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Friday, July 30, 2021

तमस

 

                             (तमस)


हिंदी साहित्य लोचन hindisahityalochan sahityahindilochan.blogspot.com


● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी नेट/जे.आर. एफ परीक्षा में चयनित प्रगतिशील विचारो से लैस और मार्क्सवादी सिद्धान्तों व विचारों से सहमत कथाकार "यशपाल" के सर्वप्रसिद्ध- सर्वचर्चित उपन्यास 'झुठासच' के बारे में कुछ विशेष तथ्य जानने की कोशिश करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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• स्थान:-  ढोलइलाही बख़्स व  सैयदपुर 


• पात्र योजना:-

1. बक्शी जी - कांग्रेस सेक्रेटरी

2. मेहता जी - कांग्रेस प्रधान और बीमा एजेंट।

3. देवराज - अखाड़ा संचालक

4. गोरखा - चौकीदार, जो मुर्गी और छुरी लेके आता है।

5. बोधराज - गुरद्वारे संगठन का नायक

6. ह्यातबख्श - मुस्लिम लीग का नेता

7. रणवीर- जो मुर्गी काटता है

8. शहनवाज़ - जो लालाजी को दंगे से बचाकर गाड़ी में अपने घर ले जाता है।

9. हरनाम सिंह और बंतो- जिनकी दुकान लूट ली जाती है।

10. इकबाल सिंह- जिसे जबरन मुस्लिम बनाया काट है। हरनाम सिंह का बेटा।

11. जसबीर सिंह - हरनाम सिंह की बेटी, लापता होती है।

12. रमजान और एहसान अली- हरनाम सिंह का घर लूटने वाले।

13. अकरा और राजो - रमजान और एहसान अली की पत्नियां।

14. इमामदीन, करीमखान, अब्दुलगनी

15. बिशनसिंह, मुरादअली, नत्थू

16. इत्रफरोश - जिसे रणवीर चाकू मारता है।


                             (आमुख)

● 1945 के दिल्ली अधिवेशन में लीग ने पाकिस्तान की मांग कर दी थी। लीग के लोगों की हठधर्मिता के कारण 1946 में मंत्रिमंडल अपने मिशन में असफल रहा और लीग ने उस साल पहला देश में संघर्ष विरोधी नारा लगा।

 यह उपन्यास 5 दिन की कथा को आधार बनाकर चलता है, जहाँ 1947 के मार्च अप्रैल के माह में हुए भीषण दंगे का वर्णन है।

● " सचमुच लड़ने वालों के पाँव 20वी सदी में और दिमाग मध्ययुग में था"...। (लेखक का मानना तमस के लिए)

● मुरादअली के द्वारा ही दंगे की शुरुआत हुई थी और अंत भी। अमन कमेटी की बस में सबसे तेज नारे लगा रहा था।


                          (मूल उपन्यास )


मुख्य बातें :-


● " चाहे आप मुझे कुछ भी कह लीजिए, परन्तु अहम सवाल हिन्दुस्तान की आजादी का है, वो भी इन अंग्रेज अफसरों से"....।  (हकीमजी - मौलदाद से)

● दुख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत के पास ही जाता है"...। (नत्थू के लिए- मोतिया वैश्या के पास जाता है सुअर मारने के बाद और डर के मारे)

●" सोहनसिंह और मीरदाद , दोनों ही अपने अपने लोगों को अमन कायम करने को कह रहे थे और अंग्रेज की चाल से सावधान रहते की भी सलाह  दे रहे थे।

●" जिस गाँव में हिन्दू और मुसलमानों के बीच लड़ाई चल रही थी वो सैयदपुर था।


आधार ग्रन्थ :-

1. तमस, साहनी भीष्म, राजकमल प्रकाशन।



Thursday, July 29, 2021

आधे-अधूरे - मोहन राकेश



                         (आधे-अधूरे)


हिंदी साहित्य लोचन hindisahityalochan sahityahindilochan.blogspot.com


● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी नेट/जे.आर. एफ परीक्षा में चयनित प्रगतिशील विचारो से लैस और मार्क्सवादी सिद्धान्तों व विचारों से सहमत कथाकार "यशपाल" के सर्वप्रसिद्ध- सर्वचर्चित उपन्यास 'झुठासच' के बारे में कुछ विशेष तथ्य जानने की कोशिश करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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● प्रमुख तथ्य व अन्य बातें :-


 निर्देशक का वक्तव्य:-

" यह आलेख एक स्तर पर स्त्री और पुरूष के बीच लगाव और तनाव का दस्तावेज़ है".....।

मैं प्रदर्शन में सादगी का कायल हूँ। इसलिए प्रकाश व्यवस्था में किसी तरह की लटके नही चाहता। नाटक के लिए उपयुक्त सादगी आलोक-पद्धति है। प्रारंभ में कुछेक चीजे आलोकित करती थी फिर लाइट हाउस में घुल-मिल जाती थी। (निर्देशक)

                                                           

● पात्र योजना :-

1. महेन्द्रनाथ:- पति

2. सावित्री:- पत्नी

3. अशोक :- लड़का

4. बिन्नी: - बड़ी लड़की

5. किन्नी :- छोटी लड़की

6. जुनेजा, सिंघानिया और जगमोहन :- जिनसे सावित्री जीवनसाथी के सपने देख रही थी।

7. सुषमा :- जुनेजा की बेटी

8. मनोज :- बिन्नी का पति 

9. शोकी

10. शिवजीत - इस से भी सावित्री का सम्बंध रहा था।


● यह नाटक 4 अंको में लिखा है। जो निम्नांकित हैं :-

1. निर्देशक का वक्तव्य

2. पात्र योजना

3. पूर्वाध

4. उत्तरार्ध


(मूल कथा के कुछ अंश )

•" महेन्द्रनाथ" :- जब जब किसी नए आदमी का यहाँ आने शुरू होता है, मैं शुक्र ही मानता हूँ"....।

• "जिससे उसके मन को कड़ी से कड़ी चोट पहुचा सकू। मेरे लम्बे बालो को पसंद करता है, सोचती हूँ इन्हें कटवा दूँ"..।(बिन्नी के मुताबिक मनोज में वह गुण नही)

• "अधिकार, रुतबा और इज्जत - यह सब बाहर के लोगो से मिल सकता है इस घर में। इस घर का जो आजतक बना है वह सब बाहर के लोगो से"....। (महेन्द्रनाथ- सावित्री से)

• "उसकी बड़ी चीज की वजह से । किसी की तनख्वाह, किसी का इंटलेक्चुअलपन और तो किसी की पदवी। किसी आदमी को न बुला कर उसकी औकात को बुलाया जाता है".।(अशोक - सावित्री से)

• " सावित्री महेंद्र की नाक में नकेल डाल कर उसे चला रही है।सावित्री ने बेचारे की रीढ़ ही तोड़ दी। अब वह जैसे किसी हाड़ मांस का पुतला हो"....। (दोस्तो का कथन) 


 ● आधार ग्रन्थ 

1. आधे-अधूरे, मोहन राकेश, 


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Wednesday, July 28, 2021

नामवर सिंह स्मृति


 काशीनाथ सिंह द्वारा नामवर सिंह जी की स्मृति में ...


भैया को याद करते हुए-----


'डायरी का एक भूला बिसरा पन्ना'

अरविंद कॉलोनी,G-14 क्वार्टर, ड्राइंग रूम, भैया और मैं। बीच में छोटा सा टेबल, उस पर शीशे के दो गिलास। शाम का वक्त। शाम गिलासों में धीरे धीरे ढलती हुई गहराती जारही है---- तारीख थी 9 -9-1994 ।

बातें कहाँ से शुरू हुई थीं और जाने कब कैसे यूपी कॉलेज पहुंच गईं। भैया थोड़ी देर चुप रहे फिर कहना आरम्भ किया- मैं सन 42 में बनारस आया। उदय प्रताप में 7 में नाम लिख गया। 6th Hostel में कमरा no.1 मिला।

तब सागर सिंह (नगर के नामी वकील, अब दिवंगत ) 11th कक्षा में थे, वे कवि थे और गोष्ठियां करते थे, उसमें मैं भी शामिल हो गया। उन्हीं दिनों पहली बार, कॉलेज के पास सरसौली (तब एक कस्बा ) में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमें नगर के सभी महत्वपूर्ण कवियों के साथ ही बाहर से आए कवि भी थे. निराला को पहली बार वहीं देखा।

मैंने भी कविता पढ़ी, सम्मेलन में निराला ने जानकी वल्लभ शास्त्री को 200₹ पुरस्कार में दिए और शंभू नाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह आदि नगर के कवियों के रहते हुए, मुझे 100₹ का द्वितीय पुरस्कार दिया। ये वे दिन थे, जब बनारस में अमृत राय, शिव दान सिंह चौहान, शमशेर, मुक्तिबोध और त्रिलोचन रहते थे। अमृत राय, कम्युनिस्ट पार्टी का अख़बार, हम लोगों में बाँटते थे और महीने के हिसाब से अपनी साइकिल से आ कर, पैसे ले जाते थे। वे स्टडी-सर्कल भी चलाते थे।

उन दिनों, नगर में दो साहित्यिक संस्थाएं थीं। एक ठाकुर प्रसाद सिंह की "नवयुवक साहित्यिक संघ" और दूसरी, सोशलिस्टों की "सांस्कृतिक संघ"। हम लोग, सांस्कृतिक संघ से जुड़े हुए थे जिसका चुनाव हुआ था, जिसमें त्रिलोचन अध्यक्ष चुने गए और नामवर सचिव, उपाध्यक्ष थे मार्कण्डेय सिंह और BHU के डॉक्टर श्री कृष्ण लाल। मैं 1947 में, महेंद्रवी लॉज, BHU में आ गया और 1950 में गोविन्द लॉज में (जो लंका पर स्थित था)। सचिव रहते हुए, बनारस में पहला विराट साहित्यिक आयोजन मैंने 'टाउन हाल' में किया था। इसी में, जय नारायण इंटर कॉलेज (अध्ययन काल) के बाद, पहली बार, बनारस में, सुमित्रा नंदन पंत आए थे।


- काशीनाथ

Tuesday, July 27, 2021

झुठासच

 

                            (झुठासच)


हिंदी साहित्य लोचन

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● प्रमुख तथ्य व अन्य बातें :-


"सच" को कल्पना के रंग में रंग कर उसी जन समुदाय को सौंपने जा रहा हूँ जो सदा  "झूठ"  से ठगा जाकर भी सच के लिए अपनी निष्ठा नही छोडता"....।(भूमिका से) 

