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Sunday, September 19, 2021

काव्यशास्त्र भाग 8

                   

                          (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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                       (प्लेटो व अनुकरण)

       

 ● रचनाएँ:-  इयोन, लाज़, रिपब्लिक (गणतंत्र) 

इनका समय एथेंस के पतन काल मे हुआ था। इनका यह नाम इनके गुरु द्वारा रखे  "पलातोंन" के अरबी-फारसी रूप अफ़लातून के रूप में प्रचलित हुआ जिसे कई जगह प्लेटो कहा जाता है।  ऐसा माना जाता है कि ये 28 वर्ष की उम्र में ही देश-देशांतर पर चल निकले थे और 12 साल की यात्रा के बाद 40 कि उम्र में एथेंस आये थे। उन्होंने एक अकादमी की शुरुआत की जिसे योरोप का पहला विश्विद्यालय कहा गया।  इनका "लाज़" शब्द ही इनका अंतिम सम्वाद है।

इनके 28 रचनाओ में से 27 संवाद है और 1 पत्र-संग्रह है।

प्लेटो के संवाद मुख्यता द्वंद रूप में हैं। मतलब किसे स्वीकार किया जाए और किसे नही, उस सन्दर्भ में यह खूब मत्थापची करते दिखे हैं। काव्य और कला के विषय मे इनकी चिंता आदर्श समाज की उपयोगिता से है।

"काव्य, सत्य और अनुकरण" के सम्बंध में प्लेटो का मत एकदम स्पष्ट है। काव्य के संदर्भ में इनका सम्बन्ध सत्यता से है पर जब हम प्लेटो को गहन रूप से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि उनका सम्बन्ध सिर्फ सत्य से नहीं बल्कि आदर्श समाज की स्थापना के लिए उस झूठ या कल्पना को भी स्वीकार कर लेता है जिसमें एक भावी समाज की झलक दिख रही हो।

प्लेटो की बहस 'अनुकरण' नही उसके विषय से है। वह कहते हैं :- "विवेकहीन,अपरिपक्व मन पर दुष्प्रभाव डालने वाले साहित्य का पूर्ण निषेध होना चाहिए चाहे वह सत्य ही क्यों न हो....। अनुकरण का विषय ऐसा हो जिसमें आदर्श समाज की कल्पना हो सके। जहाँ प्लेटो कविता को समाज के लिए घातक साबित करते हुए उसका बहिष्कार करते हैं तो वहीं वह उस कवि और कविता को भी स्वीकार कर लेते हैं जो शुभ का अनुकर्ता हो। "निर्मला जैन" अनुसार " प्लेटो ने काव्य का निषेध अनुकरण मात्र से नहीं बल्कि उसके अनैतिक होने से किया है

प्लेटो ने 'काव्य सृजन की प्रक्रिया' के विषय में अपनी पुस्तक "इयोन" में कहा है " वह मानते हैं कि कवि में सृजन की शक्ति दैवीय होती है। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वह तर्क देते हैं कि " यदि कवि वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर कविता करने में सफल होता तो वह किसी भी विषय पर कविताएँ लिख सकता है लेकिन व्यवहारिक रूप में यह सम्भव नहीं केवल कुछ ही विषयो में वह महारथ हासिल कर सकता है"..। इसी के आगे जोड़ते हुए प्लेटो कहते हैं कि " समस्त सुंदरतम कविता का अविष्कार दैवीय शक्ति से ही होता है"..।

निर्मला जैन कहती है " अलौकिक शक्ति द्वारा अधिकृत कवि स्रष्टा नहीं, उसका प्रवक्ता होता है"..। साथ ही प्लेटो द्वारा कवि पर दैवीय शक्ति की प्रेरणा को स्पष्ट करती हुई कहती हैं कि " प्लेटो ने कविता को वैज्ञानिक ज्ञान से अलगाने के लिए प्रेरणा शक्ति का उपयोग किया है, न कि कवि की अवमानना करने के लिए"..।


● कविता पर प्लेटों के मत :-

प्लेटो के अनुसार कविता हमारे व्यक्तित्व में बाधा का कार्य करती है, वह हमें भावोतेजक, असंयमित बनाती है।जो मनुष्य की साधु प्रकृति के विरुद्ध न हो 

दुख:पूर्ण कविता से समाज में दुख का संचार होता है और मनुष्य दुखी होता है। प्लेटो के अनुसार वहीं समाज आदर्शवादी है जहाँ के लोग सुखी हों।  इस दुखमूलक धारणा कामदी, नाटक, काव्य आदि में होती है। 

"कविता मानव की शासक होती है और मानव शासित"....। अर्थात गुलामी , जिसे वह मृत्यु से भी बढ़कर मानता है।  प्लेटो की काव्य सम्बन्धी मान्यताएँ रोमांटिक भावनाओ के विरुद्ध है क्योंकि इससे घृणित भावनाए उतपन्न होती है। 

प्लेटो ने अपनी पुस्तक "गणतंत्र " republic में स्वीकार किया है कि "मेरी काव्य सम्बन्धी धारणा सत्य और नैतिकता पर थी पर गणतंत्र तक आते आते मैं असत्यभाषी भी हुआ और अनैतिकता के घेरे में भी फंसा"....।   निष्कर्षतः प्लेटो ने कविता का विरोध करते हुए भी कविता के पृष्ठपोषकों को अपने समर्थन के लिए पूरा अवसर दिया है। व कला के संदर्भ में इनका विचार उपयोगितावादी था।

प्लेटो के बारे में क्रोचे का मत है " विचारों के इतिहास में कला के महान निषेध का इतना बड़ा विचारक एक भी नहीं हुआ"..।

• प्लेटों ने काव्य के 3 भेद किये

1. अनुकरणात्मक -प्रहसन व दुखांत

2. वर्णनात्मक- डिथिरैम्ब (प्रगीत)

3. मिश्र -महाकव्य


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Tuesday, August 24, 2021

काव्यशास्त्र भाग - 7

           

                          (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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                          (पाश्चात्य काव्यशास्त्र)

● (एक भूमिका):-  पाश्चात्य साहित्य में समीक्षाशास्त्र के विकास के संकेत 5वी सदी से दिखने लगते हैं जब हेडियड, सोलन, पिण्डार आदि की रचनाओं में काव्य हेतु और प्रयोजन के चिन्ह दिखने लगे थे। एक सुबद्ध शास्त्र के संकेत "प्लेटो" के "इयोन" से दिखने लगते हैं। प्लेटो की मूल दृष्टि 'प्रत्ययवादी' के साथ अनुभव लोकोत्तर थी। चूंकि कविता बाह्य संसार से ही सामग्री प्राप्त करती है तो "वह अनुकरण का भी अनुकरण करती है"...।


प्लेटो के अनुसार कविता में वैज्ञानिकता और तर्क का अभाव होता है, वह हास्य और छिछोरे भावनाओं को उकसाती है। वही कविता ग्राह्य है जो बेहतर, आदर्श समाज की संरचना कर सकती है। जिसमें कवि गम्भीर भाव से मात्र श्रेष्ठ गुणों का अनुकरण करें। उसे देवताओँ और प्रख्यात मानवों के चरित्र को अपना विषय बनाना चाहिए। कविता को प्लेटो तभी सम्भव मानते हैं जब उस पर दैवी कृपा हो। 

प्लेटो के शिष्य "अरस्तु" ने प्लेटो की दृष्टि अनुभववादी थी परन्तु वह भी आगे चलकर अभिजात्यवादी हो गयी। प्लेटों ने जहाँ कविता को यथार्थ से दूर और उसे विकृत करने वाला बताया है वहीं अरस्तू की नजर में कविता यथार्थ से भी बढ़कर है। अरस्तू कविता को इतिहास से श्रेष्ठ मानते हुए उसे संभावना व्यक्त करने में भी मजबूत मानते हैं।

अरस्तू भी कविता को अनुकरण मानते हैं परंतु उसके साथ ही उसमें कवि की अपनी मैलिकता भी समाहित होती है। वह आंतरिक क्रियाओं को भी दर्शाती है।  कविता को अरस्तु प्रकृति से भी बढ़कर मानते हैं।

अरस्तु को प्लेटो से अलग जो विचारधारा करती है वो अरस्तु की अभिजात्यवादी विचारधारा है।

• अरस्तु के बाद रोमन कवि "होरेस" की कविताओं में साहित्य के तत्व मिलते है। ये मूलतः वस्तुपरक और शुद्धतावादी थे। होरेस औचित्य को कविता की मूल कसौटी मानते हैं। इनकी कविता की भाषा में 'उदात्त के तत्व' के साथ पुरानी शब्दावली के साथ नवीन शब्दावली के निर्माण की भी सिफारिश दिखती है। इन्होंने अरस्तु के मत की व्याख्या करते हुए 'कविता के लिए श्रेष्ठ काव्यों के अनुसरण और प्राचीन काव्य-सिद्धान्तों के अनुसरण पर भी बल दिया।'

ईसा की 1शताब्दी में "लोंजाइनस" आये जिनकी रचना "पेरीपसुस" थी। उनके अनुसार उदात्त तत्व भव्यता या विराटता में नही होता बल्कि लघुता में दिखाई देता है। इनकी मान्यताओं में वस्तुपरक शास्त्रीयता तथा आत्मपरक रोमानी दृष्टि का तालमेल दीखता है।

तीसरी शती तक आते-आते आत्मवाद तथा वस्तुवाद का पुनरुथान क्रमशः "नव्य प्लेटोवाद" तथा "नव्य अभिजात्यवाद" के रूप में होने लगा। इस समय के लगभग" पलाटीनस" ने गहन दर्शन पर आधारित सिद्धान्तों की पुष्टि की गई। इन्होंने भी प्लेटों की तरह संसार को अदृश्य अमूर्त यथार्थ की बाह्य अभिव्यक्ति माना प्लेटो के विपरीत प्लाटिन्स "कविता अनुकरण का अनुकरण नही , बल्कि परम् चैतन्य में स्थित प्रत्ययों तक पहुचती है"..। नव्य प्लेटोवाद और नव्य अभिजात्यवाद दोनों अपने गुणों के आधार पर निकट दिखते हैं जहाँ उनका आपसी सिद्धान्तवादी और शास्त्रवादी, अनुभवइतर, नियमों से बंधकर रहना बराबर ही हैं। नव्य प्लेटोवाद का प्रभाव मध्ययुगीन धार्मिक चिंतन पर भी पड़ा और आधुनिक काल में 18वीं शती के इंग्लैंड में यह कैम्ब्रिज प्लेटोवाद के रूप में उभरा।

आभिजात्यवादी और नव्य अभिजात्यवादी दोनों में कोई ज्यादा अंतर नही है। दोनों ने आत्मनिष्ठता के स्थान पर वस्तुनिष्ठता को प्रश्रय दिया और दोनों ने ही अनुकरण को बाह्य यथार्थ माना, जिसमें कवि के लिए किसी भी तरह की मौलिकता का अभाव रहता है। यह प्लेटो के सिद्धांत से मिलते हुए नजर आते हैं। दोनों ही अनुभव से इतर थे।

नव्य अभिजात्यवाद अरस्तू के अनुकरण और कवि की मैलिकता के मत के विरुद्ध एकदम सिद्धान्तवादी और आदर्शवादी था। यह सिद्धान्त अपेक्षाकृत संकीर्ण था।  इसका प्रभाव पहले साहित्येतर क्षेत्रों में दिखाई पड़ा। साहित्य के स्तर पर इसका प्रभाव पहले फ्रांस में हुआ जहाँ अरस्तु और होरेस के मतों को खूब चर्चा में लिया जा रहा था।

नव्य- अभिजात्यवादी व्यक्तिकता के विरुद्ध सफल तो हुए पर बाद में उन्होंने उन्ही लोगो को केंद्र में रखा जो अभिजात वर्ग से जुडे थे। 

17-18 वीं शती में इंग्लैंड के कुछ कवियों जैसे बेन जॉनसन, सैमुअल जॉनसन, जॉन ड्राईडन, अलेक्जेंडर पोप, जोसेफ एडीसन आदि कवियों ने अभिजात्यवाद का झंडा फहराया और अपने प्राचीन सिद्धान्तों को पुनः समाज मे स्थापित करने पर बल दिया। जॉन ड्राईडन ने तो प्राचीन क्लासिकी ग्रँथों का अनुवाद तक किया और इस परंपरा के प्रबल समर्थक थे। इन्होंने रोमानी भावुकलता के विरुद्ध "कला की कसौटी तर्क को माना ना कि स्वछन्दतावादी कवियों की तरह भाव को"..।

18वी सदी में जिस अभिजात्यवाद की स्थापना फ्रांस में हुई थी वह अभिजात्य वर्ग का ही प्रतिबिम्ब था।

पश्चिमी साहित्य में प्लेटो का असर आगे आने वाले क्लासिक, शास्त्रवादी, अभिजात्यवादी, नव्य-अभिजात्यवादी आदि सभी कवियों पर पड़ा क्योंकि यह सभी मत कहीं-कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।


