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Sunday, May 9, 2021

आधुनिक काल भाग - 2

          

                          (द्विवेदी युग)

● हिंदी साहित्य के अंतर्गत आधुनिक काल के द्वितीय चरण "द्विवेदी युग"  को डॉ नगेंद्र ने "जागरण सुधार काल" नाम दिया है।

● शुक्ल ने द्विवेदी युग को "नई धारा : द्वितीय उत्थान"  नाम दिया है। 

● भारतेंदु युग में जो स्वदेशी क्रांति व अनुराग के जो बीज अंकुरित हुए थे वह इस काल में पल्लवित हुए और उन्हें पल्लवित करने में इस काल के राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत कवियों का बड़ा योगदान है। इसलिए "रामविलास शर्मा" इस युग को 'भारतीय जाति का जागरण" युग बताते हैं।


● महावीरप्रसाद द्विवेदी :- इस युग को द्विवेदी युग के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि महावीरप्रसाद द्विवेदी जी ने "सरस्वती" पत्रिका के माध्यम से वर्ष 1903 से 1920 तक 17 वर्ष तक हिंदी साहित्य की सेवा की थी। व साहित्यकारों की भाषा को भी परिष्कृत किया था। जिस गद्य लेखन की शुरुआत भारतेंदु युग में हुई थी वह अभी तक अपनी गति को नहीं पकड़ पाया था इसलिए इस युग के प्रतिनिधि लेखक, आलोचक, साहित्यकार , साहित्य-भाषा मर्मज्ञ "महावीरप्रसाद जी" ने इसकी बागडोर संभाली और भाषा से अरबी-फारसी-अंग्रेजी-संस्कृत के प्रयोग हो रहे शब्दों के धड़ल्लेपन पर रोक लगानी चाही। लेखकों को भाषाई स्तर पर बहुत हदतक सावधान भी किया। 

सरस्वती" में आती हुई रचनाओं व पुस्तकों के व्याकरण को काफी हदतक द्विवेदी जी ने परिष्कृत किया।

सरस्वती में इस समय विविध प्रकार के लेख छपते थे जिससे कि लेखकों को ज्यादा-से-ज्यादा जानकारी प्राप्त हो सके। 

इस युग में साहित्यिक रीतिकालीन प्रवृति की दरबारीपन का विरोध हुआ था। इसके स्थान पर हिंदी साहित्य उस राष्ट्रीय स्वाधीन चेनता का आधार बन गया था जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा हुआ था। इस काल में नई जानकारियों का संचय हो रहा था।

इस युग में दो कवि वर्ग थे। एक द्विवेदी मंडल और एक उसके बाहर का ।

"द्विवेदी मंडल के कवि" मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, नाथूराम शंकर, रामचरित उपाध्याय आदि। इस युग का प्रतिनिधित्व "महावीरप्रसाद" जी कर रहे थे।  

द्विवेदी मंडल के बाहर के कवियों में स्वछंदतावादी कवि जैसे श्रीधर पाठक, मुकुटधर पांडेय, लोचन प्रसाद पांडेय, रामनरेश त्रिपाठी, रूपनारायण पांडेय आदि। इस युग का प्रतिनिधित्व "श्रीधर पाठक" कर रहे थे।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार स्वछंदतावादी काव्यधारा द्विवेदी युग में एक भूमिका तैयार करता है जो छायावाद में और गहरा हो जाता है"..। 

• अनुशासन का नेतृत्व द्विवेदी जी कर रहे थे तो स्वछंदतावाद का श्रीधर पाठक"..।

इस काव्यधारा को आगे बढ़ाने का कार्य मुकुटधर पांडेय और लोचनप्रसाद पांडेय जैसे कवियों ने किया जिसकी निष्पत्ति रामनरेश त्रिपाठी में होती है।

● शुक्ल जी के शब्दों में द्विवेदी के बारे में " सरस्वती के सम्पादक के रूप में उन्होंने आई हुई पुस्तकों के भीतर व्याकरण और भाषा की अशुद्धियाँ दिखाकर लेखकों को बहुत कुछ सावधान किया"..।

अपने काव्यखण्ड प्रकरण 4 में शुक्ल जी द्विवेदी युग के संदर्भ में कहते हैं "भारतेंदु युग में जिस स्वदेश गौरव व स्वदेश की जो भावना प्रथम उत्थान में जगाई गयी थी उसका अधिक प्रसार दिव्तीय उत्थान में हुआ और "भारत-भारती" जैसी पुस्तके प्रकाशन में आयी"..।

● इस युग में द्विवेदी जी ने माना कि अब श्रृंगारी कविताओं का समय नहीं है, उसके अलावा कितनी ही बातें कविताओं में कही जा सकती है। साथ ही कविता के बिगड़ने व उसकी सीमा परिमित होने से साहित्य पर भारी आघात होता है।