प्रस्तुत कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है साथ ही इसमें लेखक ने अपनी मंशा भी व्यक्त कर दी है, की वह किस सन्दर्भ में इस रचना को पाठकों व हिंदी साहित्य जगत के सामने पेश कर रहा है। लेखक साफ शब्दों में कह रहा है कि भले ही आज तक हम झूठ से ठगे जाते रहे हैं बावजूद उसके हममें एक विश्वास बना रहता है जो सच्चाई के साथ खड़ा है। यकीनन हम उस सत्य को पा सकेंगे जिसके लिए निरंतर हम जूझ रहे हैं। इस कथन को पढ़ते हुए मुझे दिल्ली विश्विद्यालय , हिंदी विभाग के प्रो. चंदन कुमार जी का कथन याद आ रहा है जो वह सदैव पढ़ाते वक्त कहा करते थे। खासतौर पट जब सांस्कृतिक सन्दर्भ पढ़ाया जाता था। वह कथन था कि " कुछ हस्ती है हमारी कि जो मिटती ही नहीं"....। इस कथन का सन्दर्भ भारतीय संस्कृति में भरपूर मात्रा में भरी उस अपराजय जिजीविषा व ऊर्जा से है जिसको हमने कभी नहीं छोड़ा। इसी बात में एक और बात जोड़ना चाहूँगा जोकि कथासम्राट प्रेमचंद के "रंगभूमि" उपन्यास के नायक "सूरदास"  द्वारा उसकी झोपड़ी गिरा देने के सम्बंध में कही गई है - "तुम जितनी बार गिराओगे हम उतनी बार बनायेनंगे"...।

हम पर न जाने कितने ही आक्रमण, छल-कपट,घात-प्रतिघात हुए फिर भी हम आगे बढ़ते गए । हमने कभी पीठ पर वार करना नहीं सीखा। और इस संदर्भ में न जाने कितनी ही रचनाएँ हमारी हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि बनकर सामने आई है और न जाने कितने साहित्यकार भी। मुझे आवश्यकता नहीं समझ आती की मैं जहाँ उनका ज़िक्र करूँ।


मुख्य पात्र योजना :-

1. रामजवाया :- बड़ा बेटा

2. मास्टर रामलुभाया :- छोटा बेटा, आर्यसमाजी

3. तारा :- कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित

4. जयदेव :- दयालसिंह कॉलेज से , गुप्त आंदोलन करता है, तारा का भाई

5. प्रो- प्राणनाथ :- जयदेव के गुरु


6. कनक :- 1942 आंदोलन में भाग लेती है

7. लेखराम शर्मा :- पैरोकार का उपसम्पादक (पत्रिका)

8. नैयर:- कनक का जीजा, हाईकोर्ट में वकील

9. ईश्वरकोर :- हिन्दू सभाकमेटी की सदस्य

10. महेश :- पैरोकार का संवाददाता

11. कशिश " कर्मचन्द" : पैरोकार का सम्पादक


● गौण पात्र:-


1. टीकाराम :- इंसोरेंस कंपनी से

2. बिरुमल :- डाक का कर्मचारी

3. भागवंती :- तारा की माँ

4. गुर्टू, सुरेंद्र और अमृता :- तारा की सहेली

5. नरेंद्र :- स्टूडेंट फेडरेशन के नेता

6. गोविंदराम:- pwd  क्लर्क

7. कालीचरण

8. राधेबिहारि :- पैरोकार के मालिक

9. प्रो- दीन मुहम्मद :-जो सोमनाथ को नकल करते पकड़ता है


● पत्रों (पत्रिका) के नाम:-

1. पैरोकार

2. निशांत

3. छत्रपति

4. सियासत


● मुख्य :-


• जयदेव जिन दिनों जेल में था वही रहते उसने एक कहानी संग्रह लाहौर से निकाल दिया था।

• " विद्या चाहे कितनी ही अनमोल क्यों न हो,परन्तु पैसे के अभाव में अप्राप्य हो होती है".।(तारा की पढ़ाई के सम्बंध में)

• पत्रकार का काम अपने मालिक के इशारो को किनारे रखकर काम की विशेषता को रंग देना है".।(पत्रकारिता के लिए)

• "पुरूष की तुलना में स्त्री की हीनता स्वाभाविक तो नही , परन्तु बना दी गयी है"..।(तारा की पढ़ाई को रोकने के लिए)

• "हमारी असली लड़ाई तो अंग्रेज से है जिसने मुल्क पर कब्जा किया हुआ है"...।(तारा)

•" विदेशी गुलामी से मुक्ति के लिए पहले हिन्दू-मुस्लिम- सिख एकता अनिवार्य है"...।(जयदेव)

                                                      

● कथा में शामिल पार्टियो के सदस्य:-

1.कांग्रेस :- गोपीचंद, भीमसेन , राधेबिहारि, कपूर, शन्नो  ।

2. मुलिम लीग :- अल्लामा मिशनरी, खान मामेदार

3. कम्युनिस्ट :- असद, हजारासिंह, प्रद्युम , सर खिजर

4. सिख गुट :- तारा सिंह।

आधार ग्रन्थ

1.झुठासच, यशपाल, राजकमल प्रकाशन, 



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Saturday, July 24, 2021

असग़र वज़ाहत

 पिछले महीने मैंने फेसबुक पर पाकिस्तान यात्रा से संबंधित दो टिप्पणियां लिखी थीं।

मैं 2011 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन शताब्दी समारोह में पाकिस्तान गया था। वहां लगभग 45 दिन घूमता रहा था। लाहौर, मुल्तान और कराची में अनेक लोगों से मिला था। संस्थाओं में गया था।उन अनुभवों के आधार पर मैंने एक सफरनामा 'पाकिस्तान का मतलब क्या' लिखा था जो ज्ञानोदय में छपा था और उसके बाद ज्ञानपीठ ने उसे पुस्तक रूप में छापा था । उस पर आधारित कुछ अंश मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूं। 

प्रस्तुत है पहला अंश-


पाकिस्तान का मतलब क्या

1.

पाकिस्तान एक ऐसा शब्द है जो उत्तर भारत में रहने वाले लोगों के मन में कोई ‘विशेष बिम्ब’ बनाता है। विभाजन के बाद पाकिस्तान आये लोगों की बात छोड़ भी दें तो कम से कम उत्तर भारत में पाकिस्तान के तरह-तरह के मतलब हैं। पाकिस्तान से जन्मी सबसे पुरानी छवि जो मेरे मन में है वह शायद सन् 55 के आसपास की है जब मेरी उम्र दस साल रही होगी। पड़ोस का कोई ख़ानदान पाकिस्तान जा रहा था। घर के सामने नीम के बूढ़े और घने पेड़ की छाया मेें तीन इक्के खड़े थे। एक इक्के पर सामान लादा जा रहा था। दूसरे इक्के में चादर बाँध दी गयी थी क्योंकि उसमें ज़नानी सवारियों को जाना था। घर के मर्द पड़ोसी मर्दों से गले मिल रहे थे। ऐसा ग़मगीन माहौल था कि दिल बैठा जाता था। घर के अन्दर औरतें पड़ोसिनों से लिपट-लिपट कर सिसक रही थीं। सिसकियाँ और रोना चीख़ने में तब्दील हो रहा था। बच्चे घबराये हुए इधर-उधर भाग रहे थे। मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आ रहा था कि ये सब क्या है? पाकिस्तान से जुड़ी दूसरी छवि यह है कि गर्मियों के दिनों की दोपहर में हम लोग घर के तहखाने में सोते थे जहाँ छत से लटका पंखा झलने के लिए नौकर पंखे की डोरी अपने पैर में लपेट कर कुछ फ़ासले पर लेट कर पैर चलाता था जिसके नतीजे में पंखा चलताथा और हवा होती थी। इन शान्त और ठंडी दोपहरों में कभी-कभी कोई नौकर हाथ में ख़त लिये यह कहता हुआ आता था कि पाकिस्तान से ख़त आया है। सब लोग उठ बैठते थे। हमारे अब्बा की फूफी (बुआ) के बड़े लड़के पाकिस्तान चले गये थे और वहाँ से उनके ख़तों का इन्तिज़ार पूरे घर को रहता था। कहते हैं, वसी चचा पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। लखनऊ यूनिवर्सिटी से कैमिस्ट्री में एम.एस.सी. करने के बाद वे नौकरी की तलाश में थे। एक इंटरव्यू बोर्ड में बोर्ड के किसी सदस्य ने उन्हें बहुत प्यार से समझाया था - मियाँ जी आप यहाँ भारत में क्यों नौकरी के चक्कर में परेशान हो रहे हो? पाकिस्तान में न जाने कितनी नौकरियाँ आपका इन्तज़ार कर रही हैं। आप पाकिस्तान चले जाइए। यहाँ आपको नौकरी देने का मतलब किसी हिन्दू का हक़ मारना है... ”इस बातचीत के बाद वसी मामू समझ गये थे कि हिन्दुस्तान से उनका दाना-पानी उठ गया है। वे घर आये और अपना फै़सला सुना दिया। ख़बर बम की तरह फटी। लखनऊ के कूच-ए-मीरजान में लम्बी-चैड़ी हवेली, ख़ानदानी इमामबाड़ा; वालिद शहर के माने हुए वकील, ख़ानदानी रईस, यूनिवर्सिटी में पढ़ती बहनें और भाई सब हैरान हो गये। बहरहाल वसी मामू आसानी से नहीं जा सके। बहुत हाय-तौबा और रोने-धोने के बाद कराची सिधारे। उन्हीं के ख़त तपती हुई दोपहर में ठंडी हवा के झोंके की तरह आते थे और उन्हें ऊँची आवाज़ में पढ़ा जाता था...उन्हें अच्छी नौकरी मिली थी। उन्होंने नाजिमाबाद में प्लाट भी ले लिया था और मकान बनवा रहे थे। उनके ख़तों में, नये लफ़्ज़ जैसे ‘नाजिमाबाद’ या रोचक प्रसंग जैसे उनका ‘पठान नौकर चाकू से नहीं क़रौली से सब्ज़ी काटता है’, दिमाग़ में चिपक कर रह गये हैं...पाकिस्तान से जुड़ा एक और प्रसंग वह नारा है जो पाकिस्तान बनने के बाद मुस्लिम लीगी लगाया करते थे। नारा था, ‘हँस के लिया है पाकिस्तान। लड़कर लेंगे हिन्दुतान।’

पाकिस्तान का मतलब बताने के लिए एक नारा, ‘पाकिस्तान का मतलब क्या? ला इलाहा इल्लिलाह’। पाकिस्तान का मतलब, ‘अल्लाह एक है’ साबित करता था कि पाकिस्तान मुस्लिम देश है। इसके अलावा पाकिस्तान को ‘मुमकलते-खु़दादाद’ यानी ईश्वर प्रदत्त राज्य कहने वाले कम नहीं थे। दरअसल हँस के लिया है पाकिस्तान और ‘ईश्वर प्रदत्त राज्य’ का गहरा ताल्लुक भी है।

लेकिन पाकिस्तान का मतलब जल्दी ही बदला गया था। 1958 में जरनल अय्यूब खाँ के सत्ता सँभालने के बाद कहा जाता था ”पाकिस्तान का मतलब क्या? लाठी, गोली, मार्शल लाॅ।’

