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Friday, June 25, 2021

उपन्यास भाग - 1


                            (उपन्यास)

हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।

                        

● उपन्यास हिंदी गद्य की एक आधुनिक विधा है। इस विधा का हिंदी में प्रादुर्भाव अंग्रेज़ी साहित्य के प्रभाव स्वरूप हुआ । लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इससे पहले भारत में उपन्यास जैसी विधा थी ही नहीं । संस्कृत , पालि, प्राकृत , अपभ्रंश आदि में अनेक नीति कथाएँ तथा आख्यान मिलते हैं जिनमें उपन्यास विधा के अनेक तत्त्व मिलते हैं । लेकिन हम उनको उपन्यास नहीं कह सकते । सच्चाई तो यह है कि इस विधा का उद्भव और विकास पहले यूरोप में हुआ । बाद में बांग्ला के माध्यम से यह विधा हिंदी साहित्य में आयी ।

उपन्यास ‘उप’ और ‘न्यास’ से मिलकर बना है। ‘उप’ का अर्थ समीप और ‘न्यास’ का अर्थ है रचना। अर्थात्‌ उपन्यास वह है जिसमें मानव जीवन के किसी तत्त्व को उक्तिउक्त के रूप में समन्वित कर समीप रखा जाए।

• संस्कृत लक्षण ग्रंथों में भी उपन्यास का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है। किन्तु उस उपन्यास शब्द और आज के उपन्यास शब्द में भिन्नता है। संस्कृत साहित्य में एक स्थान पर कहा गया है, “उपन्यासः प्रसाधनम्‌” अर्थात्‌ प्रसन्नता प्रदान करने वाली कृति उपन्यास है। किन्तु संस्कृत नाट्य शास्त्र में उपन्यास को प्रतिमुख संधि का एक उपभेद माना गया है, जिसकी व्याख्या में कहा गया है ‘उपपति वृतहथ उपन्यासः प्रकृतितः’ अर्थात्‌ किसी अर्थ को उसके उक्तिउक्त अर्थ में उपस्थित करने को उपन्यास कहा जाता है। किन्तु आज उपन्यास शब्द के अन्तर्गत गद्य द्वारा अभिव्यक्त सम्पूर्ण कल्पना प्रसूत कथा साहित्य में ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त उपन्यास शब्द और आधुनिक उपन्यास शब्द में ज़मीन आसमान का अंतर है।

इसमें उपन्यासकार मानव जीवन से संबंधित सुखद एवं दुखद किन्तु मर्मस्पर्शी घटनाओं को निश्चित तारतम्य के साथ चित्रित करता है। उपन्यास एक ऐसी लोकप्रिय साहित्यिक विधा है जिसे मानव जीवन का यथार्थ प्रतिबिंब कहा जा सकता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। इस प्रसंग में आचार्य "नंददुलारे वाजपेयी" ने अपनी पुस्तक “आधुनिक साहित्य” में लिखा है कि उपन्यास में आजकल गद्यात्मक कृति का अर्थ लिया जाता है। पद्यबद्ध उपन्यास नहीं हुआ करते। उपन्यास के विकास से गद्य का विकास का भी संबंध है। प्रायः वही परिस्थिति गद्य के विकास में सहायक हुई हैं जो उपन्यास के विकास में योग दे रही थीं। यूरोप में गद्य उपन्यासों के पहले कुछ प्रेमाख्यान कविताएं प्रचलित थीं। उन्हें ही आधुनिक उपन्यास की जननि कहा जा सकता है।”

डॉ. "हजारीप्रसाद द्विवेदी" के अनुसार “उपन्यास आधुनिक युग की देन है। नए गद्य के प्रचार के साथ-साथ उपन्यास प्रचार हुआ है। आधुनिक उपन्यास केवल कथा मात्र नहीं है और पुरानी कथाओं और आख्यायिकाओं की भांति कथा-सूत्र का बहाना लेकर उपमाओं, रूपकों, दीपकों और श्लेषों की छटा और सरस पदों में गुम्फित पदावली की छटा दिखाने का कौशल भी नहीं है। यह आधुनिक वैक्तिकतावादी दृष्टिकोण का परिणाम है।”

डॉ. "श्यामसुंदर दास" उपन्यास को मानव के वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा मानते हैं, किन्तु मुंशी प्रेमचंद जी कहते हैं, “मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।”

"क्षेमेन्द्र सुमन" के अनुसार उपन्यास मानव जीवन की आन्तरिक और बाह्य परिस्थितियों का उसके मन के संघर्ष-विघर्ष का, उसके चारो ओर के वातावरण और समाज का काल्पनिक चित्र है, किन्तु काल्पनिक होता हुआ भी वह यथार्थ है। उसमें जीवन के स्त्य की अभिव्यक्ति होती है।