● द्विवेदी जी के भाषा परिष्कार पर शुक्ल जी कहते हैं"  हम द्विवेदी जी को पद्यरचना की एक प्रणाली के प्रवर्तक के रूप में पाते हैं। खड़ीबोली के पद्य विधान पर द्विवेदी जी का पूरा-पूरा असर पड़ा। बहुत से कवियों की भाषा शिथिल और अव्यवस्थित थी। xxx उनकी भाषा को दुरुस्त करके सरस्वती में छपवाते थे....। ऐसे ही गद्य की भाषा के लिए भी कहते हैं " गद्य भाषा पर द्विवेदी जी के इस शुभ प्रभाव का स्मरण जब तक भाषा के लिए शुद्धता आवश्यक समझी जाएगी, तबतक बना रहेगा"..।

• अपने साहित्येतिहास के आधुनिककाल के काव्य प्रकरण 4 में शुक्ल जी ने द्विवेदी जी के एक कथन को रखकर ये दिखाने की कोशिश की है कि, नए छंदों के व्यवहार व तुक के बंधन के त्याग की सलाह के बारे में कहा था कि " तुले हूए शब्दों में कविता करने और तुक, अनुप्रास आदि ढूँढ़ने से कवियों के विचारस्वतंत्रय में बाधा आती है"...।


● महावीरप्रसाद द्विवेदी कविता के विषय के लिए मनोरंजन व उपदेश जैसे तत्वों को आवश्यक मानते हैं। इसी के आगे जोड़ते हुए अपने निबन्ध संग्रह  "रसज्ञ रंजन" में कविता के विषयवस्तु पर बात करते हुए कहते हैं कि " चींटी से लेकर हाथी पर्यंत तक, भिक्षुक से लेकर राजा पर्यंत तक, बिंदु से लेकर समुन्द्र पर्यंत तक, जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत आदि सभी पर कविता हो सकती है"...।

• महावीरप्रसाद जी पर मराठी साहित्य का भी कुछ-कुछ असर पड़ा है।

महावीरप्रसाद द्विवेदी और बालमुकुंद गुप्त जी के बीच चाहे किसी भी प्रकार से मतभेद हों परन्तु बालमुकुंद गुप्त जी की हिंदी की प्रशंसा हमेशा ही किया करते थे। इसी संदर्भ में वह कहते हैं "अच्छी हिंदी बस बालमुकुंद गुप्त ही लिखता था"..।


● श्रीधर पाठक :-  नए भावबोध का पहला लक्षण स्वछंदता की प्रवृति थी जो "श्रीधर पाठक" के काव्य में प्रकट हुई। रीतिबद्धता एवं प्रणाली निर्दिष्ट के विरोध और उसके प्रति विद्रोह का यह स्वाभाविक परिणाम था जब जड़ शास्त्रीयता भावधारा को जड़, उबाऊ, व गतकालिक बना देती है, तब काव्य धारा का विकास स्वछंद मार्ग पर चलकर होता है। यह मार्ग लोक जीवन और प्रकृति के बीच से होकर जाता है। इस प्रवृत्ति को स्वछंदतावाद या रोमांटिसिज्म कहते हैं"..। 

कविता में व्यापक रूप से खड़ीबोली को प्रयोग करने का श्रेय "श्रीधर पाठक" को जाता है। भले ही महावीरप्रसाद द्विवेदी जी ने सरस्वती के माध्यम से खड़ीबोली को प्रयोग करने के लिए बहुत परिश्रम करा पंरतु उनसे भी पहले श्रीधर पाठक इस समस्या से जूझ चुके थे। वह कहते भी है कि " लिखो, न लेखनी करो बंद, श्रीधर सम सब कवि स्वछंद। 

स्वच्छन्दतावादी कविता की पहचान प्रकृति परिचय, प्रेम की स्वछंद भंगिमाओं से जुड़ी होती है, और यही प्रवृति आगे चलकर छायावाद का रूप लेती है।

• श्रीधर पाठक की ब्रज में प्रथम मौलिक कृति 1904 में "कश्मीर सुषमा" आयी थी। और खड़ीबोली की प्रथम पुस्तक "एकांतवासी योगी" है जिसका अनुवाद गोल्डस्मिथ की "हरमिट" से किया है।

"स्वर्गीय वीणा" में श्रीधर पाठक ने उस परोक्ष दिव्य संगीत की ओर रहस्यपूर्ण संकेत किया जिसके ताल-सुर पर यह सारा विश्व नाच रहा है".. ।

गोल्डस्मिथ की रचना "हरमिट" का अनुवाद "एकांतवासी योगी" के नाम से 1886 में खड़ीबोली में किया है जिसमें 'ख्याल' या 'लावणी' की लय है। शुक्ल के अनुसार इसमें किसी के प्रेम में योगी होना और उसकी याद में प्रकृति के निर्जन क्षेत्र में कुटी में जाकर बैठ जाना दिखाया है।

गोल्डस्मिथ की रचना "द डेसर्टेड विलेज" का अनुवाद "उजड़ग्राम" 1889 की रचना ब्रजभाषा में की है। इसमें गाँव के उजड़ जाने से प्रभावित वहाँ के लोगों का वर्णन है।

गोल्डस्मिथ की रचना "द ट्रेवलर" का अनुवाद "श्रांत पथिक" नाम से 1902 में रोला छंद व खड़ीबोली में की है।

