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Tuesday, December 29, 2020

गोदान


● गोदान में आये मुख्य गाँव व उनसे जुड़े मुख्य पात्र :- 

सेमरी - रायसाहब और अमरपाल सिंह 

बेलारी - होरी 


● पात्र योजना:-

1. कामता - बड़ा बेटा 

2. जंगी - छोटा बेटा   (भोला के बेटे)

3. सोभा - छोटा भाई

4. हीरा - बड़ा भाई     (होरी के भाई)

5. पुन्नी - हीरा की पत्नी 

6. गोविंदी - मिस्टर खन्ना की पत्नी

7. मिस्टर खन्ना - बैंक मैनेजर 

8. मि. तन्खा - वकील , बीमा दलाल 

9. ओंकारनाथ  - बिजली पत्रिका के सम्पादक

10. पं. गोसेराम - कारकुन साहब

11. झिंगुरीसिंह - नोहरी से दूसरा विवाह करने वाले 

12. सुंदरिया - गाय का नाम

13. मटरू - गाय के कल्पित बछड़े का नाम  

14. गण्डासिंह - दरोगा

15.  पंडित नोखेराम

16. मालती, सरोज और वरदा, मीनाक्षी - राय साहब की बेटियाँ

17. भीष्म - गोविंदी और खन्ना का बेटा

18.  लल्लू - झुनिया का पहला बेटा

19. दोहरी - झुनिया का प्रसव कराने वाली महिला

20. मथुरा - सोना का पति

21. रुद्रपाल सिंह - सरोज का पति, मालती की बहन

22. मीनाक्षी - दिग्विजय की पत्नी

23.  मंगल - झुनिया का दूसरा बेटा

24.  रामू- सिलिया का बेटा

25. नोहरी - भोला की दूसरी पत्नी

26. सिलिया चमारिन

26.  पं. दातादीन

27 मातादीन - दातादीन का बेटा और सिलिया का पति


● गोदान : प्रमुख कथन

1. " जिस घर में पेट भर रोटियाँ भी न मिले उसकी इतनी खुशामद क्यों? "...। (धनिया)

2. " जो मालिक प्रजा को न पालें , वह कोई आदमी है? " (होरी)

3. " अपना धर्म यह नहीं है कि मित्रो का गला दबायें"..। (होरी- भोला से गाय लेने से इनकार करने पर)

4. " यह तुम रोज रोज मालिको की खुशामद करने क्यूँ जाते हो?"...। (गोबर- होरी को कहता है)

5. " हमारा जन्म तो इसलिए हुआ है कि अपना रक्त बहाएं और दूसरों का घर भरे "...। (रामलीला के दौरान पैसे देने की चिंता-होरी)

6. " औरत को सबकुछ दे पर रूप न दे"...। (चौधरी- होरी से - जो बांस काटने आया होता है)

7. " नारी का धर्म है कि गम खाए"..। (दातादीन - धनिया से)

8. " मुझे उन लोगों से कोई दिलचस्पी नही जो बातें तो कम्युनिस्ट सी करते हैं परंतु रहते हैं एकदम रईस की तरह"...। (मेहता)

9. " मैं इसे स्वीकार करता हूँ की किसी को भी किसी दूसरे के श्रम पर मोटा होने की जरूरत नही"....। (रायसाहब - मेहता से)

10. " मैं नकली जिंदगी का घोर विरोधी हूँ"...। (मेहता)

11. " मैं इस सिद्धांत का हमेशा समर्थक हूँ कि संसार में छोटे- बड़े हमेशा रहते हैं और होने चाहिए, अन्यथा मानवजाति का सर्वनाश हो जाएगा"....।  (मेहता)

12. " जिन्होंने धन और भोग विलास को जीवन का अंग बना लिया वो क्या लिखेंगे"...।(ओंकारनाथ - मालती के लिए)

13. "साहित्य की सेवा अपने जीवन का ध्येय है और रहेगा"..।(ओंकारनाथ)

14. " दौलत के पुजारी तो गली-गली मिलेंगे , मैं सिद्धान्त का पुजारी हूँ"...। (ओंकारनाथ -मालती से)

15." राजनीति के सामने न्याय को कौन पूछता है?"..।   (ओंकारनाथ)

16. " मैं उस आदमी को आदमी नहीं समझता जो देश के लिए उद्योग और बलिदान न दे"...।  (रायसाहब- स्वयं को)

17. " गड़े रुपये न निकले चाहे कितना ही सूद बढ़ता रहे"..।(झिंगुरीसिंह- होरी से)

18. " जेल से सुराज न मिलेगा, सुराज मिलेगा धर्म और न्याय से"...। (धनिया- गाय मरने पर दरोगा को पैसे न देने पर)

19. "हमको कुल प्रतिष्ठा इतनी नही प्यारी की एक जीव की हत्या कर डालते। उसकी बाँह पकड़ी है मेरे बेटे ने"..। (धनिया - दातादीन से)

20. " लड़की तो हमारे बिरादरी में कुँवारी नही रही, पर मैं बेटी की हत्या नही कर सकता"...। (होरी- पटेश्वरी से झुनिया को बाहर न निकलने पर)

21. " नीच जात लतियाये अच्छा"...। (दातादीन)

22. "संसार तो भय के बल से चलता है। समाज का अंकुश जाता रहे तो देखो क्या क्या होता है"...। (दातादीन- धनिया के लिए झुनिया को न निकलने पर)

23. " पंचो गरीब को सताकर सुख न पाओगे"...। (धनिया)

24. "बिरादरी का वह आतंक था कि अपने पीठ पर  लादकर अनाज ढोह रहा था"...। (होरी के लिए)

25. "आदमी का बहुत सीधा होना भी बुरा है"..। (धनिया)

26. "काम सबको प्यार होता है चाम नही"...। (गोबर)

27 " नई सभ्यता का आधार धन है। (लेखक)

28. " मुझे आज नया अनुभव हुआ कि महिला की सहानुभूति हार को जीत बना सकती है"..। (मेहता- कब्बडी के समय मिर्जा खुर्शीद से)

29. " सत्य की चिंगारी असत्य को भस्म कर देती है। (मेहता- वुमेन्स लीग में)

30. " कुत्ता अगर हड्डी की रखवाली करे तो खाये क्या?"..।(रायसाहब- ओंकारनाथ से)

31. " न जाने इन महाजनों से गला छूटेगा की नही"..। (शोभा)

32. " हम जाल में फंसे हैं, जितना फड़फड़ाएंगे उतना फसेंगे"...। (होरी)

33. " सिंहनी से उसका शिकार छीनना आसान नही"..।(गोविंदी- मेहता से)

34. " उसकी वाणी में बल था। डरपोक आदमियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है।"..। (गोबर के लिए - जब वह महाजनों को होली के बाद धमका आता है)

35. " जीवन का सुख दूसरों को सुखी करने में है दुखी करने में नही"...। (गोविंदी - खन्ना से)

36. "प्रेम सीधी सादी गाय नही, खूंखार शेर है। जो अपने शिकार पर किसी को आँख भी नही गड़ाने देता"....। (मेहता- मालती से)

37. " जब तक मनुष्य रहेगा उसकी पशुता भी रहेगी"..।  (सुर्यप्रताप सिंह)


सहायक ग्रन्थ :-

1 गोदान, प्रेमचंद, वाणी प्रकाशन।     

Monday, December 28, 2020

हिंदी भाषा : भाग 7

हिंदी भाषा का विकास :

 

                                (लिपि)

● कामताप्रसाद गुरु के अनुसार :- "लिखित भाषा में मूल ध्वनियों के लिए जो चिन्ह मान लिया गया है वह भी वर्ण है परन्तु वह जिस रूप में लिखें जाते हैं वह लिपि कहलाता है"..।

● लिपि का विकास :- चित्रलिपि - प्रतिलिपि - भावलिपि - ध्वनिलिपि..।

● ध्वनिलिपि के 2 रूप हैं :- 

1 अक्षरात्मक लिपि - भारत की सारी लिपियाँ इसी रूप में है।

2 वर्णात्मक - रोमनलिपि वर्णात्मक रूप में है।


● भारत की प्राचीन लिपियाँ सिंधुघाटी लिपि, खरोष्ठी लिपि और ब्राह्मी लिपि है। ब्राह्मी लिपि की उत्तरी शैली से ही "देवनागरी लिपि" निकली है।

A "सिंधुघाटी लिपि" का प्राचीन नमूना हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता की शिलाओं पर मिलता हैं।

B "खरोष्ठी लिपि" का प्राचीन नमूना पंजाब के मानेसर और अशोक के अभिलेखों में मिलता है। यह दाएँ से बाएँ की तरफ लिखी जाती है। इसे ब्राह्मी लिपि का प्राचीन रूप भी कहा जाता है।

C "ब्राह्मी लिपि" के प्रचीन नमूने बस्ती जिले के पिपराला के स्तूप में मिलता है। यह बाएँ से दांएँ की और लिखी जाती है।इसके अर्थ और उतपत्ति के भी विभिन्न मत हैं। कोई इसे भारत से उत्पन्न मानता है तो कोई इसे विदेशी।


● ब्राह्मी लिपि के निर्माण सम्बंधी मत :-

1 यह ब्रह्मा द्वारा बनाई गई है।

2 ब्रह्म वेद(ज्ञान) की रक्षा के लिए बनाई गयी थी।

3 ब्राह्मणों द्वारा निर्मित लिपि।

4 चीनी विश्वकोश द्वारा यह किसी ब्रह्म ऋषि के आधार पर बनाई गई है।


◆ ब्राह्मी लिपि के भारत में उत्तपन्न होने पर मत :-

1. भोलानाथ तिवारी के अनुसार  "हडप्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता से निकली"..।

2. राजबलि पांडेय के अनुसार "सिंधुघाटी सभ्यता से उतपन्न"..।

3. कनिघम व डाउनसन के अनुसार  "आर्यो की पुरानी चित्रलिपि से विकसित..।


◆ ब्राह्मी लिपि के विदेश में उतपन्न होने पर मत :-

1. डॉ वुलर के अनुसार "उत्तरी सामी से विकसित"..।

2. जेम्स पिपेस के अनुसार "यूनानी से उतपन्न"..।


●देवनागरी लिपि के नामकरण पर अनेक मत:-

1पाटलिपुत्र को नागर और चन्द्रगुप्त को देव कहने से देवनागरी नाम पड़ा।

2 गुजरात के नागर ब्राह्मणों के नाम पर पड़ा।

3 "धीरेंद्र वर्मा" के अनुसार मध्ययुग के स्थापत्य की एक शैली का नाम नागर होने से "नागरी" नाम पड़ा।

4 सर्वप्रथम 7-8वी शती गुजरात के राजा "जयभट्ट" के एक शिलालेख में मिलता है।


 ●लिपि सुधार सम्बन्धी सुझाव:-

1. सर्वप्रथम बम्बई राज्य के "महादेव गोविंद रनाडे" ने लिपि सुधार समिति गठित की और सुधार का प्रस्ताव पेश किया।

2. महाराष्ट्र साहित्य परिषद पुणे ने लिपि सुधार योजना बनाई।

3. बालगंगाधर तिलक ने अपने पत्र "केसरी" 1904 में देवनागरी लिपि के सुधार की बात कही।

4. सावरकर बन्धुओ ने 12 खड़ी की शुरुआत की।

5. श्यामसुंदर दास ने पंचम वर्ण के साथ पर "अनुस्वार" (.) के प्रयोग पर बल दिया।

6. हिंदी साहित्य के इंदौर अधिवेशन 1935 में  "नागरीलिपि सुधार समिति" की स्थापना गाँधी के सभापतित्व में हुई।

7 "नागरीलिपि सुधार समिति" का निर्माण 1947 आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में हुआ। इस समिति की 9 बैठक हुई जिसकी रिपोर्ट 1949 में पेश की।

8 सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 1953 की "लिपि सुधार परिषद" का गठन हुआ।

9 शिक्षा मंत्रालय के देवनागरी लिपि सम्बन्धी प्रकाशन 

• मानक देवनागरी वर्णमाला (1966)  

• हिंदी वर्तनी का मानकीकरण (1967) 

• देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण (1983)


●देवनागरी लिपि का हिंदी भाषा में अधिकृत लिपि के रूप में विकास:-

देवनागरी लिपि को आधिकारिक स्थान मिलने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। इसके लिए न सिर्फ अंग्रेज़ो ने बल्कि हमारे देश के लोगों ने भी पूरा पूरा समर्थन भी दिया और उसकी आधिकारिक स्वीकृति के लिए तत्पर रहे। अंग्रेज़ो द्वारा हिंदी का फ़ारसी लिपि में प्रचार करना सही मायने में उर्दू का प्रचार था क्योंकि उनका सारा कार्यालयी काम फारसी में होता था और एक दम से नई लिपि को लाना और सीखना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता था। इसलिए वह फ़ारसी के समर्थन में ही रहते थे। लेकिन कुछ समय बाद से उनकी तरफ से देवनागरी लिपि के प्रयोग के लिए भी प्रयास होने लगे और लंबे समय बाद 1900 में मदनमोहन मालवीय जी के अथक प्रयासों से अदालती भाषा और राजकाज की भाषा के लिए देवनागरी लिपि को भी साथ अपनाया गया।

1. फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रथम अध्यक्ष "जॉन गिलक्राइस्ट" के समय में 3 तरह की शैलियाँ बोली जाती थी।  दरबारी या फारसी शैली, हिंदुस्तानी शैली, हिंदवी शैली। फारसी शैली इनके लिए दुरूह (मुश्किल) थी क्योंकि प्रयोगकर्ता सीमित थे। हिंदवी को यह गँवारु भाषा मानते थे इसलिए उन्होंने हिंदुस्तानी का चयन किया। वैसे सही दृष्टि से यह उर्दू का ही प्रचार था क्योंकि इस भाषा में अरबी फारसी की शब्दावली बहुत थी।

2. "कैप्टन विलियम प्राइस" की नियुक्ति फोर्ट विलियम कॉलेज, हिंदी विभाग के लिए 1823 में हुई थी और उन्होंने ही सबसे पहले नागरी लिपि में लिखने पर बल दिया। इन्होंने जॉन गिलक्राइस्ट द्वारा भाषा सम्बन्धी भ्रांति को दूर किया।

3. अदालत सम्बन्धी विज्ञप्ति (1837) :- 1830 ई. में अदालत ने देशी भाषाओं को भी अदालत में मंजूरी दे दी। वास्तव में इस विज्ञप्ति के इस्तेमाल के बाद से ही अदालतों में देशी भाषाओं को सम्मान मिला। परन्तु लिपि के आधार पर फ़ारसी ही कायम थी। देवनागरी लिपि के लिए न केवल अदालत बल्कि शिक्षा क्षेत्र से भी उसे हटाने के लिए आंदोलन होने लगे और आगे चलकर हिंदी और उर्दू के 2 भेद हो गए। जिसे बढ़ाने में केवल उर्दू के समर्थक ही मुसलमान ही नहीं थे बल्कि अंग्रेज़ो ने भी इस विवाद को बढ़ाने में कली कसर नहीं छोड़ी। जो आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम के समय में साम्प्रदायिक रूप लेने लगा और दंगे होने लगे जिसका प्रभाव आजतक बना है। 

इस विज्ञप्ति के दैरान हिंदी का प्रचार तो हुआ परन्तु उसकी लिपि को स्वीकारा नहीं गया बल्कि विरोध भरपूर तरीके से हुआ।

4. सितारे हिंद का लिपि सम्बन्धी प्रतिवेदन :- सर्वप्रथम "शिवप्रसाद सितारे हिन्द" ने नागरी लिपि के लिए 1868 में लिपि सम्बन्धी "मेमोरेण्डम कोर्ट कैरेक्टर इन द अपर प्रोविन्स ऑफ इंडिया" से आरम्भ हुआ।

5. बंगाल गवर्नर ऐशले का आदेश पत्र (1870)  :- इस पत्र के आधार पर देवनागरी लिपि का समर्थन किया गया था जिसमें कहा गया था कि अदालत की भाषा ऐसी हो कि जिस हिंदुस्तानी को पूर्णता फारसी नहीं आती उसके लिए भी ऐसी भाषा का प्रयोग हो जो कम से कम बोली जाती हो। वह उसको समझ भी पाता हो। और 1873 में बंगाल सरकार ने पटना, भागलपुर, और छोटा नागपुर डिवीजनों के लिए ऐसी भाषाओं के इस्तेमाल के लिए पत्र जारी किया।

1881 तक मध्यप्रदेश और बिहार जैसे प्रांतों में भी देवनागरी लिपि और हिंदी को सरकारी आज्ञा मिली। उत्तरप्रदेश में नागरी आंदोलन को बड़ा सम्बल मिला।

6. मेरठ के प.गौरीदत्त ने देवनागरी के प्रचार के लिए कई पत्र निकाले जैसे - 1874 "नागरी प्रकाश", 1888 में "देवनागरी गजट" , 1891 में "देवनागर" , "देवनागरी प्रचारक" 1892 आदि।