‘हँस के लिया है पाकिस्तान’ की तस्दीक़ अगर इतिहास से करें तो पता चलता है कि पाकिस्तान के प्रमुख निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन से संन्यास लेकर 1932 में लन्दन चले गये थे। उस वक़्त तक जिन्ना और पाकिस्तान का कोई रिश्ता न था। 1934 में मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खँ के अनुरोध पर मुस्लिम लीग का नेतृत्व सँभालने मुहम्मद अली जिन्ना वापस आये थे।

सन् 1946 तक मुस्लिम लीग काँगे्रस के साथ मिल कर सरकार चलाने पर तैयार थी जो योजना सफल नहीं हो सके। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान अस्तित्व में आ गया। पाकिस्तान के इतिहासकार इसे ‘लम्बा संघर्ष’ मानते हैं। लेकिन लाहौर के प्रसिद्ध पंजाबी कवि मुश्ताक सूफी पूछते हैं, ”ये बताइये पाकिस्तान के आन्दोलन में मुस्लिम लीग के कितने लोग जेल गये थे? किस-किस की जायदाद ज़प्त की गयी थी? किसने ब्रिटिश हुकूमत के डंडे खाए थे? कितनों को फाँसी लगी थी? कितने लोगों को काले पानी भेजा गया था?“

सूफी साहब के इन सवालों के मेरे पास जवाब नहीं है क्योंकि मैं इतिहासकार नहीं हूँ। बहरहाल ‘हँस के लिया है पाकिस्तान’ का दूसरा पहलू ये है कि कुछ लोग काँगे्रस पर यह आरोप लगाते हैं कि उसने मुस्लिम लीग को पाकिस्तान तो ‘गिफ्ट’ किया था। इस ‘गिफ्ट’ की परिभाषा ‘मुमकलते-खु़दादाद’ तो नहीं हो सकती लेकिन इतना ज़रूर है कि खु़दा (अल्लाह) पाकिस्तान की संवेदना का प्रमुख हिस्सा रहा है।

मुश्ताक सूफी अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ”लाहौर की सबसे बड़ी और महँगी बाज़ार माल रोड पर पाकिस्तान बनने से पहले मुसलमान की सिर्फ एक दुकान थी। पुराने शहर की अनारकली बाज़ार में मुसलमानों की दो दुकानें थीं। आज सूरतेहाल उल्टी है। इसके अलावा पंजाब में ज़मीनें सिखों के पास थीं। अब मुसलमानों के पास हैं। ये सब बहुत जल्दी और ‘करप्ट’ तरीके से हुआ है...मतलब ये कि जायदादें हथियाने में गै़र क़ानूनी तरीके़ भी अपनाये गये थे और फिर वो हालात ही ऐसे थे कि क़ानूनी की पूरी पाबन्दी बहुत मुमकिन नहीं थी। लेकिन इस उथलपुथल, इस ‘अप साइड डाउन’ या कहें ‘डाउन साइड अप’ ने हमारे समाज पर, मेरे ख़याल से बहुत अच्छा असर नहीं डाला। जब चैलेंज नहीं होते तो समाजों में ‘नेगेटिव थिंकिंग’ पैदा हो जाती है।“


पाकिस्तान के इतिहासकार और बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि पाकिस्तान के लिए संघर्ष करने के दौरान यह चर्चा नहीं हुई कि पाकिस्तान का स्वरूप क्या होगा? राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था का क्या माॅडल होगा? बहुत सरसरी ढंग से यह कहा जाता था कि पाकिस्तान इस्लामी मुल्क होगा, लेकिन उसे परिभाषित नहीं किया गया। पाकिस्तान के एक प्रखर बुद्धिजीवी मियाँ आसिफ रशीद ने बहुत विस्तार से इस समस्या पर विचार किया है। पाकिस्तान के स्वरूप पर चर्चा न किये जाने के कारणों से पहले वे अधिक बुनियादी मुद्दे पर ध्यान आकर्षित कराते हैं।“ कुरान शरीफ का उद्देश्य इस्लामी राज्य स्थापित करना नहीं है बल्कि न्याय तथा समता पर आधारित समाज का निर्माण है। हम यह कह सकते हैं कि जो भी समाज न्याय और समता पर केन्द्रित होगा वही इस्लामी समाज होगा चाहे वहाँ बहुसंख्यक मुसलमान हों या गै़र मुस्लिम।“ (दलीले सहर-मियाँ आसिफ रशीद-फिक्शन हाउस, लाहौर, पृ.-82)

मियाँ आसिफ रशीद ने मुस्लिम लीग के नेताओं को कटहरे में खड़ा किया है, ”पाकिस्तान आन्दोलन के दौरान मुस्लिम लीग के नेतृत्व ने कभी यह सोचने की ज़हमत न की, कि पाकिस्तान बन जाने के बाद नये राज्य का क्या स्वरूप होगा, उसका राजनैतिक ढाँचा किन सिद्धांतों के अनुसार बनेगा और राज्य की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था क्या होगी, यद्यपि मुस्लिम लीग की विरोधी पार्टी कांग्रेस ने इन्हीं उद्देश्यों को सामने रखते हुए 1935 में प्रान्तीय चुनाव से पहले प्रो. के.टी. शाह के नेतृत्व में एक नेशनल प्लानिंग कमीशन स्थापित कर दिया था। 28 मई, 1937 को सर मुहम्मद इकबाल ने मुसलमानों की आर्थिक समस्याओं से लापरवाही बरतने वाली मुस्लिम लीग पर नुक्ता-चीनी करते हुए कायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्ना को लिखा था, ‘लीग को आखि़रकार यह तय करना पड़ेगा कि क्या वह बदस्तूर हिन्दुस्तानी मुसलमानों के उच्च वर्गों का प्रतिनिधित्व करती रहेगी या मुस्लिम जनता का...’ मुस्लिम लीग नवाबों, राजाओं, खान बहादुरों और सरदारों के बोझ तले इतनी दबी हुई थी कि खु़द कायदे आज़म भी नये राज्य की ‘पहचान’ की व्याख्या करते हुए घबराते थे कि कहीं प्रभावशाली गुट नाराज़ न हो जाएँ और लीग में फूट न पड़ जाए।“ (दलीले सहर, मियाँ आसिफ रशीद ,फिक्शन हाउस, लाहौर, पृ.-15)


नये मुल्क पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक नीतियाँ निश्चित नहीं की गयी थीं लेकिन इससे बड़ी विडम्बना यह थी कि कायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान बनने के बाद सत्ता की सभी कुंजियाँ अपने पास रख ली थीं। वे गवर्नर जनरल थे, संविधान बनाने वाली संसद के अध्यक्ष थे, मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे और अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए उन्होंने 1935 के एक्ट कानून आज़दिए हिन्द 1947 में एक संशोधन कराया था जिसे 9 पी. कहा जाता है। इसके अन्तर्गत उन्हें यह अधिकार मिल गया था कि वे पाकिस्तान की किसी भी प्रान्तीय विधानसभा को भंग कर सकते थे। उन्होंने अपने इस अधिकार का प्रयोग भी किया था।

मियाँ आसिफ रशीद ने पाकिस्तान में संविधान बनाने की प्रक्रिया और उसके स्वरूप को भी एक बुनियादी भूल माना है। उनका कहना है कि भारत ने तीन साल के समय (1947-1950) के अंदर संविधान बना कर भारत को गणराज्य बना दिया था जबकि पाकिस्तान में यह प्रक्रिया लम्बी चली। नौकरशाही और सेना ने संविधान के रास्ते में रोड़े अटकाये। और पाकिस्तान का तीसरा संविधान 1973 में बना जो मूलतः ग़ैर लोकतान्त्रिाक है तथा ‘चेक एंड बैलेंस’ की व्यवस्था भी उसमें नहीं है। इसके अलावा पाकिस्तान में ‘इस्लाम’ का बढ़ता प्रभाव और केन्द्र-राज्य संबंधों की तनावपूर्ण स्थिति भी देश को लोकतान्त्रिाक आधार देने में बाधा बनती रही।


मुहम्मद अली जिन्ना ने 11 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान की विचारधारा की व्याख्या करते हुए कहा था, ”हम इस बुनियादी सिद्धान्त से आगे बढ़ रहे हैं कि हम सब नागरिक हैं और इस देश के नागरिक बराबर हैं।“ जिन्न लोकतंत्र, धार्मिक सद्भाव और धर्म निरपेक्षता के पक्के समर्थक थे, लेकिन वे अपने विचारों को व्यवहार में लागू न कर सके और अन्ततः सिर्फ तीस साल बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़ियाउल हकने देश को इस्लाम के आधार पर मुस्लिम देश बनाने की घोषणा कर दी। लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता से मुस्लिम देश बना दिये जाने की यात्रा बहुत लम्बी नहीं है लेकिन छलाँग ज़रूर लम्बी है।

मैंने धर्म का जितना सार्वजनिक प्रदर्शन पाकिस्तान में देखा वैसा इस्लामी गणराज्य ईरान में भी नहीं देखा था। जैसे ही आप सीमा पार करते हैं, पाकिस्तान के प्रवेश द्वार पर ‘बिसिम्ल्लाहे रहमाने रहीम’ लिखा दिखाई पड़ता है। उसके बाद जैसे-जैसे लाहौर के नज़दीक पहुँचते हैं वैसे चैराहों पर, इमारतों के ऊपर, घरों के ऊपर, दुकानों के अंदर और बाहर, छतों पर, पेड़ों के तनों पर, पार्कों और मैदानों में, बार्ग़ों और फुलवारियों में हर जगह अल्लाह, कलमा या क़ुरान की आयतें लिखी दिखाई देती हैं। पेड़ के तनों पर लिखा दिखाई देता है, ‘पत्ते-पत्ते पर अल्लाह का नाम लिखा है।’ अलीशान घरों के ऊपर ‘माशा-अल्लाह या सुभान अल्लाह’ दिखाई पड़ता है। इसके अलावा रंग-बिरंगे झंडे घरों और इमारतों पर लहराते नज़र आते हैं। मैंने किसी दोस्त से पूछा था कि इन रंगबिरंगे झंडों का क्या मतलब है? क्या ये किसी विशेष सम्प्रदाय या राजनैतिक दल के झंडे हैं? मुझे जवाब मिला था कि पाकिस्तान में धर्म और राजनीति एक-दूसरे में इतना घुल-मिल गये हैं कि कहाँ से क्या शुरू होता है और क्या कहाँ ख़त्म होता है, यह बताना मुश्किल है।

..........

जारी....


