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Tuesday, August 24, 2021

काव्यशास्त्र भाग - 7

           

                          (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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                          (पाश्चात्य काव्यशास्त्र)

● (एक भूमिका):-  पाश्चात्य साहित्य में समीक्षाशास्त्र के विकास के संकेत 5वी सदी से दिखने लगते हैं जब हेडियड, सोलन, पिण्डार आदि की रचनाओं में काव्य हेतु और प्रयोजन के चिन्ह दिखने लगे थे। एक सुबद्ध शास्त्र के संकेत "प्लेटो" के "इयोन" से दिखने लगते हैं। प्लेटो की मूल दृष्टि 'प्रत्ययवादी' के साथ अनुभव लोकोत्तर थी। चूंकि कविता बाह्य संसार से ही सामग्री प्राप्त करती है तो "वह अनुकरण का भी अनुकरण करती है"...।


प्लेटो के अनुसार कविता में वैज्ञानिकता और तर्क का अभाव होता है, वह हास्य और छिछोरे भावनाओं को उकसाती है। वही कविता ग्राह्य है जो बेहतर, आदर्श समाज की संरचना कर सकती है। जिसमें कवि गम्भीर भाव से मात्र श्रेष्ठ गुणों का अनुकरण करें। उसे देवताओँ और प्रख्यात मानवों के चरित्र को अपना विषय बनाना चाहिए। कविता को प्लेटो तभी सम्भव मानते हैं जब उस पर दैवी कृपा हो। 

प्लेटो के शिष्य "अरस्तु" ने प्लेटो की दृष्टि अनुभववादी थी परन्तु वह भी आगे चलकर अभिजात्यवादी हो गयी। प्लेटों ने जहाँ कविता को यथार्थ से दूर और उसे विकृत करने वाला बताया है वहीं अरस्तू की नजर में कविता यथार्थ से भी बढ़कर है। अरस्तू कविता को इतिहास से श्रेष्ठ मानते हुए उसे संभावना व्यक्त करने में भी मजबूत मानते हैं।

अरस्तू भी कविता को अनुकरण मानते हैं परंतु उसके साथ ही उसमें कवि की अपनी मैलिकता भी समाहित होती है। वह आंतरिक क्रियाओं को भी दर्शाती है।  कविता को अरस्तु प्रकृति से भी बढ़कर मानते हैं।

अरस्तु को प्लेटो से अलग जो विचारधारा करती है वो अरस्तु की अभिजात्यवादी विचारधारा है।

• अरस्तु के बाद रोमन कवि "होरेस" की कविताओं में साहित्य के तत्व मिलते है। ये मूलतः वस्तुपरक और शुद्धतावादी थे। होरेस औचित्य को कविता की मूल कसौटी मानते हैं। इनकी कविता की भाषा में 'उदात्त के तत्व' के साथ पुरानी शब्दावली के साथ नवीन शब्दावली के निर्माण की भी सिफारिश दिखती है। इन्होंने अरस्तु के मत की व्याख्या करते हुए 'कविता के लिए श्रेष्ठ काव्यों के अनुसरण और प्राचीन काव्य-सिद्धान्तों के अनुसरण पर भी बल दिया।'

ईसा की 1शताब्दी में "लोंजाइनस" आये जिनकी रचना "पेरीपसुस" थी। उनके अनुसार उदात्त तत्व भव्यता या विराटता में नही होता बल्कि लघुता में दिखाई देता है। इनकी मान्यताओं में वस्तुपरक शास्त्रीयता तथा आत्मपरक रोमानी दृष्टि का तालमेल दीखता है।

तीसरी शती तक आते-आते आत्मवाद तथा वस्तुवाद का पुनरुथान क्रमशः "नव्य प्लेटोवाद" तथा "नव्य अभिजात्यवाद" के रूप में होने लगा। इस समय के लगभग" पलाटीनस" ने गहन दर्शन पर आधारित सिद्धान्तों की पुष्टि की गई। इन्होंने भी प्लेटों की तरह संसार को अदृश्य अमूर्त यथार्थ की बाह्य अभिव्यक्ति माना प्लेटो के विपरीत प्लाटिन्स "कविता अनुकरण का अनुकरण नही , बल्कि परम् चैतन्य में स्थित प्रत्ययों तक पहुचती है"..। नव्य प्लेटोवाद और नव्य अभिजात्यवाद दोनों अपने गुणों के आधार पर निकट दिखते हैं जहाँ उनका आपसी सिद्धान्तवादी और शास्त्रवादी, अनुभवइतर, नियमों से बंधकर रहना बराबर ही हैं। नव्य प्लेटोवाद का प्रभाव मध्ययुगीन धार्मिक चिंतन पर भी पड़ा और आधुनिक काल में 18वीं शती के इंग्लैंड में यह कैम्ब्रिज प्लेटोवाद के रूप में उभरा।

आभिजात्यवादी और नव्य अभिजात्यवादी दोनों में कोई ज्यादा अंतर नही है। दोनों ने आत्मनिष्ठता के स्थान पर वस्तुनिष्ठता को प्रश्रय दिया और दोनों ने ही अनुकरण को बाह्य यथार्थ माना, जिसमें कवि के लिए किसी भी तरह की मौलिकता का अभाव रहता है। यह प्लेटो के सिद्धांत से मिलते हुए नजर आते हैं। दोनों ही अनुभव से इतर थे।

नव्य अभिजात्यवाद अरस्तू के अनुकरण और कवि की मैलिकता के मत के विरुद्ध एकदम सिद्धान्तवादी और आदर्शवादी था। यह सिद्धान्त अपेक्षाकृत संकीर्ण था।  इसका प्रभाव पहले साहित्येतर क्षेत्रों में दिखाई पड़ा। साहित्य के स्तर पर इसका प्रभाव पहले फ्रांस में हुआ जहाँ अरस्तु और होरेस के मतों को खूब चर्चा में लिया जा रहा था।