7. अधुनिक हिंदी साहित्य की चाहे कोई सी भी विधा हो, कोई आंदोलन हो, किसी तरह की जन जागरूकता सम्बन्धी बात हो , पत्रकारिता से जुड़ी कोई बात हो या देवनागरी लिपि के प्रयोग के लिए किये गए प्रयास, उन सभी में भारतेंदु हरिश्चन्द्र का सहयोग अविस्मरणीय माना जाता रहा है। ठीक इसी तरह से 1882 में शिक्षा आयोग के प्रश्न पत्र का जवाब देते हुए भारतेंदु कहते हैं कि " सभी सभ्य देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग होता है। और यहाँ पर न उस भाषा को बोला जाता है जो न तो यहाँ की प्रजा की बोली है और न ही अदालत के शासकों की मातृभाषा"..।

8. प्रतापनारायण मिश्र ने "हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तानी" का नारा दिया।

9. नागरी प्रचारिणी सभा व मदनमोहन मालवीय :-  1893 काशी में नागरी लिपि और हिंदी भाषा के संवर्धन के लिए इस संस्था की स्थापना की थी। सर्वप्रथम कचहरी में हिंदी और देवनागरी लिपि के प्रवेश को ही अपना मुख्य काम माना। सभा ने "नागरी कैरेक्टर" नामक पुस्तक अंग्रेजी में तैयार की जिसमें भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि की अनुपयुक्तता पर प्रकाश डाला गया था।

1898 ई. में मालवीय जी के नेतृत्व में 17 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल द्वारा लेफ्टिनेंट गवर्नर एंटोनी मैकडानल को याचिका या मेमोरियल दिया।

मालवीय जी ने एक स्वतंत्र पुस्तक 1897 में "कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजुकेशन इन नार्थ- वेस्टर्न प्रोविंसेज" निकाली जिसका बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। उसी समय 1898 में तत्कालीन लेफ्टिनेंट गर्वनर काशी आने पर मालवीय जी के नेतृत्व में सभा द्वारा हजारों हस्ताक्षरों द्वारा एक मेमोरेंडम पास करवाया तब जाकर अंततः 18 अप्रैल 1900 में देवनागरी लिपि को और हिंदी को भी अदालत का आधिकारिक दर्जा प्राप्त हुआ।  परन्तु इसके बाद भी एक बड़ी लड़ाई जीतनी थी। हाँ खुशी की बात यह थी कि राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए अब एक राष्ट्रीय भाषा मिल चुकी थी।

10. शारदा चरणमित्र :- ये देवनागरी लिपि के प्रथम प्रचारक थे। कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश "शारदा चरण" ने अगस्त 1907 में "एक लिपि विस्तार परिषद" का गठन किया। इसी के अतिरिक्त 1907 में "देवनागर" पत्र निकाल कर भारत की सभी भाषाओं के साहित्य को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करने का उपक्रम रचा। इस पत्र से प्रोत्साहन पाकर भिन्न भिन्न भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखा जाने लगा। 

11. नेहरू रिपोर्ट : 1928 में आई नेहरू रिपोर्ट के अनुसार हिंदी या हिंदुस्तानी जो भी भाषा बोली जाती है वह देश की राजभाषा होगी। परन्तु सही मायने में यह द्वैत की स्थिति थी और विवादस्पद भी।

12. हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर 1949 को मिला जिसके अनुच्छेद343 (1) में स्पष्ट लिखा है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी और देवनागरी लिपि"..। 1800 से 1949 तक के 150 साल के लंबे प्रयास के बाद हिंदी को संवैधानिक रूप से स्वीकृति मिली।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Sunday, December 27, 2020

हिंदी भाषा : भाग 6

हिंदी भाषा का विकास :-


● राजभाषा विकास से सम्बंधित संस्थाएं:-

 (केन्द्रीय हिंदी समिति) , नई दिल्ली, 1967।

भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा हिंदी का प्रचार-प्रसार करना इसका उद्देश्य है। इसके अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते हैं।


A शिक्षा मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. साहित्य अकादमी, 1954, नई दिल्ली। साहित्य को बढ़ावा देने वाली शीर्षस्थ संस्था।

2. नेशनल बुक ट्रस्ट, 1957, नई दिल्ली।  विज्ञान व साहित्य की पुस्तकें कम मूल्य में देती है।

3. केंद्रीय हिंदी निदेशालय, 1960, नई दिल्ली। शब्दकोश, विश्वकोश, अहिन्दी भाषी पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन करती है।

4. वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, 1961, नई दिल्ली। विज्ञान तथा तकनीकी से जुड़ी शब्दकोश का प्रकाशन करती है।


B ग्रह मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति  :- 

1. राजभाषा विधायी आयोग, 1965-75 ।  केंद्रीय अधिनियमों के  हिंदी पाठ का निर्माण करना।

2. केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, 1971 ।  देश में अनुवाद की सबसे बड़ी संस्था।

3. राजभाषा विभाग, 1975 । संघ के विभिन्न कार्यों के लिए हिंदी के मामले देखने वाली संस्था।


C कानून मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. राजभाषा विधायी आयोग, 1975 । यह संस्था पहले ग्रह मंत्रालय के अधीन थी। प्रमुख कानूनों के हिंदी पाठ का निर्माण करने वाली संस्था।


D सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन हिंदी प्रचार समिति :-

1. प्रकाशन विभाग- 1944

2. फ़िल्म प्रभाग- 1948

3. पत्र सूचना मंत्रालय- 1956

4. आकाशवाणी -1957

5. दूरदर्शन - 1976


● राजभाषा सम्बन्धी विविध तथ्य:-

1. संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव "गोपाल स्वामी आयंगर" ने रखा था जिसका समर्थन "शंकरराव देव" ने किया।

2. संविधान सभा में "हिंदुस्तानी" को 77 और "हिंदी" को 78 वोट मिले थे जिसके आधार पर हिंदी को राजभाषा बनाया गया।


 ● 8वी अनुसूची :- 

संविधान के तहत 8वी अनुसूची में मूल भाषाएँ 14 ही थी परन्तु संविधान के 21वें संशोधन के तहत "सिंधी" को 1967 में जोड़ा गया और 1992 में 71वें संसोधन के तहत "मणिपुरी", "नेपाली", "कोंकणी" को भी जोड़कर इसकी संख्या 18 की गई। 2003 में संविधान के 92वें संसोधन के तहत 4 और भाषाओं को जोड़कर, जिसमें "बोडो" "डोगरी", "मैथिली" और "संथाली" है, उसकी संख्या 22 कर दी गई। 


● हिंदी आंदोलन से जुड़ी साहित्यिक संस्थाएं:-

1. नागरी प्रचारिणी सभा - काशी - 1893 ई.

2. हिंदी साहित्य सम्मेलन - प्रयाग - 1910 ई.

3. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा - मद्रास - 1918 ई.

4. गुजरात विद्यापीठ - अहमदाबाद - 1920 ई.

5. बिहार विद्यापीठ - पटना - 1921 ई.

6. हिंदुस्तानी एकेडमी - इलाहाबाद - 1927 ई.

7. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा - 1927 ई.

8. हिंदी विद्यापीठ - देवघर - 1929 ई.

9. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति - वर्धा - 1936 ई.

10. महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा - पुणे - 1937 ई.

11. बम्बई हिंदी विद्यापीठ - 1938 ई.

12. असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति - गुवाहाटी - 1938 ई.

13. राष्ट्रभाषा सभा, पुणे- 1945 ई.

14. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद - पटना - 1951 ई.

15. अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ - नई दिल्ली - 1964 ई.

16. नागरी लिपि परिषद - नई दिल्ली - 1975 ई.

 17. केरल हिंदी प्रचार सभा - त्रिवन्तपुरम।


 ●विश्व हिंदी सम्मेलन :- 

यह भारत सरकार के "विदेश मंत्रालय" के तहत और जिस देश में यह कार्यक्रम होता है उस देश की सरकार के सहयोग से कराया जाता है। 

• उद्देश्य - UNO की भाषाओं में हिंदी का प्रचार करना और स्थान दिलाना।


विश्वभर में हुए हिंदी सम्मेलनों की सूची:-

1  जनवरी 10-14 तक, 1975-  भारत- नागपुर- अध्यक्ष तत्कालीन मॉरीशस के राष्ट्रपति "शिवसागर राम गुलाम"।

2. अगस्त 28-30 तक, 1976- मॉरीशस- पोर्ट लुई ।
3. अक्टूबर 28-30 तक, 1983- भारत- नई दिल्ली ।
4. दिसम्बर 2-4 तक , 1993- मॉरीशस- पोर्ट लुई ।
5. अप्रैल 4-8 तक, 1996- पोर्ट ऑफ स्पेन ।
6. सितम्बर 14-18 तक, 1999-लन्दन-ब्रिटेन ।
7. जून 5-9 तक, 2003- पारामारिबो- सूरीनाम ।
8. जुलाई 13-15 तक,  2007- न्यूयॉर्क- अमेरिका ।
9. सितंबर 22-24 तक, 2012- जोहान्सबर्ग- साउथ अफ्रीका ।
10. सितंबर 10-12 तक, 2015- भोपाल- भारत ।
11. अगस्त 18-20 तक, 2018- मॉरीशस -पोर्ट लुई ।


● अन्य जानकारी :- 

1. भाषा :- भाषा संस्कृत के शब्द "भाष" धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्यक्त वाणी । मूलरूप से और भाषा के मानक रूप में "भाषा" उसे कहते हैं जो व्यक्त वाणी के रूप में अभिव्यक्त की जाती है।

2. उपभाषा :- अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और उसके प्रयोग क्षेत्र का विस्तार हो जाता है तो वह बोली न रहकर "उपभाषा" बन जाती है।

3. बोली :-  एक छोटे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा "बोली" कहलाई जाती है। यहाँ पर भाषा शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि बोली भी भाषा की तरह एक माध्यम  है जिसके आधार पर हम अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं। इसके साथ ही यह भी भाषा की एक अभिन्न इकाई है।इसका क्षेत्र सीमित होता है।

4. सम्पर्क भाषा :- भोलानाथ तिवारी के अनुसार जो भाषा अन्य लोगों से संपर्क के काम आए वह भाषा "संपर्क भाषा" कहलाती है।

5. मानक भाषा : - मानक का अभिप्राय है "आदर्श, श्रेष्ठ या परिनिष्ठित" से है। भाषा का जो रूप उसके प्रयोक्ताओं के अतिरिक्त अन्य भाषा-भाषियों के लिए आदर्श होता है, जिसके माध्यम से उस भाषा को सीखते हैं, जिस भाषा रूप का व्यवहार पत्राचार, शिक्षा, सरकारी कामकाज एवं सामाजिक- सांस्कृतिक आदान-प्रदान में समान स्तर पर होता है वह भाषा का "मानक रूप" कहलाता है।

हर मानक भाषा का अपना एक समय और रूप रहता है जो उसे साहित्यिक रूप में दर्शाता है। चाहे वह अपभ्रंश हो, ब्रज, अवधी या खड़ीबोली हो। जब यह आम बोलचाल से हटकर विशेषपन को ग्रहण करती है, जोकि सीमित दायरे और नियमावली के तहत कार्य करती है।

आज हम जिस हिंदी के मानक रूप को पहचानते हैं वह खड़ीबोली के रूप में हिंदी कही जाती है। इस भाषा को मानकीकृत करने में बहुत से लोगों, संस्थाओं, पत्रिकाओं आदि का लंबा योगदान रहा है। जैसे फोर्ट विलियम कॉलेज से प्रक्रिया शुरू होना और फिर "शिवप्रसाद" सितारे हिंद , "लल्लू लाल" , "भारतेंदु मंडल" , "महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती" का अहम योगदान आदि। उसके बाद यह मानकीकृत प्रक्रिया समय- समय पर और तेज होती गई जोकि सिलसिलेवार ढंग से आज भी चल रही है।

6. भारतीय हिंदी परिषद-  भाषा के सर्वांगीण मानकीकरण का प्रश्न सबसे पहले 1950 में "इलाहाबाद विश्वविद्यालय" के हिंदी विभाग ने उठाया। डॉ धीरेंद्र वर्मा, हरदेव बाहरी, और डॉ माताप्रसाद गुप्त आदि इसके सदस्य थे। धीरेंद्र वर्मा ने देवनागरी लिपि चिन्हों में एकरूपता, हरदेव बाहरी ने वर्ण विन्यास की समस्या, माताप्रसाद गुप्त ने हिंदी शब्द भंडार विषय पर अपने मत प्रस्तुत किये।

7. केंद्रीय हिंदी निदेशालय :-  इसकी स्थापना 1960 में हुई थी और इस संस्था ने देवनागरी लिपि के मानकीकरण के लिए "देवनागरी लिपि" तथा "हिंदी वर्तनी का मानकीकरण" 1983 में प्रकाशन किया।

8. हिंदवी, हिंदुई :- मध्यकाल में मध्यदेश के हिंदुओं की भाषा, जिसमें अरबी- फारसी शब्दों का अभाव है। सर्वप्रथम "अमीर ख़ुसरो" ने देशभाषा को हिंदी या हिंदवी कहा। जिसका उदहारण हमें उनके हिंदी-फ़ारसी शब्दकोष "खालिकबारी" में 30 बार हिंदवी और 5 बार हिंदी के इस्तेमाल होने से पता चलता है।

9. भाखा/भाषा :- विद्यापति, कबीर, तुलसी, केशवदास आदि ने हिंदी देशभाषा के लिए "भाखा" का प्रयोग किया है। फोर्ट विलियम कॉलेज के अध्यापकों के लिए भी भाषा मुंशी या भाखा मुंशी शब्द इस्तेमाल होता रहा है।

10. हिंदुस्तानी :- हिंदी-उर्दू मिश्रित व आमजनता द्वारा इस्तेमाल शब्दों की भाषा का नाम हिंदुस्तानी है। यह नाम अंग्रेज़ो ने दिया था क्योंकि उन्हें तत्कालीन समय में एक यही भाषा सबसे सुलभ और प्रशासन जमाये रखने के नज़र से सही लगी होगी। जिससे हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजों पर वर्चस्व  रखा जा सके और उनसे संपर्क भी बनाया जा सके।

11.  हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान:- "प्रतापनारायण मिश्र" जी ने यह नारा दिया था कि हिंदी ही हिंदुस्तान और हिंदुओं की भाषा है।

12.  उर्दू :- आज के समय में उर्दू उसे कहा जा रहा है जो मुसलमान की भाषा है और फारसी में लिखी जाती है। परंतु इसका इतिहास केवल यही नहीं। हिंदी और उर्दू यह दोनों ही भाषाएँ अपने वर्तमान समय में खड़ीबोली से निकली हुई भाषाएँ हैं जो कुछ शब्दों और व्याकरणिक नियमावली के चलते कुछ हदतक पृथक हैं। विद्वान इसे "आपसी बहनों का रिश्ता" कहते हैं।

"उर्दू" खड़ीबोली की वह शैली है जिसमें अरबी फारसी के शब्द कुछ अधिक हैं।

उर्दू की प्रथम पुस्तक "बानो बहार" है जो 18वी शती में लिखी थी।

13.  दक्खनी :- मध्यकाल में दक्कन के मुसलमानों द्वारा लिखी गयी हिंदी "दक्कनी या दक्खिनी" कहलाई गयी।

दक्कनी को उत्तरी भारत मे लाने का श्रेय "शायर वली दक्कनी" को जाता है जिन्होंने मुगलकाल में दक्कनी को उत्तरी भारत में लाकर इसे लोकप्रिय बनाया।
  
14. रेख़्ता  :- रेख़्ता का शाब्दिक अर्थ है- गिरा हुआ। जिस प्रकार से संस्कृत को सरल बनाकर प्राकृत भाषा अस्तित्व में आई उसी तरह से अरबी फारसी को सरल करके "रेख़्ता" का रूप सामने आया।

 उर्दू-फ़ारसी-अरबी के बोलचाल के शब्द रूप को "रेख़्ता" कहा जाता है। जिसे शुरू में हीन दृष्टि से देखा जाता था पर बाद में कई शायरों ने इस भाषा का इस्तेमाल किया।

धीरेंद्र वर्मा रेख़्ता को "उर्दू की नवीन शैली" कहते हैं।

●भारत में रेख़्ता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग छंद और संगीत के क्षेत्र में हुआ। 

18वी से लेकर 19 शती तक यह भाषा उर्दू के लिए इस्तेमाल हुई। बाद में इसका एक अलग अस्तित्व कायम हुआ जब बड़े बड़े शायरों ने इसमें गजलें गाना शुरू किया और वह आम जनता से जुड़े।

15. जनभाषा, देसीभाषा, आमभाषा, बोलचाल की भाषा, भाखापन, लोकल भाषा  ये सभी एक दूसरे की पर्याय हैं। जिसका अर्थ है साहित्य की भाषा, राजभाषा,  परिनिष्ठित भाषा, मानक भाषा, आदि से इतर। जो किसी भी क्षेत्रीयता को दर्शाती है। यह भाषा जनता अपनी सुविधानुसार आसन शब्दों के माध्यम से , गाँव- देहात में प्रयोग शब्दों से अपना वैचारिक आदान प्रदान करती है।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।