"असग़र वज़ाहत" से साभार....।

Wednesday, July 21, 2021

'क्या भूलूँ क्या याद करूँ '

 

     ('क्या भूलूँ क्या याद करूँ ' - "हरिवंशराय बच्चन")


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी नेट/जे.आर. एफ परीक्षा में चयनित उत्तर छायावादी कवि, हालावाद के प्रवर्तक "महाकवि हरिवंशराय बच्चन" जी की आत्मकथा 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' पर कुछ विशेष तथ्य जानने की कोशिश करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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● प्रमुख तथ्य व अन्य बातें :-


• इस रचना का प्रकाशन 1964 में कल्पना पत्रिका, हैदराबाद में हुआ था।

• रचनाकार बच्चन ने प्रस्तुत ग्रन्थ में उन्ही घटनाओं का उल्लेख किया है जो उनके मन को गहरी छू गयी है।

• इसमें लेखक के जीवन के शुरुआती 30 वर्षो का वर्णन है।साथ ही  परिवार का जिक्र करते हुए मनसा की सात पीढ़ी का वर्णन किया है। इसके अलावा अपनी कायस्थ जाति का वर्णन भी किया है।

• लेखक की शिक्षा का प्रारंभ बहनों और माता की मदद से हुआ था। जहाँ उन्होंने अपनी सहूलियत व बहुमूल्य समय देकर इन्हें प्रोत्साहित किया। कभी-भी इनकी शिक्षा में ढील नहीं देनी चाही। जितना इनके हिस्से में था उन्होंने भरपूर मात्रा में किया ताकि इनकी शिक्षा-यात्रा निरंतर चलती रहे । 

•  लेखक का जीवन शुरुआती दौर में आर्थिक तंगी की समस्या से भी जुझा है। इसके लिए इन्हें हमेशा ही धन की आवश्यकता व कमी महसूस होती रही है। इसके अभाव में इनके कई कार्य भी रुकते हुए होंगे ।

• हिंदी साहित्य जगत में लेखक की अक्षयकीर्ति "मधुशाला" की लोकप्रियता के कारण उन पर कई आरोप भी लगाए गए। जैसे रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा उनको गोली मारने की धमकी देना आदि।

• आत्मकथा के अंत मे "श्यामा" जोकि इनकी प्रथम पत्नी थी, उनके अंतिम दिनों का वर्णन भी किया है। अपनी पत्नी के मृत्योपरांत इनकी दशा एक दम नाज़ुक हो गयी थी। "निशा-निमंत्रण "व अन्य रचनाओं में इस विरह-वेदना, और मर्म की झलक दिखती रही है।

• रचना में एक अन्य पात्र गन्सी चाचा भी रहे हैं। जिनका आतंक बच्चों पर बहुत पडा है। चाचा द्वारा बार बार मारना- पीटना और कठोर रवैया अपनाने की वजह से बच्चे इनसे सहमे से रहते थे।

• छेदीलाल की कुछ नया करने की खासियत उन्हें (लेखक) बराबर प्रेरित करती रहती थी। 

• भोेलानाथ बाबा से अध्ययन की रूचि मिली। 

• नायब साहब से जीवन जीने की लालसा मिली जिसके बारे में लेखक कहते हैं कि :- जीवन के मारे हुए के प्रति भले ही मेरे मन में सम्वेदना न हो परन्तु जीवन से जूझने वालो के प्रति मेरे अंदर खूब उत्साह है" ।

•  बच्चन जी को पिता "प्रतापनारायण" से वैचारिक मतभेद होने के बाद भी परिश्रम , शक्ति मिलती रहती थी।

• पत्नी श्यामा ने खूब संघर्ष करने की शक्ति दी।

• रचना में शिक्षक श्री विश्राम तिवारी का भी जिक्र छेड़ा है। 

•  लेखक का हिंदी साहित्य जगत में प्रवेश यूँही नहीं था । और न ही हिंदी साहित्य इन्हें विरासत में मिला था। इसके स्थान पर "सत्यदेव परिव्राजक" ने उनमे हिंदी कविता के प्रति भाव जगाये थे।

• अपने मित्रों का भी वर्णन किया है। कर्नल के साथ अपने समलैंगिक सम्बन्ध का उल्लेख भी किया और उसके बाद अपने दोस्त की पत्नी जिसका नाम "चंपा" था उसके साथ भी सम्बन्ध रहे हैं।   वह कहते हैं कि:-

                                      

अगर उनका सानिध्य मुझे न मिलता तो में आज वह न होता जो आज हूँ"...।

• "चंपा" के लिए कहते हैं- कनक छरी से इकहरे बदन सी , लमछर, गौर वर्ण कीट्स की dryend of the trees  की तरह लगती थी"....।


पात्र:-  

प्रतापनारायण   -पिता

सरस्वती - माता

श्यामा  - पत्नी

विश्रामतिवारी - शिक्षक

गनसी - चाचा

   

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Sunday, July 18, 2021

उपन्यास भाग -10

         

                                (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. प्रभा खेतान :-

" आओ पे पे घर चले" 1990 में अमरीका के 3 शहरों लॉस एंजलिस, सेंट लुइस, न्यूयॉर्क में रहते हुए नारी उत्पीड़न के द्वारा लेखिका ने अपने अनुभवों को साझा किया है।

"तालाबंदी" 1991 में मोमिनपुर इलाके के परिश्रमी साधनहीन किंतु कुशल मारवाड़ी श्याम बाबू की फैक्ट्री के स्थापित समृद्ध और बंद होने की कथा है। इसमें मार्क्सवादी विचारधारा को दिखाया है जो धर्म का रूप लेकर बंगाल में कई फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं। 

" छिन्नमस्ता" 1993 में नारी का जीवन संघर्ष है। पुरुषों के समाज में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कथा।

"पीली आँधी" 1996 में सामंतीय व्यवस्था के उत्पीड़न और अकाल से त्रस्त मारवाड़ी जाति का कलकत्ता आने और इन बेगानी धरती पर अनेक अवरोधों-विरोधों के बावजूद अपने श्रम व व्यापार के बल पर व्यवस्थित है।

                                                  

2. मैत्रयी पुष्पा :-

 "बेतवा बहती रही " 1993 में गरीब परिवार में जन्मी, कम पढ़ी-लिखी उर्वशी की कथा है।  विवाह के बाद उसका प्यार जल्द ही छिन जाता है और वह कम उम्र में ही विधवा हो जाती है।

" चाक" 1997 में अलीगढ़ के पास अंतःपुर गाँव में अनेक जातियों की स्त्रियां है जिन पर जाटों का वर्चस्व है और उनके शोषण से दमघोंटू जीवन जी रही हैं।

"झुलानट" 1999 में बुंदेलखंड के एक परिवार की कथा है।

" अल्मा कबूतरी" 2000 में कबूतर जाति में जन्मी अल्मा की संघर्ष की कथा है। अंग्रेज़ो ने इन्हें जरायम पेशी घोषित किया परन्तु यह अपना सम्बन्ध रानी पद्मावती, झलकारीबाई से जोड़ते हैं।

"कहि ईसुरी फाग" 2004 में ईसुरी के फाग बुंदेलखंड में प्रसिद्ध है। ईसुरी के रजऊ की प्रेमकथा का वर्णन है।

"त्रियाहट" 2005 में उर्वशी नामक विधवा लड़की की कहानी है। उसका अपराध यही है कि वह अपने अनुसार जीवन जीना चाहती है।

"फरिश्ते निकले" 2014 में ग्रामीण स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों की कथा है जहाँ नायिका "बेला"एक समय तक सबकुछ सहती है पर अंततः वह ताकतवर स्त्री के रूप में तब्दील होती है।

                                                    

3. मधु कांकरिया :-

 "आखिरी सलाम" 2002 में वेश्याओं के जीवन पर आधारित है।

"पत्ताखोर" 2005 में बढ़ती नशाखोरी के भीषण और घातक परिणाम की ओर ध्यान आकृष्ट करता है।

"सेज पर संस्कृत" 2008 में जैन साध्वियों के जीवन के अन्तरबाध्य में झाँकता हुआ, स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को उठाता है। महावीर के निर्वाण के 843 वर्षों बाद जैन धर्म की आचार संहिता लिखकर मनमानी कर रहे हैं। 

"खुले गगन के लाल सितारे" 2012 में नक्सलवादी आंदोलन को केंद्र में रखकर लिखा गया है।


4. जया जादवानी :-

" मीठो पाणी खारों पाणी" 2013 में सिंध के 5000 साल के इतिहास को छोटे छोटे खण्ड में बांटकर दिखाया गया है।

"मीठा पानी सिंध का और खारा पानी अरब सागर का।

                                              

5. अनामिका  :-

" तिनके तिनके के पास" 2008 सेक्स वर्कर की बेटी तारा की माँ के देहांत के बाद कॉलगर्ल बनकर पढाई करती है। नई मध्यवर्गीय स्त्री के जटिल यथार्थ का चित्रण है।

                                                     

6. क्षमा कौल :-

"निक्की तवी पर रिहर्सल" 2013 में कश्मीर आतंकवाद पर लिखा है। विकृत राजनीति को भी दिखाया है। जम्मू में 2 महीने तक चल रहे आंदोलन जिसे "बम-बम भोले" नाम से भी जाना जाता है जिसमे जबरिया सेक्यूलर चेहरे और असहज को दिखाया है।

                                                       

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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Thursday, July 15, 2021

उपन्यास भाग - 9

           

                          (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. कृष्णा सोबती :-

" सूरजमुखी अंधेरे के" 1972 में नारी जीवन की मनोवैज्ञानिक समस्या को उभारा है। रत्ती जिसका बचपन मे बलात्कार हुआ था वह अब मनोवैज्ञानिक प्रभाव से जूझ रही है।

"जिंदगीनामा" 1979 में पंजाब की संस्कृति और वहाँ के रेशे रेशे को समझने के लिए अच्छा उपन्यास है। देवराज उपाध्याय के शब्दों में " यदि किसी को पंजाब की संस्कृति, रहन-सहन, चाल-ढाल, इतिहास आदि की जानकारी तो "जिंदगीनामा" से अन्यत्र कहीं ओर जाने की जरूरत नहीं"...।

लेखिका का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है।

"दिलो दानिश" 1993 में दिल्ली के रईश परिवार के बहाने भारतीय नारी की व्यथा दिखा दी है।

  

2. मन्नू भंडारी :-

"आपका बंटी" 1971 में मध्यवर्गीय समाज मे तलाक जैसी समस्या का प्रभाव किस तरह से बच्चों पर पड़ता है उसका जीवंत चित्रण किया है। शकुन, अजय और बंटी की कथा है।

"महाभोज" 1979 में लेखिका का राजनीतिक उपन्यास है जिसमें दलित लोगों को किस तरह से शोषित किया जाता है और अंततः उसकी "बिसेसर" (बिसु) हत्या कर के उसके साथी बिंदा को ही उसका हत्यारा बना दिया जाता है। राजनीतिक स्वार्थ किस हदतक जा सकता है इसका जीता जागता प्रमाण है यह उपन्यास।

                                                      

3. उषा प्रियम्वदा :-

"55 खंभे लाल दीवारें" 1961 में सुषमा को केंद्र में रखकर आधुनिक नारी की मानसिक यन्त्रणा का अंकन किया है।

" अन्तर्वशी" 2000 अमरीका में प्रवास करने वाले भारतीयो को कथा। लेखिका ने मुक्त यौन संबंध को विशेष रूप से दिखाया है।

"भया कबीर उदास" 2007 नायिका लिली पांडेय के माध्यम से नारी की छटपटाहट और मृत्यु से उतपन्न भय का ही मार्मिक चित्रण किया है।

 

