को लेकर खड़ा हुआ है।

• "गबन" 1930 में गहनों की चोरी के माध्यम से मध्यवर्ग की स्थितियों की कमजोरियों का पर्दाफाश किया है। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बाद भी झूठे ऐशो आराम, टीम टाम दिखाना इस वर्ग की कमजोरी है।

• "कर्मभूमि" 1933 में आया उपन्यास प्रेमाश्रम की अगली मंजिल है जिसमें न केवल किसान बल्कि छात्र, मजदूर, मध्यवर्ग, हिन्दू-मुस्लिम, गरीब-धनी सभी वर्ग के लोग शामिल हैं। 1930 कि असहयोग आंदोलन में विभिन्न वर्गों , जातियों, धर्मो के लोगों की सम्मिलिति थी। 1928 में किसान-मजदूर पार्टी की स्थापना हो चुकी थी और इसी वर्ष बारडोली का लगान-बन्दी आंदोलन भी शुरू हो चुका था। इस देशव्यापी आंदोलन की औपन्यासिक अभिव्यक्ति "कर्मभूमि" में हुई है।

• "गोदान" 1936 में प्रेमचंद गाँधीवाद से मुक्त हो जाते हैं क्योंकि उन्हें अब लगता है कि केवल आदर्शवाद से काम नहीं चलेगा, समाज को बदलने के लिए यथार्थ को दिखाना आवश्यक है। देश के किसानों से सीधा साक्षात्कार "गोदान" भारतीय किसानों का मर्मस्पर्शी, करुण और त्रासद दस्तावेज़ बन जाता है। 

"गोदान" किसान जीवन का इतना मर्मस्पर्शी और यथार्थवादी उपन्यास होने का प्रथम उपन्यास नहीं है। इससे पूर्व उड़ीसा के फ़कीरमोहन सेनापति ने 1847 में "छमाड आठ गुंठ" (छह बीघा जमीन) में किसान जीवन समस्या उठायी थी।

प्रेमचंद में किसानी जीवन को दिखाने के लिए किसानी भाषा का प्रयोग किया है।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "तुलसीदास की पारिवारिक इकाई की अवधारणा गोदान के होरी में भी दिखती है जो मरजाद के कारण अतिवादी नहीं होता"..। परन्तु हम देखें तो यही अतिवादी या विद्रोही प्रवृति का न होना उसकी दुर्गति का कारण बन जाती है क्योंकि प्रेमचंद खुद भी इस बात को महसूस कर चुके थे कि अब केवल आदर्श की लाठी के सहारे समस्याओं का निवारण नहीं किया जा सकता। कुछ ठोस कदम भी उठाने होंगे। इसके आगे चतुर्वेदी कहते हैं कि "गोदान का रचना संतुलन ऐसा बेजोड़ है कि उसमें अनवरत संघर्ष, करुणा, सहानुभूति और ट्रैजिक अंत के बावजूद कहीं किसी एक के प्रति कड़वाहट नहीं आती, गहरा असंतोष उमड़ता- घुमड़ता है तंत्र के प्रति"...।

रामस्वरूप के अनुसार गोदान में "गाँधी और मार्क्स को जैसे प्रेमचंद ने फेंट कर मिलाया है"..।

विश्वनाथ त्रि. के अनुसार "प्रेमचंद की भाषा न तो किताबी उर्दू है और न ही किताबी हिंदी है, वह सहज हिंदी भाषा है"...।

                                                             

2. विशम्भरनाथ कौशिक :-

" भिखरिणी" 1929 में अंतरजातीय विवाह की समस्या उठायी है।"जस्सो" और "रामनाथ" के प्रेम की स्मृति को सँजोया  है।   

3. शिवपूजन सहाय :-

"देहाती दुनिया" 1926 में लेखक कहते हैं:- " मैं ऐसी ठेठ देहात का रहने वाला हूँ, जहाँ इस युग की नई सभ्यता का धुँधला प्रकाश ही आता है।जहाँ केवल 2 ही चीजें प्रत्यक्ष देखने में आती है- अज्ञानता का घोर अंधकार और दरिद्रता का तांडव नृत्य"..। (भूमिका से)

4. भगवतीप्रसाद वाजपेयी :-

"पतिता की साधना" 1936 बालविधवा "नन्दा" के जीवन पर आधारित है। विधवा विवाह का समर्थन करना ही कथा का उद्देश्य है।

5. सियारामशरण गुप्त :-

"अंतिम आकांशा" 1932 में गाँधीवादी दर्शन "हृदय परिवर्तन" से प्रभावित उपन्यास है। 

6. प्रतापनारायण श्रीवास्तव)

"विश्वास की वेदी" , "वंचना" , "व्यावर्तन" उपन्यासों में चीनी आक्रमण और उसके विश्वासघात की कथा पर आधारित है।

"बयालीस" 1947 जनक्रांति 1942 से जुड़ा है।

"विहान" 1857 की क्रांति को केंद्र में रखकर लिखा है।

"बेकसी का माजरा" 1957 में अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफ़र को केंद्र बनाकर स्वतंत्रता संग्राम को दिखाया गया है।

                                    