नव्य- अभिजात्यवादी व्यक्तिकता के विरुद्ध सफल तो हुए पर बाद में उन्होंने उन्ही लोगो को केंद्र में रखा जो अभिजात वर्ग से जुडे थे। 

17-18 वीं शती में इंग्लैंड के कुछ कवियों जैसे बेन जॉनसन, सैमुअल जॉनसन, जॉन ड्राईडन, अलेक्जेंडर पोप, जोसेफ एडीसन आदि कवियों ने अभिजात्यवाद का झंडा फहराया और अपने प्राचीन सिद्धान्तों को पुनः समाज मे स्थापित करने पर बल दिया। जॉन ड्राईडन ने तो प्राचीन क्लासिकी ग्रँथों का अनुवाद तक किया और इस परंपरा के प्रबल समर्थक थे। इन्होंने रोमानी भावुकलता के विरुद्ध "कला की कसौटी तर्क को माना ना कि स्वछन्दतावादी कवियों की तरह भाव को"..।

18वी सदी में जिस अभिजात्यवाद की स्थापना फ्रांस में हुई थी वह अभिजात्य वर्ग का ही प्रतिबिम्ब था।

पश्चिमी साहित्य में प्लेटो का असर आगे आने वाले क्लासिक, शास्त्रवादी, अभिजात्यवादी, नव्य-अभिजात्यवादी आदि सभी कवियों पर पड़ा क्योंकि यह सभी मत कहीं-कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।


● अभिजात्यवाद काव्य वृति के विरुद्ध सबसे पहले "पुनर्जागरण" के दौर में आत्मवादी समीक्षा की शुरुआत हुई जहाँ मानव को विश्व का केंद्र बनाया गया। बंधी-बंधाई नियमावली के विरुद्ध सर्जनात्मकता को बल दिया। पश्चिम के साहित्य में रूढ़ियों को तोड़ने का यह पहला प्रयास था। इस युग का प्रभाव 16वीं शती के "फिलिप सिडनी" पर भी पड़ा जहाँ उन्होंने "कवि को भविष्यद्रष्टा के रूप में देखा"।

नव्य अभिजात्यवादी व शास्त्रवाद विचारधारा के विरुद्ध 17 वी सदी से "स्वछंदतावादियो" का दौर चला। इस युग में साहित्य समीक्षा का अर्थ स्वतंत्र अनुशासन के रूप में बढ़ा। स्वछंदतावाद में विश्वास रखने वाले कवियों में सबसे प्रबल समर्थक "विलियम वर्ड्सवर्थ" है जिन्होंने कविता को "प्रबल मनोवेगों के सहज उच्छलन" की परिभाषा दी ।इसके अलावा "कॉलरिज" भी स्वछंदतावादी कहलाये हैं। इन कवियों ने भावना के साथ कल्पना को भी महत्व दिया है।

शास्त्र के विरुद्ध जो विचारधारा स्वछंदतावाद की थी वही आगे चलकर "कलावाद" की रही। 1818 में विक्टर क्रुजे ने "कला कला के लिए" का सिद्धांत दिया। इस सिद्धांत के अनुसार कला का उद्देश्य पूर्णता की तलाश होना चाहिए और कला को केवल अपने नियमो को मानना चाहिए। इसकी एकमात्र कसौटी सौंदर्य पर टिकी है जो बाह्य जगत से निरपेक्ष है। इस सिद्धान्त को अपने नियम मानने चाहिए।

"वाल्टर पेटर" तो कला के लिए नियमों को उनकी स्वतंत्रता व स्वतः स्फूर्त के लिए बाधक मानते हैं।

कला को स्वतः पूर्ण और बाह्य जगत से अलग मानने की वृत्ति "क्रोचे" अपने सिद्धान्त "अभिव्यंजनावाद" में लेके आये। कलावादियों ने बाह्य अभिव्यक्ति को नकारा नहीं था किंतु क्रोचे ने शब्द, स्वर, आकार आदि के आधार पर बाहरी अभिव्यक्ति के स्थान पर कला के लिए सहजानुभूति का समर्थन किया।

जिस अभिजात्यवादी विचारधारा को स्वछंदतावाद ने खत्म कर दिया था "मैथ्यू आर्नल्ड" उसे दोबारा से लेके आते हैं। वह अपनी संस्कृति और कविता को, अराजक समाज के लिए उपादान मानते हैं। उन्हें उन आदर्शवादी नियमों की आवश्यकता हुई जो जीवन और साहित्य दोनों को मूल्यों से अनुशासित कर सके। उन्होंने कहा था कि  "कविता जीवन की आलोचना है".....।

• "प्रतीकवाद" जिसका स्पष्ट आरम्भ 1886 में 'विलिये द लील' के नाटकों से माना जाता है परन्तु इसका सूत्रपात "बादलेयर" के समय पहले ही हो चुका था। इस सिद्धान्त का जन्म प्रकृत और जड़ यथार्थवाद के विरुद्ध हुआ था। जिसका श्रय बादलेयर को जाता है। इस सिद्धान्त की मान्यता घटनाओं, व्यक्तियो तथा बाह्य जगत के पदार्थो की अपेक्षा मानवीय संवेदना, मनोभाव तथा अनुभव पर आधारित थी। इस सिद्धांत ने साहित्य के शिल्प और पारम्परिक साहित्य-रूपों का त्याग करके जड़-तुक का विरोध किया पर इसके साथ प्रगीतात्मक का समर्थन किया।