4. राजी सेठ :-

"तत्सम" 1983 में स्त्री पुरुष के सम्बंध पर विवेचित है। विश्विद्यालय स्तर के खोखलेपन को भी दिखाया गया है।

"निष्कवच" 1995 में भारतीय और पश्चिमी संस्कृति मे अंतर दिखाया है कि पश्चिम में रहने वाले लोगों को वह नरक और भारत मे रहने वालों को स्वर्ग लगता है। पश्चिम में रिश्ते देह के आधार पर बनते हैं, वयस्क होने के बाद लड़का-लड़की को अकेले छोड़ दिया जाता है परन्तु भारत इससे विपरीत है। यहाँ लंबे समय तक परिवार पर ही बच्चे आश्रित रहते हैं और यहाँ के रिश्ते भावनाओ और संस्कृति, मर्यादा से जुड़े हैं जो लंबे समय तक चलते हैं।

"उनके हिस्से की धूप" , "चितकोबरा" में नारी स्वतंत्रता , प्रेम विवाह, वैवाहिक जीवन की समस्या, ऊब व ताजगी से छुटकारा पाने के लिए पर पुरुषों की तरफ जाना ये सब इन 2 उपन्यास में है।

"अनित्य" 1980 में गाँधीवादी की व्यर्थता और भगतसिंह की का क्रांतिकारी आंदोलन को दिखाया है।

"कठगुलाब" 1996 में पुरुष प्रधान समाज मे नारी की दुर्व्यवस्था का चित्रण।

"मिलजुल मन" 2009 लोगों के मोहभंग को दिखाया है। 

                                                     

5. चंद्रकांता :-

 "बाकी सब खैरियत है" 1983 में दिखाया है कि किस तरह से सयुंक्त परिवार का एक लड़का विदेश जाकर सारे रिश्तों को ताक पर रख देता है और भावनात्मक रूप से अलग हो जाता है। विदेशीपन इतना लुभाता है कि अपने परिवार को भूल जाता है।

"एलान गली जिंदा है"  1984 कश्मीर की एक गली का चित्रण है जहाँ सदी गली मान्यता है। पीढ़ियों के अंतर्विरोध दिखता है।

                                                    

6. कुसुम कुमार :-

"हीरामन हाईस्कूल" 1989 में एक विधवा अकेली स्त्री के जीवन संघर्ष की कथा है जहाँ वह अपने 2 पुत्रियों को पालपोष कर जिजीविषा का उदहारण देती है।

                                                  

7. ममता कालिया :-

" दुक्खम-सुखम" 2010 बीसवीं शती की पृष्ठभूमि पर लिखा है। इसके सूत्र दिल्ली, आगरा,बम्बई तक फैले हैं। गांधी के चरखा से आत्मबल और विभाजन की त्रासदी।

"कल्चर वल्चर" 2017 में कला, साहित्य और संस्कृति आज सरोकार न रहकर कारोबार बनता जा रहा है। कारोबारियों के हाथ मे जाकर ये संस्कृति विकृति हो गई है और साहित्य वाहित्य बन गया है।


8. चित्रा मुद्गल :-

" आँवा" 1999 में बम्बई के मजदूरों का संघर्ष दिखाया है। जिसमे ट्रेड यूनियन कठपुतली बन गयी है और समाज का कोई भी वर्ग और क्षेत्र क्यों न हो वहाँ नारी उत्पीड़न अवश्य ही है,यह समस्या है।   

"गिलिगुड" 2002 में युवा पीढ़ी बुज़ुर्ग की घोर उपेक्षा और अवमानना करते हैं और उन्हें पालतू कुत्ते से भी ज्यादा बदत्तर बना देते हैं।

"पोस्ट बॉक्स 203 नाला सोपारा" 2016 में उस मानसिकता का विरोधी है जो मानव को मानव न समझ कर केवल शारिरिक सुविधा ही समझती है।   


10. मृणाल पांडे :-

"पटरंग पुराण" 1983 में हिमालय के पाददेश में स्थित पहाड़ी अंचल के जीवन चित्र अंकित किये हैं। 11 पीढ़ियों के इतिहास दिखाया है। पटरंग पुर के बसने, विकसित होने को बायस्कोपी रूप में दिखाया है।

                                                  

11.नासिरा शर्मा :-

" सात नदियाँ एक समुन्द्र" 1984 में ईरान की कथा दिखाई है। राजशाह की तानाशाही के खिलाफ जनता की बगावत का चित्रण जिसमे जनता हार जाती है और मुक्ति नही मिल पाती तानाशाही से।

" शाल्मली" 1987 में लेखिका ने एक पढ़ीलिखी महिला अफसर की उन्नति का चित्रण किया है जहाँ उसे आने से ऊपर के अफसरों के द्वारा हीं दिखाया जाता  है और घर मे भी पति द्वारा उसका अनादर ही हकता है।

"ठीकरे की मंगनी" 1989 में जकड़े एक मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार की शिक्षित और संवेदनशील युवती महरूख के संघर्ष की गाथा है।

" अक्षयवट" 2003 में इलाहबाद को केंद्र रखकर लिखा गया है। मानवीय मूल्यों और वर्तमान जीवन की स्थिति को उजागर किया है।

"कुनियाँ जान" 2005 में टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव के कारण क्रमशः निरन्तर छीजते जलस्रोतों की समस्या पर आधारित है।

कागज की नाव" 2014 में बिहार के उन परिवार की कथा है जिसका कोई न कोई सदस्य चंद रुपयों के लिए खाड़ी देशों में नोकरी करने चला जाता है और वतन, परिवार, आदि की जिम्मेदारी को यहाँ छोड़ जाता है।

                                                    

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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Saturday, July 10, 2021

उपन्यास भाग - 8

   

                            (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. मणि मधुकर :- 

मणि मधुकर जी को हिंदी नाटकों में भी गणनीय माना गया है।

" सफेद मेमने" 1971 में राजस्थान के "नांगिया" गाँव को केंद्र में रखकर सन्त्रास, अजनबीपन, जीवन की ऊब को दिखाया है।

"पत्तो की बिरादरी" 1979 में विभाजन और अकाल के बाद दोनों देशों में रोजी रोटी के लिए भटक रहे मानवों व राहत कैम्पों में हो रहे उनके साथ शोषण की कथा है। ऐसा ही कथा का नायक "शुबो" जो पाकिस्तान से आया है उसकी हत्या कर दी गयी है और उसकी कहानी को उसकी पत्नी "जुगनी" आगे बढाती है।


2.मंजूर एहतेशाम :-

" सूखाबरगद" 1986 में देश के बटवारे होने पर प्रगतिशील चेतना दिखाई है। विभाजन होने के बाद भी अब्बू, रसीदा पाकिस्तान नही जाते और पाकिस्तानियो को अलग मानते हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव से भरपूर पात्र हैं।

                                                

3. वीरेंद्र जैन -

"शब्दवध" 1983 में, प्रकाशन जगत में व्याप्त अनाचार और प्रतिभाओं का बौद्धिक शोषण का पर्दाफाश किया गया है। लेखक कहते हैं" बंधु यह हिंदी प्रकाशन जगत है यहाँ साहित्यकार पूजे जाते थे। पहले प्रकाशन "सरस्वती" की पूजा करता था अब इसे शुद्ध बनिये चलाते हैं और उन्ही की पूजा होती है जो कमा के दे सकते हैं।

" सबसे बड़ा सिपहिया" 1988 में पुलिस तन्त्र के थानेदार से लेकर हवलदार तक के क्रूर आमानवीय पक्ष को उजागर किया है। 

                                                         

4. मिथिलेश्वर :-

"युद्धस्थल" 1981 में दूधनाथ चौधरी रामशरण बहू डायन करार देकर अपने बेटे की हत्या का कारण मानता है। इसी कारण उसकी हत्या कर दी जाती है।

" प्रेम न बाड़ी उपजै" 1995 में रूपेश और शकुंतला की प्रेमकथा।लेखक के अनुसार पुरुष की अपेक्षा स्त्रियाँ प्रेम को अधिक गहरा समझती हैं।

"यह अंत नहीं" 2000 में खवाड़हीस, पहाड़पुर, रघुनाथपुर को आधार बनाकर बिहार के गाँवो का चित्रण किया है।

                                                      

5. कमलाकांत त्रिपाठी :-

"पाहीघर" 1991 में प्रथम स्वंतत्रता संग्राम 1857 को केंद्र में रखकर लिखी गयी है जिसमें मात्र नवाबो ताल्लुकदारों को ही नहीं देखा है बल्कि किसान, मजदूर, मालगुजार, सामान्य जनता सभी का योगदान के रूप में दिखाया है। कथा की पटभूमि बसौली गाँव के "पाहीघर" है।

इस उपन्यास के बाद लेखक को किसान चेतना का श्रेष्ठ उपन्यासकार मान लिया है।

"यह जो दिल्ली है" 1993 में दिल्ली की पृष्ठभूमि के माध्यम से आज के मूल्यहीन अवसरवादी और सुविधापरस्त पत्रकारिता के जगत का चित्र खींचा है।

 "कथासर्कस" 1995 में इसकी पृष्ठभूमि भी दिल्ली की है जहाँ साहित्य जगत की गुटबाजी, पैंतरेबाजी, जोड़-तोड़ व व्यावसायिकता आदि का कच्चा चिट्ठा पेश किया है। लेखक के अनुसार आज का कथा साहित्य रिंग मास्टर के इशारे पर नाचने वाले कि तरह हो गयी है xxx जो ऊपर से मनोरंजन करते हैं, सुखी रहते हैं परन्तु अंदर से तिक्त, विवश, दर्दनीय हैं।


6. प्रकाश मनु :-

"पापा के जाने के बाद" 1998 में कला जगत में चित्रकार वसन्तदेव के माध्यम से आदर्श विहीन समाज को दिखाया है।

                                                    

7. सुरेंद्र वर्मा :-

"मुझे चाँद चाहिए" 1993 में एक महत्वाकांक्षी कलाकार के संघर्ष की कहानी है। कलाबाजार की प्रतिकूल परिस्थितियों का चित्रण। जिसमें हर्षवर्धन जैसा कलासम्पन्न व्यक्ति अंततः आत्महत्या कर लेता है। लेखक यहाँ आत्महत्या को गलत मानता है।

"दो मुर्दो के लिए गुलदास्ता" 1998 में दिल्ली के शोधछात्र और मथुरा के चौकीदार के बहाने बम्बई की भयानक अपराध और कुत्सित सेक्स की दुनिया का चित्रण किया है। समृद्ध नारियों के अतृप्त सेक्स जीवन की कथा है।


8. भगवान सिंह :

इनका प्रस्तुत उपन्यास रामकथा पर आधारित रचनाओं में विशिष्ट योगदान रखता है। इसमें राम जी के चरित्र को नए अंदाज में बना है। जिसको हम भक्तिकालीन नजरिये से भी देख सकते हैं। जब भक्तों द्वारा अपने आराध्य को अपने अनुसार देखा-समझा जाता था, उनकी भक्ति की जाती थी, उनके आकार-रंग-रूप को ढाला जाता था।