Friday, December 25, 2020

हिंदी भाषा: भाग -5


हिंदी भाषा का विकास


                              (राजभाषा)


● राजभाषा:- इसका शाब्दिक अर्थ है- "राज काज की भाषा"..। जो भाषा देश के राजकीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होती है, वह "राजभाषा" कहलाती है। राजाओं, नवाबों के समय में इसे दरबारी भाषा कहा जाता था। इसका क्षेत्र सीमित होता है, यह केवल सरकारी दफ्तरों, प्रशासनिक स्तर पर ही कार्य करती है। इसे औपचारिक भाषा का दर्जा मिला हुआ है। 

14 सितंबर 1949 को संविधान के भाग 17 के अध्याय 1 में धारा 343 (1)  के अनुसार हिंदी देश की राजभाषा बनायी गयी थी किंतु 1950 से लेकर आने वाले 15 वर्षों तक के लिए अंग्रेजी को भी सहायक भाषा के रूप में इस्तेमाल किया गया। तदुपरांत 1965 से आजतक अंग्रेजी भाषा एक सहकारी भाषा के रूप में राजभाषा के कार्यों में इस्तेमाल की जा रही है।

●हिंदी को देश की राजभाषा बनाये जाने के उपलक्ष में पूरे भारत में 14 सितंबर को "हिंदी दिवस" मनाया जाता है।


● राजभाषा के अध्याय :- 

अध्याय 1 : संघ की भाषा - अनुच्छेद 343 और 344 आते हैं।

अध्याय 2 : प्रादेशिक भाषाएँ - अनुच्छेद 345, 346 और 347 आते हैं।

अध्याय 3 : सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय की भाषा - अनुच्छेद 348, 349 आते हैं।

अध्याय 4 : जनता की शिकायत सम्बन्धी अनुच्छेद 350 और हिंदी के प्रचार हेतु भारत की संस्कृति से जोड़ने हेतु 351 अनुच्छेद है।


●संविधान में हिंदी भाषा सम्बन्धी उपबन्ध:-

संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 तक 4 अध्यायों में राजभाषा सम्बन्धी नियमावली दी है।

1. अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी होगी।

2. अनुच्छेद 344 में राष्ट्रपति 5 वर्ष के बाद और संसद उसके 10 वर्ष बाद राजभाषा आयोग का गठन करेगा और वह गठन हिंदी भाषा के लिए राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा।

3. अनुच्छेद 345 में किसी भी राज्य का विधानसभा उस राज्य की किसी एक भाषा, जो हिंदी या हिन्दीतर भी हो सकती है उसका चयन कर पूरे राज्य के व्यक्तियों के लिए संचार-सम्प्रेषण की कमी को पूरा करेगा।

4. अनुच्छेद 346 में किसी भी 2 राज्यों के बीच शासकीय कार्यो को पूर्ण करने के लिए अंग्रेजी को पत्रादि की भाषा बनाना होगा। अगर दोनों राज्य चाहे तो आपस में सलाह करके हिंदी को भी पत्रादि की भाषा बना सकते हैं।

5. अनुच्छेद 347 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि किसी राज्य की ज्यादात्तर जनसंख्या के आधार पर वहाँ की किसी भाषा को शासकीय प्रयोजनों की भाषा बना दिया जाए।

6. अनुच्छेद 348 में, जबतक संसद उपबन्ध न करे तबतक उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी रहेगी। इसके अलावा सभी सरकारी काम भी अंग्रेजी में होंगे। परन्तु किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की अनुमति से सरकारी कार्यों को हिंदी में करवा सकता है। परन्तु सभी आदेश अंग्रेजी में होंगें।

7. अनुच्छेद 349 में प्रशासनिक कार्यो के लिए इस्तेमाल की जाने वाली किसी अन्य भाषा या संपर्क भाषा के लिए राष्ट्रपति की अनुमति के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं कर सकता।

8. 350 में जनता और अधिकारियों की भाषाई शिकायत को दूर करना और भाषाई रक्षा करने का नियम बनाया गया।

किसी राज्य के अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाना भी है।

9. 351 में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए विधान बनाया गया। जिससे कि वह भारत की संस्कृति का भाग बन सके। इसी में हिंदी एवं हिंदुस्तानी के भेद को भी खत्म किया गया। पर जहाँ आवश्यक हो अन्य भाषाओं बोलियों को भी आत्मसात किया जाए यह प्रावधान किया गया। 


●विधान मंडलो की भाषा:-

1. संसद की भाषा का उपबन्ध संविधान के भाग 5 के अनुच्छेद 120 में किया है । इसके तहत हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी या मातृभाषा का इस्तेमाल करने की मंजूरी सदन का पीठासीन दे सकता है।

2. विधानसभा की भाषा का उपबन्ध संविधान के भाग 6 के अनुच्छेद 210 में दिया गया है। उसके तहत हिंदी,अंग्रेजी में कार्य किया जाएगा। किसी सदस्य को अपने राज्य की मातृभाषा में बोलने का हक सदन का पीठासीन दे सकता है।


●1950 के बाद हिंदी की संवैधानिक प्रगति:-

1. राष्ट्रपति का संविधान आदेश 1952:-  राज्यपालों व SC, HC के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए हिंदी के अधिपत्रों का प्रयोग किया जाए।

2. राष्ट्रपति संविधान आदेश 1955:- जनता के साथ पत्राचार, प्रशासनिक कार्य, संसदीय रिपोर्ट, संकल्प व विधायी नियम आदि अंग्रेजी के साथ हिंदी में हो।


●  राजभाषा आयोग -7 जून 1955 राजेन्द्र प्रसाद और बालगंगाधर खेर की अध्यक्षता में इसका गठन हुआ। इसमें 21सदस्य थे। इसने अपना प्रतिवेदन 1956 में दिया जो 1957 में संसद के समक्ष रखा गया।


◆ राजभाषा आयोग की सिफारिश :-

1. सारे देश में माध्यमिक स्तर तक हिंदी अनिवार्य हो।

2. न्यायालय की भाषा देश की भाषा हो।

3. सार्वजनिक स्तर पर, प्रशासन, पत्राचार की भाषा अंग्रेजी रखना अनुचित है।


राजभाषा आयोग की समीक्षा के लिए 1957 में जी.बी.पन्त की अध्यक्षता में "संयुक्त संसदीय राजभाषा समिति" का गठन हुआ। इसमें लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्य थे। इसने अपना प्रतिवेदन 1959 में दिया।


◆ जी.बी. पन्त समिति की सिफारिश:-

1. हिंदी संघ की राजभाषा का स्थान जल्द से जल्द लें।

2.1965 तक अंग्रेजी को राजभाषा और हिंदी को सहायक भाषा बनाया जाए और 1965 के बाद हिंदी को राजभाषा और अंग्रेजी को सहायक भाषा बना दिया जाए। 

वैसे तो हिंदी को संघ की राजभाषा 1949 में ही बना दिया था परन्तु सम्भव है कि लंबे समय तक हिंदी में राजकाज का कार्य सुलभता से न हो पा रहा हो तभी इस समिति ने शुरुआती सालों में अंग्रेजी को मुख्य भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह दी और आने वाले समय में हिंदी को मुख्य राजभाषा बनाने की माँग रखी होगी।

◆ 1976 में राजभाषा आयोग को ख़त्म कर दिया गया था।


● राष्ट्रपति का आदेश 1960:- इसमे ग्रह मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, विधि मंत्रालय, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा सांस्कृतिक कार्य मंत्रालय को हिंदी को राजभाषा के रूप में विकसित करने के निर्देश हैं।


●"राजभाषा अधिनियम" :- यह अधिनियम 1963 में आया। इसमें 9 धाराएं है। यह अधिनियम भी राजभाषा के चयन के लिए लाया गया था क्योंकि हिंदी को राजभाषा का अधिकार मिलने के बाद भी उसका कई जगह विरोध हुआ जैसे दक्षिण (तमिलनाडु) और बंगाल में। हिंदी भाषा के कट्टर समर्थकों के कारण हिंदी को लाभ तो नहीं परन्तु नुकसान जरूर हुआ। इस पर नेहरू जी ने आश्वासन दिया कि हिंदी को एकमात्र राजभाषा का दर्जा देने से पहले अहिन्दी भाषी राज्यों से सम्मति प्राप्त की जाए और तबतक अंग्रेजी को नहीं हटाया जाए। इस पर तत्कालीन राजभाषा के विधेयक लाल बहादुर शास्त्री जी ने मोहर लगाई।

1965 के बाद हिंदी पूरी तरह से राजभाषा का अधिकार पा सकी परन्तु आजतक अंग्रेजी को सहायक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है।

"राजभाषा अधिनियम संसोधन" 1967 (इंदिरा गांधी) में हुआ। जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया था कि जो भी राज्य अंग्रेजी भाषा की समाप्ति पर रुख़ अपनाते हैं उन्हें अपने विधानमंडल में हिंदी के लिए संकल्प लेना होगा और ऐसा न होने पर अंग्रेजी पूर्व की तरह रहेगी।


● संसद द्वारा पारित संकल्प :- 

1 राजभाषा हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं की प्रगति को सुनिश्चित करें।

2 त्रिभाषा सूत्र को लागू करना जिससे कि हिंदी व अंग्रेजी के साथ किसी अन्य हिन्दीतर भाषा को पढ़ाने की व्यवस्था की जाए। परन्तु यह पूरी तरह से सफल न हो सका।


● "राजभाषा नियम"1976 :- इस में 12 नियम हैं। जिनमें हिंदी के प्रयोग के संदर्भ में भारत के राज्यों का 3 वर्गीय विभाजन किया गया है। जैसे (क) राज्य- उत्तरप्रदेश, बिहार,राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, और संघ प्रदेश दिल्ली।

(ख) राज्य-पंजाब,गुजरात, चंडीगढ़ अंडमान निकोबार। 

(ग) राज्य- शेष राज्य जैसे दक्षिण के व संघ प्रदेश। 


1. क- वर्ग में सभी राज्यों को भेजे जाने वाले पत्र देवनागरी में भेजे जाएँगे। यदि कोई अंग्रेजी का पत्र भेजा भी जा रहा है तो उसका अनुवाद भी भेजना होगा।

2. ख वर्ग वाले राज्यों में पत्र-व्यवहार हिंदी और अंग्रेजी दोनों में कर सकते हैं।

3. ग वर्ग वाले राज्यों में पत्र-व्यहवार अंग्रेजी में होगा।

इसके अलावा इस अधिनियम में प्रधान राजभाषा, सहयोगी राजभाषा और प्रादेशिक भाषा हेतु नियम दिए गए । परन्तु आज भी द्विभाषिक नीति का अनुपालन हो रहा है।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Saturday, December 12, 2020

हिंदी भाषा : भाग - 4

हिंदी भाषा का विकास :


● हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अन्य धार्मिक- समाजिक संस्थाओं व समाज सुधारकों का योगदान:-

1. ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में हुई। जिसके संस्थापक कलकत्ता में "राजाराम मोहनराय" ने कहा था कि " इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है'..।

2. बंगाल के जस्टिस ब्रह्मसमाजी "केशवचंद्र सेन" ने 1857 ई.में  कहा था कि "भारतीय  एकता के उपाय के लिए भारत में एक ही भाषा का व्यवहार हो। यह हिंदी ही एकमात्र भाषा है जिससे सारे काम सम्पन्न और शीघ्र किये जा सकते हैं"..।

3. "नवीनचन्द्र राय" ने पंजाब में हिंदी का प्रचार प्रसार किया।

4. आर्य समाज जिसकी स्थापना 1875 बम्बई में हुई थी। इसके संस्थापक "दयानंद सरस्वती" थे जोकि मूल रूप से गुजराती थे।  उन्होंने हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान होने के बाद भी अपना सारा धार्मिक साहित्य जोकि  "सत्यार्थ प्रकाश" नामक पुस्तक के रूप में है, उसे हिंदी में लिखा। उनका मत था कि "हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है"..। इसके अलावा वह कहते थे कि " मेरी आँखें उस दिन को देखना चाहती है जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लगे"...।

5.  अरविंद दर्शन के प्रवर्तक "अरविंद घोष" का मत था कि "सभी लोग अपनी मातृभाषा की रक्षा करके सामान्य तौर पर हिंदी को ग्रहण करें"।

6. थियोसोफिकल सोसाइटी (मद्रास) जिसकी स्थापना 1875 में हुई थी उसकी संचालिका "ऐनी बेसेंट" ने कहा था कि  "भारतवर्ष की भिन्न-भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह हिंदी भाषा है'...।

इसी के अतिरिक्त ऐनी बेसेंट का मत "भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए" को लेकर भी था।

17 जून 1878 में होमरूल कार्यालय सी.पी. रामस्वामी अय्यर की अध्यक्षता में एनी बेसेंट ने प्रथम हिंदी वर्ष का उदघाटन किया।

7. रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में दक्षिण भारत के एक क्षेत्र बेलूर में "स्वामी विवेकानंद" जी ने हिंदी के प्रचार के लिए की थी।

8. राजा शिवप्रसाद "सितारे हिन्द" ने ही हिंदी को सबसे पहले स्कूल में प्रवेश करवाया जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ो के कृपापात्र उर्दू के कट्टर समर्थक सर सैयद अहमद खान से टकराना पड़ा।

9. हिंदी के प्रसार के लिए नागरी प्रचारिणी सभा का योगदान :-

  1893 में कुछ उत्साही छात्रों श्यामसुंदर दास, प.रामनारायण मिश्र, ठाकुर शिवकुमार सिंह के उद्योग से इस संस्था की स्थापना की गई। इसके सभापति भारतेंदु के फुफेरे भाई "राधाकृष्ण दास" थे। इस सभा का कार्य हिंदी साहित्य को समृद्ध करना और नागरी अक्षरों का प्रचार करना उद्देश्य था।

इस सभा ने पुस्तकों की खोज का कार्य अपने हाथों में लिया। सरकार द्वारा आर्थिक सहायता भी समय समय पर मिली जिससे हिंदी साहित्य लिखने के लिए प्रमाणिक सामग्री सामने आ गयी थी। इस सभा के विशिष्ट योगदान में कुछ रचनाएँ प्रसिद्ध हैं जैसे हिंदी शब्द सागर की भूमिका, वैज्ञानिक कोष, नागरी प्रचारिणी पत्रिका आदि ।

10.  हिंदी साहित्य सम्मेलन -प्रयाग -1910 में  "पुरुषोत्तम दास टण्डन" ने इसकी स्थापना की थी। जिसका कार्य अहिन्दी भाषी लोगों को हिन्दी सिखाना था। इसमें 3 स्तर की परीक्षाएँ होती थी जिसे पास करके ही कोई हिंदी सीखने योग्य हो पाता था।

11. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा- मद्रास -1918 में गांधी इसके अध्यक्ष व संस्थापक थे। यह सभा अंग्रेजी भाषा के विरोध में खड़ी हुई थी क्योंकि भारत में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को अहिंदी भाषियों पर से कम करके भारत को एकता के सूत्र में बाँधना व भाषाई स्तर पर भी भारत एकरूपता देना या सभा का उद्देश्य था।

12. हिंदी प्रचार सभा, वर्धा -1936 में इस सभा की स्थापना भी गाँधी ने ही कि थी। इस संस्था का मुख्य लक्ष्य हिंदी के माध्यम से राष्ट्रीय भावना जगाना था।  

इसके संदर्भ में गांधी कहते हैं :- "एक हृदय भारत जननी"...। यह इस सभा में गाँधी द्वारा कही गई मुख्य पँक्ति थी।

13. फैजपुर अधिवेशन 1936 और हरिपुरा अधिवेशन 1938 में कांग्रेस ने राष्ट्रभाषा सम्मेलन आयोजित किया जिसकी अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद एवं जमना लाल बजाज ने की थी।

इसके अलावा बम्बई, विद्याधर, बिहार, असम आदि में भी इसी तरह के हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए सम्मेलन हुए। और केवल सभाएँ ही नहीं ,पत्रिकाओं , अन्य विद्वानों , सामाजिक सभाओ व साहित्यकारों आदि ने भी हिंदी के विकास के लिए योगदान दिया।


●हिंदी प्रचार प्रसार हेतू कॉंग्रेस के नेताओं का योगदान:-

1. "लोकमान्य तिलक" ने 1917 में कहा था " यद्दपि मैं उन लोगों में से हूँ जो यह चाहते हैं कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है"...।

2  "महात्मा गाँधी" का मत था कि "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है और हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है"..। यह बात उन्होंने 1917 के "भड़ौच गुजरात शिक्षा परिषद" से सभापति पद से कही थी। उन्होंने एक राष्ट्रभाषा के लिए जो लक्षण बताये थे उस आधार पर हिंदी ही केवल उससे मिलती थी। वह लक्षण थे:-


1 अमलदारों के लिए वह भाषा सरल हो।

2 भारतवर्ष के आपसी आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक व्यवहार हो सके।

