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Tuesday, June 29, 2021

उपन्यास भाग - 4

    

                            (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. भीष्म साहनी :- 

"भीष्म साहनी" अग्रज बलराज साहनी के भाई थे। बलराज साहनी का नाम सिनेमा जगत से भी जोड़कर देखा जाता है। भीष्म साहनी कक रचनाओं में भारत-पाक विभाजन का दंश तो दिखता ही है साथ ही अतीत के कथानकों के साथ ही नारी जीवन की अनेक समस्याओं व अन्य अत्याचारों के खिलाफ भी लेखनी चलती हुई दिखती है।  इनकी रचनाओं का आधार बिंदु समाज को वो बहुसंख्यक वर्ग जिसे हम मध्यवर्ग के नाम से जानते हैं उसका चित्रण भी साहनी जी की रचनाओं में निरंतर देखने को मिलता रहा है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-

"झरोखे" 1967" में आर्यसमाजी मध्यवर्गीय परिवार की कथा दिखाई है जिसमें जीवन जीने की जिजीविषा है। लेखक का मत है कि" जिसमें समय के साथ चलने की काबिलियत नहीं वह इतिहास की गति के सामने रोड़ा बनकर चूर-चूर हो जाता है।

" कड़ियाँ" 1970 मध्यवर्गीय दाम्पत्य जीवन की कथा। जिसमें दोनों की समझ विपरीत दिशा में चलती है।

"तमस" 1973 में। हिंदी साहित्य के अंतर्गत यदि आप किसी भी औसत बच्चे से भीष्म साहनी के बारे में बात करेंगें या उनकी रचनाओं के बारे में जानना चाहेंगे तो सर्वप्रथम वह उनके सर्वश्रेष्ठ उपन्यास "तमस" का ही वर्णन करेगा। यह रचनाकार की अक्षय कृति है जिससे उन्हें हिंदी साहित्य में उच्चतम लोकप्रियता व पहुँच मिली है। यह लेखक का सबसे सफल उपन्यास है जोकि मार्च-अप्रैल के भीषण साम्प्रदायिक दंगे के 5 दिन की घटना पर आधारित है। इसका कथानक विभाजन के समय पैदा हुई त्रासदी से है।

" एक संकटपूर्ण स्थिति का वर्णन जिसमे कई वर्ग,धर्म, विचाधारा के लोगो को दिखाया गया है और इसे अधिक कुछ नही है"।(लेखक का मत)                                 

"वसन्ती" 1980 में दिल्ली की झुग्गी - झोपड़ी में पली है एक लड़की की कथा। जैसे झोपड़ी को बार-बार उजाड़ा जाता है इसी तरह वसन्ती का जीवन भी बार बार उजड़ता है।   

यह कथा मूलतः "जिजीविषा के बल पर संघर्ष करने वाली लड़की" की कथा है।

" मय्यादास की माड़ी" 1988 में किसी हवेली को केंद्र बनाकर लिखा गया है।

                                                             

2. अमरकांत :-

 हिंदी साहित्य में ऐसे कई रचनाकार हुए हैं जो अपनी कुछेक रचनाओं के दमपर आज तक जीवित है। जैसे प. गुलेरी जी को ' उसने कहा था ' कहानी के लिए सदैव हिंदी साहित्य में।याद रखा जाएगा ठीक उसी तरह से अमरकांत की भी कुछेक रचनाएँ ऐसी हैं जो लंबे समय तक हिंदी साहित्य में उन्हें जीवित रखने में योगदान प्रदान करेंगी। जैसे इनकी कहानी 'दोपहर का भोजन' और ऐसे ही ' और ऐसे ही इनका सर्वप्रसिद्ध उपन्यास 

"इन्ही हथियारों से" 2003 में प्रकाशित हुआ था जोकि विभाजन पर आधारित है। इसका कथानायक उत्तरप्रदेश के एक जिला है जिसे 'बलिया' के नाम से जाना जाता है। यह जनपद ही कथा नायक है।   


3. विशम्भरनाथ उपाध्याय :- इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-

"जाग मछन्दर गोरख आया" 1983 में गोरखनाथ को चतुर्दिक धार्मिक रूढ़ियों से संघर्ष करते करते 1 युग पुरुष के रूप में दिखाया है।

"दूसरा भूतनाथ" 1985 में देवकीनंदन खत्री के भूतनाथ उपन्यास के केंद्रीय पात्र को आधार बनाकर लिखा है। इसमें भूतनाथ को जननायक के रूप में दिखाया गया है। जैसे भूत तिलिस्म तोड़ने में माहिर होता है ठीक इसी प्रकार आज के पूँजीपति व्यवस्था के तिलिस्म को तोड़ना जरूरी हो गया है और इस उपन्यास का भूत इसी तिलिस्म को टोना चाहता है।

"विश्वबाहु परशुराम" 1997 में परशुराम को ऐसे रूप में दिखाया है जो अनार्यों से संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं।

                                  

4. राही मासूम रज़ा :-

आज हिंदी साहित्य में राही जी कौन ही होगा जो नहीं जानता होगा। यह अपनी हिंदी साहित्य रचनाओं के लिए तो जाने ही जाते हैं उससे भी बड़ी बात यह है कि एक समय जब भारत में रंगीन टी.वी नहीं हुआ करता था या ना के बराबर था , साथ ही दर्शकों के मनोरंजन सम्बन्धी ज्यादा चैनल व कार्यक्रम नहीं आते थे तब पूरे भारत ही नहीं वरन संसार भर में भारत के 2 सबसे महान गर्न्थो की चर्चा खूब रही थी, वह भी दूरदर्शन के माध्यम से । उनमें से एक 1980 के आसपास बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित 'महाभारत' के संवाद लिखने वाले हमारे राही जी ही थे। उस कार्यक्रम के सभी संवाद एकदम दमदार और परिस्थिति अनुकूल, पात्रानुकूल, मंचानुकूल थे। जिसके दमपर आज भी उस महाभारत को लोगों का खूब प्यार मिलता रहता है। बड़ी बात यह भी है कि उसी महाभारत को आधार बनाकर बाद में बने कई महाभारत के शो बने हैं।

"आधागांव" 1966 में, यह राही जी की हिंदी साहित्य में अनमोल निधि है जिसके आधार पर हम उन्हें पहचानते हैं। उनकी ख्याति का स्तम्भ यही कृति है जिसमे गंगोली जनपद, गाजीपुर जिले में फैले आधी हिन्दू और मुस्लिम की कहानी है।

इसमें विभाजन होने के बाद पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का वर्णन।

"कटरा बी आरजू" 1978 में इलाहाबाद के एक मुहल्ले "कटरे मीर मुलाकी उर्फ कटरा बी आरजू" में आपातकाल के दौरान मजदूरों पर हुई समस्याओं का वर्णन है।

                                               

5.जगदीशचंद्र  :-

हिंदी साहित्य में इन्होंने कई रचनाओं को आकार दिया।  इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -

"धरती धन न अपना" 1972 में लेखक का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास आया था जो दलित जीवन और आधारित है। इस उपन्यास में दिखाया गया पंजाब सारे हिंदुस्तान के गाँवों का प्रतिनिधित्व करता है।

"आधापुल" 1973 में युद्ध की विभीषिका के यथार्थ चित्रण को लेकर लिखा गया है।

"कभी न छाड़े खेत" 1976 में जाट किसानों की ठसक की कथा है। जिसमें एक जाट परिवार छोटी-छोटी बात को तूल देकर झूठी शान के लिए लड़ जाते हैं।

"टूंडलाट" 1978 में एक सैनिक सुनील स्कूल की छात्रा रोमिला से प्यार कर लेता है। टैंक युद्ध में सुनील अपंग हो जाता है और रोमिला उसके प्रति प्रेम को बदल देती है। लेखक यह कहना चाहता है कि "युद्ध से सुकुमार सपने नष्ट हो जाते हैं।"

"घासगोदाम" 1985 दिल्ली के विस्तार के लिए जो मजदूरों, झुग्गी झोपड़ी वालो को और किसानों को परेशानी उठा ई पड़ती है उसकी कथा है कि नगरीय चकाचौंध और सुविधा के लिए वह उनकी जमीन तहस नहस कर देते हैं बाद में उन्हें लौटा देते हैं और उन्हें फिर से बसने के लिए बहुत परेशान होना पड़ता है।

"लाट की वापसी" 2000 टुंडालाट की कथा को आगे बढ़ाया है।

                                                  

6. बदीउज़्मा :- 

इनके प्रसिद्व उपन्यास हैं -

" एक चूहे की मौत " 1971 फेंटेसी में लिखा हुआ उपन्यास है। चुहाखाना, चुहेमार-अफसर आदि संवेदनहीन प्राणी के प्रतीक है।

"छाको की वापसी" 1975 में छोटी हैसियत के मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान का बनना न बनना एक बराबर है। वह यह मानते हैं कि एक दिन में अपनी संस्कृति, जमीन घरबार को नहीं बदला जा सकता। विभाजन उनके लिए भी उतना ही दुखदाई है जितना हिंदुस्तानियों के।

"सभापर्व" 1994 इनकी मृत्यु के उपरांत प्रकाशित हुआ है। जिसमें अग्रेजो की कुटिल नीति के कारण वर्षों से साथ रहते आ रहे हिन्दू-मुस्लिमों को आपस में लड़वाकर उन्होंने बटवा दिया है, जिसकी परिणति विभाजन में सफल होती है। 

इसकी विशेष बात यह हैं कि " आज भले ही हम आजाद हो गए हैं लोगों के चेहरे बदल गए हैं परन्तु भीतरी परतों में पशुता आज भी जीवित है।


7.ह्यदेश :-

इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -

" सफेद घोड़ा कला सवार" 1976 में न्यायव्यवस्था पर करारा प्रहार किया है।

" साँड़" 1981उपन्यास में शिक्षा संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दिखाया गया है।  

"पगली घण्टी" 1995 जेल जीवन को आधार बनाकर लिखा है जिसमें जेल खुद बोलती है।

"किस्सा हवेली"2004 में जिस तरह से हवेली पुरानी होकर झड़ना/टूटना शुरू हो जाती है उसी तरह से समय के प्रवाह में वर्ण व्यवस्था भी टूटी है और महिलाओं के उत्थान में विकास आ रहा है।

"शब्द भी हत्या करते हैं" लेखक की मूल कथाभूमि से जुड़ा हुआ है जिसमें हर विचारधारा को तरजीह दी गयी है।

                                                                           

8.जगदम्बा प्रसाद दीक्षित - 

इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -

"कटा हुआ आसमान" 1971 में बम्बई के सेवारत अध्यापकों की स्थिति दिखाई है।

" मुर्दाघर" 1974 में  बम्बई के भटियारनो का जीवन चित्रण। व्यवस्था ने पूरे समाज को मुर्दाघर बना दिया है।उपन्यास में व्यवस्था के प्रति एक क्षोभ है।              

                                    

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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● अधिक जानकारी के लिए आप देख सकते हैं-

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Sunday, June 27, 2021

उपन्यास भाग -3

 

        (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. पांडेय बेचैन शर्मा 'उग्र' :-

 'उपन्यासकार अश्क',  पृ 184 में जोकि 1960  में प्रकाशित हुई थी उसके अनुसार 'उग्र जैसा लेखक नारी के विषय मे थोड़ा असंवेदन शील और रूढ़िवादी हो गया है। वह अपने उपन्यास "जीजीजी" पृ128 में कहते हैं :- " बाहर स्त्री घूमेगी तो पुरुष से उसे खतरा रहेगा, बात-बात में गर्भ करने और रक्त माँस से स्वतंत्रता का मोल चुकाने का"...। इसी के प्रतिवाद में 'जीजीजी' कहती है कि :- " कुल मिलाकर मुझे मालूम पड़ा है कि उत्तमतम नारी के लिए मानव-समाज में व्यभिचारी पुरुष की अंक शायिनी बनने के सिवा और कोई गति नहीं..पृ 47' ।  ऐसा माना जाता है कि जीजीजी का व्यक्तित्व जो ऐसा बना है वह सदियों से पीड़ित होकर निराशावादी और नियतिवादी हो गयी है।

माना जाता है कि प्राकृतवादी उपन्यासों अर्थात नग्न-दृश्य उपन्यासों का जनक "जोला"  है। उनका मत है कि जीवन के गंदे से गन्दे और कुरुप चित्र खींचे...।

2. उपेन्द्रनाथ अश्क़ :-  

अश्क ने मध्यवर्ग पर मूल रूप से लेखन किया है। अश्क़ जी के प्रसिद्ध उपन्यास व उनकी कथावस्तु -

"गिरती दीवारें" 1947 में, जलंधर के "चेतन" नामक की कथा है जो निरन्तर  समाज में बिना किसी ठोस आधार के भटकता रहता है। (आजीविका के लिए काम नहीं मिलता )। चेतन उसी कमज़ोर दीवार की तरह है जो दिन -दिन झड़ कर गिरती रहती है।

"शहर में घूमता आईना" 1963 में , उपन्यास  "गिरती दीवारे" की कथा को आगे लेके चलता है। घटनास्थल भी जलन्धर ही है और पात्र भी वही। 

बच्चन सिंह के अनुसार लेखक के "गिरती दीवारें", "शहर में घूमता आईना" और "बाँधो न इस ठाँव बंधु" 'गाल्सवर्दी' के सागा उपन्यासों से अभिप्रेरित हैं। 

3. जैनेन्द्र कुमार :- 

बच्चन सिंह के अनुसार जैनेंद्र हिंदी के पहले आधुनिकतावादी कथाकार हैं।

बच्चन सिंह के अनुसार "परख" 1929 में आया उपन्यास में उसका "प्रेम अशरीरी और प्लेटोनिक" है।

