Translate

Friday, January 29, 2021

भक्तिकाल भाग :- 2


(भक्तिकाल)


प्रस्तुत ब्लॉग पर भक्तिकाल के सम्बन्ध में जो अंतिम  पोस्ट किया गया था उसके बाद कि चर्चा यहाँ की जा रही है। अभी तक जितने भी विद्वानों के मत भक्तिआन्दोलन की पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखें गए हैं उनमें से सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण और विचार-विमर्शी आचार्य शुक्ल और द्विवेदी जी के मतों को मान्यता मिली है। जिनके बीच लम्बे समय से विवाद चला आ रहा है कि किसके मत को ज्यादा अहमियत दी जाए या किसका मत तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल भक्ति आन्दोलन के लिये उचित ठहरता है। दोनों ही हिंदी साहित्य के अग्रणी आलोचक है जिनके गहन अध्ययन के उपरांत ही उन्होंने साहित्य सम्बन्धी किसी भी विधा, परिस्थिति, विशेष घटना व प्रसंगादि पर अपने मत प्रस्तुत किये हैं। समय-समय पर गोष्ठियों, अन्य कार्यक्रमों में भी इनके मतों की पुष्टि के लिए तर्क-वितर्क और तथ्यों को प्रस्तुत किया जाता रहा है फिर भी आजतक कोई एक मत स्वीकार्य नहीं हुआ है। फलतः आज भी ये विवाद का मसला बना हुआ है। तो आइए एक बार इन दोनों आचार्यो के मत पर एक निष्पक्ष दृष्टि फेर लेते हैं:- 


● भक्तिआन्दोलन पर शुक्ल के मत:-

1. भक्तिआन्दोलन की पृष्ठभूमि के संदर्भ में आचार्य शुक्ल का मत "इस्लामिक प्रभाव" के रूप में देखा जाता है। जिसके बढ़ते प्रभाव के कारण हिन्दू जाति को अपनी संस्कृति के नष्ट होने के ख़तरे दिखने शरू हो गए थे, जिसे बचाने के लिए उन्होंने भक्ति के गीत गाए। इस संदर्भ में शुक्ल जी कहते हैं कि "उनके सामने ही उनके देव मंदिर और मूर्तियां तोड़ी जा रही थी, पूज्य लोगों का अनादर होता था और वह कुछ भी नही कर पा रहे थे...."। "अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त और मार्ग ही क्या था"..।

2. "जिस समय मुसलमान भारत में आए उस समय सच्चे धर्म-भाव का बहुत कुछ ह्रास हो गया था। परिवर्तन के लिए बहुत बड़े धक्के की जरूरत थी..."(61पृ) । अर्थात लोगो के भीतर पुनः भक्ति भावना के बीज को अंकुरित करने की आवश्यकता थी। जिससे शुष्क पड़ती हुई जनता के भीतर उत्साह का संचार हो सके।

3. "कालदर्शी भक्तकवि जनता के हृदय को संभालने और भक्ति में उन्हें लीन रखने के लिए दबी हुई भक्ति को जगाने लगे थे। क्रमशः भक्ति का प्रवाह ऐसा विकसित और प्रबल होता गया कि उसकी लपट में केवल हिंदू ही नहीं, देश में बसने वाली सह्रदय मुसलमान भी न जाने कितने आ गए। प्रेमस्वरूप ईश्वर को सामने लाकर भक्त कवियों ने हिंदुओ और मुसलमानों दोनों को मनुष्य के सामान्य रूप में दिखाया और भेदभाव के दृश्यों को हटाकर पीछे कर दिया"...।

अर्थात आगे चलकर भक्तिआन्दोलन में सूफियो का भी योगदान देखा गया। उन्होंने भारतीय संस्कृति और लोककथाओं के उद्धरणों को उठाकर गीत गाने शुरू किए और प्रेम के माध्यम से ईश्वर की भक्ति करने पर ज़ोर दिया।

4. "भक्ति का जो सोता दक्षिण से उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ती हुई जनता के हृदय क्षेत्र में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला"...।

5. "भक्तिआन्दोलन की जो लहर दक्षिण से आई उसने उत्तर भारत की परिस्थिति के अनुरुप हिन्दू- मुसलमान दोनों के लिए एक सामान्य भक्तिमार्ग की भावना कुछ लोगों में जगाई"....।           

7.  "जनता पर चाहे जो भी प्रभाव पड़ा हो, उन भक्तों ने जितने भी पद गुनगुनाये उसने मुरझाते हुए हिन्दुओं को प्रफुल्ल किया".....।

• आचार्य शुक्ल के इस्लामिक मत की पुष्टि करते हुए रामस्वरूप चतुर्वेदी और विश्वनाथ त्रिपाठी यह मानते हैं कि " शुक्ल जी इस बात को मानते थे कि दक्षिण से ही भक्तिआन्दोलन कि शुरुआत हुई परन्तु उसे जो तेजी मिली वो इस्लाम के प्रभाव से मिली"...। 


8. इसी के अतिरिक्त शुक्ल जी सिद्ध-नाथों पर व्यंग कसते हुए कहते हैं कि" उनका उद्देश्य, कर्म को उस गड्ढे से निकाल कर प्रकृत धर्म के खुले क्षेत्र में लाना न था बल्कि एकबारगी किनारे ढकेल देना था। जनता की दृष्टि को आत्मकल्याण और लोककल्याण विधायक सच्चे कर्मो की ओर ले जाने के बदले उसे वे कर्मक्षेत्र से ही हटाने में लगे थे"...।         

इसी क्रम में तुलसीदास आगे कहते हैं कि :-

"गोरख जगायो जोग भगति भगायो लोग"...।


● हजारीप्रसाद जी के मत:-


1. हजारीप्रसाद जी शुक्ल जी के इस्लामिक मत का खंडन करते हुए उसे भारतीय संस्कृति के स्वाभाविक विकासक्रम से जोड़ते हुए "हिंदी साहित्य की भूमिका" में कहते हैं कि "बोद्धतत्ववाद, जो निश्चय ही बौद्धआचार्यो की देन था, मध्ययुग के हिंदी साहित्य के उस अंग पर अपना निश्चित पद चिन्ह छोड़ गया जो निश्चय ही सन्त-साहित्य के नाम से जाना गया। मैं जोर देकर कहना चाहता हूं, क्रमशः बौद्ध धर्म लोकधर्म का रूप लेकर आगे बढ़ रहा था जिसकी झलक हम हिंदी सहित्य में भी पाते हैं"..। 

2.  इसी के आगे वह इस्लामिक प्रभाव को नकारते हुए "हिंदी साहित्य की भूमिका" (पृ 2) में कहते हैं कि "लेकिन ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि यदि इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बाहर आना वैसा ही होता जैसा आज है"....।

3. "जिस समय मुसलमान उत्तर भारत के मंदिरों को तोड़ रहे थे उसी समय निरापद दक्षिण में भक्तलोगों ने भगवान की शरण की प्रार्थना की, जोकि वर्णाश्रम के विरुद्ध खड़े हुए थे। मुसलमानो की चढ़ाई से यदि भक्ति का उदय होना होता तो वह पहले उत्तर भारत के सिंध से निकलता परन्तु वह दक्षिण में निकला"..।                                

क्योंकि दक्षिण में पहले ही वर्णाश्रम और ब्राह्मणों की कुरीतियों के विरुद्ध आलवार और नायनार भक्तकवि खड़े हो चुके थे। जिसमें कई अवर्ण जाति के लोग भी थे। जिन्हें अपनी सामाजिक मर्यादा को सुदृढ़ करना था और इसके पीछे उनके आर्थिक स्थिति के मजबूत होने का कारण था जिसकी पुष्टि इरफान हबीब और रामशरण वर्मा जैसे इतिहासकार भी कर चुके हैं।   

4.  इसी के आगे "हिंदी साहित्य की भूमिका" में हजारीप्रसाद कहते हैं कि "इस्लाम के प्रभाव को केवल प्रभाव के रूप में देखना चाहिए ना कि प्रतिक्रिया के रूप में"...(पृ29)।