प्रतीकवाद का उन लोगो द्वारा विरोध हुआ जो आभिजात्य-और जड़वादी होने के साथ-साथ कविता के मुक्त होने के पक्ष में नही थे। इसलिए इस सिद्धांत को विरोधियो द्वारा  "पत्ननोन्मुख काव्य आंदोलन" कहा गया।

• इंग्लैंड और अमेरिका में "बिम्बबाद" की शुरुआत  t.s hume और azra pound  जैसे कवि लेके आये। यह मत मुख्यतः अति-स्वछंदतावाद और प्रतीकवाद के अतिरेक के विरुद्ध आया था। इनका उद्देश्य आम बोलचाल की भाषा और सटीक प्रतीकों के इस्तेमाल पर था।

• "नई समीक्षा" जैसी विचारधारा को "इलियट और रिचर्डस" लेके आये। ये बात अलग है कि 1941 में "जॉन क्रो रेन्सम" के इसी शीर्षक से ये नाम आलोचना के लिए रूढ़ हुआ। वैसे प्रवृति के अनुसार "नयी समीक्षा" के जनक इलियट ही माने जाते हैं। यह मत भी रोमांटिसिज्म के विरुद्ध आया था।

कुछ इस तरह से हम पाश्चत्य काव्यशास्त्र के इतिहास पर एक सीधी-सपाट नजर फेर सकते हैं।


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Tuesday, August 17, 2021

काव्यशास्त्र भाग -6

                        

                         (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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                  (कुंतक व वक्रोक्ति सिद्धान्त)



● वक्रोक्ति का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-


वक्रोक्ति शब्द "वक्र" तथा "उक्ति" से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है 'सीधा सपाट न बोलकर तिरछा बोलना।'

• परिभाषा:- इसकी पहली परिभाषा भामह ने अपने काव्यालंकार में लोकोत्तर वचन या अनूठी उक्ति के रूप में स्पष्ट की थी।

• कुंतक के अनुसार वक्रोक्ति लोक प्रचलित सामान्य कथनों से भिन्न, अनूठी और विचित्र अभिव्यक्ति का अर्थ है।


● आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति सिद्धान्त की स्थापना 10वीं शती में इसे "काव्य की आत्मा" घोषित करते हुए अपने ग्रँथ "वक्रोक्ति जीवितम" में इसके महत्व को प्रतिपादित किया था।तभी से काव्यशास्त्र के अंतर्गत वक्रोक्ति के महत्व को और भी सम्मान मिलने लगा।

कुंतक के अनुसार, कथन की वक्रता या भाषा की भंगिमा नैसर्गिक है जो शुरू से ही काव्य का तत्व रहा है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि " प्राचीन ग्रँथों में भी इसके उदाहरण मिल जाएंगे जहाँ पात्र अपनी बात को एक अलग अंदाज में कहते हुए मिल जाएंगे। जैसे रामायण और महाभारत आदि।

वक्रता के पहले पहल उदाहरण भामह के "काव्यालंकार" में मिल जाएंगे जहाँ उन्होंने वक्रता पर चर्चा करते हुए काव्य की मूलाधार वक्रता को ही माना ।

वामन ने वक्रोक्ति को अर्थालंकार के रूप में देखा तो वहीं रुद्रट ने उसे शब्दालंकार कह कर उसके 2 भेद बताए हैं :-

1. काकू वक्रोक्ति ।  

2. श्लेष वक्रोक्ति।


• दण्डी ने शब्द और अर्थ समन्वित सौन्दर्य को वक्रोक्ति कहा और इसी को काव्य-शोभा का नाम दिया।

● आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति के 6 भेद माने है:-

1.वर्ण-विन्यास वक्रता

2.पद-पूर्वार्ध वक्रता 

3.पद-परार्ध वक्रता

4.वाक्य वक्रता

5.प्रकरण वक्रता

6.प्रबन्ध वक्रता




                (क्षेमेन्द्र व औचित्य सिद्धान्त)



● औचित्य का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-

"उचित" विशेषण से औचित्य बना है जिसका अर्थ है कविता रचते समय या किसी भी रचना करते समय उचित तत्वों का संकलन व प्रयोग। 


● परिभाषा :- काव्य के विभिन्न उपादानों जैसे रस, अलंकार, रीति, वाक्य, वस्तु आदि का संतुलित उपयोग किया जाए तो वह औचित्य कहलाएगा।

औचित्य मुख्य रूप से काव्य के सभी तत्वों का संतुलित इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है, यह कोई स्वतंत्र तत्व नहीं।

● आचार्य क्षेमेन्द्र द्वारा 11वीं शती में "औचित्य सिद्धान्त" की स्थापना करके अपने ग्रन्थ "औचित्य विचारचर्चा" में उसे काव्य की आत्मा सिद्ध किया गया।

औचित्य सिद्धान्त के सबसे पहले लक्षण भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलते हैं जहाँ कविता में उसकी उपयुक्तता, अनुपयुक्तता, संतुलित तत्वों पर विचार किया गया।  इसके आगे आनन्दवर्धन ने औचित्य को रस का मूलाधार बताकर आगे आने वाले आचार्यो के लिए बड़ा कार्य किया।

11वीं शती में आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रँथ "औचित्य विचार चर्चा" में इस सिद्धान्त का पहला व्यवस्थि प्रतिपादन किया।

• क्षेमेन्द्र ने औचित्य के 27 भेद माने है।


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Sunday, August 15, 2021

काव्यशास्त्र भाग -5

     

                             (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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                   (वामन व रीति सिद्धान्त)    