डॉ, "जे. बी. क्रिस्टले" लिखते हैं, “उपन्यास जीवन का विशाल दर्पण है और इसका विस्तार साहित्य के किसी भी रूप से बड़ा है।” इसी प्रकार रौल फ्रांस के अनुसार “उपन्यास केवल काल्पनिक गद्य नहीं है वरन वह मानव जीवन का गद्य है। ऐसी प्रथम कला जिसने सम्पूर्ण मानव को लेने और उसे अभिव्यंजना देने का प्रयास किया है लेकिन इसके विपरीत विलियम हेनरी हेडसन के अनुसार, “मानव और मानवीय भावों से तथा क्रियाओं की विस्तृत चित्रावलि ने नर एवं नारियों की सार्वकालिक, सार्वदेशिक रुचि ही उपन्यास के अस्तित्व का कारण है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उपन्यास की एक सर्वमान्य परिभाषा निर्धारित करना कठिन है। इस कठिनाई की ओर इंगित करते हुए डॉ. देवराज लिखते हैं, “उपन्यास की कोई निश्चित परिभाषा देना कठिन है। प्रायः यह अंग्रेज़ी में Novel शब्द का पर्यायवाची शब्द समझा जाता है। पर Novel का प्रयोग अंग्रेज़ी में जहां एक ओर सुसंगठित कथाओं के लिए भी किया जाता है वहीं दूसरी ओर अतीत की स्मृतियों के लिए भी, जिन कथाओं का कोई विस्तृत रूप नहीं है। अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि उपन्यास मानव जीवन की कथा है।

● शुक्ल के अनुसार हिंदी उपन्यास पर बाँग्ला उपन्यासों का प्रभाव सीधे सीधे देखा गया क्योंकि हिंदी में नाटक और निबन्ध काफी लिखे जा चुके थे, अब समय आ चुका था कि बाँग्ला से उपन्यासों का भी अनुवाद हिंदी में किया जाए जिससे कि हिंदी में भी उपन्यास लिखने की मदद मिल सके। हिंदी में उपन्यास जैसी विधा की शून्यता को मिटाने के लिए इससे अच्छा वक्त और नहीं था। इन अनुवादों से बड़ा भारी काम यह हो गया था कि नए ढंग के सामाजिक और ऐतिहासिक उपन्यासों के ढंग का अच्छा परिचय हो गया और स्वतंत्र उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति और योग्यता उत्तपन हो गई।

शुक्ल के अनुसार "प्रथम उत्थान तक हिंदी में अनुदित उपन्यासों का ताँता बन्ध गया था"...।

●शुरुआती 20 वर्षो में 5 ऐसी पत्रिकाएँ थी जो उपन्यासों को प्रकाशित करती थी:-

देवकीनंदन खत्री - उपन्यास लहरी

किशोरीलाल गोस्वामी - उपन्यास

गोपालराम गहमरी - जासूस

जयरामदास गुप्त - उपन्यास बहार

रामलाल वर्मा - दरोगा दफ्तर

हिंदी-उपन्यास के विकास-क्रम को समझने के लिए इसे तीन भागों में बाँटा जा सकता है :

1. प्रेमचंद पूर्व युग
2. प्रेमचंद युग
3.  प्रेमचन्दोत्तर युग

हिंदी साहित्य में उपन्यास

हिंदी साहित्य में उपन्यास शब्द के प्रथम प्रयोग के संदर्भ में गोपाल राय लिखते हैं कि- "हिन्दी में नॉवेलके अर्थ में उपन्यास पद का प्रथम प्रयोग 1875 ई. में हुआ।"[1]

प्रथम उपन्यास

बाणभट्ट की कादम्बरी को विश्व का प्रथम उपन्यास माना जा सकता है। कुछ लोग जापानी भाषा में 1007 ई. में लिखा गया “जेन्जी की कहानी” नामक उपन्यास को दुनिया का सबसे पहला उपन्यास मानते हैं। इसे मुरासाकी शिकिबु नामक एक महिला ने लिखा था। इसमें 54 अध्याय और करीब 1000 पृष्ठ हैं। इसमें प्रेम और विवेक की खोज में निकले एक राजकुमार की कहानी है।

यूरोप का प्रथम उपन्यास सेर्वैन्टिस का “डोन क्विक्सोट” माना जाता है जो स्पेनी भाषा का उपन्यास है। इसे 1605 में लिखा गया था।

अंग्रेजी का प्रथम उपन्यास होने के दावेदार कई हैं। बहुत से विद्वान 1678 में जोन बुन्यान द्वारा लिखे गए “द पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस” को पहला अंग्रेजी उपन्यास मानते हैं।

• भारतीय भाषाओं में उपन्यास

जिसे बँगला और हिंदी में उपन्यास कहा जाता है गोपाल राय के अनुसार उसे "उर्दू में 'नाविल', मराठी में 'कादम्बरी' तथा गुजराती में 'नवल कथा' की संज्ञा प्राप्त हुई है।"[2]