"ऋतुसंहार" में ब्रज और खड़ीबोली दोनों ही का प्रयोग किया गया है।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "श्रीधर पाठक उन विरले रचनाकारों में से एक हैं जिनकी प्रशंसा सबसे बड़े सम्पादक द्विवेदी जी और सबसे बड़े आलोचक शुक्ल जी ने भी की है। यानी अपने युग की रचना - शीलता को सम्पादक और आलोचक ने सही समझा, जिसने इन प्रमुख गद्यकारों में कवित्व संक्रमित किया"..। 

• आचार्य शुक्ल श्रीधर पाठक की खड़ीबोली की अपेक्षा ब्रज की कविताओं को ज्यादा सरस् मानते हैं।

• शुक्ल के अनुसार श्रीधर पाठक ही स्वछंदतावाद (रोमटिसिज़्म) के प्रवर्तक हैं।

• शुक्लानुसार "यह अपने समय के कवियों में प्रकृति का वर्णन पाठकजी ने सबसे ज्यादा किया है, इससे हिंदी में यह प्रकृति के उपासक कहे जा सकते हैं"..।

• विश्वनाथ त्रिपाठी इन्हें "खड़ीबोली का प्रथम कवि" मानते हैं।


● "अयोध्यासिंह उपाध्याय"  :- इनका "हरिऔध" नाम उस समय पड़ा जब वह अपने निवास स्थान निजामाबाद में सिख सम्प्रदाय के महंत बाबा "सुमेरसिंह" के पास जाकर हिंदी की पूर्तियाँ पढा करते थे। खड़ीबोली के लिए इन्होंने पहले यह उर्दू के छंदों या ठेठबोली को ही उपयुक्त समझा, क्योंकि उस समय तक उर्दू में खड़ीबोली अच्छी तरह मंझ चुकी थी। 

● "प्रियप्रवास" 1914 में खड़ीबोली का प्रथम महाकाव्य है जिसमें कृष्ण जी के मथुरा गमन पर समस्त वृंदावन की गोपियाँ, राधा, यशोदा आदि विरह से पीड़ित हो रहे हैं। यह 17 सर्गो में विभक्त है। इसका मूल नाम "ब्रजांगना विलाप" था। इस महाकाव्य के लिए उन्हें "मंगला पारितोषिक सम्मान" मिला है।

इसमें कृष्ण को जननायक के रूप में दिखाया है और राधा के दुःख को समाज का दुःख बताया है जहाँ वह समाज सेवा का व्रत लेती है। 

इसमें 'नवधा भक्ति' की व्याख्या की गई है। साथ ही संस्कृत छंदों का प्रभाव है। इन संस्कृत छंदों का परिमाण में रचना करना कठिन काम है। इसकी भूमिका में हरिऔध लिखते हैं कि " अब मुझे केवल इतना ही कहना है कि समय का प्रवाह खड़ीबोली के अनुकूल है, इस समय खड़ीबोली में कविता करने से अधिक उपकार की आशा है...।

इसकी भूमिका के "ग्रँथ का विषय" शीर्षक में हरिऔध कहते हैं कि " मैंने श्रीकृष्ण चन्द्र को इस ग्रँथ में एक महापुरुष की भांति अंकित किया है, ब्रह्म करके नहीं"..।

● "शुक्ल जी" के अनुसार "इस कृति में कई जगह संस्कृत शब्दो की ऐसी लड़ी बाँधी है कि हिंदी को है, था, किया, दिया आदि ऐसी दो क्रियाएँ के भीतर सिमट कर रह जाना पड़ा है। पर सर्वत्र यह बात नहीं है"..।  अधिकतर पदों में बड़े ढंग से हिंदी अपनी चाल पर चली दिखी है।

 यह काव्य अधिकतर भावनात्मक और वर्णात्मक है। कृष्ण के चले जाने पर ब्रज की दशा का वर्णन बहुत अच्छा है। विरह वेदना से क्षुब्ध वचनावली प्रेम की अनेक अंतर्दशाओं की व्यंजना करती हुई बहुत दूर तक चली जाती है। शुक्ल 'इसे महाकाव्य तो क्या अच्छा प्रबन्ध भी नहीं मानते हैं' ।

● "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार "ईश्वर अब व्यक्तिगत आस्था का विषय है, चित्रण का नहीं। इस दृष्टि की पहली पुस्तक सशक्त उद्घोषणा "प्रियप्रवास" में ही होती है।

अपने "चुभते चौपदे" और "चोखे चौपदे" में मुहावरों और बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया है।

"रसकलश" 1940 की रचना रस सिद्धान्त और उसके शास्त्र को समझने के लिए की है।

"वैदेही वनवास" में राम के द्वारा सीता के निर्वासन की कथा कही है।

● "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार " अनुशासन की धारा का नेतृत्व महावीरप्रसाद जी ने किया परन्तु इसके पहले बड़े कवि हरिऔध ही कहलाये " ...।

● "गणपतिचन्द्र गुप्त" ने हरिऔध को आधुनिक काल का सूरदास कहा है।

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

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