● रीति का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-

रीति शब्द मूल शब्द "री" में "कितन" धातु जुड़कर बना है। जिसका अर्थ होता है मार्ग, शैली, पद्धति इत्यादि। अर्थात किसी कार्य करने की शैली, कविता रचने की पद्धति या रचनात्मकता के लिए अपनाया गया मार्ग। क्योंकि किसी भी कार्य करने की एक विधि होती है जिसके तहत ही हम अपने कार्य को अंजाम तक पहुँचा पाते हैं। इसी को काव्यशास्त्र की भाषा में कविता रचने के लिए 'रीति' शब्द कहा जाता है।

• वामन से पूर्व रीति शब्द के लिए "मार्ग" शब्द का प्रयोग किया जाता था।

• रीति शब्द के स्थान पर अन्य नामों का प्रयोग :-

कुंतक ने रीति के स्थान पर "मार्ग" और आनंदवर्धन ने  "संघटना" और मम्मट ने "वृति" शब्द का इस्तेमाल किया है।


● परिभाषा:- कोई भी कवि अपने व्यक्तित्व के आधार पर ही कविता करता है। मतलब की जिया तरह से रचनाकार का पालन-पोषण हुआ होगा, उसने समाज से, अपने आसपास के वातावरण से जो भी और जिस भी रूप में ग्रहण किया होगा उसकी बुनावट भी उसी रूप के अनुकूल हुई होगी। अर्थात उसका मन-मष्तिष्क उसी दिशा में कार्यरत होगा। तो इसी को आसान भाषा में हम रचनात्मकता से जोड़कर देखते हैं जिसकी निष्पत्ति रचनाकार के संस्कारो से होती है।

यदि रचनाकार कोमल भाव का होगा तो उसकी कविताओं के भाव भी कोमल ही होंगे और अगर उसके भाव कठोर होंगे तो कविता में भी इसी तरह के भावों की अभिव्यक्ति होगी। परन्तु साहित्य की दृष्टि में रीति सिद्धान कुछ अलग अर्थों में अपना स्वरूप रखता है। 

आचार्यों का मत है कि 'साधारण शैली के स्थान पर विशिष्ट शैली से युक्त कविता की रचना करना ही रीति है।' अर्थात कुछ ऐसा जो कविता में नयापन ला दे। उसकी चमक-धमक को और गुना बढा दे। यदि कविता सीधेपन और अलंकार के अभाव में होगी तो उसका महत्व कम होता दिखेगा। इसलिए कविता में एक ताज़गी और विशेषपन रहना अनिवार्य है। इसी शैली को काव्यशास्त्र के अंतर्गत रीति कहा गया है।

● आचार्य वामन ने रीति सिद्धान्त की स्थापना 8वीं शती में करके इसे "काव्य की आत्मा" स्वीकारा (रीतिरात्मा काव्यस्य) और काव्य की परिभाषा देते हुए इसे "विशिष्ट पद रचना" कहा। अर्थात शब्दगुण और अर्थगुण के विशिष्ट प्रयोग से बने पद को काव्य कहते हैं।


● रीति को गुण सम्प्रदाय भी कहा जाता है। जिसके 2 भेद हैं:-  

शब्द गुण 10

अर्थ गुण 10


● रीति के भेद:- 

वामन के अनुसार "काव्यालंकार सूत्रवृति" में इन्होंने रीति की 3 शैलियाँ मानी है :-

(वैदर्भी, गौणी, पांचाली)


• कुंतक ने रीति को मार्ग का नाम देकर उसके 3 भेद किये हैं:- 

1. सुकुमार मार्ग- रस , प्रसाद और माधुर्य गुण की कविता के लिए।

2. विचित्र मार्ग- अलंकार व ओजगुण की कविता के लिए।

3. मध्यम मार्ग- जहाँ सभी का समावेश हो जाता है।


• भोजराज ने 6 रीतियों का उल्लेख किया है :-

1वैदर्भी         

2 गोणिया       

3 पांचाली  

4 लाटी         

5 मागधी       

 6 अवन्ति

                      

                     

            (आनंदवर्धन व ध्वनि सिद्धान्त)


● आचार्य "आनंदवर्धन" ने ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना 9वीं शती में करके अपने ग्रँथ "ध्वन्यालोक" में इसे काव्य की आत्मा के रूप में सर्वप्रथम विवेचित किया है। इस सिद्धान्त के माध्यम से आनंदवर्धन व्यंजना शब्द पर आधारित ध्वनि को एक विशिष्ट अर्थ में प्रयोग करना चाहते थे। 

इन्होंने ध्वनि के 3 भेद बताते हुए उसे "वस्तु ध्वनि" "अलंकार ध्वनि" और "रस ध्वनि" में बांटा है।


● ध्वनि सिद्धान्त को आगे विकसित करने का कार्य "अभिनवगुप्त" द्वारा उसकी टीका "ध्वयनालोक लोचन" लिखकर किया गया है।

• भोजराज ने ध्वनि को "तातपर्य वृति" से जोड़कर दिखाया है।

• ध्वनि के शुद्ध भेदों की संख्या 51 बताई है जिसकी पुष्टि आचार्य विश्वनाथ के "साहित्य दर्पण" में भी की गई है।



● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Monday, August 9, 2021

काव्यशास्त्र भाग- 4

     

                         (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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                (भामह व अलंकार सिद्धान्त)


• अलंकार का अर्थ : साहित्यिक दृष्टि से अलंकार शब्द का निर्माण इस तरह से हुआ है - "अलम" शब्द का अर्थ है "भूषण" और उसमें "कृ" धातु उसकी क्रिया को सम्प्रेषित करता है। जिसका अर्थ हुआ भूषित करना या सजाना। अर्थात साहित्यिक दृष्टि से कविता को सजाना। 