हिन्दी का प्रथम उपन्यास

यह भी एक विचारणीय प्रश्न है कि हिंदी का पहला उपन्यास किसे स्वीकार किया जाए । इस संदर्भ में विद्वान अनेक औपन्यासिक कृतियों पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं । लाला श्रीनिवास दास ( Lala Shrinivas Dass ) का ‘परीक्षा गुरु ( 1882) (Preeksha Guru )’ तथा श्रद्धा राम फ़िल्लौरी कृत  ‘भाग्यवती‘ आदि कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जिन्हें हिंदी का प्रथम उपन्यास माना जाता है । यहां एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि भाग्यवती उपन्यास यद्दपि 1877 में लिखा जा चुका था तथापि परीक्षा गुरु को हिंदी का प्रथम उपन्यास इसलिए भी माना जाता है क्योंकि वह प्रकाशन वर्ष की तुलना में पहले आ चुका था। लिहाजा हिंदी का प्रथम उपन्यास लाला "श्रीनिवासन दास" कृत 'परिक्षागुरु' ही है ।

मलयालम

इंदुलेखा - रचनाकाल, 1889, लेखक चंदु मेनोन

तमिल

प्रताप मुदलियार - रचनाकाल 1879, लेखक, मयूरम वेदनायगम पिल्लै

बंगाली

दुर्गेशनंदिनी - रचनाकाल, 1865, लेखक, बंकिम चंद्र चटर्जी

मराठी

यमुना पर्यटन - रचनाकाल, 1857, लेखक, बाबा पद्मजी।इसे भारतीय भाषाओं में लिखा गया 'प्रथम उपन्यास' माना जाता है। इस तरह हम देख सकते हैं कि भारत की लगभग सभी भाषाओं में उपन्यास विधा का उद्भव लगभग एक ही समय दस-बीस वर्षों के अंतराल में हुआ


● हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासों के कथानक व मुख्य बातें :-

1. प.गौरीदत्त:- 

गोपालराय के अनुसार हिंदी का प्रथम उपन्यास गौरी दत्त का "देवरानी जेठानी की कहानी" 1870 है।

2.  श्रद्धाराम फुललोरी :- 

 इनका उपन्यास "भाग्यवती" 1877 मेंं आया था  इसका उद्देश्य था कि " अखण्ड भारत की स्त्रियां "ग्रहस्थ धर्म की शिक्षा" प्राप्त कर सके"..। (भूमिका से)

3. लाला श्रीनिवासन दास :- 

"परीक्षा गुरु" 1882 की भूमिका में लिखा है "इससे पूर्व के उपन्यास केवल नायक-नायिका , राजा, सेठ-साहू आदि से समबन्धित लिखे जाते थे। परंतु पहली बार भारतीय मध्यवर्ग को लेकर पाश्चात्य संस्कृति के हानिकारक प्रभाव का वर्णन दिखाया गया है , जोकि सचमुच हिंदी में नई चाल का उपन्यास सिद्ध हुआ"..।

लेखक ने बताया है कि जो बात सौ बार बताने से भी मन मे नहीं बैठती वह एक परीक्षा से मन में बैठ जाती है।

"बच्चन सिंह" के अनुसार इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि" इसमें नवजागरण की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। अपनी भाषा की उन्नति के साथ ही इसमें नए ढंग की खेती और कल-कारखाने की उन्नति पर बल दिया जाता है। "अंग्रेज़ो की नकल को निषिद्ध ठहराया है और देशी भाषा में शिक्षा देने पर जोर दिया गया है। अखबारों की कद्र न करने की निंदा की गई है। पुरानी पीढ़ी की कर्मठता को अनुकरणीय बताया गया है। इस तरह उस युग को समग्रता में समेटने का जो प्रयास लालाजी ने किया है, वह प्रशंसनीय है" .। 

बच्चन सिंह के अनुसार " प्रेमचंद के आदर्शमुखी यथार्थ  गंगा की गोमुखी यही है"...। 

रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "इसका स्वर सात्विक और वातावरण नैतिक रखने के लिए प्रसिद्ध पुरुषों के आत्म वचन को रखा गया है। पुराने रूपकों की व्याख्या करके सादृश्य पर देखें तो यह विवेक और परम्परा का सहारा है जो विदेशी आक्रामक संस्कृति से रक्षा करता है। यह रचना स्वयं " भारतीय और अंग्रेजी संस्कृतियों के संघर्ष को अपना उपजीव्य बना कर चलती है'...।"

• हिंदी की प्रथम अंग्रेजी ढंग का और प्रथम मैलिक  उपन्यास भी इसी को दिया जाता है। इसमे भारतीय मध्यवर्ग के आकर्षण के बहकावे में आकर अपनी गर्त का कारण बनने और उसके बचने की कथा है।

4. "किशोरीलाल गोस्वामी" जी के उपन्यासों पर "बंकिमचंद्र चटर्जी" का प्रभाव है और बाँग्ला उपन्यासों पर अंग्रेजी का सीधा प्रभाव है, तो कहा जा सकता है कि हिंदी उपन्यासों पर अंग्रेजी से होते हुए बाँग्ला उपन्यासों का प्रभाव सीधा है।