5.  इसके अलावा हजारीप्रसाद जी एक अन्य तथ्य को भी भक्तिआन्दोलन से जोड़ते हुए अपनी पुस्तक "मध्यकालीन बोध स्वरूप" में कहते हैं कि "अत्यधिक प्राकृत-केंद्री कविता की प्रतिक्रिया का अवसान सहज भगवत्प्रेम में हुआ। संत-सगुण मार्गी भक्तों ने नए रसबोध को बढ़ाया। यद्दपि रीतिकाल में संस्कृत की प्रवृत्ति को जिलाये रखा, पर भक्ति के आदर्श उसे भी चालित करते रहे".....(पृ119)।

हजारीप्रसाद जी भक्ति साहित्य को "हतदर्प जाति का साहित्य " नहीं मानते।

                        

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार हजारीप्रसाद जी भक्तिकाव्य के लिए 2 तर्क देखते हैं:-

1. बौद्ध तत्ववाद का स्वाभाविक विकास।

2. प्राकृत-अपभ्रंश की श्रृंगारिकता के विरुद्ध प्रतिक्रिया।

इन सभी मतों को देखने के बाद "बच्चन सिंह" शुक्ल और हजारीप्रसाद जी के मतों को आधा सच मानते हैं और उसे पुनः विचारने का प्रस्ताव पेश करते हैं। वह कहते हैं कि "मन्दिरो के तोड़े जाने और जबरन मुस्लिम बनाये जाने का प्रभाव भक्तों पर न पड़ता ,यह अमनोवैज्ञानिक जान पड़ता है। लेकिन साथ ही उस समय मुसलमान- हिन्दू एकसाथ भी रह रहे थे जिससे आत्मीय सहोदर की भावना भी समाज में पल्लवित हो रही थी। इतिहास भले ही इसकी पुष्टि न करता हो पर साहित्य ज़रूर करता है"....। 

बच्चन सिंह हजारीप्रसाद जी के मत को इस तरह से पुष्ट करते हैं "यदि मुसलमान न आये होते तो संत-सूफी साहित्य नहीं लिखा जाता"...। जिसकी पुष्टि शुक्ल जी भी करते हैं।

●रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास में "जनता" शब्द का इस्तेमाल करके समाज के हर वर्ग को शामिल किया है वहीं हजारीप्रसाद जी ने "लोक" शब्द का प्रयोग करके निम्नवर्ण के लोगों को महत्व दिया है।

सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018   

Saturday, January 23, 2021

भक्तिकाल - भाग 1

 

●भक्तिआन्दोलन की पृष्ठभूमि:-

 भक्तिकालीन साहित्य जैसी अवधारणा का सामान्य अर्थ देखने पर यह पता चलता है कि, कोई ऐसा विशेष समय या इस समय जब विशेषकर भक्ति-साधना समाज का अंग रही हो। या किसी ईश्वर, व्यक्ति- गुरु आदि की आराधना की जाती हो और उनके मतों को लोककल्याण के लिए में फैलाया जाता हो। ठीक इसी तरह से कुछ महान व्यक्तित्व, सम्प्रदाय, दर्शन, मत आदि का प्रसार लगभग 8वी शती के आसपास से दक्षिण में होने लगा था जहाँ मुख्यतः शैव-वैष्णव भक्तो ने अपने-अपने आराध्य-ईश्वर का महिमाण्डन करना शुरू किया था। परन्तु इसके पीछे की विकास यात्रा को समझना हमारे लिए बेहद जरूरी है।


●भक्ति का अर्थ और उसकी विकासयात्रा:-

हिंदी साहित्य के महान आलोचक "शुक्लानुसार" श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। जहाँ श्रद्धा या पूज्यवृद्धि का अवयव-जिसका लगाव धर्म से होता है, उसे छोड़कर केवल प्रेम लक्षणा की ओर जाएगी वहाँ वह अवश्य विलासिता से ग्रस्त हो जाएगी".।

भक्ति शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख उपनिषद में मिलता है।

भारतीय धर्म-साधना में भक्ति की एक सुस्पष्ट एवं सुदीर्घ परम्परा रही है। महाभारत के भीष्म पर्व में, शांडिल्य भक्ति सूत्र में , नारद मुनि सूत्र में भक्ति का सैद्धान्तिक विवेचन हुआ है। सर्वप्रथम दक्षिण के आलवार भक्तों ने भक्ति-भावना की उच्चतम स्थिति को प्राप्त किया।

"आलवार भक्त" तमिल भाषा में वैष्णव भक्तों को कहा जाता था और "नायनार भक्त" शिव भक्तों को। जो बौद्ध धर्म के विरुद्घ एक धार्मिक क्रांति लेकर खड़े हुए थे। इस क्रांति का आधार इन सिद्ध योगियों  द्वारा समाज में फैलाई गयी वीभत्स वृतियां, कुसंस्कार आदि को खत्म करके अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करना था। इन शैव- वैष्णव भक्तो का उद्देश्य गीता, उपनिषद और अपने धार्मिक गर्न्थो का गीतों के माध्यम से प्रचार करना था।

 

● आलवार का अर्थ:-  विजेंदर स्नातक के अनुसार "ईश्वरीय ज्ञान के मूल तत्व तक पहुँचा हुआ ज्ञानी आदमी" ही आलवार है। आलवारों में सभी वर्णो के लोग रहते थे और इनमें प्रसिद्ध अंतिम भक्त "तिरूपाणी" है। आलवारों में पेरियार की दत्तक पुत्री "आंडाल"है।

● बच्चन सिंह के अनुसार प्राकृत-अपभ्रंश भाषा को छोड़ते हुए देशभाषा "तमिल-कन्नड़" में आलवारों ने भक्ति भावना को फैलाना शुरू किया। इस तरह के भक्तिआन्दोलन की प्रथम शुरुआत 12-13 वी शती में तमिल और कन्नड़ जातियों में हुई थी। उसके बाद 15 वी शती तक उत्तर भारत तक भी फैल गयी थी"...। 

जिस बौद्ध-जैन धर्म के विरुद्ध और उसके पतन के पश्चात यह धार्मिक क्रांति खड़ी हुई थी उसी धार्मिक क्रांति में कुछ ब्राह्मण भी थे जिन्होंने समय का फायदा उठाते हुए समाज में अपने वर्चस्व को बढाने और वर्णाश्रम की रक्षा करने के लिए शूद्रों के साथ कठोर व्यवहार अपनाना शुरू कर दिया था। इनकी दशा सोचनीय हो गयी थी। ब्राह्मणों की चालाकी इस हद तक थी कि ये कभी-कभी किसी शुद्र को ही क्षत्रिय बनाकर अपना शासन चलवाते थे जिससे वर्णाश्रम धर्म की रक्षा हो सके। इन ब्राह्मणों ने निम्न वर्णो की हालत पस्त कर रखी थी। थक हारकर जब निम्नवर्ण ने ईश्वर की शरण ली तो उससे जाति प्रथा और वर्णाश्रम व्यवस्था को गहरा धक्का पहुँचा। क्योंकि निम्नवर्ण के लोगों को व्यापक तौर पर पूजापाठ, तीर्थ आदि करने का अधिकार नहीं था और इनके देवी-देवता, और उन देवी-देवताओं की सवारियां भी हिन्दू धर्म के अनुसार अलग होती थी। इन सब प्रतिबंधो के बावजूद अगर इस वर्ण के लोग धार्मिक आंदोलन चलाते थे तो यह बड़े ही साहस की बात थी। इसने पूरे ब्राह्मणवाद की कमर तोड़ दी थी। इस आंदोलन से उन्हें अपनी जातिगत और सामाजिक मर्यादा को सुधारने का अवसर मिला। ऐसा ही कुछ रुख़ निर्गुणमत को मानने वाले संत कवियो ने अपनाया था जिसमें कई निम्न जाति के लोग थे जैसे कबीर, रैदास आदि।

बच्चन सिंह के अनुसार "तमिलों का भक्तिआन्दोलन ब्राह्मण धर्म की प्रभुसत्ता और वर्णाश्रम व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हुआ था साथ ही वीरशैव या लिंगायत भक्त भी उस जाति-पाँति के विरुद्ध भक्तिआन्दोलन चलाया था"...।