उदाहरण के रूप में जैसे एक नायिका या नायक अपने को सुंदर बनाने के लिए तरह-तरह के उपकरण व अन्य सौंदर्य पदार्थ इस्तेमाल करता है ठीक उसी प्रकार से कविता को सौन्दर्यमयी व जादुई बनाने के लिए उसे अलंकारों से सुसज्जित किया जाता है। इससे कविता में एक नई रवानगी पैदा होती है और पाठक वर्ग के अन्तःस्थल को प्रभावित करती है। इसलिए बड़े-बड़े विद्वानों ने काव्य में अलंकार की उपयोगिता को आवश्यक माना है। जिसे कुछ आचार्यों में काव्य की आत्मा तक घोषित कर दिया है। इनमें प्रमुख हैं - "भामह".....।


●  अलंकार की परिभाषा :- 

1. "दण्डी" के अनुसार :- काव्य-सौंदर्य करने वाले सृजनात्मक गुणों का धर्मो को ही अलंकार कहा जाता है।

2. "रुद्रट" के अनुसार अभिव्यक्ति के विशिष्ट प्रकारों को ही अलंकार कहते हैं।


● अलंकार सम्बन्धी विभिन्न विद्वानों के मत :-

• भामह ने अपने ग्रँथ "काव्यालंकार " में "वक्रता" को वह तत्व दिया है जिसके द्वारा अर्थ सौंदर्य और शब्द सौंदर्य अभिन्न होकर काव्यालंकार की सृष्टि करते हैं। इन्होंने ही सबसे पहले अलंकार को रस से अलग करके अलग सम्प्रदाय बनाया और काव्य की आत्मा से उसकी तुलना की । उसे काव्यशास्त्र के अंतर्गत प्रमुख महत्व दिया।

भामह ने अपने अलंकार सिद्धान्त की स्थापना 6ठी शती में करके इसे काव्य की आत्मा माना है और वक्रोक्ति को अलंकार का मूलाधार माना है।

दंडी ने भी अलंकार को ही काव्य का मूल तत्व माना है।

• काव्य की परिभाषा देते हुए भामह ने " शब्दार्थों सहितौ काव्यम" कहा अर्थात शब्द और अर्थ का समन्वय।

• रुद्रट ने अपने ग्रँथ "काव्यालंकार" में अलंकारों का सबसे पहले 'वैज्ञानिक ढंग से विवेचन' किया है।

• मम्मट काव्य सौंदर्य के लिए अलंकार को 'अनिवार्य नहीं' मानते। 

• आचार्य विश्वनाथ ने मम्मट के मत का खंडन करते हुए "उत्तम काव्य में भी दोष गिनाए हैं। उनका मत है कि सर्वथा निर्दोष रहित काव्य दुर्लभ है"..।

भामह से लेकर रुद्रट तक के काल को अलंकार सम्प्रदाय का 'स्वर्णयुग' कहा जाता है।


●भामह ने अपने ग्रन्थ "काव्यालंकार" में 6 परिच्छेद बताए हैं जिसके 2-3 परिच्छेद में अलंकार निरूपण किया है।

● अलंकार काव्य की सुंदरता है तो अलंकार्य उस सुंदरता को दिखाने वाले तत्व या स्रोत।


● अलंकार के भेद :-

1. शब्दालंकार - अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनुरुक्ति।

2. अर्थालंकार- उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, विभावना आदि


●अलंकारों की संख्या विद्वानों के अनुसार :-

भरतमुनि - 4  उपमा, रूपक, यमक, अनुप्रास 

मम्मट -   67/61

रुय्यक -  78/75

विश्वनाथ -  78

जयदेव -  100

अपयदीक्षित -124/125


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Saturday, August 7, 2021

काव्यशास्त्र भाग - 3

    

                          (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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                  (भरतमुनि व रस सिद्धान्त)


● रस का अर्थ,परिभाषा व स्वरूप :-

"रस" शब्द को सुनते ही सबसे पहले किसी भी सामान्य व्यक्ति के दिमाग में चित्र बनेगा वह एक तरल पदार्थ होगा। जोकि स्वाद के साथ होगा और ज्यादातर लोग उसे मीठे रूप में देखेंगे। वहीं दूसरी ओर रस शब्द का एक और सामान्य से थोड़ा ऊपर उठकर, कुछ पढ़े-लिखे समाज में इसका अर्थ आनंद से भी जोड़कर देखा जाएगा।

परन्तु जब हम साहित्य विशेष की बात करते हैं तो 'रस' शब्द का अर्थ हम मानव-शरीर में होने वाले या आने वाले, निहित भावों, फिलिंग, इमोशन्स आदि से लेते हैं।

वही रस शब्द शास्त्रीय इतिहास प्राचीन भारतीय शास्त्रों जैसे ऋग्वेद में सोमरस के रूप में मिलता है। उसके बाद ब्राह्मण ग्रँथ में छंद रस और काव्य रस के रूप में हुआ भी।


• रस शब्द "रस" धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ है आस्वादन करना। काव्यशात्रीय प्रणाली रूप से काव्यास्वादन करना ही रस का आस्वादन करना है।

• परिभाषा:- जब नट (अभिनेता) रंगमंच पर किसी नाटक की भावपूर्ण, कलात्मक प्रस्तुति करते हैं तो विभाव, अनुभव और व्याभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस निष्पत्ति होती है"..।

• आचार्य भरतमुनि द्वारा "रस सिद्धान्त" की स्थापना तीसरी शती में करके अपने ग्रँथ "नाट्यशास्त्र" में रस को कविता की आत्मा बताया है। रस सिद्धात की व्यवस्थित व्याख्या करते हुए उसे रस निष्पत्ति के रूप में "विभावनुभावव्यभिचारी संयोगादरसनिष्पत्ति" का सूत्र दिया था।