5. बालकृष्ण भट्ट :-

 "नूतन ब्रह्मचारी" 1886 में उपन्यास का मुख्य पात्र "विनायक" के व्यवहार से डाकुओं के हृदय परिवर्तन की कथा है जिसमें 2 विरोधी प्रकार के चरित्रों को उद्घाटित किया है। 

इसका आरम्भिक प्रकाशन "हिंदी प्रदीप" में हुआ था।

6. ठाकुर जगमोहन सिंह :- 

"श्यामास्वप्न " 1888 में सँस्कृत की प्रेमकथा के आधार पर लिखी गयी है जिसमें ब्राह्मण कुमारी और क्षत्रिय कुमार के स्वछंद प्रेम की कथा दिखाई है । जाति प्रथा को तोड़ने का यह अच्छा प्रयास रहा है। इसमें ग्राम्य जीवन के दृश्य दिखाए गए हैं।  

7. राधाकृष्ण दास :- 

निःसहाय हिन्दू" 1890 हिंदुओ की निस्सहायता और मुस्लिमों की धार्मिक कट्टरता के साथ हिन्दू मुस्लिम मित्रता भी दिखाई है। गोवध निवारण इस उपन्यास का मुख्य उद्देश्य था।

8. लज्जाराम मेहता :-

 "धूर्त रसिकलाल" 1889 में उसकी धूर्तता दिखाई गई है। वह आने वाले मित्र सोहनलाल को फंसाने की कोशिश करता है परंतु अंततः पकड़ा जाता है।

 "स्वतन्त्र रमा और परतन्त्र लक्ष्मी "1899 में 2 सगी बहनों रमा और लक्ष्मी के माध्यम से भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित महिलाओ को दिखाया गया है।  

"आदर्श दम्पति" 1904 में एक भारतीय दम्पत्ति की कथा दिखाई है जिसमें उनके भारतीय संस्कृति के अनुसार प्रेम करने की कथा को रखा गया है।

"बिगड़े का सुधार" 1907 में M.A तक शिक्षा पाए नयी सभ्यता के बनमाली बाबू और उनकी लटनी की कथा दिखाई है जिसमें बनमाली बाबू नई सभ्यता की धुन में एक होटल की नौकरानी से प्रेम कर लेते हैं परन्तु अंत में उसका परदेसीपन का भूत उतर जाता है।

9. हरिऔध :-

"ठेठ हिंदी का ठाठ" 1898 का अन्य नाम 'देवबाला' है।जिसमें अनमेल विवाह की समस्या उठाई है और उसके दुष्परिणाम को दिखाया है।

" अधखिला फूल" 1907 में धर्म की महत्ता और अंधविश्वास के कुपरिणाम को दिखाया गया है। 

10. देवकीनंदन खत्री :-

तिलिस्मी शब्द यूनानी के "टेलेसमा" और अरबी के "तिलिस्म" का हिंदी संस्करण है। जिसका प्रयोग जादू, अलौकिक, इंद्रजाल, गड़े हुए धन आदि घटनाओं को दिखाने के लिए किया जाता है। जिन उपन्यासों में कथानायक द्वारा किसी तिलस्मी इमारत को तोड़कर खजाना प्राप्त करने की कथा वर्णित होती है उन्हें 'तिलस्मी उपन्यास' कहा जाता है। इस कार्य में नायक को ऐयारों से बड़ी मदद मिलती है। ऐयार शब्द 'अरबी' का है जिसका अर्थ होता है 'ऐसा व्यक्ति जो तीव्रगामी, चपल, चतुर, हो।'

देवकीनंदन खत्री कहते हैं " ऐयार उसको कहा जाता है जो हर एक "फन" (कला) को जानता हो। शक्ल बदलने से लेकर दौड़ना उसका मुख्य काम रहता है"...। (चन्द्रकान्ता, पृ 2, फुटनोट से)

रामचंद्र तिवारी अपनी विशालकाय रचना 'हिंदी का गद्य साहित्य' में कहते हैं -   काशीनरेश की कृपा से आपको चकिया और नौगढ़ के जंगलों के ठीका मिल गया था। इन्हीं जंगलों और पहाड़ों में अनेक  इमारतों के भगनावशेषों को देखने से आपकी रहस्मयी कल्पना-शक्ति स्फुरित हुई और आपने चन्द्रकान्ता लिखकर हिंदी में तिलस्मी-ऐय्यारी उपन्यासों का प्रवर्तन किया।


" चन्द्रकान्ता" 1888 में विजयगढ़ की राजकुमारी "चन्द्रकान्ता" और नौगढ़ के राजकुमार "वीरेंद्र सिंह" की प्रेम कथा को जादुई रूप में दिखाया गया है।

• इस उपन्यास के बारे में "शुक्ल जी" कहते हैं कि "इसे पढ़ने के लिए कई उर्दू भाषियों ने हिंदी सीखी थी"..।