● भक्तिआन्दोलन के प्रचार प्रसार में इन निम्नवर्ण के लोगों को इतना आत्मविश्वास कैसे मिला इस बात की पुख़्ता जानकारी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। इस चमत्कारी घटना को समझना जरूरी है। जैसाकि ऐतिहासिक तथ्यों द्वारा माना जाता है कि निम्नवर्ण के लोगों को इस तरह का आत्मविश्वास उनकी आर्थिक स्थिति के मजबूत होने से मिला था। जब चोलवंश की कई शताब्दियों बाद  दक्षिण में इन शिल्पकारों, बुनकरों, मल्लाहों, किसानों आदि को अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के अवसर मिले। जहाँ उन्हें तत्कालीन शासको द्वारा भवन निर्माण, सिंचाई के लिए, मछली व्यापार आदि के लिए कई मजदूरों कामगरों की ज़रूरत पड़ी और इसी आर्थिक वृद्धि से इस वर्ण की समाजिक मर्यादा भी सुदृढ़ हुई।

"विश्वनाथ त्रिपाठी" के अनुसार मध्यकाल के विशेषज्ञ इतिहासकारों का मानना है जिसमें "इरफ़ान हबीब" और "रामशरण वर्मा" का नाम उल्लेखनीय है। जो मानते हैं कि "दक्षिण के व्यापारियों, किसानों आदि की तरह उत्तरभारत के जाट-किसानों, व्यापारियों, शिल्पियों की निर्गुणमत को तैयार करने में मुख्य भूमिका रही । उस समय के शासक (खिलजी, तुगलक- सूरी) आदि सड़क -भवनों का निर्माण करवा रहे थे जिससे इन शिल्पकारों, मजदूरों, बुनकरों आदि को आर्थिक मदद पहुँची और इनकी सामाजिक स्थिति बेहतर हुई। निर्गुणमत के सन्तो का सामाजिक आधार यही था".।

अर्थात जब तक हमारी आर्थिक स्थिति सही न हो तबतक हम समाज में किसी भी तरह के आंदोलन, सेवाभाव, क्रांति आदि को अंजाम तक नही पहुँचा सकते क्योंकि किसी भी कार्य की पूर्णता के लिए उन सभी उपकरणों व माध्यमों की अति आवश्यकता होती है जिससे हम उस लक्ष्य तक पहुँचते हैं। इसे हम।और आसानी से ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब भी समाज में लोक कल्याण के लिए कोई भी कृत्य किये जाते हैं तो उस कृत्य से होने वाली मदद भी आर्थिक आधार पर ही टिकी होती है कुछ ऐसा ही भक्तिकाल की पृष्ठभूमि तैयार होने में निम्नवर्ग के लोगों के साथ भी हुआ। जोकि आज भी प्रसांगिक है।


●भक्तिआन्दोलन के संदर्भ में विद्वानों के मत:-

1. "अरबो की देन " ताराचंद का मत। 

2. "ईसाइयत की देन"..। ग्रियर्सन का मत है कि भारत में ईसाईयों के बढ़ते प्रभाव से भारतीय लोगों को उनकी संस्कृति के कलुषित होने या लुप्त होने का डर था इस लिए उन्होंने अपने धार्मिक ग्रन्थों के उपदेश को गीतों के माध्यम से गाना शुरू कर दिया था...।   परंतु बच्चन सिंह ग्रियर्सन के मत को इस बात से ख़ारिज कर देते हैं कि वह झूठे है और अब इस पर कोई चर्चा भी नहीं होती है....। 

3. मुक्तिबोध का मत है कि "सामाजिक शक्तियों के रूप में जनता के दुःख व कष्टों से उत्पन्न आंदोलन था"...। 

4. रामविलास शर्मा का मत है कि "भक्तिआन्दोलन एक जातीय और जनवादी आंदोलन है"..।

5. बच्चन सिंह का मत है कि " यह पहला भारतीय जागरण था जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर असम तक फैला हुआ था। साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह एक बार में सब जगह नही फैला था कहीं पहले तो कहीं बाद में"...।

6. जयशंकर प्रसाद का मत है कि " दुखवाद जिस मननशैली का फल था, वह बुद्धि विवेक के आधार पर तर्क का आश्रय लेकर आगे बढ़ता जा रहा था। अनात्मवाद की प्रतिक्रिया होनी चाहिए। फलतः भारत के पिछले काल के जो दार्शनिक अनात्मवादी थे वही भक्तिवादी बने और बुद्धिवाद का विकास भक्ति के रूप में हुआ"...। फिर कुछ व्यंग की मुद्रा में कहते हैं कि "जिन-जिन लोगों में अनात्मवाद की कमी रही उन्हें एक त्राणकारी की आवश्यकता थी"...(रहस्यवाद निबन्ध से)।

7. रामस्वरूप चतुर्वेदी मानते हैं कि प्रसाद और शुक्ल जी का मत इस्लामिक प्रभाव से मिलता-जुलता है और दोनों कहीं-न-कहीं एक दूसरे के पूरक हैं।

8. "उस समय स्वतंत्रता के साथ-साथ वीरगाथा काल भी अंधेरे में पड़ चुका था। इस हीन दशा में अपने पराक्रम के गीत किस मुँह से गाते और सुनते?..। जनता पर गहरी उदासी छाई थी, उसकी वृतियां (उत्साह) को पाने के लिए वह कृष्ण की ही उपासना कर सकते थे परंतु वह उस तरफ भी नही जा पा रहे थे। ऐसे में इन कृष्णभक्तों ने  गीत गाकर जीवन के प्रति अनुराग जगाया और जीने की चाह को कायम रखा"...।(महाकवि सूरदास- त्रिवेणी- शुक्ल)

 9. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार वल्लभाचार्य का मत "मलेच्छाक्रांतेषु देशेषु" से है। यह देश मलेच्छाक्रान्त है और गंगादि तीर्थ आदि नष्ट हो रहे हैं। अशिक्षा और अज्ञान के कारण वैदिक धर्म  नष्ट हो रहा है'...ऐसी स्थिति में कृष्णाश्रय ही केवल एकमात्र ही सहारा रह गया था"...। 

10. प्रो हैवेल का मत है कि " वह अपनी पुस्तक history of aaryan rules में लिखते हैं कि "मुसलमानी सत्ता के स्थापित होते ही हिंदुओ को राजकाज के कामों से निकाल दिया था इसलिए दुनिया की झंझटो से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने ईश्वर की भक्ति शुरू कर दी"....।  इस मत का हजारीप्रसाद यह कह कर विरोध करते हैं कि " भारतीय पांडित्य ईसा की एक सहस्त्राब्दी बाद विचारों और भाषा का क्षेत्रों में स्वभावतः ही लोक की तरफ झुक गया था। xxxx इस्लामी प्रभाव नही आया होता तो भी इस साहित्य को इसी रास्ते आना था , उसके भीतर की शक्ति उसे स्वभाविक विकास की तरफ धकेले जा रही थी"....(हिंदी साहित्य की भूमिका पृ 24)

11.  हजारीप्रसाद जी के मत को उनके शिष्य "नामवर सिंह" भी गुरु परम्परा में विश्वास दिखाते हुए शुक्ल और वल्लभाचार्य के मत को एकसाथ नत्थी कर देते हैं।

एक तरफ "रामस्वरूप चतुर्वेदी" जी हैवेल के मत का खंडन करते हुए यह कहते हैं कि" यह गलत व्याख्या है क्योंकि इस्लाम केवल एक ऐतिहासिक घटना नही थी वह सम्पूर्ण हिन्दू धर्म की मर्यादा को कलुषित करने पर तुली थी जिसे बचाने के लिए इन भक्तकवियो ने आंदोलन खड़ा किया और अपनी मान्यता को शुक्ल जी से जोड़ देते हैं"....। वहीं आगे नामवर सिंह जी के मत का विरोध करते हुए कहते हैं कि " म्लेच्छ कहने से तत्कालीन मुसलमानों का ही पता चलता है क्योंकि उस समय कोई अन्य जाति जैसे शक-हूण आदि नही थी"....। 

चतुर्वेदी जी आगे आधुनिक काल के एक तेजस्वी कवि निराला के "तुलसीदास" नामक रचना का उद्धरण लेकर उसे भी भारतीय संस्कृति की चिंता के रूप में देखते हैं। जहाँ निराला लिखते हैं :-