"त्यागपत्र" 1937 में आया नारी की सीमित जिंदगी व अन्य समस्याओं, वर्जनाओं से सम्बंधित है। जहाँ वह खुलकर भी अपना जीवन यापन नहीं कर पाती। समाज की बनी-बनाई परिपाटी जोकि रुढियों सी प्रतीत होती है उसके अनुसार जीने को मजबूर है। जिसके पीछे झूठी सामाजिक मर्यादा का आवरण ढका पड़ा है।

4. इलाचन्द्र जोशी :-  

जोशी जी पर फ्रायड, युंग और एडलर का विशेष प्रभाव पड़ा है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-

"घृणामयी" 1929 में प्रकाशित, जो अब 'लज्जा' नाम से प्रकाशित है उसमे आधुनिक शिक्षाप्राप्त नारी की काम- चेष्टाओं को दिखाया गया है। इस प्रकार जोशी जी ने अपने मनोविश्लेषणवाद का परिचय दिया है।

" सन्यासी" 1940 में आत्मकथात्मक शैली में लिखा उपन्यास है। जहाँ अंत मे "नंदकिशोर" अपने आप को सन्यासी बनाकर देशभक्ति करने लग जाता है।

"पर्दे की रानी" 1942 में नायिका "निरंजना" खूनी पिता और वैश्या माता की पुत्री का पता चलने पर वह हीन भावना से ग्रसित होने लग जाती है और समाज से घृणा करने लगती है।

"प्रेत और छाया" 1944 में नायक "पारसनाथ" को पता चलता है कि उसकी माँ वैश्या है और उसे समस्त नारी जाति से घृणा होने लग जाती है।

" जहाज का पंछी" 1954 एक शिक्षिक नवयुवक की कथा का वर्णन करता है। जो कलकत्ता में काम ढूंढने की तलाश करता हुआ कई तरह के कामो में अपना संघर्षशील परिचय देता है।

"कवि की प्रेयसी" 1976 कालिदास के द्वारा "मालविकाग्निमित्रम" नाटक में उल्लिखित कवि सौमिल्लिक के जीवन की काल्पनिक सृष्टि की है।

5. सचिदानंद हीरानंद वात्स्यायन -'अज्ञेय' :- 

हिंदी साहित्य की  मनोवैज्ञानिक औपन्यासिक परम्परा में जितनी ख्याति महाकवि अज्ञेय को मिली है उतनी शायद दूसरे किसी को नहीं। इनका मनोवैज्ञानिक अध्ययन बहुत गूढ़ अर्थों में छिपा रहता है जिसके लिए पाठक को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। अज्ञेय का सबसे प्रसिद्ध व पाठकप्रिय उपन्यास 'शेखर - एक जीवनी' रहा है जिसे तरह-तरह की प्रशंसा के साथ आलोचकीय लेखों व तंज का भी सामना करना पड़ा है। माना जाता है कि कोई भी रचना तभी उच्चतम सफलता हासिल करती है जबकि उसकी कमी व खूबियों पर जितना हो सके लिखा-पढा-बोला जाए, विचार विमर्श किया जाए, बहस की जाए। इस अर्थ में शेखर - एक जीवनी उच्चतम सफलता हासिल कर पाती है 

 "शेखर-1 जीवनी " 1941 पर "रोमा रोला" पाश्चत्य लेखिका के "जॉन क्रिस्टॉफ " का प्रभाव स्प्ष्ट है, जिसे लेखक स्वीकार भी करता है। इस बात की पुष्टि अज्ञेय ने अपने "आत्मनेपद" निबन्ध संग्रह के पृ 64 पर भी करी है।

शेखर-एक जीवनी पर विद्वानों के मत :-

• इस रचना को डॉ. नगेन्द्र 'प्रकाशमान पुच्छल तारा' कहते हैं।

• निर्मल वर्मा को यह उपन्यास अपने जीवन की कथा से प्रतीत होता है। जो उन्होंने 2002 की पुस्तक वार्ता में कहा था।

• मैथिलीशरण गुप्त को यह 'नैतिकता और मर्यादा के विरुद्ध' लगा है।

• रामविलास शर्मा शेखर को 'एक कट्टर सोवियत संघी, मार्क्सवादी, मानवद्रोही, नारी से करुणा की भीख मांगने वाला, आत्मपीड़ा का अभिनयकर्ता, निक्कमा, कुंठावाद का प्रतीक आदि कहते हैं।'

"नदी के द्वीप" 1951 में यौन-भावना प्रधान उपन्यास है। बच्चन सिंह के अनुसार " यह प्रेमाख्यान नहीं कामाख्यान है: आधुनिक बौद्धिक और अदिवतीय"...।

"अपने-अपने अजनबी " 1961 में अस्तित्ववाद का प्रभाव स्प्ष्ट देखा जा सकता है। बच्चन सिंह के अनुसार इसमें अस्तित्ववाद का खंडन किया गया है।                                

6. डॉ. देवराज:-  

हिंदी साहित्य की औपन्यासिक विधा के मनोवैज्ञानिक रचनाओं में देवराज का नाम भी बड़े आदर के साथ याद किया जाता है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -

"पथ की खोज" 1951 मध्यवर्गीय परिवार में आने वाली समस्या का मनोविश्लेषण चित्रण है। जिसमेे वह समाधान ढूंढ रहे हैं।                                        

7. यशपाल :- 

हिंदी उपन्यासों में मार्क्सवादी दृष्टिकोण सम्बन्धी उपन्यास लिखे जाने वालों में यशपाल का नाम सर्वोपरि लिया जाता है। यशपाल ने क्रांतिकारी जीवन व्यतीत किया था और देश भ्रमण भी। वह मार्क्स के पक्के समर्थक थे। इसी आधार पर उनकी रचनाओं में मार्क्सवाद खुलकर आता है 

रामविलास शर्मा उन पर 'भाभीवाद होने का आरोप' लगाते हुए कहते हैं कि" जैनेंद्र जी ने "सुनीता" से जो भाभीवाद शुरू किया था, यशपाल ने वही सूत्र "दादा कामरेड" में पकड़ लिया है। 

• इनके प्रसिद्ध उपन्यास इस प्रकार हैं -

"दादा कामरेड" 1941 से हिंदी उपन्यास में 'पहली बार रोमांस के साथ राजनीति' भी आई है।    

"देशद्रोही" 1943 में कम्युनिस्ट पार्टी की उस गलत नीति के समर्थन में लिखा गया था जिसके तहत पार्टी ने कांग्रेस के "भारत छोड़ो" आंदोलन के विरुद्ध विश्वयुद्ध में रूस के शामिल हो जाने के कारण अंग्रेज़ो की मदद की थी।                 

"दिव्या" 1945 में लेखक ने प्राचीन कथानक उठाकर नारी हित की बात की है।

हिंदी साहित्य के अंतर्गत यशपाल की ख्याति का आधारस्तम्भ उनका उपन्यास झुठासच है जिसमें देश विभाजन का दंश मौजूद हैं। यह 2 भागों में विभाजित है जिसका प्रथम अंश 'देश और वतन' 1958 में आया था और दूसरा अंश 'देश और भविष्य ' 1960 में। इसके दूसरे भाग में पाकिस्तान से आये हुए शरणार्थियों की समस्याओं को केंद्र में रखकर नए आर्थिक, समाजिक, राजनीतिक संकटो को उठाया है।


"मेरी तेरी उसकी बात" 1974 में 1919 से लेकर 1945 तक कि राजनीतिक घटनाओं और इस अवधि की शिक्षित जनता और राजनीतिक दलों का जो प्रभाव पड़ा उसका विवेचन भी किया गया है।

8. नागार्जुन :- 

नागार्जुन की विशेषता मिथिला की धरती की गंध, गाँवों के दुखियों, निरीहों, उपेक्षित के प्रति सहानुभूति है। वह समाज के कुम्भीपाक (नरक) को समाप्त कर देना चाहते हैं। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -

"रतिनाथ की चाची" 1948 एक कुलीन किंतु विधवा नारी की करुण कहानी है। जिसमें मिथिला के सामाजिक जीवन के अंतरर्विरोधों को दिखाया गया है।

"बलचनमा" 1952 परिश्रमी और ईमानदार किसान के प्रति अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष की गाथा है।

"नई पौध" 1953 अंसगत विवाह की समस्या को केंद्र में रखकर लिखा है।

"बाबा बटेसरनाथ" 1954 में  बरगद के पेड़ को बचाने के लिए  "जैकिशन" और अन्य लोग निरन्तर विरोध कर रहे हैं।

" वरुण के बेटे" 1957 मछुआ संघ की स्थापना होती है।जिसमे "गढ़ हमार पोखर ह" का नारा बुलंद होता है।

" कुंमभीपाक" 1960 में ऐसे समझदार लोगो की कल्पना की गई है जहाँ कोइ भी किसी को धोखा नही देता और किसी तरह की बेबसी का फायदा उठाता है।"जहाँ पुरुष ज्ञान है तो स्त्री शक्ति है"......।

"इमरतिया" 1968 में बिहार के उत्तरी भाग में जमींदारों और व्यापारियों द्वारा तस्करी की सुविधा के लिए स्थापित जमनिया मठ होने वाले भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया है।

"पारो" 1975 खड़ीबोली में मैथिली के 1946 से रूपांतरित हुआ है। इसमें बाल विवाह जैसी कुरीति की वेदी पर अपना ओरा जीवन होम करने देने वाली युवती की कथा है।

"गरीबदास" 1979 में अंतिम उपन्यास है जिसमें स्वतंत्र भारत के ग्रामीण जीवन के सामाजिक आर्थिक अंतर्विरोधों को उजागर किया है।

                                                       

9. रांगेय राघव :- यह भी मूलतः मार्क्सवादी रचनाकार हैं। जिनके उपन्यासों का कथानक इस प्रकार है -

मुर्दो का टीला- 1948, सिन्धु घाटी की सभ्यता

चीवर -1951, हर्षकालीन बौद्ध धर्म का उत्थान

कब तक पुकारू -1951, राजस्थान के करनटो का जीवन

बन्दूक और बीन- 1957,  युद्ध की समस्या का वर्णन

धरती मेरा घर         राजस्थानी लोहापीटो की कथा

                                                   

                                                      

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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उपन्यास भाग -2

   

                             (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. प्रेमचंद :-

प्रेमचंद का कथा साहित्य गाँधी के सत्य-अहिंसा की जीवन प्रणाली का प्रबल समर्थक है। उनमें आर्य समाज की तार्किकता, गाँधी की विनयशीलता और तिलक की तेजस्विता का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने नशाखोरी दूर करना, स्त्रियों की उन्नति, अस्पृश्यता निवारण, दहेज प्रथा खत्म करना, बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य-सफाई, किसान-मजदूरों के लिए बहुत सा काम किया है।

प्रेमचंद के उपन्यास कला की महत्ता हजारीप्रसाद जी सिद्ध करते हुए कहते हैं कि" यदि आपको उत्तर भारत की सारी जनता के आचार विचार, भाषा, भाव, रहन-सहन, आशा-आकांशा, दुख-सुख और सूझबूझ जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद के उपन्यासों से उत्तम परिचायक कहीं ओर नहीं मिलेगा"...।

विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार ' प्रेमचंद के उपन्यासों में सभी वर्ग सिमट आये हैं। इन पर गाँधी का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है परन्तु गोदान तक आते आते उनका यह गाँधीवादी प्रभाव व आदर्श रूप टूटता हुआ नजर आता है और वह उससे मुक्त होकर मूलतः यथार्थवादी बन जाते हैं इसलिए गोदान अंततः दुखांत उपन्यास है..।'


● प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यास :-

• "सेवासदन" 1918 में प्रकाशित उपन्यास में वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ कथानक को दिखाया गया है। विश्वनाथ त्रि. के अनुसार प्रेमचंद का ऐसा मत है कि " सवर्ण वर्ग में स्त्रियों का ज्यादा शोषण होता है क्योंकि वहाँ पुरुषों पर आर्थिक स्थिति से निर्भर रहना पड़ता है। मुख्यतः इस रचना में वैश्यावृत्ति की समस्या को उभारा गया है।

इस उपन्यास की महिला पात्र "सुमन" है जिसके माध्यम से पहली बार हिंदी उपन्यास में स्त्री का पुरुषों पर आश्रित होना यह बात समझती है और उसके विरुद्ध खड़ी होती है।

बच्चन सिंह इसे "हिंदी का बेहतरीन नॉवेल" की संज्ञा देते हैं।

• "प्रेमाश्रम" 1922 और "रंगभूमि" 1925 में किसान जीवन को उभारा है कि 'वह अपनी जमीन के लिए कितनी आत्मीयता रखता है। ब्रिटिश साम्राज्य, बड़े व्यापारी, जमींदार आदि किसानों को तरह-तरह की यातना देकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देते हैं। और यह किसानी जीवन किस तरह से मजदूर बनकर अंततः मृत्यु को प्राप्त हो जाता है जिसका जीता जागता प्रमाण "गोदान" 1936 में और उसका मुख्य पात्र (नायक) "होरी" है।

"प्रेमाश्रम" गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित है जिसमें हृदय परिवर्तन के साथ रामराज्य स्थापित करने की कल्पना भी शामिल हैं। बच्चन सिंह के अनुसार "प्रेमाश्रम" हिंदी का पहला "राजनीतिक उपन्यास" है और इस पर बोल्शेविक क्रांति का भी प्रभाव है...।

"रंगभूमि" का "सूरदास" पूँजीपतियों से सीधा संघर्ष करता है।

• "कायाकल्प" 1926 में अलौकिक और अतिरंजनापूर्ण परम्परा से जुड़े प्रसंगों को दिखाया है जैसे बाबाओं के चमत्कार, पूर्वजन्म की कल्पना, वृद्धा को तरुणी में बदली करना आदि।