3 भारतवर्ष के बहुत से लोग उसे बोलते हो।

4 राष्ट्र के लिए आसान हो।


 3. हिंदी साहित्य सम्मेलन इंदौर अधिवेशन 1918 के मंच से "गाँधी" कहते हैं " हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है"..। इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव रखा कि प्रतिवर्ष 6 युवक उत्तर भारत के दक्षिण जाकर वहाँ की भाषा सीखें और हिंदी का प्रचार करें और इसी तरह से दक्षिण के 6 युवक उत्तर में आकर हिंदी सीखें। हिंदी पढ़ने की बात इसी अधिवेशन में कही गयी थी और वह ऐसी हो जो फ़ारसी शब्दों से लदी न हो और न ही संस्कृतमयी हो।

दक्षिण में सर्वप्रथम गाँधी जी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास को 1918 में हिंदी प्रचारक के रूप में दक्षिण भेजा। उसी समय सत्यदेव उनकी सहायता के लिए आ गए। "हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रचार कार्यालय" 1918 के रूप में हिंदी का प्रचार किया गया।

1918 में ही हरिहर शर्मा, शिवराम शर्मा को प्रयाग भेजा गया जिन्होंने लौटकर दक्षिण में प्रचार कार्य सम्भाला। स्वामी सत्यदेव ने हिंदी सीखने के लिए "हिंदी की पहली पुस्तक" लिखी। 1922 तक इतना प्रसार हो गया था कि वहाँ प्रेस भी खोलना पड़ा। 

4. "मोटूरि सत्यनारायण" की सहायता से ही नेल्लूर आंध्रा शाखा खुली। उत्तर और दक्षिण के बीच सांस्कृतिक समन्वय का प्रारम्भ मोटूरि सत्यनारायण के माध्यम से हुआ।

5. कानपुर अधिवेशन 1925 में गाँधी जी ने कहा कि " कांग्रेस का कार्यकारिणी समिति का कामकाज हिंदी में होगा"..।

6. गाँधी जी के प्रयास से ही 1927 में दक्षिणी भारत हिंदी प्रचार समिति (मद्रास) और वर्धा 1936 में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएँ स्थापित हुई।

7. 1927 में दक्षिण भारत के लोगों के लिए गाँधी लिखते हैं कि "ये अंग्रेजी बोलने वाले लोग हैं जो आमजनता में हमारा काम आसान नहीं होने देते। इसी से प्रभावित होकर "सी.राज गोपालाचारी" कहते हैं " हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतन्त्रात्मक भारत में राजभाषा भी होगी"...।

8. नेहरू रिपोर्ट 1928 में कहा कि " देवनागरी या फारसी में लिखी जाने वाली हिंदुस्तानी भारत की राजभाषा होगी"...। परन्तु कुछ समय के लिए अंग्रेजी भी सहायक राजभाषा होगी जिसे आगे चलकर भारत के संविधान में अपना लिया।

9. 1929 में सुभाषचंद्र बोस ने कहा था " प्रांतीय ईर्ष्या को दूर करने में जितनी सहायता हिंदी से मिलेगी उतनी और किसी से नहीं"..।

10.  1931 में गाँधी कहते हैं " यदि स्वराज अंग्रेजी पढेलिखों के लिए है तो संपर्क भाषा अंग्रेजी होगी। यदि वह दलितों, निरक्षरों, स्त्रियों-बच्चों-करोड़ो लोगों के लिए है तो उसकी भाषा केवल हिंदी होगी"।

11.  वर्ष 1936 में गाँधी जी ने कहा था " अगर हिंदुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता"...।

और यह भाषाई आंदोलन स्वाधीनता के अंतिम समय तक चलता रहा जिसमें हिंदी के समर्थन में सभी ने सहयोग किया।


●बंगाल के अन्य जन नेताओं का योगदान:-

 1. सबसे पहले  1805 में "चरिणी दास" ने बेताल पचीसी का सम्पादन कराया और विभिन्न विषयों पर हिंदी में लेखन कार्य किया। 1826 में "राजाराम मोहनराय" ने वेदांत सारनात्मक ग्रन्थ का हिंदी अनुवाद किया। "ईश्वरचंद्र विद्यासागर" के लिखे अनेक सहित्यपरक लेख कविवचन सुधा में प्रकाशित हुए।

2.  सुभाषचंद्र बोस:- 1936 महाराष्ट्र प्रांत के एक क्षेत्र (वर्धा) में वह कहते हैं कि "हिंदी का प्रचार इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वह बहुत ही व्यापक रूप में बोली जाती और सरल भी है। हमें मिश्रित भाषा का निर्माण नहीं करना बल्कि उत्तर भारत की सामान्य भाषा का प्रचार करना चाहिए"..।

3. वंदे मातरम के रचयिता "श्री बंकिमचंद्र" ने हिंदी भाषा पर बल दिया था। इस गीत का गायन राष्ट्रीय कॉंग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के प्रारम्भ में रवींद्रनाथ ठाकुर ने ही किया था।

4. रवींद्रनाथ टैगोर:- हमें उस भाषा को राष्ट्रभाषा ग्रहण करना चाहिए जो देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने के लिए महात्मा जी ने हमसे आग्रह किया है अर्थात हिंदी"..।


● संविधान में राजभाषा:- (एक विकासयात्रा)

1. सन 1946 में संविधान सभा का गठन होता है जिसमें मुख्यतः कांग्रेस के नेता थे। उसके अतिरिक्त स्वतंत्र पार्टियों के नेता और मुस्लिम लीग के नेता भी शामिल थे। विभाजन के बाद लीग के नेता हट गए शेष रह गए थे।

2. 14 जुलाई 1947 को संविधान सभा के चौथे सत्र के दूसरे दिन ही यह संसोधन प्रस्तुत किया गया कि " हिंदुस्तानी" के स्थान और "हिंदी" शब्द रखा जाये। मतदान में 63 हिंदी भाषा के लिए, 32 हिंदुस्तानी भाषा के लिए व देवनागरी लिपि के लिए 63 पक्ष में और विपक्ष में 18 मतदान हुए थे।

3. फरवरी 1948 में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया उसमें राजभाषा विधेयक कोई धारा नहीं थी। मात्र यह था कि संसद की भाषा हिंदी या अंग्रेजी होगी। उस पर खूब पक्ष-विपक्ष हुआ। नेहरू ने हिंदी पर बल दिया तो वहीं कुछ नेताओं ने संविधान की भाषा को हिंदी के लिए माना। 

4. अगस्त 1949 में कॉंग्रेस की वर्किंग कमेटी ने भाषा पर बहस करके द्विभाषिक स्थिति को प्रस्ताव किया और स्टेट लैंग्वेज की भी अवधारणा रखी।

5. अगस्त 6,  1949 को हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में हिंदी को एकमत स्वीकारा गया और नागरी लिपि को भी स्वीकृति मिली। अंग्रेजी भाषा के राजभाषा सम्बन्धी प्रयोग को लेकर 10 और 15 वर्ष के लिये सदस्यों के अपने अपने मत बने रहे।

6. अगस्त 1949 को राजभाषा सम्बन्धी प्रारूप समिति तैयार की गई जिसके अध्यक्ष "पट्टाभि सीतारमैया" और "महामंत्री जुगलकिशोर" थे। जिसमें अय्यर, अम्बेडकर, सुभाष बाबू, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, मौलाना आजाद, पुरुषोत्तमदास टण्डन, आयंगर,अमृता कौर, मोटूरि सत्यनारायण, घनश्याम गुप्त आदि थे। इस समिति में कई लम्बी बहसें चली और अंग्रेजी के प्रयोग करने वाले वर्षों पर विवाद कायम था।

7. अगस्त 22, 1949 को अम्बेडकर जी ने नया फ़ॉर्मूला रखा जिसमें 15 वर्ष की अवधि का प्रस्ताव रखा गया, जिसे संसद आगे बढ़ा भी सकती है। अंतरराष्ट्रीय अंक, उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी, भाषा आयोग आदि सम्बन्धी भी प्रस्ताव थे।

8. राजभाषा सम्बन्धी मसौदा पेश करने में कई लोग बाधा डाल रहे थे और बेमतलब की बहस कर रहे थे जिसको ख़त्म करने के लिए मौलाना आजाद और श्यामाप्रसाद मुखर्जी काफी प्रयास कर रहे थे।

9. मुख्य बहस 11 से 14 सितंबर तक चलती है जहाँ 45 पृ में 400 से अधिक संसोधन आ चुके थे। 14 सितंबर को ही दोनों पक्षों में राजीनामा हुआ और दोपहर 1 बजे बैठक स्थगित हुई। 3 बजे संविधान सभाई पार्टी में समझौते हुए। लगभग 5 बजे तक कुछ सहमति हुई अतएव उन्होंने (मुंशीजी) ने आकर 1 घण्टा अतिरिक्त माँगा। 6 बजे तक सभी पहलुओं पर विचार-विमर्श कर मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला को कुछ सुधारकर स्वीकार कर लिया गया और आशा की गई कि सभी 400 संसोधन वापस ले लिए जाएँगे। अंततः 5 संसोधन नहीं लिए गए जिसमें कॉंग्रेस के सक्सेना, टण्डन, ब्रजेश्वर प्रसाद थे। लीग के नेता अहमद तथा जेड.एच. लारी भी थे। पुरुषोत्तमदास टण्डन जी ने इस्तीफा देकर संसोधन पेश किया जिसे 16 सितंबर को पार्टी के अनुरोध से वापस ले लिया गया।

10. इस प्रकार भारी तालियों की गड़गड़ाहट में मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला स्वीकार कर हिंदी को राजभाषा बनाया गया। मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला के नाम से विख्यात भाषा सम्बन्धी अनुच्छेद संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक है और परिशिष्ट में अष्टम सूची है।


●हिंदी की संवैधानिक स्थिति व उसकी समीक्षा:- 

वैसे तो स्वाधीनता से पहले ही कुछ हिन्दीत्तर और हिंदी भाषी छोटे-बड़े नेताओं ने हिंदी को सभी तरह से समर्थन देना शुरू कर दिया था, परन्तु स्वाधीनता के बाद कुछ अहिंदी भाषी नेताओं का रुख़ बदलने लगा। इसी वजह से न केवल संविधान सभा में हिंदी का ही फैसला हुआ बल्कि राजभाषा जैसे मसले को भी सुलझाने की कोशिश की। राजभाषा के नाम पर जो बहस 11 से 14 सितंबर 1949 तक चली उसमें वैसे तो हिंदी के अलावा संस्कृत, हिंदुस्तानी, अंग्रेजी के दावे पर विचार किया गया लेकिन हिंदी और अंग्रेजी का विवाद बहुत दिनों तक चला। 

इसके लिए हिंदी में भी 2 गुट थे :- 

एक देवनागरी लिपि वाली हिंदी के समर्थन में था तो दूसरा हिंदुस्तानी जिसमें फारसी लिपि भी आ रही थी। इस समस्या को समझने के लिए तत्कालीन भाषाई जनता के आंकड़े को देखना जरूरी है जोकि उस समय 1-2% अंग्रेजी बोलने वाले या व्यवहार में लाने वाले थे , 46% हिंदी भाषी व शेष जनता अन्य भाषा व बोलियों को बोलने वाली थी जिसमें कई सारी भाषाएँ स्थानीय बोलियाँ थी। जिस आधार पर इन्हें राजभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए था वह आधार मुसीबत से खाली नहीं था इसलिए ही इन पर इतना ध्यान नहीं दिया गया। हिंदी को राजभाषा बनाने का दावा न्यायसंगत रहा पर राजकीय भाषाओं का भी सम्मान रखा गया।

इन सब बातों पर ध्यान देते हुए संविधान निर्माताओं ने राजभाषा की समस्या को हल करने के लिए संविधान सभा के भीतर और बाहर हिंदी के विपुल समर्थन को देखकर संविधान सभा ने हिंदी के पक्ष में अपना फैसला दिया। यह फैसला हिंदी विरोधी एवं हिंदी समर्थकों के बीच "मुंशी-आयंगार फार्मूले" के द्वारा समझौते के परिणामस्वरूप आया।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Friday, October 16, 2020

हिंदी भाषा भाग :- 3

हिंदी भाषा का विकास:- 


● आधुनिककाल में खड़ीबोली का साहित्यिक विकास :-


खड़ीबोली का प्राचीनतम रूप-  खड़ीबोली जिसे आज हम हिंदी के नाम से जानते हैं उसका प्राचीनतम साहित्यिक रूप शुक्लानुसार लगभग 11वी शती  (राजा मुंज एयर भोज के समय) से होने लगता है परन्तु इससे पूर्व नाथों के साहित्य में भी इसका छुटपुट रूप देखने को मिल जाएगा। खड़ीबोली में कार्य करने और उसे साहित्य की भाषा में अग्रसर करने में अमीर खुसरो का योगदान अहम माना जाता है जिसे उन्होंने हिंदुई, हिंदवी, हिन्दुवी आदि नाम दिए । दक्खिन के अनेक कवियों ने इसे दक्षिण में फैलाया जब मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली से देवगिरि (दौलताबाद) में अपनी राजधानी को ले जाता है उसे साथ में हजारों की संख्या में उत्तर भारत के निवासी दक्षिण में जा बसते हैं और वहाँ जाकर इस भाषा का प्रचार प्रसार और साहित्य लिखना आरंभ करते हैं। इसी प्रकार से शिवाजीके दरबार में "गुरु रामदास" मुख्य थे। शुरुआती आधुनिक काल में "रामप्रसाद निरंजनी" का "भाषा योगवाशिष्ठ" का योगदान भी अहम माना गया है और गुजरात में "प्राणनाथ " ने खड़ीबोली को आंशिक रूप से फैलाया।

यह सब होते हुए भी खड़ीबोली शब्द का सबसे पहला प्रयोग फोर्ट विलियम कॉलेज में हुआ। इसकी स्थापना 1800 में हुई जिसके संस्थापक (मार्किस वेलेजली) थे। कॉलेज में खड़ीबोली के प्रचार प्रसार का श्रेय वहाँ के पहले हिंदी विभागाध्यक्ष "जॉन गिलक्राइस्ट" को दिया जाता है। 18वी शती में जब वह कलकत्ता पहुँचे तब उन्होंने शुरू में हिंदी का पठन पाठन शुरू किया और 1800 में जब उनकी नियुक्ति कॉलेज में हुई तो उन्होंने ऐसी भाषा का प्रयोग करने पर बल दिया जिससे उनका वर्चस्व का भी बना रहे और भाषाई आधार पर संपर्क भी कायम रहे। तब उन्होंने लल्लूलाल और सदलमिश्र जी को कॉलेज के हिंदी विभाग में शिक्षकों के रूप में नियुक्त किया जिससे कि अंग्रेजी अफसर उचित रूप से खड़ीबोली सीख सके।


● जॉन गिलक्राइस्ट ने अपने पत्रों में खड़ीबोली का इस्तेमाल 3 बार किया है जो इस तरह है:- 

1 "इन कहानियों में से कई खड़ीबोली या हिंदुस्तानी के शुद्ध हिंदवी ढंग की है"...। (हिंदी स्टोरी टेलर भाग 2)

2 "ठेठ खड़ीबोली में हिंदुस्तानी के व्याकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता और अरबी-फारसी का प्रायः पूर्ण त्याग रहता है"...। (दि ओरियन्टल फेब्युलिस्ट)

3 "मुझे खेद है कि ब्रज की तरह खड़ीबोली को सम्मान नहीं मिला"।


यहाँ एक बात ध्यातव्य है कि जॉन गिलक्राइस्ट खड़ीबोली, हिंदी, हिंदुस्तानी में कन्फ्यूज़ थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि कौन सी खड़ीबोली है और कौन सी हिंदुस्तानी। क्योंकि जहाँ वह अरबी फारसी के शब्दों के बहिष्कार की बात कर रहे हैं वहीं वह हिंदुस्तानी भाषा का भी नाम दे रहे हैं जबकि हिंदुस्तानी भाषा में अरबी-फारसी के कई शब्द होते हैं। 

कम्पनी द्वारा खड़ीबोली के प्रचार प्रसार करने हेतु गिलक्राइस्ट के काम में कई भाधा पहुँचाई गई क्योंकि इससे कम्पनी को लग रहा था कि कहीं उनका वर्चस्व कम न हो जाये। कम्पनी द्वारा इस प्रतिक्रिया से क्षुब्ध होकर सर गिलक्राइस्ट ने 1804 में पद से त्याग दे दिया और इंग्लैंड में जाकर वहाँ के फोर्ट विलियम कॉलेज में 1806 तक अध्यक्ष रहे और मृत्युपर्यन्त तक हिंदुस्तानी की सेवा में लगे रहे।


●भारत का फोर्ट विलियम कॉलेज 1854 और इंग्लैंड के 1857 में बंद हो गया ।


इसी तरह लल्लूलाल ने "प्रेमसागर" में और सदलमिश्र ने "नास्कितोपाख्यान" में भी खड़ीबोली शब्द का इस्तेमाल किया है। 