● अभिजात्यवाद काव्य वृति के विरुद्ध सबसे पहले "पुनर्जागरण" के दौर में आत्मवादी समीक्षा की शुरुआत हुई जहाँ मानव को विश्व का केंद्र बनाया गया। बंधी-बंधाई नियमावली के विरुद्ध सर्जनात्मकता को बल दिया। पश्चिम के साहित्य में रूढ़ियों को तोड़ने का यह पहला प्रयास था। इस युग का प्रभाव 16वीं शती के "फिलिप सिडनी" पर भी पड़ा जहाँ उन्होंने "कवि को भविष्यद्रष्टा के रूप में देखा"।

नव्य अभिजात्यवादी व शास्त्रवाद विचारधारा के विरुद्ध 17 वी सदी से "स्वछंदतावादियो" का दौर चला। इस युग में साहित्य समीक्षा का अर्थ स्वतंत्र अनुशासन के रूप में बढ़ा। स्वछंदतावाद में विश्वास रखने वाले कवियों में सबसे प्रबल समर्थक "विलियम वर्ड्सवर्थ" है जिन्होंने कविता को "प्रबल मनोवेगों के सहज उच्छलन" की परिभाषा दी ।इसके अलावा "कॉलरिज" भी स्वछंदतावादी कहलाये हैं। इन कवियों ने भावना के साथ कल्पना को भी महत्व दिया है।

शास्त्र के विरुद्ध जो विचारधारा स्वछंदतावाद की थी वही आगे चलकर "कलावाद" की रही। 1818 में विक्टर क्रुजे ने "कला कला के लिए" का सिद्धांत दिया। इस सिद्धांत के अनुसार कला का उद्देश्य पूर्णता की तलाश होना चाहिए और कला को केवल अपने नियमो को मानना चाहिए। इसकी एकमात्र कसौटी सौंदर्य पर टिकी है जो बाह्य जगत से निरपेक्ष है। इस सिद्धान्त को अपने नियम मानने चाहिए।

"वाल्टर पेटर" तो कला के लिए नियमों को उनकी स्वतंत्रता व स्वतः स्फूर्त के लिए बाधक मानते हैं।

कला को स्वतः पूर्ण और बाह्य जगत से अलग मानने की वृत्ति "क्रोचे" अपने सिद्धान्त "अभिव्यंजनावाद" में लेके आये। कलावादियों ने बाह्य अभिव्यक्ति को नकारा नहीं था किंतु क्रोचे ने शब्द, स्वर, आकार आदि के आधार पर बाहरी अभिव्यक्ति के स्थान पर कला के लिए सहजानुभूति का समर्थन किया।

जिस अभिजात्यवादी विचारधारा को स्वछंदतावाद ने खत्म कर दिया था "मैथ्यू आर्नल्ड" उसे दोबारा से लेके आते हैं। वह अपनी संस्कृति और कविता को, अराजक समाज के लिए उपादान मानते हैं। उन्हें उन आदर्शवादी नियमों की आवश्यकता हुई जो जीवन और साहित्य दोनों को मूल्यों से अनुशासित कर सके। उन्होंने कहा था कि  "कविता जीवन की आलोचना है".....।

• "प्रतीकवाद" जिसका स्पष्ट आरम्भ 1886 में 'विलिये द लील' के नाटकों से माना जाता है परन्तु इसका सूत्रपात "बादलेयर" के समय पहले ही हो चुका था। इस सिद्धान्त का जन्म प्रकृत और जड़ यथार्थवाद के विरुद्ध हुआ था। जिसका श्रय बादलेयर को जाता है। इस सिद्धान्त की मान्यता घटनाओं, व्यक्तियो तथा बाह्य जगत के पदार्थो की अपेक्षा मानवीय संवेदना, मनोभाव तथा अनुभव पर आधारित थी। इस सिद्धांत ने साहित्य के शिल्प और पारम्परिक साहित्य-रूपों का त्याग करके जड़-तुक का विरोध किया पर इसके साथ प्रगीतात्मक का समर्थन किया।

प्रतीकवाद का उन लोगो द्वारा विरोध हुआ जो आभिजात्य-और जड़वादी होने के साथ-साथ कविता के मुक्त होने के पक्ष में नही थे। इसलिए इस सिद्धांत को विरोधियो द्वारा  "पत्ननोन्मुख काव्य आंदोलन" कहा गया।

• इंग्लैंड और अमेरिका में "बिम्बबाद" की शुरुआत  t.s hume और azra pound  जैसे कवि लेके आये। यह मत मुख्यतः अति-स्वछंदतावाद और प्रतीकवाद के अतिरेक के विरुद्ध आया था। इनका उद्देश्य आम बोलचाल की भाषा और सटीक प्रतीकों के इस्तेमाल पर था।

• "नई समीक्षा" जैसी विचारधारा को "इलियट और रिचर्डस" लेके आये। ये बात अलग है कि 1941 में "जॉन क्रो रेन्सम" के इसी शीर्षक से ये नाम आलोचना के लिए रूढ़ हुआ। वैसे प्रवृति के अनुसार "नयी समीक्षा" के जनक इलियट ही माने जाते हैं। यह मत भी रोमांटिसिज्म के विरुद्ध आया था।

कुछ इस तरह से हम पाश्चत्य काव्यशास्त्र के इतिहास पर एक सीधी-सपाट नजर फेर सकते हैं।


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Tuesday, August 17, 2021

काव्यशास्त्र भाग -6

                        

                         (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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                  (कुंतक व वक्रोक्ति सिद्धान्त)



● वक्रोक्ति का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-


वक्रोक्ति शब्द "वक्र" तथा "उक्ति" से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है 'सीधा सपाट न बोलकर तिरछा बोलना।'

• परिभाषा:- इसकी पहली परिभाषा भामह ने अपने काव्यालंकार में लोकोत्तर वचन या अनूठी उक्ति के रूप में स्पष्ट की थी।

• कुंतक के अनुसार वक्रोक्ति लोक प्रचलित सामान्य कथनों से भिन्न, अनूठी और विचित्र अभिव्यक्ति का अर्थ है।


● आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति सिद्धान्त की स्थापना 10वीं शती में इसे "काव्य की आत्मा" घोषित करते हुए अपने ग्रँथ "वक्रोक्ति जीवितम" में इसके महत्व को प्रतिपादित किया था।तभी से काव्यशास्त्र के अंतर्गत वक्रोक्ति के महत्व को और भी सम्मान मिलने लगा।

कुंतक के अनुसार, कथन की वक्रता या भाषा की भंगिमा नैसर्गिक है जो शुरू से ही काव्य का तत्व रहा है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि " प्राचीन ग्रँथों में भी इसके उदाहरण मिल जाएंगे जहाँ पात्र अपनी बात को एक अलग अंदाज में कहते हुए मिल जाएंगे। जैसे रामायण और महाभारत आदि।

वक्रता के पहले पहल उदाहरण भामह के "काव्यालंकार" में मिल जाएंगे जहाँ उन्होंने वक्रता पर चर्चा करते हुए काव्य की मूलाधार वक्रता को ही माना ।

वामन ने वक्रोक्ति को अर्थालंकार के रूप में देखा तो वहीं रुद्रट ने उसे शब्दालंकार कह कर उसके 2 भेद बताए हैं :-

1. काकू वक्रोक्ति ।  

2. श्लेष वक्रोक्ति।


• दण्डी ने शब्द और अर्थ समन्वित सौन्दर्य को वक्रोक्ति कहा और इसी को काव्य-शोभा का नाम दिया।

● आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति के 6 भेद माने है:-

1.वर्ण-विन्यास वक्रता

2.पद-पूर्वार्ध वक्रता 

3.पद-परार्ध वक्रता

4.वाक्य वक्रता

5.प्रकरण वक्रता

6.प्रबन्ध वक्रता




                (क्षेमेन्द्र व औचित्य सिद्धान्त)



● औचित्य का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-

"उचित" विशेषण से औचित्य बना है जिसका अर्थ है कविता रचते समय या किसी भी रचना करते समय उचित तत्वों का संकलन व प्रयोग। 


● परिभाषा :- काव्य के विभिन्न उपादानों जैसे रस, अलंकार, रीति, वाक्य, वस्तु आदि का संतुलित उपयोग किया जाए तो वह औचित्य कहलाएगा।

औचित्य मुख्य रूप से काव्य के सभी तत्वों का संतुलित इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है, यह कोई स्वतंत्र तत्व नहीं।

● आचार्य क्षेमेन्द्र द्वारा 11वीं शती में "औचित्य सिद्धान्त" की स्थापना करके अपने ग्रन्थ "औचित्य विचारचर्चा" में उसे काव्य की आत्मा सिद्ध किया गया।

औचित्य सिद्धान्त के सबसे पहले लक्षण भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलते हैं जहाँ कविता में उसकी उपयुक्तता, अनुपयुक्तता, संतुलित तत्वों पर विचार किया गया।  इसके आगे आनन्दवर्धन ने औचित्य को रस का मूलाधार बताकर आगे आने वाले आचार्यो के लिए बड़ा कार्य किया।

11वीं शती में आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रँथ "औचित्य विचार चर्चा" में इस सिद्धान्त का पहला व्यवस्थि प्रतिपादन किया।

• क्षेमेन्द्र ने औचित्य के 27 भेद माने है।


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Sunday, August 15, 2021

काव्यशास्त्र भाग -5

     

                             (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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                   (वामन व रीति सिद्धान्त)    


● रीति का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-

रीति शब्द मूल शब्द "री" में "कितन" धातु जुड़कर बना है। जिसका अर्थ होता है मार्ग, शैली, पद्धति इत्यादि। अर्थात किसी कार्य करने की शैली, कविता रचने की पद्धति या रचनात्मकता के लिए अपनाया गया मार्ग। क्योंकि किसी भी कार्य करने की एक विधि होती है जिसके तहत ही हम अपने कार्य को अंजाम तक पहुँचा पाते हैं। इसी को काव्यशास्त्र की भाषा में कविता रचने के लिए 'रीति' शब्द कहा जाता है।

• वामन से पूर्व रीति शब्द के लिए "मार्ग" शब्द का प्रयोग किया जाता था।

• रीति शब्द के स्थान पर अन्य नामों का प्रयोग :-

कुंतक ने रीति के स्थान पर "मार्ग" और आनंदवर्धन ने  "संघटना" और मम्मट ने "वृति" शब्द का इस्तेमाल किया है।


● परिभाषा:- कोई भी कवि अपने व्यक्तित्व के आधार पर ही कविता करता है। मतलब की जिया तरह से रचनाकार का पालन-पोषण हुआ होगा, उसने समाज से, अपने आसपास के वातावरण से जो भी और जिस भी रूप में ग्रहण किया होगा उसकी बुनावट भी उसी रूप के अनुकूल हुई होगी। अर्थात उसका मन-मष्तिष्क उसी दिशा में कार्यरत होगा। तो इसी को आसान भाषा में हम रचनात्मकता से जोड़कर देखते हैं जिसकी निष्पत्ति रचनाकार के संस्कारो से होती है।

यदि रचनाकार कोमल भाव का होगा तो उसकी कविताओं के भाव भी कोमल ही होंगे और अगर उसके भाव कठोर होंगे तो कविता में भी इसी तरह के भावों की अभिव्यक्ति होगी। परन्तु साहित्य की दृष्टि में रीति सिद्धान कुछ अलग अर्थों में अपना स्वरूप रखता है। 

आचार्यों का मत है कि 'साधारण शैली के स्थान पर विशिष्ट शैली से युक्त कविता की रचना करना ही रीति है।' अर्थात कुछ ऐसा जो कविता में नयापन ला दे। उसकी चमक-धमक को और गुना बढा दे। यदि कविता सीधेपन और अलंकार के अभाव में होगी तो उसका महत्व कम होता दिखेगा। इसलिए कविता में एक ताज़गी और विशेषपन रहना अनिवार्य है। इसी शैली को काव्यशास्त्र के अंतर्गत रीति कहा गया है।

● आचार्य वामन ने रीति सिद्धान्त की स्थापना 8वीं शती में करके इसे "काव्य की आत्मा" स्वीकारा (रीतिरात्मा काव्यस्य) और काव्य की परिभाषा देते हुए इसे "विशिष्ट पद रचना" कहा। अर्थात शब्दगुण और अर्थगुण के विशिष्ट प्रयोग से बने पद को काव्य कहते हैं।


● रीति को गुण सम्प्रदाय भी कहा जाता है। जिसके 2 भेद हैं:-  

शब्द गुण 10

अर्थ गुण 10


● रीति के भेद:- 

वामन के अनुसार "काव्यालंकार सूत्रवृति" में इन्होंने रीति की 3 शैलियाँ मानी है :-

(वैदर्भी, गौणी, पांचाली)


• कुंतक ने रीति को मार्ग का नाम देकर उसके 3 भेद किये हैं:- 

1. सुकुमार मार्ग- रस , प्रसाद और माधुर्य गुण की कविता के लिए।

2. विचित्र मार्ग- अलंकार व ओजगुण की कविता के लिए।

3. मध्यम मार्ग- जहाँ सभी का समावेश हो जाता है।


• भोजराज ने 6 रीतियों का उल्लेख किया है :-

1वैदर्भी         

2 गोणिया       

3 पांचाली  

4 लाटी         

5 मागधी       

 6 अवन्ति

                      