"शुरू-शुरू में "चन्द्रकान्ता" और "चन्द्रकान्ता संतति" पढ़ कर न जाने कितने नवयुक हिंदी के लेखक हो गए। चन्द्रकान्ता पढ़कर वे हिंदी और प्रकार की भी रचनाएँ पढ़ गए और आगे चलकर कुछ लिखने भी लगे"...। उनके अनुसार "हिंदी साहित्य के इतिहास में "देवकीनंदन खत्री" का स्मरण इस बात के लिए सदा बना रहेगा कि उन्होंने जितने पाठक बनाए उतने और किसी ने नहीं"...।

• "बच्चन सिंह" चन्द्रकान्ता की तुलना पद्मावत से करते हुए कहते हैं कि" यह जायसी के सिंहलगढ़ से भी ज्यादा अधिक रहस्यमय है। इसमें एक बार फँसने के बाद निकलना मुश्किल है, इसमें एक ऐसा बगुला है कि जो आपको देखे तो आपको लील जाए और कहीं गुंजलक मारे अजदहा बैठा है उसने साँस ली कि आप उसके पेट में। ऐसे कई किस्से है इसमें और ऐशोआराम के कई दृश्य हैं"...।

• "प्रदीप सक्सेना" ने यह प्रमाणित किया है कि "चन्द्रकान्ता" यथार्थवाद के प्रथम उत्थान के महाकाव्य है। चन्द्रकान्ता 2 युगों के उस संधिस्थल पर खड़ी है, जहाँ से एक युग ढह रहा है और दूसरा उभर रहा है" (आलोचना,जनवरी-मार्च, 1986,पृ53)

तिलस्मी उपन्यासों को शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य कोटि में नहीं रखा है।

11. गोपालराम गहमरी :-

गोपालराम गहमरी "जासूस " नामक पत्रिका निकलते थे। जिस तरह से पाश्चत्य साहित्य में "सर ऑर्थर कानन डायल" का नाम जासूसी उपन्यासों के लिए प्रसिद्ध है ठीक उसी तरह हिन्दी में "गोपालराम गहमरी" का नाम प्रसिद्ध है। उन्होंने 200 से ज्यादा जासूसी उपन्यास लिखे। इन उपन्यासों का विषय वस्तु चोरी, डकैती, खून आदि से जुड़ा होता था जिसमें जासूस को उस समस्या का हल निकालना पड़ता था। इनका एक उद्देश्य मनोरंजन करना भी होता था।

इन्हें 'हिंदी का कानन डायल' कहा जाता है।

• हिंदी सहित्य में जासूसी और अय्यारी उपन्यासों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए प्रेमचंद ने कहा था - "जिन्हें जगत गति नही व्याप्ति वह आजकल जादुई उपन्यास लिखने लगे हैं".।(कुछ विचार,प्रेमचंद-पृ99)


• उपन्यास विधा की शुरुआत जासूसी, एय्यारी, तिलस्मी या आशिकी मिजाज वाले उपन्यासों की बाढ़ से हुआ। उसी सम्बन्ध में समाज के दूषित होने से जुड़ा एक विवाद चला जिसके केंद्र में सबसे ज्यादा "देवकीनंदन खत्री" के तिलिस्मी और "किशोरीलाल गोस्वामी" के ऐतिहासिक उपन्यास आये।

"चन्द्रकान्ता" और "चन्द्रकान्ता सन्तति" में वर्णित घटनाओं की यथार्थता को लेकर कई अंको में विचार-विमर्श किया। सबसे पहले विरोध "लज्जाराम मेहता" ने किया था। इस पूरे विवाद में मूल प्रश्न यथार्थ अभिव्यक्ति पर था जिसके घेरे में सबसे ज्यादा किशोरीलाल गोस्वामी घेरे गए। उनके 60 से ज्यादा उपन्यासों में प्रकृतवादी चित्रण (नग्नता) दिखाई गई है और उनका वृंदावन में पला बढ़ा होना मेल नहीं खाता कि ऐसी जगह पोषित होकर किसी पर इस तरह का प्रभाव पड़ सकता है।

उपन्यासों और उपन्यासकारों के विवाद से वह उसके प्रभाव पर आ जाता है जहाँ सबसे पहले "चम्पालाल जौहरी" 'सुधाकर' "हिंदी साहित्य में डकैती" शीर्षक इंदु में प्रकाशित करवाते हैं जोकि "विष्णुचंद्र शर्मा" के "हिंदी का हानिकर साहित्य" के प्रतिवाद स्वरूप लिखा गया था। जिसमें उन्होंने 3 हानियाँ गिनाई थी-

1. यह श्रृंगार रस के होते हैं जिससे पाठकों के मन में कुवासना आ जाने का खतरा होता है।