अर्थात 1803 में खड़ीबोली शब्द का इस्तेमाल 5 बार हुआ था।


1805 में सदलमिश्र ने अपने ग्रँथ "रामचरित्र" में खड़ीबोली का इस्तेमाल का उल्लेख किया है :- " अब इस पोथी को भाषा करने का कारण सिद्ध है कि मिस्टर जॉन गिलक्राइस्ट साहब ने ठहराया और एक दिन आज्ञा दी कि आध्यात्म रामायण को ऐसी बोली में करो जिसमें अरबी-फ़ारसी न आवे। तब मैं इसको खड़ीबोली में कहने लगा और 1805 में यह ग्रँथ पूरा होता है। 

इससे यह सिद्ध होता है कि "खड़ीबोली" नाम का श्रेय फोर्ट विलियम कॉलेज को दिया जाता है और यह भाषा व्यापक रूप में आगरा से लेकर पटना तक व नीचे महाराष्ट्र के कुछ हिस्से तक फैली थी।


●इसी समय दो अन्य साहित्यकार जोकि फोर्ट विलियम कॉलेज से बाहर थे वह भी उसी प्रकार की भाषा में लिख रहे थे जिसका उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं। जिनके नाम थे :- 


1 "सदासुखलाल" :- उर्दू के अच्छे लेखक होते हुए भी इन्होंने खड़ीबोली के उस रूप को ही महत्व दिया जिसमें पंडिताऊपन और अन्य बोलियों का चित्रण न हों।

2 "इंशा अल्लाह खां" - इन्होंने "रानी केतकी की कहानी" ऐसी ठेठ भाषा में लिखी जिसमें ध्यान रखा गया कि हिंदी के अतिरिक्त किसी बाहर की बोली का पुट न हो"..। 

इंशा ने इस बारे में स्पष्ट कहा है कि " एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढ़ी की कोई कहानी ऐसी होनी चाहिए कि हिंदवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो । यहाँ भाखापन का अर्थ "ब्रज" भाषा से है।


●19वी शती की प्रारंभिक भाषा में तुकबंदी, लयात्मकता, अलंकारम्यता, नाना प्रकार के प्रयोग, अनेक बोलियों के शब्दों का मिश्रण मिलता है फिर भी सामूहिक प्रयास से ब्रजभाषा के समक्ष खड़ीबोली अंततः खड़ी हो गयी है। यह ठीक है कि खड़ीबोली का परिनिष्ठित या मानक रूप स्थिर नहीं हो सका पर इसका विस्तार खूब हुआ और फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के प्रश्रय के कारण ही इसे यह मान्यता प्राप्त हुई।

●1802 में सिविल सेवा के अधिकारी "विलियम बटरवर्थ बेली" ने हिंदुस्तानी और हिंदी का एक ही अर्थ में प्रयोग किया। उनको हिंदुस्तान में कारवाई के लिए "हिंदी जबान" शीर्षक निबन्ध पर 1500 रुपये नकद और मैडल प्राप्त हुआ  


एक बात ध्यान देने योग्य है कि "हिंदी के लिए गौरव की बात यह हुई कि उस समय की संपर्क भाषा खड़ीबोली थी और आगरा व्यापारिक केंद्र होने के कारण वहाँ की खड़ीबोली पढ़ाने के लिए मुंशी रखे गए जिससे इस भाषा के तहत देश में सुचारू रूप से शासन चलाया जा सके"..। यह सही मायने में खड़ीबोली का विकास ही तो था।


●फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रथम 4 अध्यक्ष :-

1 जॉन गिलक्राइस्ट 1800 से 1804 तक

2 कैप्टन माउंट 1806 से 1808 तक

3 कैप्टन टेलर 1808 से 1823 तक। 

कैप्टन टेलर ने ही 1815 में सर्वप्रथम हिंदी का आधुनिक रूप में इस्तेमाल किया।


4 कैप्टन विलियम प्राइस 1823 से 1831तक। 

कैप्टन प्राइस ने सर गिलक्राइस्ट के मत की आलोचना इस संदर्भ में की कि "राजभाषा फ़ारसी थी जबकि उसके प्रयोक्ता बहुत कम थे। विलियम प्राइस के बदौलत ही पहली बार 1816 के अध्यादेश में भाषायी तौर पर अनेक परिवर्तन हुए जिसके फलस्वरूप 1825 में पहली बार हिंदी और हिंदुस्तानी के भेद को मिटाकर हिंदी के प्रयोग पर बल दिया।


●19वी शती के मध्य में 2 साहित्यकार हुए जिन्होंने हिंदी को आगे बढ़ाने का कार्य किया।


1 शिवप्रसाद सितारे हिंद - हिंदी -उर्दू को समीप लाने के चक्कर में उर्दू को ही भर दिया। उनका मत था कि " हम लोगों को जहाँ तक बन पड़े उन शब्दों को लेना चाहिए जो आमफ़हम में प्रचलित हो"..। इनके प्रयास से भाषा में से पंडिताऊपन तो ख़त्म हुआ पर वर्तनी में एकरूपता नहीं आ सकी। 2-2 रुप चल रहे थे जैसे उनने - उन्ने, उसके उस्के आदि। इससे भाषा बिगड़ गई थी।

इनकी "राजा भोज का सपना" सरकारी नीति का पक्ष लेती नजर आती है और "इतिहास तिमिरनाशक" की उर्दू भाषा का काफ़ी विरोध हुआ ।


2 वहीं दूसरी ओर लक्ष्मण सिंह विशुद्ध हिंदी के पक्षधर थे और उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानते थे। इस सम्बंध में वह कहते भी हैं - " हमारे मत में हिंदी और उर्दू 2 न्यारी-न्यारी बोलियाँ हैं। हिंदी यहाँ के हिन्दू बोलते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमान और पारसी पढ़े हुए।परन्तु यह आवश्यक नहीं कि अरबी-फारसी के बिना हिंदी न बोली जाए और न हम उस भाषा को हिंदी कहते हैं जिसमें अरबी फ़ारसी के शब्द आए"। 


इसी तरह दयानंद सरस्वती, नवीनचंद्र राय, अम्बिका दत्त व्यास जी ने भी हिंदी के लिए कार्य किया।


● भारतेंदु ने लक्ष्मण सिंह और सितारे हिंद की हिंदी के बीच से नई हिंदी निकाली जिसमें न तो भाषा की पंडिताऊपन था और न ही उर्दू के बहुतेरे शब्द। उन्होंने साधु शैली का निर्णय किया और उस हिंदी को "नए चाल की हिंदी " 1873 में संज्ञा दी।

आचार्य शुक्ल इस सम्बंध में कहते हैं कि " जब भारतेंदु अपनी मँझी हुई परिष्कृत भाषा सामने लाए तो हिंदी बोलनेवाली जनता को गद्य के लिए खड़ीबोली का प्राकृत साहित्यिक रूप मिल गया और भाषा के स्वरूप का प्रश्न न रह गया। भाषा का स्वरूप स्थिर हो गया"..।


●"राष्ट्रभाषा" - शादिक अर्थ है "समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त होने वाली भाषा" (जनभाषा)। जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन-जन के विचार विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है। इसका क्षेत्र व्यापक होता है।

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सर्वप्रथम विचार "राजाराम मोहन राय" का था। इसी सम्बन्ध में न केवल भारतवासियों ने बल्कि बाहरी विदेशियों ने भी भारत की हिंदी भाषा को यहाँ की राष्ट्रभाषा बनाने का पुरज़ोर समर्थन किया 


●अंग्रेज़ो द्वारा हिंदी का प्रचार व समर्थन:-

1 जब भी किसी देश को एकता के सूत्र में बाँध कर रखने की बात हो या देश के बड़े हिस्से में प्रशानिक काम करने की बात हो, बड़े स्तर पर जनता से परिचित होना हो और अपनी बात उन तक पहुंचानी हो तो उस देश में एक ऐसी भाषा की जरूरत पड़ती है जोकि देश के लगभग सभी हिस्सों में नहीं तो एक बड़े भूभाग में जरूर उसका उपयोग किया जाता हो। जिसे सामान्य भाषा में राष्ट्रभाषा भी कहा जाता है। इसकी उपयोगिता से देश की संस्कृति, सामाजिक-राजनीतिक, व्यावहारिक संप्रभुता बनी रहती है। इस  नजर से हिंदुस्तान में "हिंदी" ही केवल एक भाषा है जिसे इतने बड़े रूप में प्रयोग किया जा सकता है। और ऐसा ही कुछ रुख़ अंग्रेज़ो ने भी अपनाया था जब उन्हें प्रशासनिक स्तर पर और जनता से संपर्क बनाने के लिए किसी भाषा की जरूरत पड़ रही थी। 

शुरुआत में अंग्रेजी कार्य व प्रशासन फारसी में होता था उसी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था फिर धीरे-धीरे उन्हें इस भाषाई समस्या का परिचय प्राप्त हुआ कि बड़ी मात्रा में जनता से संपर्क नहीं साधा जा रहा है। उन्होंने अवलोकन किया कि किसी ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाए जिसमें यह सारी कमी पूरी हो जाये । तब उन्हें केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा लगी जिससे उनकी भाषाई कमी को पूरा किया जा सकता है और इसी की कमी को पूरा करने के लिए 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना भी कराई गई थी और उसमें भी हिंदी विभाग को खोला गया था। जिससे कि अंग्रेजी अफसर हिंदी सीख सके और जनता से सीधा संपर्क साधने में कुछ हदतक सफलता भी प्राप्त कर सकें। इसी क्रम में हिंदी भाषा सीखाने के लिए भाखा मुंशी सदलमिश्र और लल्लू लाल की नियुक्ति हुई। अंग्रेज अफसरों ने इस भाषा की मुक्तकंठ से तारीफ़ भी की जिनमेँ प्रसिद्ध हैं:-


●"सी.टी.मेटकाफ" :- 1806ई.में अपने शिक्षा गुरु जान गिलक्राइस्ट को लिखा कि- "भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता से लेकर लाहौर तक, कुमाऊँ से लेकर नर्मदा तक....मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है"..।(हिंदी)

● ईसाई धर्म प्रचारको ने 1813 में विल्फोर्स एक्ट के पास होने के बाद से अपने धार्मिक ग्रँथ बाइबिल और अन्य धार्मिक छोटी छोटी पुस्तकें और पैम्फलेट हिंदी में बाँटने शुरू किया। इससे हिंदी का प्रचार तो हुआ ही परन्तु सही मायने में वह अपने धर्म का प्रचार करके भारत में अपनी पकड़ को मजबूत बना रहे थे।

●"विलियम कैरी" :- 1816ई. में लिखा - हिंदी किसी एक प्रदेश की भाषा न होकर सारे देश मे सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है"...।

●प्रथम 4 दशकों में सिविल सर्विस के अधिकारियों में जो हिंदी-हिंदुस्तानी की जो लहर उमड़ रही थी उसे रोकने के लिए मैकाले की नीति लायी गयी बावजूद उसके 1851 तक भारत में अंग्रेजी 2 % मात्र रह गयी थी। खुद अंग्रेज ही अंग्रेजी भाषा का विरोध कर रहे थे और अकाट्य तर्क दे रहे थे। इसके एवज में वह हिंदी का समर्थन कर रहे थे। 

इसी में एक मुख्य नाम इंग्लैंड के "फेड्रिक पिन्काट" का आता है जिनका कम्पनी से संग्राम 1868 में शुरू हुआ जब वह मात्र 32 साल की उम्र में थे। 1888 में श्रीधर पाठक को लिखे पत्र में वह स्पष्ट करते हैं कि " 20 साल पहले मैं एकमात्र यूरोपियन था जिसने सरकार पर हिंदी के बारे में दबाव डाला और 10 साल बाद इस नियम के बनाने में सफल रहा कि भारत जाने वाले अंग्रेजों को हिंदी की परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा"..।

ऐसी स्थिति में सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा और उन्होंने 1881 में सेक्रेटरी को सिविल सर्विस कमीशन को भेजा और भारतीय भाषा के ज्ञान को अनिवार्य रूप से सीखने के लिए मंजूर कर दिया। इसके साथ 1882 में यह व्यवस्था भी की गई कि मद्रास जाने वाले अधिकारियों को विशेष पुरुस्कार दिए जाएँ। इस भारतीय भाषाओं में हिंदुस्तानी मुख्य भाषा थी।


●1878 में ग्रिफिथ ने एक रिपोर्ट में कहा कि " इस देश की भाषा हिंदी है"..। उसमें इस घोषणा के साथ भारतीय आर्यभाषाओं को महत्व देने में हिंदी प्रथम स्थान पर थी। इसी के अलावा उन्होंने कल्पना भी की " यदि कोई भविष्य बताने का साहस करे तो वह यह भी कह सकता है कि भविष्य में उत्तर भारत की जो भाषा राजकाज या साहित्य की बनेगी वह अरबी-फ़ारसी से कम प्रभावित होगी, साथ ही उसमें वर्तमान हिंदी की अपेक्षा संस्कृत तथा प्राकृत के शब्द भी कम रहेंगे"..।

●1886 में लन्दन से प्रकाशित "हॉब्सन जाब्सन कोश" में हिंदुस्तानी को भारत की राष्ट्रभाषा कहा 

●"जॉन ग्रियर्सन" :- हिंदी आम बोलचाल की महाभाषा है'...।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Tuesday, October 13, 2020

हिंदी भाषा भाग:- 2

 


●अपभ्रंश और हिंदी का सम्बंध:-


1 संस्कृत में शब्द के 24 रूप होते हैं पर अपभ्रंश में शब्द के 2 ही रूप होते थे मूल और विकारी। उसी प्रकार से हिंदी में भी यही दो रूप लिए गए। "मूल रूप" साहित्यिक होता है और "विकारी रूप" देशभाषा का या बोलचाल का।

2 अपभ्रंश की तरह हिंदी में भी नपुंसक लिंग नहीं होता।

3 संस्कृत, पालि, प्राकृत भाषा संयोगात्मक भाषा है परन्तु अपभ्रंश वियोगात्मक भाषा है जो हिंदी के वियोगात्मक रूप से मेल खाती है।

4 अपभ्रंश में प्रयोग "तद्भव शब्दों" को हिंदी में स्वीकारा गया।


●अपभ्रंश के भेद:- 


(1) वैसे मोटे तौर पर यही वर्गीकरण माना जाता है।

अपभ्रंश                   आर्यभाषा

शोरसेनी  -         पश्चिम हिंदी, राजस्थानी, गुजराती

पैशाची  -             पंजाबी, लहन्दा

ब्राचड़  -              सिंधी

खस  -                पहाड़ी

अर्धमागधी  -       पूर्वी हिंदी

मागधी  -            बिहारी , बंगला, असमिया, उड़िया

महाराष्ट्र -            मराठी


● पहाड़ी और पंजाबी पर शौरसेनी अपभ्रंश का प्रभाव देखा जाता है। इस तथ्य को आप जरूर याद रखे क्योंकि कई जगह ये तथ्य दिए नहीं गए हैं और आने वाली परीक्षाओं में यह पूछा भी जा सकता है।


●अपभ्रंश का विस्तार:-


अपभ्रंश का विस्तार बहुत अधिक था। यह भाषा के रूप में उत्तरभारत से बंगाल, बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक स्वीकृत थी। महापंडित राहुल अपनी पुस्तक "हिंदी काव्यधारा" में कहते हैं - " जहाँ सरहपा और शबरपा बिहार-बंगाल के निवासी थे वहाँ अब्दुर्रहमान का जन्म मुल्तान में हुआ था। स्वयम्भू और कनकामर शायद अवधी और बुंदेली क्षेत्र युक्त प्रांत के थे तो हेमचन्द्र और सोमप्रभ सूरी गुजरात के। x x x इस प्रकार हिमालय से लेकर गोदावरी और सिंध से ब्रह्मपुत्र तक इस साहित्य के निर्माण में अपभ्रंश ने हाथ बटाया"..।

इससे सिद्ध होता है कि 11वी शती तक अपभ्रंश का प्रसार समस्त उत्तर भारत और दक्षिण में हो गया था। अपभ्रंश इस विस्तृत देश की जनभाषा थी।

●अपभ्रंश मुख्यतः प्राकृत शब्दकोश और देशी भाषाओं के व्याकरणिक ढाँचे को लेकर खड़ा हुआ। इसको "ग्रामभाषा" भी कहा गया।

●"अवहट्ट"- यह अपभ्रंश का परवर्ती रूप है जिसे "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की कड़ी कहा है। 

"अवहट्ट" अपभ्रंश और आधुनिक आर्यभाषाओं के बीच की कडी है जिसका समय 900ई. 1100ई. तक माना गया है परन्तु विद्यापति ने इस भाषा का प्रयोग14वी शती में भी किया है। विद्यापति ने इसे देसीभाषा का नाम देकर प्रयोग किया है क्योंकि उनके अनुसार यह मीठी और जनता की भाषा है।

 "देसिल बअना सब जन मिट्ठा

 तँ तैसन जम्पओ अवहट्ठा"

काफी समय तक इस भाषा को अपभ्रंश के अंतर्गत ही उसकी उपरूप की भाँति देखा जाता रहा और इस बात में कोई 2 राय नहीं है कि शुरुआत में इस भाषा में अपभ्रंश के ज्यादात्तर लक्षण दिखते थे परन्तु धीरे-धीरे यह कम होते गए और वह आधुनिक आर्य भाषाओं की तरफ बढ़ती गयी।