                     

            (आनंदवर्धन व ध्वनि सिद्धान्त)


● आचार्य "आनंदवर्धन" ने ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना 9वीं शती में करके अपने ग्रँथ "ध्वन्यालोक" में इसे काव्य की आत्मा के रूप में सर्वप्रथम विवेचित किया है। इस सिद्धान्त के माध्यम से आनंदवर्धन व्यंजना शब्द पर आधारित ध्वनि को एक विशिष्ट अर्थ में प्रयोग करना चाहते थे। 

इन्होंने ध्वनि के 3 भेद बताते हुए उसे "वस्तु ध्वनि" "अलंकार ध्वनि" और "रस ध्वनि" में बांटा है।


● ध्वनि सिद्धान्त को आगे विकसित करने का कार्य "अभिनवगुप्त" द्वारा उसकी टीका "ध्वयनालोक लोचन" लिखकर किया गया है।

• भोजराज ने ध्वनि को "तातपर्य वृति" से जोड़कर दिखाया है।

• ध्वनि के शुद्ध भेदों की संख्या 51 बताई है जिसकी पुष्टि आचार्य विश्वनाथ के "साहित्य दर्पण" में भी की गई है।



● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Monday, August 9, 2021

काव्यशास्त्र भाग- 4

     

                         (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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                (भामह व अलंकार सिद्धान्त)


• अलंकार का अर्थ : साहित्यिक दृष्टि से अलंकार शब्द का निर्माण इस तरह से हुआ है - "अलम" शब्द का अर्थ है "भूषण" और उसमें "कृ" धातु उसकी क्रिया को सम्प्रेषित करता है। जिसका अर्थ हुआ भूषित करना या सजाना। अर्थात साहित्यिक दृष्टि से कविता को सजाना। 

उदाहरण के रूप में जैसे एक नायिका या नायक अपने को सुंदर बनाने के लिए तरह-तरह के उपकरण व अन्य सौंदर्य पदार्थ इस्तेमाल करता है ठीक उसी प्रकार से कविता को सौन्दर्यमयी व जादुई बनाने के लिए उसे अलंकारों से सुसज्जित किया जाता है। इससे कविता में एक नई रवानगी पैदा होती है और पाठक वर्ग के अन्तःस्थल को प्रभावित करती है। इसलिए बड़े-बड़े विद्वानों ने काव्य में अलंकार की उपयोगिता को आवश्यक माना है। जिसे कुछ आचार्यों में काव्य की आत्मा तक घोषित कर दिया है। इनमें प्रमुख हैं - "भामह".....।


●  अलंकार की परिभाषा :- 

1. "दण्डी" के अनुसार :- काव्य-सौंदर्य करने वाले सृजनात्मक गुणों का धर्मो को ही अलंकार कहा जाता है।

2. "रुद्रट" के अनुसार अभिव्यक्ति के विशिष्ट प्रकारों को ही अलंकार कहते हैं।


● अलंकार सम्बन्धी विभिन्न विद्वानों के मत :-

• भामह ने अपने ग्रँथ "काव्यालंकार " में "वक्रता" को वह तत्व दिया है जिसके द्वारा अर्थ सौंदर्य और शब्द सौंदर्य अभिन्न होकर काव्यालंकार की सृष्टि करते हैं। इन्होंने ही सबसे पहले अलंकार को रस से अलग करके अलग सम्प्रदाय बनाया और काव्य की आत्मा से उसकी तुलना की । उसे काव्यशास्त्र के अंतर्गत प्रमुख महत्व दिया।

भामह ने अपने अलंकार सिद्धान्त की स्थापना 6ठी शती में करके इसे काव्य की आत्मा माना है और वक्रोक्ति को अलंकार का मूलाधार माना है।

दंडी ने भी अलंकार को ही काव्य का मूल तत्व माना है।

• काव्य की परिभाषा देते हुए भामह ने " शब्दार्थों सहितौ काव्यम" कहा अर्थात शब्द और अर्थ का समन्वय।

• रुद्रट ने अपने ग्रँथ "काव्यालंकार" में अलंकारों का सबसे पहले 'वैज्ञानिक ढंग से विवेचन' किया है।

• मम्मट काव्य सौंदर्य के लिए अलंकार को 'अनिवार्य नहीं' मानते। 

• आचार्य विश्वनाथ ने मम्मट के मत का खंडन करते हुए "उत्तम काव्य में भी दोष गिनाए हैं। उनका मत है कि सर्वथा निर्दोष रहित काव्य दुर्लभ है"..।

भामह से लेकर रुद्रट तक के काल को अलंकार सम्प्रदाय का 'स्वर्णयुग' कहा जाता है।


●भामह ने अपने ग्रन्थ "काव्यालंकार" में 6 परिच्छेद बताए हैं जिसके 2-3 परिच्छेद में अलंकार निरूपण किया है।

● अलंकार काव्य की सुंदरता है तो अलंकार्य उस सुंदरता को दिखाने वाले तत्व या स्रोत।


● अलंकार के भेद :-

1. शब्दालंकार - अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनुरुक्ति।

2. अर्थालंकार- उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, विभावना आदि


●अलंकारों की संख्या विद्वानों के अनुसार :-

भरतमुनि - 4  उपमा, रूपक, यमक, अनुप्रास 

मम्मट -   67/61

रुय्यक -  78/75

विश्वनाथ -  78

जयदेव -  100

अपयदीक्षित -124/125


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Saturday, August 7, 2021

काव्यशास्त्र भाग - 3

    

                          (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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                  (भरतमुनि व रस सिद्धान्त)


● रस का अर्थ,परिभाषा व स्वरूप :-

"रस" शब्द को सुनते ही सबसे पहले किसी भी सामान्य व्यक्ति के दिमाग में चित्र बनेगा वह एक तरल पदार्थ होगा। जोकि स्वाद के साथ होगा और ज्यादातर लोग उसे मीठे रूप में देखेंगे। वहीं दूसरी ओर रस शब्द का एक और सामान्य से थोड़ा ऊपर उठकर, कुछ पढ़े-लिखे समाज में इसका अर्थ आनंद से भी जोड़कर देखा जाएगा।

परन्तु जब हम साहित्य विशेष की बात करते हैं तो 'रस' शब्द का अर्थ हम मानव-शरीर में होने वाले या आने वाले, निहित भावों, फिलिंग, इमोशन्स आदि से लेते हैं।

वही रस शब्द शास्त्रीय इतिहास प्राचीन भारतीय शास्त्रों जैसे ऋग्वेद में सोमरस के रूप में मिलता है। उसके बाद ब्राह्मण ग्रँथ में छंद रस और काव्य रस के रूप में हुआ भी।


• रस शब्द "रस" धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ है आस्वादन करना। काव्यशात्रीय प्रणाली रूप से काव्यास्वादन करना ही रस का आस्वादन करना है।

• परिभाषा:- जब नट (अभिनेता) रंगमंच पर किसी नाटक की भावपूर्ण, कलात्मक प्रस्तुति करते हैं तो विभाव, अनुभव और व्याभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस निष्पत्ति होती है"..।

• आचार्य भरतमुनि द्वारा "रस सिद्धान्त" की स्थापना तीसरी शती में करके अपने ग्रँथ "नाट्यशास्त्र" में रस को कविता की आत्मा बताया है। रस सिद्धात की व्यवस्थित व्याख्या करते हुए उसे रस निष्पत्ति के रूप में "विभावनुभावव्यभिचारी संयोगादरसनिष्पत्ति" का सूत्र दिया था।

भरतमुनि के ग्रन्थ  "नाट्यशास्त्र" में 36 अधयाय है जिसके 6ठे अध्याय में भरतमुनि बताते हैं 'सहृदय प्रेक्षक स्थायी भावों का ही विविध रसों का आस्वादन करते हैं।'

भरतमुनि के अनुसार 8 स्थायी भाव, 33 संचारी भाव, 8 सात्विक भाव हैं।


● रस के 4 अंग:- स्थायी भाव, विभाव, संचारी भाव और अनुभाव।

निष्कर्ष :- 

1.भरतमुनि का रस विषयक चिंतन वस्तुगत व विषयगत है।

2. रस आस्वाद्य है नाकि आस्वाद।

3. रस अनुभूति की प्रक्रिया है नाकि अपने आप में किसी तरह की अनुभूति।


                 (रस सम्प्रदाय और उनके व्याख्याता)


(आ). भट्टलोलट का उत्तपत्तिवाद/ उपचयवाद/ आरोपवाद/मीमांसा वाद :- 

इन्होंने रस की व्याख्या करते हुए अपने मुख्य बिंदुओं को इस प्रकार वर्णित किया है :-

1. किसी कारण विशेष से ही रस की उतपत्ति होती है। 

2. इसमें दर्शको द्वारा ही अभिनेताओं को अपने अभिनित रूप में आरोपित करके उसी पात्र (राम आदि) में मान लिया जाता है। जिसे आरोपवाद कहते हैं। अर्थात राम का किरदार निभाने वाले को सही अर्थों में राम समझ लेना और नाटक का आनंद लेना।

3. भट्टलोलट ने रस निष्पत्ति का अर्थ "उतपत्ति" माना है।

4. यह 'मीमांसा दर्शन' से प्रभावित थे।

5. भटलोलट के मत की व्याख्या मम्मट ने की है।


(बा). शंकुक का अनुमितिवाद/अनुकरण/न्याय दर्शन  :-


1. इनका मत है कि इसमें दर्शक अभिनेता पर किसी पात्र का आरोप न करके उसे उस पात्र का अनुकर्ता मान लेता है और उसी रूप में भाव को ग्रहण करता है।

2. "चित्र तुरंग ज्ञान" का उपयोग इसी व्याख्या के लिए किया जाता है जिसका अर्थ होता है कि हम जिस रूप में देखते हैं उसी का अनुकरण कर लेते हैं।

3. शंकुक का मत :- 

सहयोग का अर्थ -अनुमान, रस निष्पत्ति का अर्थ- अनुमिति।

4. इनका दर्शन 'न्याय दर्शन' से जुड़ा है।


(सा).भटनायक का भुक्तिवाद/साधारणीकरण/सांख्य दर्शन:-


1. इनका दर्शन 'सांख्य दर्शन' पर आधारित है।

2. यह मानते हैं कि न तो रस की उतपत्ति होती है और न ही अनुमिति। उसका साधारणीकरण होता है। अर्थात जब दर्शक अभिनय को देखकर या काव्य पाठन करके उसी रस की अनुभूति उसी रूप में कर लेता है और विशेषपन खत्म होकर सामान्यता की भूमिका में दर्शक और अभिनेता मिल जाये, तब जाकर साधारणीकरण की प्रक्रिया पूरी होती है।

3. साधारणीकरण के होते ही सामाजिक सत्वगुण का उदय और रजो-तमो गुण का नाश हो जाता है।

4. रस की निष्पत्ति का अर्थ "भुक्ति" से है। 

● भट्टनायक के अनुसार शब्द के 3 व्यापार हैं:-

1. अभिधा   

2. भावक्त्व    

3. भोजकत्व


(डा). अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद/शैव दर्शन/वेदांत वादी :-


1. इनके अनुसार न ही रस की उतपत्ति,अनुभूति,और न ही अनुमिति होती है। केवल अभिव्यक्ति होती है, अर्थार्त जैसा सामने अभिनय दिखेगा उसी तरह के रस की अनुभूति होगी। यदि प्रेम सौन्दर्य है तो श्रृंगार रस की उतपत्ति होगी और घृणित दृश्य है तो वीभत्स रस की अभिव्यक्ति होगी।

2. जो अभिनेता के भीतर होगा उसी की अभिव्यक्ति रंगमंच पर बाहर होगी।

3. इनका मत 'शैव मत' पर आधारित है।

4. इनका वेदांतवादी दृष्टिकोण था।


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Thursday, August 5, 2021

काव्यशास्त्र भाग -2

 

                       (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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1. काव्य हेतु :- काव्यशास्त्र के अंतर्गत कविता का निर्माण करने के लिए कवि द्वारा प्रयोग किये जाने वाले काव्य- तत्व ही "काव्य हेतु" कहलाते हैं। अर्थात सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि किसी भी कविता की निर्मिति उस कवि द्वारा प्रायोगिक सभी तरह के नियम, कायदे-कानून, अनुशासन, बंधन, विराम चिन्ह, पूर्ण विराम, अर्धविराम, तुक, लय, अलंकार, छंद आदि सभी काव्य तत्वों का एक्सपेरिमेंट ही काव्य हेतु के अंतर्गत आता है। अर्थात कविता के लिए उपयुक्त अंग...।


• आचार्यो द्वारा काव्य हेतु के तत्व:-

1. भामह व आनंदवर्धन के अनुसार प्रतिभा ।

2. दंडी के अनुसार अभ्यास और प्रतिभा ।

3. वामन के अनुसार लोक, विद्या और प्रकीर्ण ।

4. रुद्रट के अनुसार शक्ति ।

5. मम्मट के अनुसार शक्ति, लोक व्यवहार, शास्त्र ।


2. काव्य प्रतिभा :- कवि में प्रतिभा का होना ही उसकी काव्यगत प्रतिभा के दर्शन देता है। अर्थात जबतक प्रतिभा नहीं होगी कला की सर्जना करना असंभव है।