• "निर्मला" 1927 में अनमेल विवाह की समस्या को लेकर खड़ा हुआ है।

• "गबन" 1930 में गहनों की चोरी के माध्यम से मध्यवर्ग की स्थितियों की कमजोरियों का पर्दाफाश किया है। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बाद भी झूठे ऐशो आराम, टीम टाम दिखाना इस वर्ग की कमजोरी है।

• "कर्मभूमि" 1933 में आया उपन्यास प्रेमाश्रम की अगली मंजिल है जिसमें न केवल किसान बल्कि छात्र, मजदूर, मध्यवर्ग, हिन्दू-मुस्लिम, गरीब-धनी सभी वर्ग के लोग शामिल हैं। 1930 कि असहयोग आंदोलन में विभिन्न वर्गों , जातियों, धर्मो के लोगों की सम्मिलिति थी। 1928 में किसान-मजदूर पार्टी की स्थापना हो चुकी थी और इसी वर्ष बारडोली का लगान-बन्दी आंदोलन भी शुरू हो चुका था। इस देशव्यापी आंदोलन की औपन्यासिक अभिव्यक्ति "कर्मभूमि" में हुई है।

• "गोदान" 1936 में प्रेमचंद गाँधीवाद से मुक्त हो जाते हैं क्योंकि उन्हें अब लगता है कि केवल आदर्शवाद से काम नहीं चलेगा, समाज को बदलने के लिए यथार्थ को दिखाना आवश्यक है। देश के किसानों से सीधा साक्षात्कार "गोदान" भारतीय किसानों का मर्मस्पर्शी, करुण और त्रासद दस्तावेज़ बन जाता है। 

"गोदान" किसान जीवन का इतना मर्मस्पर्शी और यथार्थवादी उपन्यास होने का प्रथम उपन्यास नहीं है। इससे पूर्व उड़ीसा के फ़कीरमोहन सेनापति ने 1847 में "छमाड आठ गुंठ" (छह बीघा जमीन) में किसान जीवन समस्या उठायी थी।

प्रेमचंद में किसानी जीवन को दिखाने के लिए किसानी भाषा का प्रयोग किया है।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "तुलसीदास की पारिवारिक इकाई की अवधारणा गोदान के होरी में भी दिखती है जो मरजाद के कारण अतिवादी नहीं होता"..। परन्तु हम देखें तो यही अतिवादी या विद्रोही प्रवृति का न होना उसकी दुर्गति का कारण बन जाती है क्योंकि प्रेमचंद खुद भी इस बात को महसूस कर चुके थे कि अब केवल आदर्श की लाठी के सहारे समस्याओं का निवारण नहीं किया जा सकता। कुछ ठोस कदम भी उठाने होंगे। इसके आगे चतुर्वेदी कहते हैं कि "गोदान का रचना संतुलन ऐसा बेजोड़ है कि उसमें अनवरत संघर्ष, करुणा, सहानुभूति और ट्रैजिक अंत के बावजूद कहीं किसी एक के प्रति कड़वाहट नहीं आती, गहरा असंतोष उमड़ता- घुमड़ता है तंत्र के प्रति"...।

रामस्वरूप के अनुसार गोदान में "गाँधी और मार्क्स को जैसे प्रेमचंद ने फेंट कर मिलाया है"..।

विश्वनाथ त्रि. के अनुसार "प्रेमचंद की भाषा न तो किताबी उर्दू है और न ही किताबी हिंदी है, वह सहज हिंदी भाषा है"...।

                                                             

2. विशम्भरनाथ कौशिक :-

" भिखरिणी" 1929 में अंतरजातीय विवाह की समस्या उठायी है।"जस्सो" और "रामनाथ" के प्रेम की स्मृति को सँजोया  है।   

3. शिवपूजन सहाय :-

"देहाती दुनिया" 1926 में लेखक कहते हैं:- " मैं ऐसी ठेठ देहात का रहने वाला हूँ, जहाँ इस युग की नई सभ्यता का धुँधला प्रकाश ही आता है।जहाँ केवल 2 ही चीजें प्रत्यक्ष देखने में आती है- अज्ञानता का घोर अंधकार और दरिद्रता का तांडव नृत्य"..। (भूमिका से)

4. भगवतीप्रसाद वाजपेयी :-

"पतिता की साधना" 1936 बालविधवा "नन्दा" के जीवन पर आधारित है। विधवा विवाह का समर्थन करना ही कथा का उद्देश्य है।

5. सियारामशरण गुप्त :-

"अंतिम आकांशा" 1932 में गाँधीवादी दर्शन "हृदय परिवर्तन" से प्रभावित उपन्यास है। 

6. प्रतापनारायण श्रीवास्तव)

"विश्वास की वेदी" , "वंचना" , "व्यावर्तन" उपन्यासों में चीनी आक्रमण और उसके विश्वासघात की कथा पर आधारित है।

"बयालीस" 1947 जनक्रांति 1942 से जुड़ा है।

"विहान" 1857 की क्रांति को केंद्र में रखकर लिखा है।

"बेकसी का माजरा" 1957 में अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफ़र को केंद्र बनाकर स्वतंत्रता संग्राम को दिखाया गया है।

                                    

7. अमृतलाल नागर :-

" बूंद और समुन्द्र" 1956 में अहिंसावादी, मानवतावादी आदि पूरी तरह से गांधी दर्शन का प्रभाव दिखाया है। जहाँ वह कहते हैं:- "सुख-दुख में व्यक्ति का व्यक्ति से अटूट सम्बन्ध बना रहे - जैसे बूँद से बूँद जुड़ी रहती है और  लहरों से लहरें , जिससे समुन्द्र बनता है"।

"शतरंज के मोहरे" 1959 में अवध की नवाबी के हरासोन्मुखी काल का वर्णन है।

" अमृत और विष" 1966 में मानव जीवन के गुण-दोष को दिखाया गया है।

"अग्निगर्भा " 1983 में दहेज की समस्या को दिखाया है.

    

8. विष्णु प्रभाकर :-

" अर्धनारीश्वर" 1992  में समाज के लगभग सभी वर्गों की स्त्रियों को बलात्कार- सहित उनकी यातनाओ को दिखाया गया है"।         

 

9. उदयशंकर भट्ट :-

"सागर लहरें और मनुष्य" 1956 में बम्बई के बरसोवा क्षेत्र के मछुआरों का जीवन दिखाया गया है।                                                            

10. प्रसाद :- 

"कंकाल" 1929 में आया लेखक का उपन्यास सामाजिक विकृतियों को उभारने में सफल हुआ है।

"तितली " 1934 में बच्चन सिंह के अनुसार किन्ही अंशो में प्रेमचंद की परंपरा का उपन्यास है। यह एक आदर्शपरक रचना है जिसमें ढहती हुई सामंती व्यवस्था, जमींदारी प्रथा की दुर्बलता, ग्रामीण समाज किस सरलता और स्वार्थ वृति, सम्मिलित कुटुंब की विकृतियां, त्यौहार के उत्सव चित्र आदि है, परंतु यह कथा गौण है। मुख्य कथा भारतीय जीवन दृष्टि को लेकर चलने वाली तितली और पश्चिमी दृष्टि को लेकर चलने वाली शिला की टकराहट है। इसमें भारतीय नारी जीवन की विजय होती है।

बच्चन सिंह के अनुसार " तितली कामायनी की श्रद्धा है और शैला चन्द्रगुप्त मौर्य की कार्नेलिया...।"

तितली शैला से कहती है " तुम धर्म के बाहरी आवरण में ढंककर हिन्दू स्त्री बन गई हो किंतु उसकी संस्कृति की मूल शिक्षा भूल रही हो। हिन्दू स्त्री का श्रद्धापूर्ण समर्पण उसकी साधना का प्राण है...।"


11. भगवतीचरण वर्मा :-

"चित्रलेखा" 1934 में पाप और पुण्य की समस्या और उसके समाधान को लेकर उतरा है। इसमें भोग को सर्वथा अनैतिक और त्याग को सर्वथा नैतिक नहीं माना है। कहा गया है कि" न ही कोई चीज पाप ह और न ही कोई चीज पुण्य। परिस्थितियों से ही एक कृत्य किसी को पाप और किसी को पुण्य लग सकता है"..।

"टेढ़े-मेढ़े रास्ते"1946 उपन्यास में गांधी,आतंकवाद, साम्यवाद को टेढ़े मेढे रास्ते पर चलते दिखाया है।

" सामर्थ्य और सीमा" 1962 में मनुष्य की सीमा को प्रकृति के सामने असमर्थ दिखाया गया है। नियतिवाद की अवधारणा दिखाना ही इस उपन्यास का उद्देश्य है।

" प्रश्न और मरीचिका" 1973 में आज के शासनतंत्र से कुछ समाधान नही निकल पा रहा है। क्या यह केवल 1 मरीचिका भर है ? 

                                        

12. हजारीप्रसाद द्विवेदी :-

"हजारीप्रसाद के सभी उपन्यास रोमानी भाव के रहे हैं। 

"बाणभट्ट की आत्मकथा" 1946 में हर्षकालीन उत्तर भारत का सांस्कृतिक जीवन दिखाया गया है।

"अनामदास का पोथा" में ऋषि रैक्व और जाबाला का विवाह जातीय मर्यादा तोड़कर कराया गया है जिससे कि स्वछंद मानवतावादी दृष्टिकोण को सामने लाया जाए।

बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 - 6-7 वी शती 

चारुचंद्रलेखा 1963 -    12-13 वी शती 

पुनर्नवा 1973 -             4थी शती

अनामदास का पोथा 1976 -  ओपनिशिदिक युग


13. आचार्य चतुरसेन शास्त्री :-

"वैशाली की नगरवधू" 1948 में महावीर स्वामी, बुद्ध, और वासुदेव सभी एक साथ उपस्थित है,भारतीय सँस्कृति के संश्लिष्ट रूप को दिखाता है।

"सोमनाथ" 1955 में चालुक्य वंश द्वारा मंदिर की निर्मिति महमूद गजनवी द्वारा उस पर आक्रमण कर उसे लूटे जाने की कथा है जिसमें गजनवी को कोमल हृदय के रूप में दिखाया है।

                                                 

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी



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Friday, June 25, 2021

उपन्यास भाग - 1


                            (उपन्यास)

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।

                        

● उपन्यास हिंदी गद्य की एक आधुनिक विधा है। इस विधा का हिंदी में प्रादुर्भाव अंग्रेज़ी साहित्य के प्रभाव स्वरूप हुआ । लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इससे पहले भारत में उपन्यास जैसी विधा थी ही नहीं । संस्कृत , पालि, प्राकृत , अपभ्रंश आदि में अनेक नीति कथाएँ तथा आख्यान मिलते हैं जिनमें उपन्यास विधा के अनेक तत्त्व मिलते हैं । लेकिन हम उनको उपन्यास नहीं कह सकते । सच्चाई तो यह है कि इस विधा का उद्भव और विकास पहले यूरोप में हुआ । बाद में बांग्ला के माध्यम से यह विधा हिंदी साहित्य में आयी ।

उपन्यास ‘उप’ और ‘न्यास’ से मिलकर बना है। ‘उप’ का अर्थ समीप और ‘न्यास’ का अर्थ है रचना। अर्थात्‌ उपन्यास वह है जिसमें मानव जीवन के किसी तत्त्व को उक्तिउक्त के रूप में समन्वित कर समीप रखा जाए।

• संस्कृत लक्षण ग्रंथों में भी उपन्यास का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है। किन्तु उस उपन्यास शब्द और आज के उपन्यास शब्द में भिन्नता है। संस्कृत साहित्य में एक स्थान पर कहा गया है, “उपन्यासः प्रसाधनम्‌” अर्थात्‌ प्रसन्नता प्रदान करने वाली कृति उपन्यास है। किन्तु संस्कृत नाट्य शास्त्र में उपन्यास को प्रतिमुख संधि का एक उपभेद माना गया है, जिसकी व्याख्या में कहा गया है ‘उपपति वृतहथ उपन्यासः प्रकृतितः’ अर्थात्‌ किसी अर्थ को उसके उक्तिउक्त अर्थ में उपस्थित करने को उपन्यास कहा जाता है। किन्तु आज उपन्यास शब्द के अन्तर्गत गद्य द्वारा अभिव्यक्त सम्पूर्ण कल्पना प्रसूत कथा साहित्य में ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त उपन्यास शब्द और आधुनिक उपन्यास शब्द में ज़मीन आसमान का अंतर है।

इसमें उपन्यासकार मानव जीवन से संबंधित सुखद एवं दुखद किन्तु मर्मस्पर्शी घटनाओं को निश्चित तारतम्य के साथ चित्रित करता है। उपन्यास एक ऐसी लोकप्रिय साहित्यिक विधा है जिसे मानव जीवन का यथार्थ प्रतिबिंब कहा जा सकता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। इस प्रसंग में आचार्य "नंददुलारे वाजपेयी" ने अपनी पुस्तक “आधुनिक साहित्य” में लिखा है कि उपन्यास में आजकल गद्यात्मक कृति का अर्थ लिया जाता है। पद्यबद्ध उपन्यास नहीं हुआ करते। उपन्यास के विकास से गद्य का विकास का भी संबंध है। प्रायः वही परिस्थिति गद्य के विकास में सहायक हुई हैं जो उपन्यास के विकास में योग दे रही थीं। यूरोप में गद्य उपन्यासों के पहले कुछ प्रेमाख्यान कविताएं प्रचलित थीं। उन्हें ही आधुनिक उपन्यास की जननि कहा जा सकता है।”