●सर्वप्रथम "बाबू सक्सेना राम" ने इस भाषारूप पर अपने ग्रन्थ "कीर्तिलता" में इसकी चर्चा की। उनके अनुसार कीर्तिलता की भाषा (अवहट्ठ) आधुनिक मैथिली और मध्यकालीन प्राकृत के बीच है। उसी ग्रन्थ में मैथिली अपभ्रंश की संज्ञा भी दी गयी है।

● "डॉ शिवप्रसाद सिंह" ने अपने ग्रँथ "कीर्तिलता और अवहट्ट" (1955) में बड़े विस्तार के साथ स्पष्ट किया है। उनके अनुसार शौरसेनी अपभ्रंश राजनीतिक और भाषा वैज्ञानिक कारणों से राष्टभाषा का रूप ले रहा था। उसी का परवर्ती रूप ईसा की 11वी शती से 14वी शती तक उत्तर भारत की साहित्यिक भाषा बना। यह अवहट्ट थोड़े प्रांतभेदों के अलावा सर्वत्र एक सा ही है। x x x "ईसा की 11वी शती से ईसा की 14वी शती तक के काल को हम अवहट्ट का काल मानते हैं" (पृ 24 व 31)

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि "कीर्तिलता की भाषा पर मैथिली का रंग अवश्य है परन्तु उसके मूल में शौरसेनी अपभ्रंश की प्रवृतियाँ है इसे कौन अस्वीकार कर सकता था"..।


(6) ● प्रारम्भिक हिंदी (पुरानी हिंदी)

मूलतः अपभ्रंश के परवर्ती रूप को ही पुरानी हिंदी माना गया है परन्तु इस पर भी कुछ विद्वानों के थोड़े भिन्न मत हैं। 

जहाँ एक ओर गुलेर जी अपभ्रंश के परवर्ती रूप को पुरानी हिंदी कहते हैं और जिनका मत सबसे ज्यादा प्रभावी और स्वीकार्य भी है। इसी मत की पुष्टि डॉ हरदेव बाहरी भी करते हैं कि "11वी शती की परवर्ती अपभ्रंश से पुरानी हिंदी का उदय माना जाता है"..। परन्तु आचार्य शुक्ल , राहुल जी और रामकुमार वर्मा इसे थोड़ा और पीछे ले जाकर अपभ्रंश से जोड़ देते हैं। 

आचार्य शुक्ल अपने इतिहास में कहते हैं :-"हिंदी काव्य भाषा के पुराने रूप का पता हमें विक्रम की 7वी शती के अंतिम चरण में लगता है"..। x x x देश भाषा मिश्रित अपभ्रंश अर्थात पुरानी हिंदी की कावयभाषा है'..(पृ 10, 12)

●सर्वप्रथम "पुरानी हिंदी" नामक विषय पर चर्चा गुलेरी जी ने अपने शोध आलेख 1921 में "पुरानी हिंदी" नामक से की थी। यह उनका आलेख शायद सरस्वती में छपा था और बाद में 1948 के समय "नागरी प्रचारिणी सभा" ने पुस्तकाकार कराके प्रकाशित कराया और तत्कालीन साहित्य मंत्री "आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र" ने अपने वक्तव्य में लिखा था कि - "विचार था कि इसमें उदधृत अपभ्रंश या अवहट्ट के अवतरणों की वैज्ञानिक टीका-टिप्पणी कराकर जोड़ दी जाए".।

●गुलेरी जी ने अपनी पुस्तक के वक्तव्य में कहा था " प्रायः यह समझा जाता रहा है कि उन्होंने "अपभ्रंश" को ही पुरानी हिंदी की संज्ञा दी। ऐसा नहीं है, उन्होंने अपभ्रंश के 2 रूप बताए हैं:-

पुरानी अपभ्रंश (प्रारंभिक अपभ्रंश)

पिछली अपभ्रंश (उत्तरकालीन अपभ्रंश)

"पुरानी अपभ्रंश संस्कृत और प्राकृत से मिलती है और पिछली पुरानी हिंदी से"...।

उनका तात्पर्य था कि आगे और व्यापक खोज होनी चाहिए जिससे निश्चित रूप से यह पता लगाया जा सके कि कहाँ तक के साहित्य को अपभ्रंश माना जाए और कहाँ से प्राप्त साहित्य को अपभ्रंश न कहकर "पुरानी हिंदी" कहा जाए। जहाँ से हिंदी आरंभ होती है, इसका निर्णय करना कठिन किंतु रोचक और बड़े महत्व का है। इन दो भाषाओं के समय और देश के विषय में कोई स्पष्ट रेखा खींची जा सकती "..।

●चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी ने पुरानी हिंदी और अस्तित्व में आती हुई आधुनिक आर्यभाषाओं के साथ देसीभाषाओं के आगमन पर नदी के रूपक को बाँधकर स्पष्ट करते हुए कहा है कि :- " बाँध से बचे हुए पानी की धाराएँ मिलकर नदी का रूप धारण कर रही थी।उनमें देशी की धाराएँ भी आकर मिलती गई। देशी और कुछ नहीं, बाँध से बचा हुआ पानी था जो नदी मार्ग पर चला आया। उसे भी कभी- कभी छानकर नहर में ले लिया जाता था। बाँध का जल भी रिसता-रिसता इधर मिलता आ रहा था। पानी बढ़ने से नदी की गति वेग से निम्नाभिमुखी हुई, उसका अपभ्रंश नीचे को बिखरना। अब सूत के नये किनारे और नियत गहराई नहीं रही"..(पुरानी हिंदी)..।


(7) ●हिंदी और हिन्दीतर बोलियों का परिचय:-


हिंदी शब्द की उतपत्ति:- हिंदी (नष्ट करना) +टू (दुष्ट) अर्थात हिन्दू का अर्थ "जो दुष्टों का विनाश करने वाला हो", "हीनो को दूषित करने वाला"। परन्तु ये मत कल्पना पर आधारित है।

भोलानाथ तिवारी के अनुसार "हिन्दू" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 7वी शती के अंतिम चरण के ग्रन्थ "निशीथचूर्णी" में मिलता है।

●"हिन्दू शब्द" फारसी है जो संस्कृत के सिंधु का फारसी रूपांतरण है। सिंधु शब्द का सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है। जहाँ उसका प्रयोग नदी के रूप में हुआ था। 

●500 ई.पू में ईरानियों का कब्जा सिंधु के आसपास के क्षेत्र पर था और सिंधु शब्द ईरानी में हिन्दू हो गया। क्योंकि उनकी भाषा व्याकरण में शायद "स" को "ह" पढा जाता था। यही हिन्दू शब्द आगे चलकर हिंदुस्थान, हिंदुस्तान आदि बना।

●हिन्द शब्द में "इक" प्रत्यय जुड़ने से हिन्दीक बना जिसका अर्थ था "हिन्द का"। कल्पांतर में "क" हटने और "ई" जुड़ने से हिंदी बना अर्थात हिन्द का वासी।

आगे चलकर यह भाषा "हिन्द की भाषा" के रूप में हुआ।

●ग्रीक के लोग सिंधु को "इंदोस" कहते थे उसी से वहाँ के निवासियों को "इन्दोई"तथा प्रदेश को "इंदिके" या "इंदिका" कहा। "इंदिका" शब्द जो अंग्रेज़ो के आने से "इंडिया" हो गया।

●किसी भी भारतीय प्राचीन ग्रन्थ में हिंदी शब्द का प्रयोग नहीं है। केवल कालकाचार्य के जैन महाराष्ट्री में हिंदुग शब्द का प्रयोग है।


(8) ●भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग:-


1 भाषा के सम्बंध में हिंदी का प्रयोग अरब और फारस से होता है।

2 ईरान के बादशाह "नौशेरवाँ" ने 6ठी शती में अपने दरबारी हकीम को "पंचतंत्र का अनुवाद" लिखने को कहा तब उन्होंने "जबान-ए-हिंदी" में उसे किया। उस हिंदी का अर्थ संस्कृत-पालि-प्राकृत भाषाओं के सम्बंध में था।

3 भारत के फ़ारसी कवि "ओफी" ने 1228 ई. में "हिंदवी" शब्द का प्रयोग भारत की मध्यदेश की देसीभाषाओ के लिए किया था।

4 तैमूरलंग के पोते "शरफुद्दीन यजदी" ने अपने ग्रँथ "जफरनामा" 1424 ई. में "हिंदी भाषा" का अर्थ "हिंदी" के लिए किया था।

5 धीरेंद्र वर्मा के "हिंदी साहित्य कोष" के अनुसार 13वी 14वी शती में देसीभाषाओ को हिन्दीक, हिन्दुई, हिंदी आदि नाम "अबुलहसन" ने दिया जो सबसे महत्वपूर्ण है।

6 भोलानाथ तिवारी और उदयनारायण तिवारी ने अबुलहसन के द्वारा प्रयुक्त "हिंदी" को सन्दिग्ध मानते हुए उसे भारतीय मुसलमानों और मध्यदेशीय भाषा के लिए इस्तेमाल माना है।

7 हिंदुवी या हिंदुई शब्द वस्तुतः हिंदवी का ही है जिसका अर्थ था हिंदुओ की भाषा जो आगे चलकर 18 शती तक हिंदुओ के लिए रूढ़ हो गई ।

8 "उर्दू" शब्द मूलतः तुर्की के है जिसका अर्थ है "शाही शिविर या खेमा" (दल)..।

9 प्रो. ताराचंद का कहना है कि उर्दु का शुरूआती रूप "मुसहफ़ी" में मिलता है।

10 हिंदी का नवीन लिखित अर्थ में प्रयोग सर्वप्रथम 1815 ई.फोर्ट विलियम कॉलेज में कैप्टन टेलर ने किया।


(9) ●हिंदी उपभाषाएँ और बोलियों का परिचय:- 

हिंदी भाषा भाषी क्षेत्र अम्बाला (हरियाणा) से लेकर पूर्णिया(पूर्णिया) और बद्रीनाथ(उत्तराखंड) से लेकर खण्डवा (मध्यप्रदेश) तक फैला है। इसके अंतर्गत9 राज्य - उत्तरप्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश,उत्तराखंड तथा 1 केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली भी आता है। इन राज्यों में देश की 43% जनसंख्या रहती है।

●सर्वप्रथम एक अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी जॉर्ज ग्रियर्सन ने 1889ई. में "मॉर्डन वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान" अपने साहित्य इतिहास में हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों का परिचय दिया था। बाद में ग्रियर्सन ने 1894 से 1927 तक के 33 वर्षों के अपने अध्धयन में "ए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया" नाम की भाषा आधारित पुस्तक निकाली। इसमें हिंदी की उपभाषाओं, बोलियों को उसके व्याकरणिक तथा शाब्दिक आधार पर उसका क्षेत्र को निर्धारित किया गया। 

इसके बाद "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने बंगला भाषा का उद्भव और विकास "origin and development og Bengali language" 1926 में लिखा। चटर्जी पहाड़ी भाषाओं को इसमें नहीं गिनते।

धीरेंद्र वर्मा "हिंदी भाषा का इतिहास" 1933 ई. का वर्गीकरण सुनीतिकुमार चटर्जी के आधार पर ही किया। केवल उसमें संशोधन के आधार पर पहाड़ी को जोड़ दिया गया।

इसके अलावा कई विद्वानों के अपने अलग अलग मत है हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों के बारे में जिस पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है। 

मुख्य तौर पर हिंदी की 5 उपभाषाएँ हैं और17 बोलियाँ ।


●पश्चिमी हिंदी उपभाषा की 5 बोलियाँ जोकि शौरसेनी अपभ्रंश से निकली हैं:

1 खड़ीबोली- इसका मूल नाम "कौरवी" है और साहित्यिक नाम खड़ीबोली। इसके मानक रूप को हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा और राजभाषा होने का गौरव प्राप्त है। इसे दिल्ली मेरठ के अतिरिक्त रामपुर,

सहारनपुर, मुरादाबाद,देहरादून,अम्बाला में भी बोला जाता है।

2 ब्रज- इस भाषा का सम्बंध मध्यकाल से ही रहा है जिसमें "कृष्णकाव्य" बहुत बड़ी मात्रा में लिखा गया है और "रीतिकालीन साहित्य" भी इसी भाषा में ज्यादातर लिखा गया है।  बंगाल में इसका नाम ब्रजबुलि पड़ा। 

मथुरा इसका केंद्र है।उसके अतिरिक्त मथुरा,वृंदावन, एटा,बदायूँ, बरेली, अलीगढ़, मैनपुरी में बोली जाती है।

3 हरियाणवी - इसे "देसवाली" ," जाटू" और ग्रियर्सन इसे "बाँगरू" कहते हैं। बाँगर का अर्थ उच्च भूमि होता है। यमुना के उच्च भूमि में कहे जाने के कारण नाम पड़ा। इसे जींद , हिसार , रोहतक , कुरुक्षेत्र, नरवाना, कैथल, करनाल आदि में बोला जाता है।

4 कन्नौजी- इसका नाम "कन्नौज नगर" के नाम पर पड़ा। इसके अन्य नाम "कन्नौजिया, कनउजी"भी हैं। इसके मुख्य क्षेत्र पीलीभीत, इटावा , कानपुर, फरुखाबाद, शाहजहाँपुर, हरदोई है। पीलीभीत और इटावा की बोली पर "ब्रज" का प्रभाव है। डॉ धीरेंद्र वर्मा इसे ब्रज की "पूर्वी उपबोली" भी कहते हैं।

5 बुंदेली- "बुंदेलखंड" की बोली होने के कारण नाम पड़ा है। बुंदेलखंड मुख्यतः बुंदेली राजपूतों का एरिया है। इसका मुख्य क्षेत्र चंबल,जबलपुर, रीवाँ, जालौन, झाँसी, हमीरपुर, ग्वालियर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर, सिवनी आदि में बोली जाती है।


●पूर्वी हिंदी उपभाषा की 3 बोलियाँ जोकि अर्धमागधी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 अवधी- इसका केंद्र "अयोध्या" है। इस भाषा के सबसे बड़े कवि "तुलसी" है और इसी की एक अन्य रूप "बैसवाड़ी" के कवि जायसी माने जाते हैं। इसको "कोशली" भी कहते हैं। इसके स्थान हैं- गोंडा, लखीमपुर, बहराइच, फैजाबाद, मिर्जापुर, फतेहपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, सीतापुर, जौनपुर आदि।

2 बघेली- "बघेल राजपूतों का क्षेत्र" और रीवाँ के आसपास का क्षेत्र बघेलखण्ड कहलाता है। यह बालाघाट, मांडला, फतेहपुर, जबलपुर, रीवाँ,बाँदा आदि में बोलते हैं।

3 छतीसगढ़ी- इसका मुख्य क्षेत्र "छत्तीसगढ़" है। बालाघाट के लोग इसे "खलोटी या खहलाटी" भी कहते हैं। यह रायपुर, बिलासपुर, खैरागढ़ आदि में बोली जाती है।


●बिहारी हिंदी उपभाषा की 3 बोलियों का परिचय जोकि मागधी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 भोजपुरी- कुछ लोग इसे "पुरबिया या भोजपुरिया" भी कहते हैं। यह सारन, चंपारन, मुज्जफरपुर, गाजीपुर, देवरिया,हरदी, गोरखपुर, आदि में बोली जाती है।

2 मगही- इस बोली को कुछ लोग "मागधी" भी कहते हैं। इसका क्षेत्र पटना, हजारीबाग, मुंगेर, भागलपुर, राँची है।

3 मैथिली-यह बिहारी हिंदी की सबसे "प्राचीन" भाषा है जिसका इस्तेमाल "विद्यापति" ने किया था। इसे "तिरहुतिया" भी कहा जाता है। इसका क्षेत्र दरभंगा, पूर्णिया, नेपाल का रौतहट, मोहतरी आदि में बोली जाती है।


●राजस्थानी उपभाषा की 4 बोलियाँ जो शौरसेनी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 मारवाड़ी- यह राजस्थानी की सर्वप्रमुख बोली है। "मारवाड़" की बोली होने के कारण यह मारवाड़ी कही जाती है। साहित्यिक मारवाड़ी को "डिंगल" भी कहा जाता है। यह पश्चिमी राजस्थानी है। इसका क्षेत्र मारवाड़, मेवाड़ ,बीकानेर, सिंध, जैसलमेर आदि है।

2 जयपुरी- ग्रियर्सन इसे मध्य पूर्वी राजस्थानी कहते हैं। इसे ढूंढाड़ी भाषा भी कहा जाता है। यह अलवर,किशनगढ़, अजमेर, आदि में बोली जाती है।

3 मेवाती- मेव लोगों के कारण इसे मेवाती कहा जाता है। मेवात इसका मुख्य क्षेत्र है। यह उत्तरी राजस्थानी है।यह वैसे पूरे अलवर की भाषा है और ब्रज क्षेत्र के जुड़ी भाषा है। भरतपुर और गुडग़ांव के पास भी बोली जाती है।