न केवल साहित्य में ही ऐसी मान्यताएँ है कि कवि दैवीय शक्ति का अनुकर्ता होता है या उसमें जन्मजात ही कुछ ऐसे विशेष गुण होते हैं जो उसे असाधारण बनाता है, बल्कि समाज में भी आप लंबे समय से सुनते-देखते आ रहे होंगे कि उस व्यक्ति में कोई तो खास गुण है जो फलाने कार्य में कुशल है। 

हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक व सबसे प्रसिद्ध हिंदी साहित्येतिहासकार "आचार्य रामचंद्र शुक्ल" जी ने कबीर के संदर्भ में कहा ही है "प्रतिभा में बहुत प्रखर थी.....।" पश्चिमी दार्शनिक "प्लेटों" ने जहाँ एक तरफ रोमांटिक कविता को समाज विरोधी कहकर उसे जड़ से उखाड़ फेंकने की बात कही है वहीं स्वस्थ कविता के प्रति आदर भाव से स्वीकार भाव दिखाया है। वह भी कहते हैं कि कवि (कलाकार) दैवीय शक्ति से प्रेरित व लैस होता है। 

इन बातों से हम समझ सकते हैं कि हमारे काव्यशास्त्र के प्रणेताओं ने जो काव्य -प्रतिभा का ढाँचा गढ़ा है वह उसमें किसी विशेष भाव के रूप में है। जबतक उसका बीज अंकुरित नहीं होगा कविता की सर्जना नहीं होगी। इसलिए कविता रचने के लिए प्रतिभा का होना आवश्यक है।


• आचार्यो द्वारा प्रतिभा के तत्व:-

1. "भट्टतौत" के अनुसार कवि की अनुभूति व अभिव्यक्ति।

2. "राजशेखर" के अनुसार चयन से लेजर संयोजन तक कि प्रक्रिया, जिसे उन्होंने कार्य व्यापार का नाम दिया है।  इसे 2 भागों में बाँटते हैं :-


भावयित्री:- कवि में जन्म आधारित। कवि से जुड़ी है।

कारयित्री:- सहृदय, पाठक या आलोचक से जुड़ा।


3. काव्य प्रयोजन :- कविता का लक्ष्य और अपने लक्ष्य तक पहुँचना ही उसका प्रयोजन है। 

हम जब भी किसी कार्य को करते हैं और उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाना चाहते हैं तो उसका एक कारण होता है जिसकी पूर्ति करना हमारा उद्देश्य होता है। उसी कार्य की सिद्धि और लक्ष्य प्राप्ति ही हमारा प्रयोजन होता है। इसे और सरल भाषा में ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब लेखक लेखन कर रहा होता है तो वह किसी निश्चित पाठक वर्ग के लिए लिख रहा होता है, ऐसे ही कोई चित्रकार, फिल्मकार, गीतकार, आदि अपनी कला को किसी निश्चित ऑडियंस के लिए रचते हैं। और उसी ऑडियंस तक उसको पहुँचाना उनका प्रयोजन होता है। 

एक पंक्ति में काव्य प्रयोजन का अर्थ है ' कविता किसके लिए और क्यों लिखी जा रही है, हम उससे क्या दिखाना, जताना चाहते हैं...।'


• आचार्यो द्वारा काव्य प्रयोजन के तत्व :-

1. "भरतमुनि" के अनुसार थकी-मांदी, दुखी जनता की पीड़ा का परिहार और उसका कल्याण करना।

2. "भामह" के अनुसार काव्य को शास्त्र के नीरस और दुर्बोध से बाहर निकालकर सरस बनाना।

3. "वामन" के अनुसार कवि को कीर्ति मिलना और सहृदय को कविता से आंनद प्राप्त होना।

4. "कुंतक" के अनुसार सदव्यवहार व औचित्य का बोध कराना।

5. "तुलसी" के अनुसार स्वान्त सुखाय और लोकमंगल की स्थापना करना।

6. "मैथिलीशरण गुप्त" के अनुसार मनोरंजन के साथ उपदेश देना।

7. "शुक्ल" के अनुसार लोकमंगल की भावना होना चाहिए।

8. "हजारीप्रसाद" के अनुसार मानव मूल्यों की स्थापना।

9. "नंदुलारे वाजपेयी" के अनुसार कवि का आत्मोत्थान करना।

10. "नगेंद" के अनुसार कवि का आत्माभिव्यक्ति करना।

11. "प्लेटो" के अनुसार मानव के आंतरिक गौरव व सौंदर्य का उदघाटन करना।

12. "शिलर" के अनुसार पाठक को आह्लादित करना।

13. "मैथ्यू आर्नल्ड" के अनुसार काव्य में नैतिकता हो।

14. "रिचर्ड्स" के अनुसार काव्य में नैतिकता व आनंद हो।

 

● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

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Tuesday, August 3, 2021

काव्यशास्त्र भाग - 1


                        (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● काव्यशास्त्र की बात करने से पूर्व हमें उस शब्द विशेष की जानकारी रखना अपेक्षित है जिसकी चर्चा यहाँ की जा रही है।

ध्यान देने पर पता चलता है कि,  शास्त्र शब्द "शास" से बना है जिसका अर्थ शासन करना, निर्देश देना, शिक्षा देना। सरल भाषा में हम देख पाते हैं कि किसी भी कार्य करने की विधि या व्यवस्था को चलाने की जो लिखित, नियमावली व सिद्धान्तों के तहत की गई संरचना है, वह शास्त्र का रूप होती है। जिसके आधार पर हम अपने कार्य की सिद्धि करते हैं। 

आपने अपने घर-परिवार व आसपास के वातावरण में भी महसूस किया होगा, सुना-समझा होगा कि समय-समय पर कहा जाता रहा है कि 'हमारे शास्त्रों में यह कहा गया है, वह कहा गया है, शास्त्रों के अनुसार ऐसे किया जाता है या वेसे किया जाता है।' इनका इस्तेमाल हम आज भी उसी रूप में करते हैं जिससे की हमारे काम अच्छी तरह से संपन्न हो सके। न किसी बाधा के और न किसी परेशानी के।

अपने शास्त्रों पर आस्था या विश्वास रखना किसी भी धर्म-जाति-समुदाय आदि का परिचय देना होता है की, आज भी उन गर्न्थो का क्या महत्व है हमारे जीवन में। उन ऋषियों-मुनियों-विद्वानों ने जो प्राचीन समय में दूरगामी दृष्टि रखते हुए जिन नियमों-व्यवस्थाओं को लिपिबद्ध किया उनका आज भी यथासंभव इस्तेमाल-प्रयोग हो रहा है। 

शास्त्रियों द्वारा इन गर्न्थो की देन किसी भी स्वस्थ समाज की जडीबुटी साबित हो सकता है यदि आज भी हम उससे अपने सरोकारों को सिद्ध कर पाते हैं या उनकी प्रासंगिकता समझते हैं। अब ज्यादा लम्बी बात न खींचते हुए मैं हिंदी साहित्य में काव्यशास्त्र के रूप को रखने की कोशिश कर रहा हूँ।


• काव्यशास्त्र का अर्थ है "किसी भी काव्य को पूर्ण रूप देने की सिद्धान्तों व नियमों की लिखित सामग्री "..। अर्थात कविता के अनुशासन के लिए नियमावली व सैद्धान्तिकी व तर्क और वस्तुनिष्ठ से जुड़ा होना है।

• काव्य का अर्थ "कवि आत्मपरक अभिव्यक्ति है"..। उसमें उसके बिम्बमयी रसात्मकता का चित्रण किया जाता है। यह भावना से जुड़ी है।              


● काव्य की परिभाषा चिंतकों के अनुसार :- 

1. "शब्दार्थों सहितौ काव्यम"- भामह (काव्यालंकार)

2. "ननु शब्दार्थों काव्यम" -रुद्रट (काव्यालंकार)

3. "विशिष्ट पद रचना"- वामन (काव्यलांकर सूत्र वृति)

4. "शब्दार्थों सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनी" - कुंतक (व्रकोक्ति जीवितम)

5. "तद दोषों शब्दार्थों सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि" अर्थात दोषरहित, गुणसहित, अलंकारयुक्त, किंतु अलंकार रहित भी शब्द और अर्थ काव्य कहलाते हैं। - मम्मट


6. "वाक्यं रसात्मक काव्यम" - आचार्य विश्वनाथ

7. "रमणियार्थ प्रतिपादक शब्द काव्यम" - पं जगन्नाथ


8. "अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है"..।महावीर प्रसाद द्विवेदी

9. "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है उसी प्रकार से हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए  मनुष्य की बानी जो शब्द विधान करती है, उसे कविता कहते हैं"..।   शुक्ल (चिंतामणि भाग -1)

10. "काव्य तो प्रकृत मानव अनुभतियों का नैसर्गिक कल्पना के सहारे ऐसा सौंदर्यमय चित्रण है, जो मनुष्यमात्र में स्वभावतः भावोच्छवास और सौंदर्य उतपन्न करता है"..।  नंदुलारे वाजपेयी (आधुनिक साहित्य में)

11. "काव्य आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति है, जिसका सम्बन्ध विश्लेषण या विज्ञान से नहीं"..।    प्रसाद (काव्यकला और अन्य निबन्ध से)

12.  "काव्य कवि की भाव-प्रधान मानसिक प्रतिक्रियाओं की कल्पना के ढाँचे में ढली हुई श्रेय की प्रेयरूपा प्रभावोत्पादकता अभिव्यक्ति है।        (गुलाबराय)

13. "ज्ञान राशि का संचित कोष ही कविता है"..। (नगेंद्र)


14. "कविता शासक और मृत्यु के समान है".।(प्लेटो)

15. "काव्य प्रकृति का अनुकरण है"..।(अरस्तु)

16. "काव्य उदात्त भाव की अभिव्यक्ति है"...।(लोंजाइनस)

17. "कला जीवन की आलोचना है"..।(मैथ्यू आर्नल्ड)

18" प्रबल मनोवेगों का उच्छलन है"..। (वर्ड्सवर्थ)

19. "कविता आत्माभिव्यक्ति की सहजानुभूति है"..। (क्रोचे)

20. "कविता कवि की अभिव्यक्ति नहीं उसके पलायन है"..। (इलियट)

21. "कविता छंदोंमयी रचना है"...। (जॉनसन)

22. " कविता सौंदर्य की लयात्मक सृष्टि है"..। (एडगर एलन पो)


आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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Friday, July 30, 2021

तमस

 

                             (तमस)


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• स्थान:-  ढोलइलाही बख़्स व  सैयदपुर 


• पात्र योजना:-

1. बक्शी जी - कांग्रेस सेक्रेटरी

2. मेहता जी - कांग्रेस प्रधान और बीमा एजेंट।

3. देवराज - अखाड़ा संचालक

4. गोरखा - चौकीदार, जो मुर्गी और छुरी लेके आता है।

5. बोधराज - गुरद्वारे संगठन का नायक

6. ह्यातबख्श - मुस्लिम लीग का नेता

7. रणवीर- जो मुर्गी काटता है

8. शहनवाज़ - जो लालाजी को दंगे से बचाकर गाड़ी में अपने घर ले जाता है।

9. हरनाम सिंह और बंतो- जिनकी दुकान लूट ली जाती है।

10. इकबाल सिंह- जिसे जबरन मुस्लिम बनाया काट है। हरनाम सिंह का बेटा।

11. जसबीर सिंह - हरनाम सिंह की बेटी, लापता होती है।

12. रमजान और एहसान अली- हरनाम सिंह का घर लूटने वाले।

13. अकरा और राजो - रमजान और एहसान अली की पत्नियां।

14. इमामदीन, करीमखान, अब्दुलगनी

15. बिशनसिंह, मुरादअली, नत्थू

16. इत्रफरोश - जिसे रणवीर चाकू मारता है।


                             (आमुख)

● 1945 के दिल्ली अधिवेशन में लीग ने पाकिस्तान की मांग कर दी थी। लीग के लोगों की हठधर्मिता के कारण 1946 में मंत्रिमंडल अपने मिशन में असफल रहा और लीग ने उस साल पहला देश में संघर्ष विरोधी नारा लगा।

 यह उपन्यास 5 दिन की कथा को आधार बनाकर चलता है, जहाँ 1947 के मार्च अप्रैल के माह में हुए भीषण दंगे का वर्णन है।

● " सचमुच लड़ने वालों के पाँव 20वी सदी में और दिमाग मध्ययुग में था"...। (लेखक का मानना तमस के लिए)

● मुरादअली के द्वारा ही दंगे की शुरुआत हुई थी और अंत भी। अमन कमेटी की बस में सबसे तेज नारे लगा रहा था।


                          (मूल उपन्यास )


मुख्य बातें :-


● " चाहे आप मुझे कुछ भी कह लीजिए, परन्तु अहम सवाल हिन्दुस्तान की आजादी का है, वो भी इन अंग्रेज अफसरों से"....।  (हकीमजी - मौलदाद से)

● दुख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत के पास ही जाता है"...। (नत्थू के लिए- मोतिया वैश्या के पास जाता है सुअर मारने के बाद और डर के मारे)