"भारत के नभ का प्रभापुण्य

शीतलछाया सांस्कृतिक का सूर्य"...।

• यहाँ पर सूर्य और चंद्र इस्लाम और भारत का प्रतीक हैं।

● जहाँ एक तरफ "नामवर सिंह" भक्तिआन्दोलन को शास्त्र और लोक का संघर्ष मानते हैं वही दूसरी और "चतुर्वेदी" जी उसे इस्लाम और भारतीय संस्कृति का द्वंद मानते हैं। ख़ैर ये बातें विचार विमर्श के लिए रह जाती है जिस पर अभी और काम करने की ज़रूरत है।

12.  रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "भक्तिकाव्य के पीछे यदि बौद्ध धर्म का लोकमूलक रूप और प्राकृतों के श्रृंगार काव्य की प्रतिक्रिया है तो इस्लाम के प्रभाव की चेष्टा भी"...।

चतुर्वेदी के अनुसार "ग्रियर्सन, शुक्ल और हजारीप्रसाद जी का मत 'विदेशी, देशी और लोक पक्ष की अलग-अलग परिणतियाँ हैं"..।

• अभी तक जितने भी विद्वानों के मत भक्तिआन्दोलन की पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखें गए हैं, उनमें से सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण और विचार-विमर्श के नजरिये से आचार्य शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के मतों को मान्यता मिली है जिनके बीच लम्बे समय से विवाद चला आ रहा है कि किसके मत को ज्यादा अहमियत दी जाए या किसका मत तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल भक्तिआन्दोलन के लिये उचित ठहरता है। समय-समय पर गोष्ठियों, अन्य कार्यक्रमों में भी इनके मतों की पुष्टि के लिए तर्क-वितर्क और तथ्यों को प्रस्तुत किया जाता रहा है फिर भी आजतक कोई एक मत स्वीकार्य नहीं हुआ है और आज भी ये विवाद का मसला बना हुआ है। तो आइए एक बार इन दोनों आचार्यो के मत पर एक निष्पक्ष दृष्टि फेर लेते हैं:- 


सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018    

                  

Friday, January 22, 2021

आदिकाल भाग - 4

   

● अपभ्रंश से हिंदी का विकास

इस विषय पर मैं अपने निजी मत भी प्रस्तुत कर रहा हूँ। यदि किसी भी व्यक्ति को किसी भी तथ्य या बात से असहमति हो तो वह अपनी प्रक्रिया दर्ज करा सकते हैं। उसके लिए वह लिंक के कमेंट बॉक्स की मदद ले सकते हैं या फेसबुक व व्हाट्सएप पर भी अपनी असहमति दर्ज करा सकते हैं।

वैसे तो किसी भी भाषा का विकास तब ही सम्भव माना जाता है जब वह अपने पूर्व के दुर्गुणों, कुसंस्कारों आदि को छोड़ती हुई समय के साथ  विकास के पथ पर चलती जाती है और धीरे-धीरे अपना सामाजिक- साहित्यिक विकास करती है। परंतु कुछ भाषाओं के साथ ये प्रक्रिया होना इतना आसान नही होता और उसके विकासक्रम को समझना और समझाना भी इतना सरल कार्य नही दिखाई पड़ता। ठीक इसी तरह के एक भाषाई-विकासक्रम का नाम अपभ्रंश का हिंदी में परिवर्तित होेना है। सामान्य तौर पर हिंदी साहित्य के अंतर्गत अपभ्रंश को हिंदी का पूर्ववर्ती रूप माना जाता है परंतु कुछ विद्वान इस बात से सहमत नहीं है। वह हिंदी और अपभ्रंश को दो भिन्न भिन्न भाषा कहते हैं। इसी विवाद में कुछ विद्वानों के मत द्रष्टव्य हैं:-

1. रामस्वरूप चतुर्वेदी मानते हैं कि अपभ्रंश से हिंदी ठीक वहीं से अलग मानी जाती है जहाँ से प्रत्यक्ष रूप से परसर्गो का प्रयोग होना शुरू हो जाता है। इसकी पुष्टि के लिए वह रासो साहित्य का हवाला देते हैं। जिसमें व्याकरणिक दृष्टि से आधे वर्णों जैसे दुग्ध ,हत्थ आदि के ग और त को हटा कर पूरे वर्णों का इस्तेमाल होना शुरू हो जाता है।  

2. बच्चन सिंह के अनुसार विद्वानों के मत:-

"हजारीप्रसाद " जी मानते हैं कि अपभ्रंश हिंदी नहीं है परंतु परवर्ती अपभ्रंश (पुरानी हिंदी) पूर्ववर्ती अपभ्रंश के निकट है तो इसे साहित्य में ले लेना चाहिए।

"रामविलास शर्मा" के अनुसार व्याकरणिक दृष्टि से अपभ्रंश और हिंदी बिल्कुल भिन्न हैं।

पं.गुलेरी जी,  राहुल सांकृत्यायन व शुक्लजी परवर्ती अपभ्रंश को पुरानी हिंदी कहते हैं।


● "गुलेरी जी" ने 1921 में ना.प्रा.पत्री. से "पुरानी हिंदी" नामक एक लेखमाला निकाली थी जिसमें वह कहते हैं " विक्रम की 7वी से 11वी तक भले ही अपभ्रंश की प्रधानता रही हो फिर भी वह हिंदी में परिणत हो गयी"...। आगे वह कहते हैं कि "पुरानी अपभ्रंश संस्कृत-प्राकृत से मिलती है तो परवर्ती अपभ्रंश हिंदी से "...। अर्थात गुलेरी जी ने अपभ्रंश को पुरानी और परवर्ती कहा है।

● "बच्चन सिंह" शुक्ल जी को हिंदी-अपभ्रंश के मसले पर अंतर्विरोध में जकड़े हुए पाते हैं और कहते हैं कि एक तरफ तो उन्होंने राजा मुंज से अपभ्रंश का पूर्ण-प्रचार माना वहीं वह सिद्ध-नाथों के साहित्य को अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी की रचना मानते हैं।     

परन्तु ये अंतर्विरोध न होकर बल्कि भाषा की विकासयात्रा है।जहाँ भाषा अपने शुद्ध रूप में आने में समय लेती है परंतु आचार्य शुक्ल के साथ एक अंतर्विरोध यह पाया जाता है कि वह सिद्ध-नाथो की रचनाओं को अगर धर्म-साधना-योग आदि की रचना कह कर साहित्य से बाहर कर देते हैं तो उनकी रचनाओं की भाषा हिंदी कैसे हो सकती है? जिसे उन्होंने प्राकृताभास हिंदी या अपभ्रंश कहा है पृ 15 पर...।

एक अन्य अंतर्विरोध यह भी पाया जाता है कि "शुक्लानुसार सिद्ध-नाथों की रचनाओं को उस समय की प्रयुक्त भाषा से परिचित कराने के लिए हिंदी साहित्य में दिखाया गया है। इसका अर्थ ये निकलता है कि शुक्ल जी या तो पूर्णरूप से अपभ्रंश और हिंदी के मसले को समझ नहीं पाए थे या तो वह केवल हल्के तर्क देकर सिद्ध-नाथों के साथ नाइंसाफी कर रहे थे। ख़ैर ये भी एक विवाद का मसला बन सकता है जिसकी चर्चा निरन्तर शोधार्थी और साहित्यकार दोनों मिलकर करते रहेंगे।


3. बच्चन सिंह, अपभ्रंश का हिंदी में विकासक्रम, इस तर्क पर मानते हैं कि "जिस समय अपभ्रंश भाषा का इस्तेमाल हो रहा था उस समय कुछ-कुछ लोकभाषा के शब्दों का भी प्रयोग हो रहा था जिसे परसर्ग कहा जाता था। जोकि ब्रज-खड़ीबोली-अवधि-भोजपुरी आदि के हो सकते थे। यही परसर्ग आगे चलकर हिंदी या परवर्ती अपभ्रंश का रूप लेने लगे। इसलिए हिंदी साहित्य के अंर्तगत हमें अपभ्रंश का अध्धयन भी करना आवश्यक है। इस तर्क से वह कहते हैं कि "अपभ्रंश साहित्य हिंदी साहित्य का समृद्ध रिक्थ है"....।