डॉ. "हजारीप्रसाद द्विवेदी" के अनुसार “उपन्यास आधुनिक युग की देन है। नए गद्य के प्रचार के साथ-साथ उपन्यास प्रचार हुआ है। आधुनिक उपन्यास केवल कथा मात्र नहीं है और पुरानी कथाओं और आख्यायिकाओं की भांति कथा-सूत्र का बहाना लेकर उपमाओं, रूपकों, दीपकों और श्लेषों की छटा और सरस पदों में गुम्फित पदावली की छटा दिखाने का कौशल भी नहीं है। यह आधुनिक वैक्तिकतावादी दृष्टिकोण का परिणाम है।”

डॉ. "श्यामसुंदर दास" उपन्यास को मानव के वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा मानते हैं, किन्तु मुंशी प्रेमचंद जी कहते हैं, “मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।”

"क्षेमेन्द्र सुमन" के अनुसार उपन्यास मानव जीवन की आन्तरिक और बाह्य परिस्थितियों का उसके मन के संघर्ष-विघर्ष का, उसके चारो ओर के वातावरण और समाज का काल्पनिक चित्र है, किन्तु काल्पनिक होता हुआ भी वह यथार्थ है। उसमें जीवन के स्त्य की अभिव्यक्ति होती है।

डॉ, "जे. बी. क्रिस्टले" लिखते हैं, “उपन्यास जीवन का विशाल दर्पण है और इसका विस्तार साहित्य के किसी भी रूप से बड़ा है।” इसी प्रकार रौल फ्रांस के अनुसार “उपन्यास केवल काल्पनिक गद्य नहीं है वरन वह मानव जीवन का गद्य है। ऐसी प्रथम कला जिसने सम्पूर्ण मानव को लेने और उसे अभिव्यंजना देने का प्रयास किया है लेकिन इसके विपरीत विलियम हेनरी हेडसन के अनुसार, “मानव और मानवीय भावों से तथा क्रियाओं की विस्तृत चित्रावलि ने नर एवं नारियों की सार्वकालिक, सार्वदेशिक रुचि ही उपन्यास के अस्तित्व का कारण है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उपन्यास की एक सर्वमान्य परिभाषा निर्धारित करना कठिन है। इस कठिनाई की ओर इंगित करते हुए डॉ. देवराज लिखते हैं, “उपन्यास की कोई निश्चित परिभाषा देना कठिन है। प्रायः यह अंग्रेज़ी में Novel शब्द का पर्यायवाची शब्द समझा जाता है। पर Novel का प्रयोग अंग्रेज़ी में जहां एक ओर सुसंगठित कथाओं के लिए भी किया जाता है वहीं दूसरी ओर अतीत की स्मृतियों के लिए भी, जिन कथाओं का कोई विस्तृत रूप नहीं है। अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि उपन्यास मानव जीवन की कथा है।

● शुक्ल के अनुसार हिंदी उपन्यास पर बाँग्ला उपन्यासों का प्रभाव सीधे सीधे देखा गया क्योंकि हिंदी में नाटक और निबन्ध काफी लिखे जा चुके थे, अब समय आ चुका था कि बाँग्ला से उपन्यासों का भी अनुवाद हिंदी में किया जाए जिससे कि हिंदी में भी उपन्यास लिखने की मदद मिल सके। हिंदी में उपन्यास जैसी विधा की शून्यता को मिटाने के लिए इससे अच्छा वक्त और नहीं था। इन अनुवादों से बड़ा भारी काम यह हो गया था कि नए ढंग के सामाजिक और ऐतिहासिक उपन्यासों के ढंग का अच्छा परिचय हो गया और स्वतंत्र उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति और योग्यता उत्तपन हो गई।

शुक्ल के अनुसार "प्रथम उत्थान तक हिंदी में अनुदित उपन्यासों का ताँता बन्ध गया था"...।

●शुरुआती 20 वर्षो में 5 ऐसी पत्रिकाएँ थी जो उपन्यासों को प्रकाशित करती थी:-

देवकीनंदन खत्री - उपन्यास लहरी

किशोरीलाल गोस्वामी - उपन्यास

गोपालराम गहमरी - जासूस

जयरामदास गुप्त - उपन्यास बहार

रामलाल वर्मा - दरोगा दफ्तर

हिंदी-उपन्यास के विकास-क्रम को समझने के लिए इसे तीन भागों में बाँटा जा सकता है :

1. प्रेमचंद पूर्व युग
2. प्रेमचंद युग
3.  प्रेमचन्दोत्तर युग

हिंदी साहित्य में उपन्यास

हिंदी साहित्य में उपन्यास शब्द के प्रथम प्रयोग के संदर्भ में गोपाल राय लिखते हैं कि- "हिन्दी में नॉवेलके अर्थ में उपन्यास पद का प्रथम प्रयोग 1875 ई. में हुआ।"[1]

प्रथम उपन्यास

बाणभट्ट की कादम्बरी को विश्व का प्रथम उपन्यास माना जा सकता है। कुछ लोग जापानी भाषा में 1007 ई. में लिखा गया “जेन्जी की कहानी” नामक उपन्यास को दुनिया का सबसे पहला उपन्यास मानते हैं। इसे मुरासाकी शिकिबु नामक एक महिला ने लिखा था। इसमें 54 अध्याय और करीब 1000 पृष्ठ हैं। इसमें प्रेम और विवेक की खोज में निकले एक राजकुमार की कहानी है।

यूरोप का प्रथम उपन्यास सेर्वैन्टिस का “डोन क्विक्सोट” माना जाता है जो स्पेनी भाषा का उपन्यास है। इसे 1605 में लिखा गया था।

अंग्रेजी का प्रथम उपन्यास होने के दावेदार कई हैं। बहुत से विद्वान 1678 में जोन बुन्यान द्वारा लिखे गए “द पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस” को पहला अंग्रेजी उपन्यास मानते हैं।

• भारतीय भाषाओं में उपन्यास

जिसे बँगला और हिंदी में उपन्यास कहा जाता है गोपाल राय के अनुसार उसे "उर्दू में 'नाविल', मराठी में 'कादम्बरी' तथा गुजराती में 'नवल कथा' की संज्ञा प्राप्त हुई है।"[2]

हिन्दी का प्रथम उपन्यास

यह भी एक विचारणीय प्रश्न है कि हिंदी का पहला उपन्यास किसे स्वीकार किया जाए । इस संदर्भ में विद्वान अनेक औपन्यासिक कृतियों पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं । लाला श्रीनिवास दास ( Lala Shrinivas Dass ) का ‘परीक्षा गुरु ( 1882) (Preeksha Guru )’ तथा श्रद्धा राम फ़िल्लौरी कृत  ‘भाग्यवती‘ आदि कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जिन्हें हिंदी का प्रथम उपन्यास माना जाता है । यहां एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि भाग्यवती उपन्यास यद्दपि 1877 में लिखा जा चुका था तथापि परीक्षा गुरु को हिंदी का प्रथम उपन्यास इसलिए भी माना जाता है क्योंकि वह प्रकाशन वर्ष की तुलना में पहले आ चुका था। लिहाजा हिंदी का प्रथम उपन्यास लाला "श्रीनिवासन दास" कृत 'परिक्षागुरु' ही है ।

मलयालम

इंदुलेखा - रचनाकाल, 1889, लेखक चंदु मेनोन

तमिल

प्रताप मुदलियार - रचनाकाल 1879, लेखक, मयूरम वेदनायगम पिल्लै

बंगाली

दुर्गेशनंदिनी - रचनाकाल, 1865, लेखक, बंकिम चंद्र चटर्जी

मराठी

यमुना पर्यटन - रचनाकाल, 1857, लेखक, बाबा पद्मजी।इसे भारतीय भाषाओं में लिखा गया 'प्रथम उपन्यास' माना जाता है। इस तरह हम देख सकते हैं कि भारत की लगभग सभी भाषाओं में उपन्यास विधा का उद्भव लगभग एक ही समय दस-बीस वर्षों के अंतराल में हुआ


● हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासों के कथानक व मुख्य बातें :-

1. प.गौरीदत्त:- 

गोपालराय के अनुसार हिंदी का प्रथम उपन्यास गौरी दत्त का "देवरानी जेठानी की कहानी" 1870 है।

2.  श्रद्धाराम फुललोरी :- 

 इनका उपन्यास "भाग्यवती" 1877 मेंं आया था  इसका उद्देश्य था कि " अखण्ड भारत की स्त्रियां "ग्रहस्थ धर्म की शिक्षा" प्राप्त कर सके"..। (भूमिका से)

3. लाला श्रीनिवासन दास :- 

"परीक्षा गुरु" 1882 की भूमिका में लिखा है "इससे पूर्व के उपन्यास केवल नायक-नायिका , राजा, सेठ-साहू आदि से समबन्धित लिखे जाते थे। परंतु पहली बार भारतीय मध्यवर्ग को लेकर पाश्चात्य संस्कृति के हानिकारक प्रभाव का वर्णन दिखाया गया है , जोकि सचमुच हिंदी में नई चाल का उपन्यास सिद्ध हुआ"..।

लेखक ने बताया है कि जो बात सौ बार बताने से भी मन मे नहीं बैठती वह एक परीक्षा से मन में बैठ जाती है।

"बच्चन सिंह" के अनुसार इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि" इसमें नवजागरण की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। अपनी भाषा की उन्नति के साथ ही इसमें नए ढंग की खेती और कल-कारखाने की उन्नति पर बल दिया जाता है। "अंग्रेज़ो की नकल को निषिद्ध ठहराया है और देशी भाषा में शिक्षा देने पर जोर दिया गया है। अखबारों की कद्र न करने की निंदा की गई है। पुरानी पीढ़ी की कर्मठता को अनुकरणीय बताया गया है। इस तरह उस युग को समग्रता में समेटने का जो प्रयास लालाजी ने किया है, वह प्रशंसनीय है" .। 

बच्चन सिंह के अनुसार " प्रेमचंद के आदर्शमुखी यथार्थ  गंगा की गोमुखी यही है"...। 

रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "इसका स्वर सात्विक और वातावरण नैतिक रखने के लिए प्रसिद्ध पुरुषों के आत्म वचन को रखा गया है। पुराने रूपकों की व्याख्या करके सादृश्य पर देखें तो यह विवेक और परम्परा का सहारा है जो विदेशी आक्रामक संस्कृति से रक्षा करता है। यह रचना स्वयं " भारतीय और अंग्रेजी संस्कृतियों के संघर्ष को अपना उपजीव्य बना कर चलती है'...।"

• हिंदी की प्रथम अंग्रेजी ढंग का और प्रथम मैलिक  उपन्यास भी इसी को दिया जाता है। इसमे भारतीय मध्यवर्ग के आकर्षण के बहकावे में आकर अपनी गर्त का कारण बनने और उसके बचने की कथा है।

4. "किशोरीलाल गोस्वामी" जी के उपन्यासों पर "बंकिमचंद्र चटर्जी" का प्रभाव है और बाँग्ला उपन्यासों पर अंग्रेजी का सीधा प्रभाव है, तो कहा जा सकता है कि हिंदी उपन्यासों पर अंग्रेजी से होते हुए बाँग्ला उपन्यासों का प्रभाव सीधा है।

5. बालकृष्ण भट्ट :-

 "नूतन ब्रह्मचारी" 1886 में उपन्यास का मुख्य पात्र "विनायक" के व्यवहार से डाकुओं के हृदय परिवर्तन की कथा है जिसमें 2 विरोधी प्रकार के चरित्रों को उद्घाटित किया है। 

इसका आरम्भिक प्रकाशन "हिंदी प्रदीप" में हुआ था।

6. ठाकुर जगमोहन सिंह :- 

"श्यामास्वप्न " 1888 में सँस्कृत की प्रेमकथा के आधार पर लिखी गयी है जिसमें ब्राह्मण कुमारी और क्षत्रिय कुमार के स्वछंद प्रेम की कथा दिखाई है । जाति प्रथा को तोड़ने का यह अच्छा प्रयास रहा है। इसमें ग्राम्य जीवन के दृश्य दिखाए गए हैं।  

7. राधाकृष्ण दास :- 

निःसहाय हिन्दू" 1890 हिंदुओ की निस्सहायता और मुस्लिमों की धार्मिक कट्टरता के साथ हिन्दू मुस्लिम मित्रता भी दिखाई है। गोवध निवारण इस उपन्यास का मुख्य उद्देश्य था।

8. लज्जाराम मेहता :-

 "धूर्त रसिकलाल" 1889 में उसकी धूर्तता दिखाई गई है। वह आने वाले मित्र सोहनलाल को फंसाने की कोशिश करता है परंतु अंततः पकड़ा जाता है।

 "स्वतन्त्र रमा और परतन्त्र लक्ष्मी "1899 में 2 सगी बहनों रमा और लक्ष्मी के माध्यम से भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित महिलाओ को दिखाया गया है।  

"आदर्श दम्पति" 1904 में एक भारतीय दम्पत्ति की कथा दिखाई है जिसमें उनके भारतीय संस्कृति के अनुसार प्रेम करने की कथा को रखा गया है।

"बिगड़े का सुधार" 1907 में M.A तक शिक्षा पाए नयी सभ्यता के बनमाली बाबू और उनकी लटनी की कथा दिखाई है जिसमें बनमाली बाबू नई सभ्यता की धुन में एक होटल की नौकरानी से प्रेम कर लेते हैं परन्तु अंत में उसका परदेसीपन का भूत उतर जाता है।

9. हरिऔध :-

"ठेठ हिंदी का ठाठ" 1898 का अन्य नाम 'देवबाला' है।जिसमें अनमेल विवाह की समस्या उठाई है और उसके दुष्परिणाम को दिखाया है।

" अधखिला फूल" 1907 में धर्म की महत्ता और अंधविश्वास के कुपरिणाम को दिखाया गया है। 