●" सोहनसिंह और मीरदाद , दोनों ही अपने अपने लोगों को अमन कायम करने को कह रहे थे और अंग्रेज की चाल से सावधान रहते की भी सलाह  दे रहे थे।

●" जिस गाँव में हिन्दू और मुसलमानों के बीच लड़ाई चल रही थी वो सैयदपुर था।


आधार ग्रन्थ :-

1. तमस, साहनी भीष्म, राजकमल प्रकाशन।



Thursday, July 29, 2021

आधे-अधूरे - मोहन राकेश



                         (आधे-अधूरे)


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● प्रमुख तथ्य व अन्य बातें :-


 निर्देशक का वक्तव्य:-

" यह आलेख एक स्तर पर स्त्री और पुरूष के बीच लगाव और तनाव का दस्तावेज़ है".....।

मैं प्रदर्शन में सादगी का कायल हूँ। इसलिए प्रकाश व्यवस्था में किसी तरह की लटके नही चाहता। नाटक के लिए उपयुक्त सादगी आलोक-पद्धति है। प्रारंभ में कुछेक चीजे आलोकित करती थी फिर लाइट हाउस में घुल-मिल जाती थी। (निर्देशक)

                                                           

● पात्र योजना :-

1. महेन्द्रनाथ:- पति

2. सावित्री:- पत्नी

3. अशोक :- लड़का

4. बिन्नी: - बड़ी लड़की

5. किन्नी :- छोटी लड़की

6. जुनेजा, सिंघानिया और जगमोहन :- जिनसे सावित्री जीवनसाथी के सपने देख रही थी।

7. सुषमा :- जुनेजा की बेटी

8. मनोज :- बिन्नी का पति 

9. शोकी

10. शिवजीत - इस से भी सावित्री का सम्बंध रहा था।


● यह नाटक 4 अंको में लिखा है। जो निम्नांकित हैं :-

1. निर्देशक का वक्तव्य

2. पात्र योजना

3. पूर्वाध

4. उत्तरार्ध


(मूल कथा के कुछ अंश )

•" महेन्द्रनाथ" :- जब जब किसी नए आदमी का यहाँ आने शुरू होता है, मैं शुक्र ही मानता हूँ"....।

• "जिससे उसके मन को कड़ी से कड़ी चोट पहुचा सकू। मेरे लम्बे बालो को पसंद करता है, सोचती हूँ इन्हें कटवा दूँ"..।(बिन्नी के मुताबिक मनोज में वह गुण नही)

• "अधिकार, रुतबा और इज्जत - यह सब बाहर के लोगो से मिल सकता है इस घर में। इस घर का जो आजतक बना है वह सब बाहर के लोगो से"....। (महेन्द्रनाथ- सावित्री से)

• "उसकी बड़ी चीज की वजह से । किसी की तनख्वाह, किसी का इंटलेक्चुअलपन और तो किसी की पदवी। किसी आदमी को न बुला कर उसकी औकात को बुलाया जाता है".।(अशोक - सावित्री से)

• " सावित्री महेंद्र की नाक में नकेल डाल कर उसे चला रही है।सावित्री ने बेचारे की रीढ़ ही तोड़ दी। अब वह जैसे किसी हाड़ मांस का पुतला हो"....। (दोस्तो का कथन) 


 ● आधार ग्रन्थ 

1. आधे-अधूरे, मोहन राकेश, 


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Wednesday, July 28, 2021

नामवर सिंह स्मृति


 काशीनाथ सिंह द्वारा नामवर सिंह जी की स्मृति में ...


भैया को याद करते हुए-----


'डायरी का एक भूला बिसरा पन्ना'

अरविंद कॉलोनी,G-14 क्वार्टर, ड्राइंग रूम, भैया और मैं। बीच में छोटा सा टेबल, उस पर शीशे के दो गिलास। शाम का वक्त। शाम गिलासों में धीरे धीरे ढलती हुई गहराती जारही है---- तारीख थी 9 -9-1994 ।

बातें कहाँ से शुरू हुई थीं और जाने कब कैसे यूपी कॉलेज पहुंच गईं। भैया थोड़ी देर चुप रहे फिर कहना आरम्भ किया- मैं सन 42 में बनारस आया। उदय प्रताप में 7 में नाम लिख गया। 6th Hostel में कमरा no.1 मिला।

तब सागर सिंह (नगर के नामी वकील, अब दिवंगत ) 11th कक्षा में थे, वे कवि थे और गोष्ठियां करते थे, उसमें मैं भी शामिल हो गया। उन्हीं दिनों पहली बार, कॉलेज के पास सरसौली (तब एक कस्बा ) में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमें नगर के सभी महत्वपूर्ण कवियों के साथ ही बाहर से आए कवि भी थे. निराला को पहली बार वहीं देखा।

मैंने भी कविता पढ़ी, सम्मेलन में निराला ने जानकी वल्लभ शास्त्री को 200₹ पुरस्कार में दिए और शंभू नाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह आदि नगर के कवियों के रहते हुए, मुझे 100₹ का द्वितीय पुरस्कार दिया। ये वे दिन थे, जब बनारस में अमृत राय, शिव दान सिंह चौहान, शमशेर, मुक्तिबोध और त्रिलोचन रहते थे। अमृत राय, कम्युनिस्ट पार्टी का अख़बार, हम लोगों में बाँटते थे और महीने के हिसाब से अपनी साइकिल से आ कर, पैसे ले जाते थे। वे स्टडी-सर्कल भी चलाते थे।

उन दिनों, नगर में दो साहित्यिक संस्थाएं थीं। एक ठाकुर प्रसाद सिंह की "नवयुवक साहित्यिक संघ" और दूसरी, सोशलिस्टों की "सांस्कृतिक संघ"। हम लोग, सांस्कृतिक संघ से जुड़े हुए थे जिसका चुनाव हुआ था, जिसमें त्रिलोचन अध्यक्ष चुने गए और नामवर सचिव, उपाध्यक्ष थे मार्कण्डेय सिंह और BHU के डॉक्टर श्री कृष्ण लाल। मैं 1947 में, महेंद्रवी लॉज, BHU में आ गया और 1950 में गोविन्द लॉज में (जो लंका पर स्थित था)। सचिव रहते हुए, बनारस में पहला विराट साहित्यिक आयोजन मैंने 'टाउन हाल' में किया था। इसी में, जय नारायण इंटर कॉलेज (अध्ययन काल) के बाद, पहली बार, बनारस में, सुमित्रा नंदन पंत आए थे।


- काशीनाथ

Tuesday, July 27, 2021

झुठासच

 

                            (झुठासच)


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● प्रमुख तथ्य व अन्य बातें :-


"सच" को कल्पना के रंग में रंग कर उसी जन समुदाय को सौंपने जा रहा हूँ जो सदा  "झूठ"  से ठगा जाकर भी सच के लिए अपनी निष्ठा नही छोडता"....।(भूमिका से) 

प्रस्तुत कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है साथ ही इसमें लेखक ने अपनी मंशा भी व्यक्त कर दी है, की वह किस सन्दर्भ में इस रचना को पाठकों व हिंदी साहित्य जगत के सामने पेश कर रहा है। लेखक साफ शब्दों में कह रहा है कि भले ही आज तक हम झूठ से ठगे जाते रहे हैं बावजूद उसके हममें एक विश्वास बना रहता है जो सच्चाई के साथ खड़ा है। यकीनन हम उस सत्य को पा सकेंगे जिसके लिए निरंतर हम जूझ रहे हैं। इस कथन को पढ़ते हुए मुझे दिल्ली विश्विद्यालय , हिंदी विभाग के प्रो. चंदन कुमार जी का कथन याद आ रहा है जो वह सदैव पढ़ाते वक्त कहा करते थे। खासतौर पट जब सांस्कृतिक सन्दर्भ पढ़ाया जाता था। वह कथन था कि " कुछ हस्ती है हमारी कि जो मिटती ही नहीं"....। इस कथन का सन्दर्भ भारतीय संस्कृति में भरपूर मात्रा में भरी उस अपराजय जिजीविषा व ऊर्जा से है जिसको हमने कभी नहीं छोड़ा। इसी बात में एक और बात जोड़ना चाहूँगा जोकि कथासम्राट प्रेमचंद के "रंगभूमि" उपन्यास के नायक "सूरदास"  द्वारा उसकी झोपड़ी गिरा देने के सम्बंध में कही गई है - "तुम जितनी बार गिराओगे हम उतनी बार बनायेनंगे"...।

हम पर न जाने कितने ही आक्रमण, छल-कपट,घात-प्रतिघात हुए फिर भी हम आगे बढ़ते गए । हमने कभी पीठ पर वार करना नहीं सीखा। और इस संदर्भ में न जाने कितनी ही रचनाएँ हमारी हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि बनकर सामने आई है और न जाने कितने साहित्यकार भी। मुझे आवश्यकता नहीं समझ आती की मैं जहाँ उनका ज़िक्र करूँ।


मुख्य पात्र योजना :-

1. रामजवाया :- बड़ा बेटा

2. मास्टर रामलुभाया :- छोटा बेटा, आर्यसमाजी

3. तारा :- कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित

4. जयदेव :- दयालसिंह कॉलेज से , गुप्त आंदोलन करता है, तारा का भाई

5. प्रो- प्राणनाथ :- जयदेव के गुरु


6. कनक :- 1942 आंदोलन में भाग लेती है

7. लेखराम शर्मा :- पैरोकार का उपसम्पादक (पत्रिका)

8. नैयर:- कनक का जीजा, हाईकोर्ट में वकील

9. ईश्वरकोर :- हिन्दू सभाकमेटी की सदस्य

10. महेश :- पैरोकार का संवाददाता

11. कशिश " कर्मचन्द" : पैरोकार का सम्पादक


● गौण पात्र:-


1. टीकाराम :- इंसोरेंस कंपनी से

2. बिरुमल :- डाक का कर्मचारी

3. भागवंती :- तारा की माँ

4. गुर्टू, सुरेंद्र और अमृता :- तारा की सहेली

5. नरेंद्र :- स्टूडेंट फेडरेशन के नेता

6. गोविंदराम:- pwd  क्लर्क

7. कालीचरण

8. राधेबिहारि :- पैरोकार के मालिक

9. प्रो- दीन मुहम्मद :-जो सोमनाथ को नकल करते पकड़ता है


● पत्रों (पत्रिका) के नाम:-

1. पैरोकार

2. निशांत

3. छत्रपति

4. सियासत


● मुख्य :-


• जयदेव जिन दिनों जेल में था वही रहते उसने एक कहानी संग्रह लाहौर से निकाल दिया था।

• " विद्या चाहे कितनी ही अनमोल क्यों न हो,परन्तु पैसे के अभाव में अप्राप्य हो होती है".।(तारा की पढ़ाई के सम्बंध में)

• पत्रकार का काम अपने मालिक के इशारो को किनारे रखकर काम की विशेषता को रंग देना है".।(पत्रकारिता के लिए)

• "पुरूष की तुलना में स्त्री की हीनता स्वाभाविक तो नही , परन्तु बना दी गयी है"..।(तारा की पढ़ाई को रोकने के लिए)

• "हमारी असली लड़ाई तो अंग्रेज से है जिसने मुल्क पर कब्जा किया हुआ है"...।(तारा)

•" विदेशी गुलामी से मुक्ति के लिए पहले हिन्दू-मुस्लिम- सिख एकता अनिवार्य है"...।(जयदेव)

                                                      

● कथा में शामिल पार्टियो के सदस्य:-

1.कांग्रेस :- गोपीचंद, भीमसेन , राधेबिहारि, कपूर, शन्नो  ।

2. मुलिम लीग :- अल्लामा मिशनरी, खान मामेदार

3. कम्युनिस्ट :- असद, हजारासिंह, प्रद्युम , सर खिजर

4. सिख गुट :- तारा सिंह।

आधार ग्रन्थ

1.झुठासच, यशपाल, राजकमल प्रकाशन, 



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Saturday, July 24, 2021

असग़र वज़ाहत

 पिछले महीने मैंने फेसबुक पर पाकिस्तान यात्रा से संबंधित दो टिप्पणियां लिखी थीं।

मैं 2011 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन शताब्दी समारोह में पाकिस्तान गया था। वहां लगभग 45 दिन घूमता रहा था। लाहौर, मुल्तान और कराची में अनेक लोगों से मिला था। संस्थाओं में गया था।उन अनुभवों के आधार पर मैंने एक सफरनामा 'पाकिस्तान का मतलब क्या' लिखा था जो ज्ञानोदय में छपा था और उसके बाद ज्ञानपीठ ने उसे पुस्तक रूप में छापा था । उस पर आधारित कुछ अंश मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूं। 

प्रस्तुत है पहला अंश-


पाकिस्तान का मतलब क्या

1.