7. अमृतलाल नागर :-

" बूंद और समुन्द्र" 1956 में अहिंसावादी, मानवतावादी आदि पूरी तरह से गांधी दर्शन का प्रभाव दिखाया है। जहाँ वह कहते हैं:- "सुख-दुख में व्यक्ति का व्यक्ति से अटूट सम्बन्ध बना रहे - जैसे बूँद से बूँद जुड़ी रहती है और  लहरों से लहरें , जिससे समुन्द्र बनता है"।

"शतरंज के मोहरे" 1959 में अवध की नवाबी के हरासोन्मुखी काल का वर्णन है।

" अमृत और विष" 1966 में मानव जीवन के गुण-दोष को दिखाया गया है।

"अग्निगर्भा " 1983 में दहेज की समस्या को दिखाया है.

    

8. विष्णु प्रभाकर :-

" अर्धनारीश्वर" 1992  में समाज के लगभग सभी वर्गों की स्त्रियों को बलात्कार- सहित उनकी यातनाओ को दिखाया गया है"।         

 

9. उदयशंकर भट्ट :-

"सागर लहरें और मनुष्य" 1956 में बम्बई के बरसोवा क्षेत्र के मछुआरों का जीवन दिखाया गया है।                                                            

10. प्रसाद :- 

"कंकाल" 1929 में आया लेखक का उपन्यास सामाजिक विकृतियों को उभारने में सफल हुआ है।

"तितली " 1934 में बच्चन सिंह के अनुसार किन्ही अंशो में प्रेमचंद की परंपरा का उपन्यास है। यह एक आदर्शपरक रचना है जिसमें ढहती हुई सामंती व्यवस्था, जमींदारी प्रथा की दुर्बलता, ग्रामीण समाज किस सरलता और स्वार्थ वृति, सम्मिलित कुटुंब की विकृतियां, त्यौहार के उत्सव चित्र आदि है, परंतु यह कथा गौण है। मुख्य कथा भारतीय जीवन दृष्टि को लेकर चलने वाली तितली और पश्चिमी दृष्टि को लेकर चलने वाली शिला की टकराहट है। इसमें भारतीय नारी जीवन की विजय होती है।

बच्चन सिंह के अनुसार " तितली कामायनी की श्रद्धा है और शैला चन्द्रगुप्त मौर्य की कार्नेलिया...।"

तितली शैला से कहती है " तुम धर्म के बाहरी आवरण में ढंककर हिन्दू स्त्री बन गई हो किंतु उसकी संस्कृति की मूल शिक्षा भूल रही हो। हिन्दू स्त्री का श्रद्धापूर्ण समर्पण उसकी साधना का प्राण है...।"


11. भगवतीचरण वर्मा :-

"चित्रलेखा" 1934 में पाप और पुण्य की समस्या और उसके समाधान को लेकर उतरा है। इसमें भोग को सर्वथा अनैतिक और त्याग को सर्वथा नैतिक नहीं माना है। कहा गया है कि" न ही कोई चीज पाप ह और न ही कोई चीज पुण्य। परिस्थितियों से ही एक कृत्य किसी को पाप और किसी को पुण्य लग सकता है"..।

"टेढ़े-मेढ़े रास्ते"1946 उपन्यास में गांधी,आतंकवाद, साम्यवाद को टेढ़े मेढे रास्ते पर चलते दिखाया है।

" सामर्थ्य और सीमा" 1962 में मनुष्य की सीमा को प्रकृति के सामने असमर्थ दिखाया गया है। नियतिवाद की अवधारणा दिखाना ही इस उपन्यास का उद्देश्य है।

" प्रश्न और मरीचिका" 1973 में आज के शासनतंत्र से कुछ समाधान नही निकल पा रहा है। क्या यह केवल 1 मरीचिका भर है ? 

                                        

12. हजारीप्रसाद द्विवेदी :-

"हजारीप्रसाद के सभी उपन्यास रोमानी भाव के रहे हैं। 

"बाणभट्ट की आत्मकथा" 1946 में हर्षकालीन उत्तर भारत का सांस्कृतिक जीवन दिखाया गया है।

"अनामदास का पोथा" में ऋषि रैक्व और जाबाला का विवाह जातीय मर्यादा तोड़कर कराया गया है जिससे कि स्वछंद मानवतावादी दृष्टिकोण को सामने लाया जाए।

बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 - 6-7 वी शती 

चारुचंद्रलेखा 1963 -    12-13 वी शती 

पुनर्नवा 1973 -             4थी शती

अनामदास का पोथा 1976 -  ओपनिशिदिक युग


13. आचार्य चतुरसेन शास्त्री :-

"वैशाली की नगरवधू" 1948 में महावीर स्वामी, बुद्ध, और वासुदेव सभी एक साथ उपस्थित है,भारतीय सँस्कृति के संश्लिष्ट रूप को दिखाता है।

"सोमनाथ" 1955 में चालुक्य वंश द्वारा मंदिर की निर्मिति महमूद गजनवी द्वारा उस पर आक्रमण कर उसे लूटे जाने की कथा है जिसमें गजनवी को कोमल हृदय के रूप में दिखाया है।

                                                 

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी



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