2. ऐहिक और पारलौकिक कार्यों में किसी तरह की सिद्धि नहीं होती।

3. मन और बुद्धि का सुखियापन होता है।

इसका उत्तर "सुधाकर" जी इंदु में प्रकाशित लेख से कहते हैं कि " माना कि श्रृंगारिक उपन्यासों से कुवासना आती है लेकिन सभी प्रकार के उपन्यास श्रृंगारिक नहीं होते हैं इस लिहाज से जो नैतिकता वादी उपन्यास हैं वह भी छत जाएँगे। ऐतिहासिक उपन्यास भी इतने प्रभावी होते हैं कि उनकी छाप लंबे समय तक पाठकों के हृदय से जाती नहीं। किंतु पण्डित जी नैतिक उपन्यास को भी हानिकारक बताते हैं"...।

 ● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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डॉ धर्मवीर की समझ -

 

तारीख़ पर छूकर आप सीधे 'हिंदी आलोचना' के मंच पर भी जा सकते हैं।

डॉ. धर्मवीर की समझ

 अस्मितावाद की धर्मवीरी समझ 

       राजीव रंजन गिरि

हिन्दी कथा-साहित्य की कर्मभूमि बदलकर उसका कायाकल्प करने वाले अमर कथाकार प्रेमचन्द की रचनाओं पर विद्वानों के बीच वाद-संवाद होते रहे हैं। अपनी-अपनी वैचारिक समझ और नजरिये से विद्वानों ने उनकी रचनाओं को विवेचित-विश्लेषित किया है। इन लोगों की समझ और नजरिये का फर्क ही रचना पर भिन्न स्थापना कराता है। प्रेमचन्द जिस दौर में लिख रहे थे, उस समय के कुछ आलोचकों ने प्रेमचन्द की तीखी आलोचना की थी। इलाचन्द्र जोशी और हेमचन्द्र जोशी जैसे लेखकों का मानना था कि प्रेमचन्द की रचनाएँ भविष्य में याद नहीं की जाएँगी। नन्द दुलारे वाजपेयी ने इन्हें 'समसामयिक विषय का कथाकार' कहकर आलोचना की थी। असल में प्रेमचन्द की कई रचनाएँ स्वाधीनता-आन्दोलन में घटित सच्ची घटनाओं पर आधारित थीं। इसे ही परखकर जोशी बन्धुओं ने अपनी राय बनायी थी कि आनेवाले समय में प्रेमचन्द की कहानियाँ बासी हो जाएँगी। प्रेमचन्द की कहानियों की व्यापक लोकप्रियता ने ऐसी मान्यताओं का पुरजोर जवाब दे दिया है। यह था प्रेमचन्द की आलोचना का एक पक्ष। ज्योति प्रसाद निर्मल, ठाकुर श्रीनाथ सिंह जैसे लेखकों ने अपनी जातिवादी मानसिकता के साथ प्रेमचन्द की आलोचना की थी। इन लोगों का मानना था कि प्रेमचन्द अपनी रचनाओं में ब्राह्मणों, जमींदारों को काले रंग में चित्रित करते हैं। लिहाजा, 'घृणा के प्रचारक' हैं। प्रेमचन्द की आलोचना का यह दूसरा पक्ष था।

                ठाकुर श्रीनाथ सिंह और ज्योति प्रसाद निर्मल की आलोचना के आधार पर देखा जाये तो जमींदारों और उच्च जातियों को काले रंग में चित्रित करने का क्या मतलब निकलेगा? ऐसे में प्रेमचन्द की पक्षधरता किस तबके के साथ साबित होगी? जाहिर तौर पर, तथाकथित निम्न जातियों और समाज के दबे-कुचले लोगों के प्रति।