पाकिस्तान एक ऐसा शब्द है जो उत्तर भारत में रहने वाले लोगों के मन में कोई ‘विशेष बिम्ब’ बनाता है। विभाजन के बाद पाकिस्तान आये लोगों की बात छोड़ भी दें तो कम से कम उत्तर भारत में पाकिस्तान के तरह-तरह के मतलब हैं। पाकिस्तान से जन्मी सबसे पुरानी छवि जो मेरे मन में है वह शायद सन् 55 के आसपास की है जब मेरी उम्र दस साल रही होगी। पड़ोस का कोई ख़ानदान पाकिस्तान जा रहा था। घर के सामने नीम के बूढ़े और घने पेड़ की छाया मेें तीन इक्के खड़े थे। एक इक्के पर सामान लादा जा रहा था। दूसरे इक्के में चादर बाँध दी गयी थी क्योंकि उसमें ज़नानी सवारियों को जाना था। घर के मर्द पड़ोसी मर्दों से गले मिल रहे थे। ऐसा ग़मगीन माहौल था कि दिल बैठा जाता था। घर के अन्दर औरतें पड़ोसिनों से लिपट-लिपट कर सिसक रही थीं। सिसकियाँ और रोना चीख़ने में तब्दील हो रहा था। बच्चे घबराये हुए इधर-उधर भाग रहे थे। मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आ रहा था कि ये सब क्या है? पाकिस्तान से जुड़ी दूसरी छवि यह है कि गर्मियों के दिनों की दोपहर में हम लोग घर के तहखाने में सोते थे जहाँ छत से लटका पंखा झलने के लिए नौकर पंखे की डोरी अपने पैर में लपेट कर कुछ फ़ासले पर लेट कर पैर चलाता था जिसके नतीजे में पंखा चलताथा और हवा होती थी। इन शान्त और ठंडी दोपहरों में कभी-कभी कोई नौकर हाथ में ख़त लिये यह कहता हुआ आता था कि पाकिस्तान से ख़त आया है। सब लोग उठ बैठते थे। हमारे अब्बा की फूफी (बुआ) के बड़े लड़के पाकिस्तान चले गये थे और वहाँ से उनके ख़तों का इन्तिज़ार पूरे घर को रहता था। कहते हैं, वसी चचा पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। लखनऊ यूनिवर्सिटी से कैमिस्ट्री में एम.एस.सी. करने के बाद वे नौकरी की तलाश में थे। एक इंटरव्यू बोर्ड में बोर्ड के किसी सदस्य ने उन्हें बहुत प्यार से समझाया था - मियाँ जी आप यहाँ भारत में क्यों नौकरी के चक्कर में परेशान हो रहे हो? पाकिस्तान में न जाने कितनी नौकरियाँ आपका इन्तज़ार कर रही हैं। आप पाकिस्तान चले जाइए। यहाँ आपको नौकरी देने का मतलब किसी हिन्दू का हक़ मारना है... ”इस बातचीत के बाद वसी मामू समझ गये थे कि हिन्दुस्तान से उनका दाना-पानी उठ गया है। वे घर आये और अपना फै़सला सुना दिया। ख़बर बम की तरह फटी। लखनऊ के कूच-ए-मीरजान में लम्बी-चैड़ी हवेली, ख़ानदानी इमामबाड़ा; वालिद शहर के माने हुए वकील, ख़ानदानी रईस, यूनिवर्सिटी में पढ़ती बहनें और भाई सब हैरान हो गये। बहरहाल वसी मामू आसानी से नहीं जा सके। बहुत हाय-तौबा और रोने-धोने के बाद कराची सिधारे। उन्हीं के ख़त तपती हुई दोपहर में ठंडी हवा के झोंके की तरह आते थे और उन्हें ऊँची आवाज़ में पढ़ा जाता था...उन्हें अच्छी नौकरी मिली थी। उन्होंने नाजिमाबाद में प्लाट भी ले लिया था और मकान बनवा रहे थे। उनके ख़तों में, नये लफ़्ज़ जैसे ‘नाजिमाबाद’ या रोचक प्रसंग जैसे उनका ‘पठान नौकर चाकू से नहीं क़रौली से सब्ज़ी काटता है’, दिमाग़ में चिपक कर रह गये हैं...पाकिस्तान से जुड़ा एक और प्रसंग वह नारा है जो पाकिस्तान बनने के बाद मुस्लिम लीगी लगाया करते थे। नारा था, ‘हँस के लिया है पाकिस्तान। लड़कर लेंगे हिन्दुतान।’

पाकिस्तान का मतलब बताने के लिए एक नारा, ‘पाकिस्तान का मतलब क्या? ला इलाहा इल्लिलाह’। पाकिस्तान का मतलब, ‘अल्लाह एक है’ साबित करता था कि पाकिस्तान मुस्लिम देश है। इसके अलावा पाकिस्तान को ‘मुमकलते-खु़दादाद’ यानी ईश्वर प्रदत्त राज्य कहने वाले कम नहीं थे। दरअसल हँस के लिया है पाकिस्तान और ‘ईश्वर प्रदत्त राज्य’ का गहरा ताल्लुक भी है।

लेकिन पाकिस्तान का मतलब जल्दी ही बदला गया था। 1958 में जरनल अय्यूब खाँ के सत्ता सँभालने के बाद कहा जाता था ”पाकिस्तान का मतलब क्या? लाठी, गोली, मार्शल लाॅ।’

‘हँस के लिया है पाकिस्तान’ की तस्दीक़ अगर इतिहास से करें तो पता चलता है कि पाकिस्तान के प्रमुख निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन से संन्यास लेकर 1932 में लन्दन चले गये थे। उस वक़्त तक जिन्ना और पाकिस्तान का कोई रिश्ता न था। 1934 में मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खँ के अनुरोध पर मुस्लिम लीग का नेतृत्व सँभालने मुहम्मद अली जिन्ना वापस आये थे।

सन् 1946 तक मुस्लिम लीग काँगे्रस के साथ मिल कर सरकार चलाने पर तैयार थी जो योजना सफल नहीं हो सके। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान अस्तित्व में आ गया। पाकिस्तान के इतिहासकार इसे ‘लम्बा संघर्ष’ मानते हैं। लेकिन लाहौर के प्रसिद्ध पंजाबी कवि मुश्ताक सूफी पूछते हैं, ”ये बताइये पाकिस्तान के आन्दोलन में मुस्लिम लीग के कितने लोग जेल गये थे? किस-किस की जायदाद ज़प्त की गयी थी? किसने ब्रिटिश हुकूमत के डंडे खाए थे? कितनों को फाँसी लगी थी? कितने लोगों को काले पानी भेजा गया था?“

सूफी साहब के इन सवालों के मेरे पास जवाब नहीं है क्योंकि मैं इतिहासकार नहीं हूँ। बहरहाल ‘हँस के लिया है पाकिस्तान’ का दूसरा पहलू ये है कि कुछ लोग काँगे्रस पर यह आरोप लगाते हैं कि उसने मुस्लिम लीग को पाकिस्तान तो ‘गिफ्ट’ किया था। इस ‘गिफ्ट’ की परिभाषा ‘मुमकलते-खु़दादाद’ तो नहीं हो सकती लेकिन इतना ज़रूर है कि खु़दा (अल्लाह) पाकिस्तान की संवेदना का प्रमुख हिस्सा रहा है।

मुश्ताक सूफी अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ”लाहौर की सबसे बड़ी और महँगी बाज़ार माल रोड पर पाकिस्तान बनने से पहले मुसलमान की सिर्फ एक दुकान थी। पुराने शहर की अनारकली बाज़ार में मुसलमानों की दो दुकानें थीं। आज सूरतेहाल उल्टी है। इसके अलावा पंजाब में ज़मीनें सिखों के पास थीं। अब मुसलमानों के पास हैं। ये सब बहुत जल्दी और ‘करप्ट’ तरीके से हुआ है...मतलब ये कि जायदादें हथियाने में गै़र क़ानूनी तरीके़ भी अपनाये गये थे और फिर वो हालात ही ऐसे थे कि क़ानूनी की पूरी पाबन्दी बहुत मुमकिन नहीं थी। लेकिन इस उथलपुथल, इस ‘अप साइड डाउन’ या कहें ‘डाउन साइड अप’ ने हमारे समाज पर, मेरे ख़याल से बहुत अच्छा असर नहीं डाला। जब चैलेंज नहीं होते तो समाजों में ‘नेगेटिव थिंकिंग’ पैदा हो जाती है।“


पाकिस्तान के इतिहासकार और बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि पाकिस्तान के लिए संघर्ष करने के दौरान यह चर्चा नहीं हुई कि पाकिस्तान का स्वरूप क्या होगा? राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था का क्या माॅडल होगा? बहुत सरसरी ढंग से यह कहा जाता था कि पाकिस्तान इस्लामी मुल्क होगा, लेकिन उसे परिभाषित नहीं किया गया। पाकिस्तान के एक प्रखर बुद्धिजीवी मियाँ आसिफ रशीद ने बहुत विस्तार से इस समस्या पर विचार किया है। पाकिस्तान के स्वरूप पर चर्चा न किये जाने के कारणों से पहले वे अधिक बुनियादी मुद्दे पर ध्यान आकर्षित कराते हैं।“ कुरान शरीफ का उद्देश्य इस्लामी राज्य स्थापित करना नहीं है बल्कि न्याय तथा समता पर आधारित समाज का निर्माण है। हम यह कह सकते हैं कि जो भी समाज न्याय और समता पर केन्द्रित होगा वही इस्लामी समाज होगा चाहे वहाँ बहुसंख्यक मुसलमान हों या गै़र मुस्लिम।“ (दलीले सहर-मियाँ आसिफ रशीद-फिक्शन हाउस, लाहौर, पृ.-82)

मियाँ आसिफ रशीद ने मुस्लिम लीग के नेताओं को कटहरे में खड़ा किया है, ”पाकिस्तान आन्दोलन के दौरान मुस्लिम लीग के नेतृत्व ने कभी यह सोचने की ज़हमत न की, कि पाकिस्तान बन जाने के बाद नये राज्य का क्या स्वरूप होगा, उसका राजनैतिक ढाँचा किन सिद्धांतों के अनुसार बनेगा और राज्य की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था क्या होगी, यद्यपि मुस्लिम लीग की विरोधी पार्टी कांग्रेस ने इन्हीं उद्देश्यों को सामने रखते हुए 1935 में प्रान्तीय चुनाव से पहले प्रो. के.टी. शाह के नेतृत्व में एक नेशनल प्लानिंग कमीशन स्थापित कर दिया था। 28 मई, 1937 को सर मुहम्मद इकबाल ने मुसलमानों की आर्थिक समस्याओं से लापरवाही बरतने वाली मुस्लिम लीग पर नुक्ता-चीनी करते हुए कायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्ना को लिखा था, ‘लीग को आखि़रकार यह तय करना पड़ेगा कि क्या वह बदस्तूर हिन्दुस्तानी मुसलमानों के उच्च वर्गों का प्रतिनिधित्व करती रहेगी या मुस्लिम जनता का...’ मुस्लिम लीग नवाबों, राजाओं, खान बहादुरों और सरदारों के बोझ तले इतनी दबी हुई थी कि खु़द कायदे आज़म भी नये राज्य की ‘पहचान’ की व्याख्या करते हुए घबराते थे कि कहीं प्रभावशाली गुट नाराज़ न हो जाएँ और लीग में फूट न पड़ जाए।“ (दलीले सहर, मियाँ आसिफ रशीद ,फिक्शन हाउस, लाहौर, पृ.-15)


नये मुल्क पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक नीतियाँ निश्चित नहीं की गयी थीं लेकिन इससे बड़ी विडम्बना यह थी कि कायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान बनने के बाद सत्ता की सभी कुंजियाँ अपने पास रख ली थीं। वे गवर्नर जनरल थे, संविधान बनाने वाली संसद के अध्यक्ष थे, मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे और अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए उन्होंने 1935 के एक्ट कानून आज़दिए हिन्द 1947 में एक संशोधन कराया था जिसे 9 पी. कहा जाता है। इसके अन्तर्गत उन्हें यह अधिकार मिल गया था कि वे पाकिस्तान की किसी भी प्रान्तीय विधानसभा को भंग कर सकते थे। उन्होंने अपने इस अधिकार का प्रयोग भी किया था।

मियाँ आसिफ रशीद ने पाकिस्तान में संविधान बनाने की प्रक्रिया और उसके स्वरूप को भी एक बुनियादी भूल माना है। उनका कहना है कि भारत ने तीन साल के समय (1947-1950) के अंदर संविधान बना कर भारत को गणराज्य बना दिया था जबकि पाकिस्तान में यह प्रक्रिया लम्बी चली। नौकरशाही और सेना ने संविधान के रास्ते में रोड़े अटकाये। और पाकिस्तान का तीसरा संविधान 1973 में बना जो मूलतः ग़ैर लोकतान्त्रिाक है तथा ‘चेक एंड बैलेंस’ की व्यवस्था भी उसमें नहीं है। इसके अलावा पाकिस्तान में ‘इस्लाम’ का बढ़ता प्रभाव और केन्द्र-राज्य संबंधों की तनावपूर्ण स्थिति भी देश को लोकतान्त्रिाक आधार देने में बाधा बनती रही।