10. देवकीनंदन खत्री :-

तिलिस्मी शब्द यूनानी के "टेलेसमा" और अरबी के "तिलिस्म" का हिंदी संस्करण है। जिसका प्रयोग जादू, अलौकिक, इंद्रजाल, गड़े हुए धन आदि घटनाओं को दिखाने के लिए किया जाता है। जिन उपन्यासों में कथानायक द्वारा किसी तिलस्मी इमारत को तोड़कर खजाना प्राप्त करने की कथा वर्णित होती है उन्हें 'तिलस्मी उपन्यास' कहा जाता है। इस कार्य में नायक को ऐयारों से बड़ी मदद मिलती है। ऐयार शब्द 'अरबी' का है जिसका अर्थ होता है 'ऐसा व्यक्ति जो तीव्रगामी, चपल, चतुर, हो।'

देवकीनंदन खत्री कहते हैं " ऐयार उसको कहा जाता है जो हर एक "फन" (कला) को जानता हो। शक्ल बदलने से लेकर दौड़ना उसका मुख्य काम रहता है"...। (चन्द्रकान्ता, पृ 2, फुटनोट से)

रामचंद्र तिवारी अपनी विशालकाय रचना 'हिंदी का गद्य साहित्य' में कहते हैं -   काशीनरेश की कृपा से आपको चकिया और नौगढ़ के जंगलों के ठीका मिल गया था। इन्हीं जंगलों और पहाड़ों में अनेक  इमारतों के भगनावशेषों को देखने से आपकी रहस्मयी कल्पना-शक्ति स्फुरित हुई और आपने चन्द्रकान्ता लिखकर हिंदी में तिलस्मी-ऐय्यारी उपन्यासों का प्रवर्तन किया।


" चन्द्रकान्ता" 1888 में विजयगढ़ की राजकुमारी "चन्द्रकान्ता" और नौगढ़ के राजकुमार "वीरेंद्र सिंह" की प्रेम कथा को जादुई रूप में दिखाया गया है।

• इस उपन्यास के बारे में "शुक्ल जी" कहते हैं कि "इसे पढ़ने के लिए कई उर्दू भाषियों ने हिंदी सीखी थी"..।

"शुरू-शुरू में "चन्द्रकान्ता" और "चन्द्रकान्ता संतति" पढ़ कर न जाने कितने नवयुक हिंदी के लेखक हो गए। चन्द्रकान्ता पढ़कर वे हिंदी और प्रकार की भी रचनाएँ पढ़ गए और आगे चलकर कुछ लिखने भी लगे"...। उनके अनुसार "हिंदी साहित्य के इतिहास में "देवकीनंदन खत्री" का स्मरण इस बात के लिए सदा बना रहेगा कि उन्होंने जितने पाठक बनाए उतने और किसी ने नहीं"...।

• "बच्चन सिंह" चन्द्रकान्ता की तुलना पद्मावत से करते हुए कहते हैं कि" यह जायसी के सिंहलगढ़ से भी ज्यादा अधिक रहस्यमय है। इसमें एक बार फँसने के बाद निकलना मुश्किल है, इसमें एक ऐसा बगुला है कि जो आपको देखे तो आपको लील जाए और कहीं गुंजलक मारे अजदहा बैठा है उसने साँस ली कि आप उसके पेट में। ऐसे कई किस्से है इसमें और ऐशोआराम के कई दृश्य हैं"...।

• "प्रदीप सक्सेना" ने यह प्रमाणित किया है कि "चन्द्रकान्ता" यथार्थवाद के प्रथम उत्थान के महाकाव्य है। चन्द्रकान्ता 2 युगों के उस संधिस्थल पर खड़ी है, जहाँ से एक युग ढह रहा है और दूसरा उभर रहा है" (आलोचना,जनवरी-मार्च, 1986,पृ53)

तिलस्मी उपन्यासों को शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य कोटि में नहीं रखा है।

11. गोपालराम गहमरी :-

गोपालराम गहमरी "जासूस " नामक पत्रिका निकलते थे। जिस तरह से पाश्चत्य साहित्य में "सर ऑर्थर कानन डायल" का नाम जासूसी उपन्यासों के लिए प्रसिद्ध है ठीक उसी तरह हिन्दी में "गोपालराम गहमरी" का नाम प्रसिद्ध है। उन्होंने 200 से ज्यादा जासूसी उपन्यास लिखे। इन उपन्यासों का विषय वस्तु चोरी, डकैती, खून आदि से जुड़ा होता था जिसमें जासूस को उस समस्या का हल निकालना पड़ता था। इनका एक उद्देश्य मनोरंजन करना भी होता था।

इन्हें 'हिंदी का कानन डायल' कहा जाता है।

• हिंदी सहित्य में जासूसी और अय्यारी उपन्यासों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए प्रेमचंद ने कहा था - "जिन्हें जगत गति नही व्याप्ति वह आजकल जादुई उपन्यास लिखने लगे हैं".।(कुछ विचार,प्रेमचंद-पृ99)


• उपन्यास विधा की शुरुआत जासूसी, एय्यारी, तिलस्मी या आशिकी मिजाज वाले उपन्यासों की बाढ़ से हुआ। उसी सम्बन्ध में समाज के दूषित होने से जुड़ा एक विवाद चला जिसके केंद्र में सबसे ज्यादा "देवकीनंदन खत्री" के तिलिस्मी और "किशोरीलाल गोस्वामी" के ऐतिहासिक उपन्यास आये।

"चन्द्रकान्ता" और "चन्द्रकान्ता सन्तति" में वर्णित घटनाओं की यथार्थता को लेकर कई अंको में विचार-विमर्श किया। सबसे पहले विरोध "लज्जाराम मेहता" ने किया था। इस पूरे विवाद में मूल प्रश्न यथार्थ अभिव्यक्ति पर था जिसके घेरे में सबसे ज्यादा किशोरीलाल गोस्वामी घेरे गए। उनके 60 से ज्यादा उपन्यासों में प्रकृतवादी चित्रण (नग्नता) दिखाई गई है और उनका वृंदावन में पला बढ़ा होना मेल नहीं खाता कि ऐसी जगह पोषित होकर किसी पर इस तरह का प्रभाव पड़ सकता है।

उपन्यासों और उपन्यासकारों के विवाद से वह उसके प्रभाव पर आ जाता है जहाँ सबसे पहले "चम्पालाल जौहरी" 'सुधाकर' "हिंदी साहित्य में डकैती" शीर्षक इंदु में प्रकाशित करवाते हैं जोकि "विष्णुचंद्र शर्मा" के "हिंदी का हानिकर साहित्य" के प्रतिवाद स्वरूप लिखा गया था। जिसमें उन्होंने 3 हानियाँ गिनाई थी-

1. यह श्रृंगार रस के होते हैं जिससे पाठकों के मन में कुवासना आ जाने का खतरा होता है।

2. ऐहिक और पारलौकिक कार्यों में किसी तरह की सिद्धि नहीं होती।

3. मन और बुद्धि का सुखियापन होता है।

इसका उत्तर "सुधाकर" जी इंदु में प्रकाशित लेख से कहते हैं कि " माना कि श्रृंगारिक उपन्यासों से कुवासना आती है लेकिन सभी प्रकार के उपन्यास श्रृंगारिक नहीं होते हैं इस लिहाज से जो नैतिकता वादी उपन्यास हैं वह भी छत जाएँगे। ऐतिहासिक उपन्यास भी इतने प्रभावी होते हैं कि उनकी छाप लंबे समय तक पाठकों के हृदय से जाती नहीं। किंतु पण्डित जी नैतिक उपन्यास को भी हानिकारक बताते हैं"...।

 ● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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डॉ धर्मवीर की समझ -

 

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डॉ. धर्मवीर की समझ

 अस्मितावाद की धर्मवीरी समझ 

       राजीव रंजन गिरि

हिन्दी कथा-साहित्य की कर्मभूमि बदलकर उसका कायाकल्प करने वाले अमर कथाकार प्रेमचन्द की रचनाओं पर विद्वानों के बीच वाद-संवाद होते रहे हैं। अपनी-अपनी वैचारिक समझ और नजरिये से विद्वानों ने उनकी रचनाओं को विवेचित-विश्लेषित किया है। इन लोगों की समझ और नजरिये का फर्क ही रचना पर भिन्न स्थापना कराता है। प्रेमचन्द जिस दौर में लिख रहे थे, उस समय के कुछ आलोचकों ने प्रेमचन्द की तीखी आलोचना की थी। इलाचन्द्र जोशी और हेमचन्द्र जोशी जैसे लेखकों का मानना था कि प्रेमचन्द की रचनाएँ भविष्य में याद नहीं की जाएँगी। नन्द दुलारे वाजपेयी ने इन्हें 'समसामयिक विषय का कथाकार' कहकर आलोचना की थी। असल में प्रेमचन्द की कई रचनाएँ स्वाधीनता-आन्दोलन में घटित सच्ची घटनाओं पर आधारित थीं। इसे ही परखकर जोशी बन्धुओं ने अपनी राय बनायी थी कि आनेवाले समय में प्रेमचन्द की कहानियाँ बासी हो जाएँगी। प्रेमचन्द की कहानियों की व्यापक लोकप्रियता ने ऐसी मान्यताओं का पुरजोर जवाब दे दिया है। यह था प्रेमचन्द की आलोचना का एक पक्ष। ज्योति प्रसाद निर्मल, ठाकुर श्रीनाथ सिंह जैसे लेखकों ने अपनी जातिवादी मानसिकता के साथ प्रेमचन्द की आलोचना की थी। इन लोगों का मानना था कि प्रेमचन्द अपनी रचनाओं में ब्राह्मणों, जमींदारों को काले रंग में चित्रित करते हैं। लिहाजा, 'घृणा के प्रचारक' हैं। प्रेमचन्द की आलोचना का यह दूसरा पक्ष था।

                ठाकुर श्रीनाथ सिंह और ज्योति प्रसाद निर्मल की आलोचना के आधार पर देखा जाये तो जमींदारों और उच्च जातियों को काले रंग में चित्रित करने का क्या मतलब निकलेगा? ऐसे में प्रेमचन्द की पक्षधरता किस तबके के साथ साबित होगी? जाहिर तौर पर, तथाकथित निम्न जातियों और समाज के दबे-कुचले लोगों के प्रति।

अस्मितावादी विमर्श ने प्रेमचन्द की रचनाओं का अपने नजरिये से मूल्यांकन किया है। डॉ. धर्मवीर की, प्रेमचन्द पर  प्रकाशित, तकरीबन साढ़े सात सौ पृष्ठों की किताब 'प्रेमचन्द की नीली आँखेंÓ (वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली) प्रेमचन्द को बिल्कुल भिन्न धरातल पर विवेचित-विश्लेषित करती है। प्रेमचन्द की प्रगतिशील छवि पर अपने वैचारिक मानस के हिसाब से सवाल उठाते हुए डॉ. धर्मवीर ने कुछ साल पहले एक किताब लिखी थी, 'प्रेमचन्द : सामन्त का मुंशी'। इस किताब में धर्मवीर ने 'कफन' कहानी को केन्द्र में रखकर अपनी राय जाहिर की थी। 'कफन' कहानी का विश्लेषण करते हुए धर्मवीर ने कहा था कि बुधिया के पेट में जमींदार का बच्चा था। चूँकि यह तथ्य या इसका संकेत कफन कहानी में नहीं मिलता; लिहाजा धर्मवीर के विश्लेषण और अभिमत की तीखी आलोचना हुई थी। 'प्रेमचन्द : सामन्त का मुंशी' में, इन्होंने लिखा था कि 'इस छोटी पुस्तक में इसी नजरिये से देखा गया है कि वे दलित और स्त्री के मामले में समय के दबाव के बदले हुए सामन्ती विचारों के व्यक्ति और प्रतिनिधि साहित्यकार थे।'
                  डॉ. धर्मवीर का यह बीज-विचार 'प्रेमचन्द की नीली आँखें में पल्लवित-पुष्पित हुआ है। अपनी इस  किताब में, इन्होंने लिखा है कि 'प्रेमचन्द पर मुझे कुछ भी नहीं कहना था। प्रेमचन्द और प्रेमचन्द का साहित्य मेरे चिन्तन के विषय नहीं थे। वे पुस्तकों की मेरी स्कीम से बाहर थे। लेकिन भ्रम यह फैलाया गया कि प्रेमचन्द प्रो-दलित और प्रो-वूमेन थे। यह बर्दाश्त से बाहर की बात थी।' चूँकि धर्मवीर के लिए, अब तक चली आ रही, प्रेमचन्द पर स्त्री-दलित सम्बन्धी मान्यताएँ बर्दाश्त से बाहर थीं, लिहाजा यह लिखी गयी।
                    इस भारी-भरकम किताब में डॉ. धर्मवीर ने तीन दावा पेश किया है-''एक, प्रेमचन्द के उपन्यास 'रंगभूमि' का असली सामाजिक सन्दर्भ ढूँढ़ निकाला है। यह स्वामी अछूतानन्द के रूप में चमारों के आदि हिन्दू आन्दोलन का है। दो, प्रेमचन्द की रखैल ढूँढ़ ली है कि वह कानपुर की और कानपुर में होनी चाहिए। यह भी अन्दाजा लगाया है कि वह चमारी होनी चाहिए। तीन, कायस्थों के इतिहास की एक व्याख्या दी है कि कायस्थ शब्द 'क्राइस्ट' से बना हो सकता है।'
                         सवाल उठता है कि डॉ. धर्मवीर ने रचनाकार प्रेमचन्द को किस रूप में देखा है? प्रेमचन्द पर लिखी इनकी किताबों से साफ पता चलता है कि इन्हें महज कायस्थ जाति के एक व्यक्ति के रूप में देखा गया है। जाहिर तौर पर इन्होंने जो तर्क-पद्धति अपनायी है, उसके मुताबिक, ''यदि प्रेमचन्द को लेकर बात केवल कला-जगत की चलाई जाए तो वे कायस्थ जाति के पात्रों का, चाहे तो अच्छा खाका खींच सकते हैं। वर्ग के रूप में वे कायस्थ जाति के तीनों प्रकार के वर्गों का चित्रण करने में भी सफल हो सकते हैं।" आशय यह कि रचनाकार प्रेमचन्द का जन्म जिस जाति में हुआ था, उसी जाति के पात्रों का अच्छा खाका खींचने में सफल हो सकते हैं। अगर धर्मवीर की यह बात मान ली जाये तो साहित्य की बुनियादी मान्यता – साहित्य परकाया प्रवेश की साधना है– गलत साबित होगी। कोई भी रचनाकार सिर्फ अपनी जाति के पात्रों की मार्फत साहित्य नहीं रच सकता। अपने इस कुतर्क से वे जो स्थापित करना चाहते हैं, उस आधार पर तो दलित साहित्य भी नहीं रचा जा सकता। कारण कि दलित साहित्य का रचनाकार अपनी जाति के अलावा पात्र की रचना कैसे करेगा; गैर दलित पात्र की रचना का तो सवाल ही नहीं पैदा होगा !
                   डॉ. धर्मवीर की इसी तरह की विवेचन-पद्धति का नतीजा है कि वे डॉ. आम्बेडकर के चिन्तन को स्वतन्त्र दलित-चिन्तन मानने से इनकार करते हैं। आखिर क्यों? क्योंकि डॉ. आम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। अगर बाबा साहब डॉ. धर्मवीर द्वारा प्रस्तावित और पसन्दीदा 'धर्म' को स्वीकार करते, तो स्वतन्त्र दलित-चिन्तन का विकास होता ! कारण कि बौद्ध धर्म के संस्थापक का जन्म क्षत्रिय परिवार में हुआ था। ऐसे में एक दलित के तौर पर डॉ. आम्बेडकर का बौद्ध धर्म में शामिल होना, डॉ. धर्मवीर को मान्य नहीं है।