भरतमुनि के ग्रन्थ  "नाट्यशास्त्र" में 36 अधयाय है जिसके 6ठे अध्याय में भरतमुनि बताते हैं 'सहृदय प्रेक्षक स्थायी भावों का ही विविध रसों का आस्वादन करते हैं।'

भरतमुनि के अनुसार 8 स्थायी भाव, 33 संचारी भाव, 8 सात्विक भाव हैं।


● रस के 4 अंग:- स्थायी भाव, विभाव, संचारी भाव और अनुभाव।

निष्कर्ष :- 

1.भरतमुनि का रस विषयक चिंतन वस्तुगत व विषयगत है।

2. रस आस्वाद्य है नाकि आस्वाद।

3. रस अनुभूति की प्रक्रिया है नाकि अपने आप में किसी तरह की अनुभूति।


                 (रस सम्प्रदाय और उनके व्याख्याता)


(आ). भट्टलोलट का उत्तपत्तिवाद/ उपचयवाद/ आरोपवाद/मीमांसा वाद :- 

इन्होंने रस की व्याख्या करते हुए अपने मुख्य बिंदुओं को इस प्रकार वर्णित किया है :-

1. किसी कारण विशेष से ही रस की उतपत्ति होती है। 

2. इसमें दर्शको द्वारा ही अभिनेताओं को अपने अभिनित रूप में आरोपित करके उसी पात्र (राम आदि) में मान लिया जाता है। जिसे आरोपवाद कहते हैं। अर्थात राम का किरदार निभाने वाले को सही अर्थों में राम समझ लेना और नाटक का आनंद लेना।

3. भट्टलोलट ने रस निष्पत्ति का अर्थ "उतपत्ति" माना है।

4. यह 'मीमांसा दर्शन' से प्रभावित थे।

5. भटलोलट के मत की व्याख्या मम्मट ने की है।


(बा). शंकुक का अनुमितिवाद/अनुकरण/न्याय दर्शन  :-


1. इनका मत है कि इसमें दर्शक अभिनेता पर किसी पात्र का आरोप न करके उसे उस पात्र का अनुकर्ता मान लेता है और उसी रूप में भाव को ग्रहण करता है।

2. "चित्र तुरंग ज्ञान" का उपयोग इसी व्याख्या के लिए किया जाता है जिसका अर्थ होता है कि हम जिस रूप में देखते हैं उसी का अनुकरण कर लेते हैं।

3. शंकुक का मत :- 

सहयोग का अर्थ -अनुमान, रस निष्पत्ति का अर्थ- अनुमिति।

4. इनका दर्शन 'न्याय दर्शन' से जुड़ा है।


(सा).भटनायक का भुक्तिवाद/साधारणीकरण/सांख्य दर्शन:-


1. इनका दर्शन 'सांख्य दर्शन' पर आधारित है।

2. यह मानते हैं कि न तो रस की उतपत्ति होती है और न ही अनुमिति। उसका साधारणीकरण होता है। अर्थात जब दर्शक अभिनय को देखकर या काव्य पाठन करके उसी रस की अनुभूति उसी रूप में कर लेता है और विशेषपन खत्म होकर सामान्यता की भूमिका में दर्शक और अभिनेता मिल जाये, तब जाकर साधारणीकरण की प्रक्रिया पूरी होती है।

3. साधारणीकरण के होते ही सामाजिक सत्वगुण का उदय और रजो-तमो गुण का नाश हो जाता है।

4. रस की निष्पत्ति का अर्थ "भुक्ति" से है। 

● भट्टनायक के अनुसार शब्द के 3 व्यापार हैं:-

1. अभिधा   

2. भावक्त्व    

3. भोजकत्व


(डा). अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद/शैव दर्शन/वेदांत वादी :-


1. इनके अनुसार न ही रस की उतपत्ति,अनुभूति,और न ही अनुमिति होती है। केवल अभिव्यक्ति होती है, अर्थार्त जैसा सामने अभिनय दिखेगा उसी तरह के रस की अनुभूति होगी। यदि प्रेम सौन्दर्य है तो श्रृंगार रस की उतपत्ति होगी और घृणित दृश्य है तो वीभत्स रस की अभिव्यक्ति होगी।

2. जो अभिनेता के भीतर होगा उसी की अभिव्यक्ति रंगमंच पर बाहर होगी।

3. इनका मत 'शैव मत' पर आधारित है।

4. इनका वेदांतवादी दृष्टिकोण था।


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Thursday, August 5, 2021

काव्यशास्त्र भाग -2

 

                       (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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1. काव्य हेतु :- काव्यशास्त्र के अंतर्गत कविता का निर्माण करने के लिए कवि द्वारा प्रयोग किये जाने वाले काव्य- तत्व ही "काव्य हेतु" कहलाते हैं। अर्थात सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि किसी भी कविता की निर्मिति उस कवि द्वारा प्रायोगिक सभी तरह के नियम, कायदे-कानून, अनुशासन, बंधन, विराम चिन्ह, पूर्ण विराम, अर्धविराम, तुक, लय, अलंकार, छंद आदि सभी काव्य तत्वों का एक्सपेरिमेंट ही काव्य हेतु के अंतर्गत आता है। अर्थात कविता के लिए उपयुक्त अंग...।