"अपने अपने राम" 1992 में राम कथा की औपन्यासिक कथा कही है। दृष्टि की नवीनतम के बावजूद सत्ता संघर्ष की कहानी बन जाती है, जिसका शायद लेखक अनिमान भी न करता हो।

                                                  

9. प्रदीप सौरभ :-

इनका LGBT कम्युनिटी पर आधारित उपन्यास बहुत ही फेमस हुआ था। 

"मुन्नी मोबाइल" 2009 में बक्सर से आई दिल्ली में एक लड़की की कथा है जिसमें वह महानगरीय जीवन में तेजी से मूल स्वरूप के विपरीत मशीन में तब्दील बन जाती है।

" तीसरी ताली" 2011 हिजड़ो, समलैंगिक, लैसवीयन्स, लौंडेबाज आदि की विकृत यौन सदर्भो को दिखाया है। मुख्यतः हिजड़ो के जीवन को दिखाया है।

10. पंकज बिष्ट :-

"लेकिन दरवाजा" दिल्ली के साहित्यकारों के हरासोन्मुखी सुविधा खोजी जीवन पर आधारित है।


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2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

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Thursday, July 8, 2021

उपन्यास भाग - 7


                            (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. कमलेश्वर :-

हिंदी साहित्य की आधुनिक काल की कथा साहित्य में कमलेश्वर का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इनकी प्रसिद्ध कहानी 'दिल्ली में एक मौत' है जिसमें मध्यवर्ग की लुप्त होती सम्वेदना और उसपर चढ़े झूठे भावनात्मक आवरण का पर्दा उठाने की कोशिश की है। इस कहानी को एक पँक्ति में 'मगरमच्छ के आँसू' से भी जोड़कर देख सकते हैं परंतु हमें ध्यान देना होगा कि मगरमच्छ के आंसू जब आते हैं तो वह भूखा होता है लेकिन इस कथा में आंसू निकलने का अर्थ झूठी सम्वेदना व्यक्त करने से जोड़ा गया है। 

इनके प्रसिद्ध उपन्यासों में सबसे ज्यादा चर्चित "कितने पाकिस्तान" रहा है जिसमें विभाजन के दंश को दिखाया गया है। यहाँ पाकिस्तान किसी एक समय को लेकर नहीं है। वह प्रत्येक समय का प्रतिनिधित्व कर रहा है जब-जब लोगों ने अपने को धर्म आधारित बाँटा है।

"एक सड़क सतावन गलियां" 1957 में आधुनिक परिवेश में कस्बे की जिंदगी दिखाई है।

" समुन्द्र में खोया आदमी" 1967 में आर्थिक दबाव के कारण परिवार के बीच कथानायक "श्यामलाल" अकेला-सा पड़ जाता है और लगता है जैसे वह समुन्द्र में खो गया हो।

" काली आँधी" 1974 में राजनीति के क्षेत्र में पहुंचने वाली आधुनिक नारी की परिस्थिति। 

" तीसरा आदमी" 1976 में पति-पत्नी के बीच आर्थिक दबाव को लेकर तीसरे आदमी के आने की समस्या को लेकर लिखा है।

"सुबह दोपहर शाम" 1982 में आजादी पूर्व भारतीय गाँव के कस्बाई संघर्ष की कथा दिखाई है।

" कितने पाकिस्तान" 2000 में उपन्याकार ने यह दिखाया है कि लम्बे समय से इंसान ही घृणा और द्वेष के कारण लोंगो को बांटता आया और न जाने कितने पाकिस्तान बन चुके हैं  और अभी बनने बाकी हैं। इसी की परिणाती है कि विभाजन के कारण यह एक और पाकिस्तान बन गया । 

उपन्यास के अंत में अदीब कहता है" अदीब-ए-आला वक्त न हिन्दू है न मुसलमान.. इतिहास गवाह है कि रजवाड़ो और सल्तनतों के लोग हिन्दू या मुसलमान तो थे पर इनके स्वार्थ के कारण में वह भी बन गए"..।

 

2. मनोहर श्याम जोशी :-

" कुरु-कुरु स्वाहा" 1980 में बम्बई के पतनशील समाज का चित्रण जहाँ कॉलगर्ल और फिल्मजगत के माध्यम से इंदिरायुग के खोखले पन को दिखाया है।

" कसप" 1982 में गंगोली हाट के निम्नमध्यवर्गीय के जीवन की कथा। उपन्यास के केंद्र में कुमाऊनी मध्यवर्ग है।

"क्याप" 2006 में लेखक ने उत्तर आधुनिक शैली में कुर्मांचल के कस्तूरी कोट की कहानी कही है 

 

3. गिरिराज किशोर :-

" चिड़ियाघर" 1968 में रोजगार के दफ्तर के काले कारनामों का पर्दाफाश किया है।

"जुगलबंदी" 1973 में अंग्रेजी साम्राज्य के साथ बहती हुई सामन्तशाही और कॉंग्रेस के रूप में नए सत्ताधीशों का पर्दाफाश किया है।

"तीसरी सत्ता" 1982 में पति पत्नी के बीच आने वाला तीसरा व्यक्ति के आने से उत्तपन्न तनाव की कहानी है।

"परिशिष्ट" 1984 IIT जैसे तकनीकी शिक्षा संस्थाओं में हरिजन विरोधी वातावरण का दर्दनाक चित्र प्रस्तुत किया गया है। अभिजात वर्ग के छात्रों द्वारा उत्पीड़ित हरिजन छात्रों को आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है।

" ढाईघर" 1991 में समाज, मनुष्य और बदलते रिश्तों की सच्चाई दिखाई है।

"यातनाघर" 1997 में नेहरू को अमेरिका राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी द्वारा यादगार के रूप में दिये गए एक उच्चतम तकनीकी शिक्षा संस्थान की अंदरूनी गुटबाजी, उठा पटक, जोड़ तोड़ और कुत्सित राजनीति की कहानी है।

"पहला गिरमिटिया" 1999 में गाँधी जी द्वारा दक्षिण अफ्रीका के भारत से गए हुए मजदूरों के साथ हो रहे शोषण के खिलाफ खड़े होने और उनका उद्धार करने से सम्बंधित है।

                                              

4. दूधनाथ सिंह :-

"आखिरी कलाम" 2003 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस को आधार बनाकर लिखा गया है।

                                                  

5. रमेशचंद्र शाह :-

" गोबरगणेश" 1978 में विनायक की परिस्थितियों का विश्लेषण।  प्रतिभा सम्पन्न होने के बावजूद गरीब होने से डर-डर भटकता रहता है।

"किस्सा गुलाम" 1986 में शुद्र जाति में उत्तपन्न एक युवक कुंदन की कहानी है जो समाज के सड़े गले मूल्यों पर थूकता है।

                                                

6. विनोदकुमार शुक्ल :-

"नौकर की कमीज" 1979 में कुल घटना घर से दफ्तर और दफ्तर से घर आने तक सीमित है जिसमें निम्नमध्यवर्ग की तनावग्रस्त कथा दिखाई है।

" दीवार में एक खिड़की रहती थी" 1997 में मनुष्य के खुले प्रकृति के मुक्तसौन्दर्य से हटकर दीवार के घर मे सिमटते जा रहे हैं।

                                          

7. गोविंद मिश्र :-

"लाल पीली जमीन" 1976 में बुंदेलखंडी उपनगर के युवा छात्रों की भटकी हुई जिंदगी की कथा है। यह भटकाव गुंडागर्दी और सेक्स को लेकर दिखाया है।

"पाँच आँगनों वाला घर" 1995 में आधुनिकता के दबाव से भारतीय संयुक्त परिवार के टूटने और संवेदनशील के छीजने का अहसास कराने वाला उपन्यास है।


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3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

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7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

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Tuesday, July 6, 2021

शेर को गोद लें-पुस्तक अंश

 शेर को गोद लें

असग़र वजाहत

(हंगरी प्रवास (1992-1997) पर आधारित "स्वर्ग में पांच दिन",राजपाल  द्वारा प्रकाशित पुस्तक का एक अंश।)

सत्ता परिवर्तन के बाद हंगरी के समाज में बड़े रोचक परिवर्तन आ रहे हैं। सरकार के पास साधनों की कमी है और दूसरी ओर निजीकरण का बोलबाला है। सरकारी संपत्तियाँ कौड़ियों के मोल बेची जा रही हैं। कहा जा रहा है कि कम्युनिस्ट सरकार ने जिनका राष्ट्रीयकरण किया था वे संपत्तियाँ उनके मालिकों को वापस कर दी जायेंगी। खेती के क्षेत्र में जो सरकारी संस्थाएं बनायी गयी थीं और जो बहुत सफल थीं उन्हें तोड़ दिया जायेगा। ज़मीन निजी संपत्ति बन जायेगी। निजीकरण का प्रभाव शहर के चिड़िया घर पर भी पड़ा है। सरकार के पास चिड़िया घर चलाने के लिए पैसे की कमी है और चिड़िया घर से कहा गया है कि वह अपने साधनों से पैसा कमाए। टिकट लगाने के अलावा चिड़िया घर के पास और क्या रास्ता हो सकता है? लेकिन केवल टिकट लगाकर कितना पैसा कमाया जा सकता है? इसलिए चिड़िया घर ने एक योजना शुरू की है। वह योजना यह है कि चिड़िया घर के जानवरों को 'गोद' लिया जा सकता है।

उदाहरण के लिए यदि कोई एक महीने के लिए शेरों के भोजन और देख-रेख पर खर्च होने वाला पैसा देता है तो एक महीने के लिए शेर उसके हो जायेंगे। शेरों के कटहरे पर यह लिख दिया जायेगा कि यह शेर एक महीने के लिए फ़लां का है। इसी तरह दूसरे जानवरों, चिड़ियों, साँप, बिछुओं आदि-आदि को भी अगर कोई चाहे तो गोद ले सकता है। 

मैं चिड़िया घर में यह तमाशा देख रहा था कि अचानक एक कटहरे पर नज़र पड़ी जिसमें गधा बंद था। चूंकि योरोप में गधे कम होते हैं इसलिए योरोप वासियों के लिए ऐशियन गधा एक रोचक जानवर है। गधे के कटहरे पर जो जानकारियाँ दी गयी थीं उनमें ये भी लिखा था कि गधा भारत से लाया गया था। गधे के कटहरे पर यह नहीं लिखा था कि उसे किसी ने ‘एडाप्ट’ किया है। जबकि दूसरे जानवरों को काफी ‘एडाप्ट’ किया गया था। एक भारतीय होने के नाते मुझे दुःख हुआ कि हमारे देश से आये गधे की विदेश में बड़ी उपेक्षा हो रही है।

अगले दिन मैं भरतीय राज दूतावास गया। राजदूत महोदय से सीधी-सीधी बातचीत तो नहीं की लेकिन चिड़िया घर के भारतीय गधे का पूरा प्रसंग बताया और कुछ ये संकेत दिया कि राजदूत महोदय यदि चाहें तो भारतीय गधे को  ‘एडाप्ट’ कर सकते हैं। राजदूत महोदय मेरा आशय समझ गये और बोले- मेरे पास बहुत हैं।“