                   डॉ. धर्मवीर की इस किताब का महत्त्वपूर्ण पक्ष है– स्वामी अछूतानन्द और उनके द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन पर विस्तारपूर्वक विचार। प्रेमचन्द के उपन्यास 'रंगभूमि' को अछूतानन्द के साथ जोड़कर अब तक नहीं देखा गया था। धर्मवीर ने 'रंगभूमि' को अछूतानन्द और उनके आन्दोलन की परिणति मानकर देखने का इसरार करते हुए, नतीजा क्या निकाला है? इनका मानना है, 'प्रेमचन्द ने रंगभूमि का पाठ तैयार ही इसलिए किया था कि अपने समय के अछूतों के नेतृत्व से लड़ा जा सके।' इसलिए धर्मवीर प्रस्तावित करते हैं कि "यदि आप पाठ से बाहर नहीं देख रहे हैं तो समझ लो, आप मकड़ी के जाल में फँस गए हैं। तब इस जाल को कौन तोड़ेगा? पहले इन्द्रजाल का हथियार विरोधियों को फाँसने के लिए ही चलता था, साहित्य के क्षेत्र में इसे नाम बदलकर 'कला जाल' कह दो– है यह मकडज़ाल ही।"

                  धर्मवीर ने आगे साफ-साफ लिखा है कि ''प्रेमचन्द ने 'रंगभूमि' रचकर चमार-पाठकों को कुएँ में ढकेला है। उन्होंने हम से हमारा इतिहास छीना है और हमसे हमारा नायक भी छीना है। तो क्या हम प्रेमचन्द जैसे कलावादियों के चक्कर में आकर अपना इतिहास और अपने नायक को भूल जाएँ? मैं पाठ के बाहर का भी पाठक हूँ, मेरे साथ ऐसा धोखा कैसे खेला जा सकेगा? मैंने 'रंगभूमि' को चारों ओर से घेरते खड़े अपने महान आजीवक स्वामी अछूतानन्द पहचान लिये हैं– मुझे प्रेमचन्द के किसी ऋषि सूरदास, औलिये सूरदास, फरिश्ते सूरदास, साधु सूरदास, दार्शनिक सूरदास, इल्म गैब वाले सूरदास और असाधारण पुरुष सूरदास को जानने और मानने की जरूरत नहीं है। सीधा आरोप लगाया जा सकता है कि 'रंगभूमि' रचकर प्रेमचन्द ने चमार पाठकों को बेवकूफ बनाने की रणनीति तैयार की थी।"

                        डॉ. धर्मवीर की तरह इतिहास से अपने मनचीते नायक को उपन्यास में खोजते हुए पढऩे वाले लोगों के लिए, 'कर्मभूमि' के 'निवेदन' में प्रेमचन्द ने लिखा था 'संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उपन्यास को इतिहास की दृष्टि से पढ़ते हैं। उनसे हमारा निवेदन है कि जिस तरह पुस्तक के पात्र कल्पित हैं, उसी तरह इसके स्थान भी कल्पित हैं। कल्पित और यथार्थ व्यक्तियों में यह अन्तर अवश्य होगा, जो ईश्वर और ईश्वर के बनाए हुए मनुष्य की सृष्टि में होना चाहिए।" इतिहास के अपने पसन्दीदा चरित्र को 'रंगभूमि' में अपने मनचाहे रूप में न पाने के कारण ही, धर्मवीर को लगता है कि रंगभूमि रचकर प्रेमचन्द ने चमार पाठकों को बेवकूफ बनाने की रणनीति तैयार की थी।

       बहरहाल, किसी भी अस्मितावादी समूह द्वारा उठाए जा रहे सवालों से मुँह नहीं फेरना चाहिए। कारण कि 'वृहद आख्यान' रचने के दौरान छोटी अस्मिताएँ दबी रह जाती हैं। साथ ही, कई दफे वृहद आख्यान के नाम पर ऊपर के लोगों का हित साधने की कवायद भी की जाती है। परंतु यह भी ध्यान रहे कि अस्मितावादी विचार या समूह का लक्ष्य मुक्ति-कामना हो। ऐसा  न हो कि अपनी अस्मिता को उभारकर, ताकत अर्जित कर, एक नया वृहद आख्यान रच लिया जाये। उसके बाद अस्मिता से बने इस 'नए' आख्यान में भी दूसरी अस्मिताएँ दब जाएँ। लिहाजा लोकतान्त्रिक मूल्यों की कसौटी पर अस्मितावादी विचारों की जाँच होनी चाहिए। वरन अस्मितावादी विमर्श मुक्तिकामी परियोजना की बजाय एक दूसरी दमनकारी परियोजना का रूप धारण कर लेगी।
                             प्रेमचन्द के अस्मितावादी मूल्यांकन के दौरान भी इन बातों को याद रखना होगा। अपने समय में ऐसे ही सवालों से जूझते हुए प्रेमचन्द ने लिखा था, 'सूबा सूबे वालों के लिए, जिला जिले के लिए और फिर हिन्दू-हिन्दू के लिए, मुस्लिम-मुस्लिम के लिए, ब्राह्मण-ब्राह्मण के लिए, कायस्थ-कायस्थ के लिए, जैसी सदाएँ उठने लगी हैं। इतनी दीवारों और कोठरियों के अन्दर कौमियत कितने दिन साँस ले सकेगी?"
                                   अस्मिता के रेखांकन के साथ-साथ कौमियत की परवाह जरूरी है और वास्तविक चुनौती भी। अस्मिता और कौमियत के बीच लोकतांत्रिक संतुलन के प्रतिमान पर जाँचकर विमर्शों का मूल्यांकन होना चाहिए। यह लोकतांत्रिक पहल एक आवश्यक पड़ाव साबित होगी।

Friday, June 18, 2021

लमही में प्रेमचंद - राजीव रंजन गिरि

 

आज पढ़िए प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक "राजीव रंजन गिरि" जी का लेख प्रेमचंद और उनके गांव लमही के संदर्भ में -


लमही में प्रेमचन्द : राजीव रंजन गिरि

 लमही में प्रेमचन्द : राजीव रंजन गिरि 

प्रेमचन्द के गाँव लमही के नाम पर लखनऊ से एक त्रैमासिक पत्रिका शुरू हुई है। 'लमही’ के दूसरे अंक (अक्टूबर-दिसम्बर) में वरिष्ठ आलोचक भवदेव पांडेय ने फिराक गोरखपुरी से सम्बन्धित कुछ तथ्यों पर प्रकाश डाला है। प्रेमचन्द द्वारा स्थापित 'सरस्वती प्रेस’ में कमलापति मिश्र काम करते थे। काम के दौरान उन्हें प्रेमचन्द के सौतेेले भाई बाबू महताब राय का भी सान्निध्य मिला। कमलापति मिश्र ने 'लमही के दो रत्न’ शीर्षक संस्मरण में दोनों भाइयों क ो याद किया है। इनके मुताबिक बाबू महताब राय शुरुआती दौर में, बस्ती में बन्दोबस्त के महकमे में काम करते थे। थोड़े दिनों बाद बन्दोबस्त महकमा टूट जाने के कारण वे बेरोजगार हो गये। ''महताब राय प्रकृत्या ऐसे आत्माभिमानी थे कि किसी के समक्ष न अपनी असहायता प्रकट करते, न नौकरी के लिए किसी सिफारिश आदि का सहारा लेने का प्रयत्न करते। महताब राय को अपने कर्मण्य स्वभाव, दृढ़ निश्चय और विश्वसनीयता पर अगाध विश्वास था।’’ 

बन्दोबस्त विभाग में काम के दौरान इनका सम्बन्ध आई.सी.एस. ऑफिसर आर्थर से बन गया। बेरोजगार होने के थोड़े दिनों बाद आर्थर ने उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार पद का नियुक्ति पत्र भेजा। कमलापति मिश्र के अनुसार महताब राय ने इलाहाबाद जाने का मन बना लिया था लेकिन बड़े भाई प्रेमचन्द ने सरकारी नौकरी नहीं कर, गोरखपुर के प्रतिष्ठित व्यवसायी महावीर प्रसाद पोद्दार के प्रेस में काम करने के लिए प्रेरित किया। कमलापति मिश्र ने 11 मार्च 1920 को प्रेमचन्द द्वारा अपने अजीज दोस्त दयानारायण निगम को लिखा पत्र पेश किया है। इस चिट्ठी का मजमून बताता है कि प्रेमचन्द की इच्छा थी कि जब अपना छापाखाना कायम होगा, तो महताब राय को यहाँ बुला लूँगा। उस दौरान महताब राय साठ रुपये माहवार पर बतौर मैनेजर काम कर रहे थे। इस चिट्ठी के मजमून से यह भी पता चलता है कि महताब राय को काम करते कुछ समय बीत चुके थे। छापाखाना के मालिक पोद्दार, उन्हें नफे में भी कुछ हिस्सा देना चाहते थे। प्रेमचन्द ने लिखा है ''वह (महताब राय) काम से खूब वाकिफ हो गये हैं।’’

गौरतलब है कि प्रेमचन्द ने 8 फरवरी 1921 ई. को गोरखपुर के गाजी मियाँ मैदान में महात्मा गांधी का भाषण सुनने के बाद सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया। 1920 से ही उन्हें छापाखाना खोलने, पत्रिका निकालने की इच्छा हो रही थी। पर जोखिम लेने से घबराते थे। स्कूल शिक्षक की नौकरी छोड़ते वक्त भी वह ऊहापोह में थे। फिर शिवरानी देवी ने उन्हें मन के काम यानी नौकरी छोडऩे हेतु प्रेरित किया। प्रेमचन्द ने खुद नौकरी छोडऩे से काफी पहले महताब राय को सरकारी नौकरी नहीं करने के लिए प्रेरित किया था।

कलकत्ता से महताब राय को बुलाकर बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने 'ज्ञानमंडल’ का व्यवस्थापक नियुक्त किया। सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद प्रेमचन्द काशी में रहने लगे। फिर प्रेस और प्रकाशन खोला तथा महताब राय को 'ज्ञानमंडल’ छोड़कर अपना प्रेस चलाने के लिए दबाव डाला। महताब राय ने प्रेमचन्द की आज्ञा मान वैसा ही किया। कालान्तर में महताब राय की एक किताब 'मनमोदक’ भी इसी प्रेस से छपी। कुछ समय बाद प्रेमचन्द और महताब राय के बीच प्रेस को लेकर तनाव हो गया। बकौल कमलापति मिश्र ''शिवरानी देवी ने प्रेमचन्द पर जोर डाला कि महताब राय प्रेस में एक नौकर की तरह रहें, हिस्सेदार, के समान नहीं। प्राय: प्रतिदिन घर में महताब राय को लेकर अप्रिय प्रसंग उठा करते। प्रेस घाटे में चल रहा था। महताब राय विवशता की स्थिति में प्रेस से अलग हो गये।’’ प्रेमचन्द के व्यक्तित्व के कुछ अन्तर्विरोध दिखते हैं, जिन पर अभी भी काफी पड़ताल करने की जरूरत है। सरस्वती प्रेस को लेकर अपने भाई महताब राय के साथ प्रेमचन्द का बर्ताव, मजदूरों की हड़ताल और प्रेस मैनेजर प्रवासीलाल वर्मा के साथ रुपयों को लेकर हुई टकराहट और जागरण को लेकर विनोदशंकर व्यास के साथ हुआ विवाद, ऐसे मामले हैं जिनमें प्रेमचन्द की भूमिका विवादास्पद है।

