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Thursday, August 5, 2021

काव्यशास्त्र भाग -2

 

                       (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर काव्यशास्त्र व महत्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय कथनों पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 


1. काव्य हेतु :- काव्यशास्त्र के अंतर्गत कविता का निर्माण करने के लिए कवि द्वारा प्रयोग किये जाने वाले काव्य- तत्व ही "काव्य हेतु" कहलाते हैं। अर्थात सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि किसी भी कविता की निर्मिति उस कवि द्वारा प्रायोगिक सभी तरह के नियम, कायदे-कानून, अनुशासन, बंधन, विराम चिन्ह, पूर्ण विराम, अर्धविराम, तुक, लय, अलंकार, छंद आदि सभी काव्य तत्वों का एक्सपेरिमेंट ही काव्य हेतु के अंतर्गत आता है। अर्थात कविता के लिए उपयुक्त अंग...।


• आचार्यो द्वारा काव्य हेतु के तत्व:-

1. भामह व आनंदवर्धन के अनुसार प्रतिभा ।

2. दंडी के अनुसार अभ्यास और प्रतिभा ।

3. वामन के अनुसार लोक, विद्या और प्रकीर्ण ।

4. रुद्रट के अनुसार शक्ति ।

5. मम्मट के अनुसार शक्ति, लोक व्यवहार, शास्त्र ।


2. काव्य प्रतिभा :- कवि में प्रतिभा का होना ही उसकी काव्यगत प्रतिभा के दर्शन देता है। अर्थात जबतक प्रतिभा नहीं होगी कला की सर्जना करना असंभव है।

न केवल साहित्य में ही ऐसी मान्यताएँ है कि कवि दैवीय शक्ति का अनुकर्ता होता है या उसमें जन्मजात ही कुछ ऐसे विशेष गुण होते हैं जो उसे असाधारण बनाता है, बल्कि समाज में भी आप लंबे समय से सुनते-देखते आ रहे होंगे कि उस व्यक्ति में कोई तो खास गुण है जो फलाने कार्य में कुशल है। 

हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक व सबसे प्रसिद्ध हिंदी साहित्येतिहासकार "आचार्य रामचंद्र शुक्ल" जी ने कबीर के संदर्भ में कहा ही है "प्रतिभा में बहुत प्रखर थी.....।" पश्चिमी दार्शनिक "प्लेटों" ने जहाँ एक तरफ रोमांटिक कविता को समाज विरोधी कहकर उसे जड़ से उखाड़ फेंकने की बात कही है वहीं स्वस्थ कविता के प्रति आदर भाव से स्वीकार भाव दिखाया है। वह भी कहते हैं कि कवि (कलाकार) दैवीय शक्ति से प्रेरित व लैस होता है। 

इन बातों से हम समझ सकते हैं कि हमारे काव्यशास्त्र के प्रणेताओं ने जो काव्य -प्रतिभा का ढाँचा गढ़ा है वह उसमें किसी विशेष भाव के रूप में है। जबतक उसका बीज अंकुरित नहीं होगा कविता की सर्जना नहीं होगी। इसलिए कविता रचने के लिए प्रतिभा का होना आवश्यक है।


• आचार्यो द्वारा प्रतिभा के तत्व:-

1. "भट्टतौत" के अनुसार कवि की अनुभूति व अभिव्यक्ति।

2. "राजशेखर" के अनुसार चयन से लेजर संयोजन तक कि प्रक्रिया, जिसे उन्होंने कार्य व्यापार का नाम दिया है।  इसे 2 भागों में बाँटते हैं :-


भावयित्री:- कवि में जन्म आधारित। कवि से जुड़ी है।

कारयित्री:- सहृदय, पाठक या आलोचक से जुड़ा।


3. काव्य प्रयोजन :- कविता का लक्ष्य और अपने लक्ष्य तक पहुँचना ही उसका प्रयोजन है। 

हम जब भी किसी कार्य को करते हैं और उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाना चाहते हैं तो उसका एक कारण होता है जिसकी पूर्ति करना हमारा उद्देश्य होता है। उसी कार्य की सिद्धि और लक्ष्य प्राप्ति ही हमारा प्रयोजन होता है। इसे और सरल भाषा में ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब लेखक लेखन कर रहा होता है तो वह किसी निश्चित पाठक वर्ग के लिए लिख रहा होता है, ऐसे ही कोई चित्रकार, फिल्मकार, गीतकार, आदि अपनी कला को किसी निश्चित ऑडियंस के लिए रचते हैं। और उसी ऑडियंस तक उसको पहुँचाना उनका प्रयोजन होता है। 

एक पंक्ति में काव्य प्रयोजन का अर्थ है ' कविता किसके लिए और क्यों लिखी जा रही है, हम उससे क्या दिखाना, जताना चाहते हैं...।'


• आचार्यो द्वारा काव्य प्रयोजन के तत्व :-

1. "भरतमुनि" के अनुसार थकी-मांदी, दुखी जनता की पीड़ा का परिहार और उसका कल्याण करना।

2. "भामह" के अनुसार काव्य को शास्त्र के नीरस और दुर्बोध से बाहर निकालकर सरस बनाना।

3. "वामन" के अनुसार कवि को कीर्ति मिलना और सहृदय को कविता से आंनद प्राप्त होना।

4. "कुंतक" के अनुसार सदव्यवहार व औचित्य का बोध कराना।

5. "तुलसी" के अनुसार स्वान्त सुखाय और लोकमंगल की स्थापना करना।

6. "मैथिलीशरण गुप्त" के अनुसार मनोरंजन के साथ उपदेश देना।

7. "शुक्ल" के अनुसार लोकमंगल की भावना होना चाहिए।

8. "हजारीप्रसाद" के अनुसार मानव मूल्यों की स्थापना।

9. "नंदुलारे वाजपेयी" के अनुसार कवि का आत्मोत्थान करना।

10. "नगेंद" के अनुसार कवि का आत्माभिव्यक्ति करना।

11. "प्लेटो" के अनुसार मानव के आंतरिक गौरव व सौंदर्य का उदघाटन करना।

12. "शिलर" के अनुसार पाठक को आह्लादित करना।

13. "मैथ्यू आर्नल्ड" के अनुसार काव्य में नैतिकता हो।

14. "रिचर्ड्स" के अनुसार काव्य में नैतिकता व आनंद हो।

 

● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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