● अपभ्रंश साहित्य को बच्चन सिंह 3 वर्गों में बांटते हैं:-  

1.सिद्ध साहित्य

2. जैन साहित्य

3. बौद्ध साहित्य


4. शुक्ल जी का मत अपभ्रंश के लिए:-

अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी का सबसे पुराना पता तांत्रिक योगियों सिद्ध-नाथों से चलता है।

अपभ्रंश का सबसे पहला पता धारसेन के राजा वलभी से चलता है 593ई. में।

जब प्राकृत बोलचाल की भाषा न रह गयी तभी से अपभ्रंश का उदय हुआ। और जब शुद्ध रूप से अपभ्रंश लोक में फैल गई तो वहाँ से हिंदी साहित्य की शुरुआत हुई। उस समय पद्य में ही साहित्य लिखा जाता था।

शुक्ल जी ने साहितियक भाषा को अपभ्रंश और लोकभाषा को देसीभाषा कहा है।


●सिद्ध-नाथों की रचनाओं पर विद्वानों के मत:-

1. आचार्य शुक्ल और रामस्वरूप चतुर्वेदी जी का मानना है कि ,इन सिद्ध-नाथ योगियों की रचनाएं साहित्य कोटि के अंतर्गत नहीं आती। इनका इस्तेमाल केवल यह दिखाने के लिए किया गया था कि उस समय प्रचलित भाषा कौन-सी थी? और अपभ्रंश भाषा की शुरुआत कब से मानी जाती है,₹। और उनके द्वारा किस तरह का साहित्य रचा जा रहा था आदि बातें।जैसाकि शुक्ल जी कहते हैं कि" इन सिद्ध-नाथ योगियों के द्वारा संतमत के लिए पहले से ही मार्ग तैयार था...।

2. उनके अनुसार इनका साहित्य एहिकता और लोक से कहीं दूर नज़र आता है। वह धर्म-दर्शन-योग आदि का साहित्य ज़्यादा है और लोक से जुड़ा हुआ कम। बाद में ये प्रक्रिया कबीर तक जाती दिखती है। 

3. यह सभी सिद्ध-नाथपंथी योगी अपनी प्रतीकात्मक संध्याभाषा अर्थात "योग से संपन्न भाषा" का इस्तेमाल करते थे और जनता को गुमराह कर अपनी शक्तियों का प्रभाव दिख कर समाज को कुमार्ग पर ला रहे थे, दुराचार फैला रहे थे। इसलिए शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य के अंतर्गत इस साहित्य की गणना नहीं की है और हिंदी साहित्य के प्रथम काल की शुरुआत 1050ई. से मानी है । जिसे उन्होंने "वीरगाथा काल" का नाम दिया है।

परन्तु यहाँ एक बात यह खटकती है कि जब सिद्ध-नाथ और कबीर के सन्तमत के बारे में यह बात सर्वविदित है कि वह किसी भी तरह के बाह्याडंबर, जात-पात, ढकोसले आदि पर विश्वास नहीं करते थे, तब उनकी रचनाएं धर्म से कैसे जुड़ी हो सकती है? क्या शुक्लजी और रामस्वरूप चतुर्वेदी जी के कथन सही हैं? क्या उनका सिद्ध-नाथों पर किया गया शोध कार्य सही है? ये सभी बातें विचार-विमर्श के लिए रखी है जिस पर आने वाली पीढ़ियों को और हमें भी सोचना चाहिए।   

             परन्तु इन सब के विपरीत पं हजारीप्रसाद जी ने सिद्ध-नाथ-जैन-बोद्ध आदि को आदिकाल का नाम देकर एक ही पिटारे में नक्की कर दिया है जोकि हमारे भारतीय साहित्य का कहीँ-न-कहीं  अंग है और हिंदी साहित्य की नींव खड़ी करने में इनका योगदान अवश्य माना जाना चाहिए।    अपनी बात को सिद्ध करने के लिए यहाँ हजारीप्रसाद जी के कथन को रखना उचित व आवश्यक भी है...."भले ही अपभ्रंश हिंदी नही है परंतु हमे परवर्ती अपभ्रंश को पूर्ववर्ती अपभ्रंश के निकट ही मान लेना चाहिए और इसलिए इन्हें हमें हिंदी साहित्य में शामिल कर ले जाना चाहिए".....। 

                                             

●अपभ्रंश के मुख्य छंद:-  

1. दोहा - ये 2 पंक्तियो का छंद होता है जिसमें वीर, श्रृंगार, नीति धर्मपरक आदि के गीत व उपदेश लिखे हैं। 

2. पध्दडिया- अहिलल्ल- कडवक - ये चौपाई की तरह होता है जिसका प्रयोग तुलसी, जायसी और सिद्ध के चर्यापद में भी मिलता है। इसमें 16 मात्राएं होती है जिसमें 8-8 पंक्तियो पर धत्ता दिया जाता है। हिंदी के दोहा-चौपाई वाले छंदों में दोहा द्वारा धत्ता दिया जाने लगा है।

मूलतः कडवक शैली वो है जिसमें चौपाई के बाद दोहा रखने की शैली होती है। अब यह कितनी चौपाई के बाद रखा जाएगा यह रचनाकार पर निर्भर रहता है। जैसे पद्मावत में 7 चौपाई पर 1 दोहा रखा गया है और "माधवानल कामकन्दला" आलम की रचना में 5 चौपाई पर 1 दोहा।

●अर्धलियाँ का अर्थ चौपाई होता है।


सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018    

                  

Wednesday, January 20, 2021

आदिकाल भाग -3

 

आदिकालीन साहित्य


● अमीर खुसरो :-  इनका वास्तविक नाम "अबुल हसन" था।इनका जन्म एटा में 1255 ई.में हुआ था। इनके पिता का नाम सैफुद्दीन महमूद था जो तुर्की के लाचीने कबिले के सरदार थे।इनके गुरु का नाम निजामुद्दीन औलिया था जिनसे इन्हें घनिष्ठ प्रेम था। अपने गुरु की मृत्यु पर इन्हें लम्बे समय तक दुख रहा था जिससे प्रभावित होकर इन्होंने ये पँक्ति कही थी :-

             "गोरी सोवे सेज पर मुख पर डाले केस.....। 

गुरु की मृत्यु से आहत होकर उनके विलाप में लगातार रहने के चलते आगामी 6 माह में इनकी हालत बिगड़ती गयी और उसके परिणामस्वरूप अमीर खुसरो की भी मृत्यु 1325 ई. में हो गयी थी।

● इन्होंने कई तरह की रचनाएं की हैं जैसे:-

शिष्ट काव्य              -     फ़ारसी में

गीत,कव्वाली          -       ब्रज में

खालिकबारी शब्दकोश -   फ़ारसी में

दोहे, मुकरियां, ढकोसला -  खड़ीबोली में


इन्हें हिन्दू-तुर्क का मिश्रित कवि माना जाता है। इन्होंने कई राजाओं का समय देखा था, जैसे गयासुद्दीन बलबन,अलाउद्दीन खिलजी, बुगरा खां आदि।

"सुल्तानी" और "तुर्क" इनके बचपन के नाम थे। इसके अलावा "तूती-ए-हिंदी" ,"अमीर" जैसी पदवियाँ इन्हें बादशाहों ने दी थी।

"नूरे सिपहर" पर प्रसन्न होकर कुतुबुद्दीन खिलजी ने इन्हें एक हाथी के भार के बराबर सोना दान किया था।

"खालिकबारी" शब्दकोश तैयार करने वाले हिंदी के प्रथम शब्दकोशकार थे।

भाषा शास्त्री "बाबूराम सक्सेना" इन्हें "उर्दू का अविष्कारक" और लाला श्रीराम उन्हें "उर्दू का मुग्गा" मानते हैं।


● विद्यापति :-  इनका जन्म 14वी शती में बिहार के दरभंगा जिले के विपसी नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम "गणपति ठाकुर" और माता का नाम "हासिनी देवी" था। इनके गुरु का नाम "प. हरिमिश्र" था। ये तिरहुत के राजा "शिवसिंह" के और "कीर्तिसिंह" के दरबारी कवि थे। ये अवहट्ट और मैथिली के बड़े कवियों में माने जाते हैं। इनके आदर्श कवि "जयदेव" थे जिनसे प्रभावित होकर इन्होंने "पदावली" की रचना की थी।