मैं निराश हो गया और लगा कि भारतीय गधे का जीवन संकट में है।

बुदापैश्त में पता नहीं कैसे पाकिस्तानी दूतावास के एक अधिकारी से भी परिचय हो गया था जो शहर में इधर-उधर घूमते हुए मिल जाते थे। उन्होंने एक बार बातचीत के दौरान बताया था कि पाकिस्तानी राजदूत तो ये कहते हैं कि हंगरी में पाकिस्तानी दूतावास बंद कर देना चाहिए। जब मैंने कारण पूछा था तो उन्होंने बताया था कि हंगरी में कोई भी भारत के खिलाफ कुछ नहीं सुनना चाहता।

गधे वाले प्रसंग के बाद पाकिस्तानी डिप्लोमैट अचानक बाज़ार में मिले। मुझे ध्यान आया कि गधा भारत से ज़रूर लाया गया था लेकिन यह जानकारी नहीं है कि कब लाया गया था। मतलब यह है कि यदि वह भारत विभाजन से पहले लाया गया था तो उसकी जिम्मेदारी जितनी भारत पर बनती है उतनी ही पाकिस्तान पर भी बनती है। यह सोचकर मैंने पाकिस्तानी डिप्लोमैट को पूरी बात बतायी और कहा कि आप लोग उस गधे को गोद क्यों नहीं ले लेते। 

डिप्लोमैट महोदय सोच में पड़ गये और कुछ देर बाद बोले-अगर कहीं से यह साबित हो सके कि वह गधा कश्मीर से है तब हम उसे एडाॅप्ट कर सकते हैं।

मैंने उनसे कहा- आप किस हवा में हैं। अगर यह शक भी हो गया कि वह गधा कश्मीर से है तो भारत सरकार उसे ‘एयर-लिफ्ट’ करा लेगी।“

1994

Sunday, July 4, 2021

उपन्यास भाग -6

            

                            (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. विवेकीराय:-

"सोनमाटी" 1984 में गाजीपुर और बलिया के बीच 'करैल' क्षेत्र दिखाया गया है जहाँ लोंगो का मुख्य काम पैसा कमाना है।इसमें लेखक का आशावादी स्वर दिखा है।

"समर शेष है" 1988 में लेखक का आजादी मिलने के बाद भी उसकी अपूर्णतः पर आधारित है। जहाँ आज भी कई ऐसीे समस्याएं हैं, परिस्थितियाँ है जिस पर कार्य नहीं किया है। देश को आजादी तो मिल गयी परंतु विकास की आजादी अभी बाकी है। लेखक भूमिका में कहते हैं" रामराज्य अंततः देष को नहीं मिला अब तो उसकी चर्चा भी नहीं होती है xxx गाँव में सड़क का नारा खोखला पड़ा है"..। 

लेखक ने जयंती (जनता), सुराज और रामराज को प्रतीक में इस्तेमाल किया है। सुराज को जनता तक न पहुँचाने में ही यहाँ सड़क का इस्तेमाल किया है।

" नमामि ग्रामम" 1997 में गाँव खुद अपनी कथा कहता है। गाँव की दूरदशा का वर्णन है जिसमें उसे ऐसे भूखे मगरमच्छों के हाथ मे दे दिया है जो विकास का सारा पैसा हजम कर जाते हैं। विकास के अभाव को दर्शाता है यह उपन्यास खोखली व्यवस्था को दर्शाता है।

                                                      

2. शैलेश मटियानी :-

"बोरीवली से बोरीबंदर तक" 1959 में बम्बई की भागदौड़ में व्यस्त यांत्रिक जीवन को दिखाया है।

"कबूतरखाना" 1959 बम्बई के भूलेश्वर मुहल्ले की गगनचुंबी इमारतों के कबूतर खाने जैसे फ्लैटों में रहने वाले मध्यवर्गीय लोगों के घुटते जीवन को दिखाया है।

"किस्सा नर्मदाबेन गंगूबाई" 1960 में बम्बई की सेठानियों के यौन चित्रण का उल्लेख है।


3. श्याम परमार :-

"मोरझाल" 1963 मालवा के आदिवासी भीलों का चित्रण है


4.शानी :-

"कालाजल" 1965 में बस्तर के 2 मुस्लिम परिवारों की 3 पीढ़ियों की कहानी दिखाते हैं। परिवार की सम्पन्नता और विपन्नता दिखाई है।

                                                            

5.भगवानदास मोरवाल :-

" काला पहाड़" हरियाणा के मेवात राज्य के गांव "नगीना" को केंद्र में रख कर बताया कि उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के सीमांत पर काले पहाड़ की छाया में बसा है जहाँ सभी मेवाती हैं कोई हिन्दू-मुस्लिम नही"। मेवातियों की शुरुआत 1527 के युद्ध से शुरू होकर विभाजन के बाद तक यहाँ हिन्दू और मुस्लिम दोनों साथ रहते थे पर वर्तमान काल में राजनीतिक दलों के कारण इनके बीच दीवार खड़ी कर दी गयी है।

"बाबुल तेरे देश में" 2004 मुस्लिम परिवार के पितृसत्तात्मक समाज में पिसती स्त्रियों की कथा है।

"रेत" 2008 में हरियाणा और राजस्थान सीमांत के पास बसने वाली कंजर जाति के इतिहास, रीति रिवाज, उनके जीवन को दिखाया है। कंजर जाति का मुख्य धंधा अवैध शराब बेचना और वैश्यावृत्ति करना है। कंजर का अर्थ काननचर या जंगल मे घूमने वाला।यह जाति अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।

"नरक मसीहा" 2014 में NGO संस्कृति की पड़ताल में यह पहला ऐसा उपन्यास है।

लेखक ने हरियाणा सीमांत पर उपन्यास लिखे हैं।

 

6. नरेश मेहता :-

इनकी जीवन दृष्टि मानवतावादी है। नारी उत्पीड़न की समस्या तो लगभग उनके सभी उपन्यासों में दिखाई देती है। 

" डूबते मस्तूल" 1954 में रंजना के माध्यम से मध्यवर्गीय स्त्री की समस्या को दिखाया है। उसके जीवन मे कई मर्द आते हैं लकीन कोई भी उसकी आत्मा की सुंदरता को न देखकर उसके शारिरिक सुंदरता को ही देखता है।

"धूमकेतु: एक श्रुति" 1962 मातृहीन बालक के "उदयन" के मानसिक विकास का मनोवैज्ञानिक विवेचन किया है। 

"यह पथ बंधु था" 1962 श्रीधर और सरो की कथा दिखाई है। इसी का दूसरा भाग "नदी यशस्वी है" 1967 है जिसमें उदयन किशोरावस्था में है।

"उत्तरकथा" 2 भाग 1979,82 मालवा के ब्राह्मण परिवार को केंद्र में रखकर 20वी शती के प्रथमार्थ में लिखी है  जिसमें दुर्गा, वसुंधरा और गायत्री के नारी उत्पीड़न की कथा भी दिखाई है। इसमें मुख्य पात्र "शिवशंकर" हैं।

                                                      

7.कृष्णशर्मा भीखू :-

" मौत की सराय" 1970 में फ़्रांस की 18 शती की राज्यक्रांति का चित्रण किया है।

                                             

8.मोहन राकेश :-

"अंधेरे बन्द कमरे" 1961 दिल्ली के अभिजात्यवर्ग नीलिमा और हरवंश के दाम्पत्य जीवन को चित्रित और उसकी विसंगतियों को भी करता है।

"ना आने वाला कल" 1968 में एक पहाड़ी प्रदेश के मिशनरी प्रिंसिपल के रिजाइन करने से स्कूल के वातावरण, गंदी राजनीति आदि का वर्णन है।

" अंतराल" 1972 में स्त्री-पुरुष की जटिलताओं को दिखाया है।

                                                   

9.धर्मवीर भारती:-

"गुनाहों का देवता" 1949 में नीरज और सुधा की भावुकता से भरी कथा है।

"सूरज का सातवाँ घोड़ा" 1952 में कथा के भीतर कथा का पंचतंत्रीय ढंग से नया प्रयोग हुआ है। जिस का उपन्यास के परिवेश से मेल खाती है।


10.कृष्ण बलदेव वैध :-

"नर नारी" 1996 शहरी अभिजात्य परिवारों की कथा है जहाँ मुख्यतः सेक्स समस्या है।

                                               

11.सर्वेश्वर दयाल सक्सेना :-

" सोया हुआ जल" 1954 सिनेरियो शिल्प में लिखा है । एक प्रतीकात्मक उपन्यास है।

" पागल कुत्ते का मसीहा" 1977 में पागल कुत्ते सन्दर्भहीन व रूढिप्रियता जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं।


12.राजेंद्र यादव:-

" शह और मात" 1959 में उदय और सुजाता की प्रेम कहानी डायरी शैली में कही है।

" एक इंच मुस्कान" 1963 अमर और रंजना के प्रेम प्रसंग में बीच मे अमला के आ जाने से पैदा होने वाली समस्याओं को दिखाया गया है। 


12.निर्मल वर्मा:-

" वे दिन" 1964 दिव्तीय विश्वयुद्ध के बाद योरोप  की अभिशप्त पीढ़ी का वर्णन।

"रात का रिपोर्टर" 1989 "रात का अंधेरा"में आपातकाल के प्रतीक है। रिषि रिपोर्टर के बहाने पूरे समाज की यातना कथा दिखाई है।

                                                  

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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Friday, July 2, 2021

उपन्यास भाग -5

 

                                (उपन्यास)


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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. काशीनाथ सिंह :- 

हिंदी साहित्य के अंतर्गत काशीनाथ सिंह अपने कथा साहित्य के योगदान के लिए जाने जाते हैं। इनके कथा-साहित्य में अंचल विशेष की प्रवृति के साथ-साथ अन्य प्रवृतियों का भी समावेश है। जो भिन्न-भिन्न रूप में पाठकों के समक्ष आता है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-

" अपना मोर्चा" 1972 में वर्तमान शिक्षा पद्धति के खोखलेपन को उजागर किया है।

"काशी का अस्सी" 2002 में यह लेखक की औपन्यासिक कृतियों में सबसे ज्यादा लोकप्रियता को प्राप्त हुआ है। काशीनाथ सिंह जी की ख्याति का आधार यही कृति है जिसमें काशी के 'अस्सी मोहल्ले' की जीवंतता को दिखाया है। वहाँ की दैनिक जीवन की चर्चा को गहराई से और उसका रेशा-रेशा बुनकर दिखाया है।

" रेहन पर रग्घू" 2008 में उपन्यास की टिपण्णी में काशीनाथ कहते हैं कि:- अगर "काशी का अस्सी"    मेरा नगर था तो "रेहन पर रग्घू" मेरा घर है ....। इस उपन्यास को 'साहित्य अकादमी' मिला है।                               