• आचार्यो द्वारा काव्य हेतु के तत्व:-

1. भामह व आनंदवर्धन के अनुसार प्रतिभा ।

2. दंडी के अनुसार अभ्यास और प्रतिभा ।

3. वामन के अनुसार लोक, विद्या और प्रकीर्ण ।

4. रुद्रट के अनुसार शक्ति ।

5. मम्मट के अनुसार शक्ति, लोक व्यवहार, शास्त्र ।


2. काव्य प्रतिभा :- कवि में प्रतिभा का होना ही उसकी काव्यगत प्रतिभा के दर्शन देता है। अर्थात जबतक प्रतिभा नहीं होगी कला की सर्जना करना असंभव है।

न केवल साहित्य में ही ऐसी मान्यताएँ है कि कवि दैवीय शक्ति का अनुकर्ता होता है या उसमें जन्मजात ही कुछ ऐसे विशेष गुण होते हैं जो उसे असाधारण बनाता है, बल्कि समाज में भी आप लंबे समय से सुनते-देखते आ रहे होंगे कि उस व्यक्ति में कोई तो खास गुण है जो फलाने कार्य में कुशल है। 

हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक व सबसे प्रसिद्ध हिंदी साहित्येतिहासकार "आचार्य रामचंद्र शुक्ल" जी ने कबीर के संदर्भ में कहा ही है "प्रतिभा में बहुत प्रखर थी.....।" पश्चिमी दार्शनिक "प्लेटों" ने जहाँ एक तरफ रोमांटिक कविता को समाज विरोधी कहकर उसे जड़ से उखाड़ फेंकने की बात कही है वहीं स्वस्थ कविता के प्रति आदर भाव से स्वीकार भाव दिखाया है। वह भी कहते हैं कि कवि (कलाकार) दैवीय शक्ति से प्रेरित व लैस होता है। 

इन बातों से हम समझ सकते हैं कि हमारे काव्यशास्त्र के प्रणेताओं ने जो काव्य -प्रतिभा का ढाँचा गढ़ा है वह उसमें किसी विशेष भाव के रूप में है। जबतक उसका बीज अंकुरित नहीं होगा कविता की सर्जना नहीं होगी। इसलिए कविता रचने के लिए प्रतिभा का होना आवश्यक है।


• आचार्यो द्वारा प्रतिभा के तत्व:-

1. "भट्टतौत" के अनुसार कवि की अनुभूति व अभिव्यक्ति।

2. "राजशेखर" के अनुसार चयन से लेजर संयोजन तक कि प्रक्रिया, जिसे उन्होंने कार्य व्यापार का नाम दिया है।  इसे 2 भागों में बाँटते हैं :-


भावयित्री:- कवि में जन्म आधारित। कवि से जुड़ी है।

कारयित्री:- सहृदय, पाठक या आलोचक से जुड़ा।


3. काव्य प्रयोजन :- कविता का लक्ष्य और अपने लक्ष्य तक पहुँचना ही उसका प्रयोजन है। 

हम जब भी किसी कार्य को करते हैं और उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाना चाहते हैं तो उसका एक कारण होता है जिसकी पूर्ति करना हमारा उद्देश्य होता है। उसी कार्य की सिद्धि और लक्ष्य प्राप्ति ही हमारा प्रयोजन होता है। इसे और सरल भाषा में ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब लेखक लेखन कर रहा होता है तो वह किसी निश्चित पाठक वर्ग के लिए लिख रहा होता है, ऐसे ही कोई चित्रकार, फिल्मकार, गीतकार, आदि अपनी कला को किसी निश्चित ऑडियंस के लिए रचते हैं। और उसी ऑडियंस तक उसको पहुँचाना उनका प्रयोजन होता है। 

एक पंक्ति में काव्य प्रयोजन का अर्थ है ' कविता किसके लिए और क्यों लिखी जा रही है, हम उससे क्या दिखाना, जताना चाहते हैं...।'


• आचार्यो द्वारा काव्य प्रयोजन के तत्व :-

1. "भरतमुनि" के अनुसार थकी-मांदी, दुखी जनता की पीड़ा का परिहार और उसका कल्याण करना।

2. "भामह" के अनुसार काव्य को शास्त्र के नीरस और दुर्बोध से बाहर निकालकर सरस बनाना।

3. "वामन" के अनुसार कवि को कीर्ति मिलना और सहृदय को कविता से आंनद प्राप्त होना।

4. "कुंतक" के अनुसार सदव्यवहार व औचित्य का बोध कराना।

5. "तुलसी" के अनुसार स्वान्त सुखाय और लोकमंगल की स्थापना करना।

6. "मैथिलीशरण गुप्त" के अनुसार मनोरंजन के साथ उपदेश देना।

7. "शुक्ल" के अनुसार लोकमंगल की भावना होना चाहिए।

8. "हजारीप्रसाद" के अनुसार मानव मूल्यों की स्थापना।

9. "नंदुलारे वाजपेयी" के अनुसार कवि का आत्मोत्थान करना।

10. "नगेंद" के अनुसार कवि का आत्माभिव्यक्ति करना।

11. "प्लेटो" के अनुसार मानव के आंतरिक गौरव व सौंदर्य का उदघाटन करना।

12. "शिलर" के अनुसार पाठक को आह्लादित करना।

13. "मैथ्यू आर्नल्ड" के अनुसार काव्य में नैतिकता हो।

14. "रिचर्ड्स" के अनुसार काव्य में नैतिकता व आनंद हो।

 

● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Tuesday, August 3, 2021

काव्यशास्त्र भाग - 1


                        (काव्यशास्त्र) 


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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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● काव्यशास्त्र की बात करने से पूर्व हमें उस शब्द विशेष की जानकारी रखना अपेक्षित है जिसकी चर्चा यहाँ की जा रही है।