इनकी प्रसिद्ध रचना "कीर्तिलता और कीर्तिपताका" है जिसमें महाराजा कीर्तिसिंह के शौर्य का वर्णन है। इसकी भाषा अवहट्ट व अपभ्रंश मिश्रित है। इसके अतिरिक्त "पदावली" से इनको न केवल मैथिली में बल्कि सम्पूर्ण हिंदी सहित्य में ख्याति मिली। और इन्हें अपनी इस कृति के लिए "मैथिल-कोकिल" की उपाधि से भी जाना जाता है।


●आचार्य शुक्ल द्वारा इनकी दो प्रकार की भाषा थी:-

1 साहित्यिक भाषा - अपभ्रंश

2 देसीभाषा -अवहट्ट व देसीभाषा मिश्रित (मैथिली)।


●अनेक विद्वानों द्वारा इनके बारे में कही गई बातें:-

1. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "विद्यापति में वैष्णव की मर्यादा और शैव का तादात्म्य दोनों एक साथ मिलता है"...।

2. बच्चन सिंह के अनुसार "हिंदी के जातीय कवि" और "अपरूप के कवि" अर्थात इनका प्रेम न तो रोमांटिक है और न ही भक्तों की तरह वायवीय।वे तो अपरूप के कवि हैं"....।

3. इनकी भाषा में पूर्वी अपभ्रंश का प्रयोग पाया जाता है। शुक्ल जी इनके लिए एक व्यंग्यात्मक पंक्ति का प्रयोग करते हैं :-"आध्यात्मिक रंग के चश्मे इतने सस्ते हो गए हैं कि उन्हें चढाकर कोई भी जैसे गीतगोविन्द के पदों को आध्यत्मिक मान लेता है वैसे ही विद्यापति के भी"....।

4. "हजारीप्रसाद" ने इन्हें श्रृंगार का सिद्धराज कवि कहा है। इसके अतिरिक्त वह पदावली के लिए कहते हैं कि "आगे चलकर इस पुस्तक के पदों ने बंगाल, आसाम और उड़ीसा में वैष्णव भक्तोँ को प्रभावित किया और उन प्रदेशो के भक्त साहित्य में नई प्राणधारा संचारित हुई। इसलिए यह पूर्वी प्रदेशों में धर्मग्रंथ का महत्व पा सकी"....।

5. बच्चन सिंह के अनुसार निराला ने पदावली के पदों को "नागिन की लहर " कहा है।

6. विद्यापति को अभिनय जयदेव, कविशेखर आदि उपनामों से भी जाना जाता है।

7. चन्द्रबली पांडे के अनुसार "विद्यापति काम ,कला और रस के पथिक" हैं। 

8. डॉ रामकुमार वर्मा के अनुसार "विद्यापति का अंतर्जगत उतना हृदयग्राही नही है जितना बाह्य "...।

● ऐसा माना जाता है कि जिस गांव में विद्यापति पैदा हुए थे वहाँ के राजा शिवसिंह ने उन्हें दान कर दिया था और उनके वंशजो के पास वो ताम्रपत्र अभी तक  सम्भाल के रखा था परंतु उन्हें अंग्रेजो ने हथिया लिया था।

सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018    

7. प्राचीन व पूर्व मध्यकालीन हिंदी काव्य,  डॉ दीनदयाल, के.एल. पचौरी प्रकाशन,  प्रथम संस्करण  2012                              

Saturday, January 16, 2021

आदिकाल भाग -2


आदिकालीन साहित्य

                     

                          ( जैन साहित्य)


●आदिकालीन जैन-साहित्य मूलतः धर्म, आस्था , लोक कथाओं, मिथकों आदि पर रचित काव्य है जोकि सिद्ध, नाथ, रासो आदि में सबसे ज्यादा प्रमाणिक काव्य माना गया है। इस साहित्य का मूलतः स्थान पश्चिमोत्तर भारत का माना जाता है।इन्होंने पुराण काव्य की भी रचना की है जैसे:-


(अपभ्रंश में )

स्वयम्भू - पउम चरिउ

पुष्पदंत - आदिपुराण (महापुराण)

विमलसुरी - पउम चरियम            


●इनकी कवियों की काव्य परम्परा कुछ इस तरह से है :-

जोइन्दु > स्वयम्भू > देवसेन > पुष्पदंत > रोड़ा कवि > मुनिरामसिंह > अब्दुर्रहमान > हेमचन्द्र > मेरुतुंग > लक्ष्मीधर ।


● "जोइन्दु" का जन्म 6ठी शती के आसपास माना जाता है  जिन्हें "दोहा शैली" का प्रथम प्रयोक्ता माना जाता है। इनकी दो प्रसिद्ध रचना है:- परमात्म प्रकाश और योगसार

● "स्वयम्भू" को अपभ्रंश का वाल्मीकि और व्यास कहा जाता है। इन्होंने एक प्रबन्धग्रन्थ "पउम चरिउ" की रचना की थी जिसको पूरा उनके पुत्र त्रिभुवन ने किया था। यह महाकाव्य रामकथा पर आधारित है।

डॉ रामकुमार वर्मा इन्हें अपभ्रंश भाषा के प्रथम कवि मानते हैं। और राहुल जी इन्हें अपनी पुस्तक "हिंदी-काव्यधारा" में 8वी शती का सबसे बड़ा कवि मानते हैं। परंतु रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस बात पर यह विवाद खड़ा किया है कि यह अपभ्रंश के कवि है न कि हिंदी के।

● डॉ नगेन्द्र "देवसेन" को हिंदी का प्रथम कवि मानते हैं। इन्होंने 933ई. में "श्रावकाचार" नामक एक ग्रन्थ की रचना की थी जिसमें श्रावक धर्म के बारे में लिखा है।

इनके शिष्य माइल धवल की रचना "द्रव्य-प्रकाश-स्वभाव" पहले अपभ्रंश में थी और अब हिंदी में मौजूद है।

● जिस "पुष्य या पुंड" कवि को शिवसिंह सेंगर ने 7वी शती का बताया है हजारीप्रसाद जी उन्हें 9शती का बताते हैं परंतु इनका सर्वमान्य समय 10वी शती ही माना गया है जोकि शुक्ल जी भी मानते हैं। ये मान्यआखेट के प्रतापी राजा कर्ण के सभाकवि थे।

इनकी रचना "महापुराण" में 63 महापुरुषों की कथा कही गयी है।यह रचना भी रामकथा पर आधारित है।

पुष्पदन्त को "अपभ्रंश का भवभूति" कहा जाता है। ये अपने-आप को अभिमान-मेरु, कवितिलक, काव्यरत्नाकर, आदि संज्ञा से सम्मानित करते हैं। 

● "रोड़ा कवि" को 10वी शती का बड़ा कवि माना जाता है जिनकी रचना "राउरवेल" एक तरह की गद्य-पद्य मिश्रित अपभ्रंश-मैथिली की श्रृंगारिक रचना है। जिमसें एक राजा के अन्तःपुर(ह्रदय) में बसने वाली कई रानियो का वर्णन है।

● "मुनिराम सिंह" को 11वी शती का मुख्य कवि कहा जाता है जिनकी रचना "पाहुड दोहा" है। यह एक रहस्यवादी कवि थे।

● "अब्दुर्रहमान" द्वारा रचित "सन्देश रासक" एक तरह का गेय-विरह-खंडकाव्य है। जिसमें  विक्रमपुर की रानी के विरह का वर्णन है। इसमें 223 छंद हैं और इसे हिंदी का प्रथम अभारतीय या अवधी भाषा का इस्लामिक ग्रन्थ माना जाता है। इसकी रचना 12वी शती के आसपास हुई थी।


● "हेमचन्द्र" गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह केे सभाकवि थे। इन्होंने "शब्दानुशासन" की रचना 13-14वी शती के बीच की थी जोकि व्याकरण ग्रन्थ है। जिसमें संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश के दोहे और पद्ध शामिल हैं। ये उस समय के प्रसिद्ध जैन-आचार्य समझे जाते थे।

बच्चन सिंह के अनुसार इन्हें प्राकृत का पाणिनी भी कहा जाता है।

इन्होंने राजा जयसिंह के भतीजे "कुमारपाल" पर एक रचना लिखी थी जिसका नाम "कुमारपाल-प्रतिबोध" था। जिसमें उनके शौर्य और वीरता की गाथा लिखी गयी थी।

शब्दानुशासन की प्रसिद्ध पंक्ति द्रष्टव्य है:-

"भल्ला हुआ जो बहिनी मारिया गया म्हारा कंतु....."