4 मालवी- मालव प्रदेश की मुख्य बोली है।मालवी को अवन्ति का विकसित रूप कहा जाता है क्योंकि पहले इस क्षेत्र की बोली को अवन्ति कहा जाता था।यह दक्षिणी राजस्थानी है। यह मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों जगह बोली जाती है जैसे इंदौर, उज्जैन, देवास,रतलाम,भोपाल, आदि।


●पहाड़ी हिंदी उपभाषा की 2 बोलियाँ जो "खस अपभ्रंश" से निकली हैं:-

1 कुमायूंनी - "कुमायूँ" इसका मुख्य क्षेत्र है। इसका संबन्ध कुर्मांचल से है। यह अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली,उत्तरकाशी के जिलों में बोली जाती है।

2 गढ़वाली- इसका मुख्य क्षेत्र "गढ़वाल" है। पहले का केदारखण्ड या उत्तराखंड बहुत से गढ़ो के कारण गढ़वाल कहा जाता था। इसके क्षेत्र हैं देहरादून, मुरादाबाद, टेहरी,बिजनौर, आदि।


●सिंधी- यह शब्द संस्कृत से निकला है जो सिंधु नदी से बना है। उसके आसपास के देश को सिंधु देश कहा गया और वहाँ की भाषा और उन्हें बोलने वालों को सिंधी कहा गया।

इसकी मुख्य 5 बोलियां हैं:- विचोली, थरेली, लासी, लाडी, सिराइकी। इसकी लिपि लंडा है।

●लहन्दा:- इसका अर्थ होता है पश्चिमी। इसके अन्य नाम मुल्तानी, जाटकी, पश्चिमी पंजाबी, हिन्दकी। इसकी भी लिपि "लंडा" ही है जो कश्मीर की शारदा लिपि की एक शाखा है।

●पंजाबी:- इसका अर्थ है पाँच नदियों का देश। इसकी भी लिपि लंडा थी जिसे "गुरु अंगद" ने बदलकर गुरुमुखी कर दिया था।

पंजाबी की मुख्य बोलियां हैं- दोआबी, डोगरी, माझी, राठी।

●गुजराती:- ये गुजरात प्रदेश की भाषा है जो "गुर्जर" के विकसित रूप गुजरात से बनी है। इसकी लिपि भी गुजराती है जिसमें शिरोरेखा नहीं लगती है।

●मराठी:- महाराष्ट्र प्रदेश की भाषा है जिसकी मुख्य बोलियाँ हैं:- कोंकणी, नागपुरी, कोष्टी, महारी।

इसकी लिपि देवनागरी है पर कुछ लोग "मोड़ी लिपि" का भी प्रयोग करते हैं।

●बांग्ला:- बंग+आल से बना है। यह बंगाल प्रदेश की भाषा है। इसकी लिपि देवनागरी की प्राचीन लिपि से विकसित है इसलिए भी इसे हिंदी की बोलियों में गिन लिया जाता है।

●असमिया:- ये "असम प्रदेश" की भाषा है जिसकी लिपि बंगला है। इसकी मुख्य बोली "विशनुपुरिया" है।

●उड़िया:- यह "उड़ीसा" की भाषा है।इसकी मुख्य बोलियां भत्री, गंजामी, सम्भलपुरी।

उड़िया भाषा बंगला से मिलती जुलती है किंतु इसकी लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली से विकसित है।


यहाँ पर जो भाषा और बोलियाँ है उनको हिंदी की भाषाओं और बोलियों के वर्गरूप में शामिल केवल इसलिए किया गया है क्योंकि यह भी हिंदी की ही परवर्ती अपभ्रंश से निकली है और लिपि-व्याकरण आदि के आधार पर इनमें समानता है।


(10)●हिंदी बोलियों के उपनाम:-

1 हरियाणवी :- बाँगरू, देसवाली,जाटभाषा, चमरवा।

2 अवधी:-       कौशली, बैसवाड़ी।

3 खड़ीबोली:-  कौरवी।

4 छतीसगढ़ी:-  खलटाही, लरिया।

5 बघेली:-        रीवाई।

6 डिंगल:-       भाटभाषा।

7 पिंगल:-        नागभाषा।

8 ब्रज -           बंगाल में इसे ब्रजबुलि कहा जाता है।

9 जयपुरी-       ढूंढाड़ी


(11)●बोलियों के नामकरण कर्ता :-

1 कौरवी-                   राहुल सांकृत्यायन

2 ब्रजबुलि-                ईश्वरचंद्र गुप्त

3 राजस्थानी,बिहारी-  ग्रियर्सन

4 डिंगल-                  बांकीदास

5 भोजपुरी-              रेमण्ड

6 मैथिली-                कोलब्रुक


12 ● बोली व उनकी विशेषता:-

A ओकरबहुला बोलियाँ - ब्रज, बुंदेली, कन्नौजी, मारवाड़ी, कुमाउनी, गढ़वाली, मालवी आदि।

B आकारबहुला बोलियाँ - कौरवी, दक्खिनी आदि

C इकारबहुला बोलियाँ - भोजपुरी

D उदासीन ओकारबहुला बोलियाँ - अवधी, बघेली ।


सहायक ग्रन्थ:-

1 हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2018।

2 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

3 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

4 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

5 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Sunday, October 11, 2020

हिंदी भाषा भाग :-1


हिंदी साहित्य में भाषा का विकास :- 


 (1) ●विश्व की लगभग 3000 भाषाओं में से "हिंदी" भी एक है जो अपनी वियोगात्मक या विश्लिष्ट रूप में विशेषपन रखने वाली भाषा है। 


● ऐसा माना जाता है कि भारत की सभी भाषाओं का उद्गम स्थल "संस्कृत" भाषा ही है, जिसमें से एक "हिंदी" भाषा भी निःसृत हुई है। हिंदी भाषा संस्कृत से होती हुई पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और अपभ्रंश में भी उसके क्षेत्रीय आधार पर बंटे भेदों से निकलकर आधुनिक हिंदी के रूप में विकसित व स्थापित हुई है और उसी में से हिंदी की उपभाषाओं व उपबोलियों आदि का जन्म हुआ है। 


परन्तु समकालीन विद्वानों ने "हिंदी" की उतपत्ति "अपभ्रंश" से मानी है क्योंकि  अपभ्रंश वियोगात्मक भाषा थी और हिंदी को भी वियोगात्मक भाषा माना जाने से वह अपभ्रंश के सबसे निकट बैठती है। लिपि और व्याकरण के आधार पर भी अपभ्रंश ही एक ऐसी भाषा है जो वर्तमान हिंदी के सबसे नजदीक देखी जाती है। क्योंकि संस्कृत से यदि हिंदी की तुलना की जाती तो संस्कृत में शब्द ह 24 रूप और लिंग के आधार पर भी उसके 3 रूप दिखे जाते हैं परन्तु अपभ्रंश और हिंदी के साथ ऐसा नहीं है। यहाँ पर मूल व विकारी रूप के साथ स्त्रीलिंग व पुल्लिंग रूप ही प्रचलित हैं अतः "हिंदी" की जननी "अपभ्रंश" है।


(2) भाषा :- भाषा "संस्कृत" के शब्द "भाष" धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है "व्यक्त वाणी"। भाषा उसे कहते हैं जो वाणी के रूप में अभिव्यक्त की जाती है। अर्थात जिसके माध्यम से हम अपने विचारों को आदान प्रदान करते हैं। यह और बात है कि समय के साथ भाषा का रंग-रूप भी बदला है और समाज में सामान्य तौर पर केवल मौखिक व लिखित भाषा को ही सबसे ज्यादा तरज़ीह दी जाती है परन्तु कुछ विशेष रूप में सांकेतिक भाषा का भी अपना दृढ़ अस्तिव है जिसके ऊपर कई लोग आश्रित हैं।


(3) भाषा की परिभाषा:- (भारतीय विद्वान)


1 "भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर भली भाँति प्रकट करता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टता समझ सकता है"...।                                                                                                      (कामताप्रसाद गुरु)


2 "भाषा निश्चित प्रयत्न के फलस्वरूप मनुष्य के मुख से निःसृत वह सार्थक ध्वनि-समष्टि है, जिसका विश्लेषण और अध्ययन हो सकें"..।                                                                                       (भोलानाथ तिवारी)


●(पश्चिमी विद्वान)


1 "भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते हैं जो अभिव्यंजना के लिए नियुक्त की जाती है"...।

                                                                (क्रोचे)


2 "ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है"..। 

                                                        (हेनरी स्वीट)


(4) ●भारत के प्रमुख रूप से 2 भाषा परिवार हैं:-


1 आर्यभाषा परिवार - समस्त उत्तर भारत की भाषाएँ ।

2 द्रविड़ भाषा परिवार- समस्त दक्षिण भारत की भाषाएँ।

भारत के भाषापरिवार में 4 भाषा परिवार हैं जैसे भारोपीय 73% , द्राविड़ 25%, ऑस्ट्रिक 1.3%, चीनी तिब्बती 0.7% बोलने वालों की सँख्या है।


(5) ●भारतीय आर्यभाषाएँ:- 


1 प्राचीन भारतीय आर्यभाषा:- 1500 ई.पू. से 500 ई.पू तक है जिसके दो भेद हैं:-

A- वैदिक संस्कृत- 1500ई.पू. से 1000ई.पू.तक।

B- लौकिक संस्कृत- 1000ई.पू.से 500ई.पू. तक।


●"वैदिक संस्कृत" में ही सभी प्राचीन भारतीय धार्मिक-पौराणिक-वेद-ब्राह्मण- उपनिषद-महाकाव्य आदि लिखे गए हैं। इसी को "वैदिक साहित्य" कहा गया।


●"लौकिक संस्कृत" में संस्कृत साहित्य के नाटक, काव्य ,शास्त्र , कालिदास के महाकाव्य व नाटक ,भरतमुनि का नाट्यशास्त्र, मुद्राराक्षस के महाकाव्य, काव्य, नाटक, पाणिनि का अष्टाध्यायी,आदि ग्रन्थ है।

2 मध्यकालीन आर्यभाषा :- इन सभी भाषाओं का प्रथम प्रमाणिक रूप अशोक के अभिलेखों से प्राप्त होता है। इसमें मुख्यतः निम्न भाषाओं को संकलित किया गया है:-

A- पालि-  प्रथम प्राकृत 500ई.पू. से लेकर 1 ई. तक।

B- प्राकृत- द्वितीय प्राकृत 1ई.से 500ई. तक।

C- अपभ्रंश -तृतीय प्राकृत 500 ई.से 1000ई. तक।

D- अवहट्ट - चतुर्थ प्राकृत 1100 से 1400ई.तक।


यहाँ पर प्रथम , द्वितीय "प्राकृत" इसलिए नाम दिया जा रहा है क्योंकि विद्वानों के अनुसार प्राकृत ही प्रथम "देसीभाषा" कहलाई जो संस्कृत से निकलकर लोक तक पहुँची थी। उसके बाद पालि, प्राकृत अपभ्रंश जोकि साहित्यिक नजरिये से इसी क्रमानुसार अस्तित्व में मानी गई हैं । फिर वह चाहे लोक की भाषा रही हो या साहित्य की, उसे प्रथम, दिव्तीय, तृतीय प्राकृत का नाम देकर उल्लेखित किया गया।


●"पालि"- प्रथम प्राकृत - पालि का अर्थ है"बुध वचन"। यह भारत की "प्रथम देशभाषा" है। सम्पूर्ण बौद्ध धर्म का साहित्य पालि भाषा में ही लिखा गया था। बौद्ध धर्म के "त्रिपिटक" पालि भाषा में ही लिखे गए हैं जिसमें जीवन और धर्म-कर्म आदि सम्बन्धी उपदेश दिए गए हैं।

"सूतपिटक"- बौद्ध भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी उपदेश।

"विनयपिटक"- जीवन यापन के उपदेश।

"अभिधम्मपिटक"- धर्म सम्बन्धी उपदेश।


●"प्राकृत" - दिव्तीय प्राकृत - (प्राक+ कृत= पहली सहज भाषा)..।

प्राकृत का सामान्य अर्थ :- सहज या स्वाभाविक होता है। जैन साहित्य का बहुत कुछ भाग प्राकृत में भी लिखा गया है।

प्राकृत के उत्तपत्ति के सम्बंध में 2 मत है:-


1 प्राकृत प्राचीन जनभाषा है:- "नामिसाधु" ने कहा है कि प्राक + कृत से बना है जिसका अर्थ है "पहले की बनी हुई भाषा"। जो मूल से चली आ रही है उसको प्राकृत कहते हैं। नामिसाधु में अपने "काव्यालंकार" में कहा है कि " सकल जगत के प्राणियों के व्याकरण आदि संस्कारों से रहित (इतर, हटके) सहजवचन व्यापार को प्रकृति कहते हैं। उससे उत्पन्न वही प्राकृत है। 


●"वाक्पतिराज" ने भी अपने ग्रँथ "गउड़बहो" में कहा है कि "जिस प्रकार जल सागर में ही मिलता है और वहीं से उत्पन्न होता है इसी प्रकार सभी भाषाएँ प्राकृत में मिलती है और यहीं से ही निकलर आगे बढ़ी हैं जिसमें से सभी आर्यभाषाएँ निकली हैं"।


2 प्राकृत की उत्पत्ति संस्कृत से:- जो मूल संस्कृत से आगत अर्थात निकली है वह प्राकृत है"..।      (हेमचंद्र)


●संस्कृत की विकृति प्राकृत है"...। (लक्ष्मीधर के "भाषाचंद्रिका" से)

अर्थात सभी मतों को देखने के बाद यह निश्चित हो जाता है कि वैदिक संस्कृत के अतिरिक्त उस समय जो भी संस्कृत बोली जाती थी ,जो जनभाषा के तौर पर प्रयोग की जाती थी वह प्राकृत थी। जो परिष्कृत-परिनिष्ठित संस्कृत नहीं थी, वेदों के अनुकूल नहीं थी उसे पंडितों ने, विद्वानों ने हीन भाषा माना और उसी मूल भाषा से निकली प्राकृतिक रूपी (सहजरूप में ) भाषा "प्राकृत" कहलाने का गौरव हासिल कर पाई। 

एक अर्थ यह भी हो सकता है कि जब किसी भाषा को समाज अपने कार्य व्यवहार के आधार पर प्रयोग करता है तब उसकी व्यापकता व प्रचार को देखते हुए उसे साहित्य की भाषा बनाने की कोशिश करता है। धीरे-धीरे उसे व्याकरणिक दृष्टि से परिमार्जित करना और मानक रूप देना शुरू किया जाता है और एक समय ऐसा भी आता है जब वह भाषा अपना पुराना अस्तित्व छोड़कर आगे बढ़ जाती है व साहित्यिक रूप अपना लेती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसका अस्तित्व ही मिट जाता है। लोक में उसका प्रयोग पहले की तरह कायम रहता है। ऐसा ही कुछ प्राकृत के साथ भी हुआ और बाकी अन्य आर्य भाषाओं के साथ भी।

यही प्राकृत भाषा आने वाले समय में अपने पूर्ण विकसित रूप में अभिव्यक्त हुई। और जब इस भाषा में साहित्य लिखा जाने लगा तो इसका साहित्यिक समय मूलतः 1ई.से 500ई. तक माना गया ।

अब सभी विद्वानों ने प्राकृत को संस्कृत से उत्पन्न भाषा मान लिया है। और "दिव्तीय प्राकृत" अर्थात प्राकृत को "साहित्यिक प्राकृत" भी मान लिया है।


●भरतमुनि ने अपने "नाट्यशास्त्र" में सर्वप्रथम प्राकृत भाषाओं के बारे में चर्चा की थी और उसके भेदों का वर्णन किया है:-


मुख्य प्राकृत                     गौण प्राकृत

मागधी                           शाबरी

अवन्तिज़ा                      आभीरी

प्राच्या                           चाण्डाली

सुरसेनी(शौरसेनी)            सचरी

अर्धमागधी                     द्राविड़ी

बाह्लीक                        उदरजा

दाक्षिणात्य(महाराष्ट्री)      वनचेरी


ये जो प्राकृत के भेद दिए गए हैं वह स्थान विशेष व वहाँ की संस्कृति के आधार पर वर्गीकृत है क्योंकि यह सभी स्थान भारत के राज्य-प्रांत-जनपद आदि के आधार पर बाँटे गए हैं । जैसे-जैसे भाषा का विकास होता गया वैसे -वैसे उस भाषा का भी नाम इन स्थान विशेष के आधार पर बदलता गया। उदहारणस्वरूप:- पहले मागधी प्राकृत तो बाद में मागधी अपभ्रंश हुआ और इसी तरह ये क्रम आगे देखा जा सकता है :-  शौरसेनी प्राकृत, शौरसेनी अपभ्रंश आदि। 

विद्वान "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने भी कुछ इस तरह से भाषाई तर्क रखे हैं । भाषा का विकास तो होता गया परन्तु स्थान विशेष में कोई खासा परिवर्तन न होने के कारण उनका भाषाई नाम ही बदला। वर्तमान में जो भी हिंदी की बोलियाँ निकली वह इन्हीं अपभ्रंशों में से उपभाषा और बोली के रूप में निकली। इसलिए कुछ समकालीन विद्वानों ने हिंदी की पूर्वज भाषा को अपभ्रंश माना है नाकि संस्कृत को जिसका सम्बन्ध हम ऊपर स्पष्ट कर चुके हैं।