" महुआ चरित" 2012 में मध्यवर्गीय पढ़ाकू लड़की की कहानी है। महुआ उन सभी स्त्रियों का प्रतीक है जो कहीं न कहीं सामाजिक दोहरेपन से जुड़ती है और उठ खड़ी होती है। स्त्री विमर्श के प्रति खुला आग्रह न दिखाई देने के बावजूद भी यह स्त्री अस्मिता को बनाये रखने वाला उपन्यास है।

" उपसंहार" 2014 में यह एक अन्य प्रकार की विशेषता रखने वाला उपन्यास है। जिसका कथानक महाभारत ग्रन्थ से उठाया गया है। इसमें महाभारत के नायक, खलनायक, विदुषक और महाभारत के कर्ता- धर्ता भगवान श्रीकृष्ण जी के अंतिम दिनों को दिखाया है। जिसमें उन्हें अंत में किस तरह से दुख उठाना पड़ता है। कहने का अर्थ यह है कि इस भौतिकवादी और सुविधा संपन्न दुनिया मे , आधुनिकता के समय में भी लोग समझ सके कि बड़े से बड़े नायक का हश्र कैसा हो सकता है।

लेखक एक स्थान पर कहते हैं कि " महाभारत में केवल कृष्ण ही ऐसे हैं जो किसी भी वस्तु-व्यक्ति से अछूते नही हैं,वह नायक, विदुषक, योगी सब कुछ हैं।"।

श्रीकृष्ण के ऐसे चरित्र को उठाकर काशीनाथ सिंह ने वह काम किया है जो आज तक कोई भी साहित्यकार और इतिहासकार नहीं कर पाया ।


2. संजीव :-

 यह भी अपने कथा-साहित्य के लिए हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण हैं। इनका कुछ समय हैदराबाद विश्विद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में भी कटा है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-

"धार" 1990 में  "बंगाल" के कोयला अंचल में रहने वाले कोयला मजदूरों की नारकीय जीवन को दिखाया है। साथ ही आदिवासी  समस्या को भी उठाया है। परन्तु उनकी मुक्ति का रास्ता ढूंढने में लेखक नाकामयाब रहा।

" पाँव तले की दूब" 1995 में छोटा नागपुर के पठारी इलाके का डोंगरी अंचल है। जहाँ की वास्तविकता को लेखक ने बखूबी उतारा है।

"जंगल जहाँ से शुरू होता है" 2000 में कथाभूमि पश्चिमी चंपारण की है इसे 'मिनी चंबल' भी कहते हैं। डाकू समस्या के माध्यम से व्यवस्था में बनी जंगल राज की परतों को उधेड़ दिया है, जिसे कुछ बाहुबलियों, धन्ना सेठों, उद्योगपतियों आदि ने बना रखा है। इसकी त्रासदी इस बात पर है कि इसे बदलने की कोशिश बेकार जा रही है।

"सूत्रधार" 2003 लोक नाटककार "भिखारी ठाकुर" को आधार बनाकर लिखा गया है। यह दलित विमर्श को नया आयाम देने वाला उपन्यास है।


3. अब्दुल बिस्मिल्लाह :- 

वर्तमान में यह दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। साथ ही निरंतर लेखन से भी जुड़े हुए हैं।

" झीनी-झीनी बिनि चदरिया" 1986 में बनारस के बुनकरों के शोषण की कहानी है। इसके साथ व्याप्त अशिक्षा, रूढिप्रियता आदि का भी ज़िक्र है।

"अपवित्र आख्यान" 2008 हिन्दू- मुस्लिम के सद्भाव की कहानी।


4. महापंडित राहुल सांकृत्यायन :-

हिंदी साहित्य में यात्रा त्रयी में यह भी शुमार हैं। इनकी ख्याति का अर्थ इनकी यात्रा प्रसंगों के रूप में शामिल है।

" सिंह सेनापति" 1942 में "लिच्छवि" और "जययोद्धय" 1944 में योद्धये गणतंत्र की कथा कही है, और कालपनिक रूप से मार्क्स के दर्शन करायें हैं।

" विस्मृत यात्री" में एक यात्री 500 मील की यात्रा करता है जो राहुल सांकृत्यायन  का ही प्रतीक है।


5. नरेंद्र कोहली :- 

हिंदी साहित्य के अंतर्गत गद्य-साहित्य में रामकथा व राम जी के चरित्र पर इनकी लेखनी चली है। रामायण और महाभारत को आधार बनाकर इनके कई उपन्यास लिखें हैं।    

बंगलादेश के युद्ध से कोहली को रामकथा की नई व्याख्या मिली है।  इनके उपन्यास हैं - दीक्षा, महासमर, आदि।                                                                                                              

6.शिवप्रसाद सिंह :-

"अलग-अलग वैतरणी"1967 में करैता गाँव में आजादी के बाद जमीदारी प्रथा में उन्मूलन के बाद स्थिति सुधरना है।

" गली आगे मुड़ती है " 1974 में छात्र आंदोलन, विश्वविद्यालय के प्रध्यापको की राजनीति दिखाई है।

"नीला चाँद" 1988 1060ई. की काशी को उसके पूरे सांस्कृतिक सन्दर्भ में मूर्त किया है।

"शैलूष" 1989 में कबीलाई जीवन व्यतीत करने वाले नटों के जीवन संघर्ष को उभारा गया है। लेखक ने इन नटों की उतपत्ति कबीले से न मानकर इन्हें चंद्रगुप्त के वंशज द्वारा शक-कुषाण कबीलों को पराजित किया था तब वह अपनी रक्षा के लिए विंध्याचल की घाटियों में छिप गए थे और यही से इन कबीलाई समाज का विकास हुआ।

"कुहरे में युद्ध" 1992 "दिल्ली दूर है" 1993 एक ही उपन्यास के 2 खंड है जिसमें दिल्ली पर किये गए खिलजी वंश और गुलाम वंश का वर्णन है जो भारत के लिए सबसे यन्त्रणा का समय था।

" वैश्वानर" 1996 में भारतीय संस्कृति के धन और ऋण दोनों ही पक्षो को दिखाया है। लेखक ने यह प्रतिपादित किया है कि आर्यों और अनार्यों दोनों की सहायता से यह संस्कृति बनी और विकसित हुई है।

 

7. फणीश्वरनाथ रेणु :-

 हिंदी साहित्य के पाठक रेणु जी से भली-भांति परिचित होंगे। उनके बार में यहाँ किसी भी प्रकार की औपचारिक जानकारी देना उचित नहीं। केवल इतना भर कहा जा सकता है कि रेणु जी अपने अंचल विशेष की प्रवृत्ति के लिए हिंदी साहित्य में स्मरणीय हैं।

"मैला आँचल" 1954 में बिहार के पूर्णिया जिले के मेरीगंज को कथा बनाकर लिखा है। इसमें पूरा अंचल ही नायक है। यह लेखक की ख्याति का आधार स्तम्भ होने के साथ-साथ उन्हें सदैव स्मरण रखने वाली कृति भी साबित हो चुकी है। हिंदी साहित्य जगत इस अनुपम निधि के लिए लेखक की हमेशा एहसान मंद रहेगी।

"परती परिकथा " 1957 में पूर्णिया जिले के ही परानपुर गाँव की कथा को केंद्र बनाया है। आजादी के बाद के टूटते बनते बिखरते सामंती व्यवस्था और उनमें उभरते नए जनवादी मूल्यों को दिखाया है।

"दीर्घतपा" 1963 में शहरों के सफेदपोशों द्वारा रुपया कमाने के तरीकों का पर्दाफाश किया है।

" जुलूस" 1965 में बंगाल से आये शरणार्थियों की समस्या है।

" कितने चौराहों" 1966 में आजादी के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाले युवकों के संघर्ष का चित्रण।

" पलटू बाबू रोड़" 1979 कांग्रेस सरकार में फैलते भ्र्ष्टाचार का चित्रण।


8. रामदरश मिश्र :- हिंदी साहित्य की औपन्यासिक लेखन परम्परा में इनकी भी गिनती अंचल विशेष की रचनाकारों में करी जाती है।

" पानी के प्राचीर" 1961 गोरखपुर के पांडे पुरवा को केंद्र में रखकर गाँव की दारुन अवस्था दिखाई है।

" सूखता हुआ तलाब" 1972 गाँव के सूखते हुए जीवन चित्रण को बयां करता है। 

" दूसरा घर" 1986 मे भिखमंगे का बेटा कमलेश एम.ए करने के बाद भी गुजरात के महानगर में यूँही घूमता रहता है और अपने गांव को याद करता हुआ बेचैन होता है।  

                                                 

9. केशवचन्द्र मिश्र :-

"कोहबर की शर्त" 1965 बलिया जिले के 2 गाँवों "बलिहार और चौबेपुर" को केंद्र में रखकर लिखा है।


10. श्रीलाल शुक्ल :-

हिंदी साहित्य ने इसे कई रचनाकार दिए हैं जिन्हें जबतक हिंदी साहित्य रहेगा तबतक उन्हें भुलाया नहीं जा सकेगा, ऐसी मेरी समझ है। उन्हीं में से एक "श्रीलाल शुक्ल" जी हैं जो अपनी व्यंग्य धर्मिता के लिए जाने जाते हैं। वह अपनी एक ऐसी रचना के लिए प्रसिद्ध है जिसमें अंचल विशेष की नामकानियों, समस्याओं, कुरूपताओं आदि की बग्घियां उधेड़ कर रख दी हैं। उनका प्रसिद्ध उपन्यास "राग दरबारी" है।

"राग दरबारी" 1968 में यह शिवपालगंज गाँव की कथा है जो भारत के किसी गाँव की हो सकती है। भले ही मुख्य समस्या शिवपालगंज कॉलेज की है पर व्यापक रूप में समस्त अमानवीयता, अवसरवाद, छल प्रपंच आदि को दिखाता है। इसे 1969 साहित्य अकादमी से भी पुरूस्कृत किया जा चुका है।

 

" सीमाएं टूटती है" 1973 में परिवार के टूटने बिखरते सम्बन्धो को दिखाया है।

"पहला पड़ाव" 1987 गांवों में आकर शहरों में मकान बनाने वाले मजदूरों की जिंदगी का यथार्थ चित्रण किया है। बड़े-बड़े ठेकेदार और इंजीनियर उनका हर तरह से शोषण करते हैं।

" विश्रामपुर का सन्त" 1998 में राज्यपाल कुँवर सिंह को केंद्र में रखकर लिखा गया है।कांग्रेस की शासन व्यवस्था को दिखाया है।

                                                  

11.हिमांशु जोशी :-

 " कगार की आग"1976 अल्मोड़ा के लघौन गांव की दयनीय स्थिति का चित्रण।सारी सरकारी योजनाओं के बाद भी पहाड़ियों के जीवन मे कोई सुधार नहीं आया है।

                                                    

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


"हिंदी साहित्य लोचन" sahitya hindi lochan.blogspot.com पर आने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आप इसी तरह से "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आते रहे और हिंदी साहित्य से सम्बंधित अन्य तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी यहाँ पाते रहें।

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