हिन्दी में बड़े साहित्यकारों के प्रति श्रद्धा-भक्ति का आलम यह है कि उनके साहित्य और व्यक्तित्व के अन्तर्विरोधों को नजरअन्दाज कर दिया जाता है। कभी-कभार इसकी चर्चा होती भी है तो दबी जुबान से। ऐसे अन्तर्विरोधों का उजागर होना जरूरी है। 'लमही’ को सन्तुलित और तर्कसंगत ढंग से ऐसी रचनाएँ प्रकाशित करने के लिए याद किया जाएगा।

http://hindialochana.blogspot.com/2020/10/blog-post_59.html?m=0

प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार हैं। इसमें 'हिंदी साहित्य लोचन' का कोई हस्तक्षेप नहीं है।

'हिंदी आलोचना' ब्लॉग से.....।

Wednesday, June 16, 2021

आधुनिक काल भाग 10

 

                (अन्य सप्तक के कवि )


"हिंदी साहित्य लोचन" , hindisahityalochan, sahityahindilochan.blogspot.com


● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "प्रयोगवाद" भी है। आज हम  'प्रयोगवाद के दूसरे व तीसरे सप्तक के कवियों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप प्रयोगवादी कवियों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।


1. शमशेर :-

प्रयोगवादी कवियों में शमशेर की गिनती एक अनोखे कलाकार के रूप में कई जाती है। यह कला उनकी लेखनी में देखी जा सकती है जहाँ उन्होंने शब्दों का चयन बड़ी सूझबूझ और इत्मीनान से किया है। इसके अलावा बिम्बों की रचना उनकी इस कला में चार चाँद लगाने का उद्योग करती है। मानो ऐसा लगता है कि शमशेर अपनी कलम के माध्यम से शब्दों में रंग भर रहे हों इसी आधार पर उन्हें एक चित्रकार के रूप में भी देखा जाता है। शमशेर की इसी कलात्मकता पर कुछ विद्वानों ने अपने मत प्रस्तुत किये हैं जो निम्नांकित हैं -

अ. "विश्वनाथ त्रिपाठी" के अनुसार शमशेर ने फ्रांसीसी प्रतिकवादियों के प्रभाव में आकर कविताएँ लिखी थी इसलिए उन्हें "कवियों का कवि" कहा जाता है।

ब.  "बच्चन सिंह" के अनुसार शमशेर मूलतः प्रयोगवादी कवि हैं। इस दृष्टि से वह अज्ञेय के निकट पाए जाते हैं।

"हिंदी साहित्य लोचन" hindisahityalochan के मंच पर आप जान पाएंगे कि , शमशेर की रचनाओं में सम्वेदना पक्ष कितना ठोस और मजबूती से जुड़ा है उसको बच्चन सिंह इस आधार पर सिद्ध करते नजर आते हैं। उनके अनुसार शमशेर का सम्वेदना पक्ष कोई हवाई खेल नहीं है कि मानो कोई कविता पढ़ी और उसमें से निकलने वाला भाव कहीं दूर ही आसमान में उड़ता नजर आ रहा हो। इसे और भी आसानी से समझने के लिए ऐसे भी देख सकता हैं  जब भी कोई कलाकार किसी कला की रचना करता है तो उसे एक ठोस आधार की आवश्यकता होती है। भवन निर्माण के समय सबसे पहले उसकी नींव तैयार की जाती है जिस पर पूरा भवन टिका होता है। यदि इस नींव में ही कहीं कोई कमी या कमजोरी आ गयी तो भवन धड़ाधड़ गिर जाएगा। ठीक ऐसे ही कलाकार को भी कल्पना व सम्वेदना का सहारा उतना ही लेना चाहिए जिससे उसका मर्म मौलिक लगे न कि हवाई। इसी संदर्भ में बच्चन सिंह आगे कहते हैं, " शमशेर के प्रयोगवाद का रथ संवेदना का धरातल नहीं छोड़ता है लेकिन जिस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर का रथ धरती से चार अंगुल ऊपर चला करता था उसी प्रकार अज्ञेय का प्रयोगवादी रथ भी संवेदना के धरातल से चार अंगुल ऊपर चलता है।"

वह शमशेर को प्रेम के कवि बताते हुए उन्हीं की बातों मे कहते हैं " मेरी असली जमीन तो रोमानी ही थी, रोमानी बनी रही"..।वह त्रिलोचन की तरह या अन्य कवियों की तरह सबकुछ कह देने के पक्ष में नहीं हैं, वह बिंबो के माध्यम से शब्दों को अनायास बिखेर देते हैं।

बच्चन सिंह के अनुसार शमशेर प्रेम और प्रकृति-सौंदर्य के कवि हैं- कहीं दोनों अलग हैं और कहीं दोंनो एक साथ। दोनों का अद्भुत रासायनिक घोल है। अपने चित्रों को बनाने में वह कई रंगों का प्रयोग करते हैं। रंग कई हैं- पर एक भी चटकीला नहीं है- सब किंचित मटमैले, धुँधले, साँवले, उदास"...।

बच्चन सिंह के अनुसार टी.एस इलियट की तरह शमशेर भी धार्मिक और यौन-बिंबों को एक साथ रखकर नया प्रभाव पैदा करते हैं । और उनका संघर्ष निजी है, प्राइवेट है"..।

स. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार अज्ञेय और शमशेर बात के कवि हैं। शमशेर ने अपने काव्य-संकलन "कुछ और कविताएँ" की भूमिका में लिखा है "हर भाषा की जान होता है मुहावरा"..।


शमशेर अपनी निजी अनुभतियों, उनकी बारीक बुनावट और प्रायः दुरूहता के कारण भी लोगों का ध्यान आकृष्ट करते हैं।

शमशेर ने माना है कि " टेक्नीक में एजरा पाउंड शायद मेरा आदर्श बन गया है। इसके आगे कहते हैं कि  " मैं उर्दू और हिंदी का दोआब हूँ।

शमशेर की लंबी कविता "अमन राग" प्रगतिवादी सरोकारों से सम्बद्ध है।


● शमशेर पर कहे गए कथन:-

1. मलयज के अनुसार 'शमशेर मूड्स के कवि' हैं।

2. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार ये 'बात के कवि' हैं।

3. अज्ञेय के अनुसार ये 'कवियों के कवि' हैं।

4. मुक्तिबोध के अनुसार कवि की 'मूल दृष्टि इम्प्रेशनिस्टिक' की है। इसके आगे वह कहते हैं कि इनकी अभिव्यक्ति एक प्रभावशाली भवन है जिसमें जाने में डर लगता है। यह प्रणय जीवन के रससिद्ध कवि हैं।

5. विष्णु खरे ने 'शमशेर की शमशेरियत' कहा है।

6. रामचंद्र तिवारी के अनुसार 'शमशेर का गद्य हिंदी का जातीय गद्य' है।

   

2. नरेश मेहता :-

नरेश मेहता की शुरुआती कविताओं में ऋग्वैदिक ऋचाओं का आदिम बिंबो का प्रभाव गहराई से दिखाया है। दूसरा सप्तक में संकलित " किरण धेनुएँ" और "उषस" ऐसी ही कविताएँ हैं।

इनकी प्रसिद्ध रचना "मेरा समर्पित एकांत" कविता को नरेश मेहता ने नई कविता की 'पहली लम्बी कविता' कहा है।

इनकी "समय देवता" कविता में दुनिया भर के देशों की सांस्कृतिक राजनीतिक गतिविधियों का दृश्यांकन हुआ है । इसके माध्यम से कवि विभिन्न भूखंडों के भूगोल, इतिहास और संस्कृति पर कुछ इस ढंग से प्रकाश डालता है कि वहाँ के निवासियों की रीति-नीति और आशा- आकांक्षाएं उद्घाटित हो उठती है। लम्बी कविता होने के कारण इसके चरणों मे विलम्बित तय का विधान किया गया है।


3. धर्मवीर भारती :- 

मूलतः दूसरे सप्तक के महत्वपूर्ण कवि धर्मवीर भारती का हिंदी साहित्य में नाटकों के लिए विशेष रूप से योगदान माना गया है, बहुत हदतक उपन्यास में भी। फिर भी इनकी कुछेक कविताएँ काफी प्रसिद्ध हुई जिसके कारण कुछ-कुछ कविताओं में भी इनका नाम चल पड़ा। इनकी प्रसिद्व कविताओं का वर्णन नीचे दिया जा रहा है -

बच्चन सिंह के अनुसार धर्मवीर भारती व्यक्ति-स्वातंत्र्य के कवि हैं। इनका "ठंडा लोहा" 1952 काव्य संग्रह कैशोर भावुकता से भरा है।

"सात गीत वर्ष" में उन्होंने अपनी किशोर भावुकता को भी तोड़ने की कोशिश की है। "प्रमथ्यु गाथा" इस काव्य संग्रह की लंबी कविता है जिसमें एक यूनानी मिथक है। प्रमथ्यु स्वर्ग स्थित द्युतिपुर को कठोर दंड देने का निश्चय किया। प्रमथ्यु को एक शिलाखण्ड से बाँध दिया गया। उसके हृदय मास-पिंड को नोंच-नोंच कर खाने के लिए बूढ़े गिद्ध को तैनात कर दिया गया है।

"कनुप्रिया" 1959 में कवि ने महाभारत की कथा को आधार बनाकर युद्ध के बाद कृष्ण उसकी थकान से राधा के पास जाकर अपनी थकान मिटाने जाएंगे। यह थकान प्रेम प्रसंग से जुड़ी है।


4. कुँवर नारायण :- 

इनकी सबसे प्रसिद्ध कविता जोकि लमबी कविता है वह आत्मजयी है जिसमें जीवन-मृत्यु जैसे गम्भीर विषय पर चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त नचिकेता द्वारा यमराज के समक्ष अपने अस्तित्व को लेकर भी प्रश्न दागे गए हैं 

 बच्चन सिंह के अनुसार कुँवर नारायण चिंतक कवि हैं। इनके काव्य संग्रह " चक्रव्यूह" 1956 में "रहना आदमी की नियति है तो उसे तोड़ना उसका धर्म"..। यही कविता का कथ्य है।

"आत्मजयी" 1965 की कथा वस्तु कठोपनिषद की यम-नचिकेता कहानी पर है। उपनिषद काल वैदिक काल के भौतिकवाद के विरुद्ध एक आध्यात्मिक प्रतिक्रिया है। इस वृति में भी भौतिकता के विरुद्ध इसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है। किंतु इसे जीने की सार्थकता या सर्जनात्मकता से जोड़कर आधुनिक बना दिया गया है। इसमें अस्तित्ववाद की झलक भी दिखाई देती है।

                                                   

5. रघुवीर सहाय :- 

रघुवीर सहाय की गणना हिंदी कविताओं में एक तेजस्वी , लोकतांत्रिक व मानव मूल्यों के संरक्षक कवि के रूप में कई जाती है। इन्होंने आजादी के बाद भारत की बनती-बिगड़ती तस्वीर को अपनी कलम का माध्यम बनाया। कॉंग्रेस के राज में जिस तरह से जनता का मोहभंग हुआ और भारतीय राजनीति ने किस प्रकार से देश को लूटने का कुकृत्य किया उसका ताज़ा उदाहरण भी इनकी कविताओं से मिल जाता है।

प्रकृति और जीवन की संश्लिष्टता कवि के काव्य-विद्वजन का स्वभाव है।

रघुवीर सहाय की कविता रामदास की हत्या संत्रास को दिखाने वाली कविता है। इनके प्रमुख काव्य संग्रह निम्नांकित हैं - 

"सीढ़ियों पर धूप में" 1960 एक अनाहत जिजीविषा, मध्यवर्गीय जीवन का दबाव और लोकतंत्र की विडम्बनाएँ चित्रित हैं । साथ ही बाद क संकलनों के मुकाबले यहाँ कवि का रुख़ कुछ हदतक कोमल है।

"आत्महत्या के विरुद्ध" 1967 में यह संग्रह जीवन में होने वाली आत्महत्याओं के विरुद्ध ही नहीं है बल्कि साहित्य की हत्या करने वाले वीटनिको और अकवितावादियों क विरुद्ध भी है। वह लोकतंत्र की विडम्बनाओ से सीधे साक्षात्कार करता है।इसमें एक शब्दवेषी छात्र मारा गया है।

"हंसों-हँसो जल्दी हँसो" 1975 में आपातकाल से सम्बद्ध कविताओं का संग्रह है। जहाँ भूमिका नहीं है, कवि मौन है, बोलने की मनाही है। व्यक्ति स्वातंत्र्य के अभाव में केवल हँसा जा सकता है बोला नहीं जा सकता।

"लोग भूल गए हैं" 1982 का मूलाधार भी व्यंग्य और विडम्बना का हिस्सा है।

"मेरा प्रतिनिधि" राममनोहर लोहिया के लिए लिखी गयी है।


6. केदारनाथ सिंह :-

 इनके "यहाँ से देखों" काव्य संग्रह में बच्चन सिंह के अनुसार केदारनाथ सिंह का कविता को देखने का बिंदु बदल जाता है। यह कविता का नया प्रस्थान बिंदु है। इसमें "जमीन पक रही है" काव्य संग्रह में एलिनियेशन इफेक्ट नहीं है और न वाक्यों के स्पीड ब्रेकर"..।

"बनारस"  "यहाँ से देखो" संग्रह की सबसे उत्तम रचना है।

"अकाल में सारस" कवि के अनुभवों का अगला चरण है।

                                             

7. बच्चन सिंह के अनुसार रामविलास शर्मा ऐसा मानते हैं कि  "गिरिजाकुमार माथुर" का किशोर मन न वयस्क होता है, न प्रौढ़, वार्धक्य तू दूर की बात है"..।

