('क्या भूलूँ क्या याद करूँ ' - "हरिवंशराय बच्चन")
हिंदी साहित्य लोचन
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी नेट/जे.आर. एफ परीक्षा में चयनित उत्तर छायावादी कवि, हालावाद के प्रवर्तक "महाकवि हरिवंशराय बच्चन" जी की आत्मकथा 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' पर कुछ विशेष तथ्य जानने की कोशिश करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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● प्रमुख तथ्य व अन्य बातें :-
• इस रचना का प्रकाशन 1964 में कल्पना पत्रिका, हैदराबाद में हुआ था।
• रचनाकार बच्चन ने प्रस्तुत ग्रन्थ में उन्ही घटनाओं का उल्लेख किया है जो उनके मन को गहरी छू गयी है।
• इसमें लेखक के जीवन के शुरुआती 30 वर्षो का वर्णन है।साथ ही परिवार का जिक्र करते हुए मनसा की सात पीढ़ी का वर्णन किया है। इसके अलावा अपनी कायस्थ जाति का वर्णन भी किया है।
• लेखक की शिक्षा का प्रारंभ बहनों और माता की मदद से हुआ था। जहाँ उन्होंने अपनी सहूलियत व बहुमूल्य समय देकर इन्हें प्रोत्साहित किया। कभी-भी इनकी शिक्षा में ढील नहीं देनी चाही। जितना इनके हिस्से में था उन्होंने भरपूर मात्रा में किया ताकि इनकी शिक्षा-यात्रा निरंतर चलती रहे ।
• लेखक का जीवन शुरुआती दौर में आर्थिक तंगी की समस्या से भी जुझा है। इसके लिए इन्हें हमेशा ही धन की आवश्यकता व कमी महसूस होती रही है। इसके अभाव में इनके कई कार्य भी रुकते हुए होंगे ।
• हिंदी साहित्य जगत में लेखक की अक्षयकीर्ति "मधुशाला" की लोकप्रियता के कारण उन पर कई आरोप भी लगाए गए। जैसे रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा उनको गोली मारने की धमकी देना आदि।
• आत्मकथा के अंत मे "श्यामा" जोकि इनकी प्रथम पत्नी थी, उनके अंतिम दिनों का वर्णन भी किया है। अपनी पत्नी के मृत्योपरांत इनकी दशा एक दम नाज़ुक हो गयी थी। "निशा-निमंत्रण "व अन्य रचनाओं में इस विरह-वेदना, और मर्म की झलक दिखती रही है।
• रचना में एक अन्य पात्र गन्सी चाचा भी रहे हैं। जिनका आतंक बच्चों पर बहुत पडा है। चाचा द्वारा बार बार मारना- पीटना और कठोर रवैया अपनाने की वजह से बच्चे इनसे सहमे से रहते थे।
• छेदीलाल की कुछ नया करने की खासियत उन्हें (लेखक) बराबर प्रेरित करती रहती थी।
• भोेलानाथ बाबा से अध्ययन की रूचि मिली।
• नायब साहब से जीवन जीने की लालसा मिली जिसके बारे में लेखक कहते हैं कि :- जीवन के मारे हुए के प्रति भले ही मेरे मन में सम्वेदना न हो परन्तु जीवन से जूझने वालो के प्रति मेरे अंदर खूब उत्साह है" ।
• बच्चन जी को पिता "प्रतापनारायण" से वैचारिक मतभेद होने के बाद भी परिश्रम , शक्ति मिलती रहती थी।
• पत्नी श्यामा ने खूब संघर्ष करने की शक्ति दी।
• रचना में शिक्षक श्री विश्राम तिवारी का भी जिक्र छेड़ा है।
• लेखक का हिंदी साहित्य जगत में प्रवेश यूँही नहीं था । और न ही हिंदी साहित्य इन्हें विरासत में मिला था। इसके स्थान पर "सत्यदेव परिव्राजक" ने उनमे हिंदी कविता के प्रति भाव जगाये थे।
• अपने मित्रों का भी वर्णन किया है। कर्नल के साथ अपने समलैंगिक सम्बन्ध का उल्लेख भी किया और उसके बाद अपने दोस्त की पत्नी जिसका नाम "चंपा" था उसके साथ भी सम्बन्ध रहे हैं। वह कहते हैं कि:-
अगर उनका सानिध्य मुझे न मिलता तो में आज वह न होता जो आज हूँ"...।
• "चंपा" के लिए कहते हैं- कनक छरी से इकहरे बदन सी , लमछर, गौर वर्ण कीट्स की dryend of the trees की तरह लगती थी"....।
पात्र:-
प्रतापनारायण -पिता
सरस्वती - माता
श्यामा - पत्नी
विश्रामतिवारी - शिक्षक
गनसी - चाचा
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