मुहम्मद अली जिन्ना ने 11 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान की विचारधारा की व्याख्या करते हुए कहा था, ”हम इस बुनियादी सिद्धान्त से आगे बढ़ रहे हैं कि हम सब नागरिक हैं और इस देश के नागरिक बराबर हैं।“ जिन्न लोकतंत्र, धार्मिक सद्भाव और धर्म निरपेक्षता के पक्के समर्थक थे, लेकिन वे अपने विचारों को व्यवहार में लागू न कर सके और अन्ततः सिर्फ तीस साल बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़ियाउल हकने देश को इस्लाम के आधार पर मुस्लिम देश बनाने की घोषणा कर दी। लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता से मुस्लिम देश बना दिये जाने की यात्रा बहुत लम्बी नहीं है लेकिन छलाँग ज़रूर लम्बी है।

मैंने धर्म का जितना सार्वजनिक प्रदर्शन पाकिस्तान में देखा वैसा इस्लामी गणराज्य ईरान में भी नहीं देखा था। जैसे ही आप सीमा पार करते हैं, पाकिस्तान के प्रवेश द्वार पर ‘बिसिम्ल्लाहे रहमाने रहीम’ लिखा दिखाई पड़ता है। उसके बाद जैसे-जैसे लाहौर के नज़दीक पहुँचते हैं वैसे चैराहों पर, इमारतों के ऊपर, घरों के ऊपर, दुकानों के अंदर और बाहर, छतों पर, पेड़ों के तनों पर, पार्कों और मैदानों में, बार्ग़ों और फुलवारियों में हर जगह अल्लाह, कलमा या क़ुरान की आयतें लिखी दिखाई देती हैं। पेड़ के तनों पर लिखा दिखाई देता है, ‘पत्ते-पत्ते पर अल्लाह का नाम लिखा है।’ अलीशान घरों के ऊपर ‘माशा-अल्लाह या सुभान अल्लाह’ दिखाई पड़ता है। इसके अलावा रंग-बिरंगे झंडे घरों और इमारतों पर लहराते नज़र आते हैं। मैंने किसी दोस्त से पूछा था कि इन रंगबिरंगे झंडों का क्या मतलब है? क्या ये किसी विशेष सम्प्रदाय या राजनैतिक दल के झंडे हैं? मुझे जवाब मिला था कि पाकिस्तान में धर्म और राजनीति एक-दूसरे में इतना घुल-मिल गये हैं कि कहाँ से क्या शुरू होता है और क्या कहाँ ख़त्म होता है, यह बताना मुश्किल है।

..........

जारी....


"असग़र वज़ाहत" से साभार....।

Wednesday, July 21, 2021

'क्या भूलूँ क्या याद करूँ '

 

     ('क्या भूलूँ क्या याद करूँ ' - "हरिवंशराय बच्चन")


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी नेट/जे.आर. एफ परीक्षा में चयनित उत्तर छायावादी कवि, हालावाद के प्रवर्तक "महाकवि हरिवंशराय बच्चन" जी की आत्मकथा 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' पर कुछ विशेष तथ्य जानने की कोशिश करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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● प्रमुख तथ्य व अन्य बातें :-


• इस रचना का प्रकाशन 1964 में कल्पना पत्रिका, हैदराबाद में हुआ था।

• रचनाकार बच्चन ने प्रस्तुत ग्रन्थ में उन्ही घटनाओं का उल्लेख किया है जो उनके मन को गहरी छू गयी है।

• इसमें लेखक के जीवन के शुरुआती 30 वर्षो का वर्णन है।साथ ही  परिवार का जिक्र करते हुए मनसा की सात पीढ़ी का वर्णन किया है। इसके अलावा अपनी कायस्थ जाति का वर्णन भी किया है।

• लेखक की शिक्षा का प्रारंभ बहनों और माता की मदद से हुआ था। जहाँ उन्होंने अपनी सहूलियत व बहुमूल्य समय देकर इन्हें प्रोत्साहित किया। कभी-भी इनकी शिक्षा में ढील नहीं देनी चाही। जितना इनके हिस्से में था उन्होंने भरपूर मात्रा में किया ताकि इनकी शिक्षा-यात्रा निरंतर चलती रहे । 

•  लेखक का जीवन शुरुआती दौर में आर्थिक तंगी की समस्या से भी जुझा है। इसके लिए इन्हें हमेशा ही धन की आवश्यकता व कमी महसूस होती रही है। इसके अभाव में इनके कई कार्य भी रुकते हुए होंगे ।

• हिंदी साहित्य जगत में लेखक की अक्षयकीर्ति "मधुशाला" की लोकप्रियता के कारण उन पर कई आरोप भी लगाए गए। जैसे रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा उनको गोली मारने की धमकी देना आदि।

• आत्मकथा के अंत मे "श्यामा" जोकि इनकी प्रथम पत्नी थी, उनके अंतिम दिनों का वर्णन भी किया है। अपनी पत्नी के मृत्योपरांत इनकी दशा एक दम नाज़ुक हो गयी थी। "निशा-निमंत्रण "व अन्य रचनाओं में इस विरह-वेदना, और मर्म की झलक दिखती रही है।

• रचना में एक अन्य पात्र गन्सी चाचा भी रहे हैं। जिनका आतंक बच्चों पर बहुत पडा है। चाचा द्वारा बार बार मारना- पीटना और कठोर रवैया अपनाने की वजह से बच्चे इनसे सहमे से रहते थे।

• छेदीलाल की कुछ नया करने की खासियत उन्हें (लेखक) बराबर प्रेरित करती रहती थी। 

• भोेलानाथ बाबा से अध्ययन की रूचि मिली। 

• नायब साहब से जीवन जीने की लालसा मिली जिसके बारे में लेखक कहते हैं कि :- जीवन के मारे हुए के प्रति भले ही मेरे मन में सम्वेदना न हो परन्तु जीवन से जूझने वालो के प्रति मेरे अंदर खूब उत्साह है" ।

•  बच्चन जी को पिता "प्रतापनारायण" से वैचारिक मतभेद होने के बाद भी परिश्रम , शक्ति मिलती रहती थी।

• पत्नी श्यामा ने खूब संघर्ष करने की शक्ति दी।

• रचना में शिक्षक श्री विश्राम तिवारी का भी जिक्र छेड़ा है। 

•  लेखक का हिंदी साहित्य जगत में प्रवेश यूँही नहीं था । और न ही हिंदी साहित्य इन्हें विरासत में मिला था। इसके स्थान पर "सत्यदेव परिव्राजक" ने उनमे हिंदी कविता के प्रति भाव जगाये थे।

• अपने मित्रों का भी वर्णन किया है। कर्नल के साथ अपने समलैंगिक सम्बन्ध का उल्लेख भी किया और उसके बाद अपने दोस्त की पत्नी जिसका नाम "चंपा" था उसके साथ भी सम्बन्ध रहे हैं।   वह कहते हैं कि:-

                                      

अगर उनका सानिध्य मुझे न मिलता तो में आज वह न होता जो आज हूँ"...।

• "चंपा" के लिए कहते हैं- कनक छरी से इकहरे बदन सी , लमछर, गौर वर्ण कीट्स की dryend of the trees  की तरह लगती थी"....।


पात्र:-  

प्रतापनारायण   -पिता

सरस्वती - माता

श्यामा  - पत्नी

विश्रामतिवारी - शिक्षक

गनसी - चाचा

   

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Sunday, July 18, 2021

उपन्यास भाग -10

         

                                (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. प्रभा खेतान :-

" आओ पे पे घर चले" 1990 में अमरीका के 3 शहरों लॉस एंजलिस, सेंट लुइस, न्यूयॉर्क में रहते हुए नारी उत्पीड़न के द्वारा लेखिका ने अपने अनुभवों को साझा किया है।

"तालाबंदी" 1991 में मोमिनपुर इलाके के परिश्रमी साधनहीन किंतु कुशल मारवाड़ी श्याम बाबू की फैक्ट्री के स्थापित समृद्ध और बंद होने की कथा है। इसमें मार्क्सवादी विचारधारा को दिखाया है जो धर्म का रूप लेकर बंगाल में कई फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं। 

" छिन्नमस्ता" 1993 में नारी का जीवन संघर्ष है। पुरुषों के समाज में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कथा।

"पीली आँधी" 1996 में सामंतीय व्यवस्था के उत्पीड़न और अकाल से त्रस्त मारवाड़ी जाति का कलकत्ता आने और इन बेगानी धरती पर अनेक अवरोधों-विरोधों के बावजूद अपने श्रम व व्यापार के बल पर व्यवस्थित है।

                                                  

2. मैत्रयी पुष्पा :-

 "बेतवा बहती रही " 1993 में गरीब परिवार में जन्मी, कम पढ़ी-लिखी उर्वशी की कथा है।  विवाह के बाद उसका प्यार जल्द ही छिन जाता है और वह कम उम्र में ही विधवा हो जाती है।

" चाक" 1997 में अलीगढ़ के पास अंतःपुर गाँव में अनेक जातियों की स्त्रियां है जिन पर जाटों का वर्चस्व है और उनके शोषण से दमघोंटू जीवन जी रही हैं।

"झुलानट" 1999 में बुंदेलखंड के एक परिवार की कथा है।

" अल्मा कबूतरी" 2000 में कबूतर जाति में जन्मी अल्मा की संघर्ष की कथा है। अंग्रेज़ो ने इन्हें जरायम पेशी घोषित किया परन्तु यह अपना सम्बन्ध रानी पद्मावती, झलकारीबाई से जोड़ते हैं।

"कहि ईसुरी फाग" 2004 में ईसुरी के फाग बुंदेलखंड में प्रसिद्ध है। ईसुरी के रजऊ की प्रेमकथा का वर्णन है।

"त्रियाहट" 2005 में उर्वशी नामक विधवा लड़की की कहानी है। उसका अपराध यही है कि वह अपने अनुसार जीवन जीना चाहती है।

"फरिश्ते निकले" 2014 में ग्रामीण स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों की कथा है जहाँ नायिका "बेला"एक समय तक सबकुछ सहती है पर अंततः वह ताकतवर स्त्री के रूप में तब्दील होती है।

                                                    

3. मधु कांकरिया :-

 "आखिरी सलाम" 2002 में वेश्याओं के जीवन पर आधारित है।

"पत्ताखोर" 2005 में बढ़ती नशाखोरी के भीषण और घातक परिणाम की ओर ध्यान आकृष्ट करता है।

"सेज पर संस्कृत" 2008 में जैन साध्वियों के जीवन के अन्तरबाध्य में झाँकता हुआ, स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को उठाता है। महावीर के निर्वाण के 843 वर्षों बाद जैन धर्म की आचार संहिता लिखकर मनमानी कर रहे हैं। 

"खुले गगन के लाल सितारे" 2012 में नक्सलवादी आंदोलन को केंद्र में रखकर लिखा गया है।


4. जया जादवानी :-

" मीठो पाणी खारों पाणी" 2013 में सिंध के 5000 साल के इतिहास को छोटे छोटे खण्ड में बांटकर दिखाया गया है।

"मीठा पानी सिंध का और खारा पानी अरब सागर का।

                                              

5. अनामिका  :-

" तिनके तिनके के पास" 2008 सेक्स वर्कर की बेटी तारा की माँ के देहांत के बाद कॉलगर्ल बनकर पढाई करती है। नई मध्यवर्गीय स्त्री के जटिल यथार्थ का चित्रण है।

                                                     

6. क्षमा कौल :-

"निक्की तवी पर रिहर्सल" 2013 में कश्मीर आतंकवाद पर लिखा है। विकृत राजनीति को भी दिखाया है। जम्मू में 2 महीने तक चल रहे आंदोलन जिसे "बम-बम भोले" नाम से भी जाना जाता है जिसमे जबरिया सेक्यूलर चेहरे और असहज को दिखाया है।

                                                       

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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Thursday, July 15, 2021

उपन्यास भाग - 9

           

                          (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. कृष्णा सोबती :-

" सूरजमुखी अंधेरे के" 1972 में नारी जीवन की मनोवैज्ञानिक समस्या को उभारा है। रत्ती जिसका बचपन मे बलात्कार हुआ था वह अब मनोवैज्ञानिक प्रभाव से जूझ रही है।

"जिंदगीनामा" 1979 में पंजाब की संस्कृति और वहाँ के रेशे रेशे को समझने के लिए अच्छा उपन्यास है। देवराज उपाध्याय के शब्दों में " यदि किसी को पंजाब की संस्कृति, रहन-सहन, चाल-ढाल, इतिहास आदि की जानकारी तो "जिंदगीनामा" से अन्यत्र कहीं ओर जाने की जरूरत नहीं"...।

लेखिका का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है।

"दिलो दानिश" 1993 में दिल्ली के रईश परिवार के बहाने भारतीय नारी की व्यथा दिखा दी है।

  

2. मन्नू भंडारी :-

"आपका बंटी" 1971 में मध्यवर्गीय समाज मे तलाक जैसी समस्या का प्रभाव किस तरह से बच्चों पर पड़ता है उसका जीवंत चित्रण किया है। शकुन, अजय और बंटी की कथा है।

"महाभोज" 1979 में लेखिका का राजनीतिक उपन्यास है जिसमें दलित लोगों को किस तरह से शोषित किया जाता है और अंततः उसकी "बिसेसर" (बिसु) हत्या कर के उसके साथी बिंदा को ही उसका हत्यारा बना दिया जाता है। राजनीतिक स्वार्थ किस हदतक जा सकता है इसका जीता जागता प्रमाण है यह उपन्यास।