अस्मितावादी विमर्श ने प्रेमचन्द की रचनाओं का अपने नजरिये से मूल्यांकन किया है। डॉ. धर्मवीर की, प्रेमचन्द पर  प्रकाशित, तकरीबन साढ़े सात सौ पृष्ठों की किताब 'प्रेमचन्द की नीली आँखेंÓ (वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली) प्रेमचन्द को बिल्कुल भिन्न धरातल पर विवेचित-विश्लेषित करती है। प्रेमचन्द की प्रगतिशील छवि पर अपने वैचारिक मानस के हिसाब से सवाल उठाते हुए डॉ. धर्मवीर ने कुछ साल पहले एक किताब लिखी थी, 'प्रेमचन्द : सामन्त का मुंशी'। इस किताब में धर्मवीर ने 'कफन' कहानी को केन्द्र में रखकर अपनी राय जाहिर की थी। 'कफन' कहानी का विश्लेषण करते हुए धर्मवीर ने कहा था कि बुधिया के पेट में जमींदार का बच्चा था। चूँकि यह तथ्य या इसका संकेत कफन कहानी में नहीं मिलता; लिहाजा धर्मवीर के विश्लेषण और अभिमत की तीखी आलोचना हुई थी। 'प्रेमचन्द : सामन्त का मुंशी' में, इन्होंने लिखा था कि 'इस छोटी पुस्तक में इसी नजरिये से देखा गया है कि वे दलित और स्त्री के मामले में समय के दबाव के बदले हुए सामन्ती विचारों के व्यक्ति और प्रतिनिधि साहित्यकार थे।'
                  डॉ. धर्मवीर का यह बीज-विचार 'प्रेमचन्द की नीली आँखें में पल्लवित-पुष्पित हुआ है। अपनी इस  किताब में, इन्होंने लिखा है कि 'प्रेमचन्द पर मुझे कुछ भी नहीं कहना था। प्रेमचन्द और प्रेमचन्द का साहित्य मेरे चिन्तन के विषय नहीं थे। वे पुस्तकों की मेरी स्कीम से बाहर थे। लेकिन भ्रम यह फैलाया गया कि प्रेमचन्द प्रो-दलित और प्रो-वूमेन थे। यह बर्दाश्त से बाहर की बात थी।' चूँकि धर्मवीर के लिए, अब तक चली आ रही, प्रेमचन्द पर स्त्री-दलित सम्बन्धी मान्यताएँ बर्दाश्त से बाहर थीं, लिहाजा यह लिखी गयी।
                    इस भारी-भरकम किताब में डॉ. धर्मवीर ने तीन दावा पेश किया है-''एक, प्रेमचन्द के उपन्यास 'रंगभूमि' का असली सामाजिक सन्दर्भ ढूँढ़ निकाला है। यह स्वामी अछूतानन्द के रूप में चमारों के आदि हिन्दू आन्दोलन का है। दो, प्रेमचन्द की रखैल ढूँढ़ ली है कि वह कानपुर की और कानपुर में होनी चाहिए। यह भी अन्दाजा लगाया है कि वह चमारी होनी चाहिए। तीन, कायस्थों के इतिहास की एक व्याख्या दी है कि कायस्थ शब्द 'क्राइस्ट' से बना हो सकता है।'
                         सवाल उठता है कि डॉ. धर्मवीर ने रचनाकार प्रेमचन्द को किस रूप में देखा है? प्रेमचन्द पर लिखी इनकी किताबों से साफ पता चलता है कि इन्हें महज कायस्थ जाति के एक व्यक्ति के रूप में देखा गया है। जाहिर तौर पर इन्होंने जो तर्क-पद्धति अपनायी है, उसके मुताबिक, ''यदि प्रेमचन्द को लेकर बात केवल कला-जगत की चलाई जाए तो वे कायस्थ जाति के पात्रों का, चाहे तो अच्छा खाका खींच सकते हैं। वर्ग के रूप में वे कायस्थ जाति के तीनों प्रकार के वर्गों का चित्रण करने में भी सफल हो सकते हैं।" आशय यह कि रचनाकार प्रेमचन्द का जन्म जिस जाति में हुआ था, उसी जाति के पात्रों का अच्छा खाका खींचने में सफल हो सकते हैं। अगर धर्मवीर की यह बात मान ली जाये तो साहित्य की बुनियादी मान्यता – साहित्य परकाया प्रवेश की साधना है– गलत साबित होगी। कोई भी रचनाकार सिर्फ अपनी जाति के पात्रों की मार्फत साहित्य नहीं रच सकता। अपने इस कुतर्क से वे जो स्थापित करना चाहते हैं, उस आधार पर तो दलित साहित्य भी नहीं रचा जा सकता। कारण कि दलित साहित्य का रचनाकार अपनी जाति के अलावा पात्र की रचना कैसे करेगा; गैर दलित पात्र की रचना का तो सवाल ही नहीं पैदा होगा !
                   डॉ. धर्मवीर की इसी तरह की विवेचन-पद्धति का नतीजा है कि वे डॉ. आम्बेडकर के चिन्तन को स्वतन्त्र दलित-चिन्तन मानने से इनकार करते हैं। आखिर क्यों? क्योंकि डॉ. आम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। अगर बाबा साहब डॉ. धर्मवीर द्वारा प्रस्तावित और पसन्दीदा 'धर्म' को स्वीकार करते, तो स्वतन्त्र दलित-चिन्तन का विकास होता ! कारण कि बौद्ध धर्म के संस्थापक का जन्म क्षत्रिय परिवार में हुआ था। ऐसे में एक दलित के तौर पर डॉ. आम्बेडकर का बौद्ध धर्म में शामिल होना, डॉ. धर्मवीर को मान्य नहीं है।

                   डॉ. धर्मवीर की इस किताब का महत्त्वपूर्ण पक्ष है– स्वामी अछूतानन्द और उनके द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन पर विस्तारपूर्वक विचार। प्रेमचन्द के उपन्यास 'रंगभूमि' को अछूतानन्द के साथ जोड़कर अब तक नहीं देखा गया था। धर्मवीर ने 'रंगभूमि' को अछूतानन्द और उनके आन्दोलन की परिणति मानकर देखने का इसरार करते हुए, नतीजा क्या निकाला है? इनका मानना है, 'प्रेमचन्द ने रंगभूमि का पाठ तैयार ही इसलिए किया था कि अपने समय के अछूतों के नेतृत्व से लड़ा जा सके।' इसलिए धर्मवीर प्रस्तावित करते हैं कि "यदि आप पाठ से बाहर नहीं देख रहे हैं तो समझ लो, आप मकड़ी के जाल में फँस गए हैं। तब इस जाल को कौन तोड़ेगा? पहले इन्द्रजाल का हथियार विरोधियों को फाँसने के लिए ही चलता था, साहित्य के क्षेत्र में इसे नाम बदलकर 'कला जाल' कह दो– है यह मकडज़ाल ही।"