                                                        

● "जैन-आचार्य मेरुतुंग" का ऐतिहासिक ग्रन्थ "प्रबन्ध-चिंतामणि" 14वी शती की प्रसिद्ध रचना है जिसमे राजाओं-महाराजाओ ,ऐतिहासिक कथानकों का वर्णन है।


● "लक्ष्मीधर" द्वारा रचित "प्राकृत-पैंगलम" एक तरह का छंद शास्त्र है जिसमे कई राजाओं का वर्णन है। इसमें राजा हम्मीर से लेकर विद्याधर, जज्जल, बब्बर आदि का ज़िक्र है। ये ग्रन्थ 900 से 1400ई. तक की घटनाओं को प्रस्तुत करता है। डॉ सुनीतिकुमार चटर्जी भी इन्हीं तथ्यों को स्वीकारती हैं। इसका एक अन्य नाम "पिंगल-सूत्र" भी है।


(रास ग्रन्थ)

● जैन आचार्यो द्वारा अनेक "रास ग्रन्थ" भी लिखे गए जिन्हें लौकिक साहित्य का दर्जा मिला। ये एक तरह के गेय काव्य थे जोकि शादी-विवाह, त्यौहार आदि में गाए जाते थे। जिनमें ये मुख्य रास-ग्रन्थ हैं:-

● "उपदेशरसायन रास" ये जिनदत्त सूरी द्वारा लिखा प्रथम जैन-रास ग्रन्थ है जिसका समय 1114ई. तक माना जाता है। इसमें नृत्य सम्बन्धित 150 पद्य शामिल हैं।

● "भारतेश्वर-बाहुबली रास" ये शालीभद्र सूरी द्वारा लिखा गया है। जोकि हिंदी भाषा का प्रथम रास ग्रन्थ माना जाता है। गनपतिचन्द्र इन्हें "हिंदी का प्रथम कवि" मानते हैं। इसमें 205 पद्य हैं और इसका सम्पादन मुनिजिन विजय ने किया था।

● "चंदनबाला रास" आसगु द्वारा रचित 35 छन्दों का लघु-खंडकाव्य है जोकि 13वी शती में आया था। इसका अन्य नाम "जीवदया-रास" भी है।

● "रेवंतगिरी रास" में तीर्थंकर रेवंतगिरी और नेमिनाथ की प्रतिमा व महत्व का वर्णन है। इसकी रचना विजयसेन सूरी में 13वी शती में की थी।

इन जैन कवियो ने फागु साहित्य की भी रचना की थी। ये एक तरह का "ऋतु वर्णन काव्य" होता था जिसमें "वसन्त ऋतु" का विशेष वर्णन होता था। इसका प्रसिद्ध उद्धरण जिनदत्त सूरी का "जिनचन्द सरिफाग" है।


सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018                                      


Sunday, January 3, 2021

आदिकाल : भाग 1

 आदिकालीन साहित्य


             (आदिकालीन सिद्ध साहित्य)


● बौद्ध धर्म के पतन के बाद उसके नेता और उस सम्प्रदाय को चलाने वाले महात्माओं ने बौद्ध धर्म के नियमों को अपने अनुसार ढालने के चक्कर में उसे और बुरी तरह जर्जर कर दिया और वह वाममार्ग 'अर्थात टेढे मार्ग" की तरफ ले गए। जिससे तमाम तरह के कुसंस्कार इस सम्प्रदाय का हिस्सा बनने लगे। और धीरे-धीरे यह सम्प्रदाय अन्य छोटे-छोटे सम्प्रदायों में बटने लग गया। इन्हीं में से एक सम्प्रदाय का नाम वज्रयान था जिसमें से सिद्ध-योगी निकले थे। इन सिद्ध योगियों ने तंत्र-मंत्र ,स्त्री उपभोग, मद्यपान, मांस-भक्षण का सेवन शुरू किया और महासुखवाद कि परिभाषा को बदल कर उसे "सहवास सुख" से जोड़कर अपने सम्प्रदाय को चरम तक पहुँचाया। इसी कारण ये सम्प्रदाय जनता को लोकप्रिय नहीं हुआ। बल्कि इसने समाज को कुसंस्कारों से ग्रसित कर दिया और अपने सम्प्रदाय का डर कायम किया।

• हजारीप्रसाद जी के अनुसार वज्रयान शब्द का अर्थ कठोर, शत्रु-विनाश, वज्रपाणि (जोकि यक्षों के देवता का हथियार था), अमरत्व, और बाद में यह बौद्ध धर्म के शून्यवाद से जुड़ गया था। जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती थी।

• बच्चन सिंह व शुक्लानुसार सहजयान वज्रयान से आगे की सीढ़ी है, जहाँ योगी अपनी सारी इन्द्रियो को नियंत्रित करके सभी साधनात्मक पड़ावों को पार करके सिद्ध कहलाता था। ये सिद्ध योगी पहले तो अपने शरीर को कष्ट देकर मजबूत कर लेते थे फिर उसी तरह का सहज जीवन जीते थे। और शेष योगियो को भी इसी का उपदेश देते थे। जिससे कि प्रत्येक परिस्थिति में ये सिद्धयोगी उसका डटकर सामना कर सके।

• "बच्चन सिंह" के अनुसार ये मुख्यता छोटी जाती के होते थे। कुछ इनमे ब्राह्मण व क्षत्रिय भी होते थे। ये जात पात, आडम्बर, धर्मादि को नही मानते थे, कौल कापालिक थे। इनका छोटी स्त्रियों के साथ सम्पर्क में आना और शूद्रों के साथ रहना ब्राह्मणवाद का खंडन ही करता है।

ये मुख्यतः निरीश्वरवादी होते थे और इनके अड्डे पूर्वी भारत के बंगाल, बिहार, आसाम तक फैले रहते थे।

● शुक्ल व बच्चन सिंह के अनुसार सरहपा नालन्दा के छात्र के साथ अध्यापक भी थे। नालंदा में प्रवेश पाना कठिन होता था। उसके लिए कड़ी तपस्या करनी पड़ती थी। इसके अलावा सरहपा ने विक्रमशिला विश्विद्यालय में भी अध्धयन किया था।

● योग साधनात्मक प्रतीकों वाली भाषा को संध्याभाषा कहा जाता था। जिसका प्रयोग सिद्ध-नाथ दोनों तरह के योगी करा करते थे। इसका प्रतीकार्थ समझकर ही मूल अर्थ को समझा जा सकता था। कुछ इस तरह का प्रयोग कबीर की उलटबांसियों में भी हुआ है।

• "विश्वनाथ त्रिपाठी" के अनुसार सहजयान के प्रवर्तक सरहपा हैं- 

• शुक्लानुसार इनकी संख्या 84 बताई गई है। सरहपा के अन्य नाम हैं:- सरोजवज्र, सरहपाद, राहुलवज्र,आदि।

•इनमे कण्हपा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता था और लुइपा को सर्व-शिक्षित।     

• शुक्लानुसार इनमे 'पा' शब्द को आदरणीय माना जाता था जिसके लिए यह हर सिद्ध योगी के नाम के बाद इस का प्रयोग करते थे।                

• बच्चन सिंह के अनुसार इनके पांच मकार माने जाते थे:- मद्य, मांस, मुद्रा, मत्स्य, मैथुन।                 

• बच्चन व शुक्लानुसार दोहा-चौपाई का प्रथम प्रयोक्ता सरहपा को माना जाता है।

• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार पुरानी हिंदी का कवि सरहपा है जिसे राहुल सांकृत्यायन ने सर्वप्रथम मान्यता दी थी।                                        