ध्यान देने पर पता चलता है कि,  शास्त्र शब्द "शास" से बना है जिसका अर्थ शासन करना, निर्देश देना, शिक्षा देना। सरल भाषा में हम देख पाते हैं कि किसी भी कार्य करने की विधि या व्यवस्था को चलाने की जो लिखित, नियमावली व सिद्धान्तों के तहत की गई संरचना है, वह शास्त्र का रूप होती है। जिसके आधार पर हम अपने कार्य की सिद्धि करते हैं। 

आपने अपने घर-परिवार व आसपास के वातावरण में भी महसूस किया होगा, सुना-समझा होगा कि समय-समय पर कहा जाता रहा है कि 'हमारे शास्त्रों में यह कहा गया है, वह कहा गया है, शास्त्रों के अनुसार ऐसे किया जाता है या वेसे किया जाता है।' इनका इस्तेमाल हम आज भी उसी रूप में करते हैं जिससे की हमारे काम अच्छी तरह से संपन्न हो सके। न किसी बाधा के और न किसी परेशानी के।

अपने शास्त्रों पर आस्था या विश्वास रखना किसी भी धर्म-जाति-समुदाय आदि का परिचय देना होता है की, आज भी उन गर्न्थो का क्या महत्व है हमारे जीवन में। उन ऋषियों-मुनियों-विद्वानों ने जो प्राचीन समय में दूरगामी दृष्टि रखते हुए जिन नियमों-व्यवस्थाओं को लिपिबद्ध किया उनका आज भी यथासंभव इस्तेमाल-प्रयोग हो रहा है। 

शास्त्रियों द्वारा इन गर्न्थो की देन किसी भी स्वस्थ समाज की जडीबुटी साबित हो सकता है यदि आज भी हम उससे अपने सरोकारों को सिद्ध कर पाते हैं या उनकी प्रासंगिकता समझते हैं। अब ज्यादा लम्बी बात न खींचते हुए मैं हिंदी साहित्य में काव्यशास्त्र के रूप को रखने की कोशिश कर रहा हूँ।


• काव्यशास्त्र का अर्थ है "किसी भी काव्य को पूर्ण रूप देने की सिद्धान्तों व नियमों की लिखित सामग्री "..। अर्थात कविता के अनुशासन के लिए नियमावली व सैद्धान्तिकी व तर्क और वस्तुनिष्ठ से जुड़ा होना है।

• काव्य का अर्थ "कवि आत्मपरक अभिव्यक्ति है"..। उसमें उसके बिम्बमयी रसात्मकता का चित्रण किया जाता है। यह भावना से जुड़ी है।              


● काव्य की परिभाषा चिंतकों के अनुसार :- 

1. "शब्दार्थों सहितौ काव्यम"- भामह (काव्यालंकार)

2. "ननु शब्दार्थों काव्यम" -रुद्रट (काव्यालंकार)

3. "विशिष्ट पद रचना"- वामन (काव्यलांकर सूत्र वृति)

4. "शब्दार्थों सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनी" - कुंतक (व्रकोक्ति जीवितम)

5. "तद दोषों शब्दार्थों सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि" अर्थात दोषरहित, गुणसहित, अलंकारयुक्त, किंतु अलंकार रहित भी शब्द और अर्थ काव्य कहलाते हैं। - मम्मट


6. "वाक्यं रसात्मक काव्यम" - आचार्य विश्वनाथ

7. "रमणियार्थ प्रतिपादक शब्द काव्यम" - पं जगन्नाथ


8. "अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है"..।महावीर प्रसाद द्विवेदी

9. "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है उसी प्रकार से हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए  मनुष्य की बानी जो शब्द विधान करती है, उसे कविता कहते हैं"..।   शुक्ल (चिंतामणि भाग -1)

10. "काव्य तो प्रकृत मानव अनुभतियों का नैसर्गिक कल्पना के सहारे ऐसा सौंदर्यमय चित्रण है, जो मनुष्यमात्र में स्वभावतः भावोच्छवास और सौंदर्य उतपन्न करता है"..।  नंदुलारे वाजपेयी (आधुनिक साहित्य में)

11. "काव्य आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति है, जिसका सम्बन्ध विश्लेषण या विज्ञान से नहीं"..।    प्रसाद (काव्यकला और अन्य निबन्ध से)

12.  "काव्य कवि की भाव-प्रधान मानसिक प्रतिक्रियाओं की कल्पना के ढाँचे में ढली हुई श्रेय की प्रेयरूपा प्रभावोत्पादकता अभिव्यक्ति है।        (गुलाबराय)

13. "ज्ञान राशि का संचित कोष ही कविता है"..। (नगेंद्र)


14. "कविता शासक और मृत्यु के समान है".।(प्लेटो)

15. "काव्य प्रकृति का अनुकरण है"..।(अरस्तु)

16. "काव्य उदात्त भाव की अभिव्यक्ति है"...।(लोंजाइनस)

17. "कला जीवन की आलोचना है"..।(मैथ्यू आर्नल्ड)

18" प्रबल मनोवेगों का उच्छलन है"..। (वर्ड्सवर्थ)

19. "कविता आत्माभिव्यक्ति की सहजानुभूति है"..। (क्रोचे)

20. "कविता कवि की अभिव्यक्ति नहीं उसके पलायन है"..। (इलियट)

21. "कविता छंदोंमयी रचना है"...। (जॉनसन)

22. " कविता सौंदर्य की लयात्मक सृष्टि है"..। (एडगर एलन पो)


आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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एक मध्यवर्गीय कुत्ता

  आज पढ़िए व्यंगय विधा के गुरु हरिशंकर परसाई का लेख "एक मध्यवर्गीय कुत्ता" जोकि मध्यवर्ग की धज्जियां उड़ाता है।  लेख का मकसद मध्यवर्...