                  धर्मवीर ने आगे साफ-साफ लिखा है कि ''प्रेमचन्द ने 'रंगभूमि' रचकर चमार-पाठकों को कुएँ में ढकेला है। उन्होंने हम से हमारा इतिहास छीना है और हमसे हमारा नायक भी छीना है। तो क्या हम प्रेमचन्द जैसे कलावादियों के चक्कर में आकर अपना इतिहास और अपने नायक को भूल जाएँ? मैं पाठ के बाहर का भी पाठक हूँ, मेरे साथ ऐसा धोखा कैसे खेला जा सकेगा? मैंने 'रंगभूमि' को चारों ओर से घेरते खड़े अपने महान आजीवक स्वामी अछूतानन्द पहचान लिये हैं– मुझे प्रेमचन्द के किसी ऋषि सूरदास, औलिये सूरदास, फरिश्ते सूरदास, साधु सूरदास, दार्शनिक सूरदास, इल्म गैब वाले सूरदास और असाधारण पुरुष सूरदास को जानने और मानने की जरूरत नहीं है। सीधा आरोप लगाया जा सकता है कि 'रंगभूमि' रचकर प्रेमचन्द ने चमार पाठकों को बेवकूफ बनाने की रणनीति तैयार की थी।"

                        डॉ. धर्मवीर की तरह इतिहास से अपने मनचीते नायक को उपन्यास में खोजते हुए पढऩे वाले लोगों के लिए, 'कर्मभूमि' के 'निवेदन' में प्रेमचन्द ने लिखा था 'संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उपन्यास को इतिहास की दृष्टि से पढ़ते हैं। उनसे हमारा निवेदन है कि जिस तरह पुस्तक के पात्र कल्पित हैं, उसी तरह इसके स्थान भी कल्पित हैं। कल्पित और यथार्थ व्यक्तियों में यह अन्तर अवश्य होगा, जो ईश्वर और ईश्वर के बनाए हुए मनुष्य की सृष्टि में होना चाहिए।" इतिहास के अपने पसन्दीदा चरित्र को 'रंगभूमि' में अपने मनचाहे रूप में न पाने के कारण ही, धर्मवीर को लगता है कि रंगभूमि रचकर प्रेमचन्द ने चमार पाठकों को बेवकूफ बनाने की रणनीति तैयार की थी।

       बहरहाल, किसी भी अस्मितावादी समूह द्वारा उठाए जा रहे सवालों से मुँह नहीं फेरना चाहिए। कारण कि 'वृहद आख्यान' रचने के दौरान छोटी अस्मिताएँ दबी रह जाती हैं। साथ ही, कई दफे वृहद आख्यान के नाम पर ऊपर के लोगों का हित साधने की कवायद भी की जाती है। परंतु यह भी ध्यान रहे कि अस्मितावादी विचार या समूह का लक्ष्य मुक्ति-कामना हो। ऐसा  न हो कि अपनी अस्मिता को उभारकर, ताकत अर्जित कर, एक नया वृहद आख्यान रच लिया जाये। उसके बाद अस्मिता से बने इस 'नए' आख्यान में भी दूसरी अस्मिताएँ दब जाएँ। लिहाजा लोकतान्त्रिक मूल्यों की कसौटी पर अस्मितावादी विचारों की जाँच होनी चाहिए। वरन अस्मितावादी विमर्श मुक्तिकामी परियोजना की बजाय एक दूसरी दमनकारी परियोजना का रूप धारण कर लेगी।
                             प्रेमचन्द के अस्मितावादी मूल्यांकन के दौरान भी इन बातों को याद रखना होगा। अपने समय में ऐसे ही सवालों से जूझते हुए प्रेमचन्द ने लिखा था, 'सूबा सूबे वालों के लिए, जिला जिले के लिए और फिर हिन्दू-हिन्दू के लिए, मुस्लिम-मुस्लिम के लिए, ब्राह्मण-ब्राह्मण के लिए, कायस्थ-कायस्थ के लिए, जैसी सदाएँ उठने लगी हैं। इतनी दीवारों और कोठरियों के अन्दर कौमियत कितने दिन साँस ले सकेगी?"
                                   अस्मिता के रेखांकन के साथ-साथ कौमियत की परवाह जरूरी है और वास्तविक चुनौती भी। अस्मिता और कौमियत के बीच लोकतांत्रिक संतुलन के प्रतिमान पर जाँचकर विमर्शों का मूल्यांकन होना चाहिए। यह लोकतांत्रिक पहल एक आवश्यक पड़ाव साबित होगी।

एक मध्यवर्गीय कुत्ता

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