8. "श्रीकांत वर्मा" की कविता "मगध" में मगध, कौशाम्बी, हस्तिनापुर, मथुरा, नालंदा, तक्षशिला, अजातशत्रु, शकटार आदि का जादुई वर्णन किया गया है। इसमें एक मायालोक भी है और नहीं भी।

9. बच्चन सिंह के अनुसार "लीलाधर जगूड़ी" वामपंथी विचारधारा के कवि हैं। कहा जाता है कि उनकी आरम्भिक कविताओं पर धूमिल के मुहावरेबाजी और खिलंदड़ापन का प्रभाव है।

इनका "नाटक जारी है" काव्य संग्रह अकवितावाद से मुक्त नहीं है।

10. बच्चन सिंह के अनुसार "चन्द्रकान्ता देवताले" पीड़ा के कवि हैं। कविता को बुलेट बनाने की बड़बोली स्पृहा उनमें नहीं है। आज की दुनिया को सही दिशा में न ले जाने की कविता की अक्षमता उन्हें दुखी कर देती है- और यह जानते हुए भी की भ्रष्ट परिवेश में व्यर्थ हो गयी है कविता, मुझे उसी में मरना है"...।

11. "विनोदकुमार शुक्ल" की कविताओं और उपन्यासों पर लातानी जादुई यथार्थवाद का प्रभाव है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


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Friday, June 11, 2021

आधुनिककाल भाग :- 9

 

(प्रयोगवाद)





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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "प्रयोगवाद" भी है। आज हम  'प्रयोगवाद के कवियों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप प्रयोगवादी कवियों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।


● प्रयोगवाद :- एक परिचय

प्रयोगवाद हिंदी साहित्य खासकर कविता की उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिसकी तरफ अज्ञेय ने दूसरा सप्तक की भूमिका में संकेत किया था। प्रयोग अपने आप में इष्ट नहीं है बल्कि वह साधन और दोहरा साधन है। वह एक ओर तो सत्य को जानने का साधन है दूसरी तरफ वह उस साधन को भी जानने का साधन है। यह स्पष्टीकरण तार सप्तक की कविताओं को प्रयोगवादी कहे जाने पर दिया गया था। प्रयोगवाद में कविता में शिल्प और संवेदना के स्तर पर सर्वथा नवीन प्रयोग मिलते हैं। प्रयोगवाद ने साहित्य में पहली बार व्यक्तिक अस्मिता, निजी व्यक्तित्व और निजता को बहुत महत्व दिया। इसमें क्षण को महत्व देकर जीवन को भरपूर ढंग से जीने की चाह है। प्रयोगवादी कवि व्यक्तिक प्रेम की सहज स्वीकृति पर बल देता है।

प्रयोगवाद फ्रायड के दर्शन से प्रभावित है।

बच्चन सिंह के मत :-

1. बच्चन सिंह के अनुसार प्रयोगवाद से ही आधुनिकतावाद की शुरुआत होती है। इसे प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया मानना चाहिए।

2. बच्चन सिंह भी प्रयोगवाद का आरम्भ सन 1943 से माना जाता है। जिसके प्रवर्तक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" के सम्पादकत्व में "तार सप्तक" के प्रकाशन से मानी जाती है। जहाँ वह तार सप्तक की भूमिका में "सातों कवियों को राही नहीं, राहों के अन्वेषी बताते हैं"..। वह सातों कवि किसी एक स्कूल के नहीं हैं। चाहे लोकतंत्र हो या उद्योगों का समाजीकरण इन सब विषयों पर सभी कवियों के मत भिन्न हैं। उनकी रचनाएँ प्रयोगशीलता के नमूनी नहीं हैं"...।

3. बच्चन सिंह के अनुसार तार सप्तक के कवियों ने प्रयोगशील और प्रयोग शब्द का उल्लेख किया है, प्रयोगवाद का नहीँ। सबसे पहले नंदुलारे वाजपेयी ने अपने निबन्ध " प्रयोगवादी रचनाएँ" में इसका प्रयोग किया था। इस निबन्ध में तार सप्तक की समीक्षा की गई है। अज्ञेय ने "दूसरा सप्तक" की भूमिका में वाजपेयी जी के आरोपो का उत्तर देते हुए कहा है कि " हमें प्रयोगवादी कहना उठा ही अनुचित है जितना हमें कवितावादी कहना"..। आगे वह कहते हैं " प्रयोग अपने आप में इष्ट नहीं है, वह साधन है। दोहरा साधन है। क्योंकि एक तो वह उस सत्य को जानने का साधन है जिसे कवि प्रेषित करता है, दूसरे वह इस प्रेषण की क्रिया को और उसके साधनों को जानने का साधन है ; अर्थात प्रयोग द्वारा कवि अपने सत्य को अधिक अच्छी तरह जान सकता है। वस्तु और शिल्प दोनों के क्षेत्र में प्रयोग फलप्रद होता है"..।

● अज्ञेय ने अपने "दूसरे सप्तक" की भूमिका में कहा था "प्रयोग का कोई वाद नहीं होता। हम वादी नहीं रहे और न ही हैं। न प्रयोग अपने आप में इष्ट या साध्य है। ठीक इसी तरह से कविता का भी कोई वाद नहीं होता है, कविता भी अपने आप मे इष्ट या साध्य नहीं है। अतः हमें प्रयोगवादी कहना उतना ही असंगत है जितना किसी कवि को कवितावादी कहना"...।

4. बच्चन सिंह के अनुसार प्रयोगवाद का मूलाधार वैयक्तिकता या व्यक्तिवाद है । छायावादी वैयक्तिकता से यह बिल्कुल भिन्न अर्थ में है कि छायावाद में भावुकता का प्राधान्य था तो प्रयोगवाद में बौद्धिकता का। यह मुख्यतः शहरी जीवन की जटिलता से जुड़ा हुआ है जहाँ यथार्थवाद नहीं, उसका अमूर्तन रूप दिखाई देता है।

5. बच्चन सिंह की नजरों में केवल शमशेर और निराला ही "सच्चे प्रयोगशील कवि" रहे हैं। किंतु व्यक्तिनिष्ठता और आधुनिकता शमशेर में ही मिलती है।

6. बच्चन सिंह के अनुसार तार दूसरे सप्तक में एक भी कवि प्रगतिवादी नहीं है। बावजूद उसके शमशेर प्रगतिवादी न कहलाकर प्रयोगवादी ही कहलाये। रघुवीर सहाय अर्ध प्रगतिवादी और भवानीप्रसाद गाँधीवादी। इन सप्तक में न तो राजनीतिक व्यंग्य है और न आत्मग्रस्त वैयक्तिकता। पर प्रत्येक कवि प्रगतिशील व प्रयोगवादी जरूर है।

इसी के आगे वह कहते हैं कि " दूसरे सप्तक की टेक्नीक सधी हुई , भाषा बोलचाल के निकट और भावानुभूति, मर्मस्पर्शी तथा प्रकृति की ताजा छवियों से युक्त है"...।

तीसरे सप्तक में काव्य-परम्परा समाप्त हो जाती है और चौथे सप्तक में उसका सुरक्षा कवच होकर रह जाता है।

● विजेन्द्र स्नातक के अनुसार "तार सप्तक" की मूल परिकल्पना प्रभाकर माचवे और नेमीचंद जैन से हुई थी।

विजेन्द्र स्नातक के अनुसार प्रयोगवाद का मूल मन्तव्य था " संगृहीत सभी कवि ऐसे होंगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हैं। जो यह दावा नहीं करते कि उन्होंने काव्य का सत्य पा लिया, वे केवल अन्वेषी हैं"..।

● रामविलास शर्मा का मत है कि " प्रयोगवादी कविता में युग से उतपन्न अनास्था, शंका, घुटन, भग्नाशा में से एक नए मार्ग का अनुवेषण की भावना दिखाई पड़ती है। ये कवि एक नए मार्ग का अनुसन्धान करने लिए व्याकुल है"..।

● विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार "प्रयोगवाद में मोहभंग और उससे उतपन्न व्यंग्य विद्रूपता की मनःस्थिति प्रमुख है"..।


● प्रयोगवाद के संदर्भ में कहे गए विद्वानों के कथन:-

1. प्रयोगवाद शैलीगत विद्रोह है..। नगेंद्र
2. प्रयोगवाद दृष्टिकोण का अनुसंधान है..। केसरी कुमार
3. प्रयोग कलात्मक अनुभव का क्षण है..। रघुवीर सहाय
4. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने "समाज के हित मे जैसी क्रांति का सतत प्रक्रिया काम्य है, वैसे ही रचना के हित में प्रयोग की...।
5. "बैठे ठाले का धंधा" - नंदुलारे वाजपेयी।


अ . महाकवि अज्ञेय :-

• बच्चन सिंह के अनुसार अज्ञेय के "भगन्दूत" 1933 पर निराला के गीतों और प्रसाद के आँसू का प्रभाव है। इसके आगे वह कहते हैं कि 'उनके काव्य संग्रह चिंता में समर्पण, पीड़ा, आत्मदमन को पुराने ढंग से नारी के मत्थे मढ़ा गया है।'

"इत्यल्म" 1946 में यौन वर्जनाओं के विरुद्ध जिहाद छेड़ा गया है।

"हरी घास पर क्षण भर" 1949 से अज्ञेय की नई कविता यात्रा आरम्भ होती है।

"असाध्य वीणा" में प्रियंवद की तरह साधना में आत्म शोध करना पड़ता है और अहम का विसर्जन करना पड़ता है।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "आधुनिक साहित्य में मानवीय व्यक्तित्व और उसकी सर्जनात्मकता की सबसे गहरी और सार्थक चिंतना अज्ञेय के कृतिव में मिलती है।

• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार अज्ञेय "निजता की सुरक्षा" के प्रतिनिधि कवि हैं।


ब. महाकवि भवानी दादा :-

• भवानीप्रसाद मिश्र भाषा के चलतेपन और भावों के खुलेपन के कवि हैं।

"सतपुड़ा के जंगल" में उनकी प्रबन्ध की प्रतिमा दिखती है।

• उदयप्रकाश ने भवानीप्रसाद मिश्र को कविता का गाँधी कहा है लेकिन कवि स्वयं को "गाँधी का बेटा" कहते हैं।

• कवि को "सहजता के कवि" कहा जाता है।


स. महाकवि मुक्तिबोध :-

• मुक्तिबोध अमानवीय व्यवस्था में पनपे और उन्होंने प्रचलित रुग्ण सौंदर्य बोध के स्थान पर नए मानवीय प्रगतिशील सौंदर्य बोध का निर्माण किया है।

• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार "मुक्तिबोध की कविताएँ स्वाधीन भारत की इस्पाती दस्तावेज हैं।

• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार इनके संकलन "चाँद का मुँह टेढ़ा है" 1964 में चांद गतकालिक सौंदर्य का बोध कराता है। जब उसकी, यानी मानवीयता व्यवस्था की कुरूपता पहचान ली गयी है इसलिए उसका मुँह टेढ़ा है।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार इस संकलन का रुप एक बड़े कलाकार के स्कैच-बुक की तरह लगता है।

• बच्चन सिंह के अनुसार मुक्तिबोध की कविता प्रयोगवादी और प्रगतिवादी का रासायनिक मिश्रण है। एक साथ प्रयोगवादी और प्रगतिवादी भी हैं । किंतु दोनों की अतिरेकवादी प्रवृतियाँ उन्हें मान्य नहीँ हैं। वह "आत्ममंथन के कवि" हैं।

• बच्चन सिंह के अनुसार मुक्तिबोध के काव्य संग्रह "भूरी-भूरी खाक धूल" 1980 का प्रकाशन बाद का है परन्तु उसमें संकलित कविताएँ चाँद का मुँह टेढ़ा है से पहले की हैं।

• बच्चन सिंह के अनुसार "अंधेरे में" अत्यंत दीर्घ कविता है। इसमें पूरी सभ्यता डूबी हुई है। इसमें न अस्मिता की खोज की कविता है और न ही अस्तित्ववाद-रहस्यवाद की। इसमें अंधेरे के विरुद्ध प्रकाश का संघर्ष हुआ है।

इस कविता में बुद्धिवर्ग से उसे किसी तरह की आशा नहीं है " बुद्धिवर्ग है क्रीतदास/किराए के विचारों का उद्भास"..।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार अँधेरे में से गुजरना एक काव्य- यात्रा है..। इसका ध्वंस इलियट के "वेस्ट लेंड" की भी याद दिला देता है।

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार 'अंधेरे में का चित्रण निराला के काव्य में लम्बी अवधि तक फैले अंधकार की याद दिलाता है। साथ ही "निराला के अंधेरे का प्राथमिक संकेत आध्यात्मिक है, जबकि मुक्तिबोध में अँधेरे का रूप सामाजिक है"..।

इस संग्रह का पहले नाम " आशंका के द्वीप अँधेरे में" था।

● "अंधेरे में" कविता पर कहे गए कथन:-

1. रामविलास शर्मा - अपराध भावना का अनुसन्धान व अरक्षित जीवन की कविता।

2. नामवर सिंह - अस्मिता की खोज।
3. इंद्रनाथ मदान - आत्म संसोधन का अनुसन्धान।
4. निर्मला जैन - अंतस्थल का विप्लव।
5. प्रभाकर माचवे - लावा।

भूल गलती, ब्रह्मराक्षस और दिमागी गुहान्धकार आदि कविता बुद्धिजीवी वर्ग की ट्रेजेडी है।

● बच्चन सिंह ने मुक्तिबोध को भयानक खबरों का कवि कहा है।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "मुक्तिबोध का ठाट किसी से मिलता है तो कबीर से। वैसी ही बैचेनी और कभी-कभी वैसा ही कोमलता और फहकडपन"...।

मुक्तिबोध ने सत चित आनंद के स्थान पर सत चित वेदना को रखा है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


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