                                                      

3. उषा प्रियम्वदा :-

"55 खंभे लाल दीवारें" 1961 में सुषमा को केंद्र में रखकर आधुनिक नारी की मानसिक यन्त्रणा का अंकन किया है।

" अन्तर्वशी" 2000 अमरीका में प्रवास करने वाले भारतीयो को कथा। लेखिका ने मुक्त यौन संबंध को विशेष रूप से दिखाया है।

"भया कबीर उदास" 2007 नायिका लिली पांडेय के माध्यम से नारी की छटपटाहट और मृत्यु से उतपन्न भय का ही मार्मिक चित्रण किया है।

 

4. राजी सेठ :-

"तत्सम" 1983 में स्त्री पुरुष के सम्बंध पर विवेचित है। विश्विद्यालय स्तर के खोखलेपन को भी दिखाया गया है।

"निष्कवच" 1995 में भारतीय और पश्चिमी संस्कृति मे अंतर दिखाया है कि पश्चिम में रहने वाले लोगों को वह नरक और भारत मे रहने वालों को स्वर्ग लगता है। पश्चिम में रिश्ते देह के आधार पर बनते हैं, वयस्क होने के बाद लड़का-लड़की को अकेले छोड़ दिया जाता है परन्तु भारत इससे विपरीत है। यहाँ लंबे समय तक परिवार पर ही बच्चे आश्रित रहते हैं और यहाँ के रिश्ते भावनाओ और संस्कृति, मर्यादा से जुड़े हैं जो लंबे समय तक चलते हैं।

"उनके हिस्से की धूप" , "चितकोबरा" में नारी स्वतंत्रता , प्रेम विवाह, वैवाहिक जीवन की समस्या, ऊब व ताजगी से छुटकारा पाने के लिए पर पुरुषों की तरफ जाना ये सब इन 2 उपन्यास में है।

"अनित्य" 1980 में गाँधीवादी की व्यर्थता और भगतसिंह की का क्रांतिकारी आंदोलन को दिखाया है।

"कठगुलाब" 1996 में पुरुष प्रधान समाज मे नारी की दुर्व्यवस्था का चित्रण।

"मिलजुल मन" 2009 लोगों के मोहभंग को दिखाया है। 

                                                     

5. चंद्रकांता :-

 "बाकी सब खैरियत है" 1983 में दिखाया है कि किस तरह से सयुंक्त परिवार का एक लड़का विदेश जाकर सारे रिश्तों को ताक पर रख देता है और भावनात्मक रूप से अलग हो जाता है। विदेशीपन इतना लुभाता है कि अपने परिवार को भूल जाता है।

"एलान गली जिंदा है"  1984 कश्मीर की एक गली का चित्रण है जहाँ सदी गली मान्यता है। पीढ़ियों के अंतर्विरोध दिखता है।

                                                    

6. कुसुम कुमार :-

"हीरामन हाईस्कूल" 1989 में एक विधवा अकेली स्त्री के जीवन संघर्ष की कथा है जहाँ वह अपने 2 पुत्रियों को पालपोष कर जिजीविषा का उदहारण देती है।

                                                  

7. ममता कालिया :-

" दुक्खम-सुखम" 2010 बीसवीं शती की पृष्ठभूमि पर लिखा है। इसके सूत्र दिल्ली, आगरा,बम्बई तक फैले हैं। गांधी के चरखा से आत्मबल और विभाजन की त्रासदी।

"कल्चर वल्चर" 2017 में कला, साहित्य और संस्कृति आज सरोकार न रहकर कारोबार बनता जा रहा है। कारोबारियों के हाथ मे जाकर ये संस्कृति विकृति हो गई है और साहित्य वाहित्य बन गया है।


8. चित्रा मुद्गल :-

" आँवा" 1999 में बम्बई के मजदूरों का संघर्ष दिखाया है। जिसमे ट्रेड यूनियन कठपुतली बन गयी है और समाज का कोई भी वर्ग और क्षेत्र क्यों न हो वहाँ नारी उत्पीड़न अवश्य ही है,यह समस्या है।   

"गिलिगुड" 2002 में युवा पीढ़ी बुज़ुर्ग की घोर उपेक्षा और अवमानना करते हैं और उन्हें पालतू कुत्ते से भी ज्यादा बदत्तर बना देते हैं।

"पोस्ट बॉक्स 203 नाला सोपारा" 2016 में उस मानसिकता का विरोधी है जो मानव को मानव न समझ कर केवल शारिरिक सुविधा ही समझती है।   


10. मृणाल पांडे :-

"पटरंग पुराण" 1983 में हिमालय के पाददेश में स्थित पहाड़ी अंचल के जीवन चित्र अंकित किये हैं। 11 पीढ़ियों के इतिहास दिखाया है। पटरंग पुर के बसने, विकसित होने को बायस्कोपी रूप में दिखाया है।

                                                  

11.नासिरा शर्मा :-

" सात नदियाँ एक समुन्द्र" 1984 में ईरान की कथा दिखाई है। राजशाह की तानाशाही के खिलाफ जनता की बगावत का चित्रण जिसमे जनता हार जाती है और मुक्ति नही मिल पाती तानाशाही से।

" शाल्मली" 1987 में लेखिका ने एक पढ़ीलिखी महिला अफसर की उन्नति का चित्रण किया है जहाँ उसे आने से ऊपर के अफसरों के द्वारा हीं दिखाया जाता  है और घर मे भी पति द्वारा उसका अनादर ही हकता है।

"ठीकरे की मंगनी" 1989 में जकड़े एक मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार की शिक्षित और संवेदनशील युवती महरूख के संघर्ष की गाथा है।

" अक्षयवट" 2003 में इलाहबाद को केंद्र रखकर लिखा गया है। मानवीय मूल्यों और वर्तमान जीवन की स्थिति को उजागर किया है।

"कुनियाँ जान" 2005 में टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव के कारण क्रमशः निरन्तर छीजते जलस्रोतों की समस्या पर आधारित है।

कागज की नाव" 2014 में बिहार के उन परिवार की कथा है जिसका कोई न कोई सदस्य चंद रुपयों के लिए खाड़ी देशों में नोकरी करने चला जाता है और वतन, परिवार, आदि की जिम्मेदारी को यहाँ छोड़ जाता है।

                                                    

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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Saturday, July 10, 2021

उपन्यास भाग - 8

   

                            (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. मणि मधुकर :- 

मणि मधुकर जी को हिंदी नाटकों में भी गणनीय माना गया है।

" सफेद मेमने" 1971 में राजस्थान के "नांगिया" गाँव को केंद्र में रखकर सन्त्रास, अजनबीपन, जीवन की ऊब को दिखाया है।

"पत्तो की बिरादरी" 1979 में विभाजन और अकाल के बाद दोनों देशों में रोजी रोटी के लिए भटक रहे मानवों व राहत कैम्पों में हो रहे उनके साथ शोषण की कथा है। ऐसा ही कथा का नायक "शुबो" जो पाकिस्तान से आया है उसकी हत्या कर दी गयी है और उसकी कहानी को उसकी पत्नी "जुगनी" आगे बढाती है।


2.मंजूर एहतेशाम :-

" सूखाबरगद" 1986 में देश के बटवारे होने पर प्रगतिशील चेतना दिखाई है। विभाजन होने के बाद भी अब्बू, रसीदा पाकिस्तान नही जाते और पाकिस्तानियो को अलग मानते हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव से भरपूर पात्र हैं।

                                                

3. वीरेंद्र जैन -

"शब्दवध" 1983 में, प्रकाशन जगत में व्याप्त अनाचार और प्रतिभाओं का बौद्धिक शोषण का पर्दाफाश किया गया है। लेखक कहते हैं" बंधु यह हिंदी प्रकाशन जगत है यहाँ साहित्यकार पूजे जाते थे। पहले प्रकाशन "सरस्वती" की पूजा करता था अब इसे शुद्ध बनिये चलाते हैं और उन्ही की पूजा होती है जो कमा के दे सकते हैं।

" सबसे बड़ा सिपहिया" 1988 में पुलिस तन्त्र के थानेदार से लेकर हवलदार तक के क्रूर आमानवीय पक्ष को उजागर किया है। 

                                                         

4. मिथिलेश्वर :-

"युद्धस्थल" 1981 में दूधनाथ चौधरी रामशरण बहू डायन करार देकर अपने बेटे की हत्या का कारण मानता है। इसी कारण उसकी हत्या कर दी जाती है।

" प्रेम न बाड़ी उपजै" 1995 में रूपेश और शकुंतला की प्रेमकथा।लेखक के अनुसार पुरुष की अपेक्षा स्त्रियाँ प्रेम को अधिक गहरा समझती हैं।

"यह अंत नहीं" 2000 में खवाड़हीस, पहाड़पुर, रघुनाथपुर को आधार बनाकर बिहार के गाँवो का चित्रण किया है।

                                                      

5. कमलाकांत त्रिपाठी :-

"पाहीघर" 1991 में प्रथम स्वंतत्रता संग्राम 1857 को केंद्र में रखकर लिखी गयी है जिसमें मात्र नवाबो ताल्लुकदारों को ही नहीं देखा है बल्कि किसान, मजदूर, मालगुजार, सामान्य जनता सभी का योगदान के रूप में दिखाया है। कथा की पटभूमि बसौली गाँव के "पाहीघर" है।

इस उपन्यास के बाद लेखक को किसान चेतना का श्रेष्ठ उपन्यासकार मान लिया है।

"यह जो दिल्ली है" 1993 में दिल्ली की पृष्ठभूमि के माध्यम से आज के मूल्यहीन अवसरवादी और सुविधापरस्त पत्रकारिता के जगत का चित्र खींचा है।

 "कथासर्कस" 1995 में इसकी पृष्ठभूमि भी दिल्ली की है जहाँ साहित्य जगत की गुटबाजी, पैंतरेबाजी, जोड़-तोड़ व व्यावसायिकता आदि का कच्चा चिट्ठा पेश किया है। लेखक के अनुसार आज का कथा साहित्य रिंग मास्टर के इशारे पर नाचने वाले कि तरह हो गयी है xxx जो ऊपर से मनोरंजन करते हैं, सुखी रहते हैं परन्तु अंदर से तिक्त, विवश, दर्दनीय हैं।


6. प्रकाश मनु :-

"पापा के जाने के बाद" 1998 में कला जगत में चित्रकार वसन्तदेव के माध्यम से आदर्श विहीन समाज को दिखाया है।

                                                    

7. सुरेंद्र वर्मा :-

"मुझे चाँद चाहिए" 1993 में एक महत्वाकांक्षी कलाकार के संघर्ष की कहानी है। कलाबाजार की प्रतिकूल परिस्थितियों का चित्रण। जिसमें हर्षवर्धन जैसा कलासम्पन्न व्यक्ति अंततः आत्महत्या कर लेता है। लेखक यहाँ आत्महत्या को गलत मानता है।

"दो मुर्दो के लिए गुलदास्ता" 1998 में दिल्ली के शोधछात्र और मथुरा के चौकीदार के बहाने बम्बई की भयानक अपराध और कुत्सित सेक्स की दुनिया का चित्रण किया है। समृद्ध नारियों के अतृप्त सेक्स जीवन की कथा है।


8. भगवान सिंह :

इनका प्रस्तुत उपन्यास रामकथा पर आधारित रचनाओं में विशिष्ट योगदान रखता है। इसमें राम जी के चरित्र को नए अंदाज में बना है। जिसको हम भक्तिकालीन नजरिये से भी देख सकते हैं। जब भक्तों द्वारा अपने आराध्य को अपने अनुसार देखा-समझा जाता था, उनकी भक्ति की जाती थी, उनके आकार-रंग-रूप को ढाला जाता था।

"अपने अपने राम" 1992 में राम कथा की औपन्यासिक कथा कही है। दृष्टि की नवीनतम के बावजूद सत्ता संघर्ष की कहानी बन जाती है, जिसका शायद लेखक अनिमान भी न करता हो।

                                                  

9. प्रदीप सौरभ :-

इनका LGBT कम्युनिटी पर आधारित उपन्यास बहुत ही फेमस हुआ था। 

"मुन्नी मोबाइल" 2009 में बक्सर से आई दिल्ली में एक लड़की की कथा है जिसमें वह महानगरीय जीवन में तेजी से मूल स्वरूप के विपरीत मशीन में तब्दील बन जाती है।

" तीसरी ताली" 2011 हिजड़ो, समलैंगिक, लैसवीयन्स, लौंडेबाज आदि की विकृत यौन सदर्भो को दिखाया है। मुख्यतः हिजड़ो के जीवन को दिखाया है।

10. पंकज बिष्ट :-

"लेकिन दरवाजा" दिल्ली के साहित्यकारों के हरासोन्मुखी सुविधा खोजी जीवन पर आधारित है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


"हिंदी साहित्य लोचन" sahitya hindi lochan.blogspot.com पर आने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आप इसी तरह से "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आते रहे और हिंदी साहित्य से सम्बंधित अन्य तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी यहाँ पाते रहें।

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