 

●हेमचन्द्र ने अपने "प्राकृत व्याकरण" में प्राकृत के 3 भेद बताएँ हैं:-

1आर्षी(अर्धमागधी)  2 पैशाची-चूलिका  3 अपभ्रंश।


हेमचन्द्र की चूलिका-पैशाची को "दंडी" ने "भूतभाषा' कहा है और "महाराष्ट्री" को सबसे अच्छी प्राकृत भाषा कहा है। 


●महाराष्ट्री को प्राकृत व्याकरणों में आदर्श , मानक प्राकृत माना गया है। इस प्राकृत का मूल स्थान महाराष्ट्र है।

●डॉ हार्नले के अनुसार महाराष्ट्री का अर्थ है "महान राष्ट्र की भाषा" अर्थात राजपुताना और मध्यदेश की भाषा। 

●राजशेखर ने प्राकृत को "मीठी" और संस्कृत को "कठोर" भाषा कहा है।


●"अपभ्रंश" - तृतीय प्राकृत : - अपभ्रंश मध्यकालीन और आधुनिक आर्यभाषाओं के "बीच की कड़ी" है इसलिए विद्वानों ने इसे "सन्धिकालीनभाषा" भी कहा है। वैसे तो इसका मूलतः साहित्यिक समय 500ई. से 1000ई. तक ही माना है परन्तु व्यापक स्तर पर इसका साहित्यिक समय 8वी से लेकर 14वी शती तक माना गया है। 

1000ई. के बाद आदिकालीन साहित्य में हिंदी के कुछ कुछ स्पष्ट रूप दिखने लगे गए थे परन्तु न उसे स्पष्ट हिंदी का काल कहा गया और न ही उसे पूर्णरूप से अपभ्रंश काल। वह दोनों की सन्धि था इसलिए इस भाषा को सन्धिकालीन भाषा भी कहा जाता है। उस समय के काव्यों में दोनों ही भाषाओं के रूप स्पष्ट थे।

मुख्य रूप से जब भी किसी काल विशेष में एक भाषा के अंर्तगत या उसके समक्ष किसी अन्य भाषा का आगमन शुरू हो जाता है या उसके लक्षण दिखने लगे जाते हैं और तत्कालीन साहित्य में उसे भी जगह मिलनी शुरू हो जाती है तो वह सन्धिकालीन भाषा का रूप धारण कर लेती है। 

इसे आसान भाषा में ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब रीतिकाल के अंतिम दिनों में ब्रज के साथ खड़ीबोली का भी आगमन शुरू हो चुका था तो तत्कालीन साहित्य में इस्तेमाल भाषा को भी सन्धिकालीन भाषा कहा जा सकता है जिसमें ब्रज के साथ खड़ीबोली के भी शब्द आ रहे थे और इसका प्रभाव द्विवेदी युग तक हमें दिखाई देता है। 


● अपभ्रंश की अन्य परिभाषा:- 

1 जब भाषा के सम्बंध में सुसंस्कृत रूप न रहकर पंडितों की नजरों में वह भाषा बिगड़ी हुई मानी जाती है तो उसे अपभ्रंश की संज्ञा दी जाती है। अर्थात अपभ्रंश वह भाषा होती है जो मूल रूप से बिगड़ी हुई हो और साहित्य के लिए स्वीकार्य न हो। परन्तु विद्यापति जैसे उत्कृष्ट कवि ने इस भाषा का भी प्रयोग किया व अन्य आदिकालीन कवियों ने भी।

2 अपभ्रंश का सर्वप्रथम प्रयोग पतंजलि के "महाभाष्य" में मिलता है जहाँ उसका इस्तेमाल "अपशब्द" के रूप में हुआ है।

3 अपभ्रंश के सबसे प्राचीन उदहारण भरतमुनि के "नाट्यशास्त्र" में मिलते हैं जहाँ "विभ्र्ष्ट" के रूप में इस भाषा का उपयोग हुआ है। साथ ही इन्होंने इसे "अभिरोक्ति" भी कहा है।

4 भर्तृहरि ने "संस्कारहीन शब्दों" को अपभ्रंश कहा है। इस प्रकार से असाधु शब्द ही अपभ्रंश कहलाये। अर्थात जब मूल शब्दों को तोड़-मरोडकर या उसे अपनी सुलभता के साथ, मुख-सुख के आधार पर शब्दों को देसीरूप में प्रयोग किया जाता है तब वह अपभ्रंश भाषा  कहलाती है।

5 कालिदास के "विक्रमोवर्षी" नाटक में भी निम्न वर्ग द्वारा प्रयोग भाषा को "अपभ्रंश" माना है।

6 आचार्य दंडी में अपने ग्रन्थ "काव्यादर्श" में अपभ्रंश को "अभीर" कहा है, अर्थात अभीरों की भाषा। इससे यही अर्थ निकलता है कि अभीरों (अहीर जाती) की भाषा जो गोवी, गाँवी, गोणि, गोपोतिलिका,असाधु, नाम से प्रचलित थी बाद में प्रचलन के कारण यह साहित्यिक रूप में आ गई होगी।

7 शुक्ल के अनुसार अपभ्रंश नाम से पहले पहल वलभी के राजा "धारसेन द्वितीय" के शिलालेख में मिलता है जिसमें उन्होंने अपने पिता "गुहसेन" 593ई. को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश का कवि माना है।

"जैन-सिद्ध योगियों की भाषा भी अपभ्रंश थी"। 

"जब प्राकृत बोलचाल न रही तभी से अपभ्रंश साहित्य का विकास मानना चाहिए"।

"प्राकृत की अंतिम अवस्था प्राकृताभास या अपभ्रंश कहलाती थी"।

8 भोलानाथ तिवारी और उदयनारायण तिवारी के अनुसार भाषा के अर्थ में अपभ्रंश शब्द का प्रथम प्रयोग "चंड" ने अपने "प्राकृत लक्षण" में 6ठी शती में किया है।

9 इसके अतिरिक्त अपभ्रंश भाषा का प्रारंभ कब से हुआ उसके लिए 3 मत हैं।

1 डॉ उदयनारायण तिवारी की पुस्तक "हिंदी भाषा का उद्गम और विकास" में 700ई. माना है।

2 नामवर सिंह ने "हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान" में भी 700ई. माना है।  

3 भोलानाथ तिवारी 500ई.मानते हैं।


10 अपभ्रंश के साथ देसी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। "स्वयंभू" ने "पउम चरिउ" की भाषा को "देसी भाषा" कहा है।

11 रुद्रट के "काव्यालंकार" में कहे एक सूत्र की नामिसाधु नामक विद्वान ने इस सूत्र के आधार पर प्राकृत के समानांतर ही अपभ्रंश की भी स्थापना मानी है।

प्राकृत के साथ ही अपभ्रंश की स्थापना यहाँ पर एक प्रश्न खड़ा कर देती है कि, यदि प्राकृत जोकि प्रथम सहजभाषा मानी गई है जिसका उद्गम संस्कृत से हुआ था और अपभ्रंश भी जनता की भाषा थी, जिसे (जनभाषा/लोकलभाषा/ बोलचाल की भाषा) प्रत्येक साहित्यिक भाषा के समानांतर देखा जा सकता है। इस आधार पर तो प्राकृत और अपभ्रंश में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है क्योंकि दोनों ही लोक की भाषाएं थी जिसका प्रयोग निम्न वर्ग के लोग, सामान्य लोग आदि करते थे। 

लेकिन इस अनसुलझे प्रश्न का उत्तर हजारीप्रसाद जी अपनी पुस्तक "हिंदी साहित्य की भूमिका" 1953 में देते हैं कि " यह बात स्मरण योग्य है कि यद्यपि प्राकृत में लिखे गए काव्यों के बाद ही अपभ्रंश भाषा में काव्य लिखे गए परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि प्राकृत नाम की कोई भाषा पहले बोली जाती थी और अपभ्रंश नाम की भाषा बाद में बोली जाती थी। असल में अपभ्रंश लोक में प्रचलित भाषा का नाम है जो नाना काल में नाना स्थान में नाना रूप में बोली जाती है" (17)..। 

अर्थात प्राकृत और अपभ्रंश को एक ही रूप में देखा जा सकता है। इस तरह की भाषा हमेशा थी, है और आगे भी रहेगी क्योंकि जब भी किसी काल विशेष में कोई साहित्यिक भाषा होती है तो उसके समानांतर सामान्य रूप से एक आम बोलचाल की भाषा भी प्रचलन में रहती है जिसे इस्तेमाल करने के लिए किसी विशेष नियमों की आवश्यकता नहीं होती।  जिसे जनता अपनी समझ और विचारों के आदान प्रदान के लिए इस्तेमाल करते हैं, वह भाषा प्रत्येक काल की अपभ्रंश कहलाएगी। यह भाषा तबतक अस्तित्व में रहेगी जब तक इस धरती पर मनुष्य जाति है। क्योंकि प्रत्येक साहित्यिक भाषा के समानांतर एक लोकल भाषा भी चलती है। इसलिए साहित्यिक भाषा को मानक रूप दिया जाता है और अन्य को लोकल या जनभाषा।


12 जब अपभ्रंश  काव्य में प्रयुक्त हुई तब वह अपभ्रंश कहलाई अन्यथा आम जनता में वह देशभाषा कहलाई क्योंकि साहित्यिक भाषा में शब्दों का चयन सीमित और व्याकरणिक आधार पर होता है, देशभाषा में किसी भी शब्द को इस्तेमाल कर सकने की छूट रहती है। किसी तरह के व्याकरणिक नियम की आवश्यकता नहीं होती।


● अपभ्रंश के अन्य नाम :- विभ्र्ष्ट, अभीर, अवहन्स, अवहट्ट, अवहत्थ, औहट, अवहत आदि हैं। परन्तु साहित्य के स्तर पर इसका अर्थ अलग महत्व रखता है।जैसे - प्राकृत से निकलने वाली भाषा का साहित्य।


सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास ,रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2018।

2 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

3 हिंदी साहित्य की भूमिका, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, 10वां संस्करण ,2019।

4 हिंदी साहित्य और सम्वेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वां संस्करण, 2018।

5 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचन्द्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन, बनारस, 12वां संस्करण , 2018।

6 हिंदी भाषा ,कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन , इलाहाबाद, संस्करण 2010।

Tuesday, October 6, 2020

यात्रा वृतांत भाग -2



 अन्य गद्य विधा (यात्रा साहित्य)


1 कमलेश्वर- खण्डित यात्राएँ 1975

                 कश्मीर:रात के बाद 1997

                आँखों देखा पाकिस्तान 2006


2 गोविंद मिश्र- धुंधभरी सुर्ख 1979

                    दरख्तों के पार शाम 1980

                   परतों के बीच 1997


3 विष्णु प्रभाकर- ज्योतिपुंज हिमालय 1982

                        हम सफर मिलते रहे 1996


4 अजित कुमार- सफ़री झोले में 1985

                       यहाँ से कहीं भी 1996


5 राजेन्द्र अवस्थी- हवा में तैरते हुए 1986


6 रामदरश मिश्र - तना हुआ इंद्रधनुष 1990

                        भोर का सपना 1993

                        पड़ोस की खुशबू 1999


7 मंगलेश डबराल- एक बार आयोबा 1991

8 सीतेश आलोक- लिबर्टी के देश में 1997

9 वल्लभ डोभाल- आधीरात का सफर 1998

10 हिमांशु जोशी- यातना शिविर में 1998


11 रमेशचंद्र शाह- एक लंबी छांह 2000

                         देश देशांतर 2016


12 कृष्णदत्त पालीवाल- जापान में कुछ दिन 2003

13 नरेश मेहता- कितना अकेला आकाश 2003

14 नासिरा शर्मा- जहाँ फ़व्वारे लहू रोते हैं 2003


15 मनोहरश्याम जोशी- पश्चिम जर्मनी पर नजर 2006

                              क्या हाल है चीन के 2006


16 असगर वजाहत- चलते तो अच्छा था 2008

                             रास्ते की तलाश 2008

                        पाकिस्तान का मतलब क्या 2008


17 निर्मला जैन- दिल्ली:शहर दर शहर 2009

18 महेश दर्पण- पुश्किन के देश में 2010

19 राजेश कुमार व्यास- कश्मीर से कन्याकुमारी 2013

20 कृष्णा सोबती- बुद्ध का कमण्डल:लद्दाख 2014

21 फूलचंद माधव - मोहाली से मेलबोर्न 2015

22 महेश कटारे- देश विदेश दरवेश 2016

23 ज्ञानरंजन - कबाड़खाना

24 पंकज बिष्ट- खरामा खरामा 2012

25 पदम् सचदेवा- मैं कहती आँखिन देखी

 

सहायक ग्रन्थ:-

1  हिंदी साहित्य और सम्वेदना का विकास , रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वा संस्करण 2018

2 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचंद्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन बनारस, 12वा संस्करण2018

3 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरिएंट ब्लैकस्वान, 2018 संस्करण







Friday, October 2, 2020

यात्रा वृतांत -भाग 1

 


हिंदी साहित्य की अन्य गद्य विधा (यात्रा साहित्य)



1 बालकृष्ण भट्ट - गया यात्रा 1894

2 प्रतापनारायण मिश्र - विलायत यात्रा 1897

3 भारतेंदु - सरयू पार की यात्रा 1899

               लखनऊ की यात्रा 1889


4 गदाधर ठाकुर - चीन में 13 मास 1902

5 सत्यदेव परिव्राजक - अमेरिका दिग्दर्शन 1911

                               मेरी जर्मन यात्रा 1926

                             यूरोप की सुखद स्मृतियाँ 1937


6 शिवप्रसाद गुप्त - पृथ्वी प्रदक्षिणा 1914


7 राहुल सांकृत्यायन - 

लंका यात्रावली 1927   मेरी यूरोप यात्रा 1932

जापान की यात्रा 1935  मेरी तिब्बत यात्रा 1937

मेरी लद्दाख यात्रा 1939  तिब्बत में सवा वर्ष 1939

रूस में 25 मास 1944   किन्नर देश में 1948

घुमक्कड़शास्त्र 1949    यात्रा के पन्ने  1952

एशिया के दुर्गम खण्डों में 1956 

चीन में कम्यून 1959   

चीन में क्या देखा 1960


8 कन्हैयालाल मिश्र - हमारी जापान यात्रा 1931

                             इराक यात्रा 1940


9 सेठ गोविंददास - हमारा प्रधान उपनिवेश 1938

                          सुदूर दक्षिण पूर्व 1951

                         पृथ्वी परिक्रमा 1954


10 सत्यनारायण- आवारे की यूरोप यात्रा 1940

                        युद्धयात्रा 1940

                        यूरोप के झरोखें


11काका कालेलकर - हिमालय की यात्रा 1948

                               सूर्योदय के देश 1955


12 यशपाल - लोहे की दीवार के दोनों ओर 1953

                    राहबीती 1957

                   स्वर्गोद्यान बिना साँप 1975


13 रामवृक्ष बेनीपुरी - पैरों में पंख बाँधकर 1952

                            उड़ते चलो-उड़ते चलो 1954


14 मोहन राकेश - आखिरी चट्टान 1953

15 मुनिकांत सागर - खोज की पगडंडियाँ 1953

                            खंडहरों का वैभव 1953


16 विद्यानिधि - शिवालिक की घाटियों में 1953

17 धर्मवीर भारती - यात्रा चक्र 1955

                         ठेले पर हिमालय 1958


18 भगवतशरण उपाध्याय - कलकत्ता से पेकिंग 1955

                                    सागर लहरों पर 1959


19अज्ञेय - अरे यायावर याद रहेगा 1957

                एक बूंद सहसा उछली 1960


20 ब्रजकिशोर नारायण नंदन से लंदन 1957

21भुवनेश्वरप्रसाद भुवन- आँखों देखा यूरोप 1959

22 यशपाल जैन - रूस में 46 दिन 1960

23 गोपालप्रसाद व्यास- अरबों के देश में 1960


24 दिनकर- देश विदेश 1957

                मेरी यात्राएँ 1970


25 निर्मल वर्मा - चीड़ों पर चाँदनी 1964

26 प्रभाकर माचवे- गोरी की नजरों में 1964


27 नगेन्द्र- तंत्रालोक से यंत्रालोक तक 1968

             अप्रवासी की यात्राएँ 1971


28 बलराज साहनी - रूसी सफरनामा 1971

29 शंकरदयाल सिंह- गाँधी के देश से लेनिन के देश में 1973

30 श्रीकांत वर्मा- अपोलो का रथ 1975


सहायक ग्रन्थ:-

1  हिंदी साहित्य और सम्वेदना का विकास , रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वा संस्करण 2018

2 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचंद्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन बनारस, 12वा संस्करण2018

3 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरिएंट ब्लैकस्वान, 2018 संस्करण


एक मध्यवर्गीय कुत्ता

  आज पढ़िए व्यंगय विधा के गुरु हरिशंकर परसाई का लेख "एक मध्यवर्गीय कुत्ता" जोकि मध्यवर्ग की धज्जियां उड़ाता है।  लेख का मकसद मध्यवर्...