●सिद्ध साहित्य पर कुछ पुस्तके प्राप्त है:-

1. पाश्चत्य विद्वान "बैंडल" ने सिद्ध साहित्य का सर्वप्रथम सम्पादन किया ।                        

2. 1917 में हरप्रसाद शास्त्री ने "बोधगान-ओ-दोहा" सम्पादन किया जोकि नेपाल से पांडुलिपि लेकर आये थे। इससे प्राचीन बंगला का पता चलता है।

3. 1928 में डॉ शमीदुल्ला ने " ले शा मिसतोस्क" नामक फ़्रेन्च ग्रन्थ का अनुवाद किया।

4. प्रबोधचन्द बागची ने तिलोपा, कण्हपा, सरहपा के दोहों का सम्पादन किया।

5. "हिंदी काव्यधारा" में राहुल सांकृत्यायन ने सिद्धो की रचनाओं का संकलन किया है जिनको वह तिब्बत से लेकर आये और सम्पादन किया।

                                                      

●सिद्धों की मुख्यतः दो प्रकार की रचनाएं होती थी:-

1. दोहा (दोहाकोष):- ये परिनिष्ठित अपभ्रंश में लिखे रहते थे जोकि उपदेश, विचार, तर्क आदि पर आधारित थे।

2. चर्यापद:- ये एक तरह के देसीभाषा में लिखे गीत होते थे जो विवाह, अनुष्ठानों में गाये जाते थे। इनकी भाषा को लोकभाषा भी कहा जाता था। इन गीतों की भाषा में पूर्वी बोलियों का जैसे मैथिली ,भोजपुरी का भी भाव आता था।

● सधुक्कड़ी भाषा:- बच्चन सिंह के अनुसार ये भाषा मूल रूप से खड़ीबोली के साथ किसी भी प्रादेशिक भाषा के इस्तेमाल को कहा जाता है। मसलन खड़ीबोली के साथ राजस्थानी का प्रयोग, भोजपूरी, मैथिली आदि का प्रयोग। जैसे कबीर, सिद्ध-नाथों की भाषा।

● सिद्ध-साहित्य में शिष्य परम्परा:-

769   सरहपा   

780 शबरपा

773 लुइपा

820 कण्हपा

840 डोम्भीपा


  


                   (आदिकालीन नाथ साहित्य)


● सिद्ध सम्प्रदाय की तरह ही नाथ सम्प्रदाय भी बौद्धधर्म की वज्रयान नामक एक शाखा से निकला है जो कि बौद्ध धर्म के विकृत होने के पश्चात समाज में पल्लवित हुआ था । सिद्ध योगियों की तुलना में नाथयोगी भी कुछ हदतक जात-पात का विरोध करना, बाह्य-आडम्बर, ढकोसला, धर्म की कुरीतियों पर प्रहार करना आदि कुछ बातों में उनसे समान रूप से मेल खाते नज़र आते हैं।  एक तरफ नाथपंथियों का एक रूप सिद्ध योगियों से मेल खाता दिखाई देता है तो वहीं स्त्री सुख , मोह माया, वीभत्स क्रीड़ा, मदपान,  माँस भक्षण आदि में वह उनसे कहीं बचते हुए पाए जाते हैं। जोकि नाथपंथियों का सामाजिक रूप से सम्बद्ध होने का परिचायक है

 इन नाथपंथी योगियों ने पतंजलि के "हठयोग" को अपनी साधना पद्धति का मार्ग बनाया था। जिसके माध्यम से यह अपने सम्प्रदाय को सामाजिक मोह-माया से व खुद को स्थिर करने में सफलता का साधन मानते थे और मोक्ष प्राप्त करने का तरीका भी। ये अपने आप को भरपूर कष्ट पहुँचा कर, तप आदि करके मजबूत बनाते थे जिससे कि नाथपंथी योगी हर परिस्थिति में खुद को उसके अनुकूल बना सके।

इन योगियों का निवास स्थान उत्तर-पश्चिमी भारत का मैदानी क्षेत्र होता था जोकि पंजाब, राजस्थान, गुजरात आदि तक फैला रहता था।  

"हजारीप्रसाद" के अनुसार सम्प्रदाय को अवधूत मत,  सिद्धमत, सिद्धमार्ग,  योगमार्ग, आदि नामों से भी जाना जाता है।

"शुक्ल" के अनुसार अपने कानों में छेद करके स्फटिक के बड़े-बड़े गोल-गोल कुंडल पहना करते थे जिसके कारण इन्हें कनफटे योगी भी कहा जाता था। 

नाथों का ईश्वरवादी होने से उन्हें जनता में ज्यादा लोकप्रिय माना गया क्योंकि ये सिद्धो की तरह वीभत्स कार्यों में लीन नहीं रहते थे और स्त्री को उपभोग की वस्तु भी नहीं मानते थे इस कारण नाथों को समाज मे ज़्यादा महत्व मिला।

"बच्चन सिंह" के अनुसार यह नाथपंथी योगी हमेशा ब्राह्मणों से शास्त्रार्थ करते रहते थे। कण्हपा से इनके संघर्ष की कथा सर्वविदित है।

● हजारीप्रसाद जी की पुस्तक "हिंदी साहित्य की भूमिका" के अनुसार सुरति-निरति, षटचक्र-भेदन, इला-पिंगला, शून्य-बिंदु, नाड़ी-भेदन आदि ये इनके साधनात्मक अंग होते थे जिनके माध्यम से यह तमाम तरह के योग करके शरीर को स्वस्थ करते थे। मूलाधार से होते हुए सहस्रदल में कमल खिलाने जैसे प्रतीकात्मक क्रियाएँ करते थे जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती थी। इन सिद्ध-नाथ योगियों की इसी प्रतीकात्मक भाषा को "संध्याभाषा" कहा जाता था। जिसे सामान्य व्यक्ति आसानी से नहीं समझ सकता है। इसके लिए उसे गहन अध्ययन की आवश्यकता जरूरी है।

ये लगातार यात्रा करते रहते थे जिससे कि इनकी भाषा में बहुत से शब्द आ गये थे। जिससे इनकी भाषा को भी संतो की तरह सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोक्ता माना जाता था। या इसे यूँ भी समझ सकते हैं कि इन नाथपंथी योगियों की इस भाषा प्रवृति का प्रभाव बाद में आने वाले उन संतो पर भी पड़ा जोकि अपनी भाषा प्रयोग के लिए "सधुक्कड़ी भाषा " जैसी संज्ञाओं से सम्मानित किए जाते थे। 


● हजारीप्रसाद के अनुसार गोरखनाथ के लिए 

1. "शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और महिमान्वित भारतवर्ष में कोई दूसरा नहीं हुआ"...।

2. "भक्तिआन्दोलन से पहले सबसे शक्तिशाली धार्मिक नेता  और धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का ही था".. ये अपने युग के सबसे बड़े नेता थे..।


● मिश्रबन्धुओ में गोरखनाथ को हिंदी का प्रथम गद्य लेखक माना है।

 ● इन योगियों की संख्या 9 मानी गयी है जोकि क्रमशः कुछ इस प्रकार है:- 

आदिनाथ (शिव), जलंधरनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ

गेंगीनाथ, निवृतिनाथ, चर्पटनाथ आदि।


● गोरखनाथ का अन्य विद्वानों के आधार पर जन्मकाल:-

845 ई. - राहुल सांकृत्यायन

9 वी शती - हजारीप्रसाद

11वी शती - पीताम्बर दत्त

13वी शती - शुक्ल व रामकुमार वर्मा

वेसे तो गोरखनाथ के समय को लेकर विद्वानों में एकमत नही है परंतु फिर भी उनका समय 9 शती के आसपास ही माना गया है। 

●नाथों पर लिखी गयी या उनकी प्राप्त पुस्तकें हैं:-

28 मिश्रबन्धुओ ने मानी।

9 हजारीप्रसाद ने मानी।

14 पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने मानी।


●महाराष्ट्र के वारकरी और उड़ीसा के पंचसखा सम्प्रदाय पर गोरख का स्पष्ट प्रभाव था।


सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

एक मध्यवर्गीय कुत्ता

  आज पढ़िए व्यंगय विधा के गुरु हरिशंकर परसाई का लेख "एक मध्यवर्गीय कुत्ता" जोकि मध्यवर्ग की धज्जियां उड़ाता है।  लेख का मकसद मध्यवर्...