(केशव )
● ये ओरछा नरेश रामसिंह के भाई "इंद्रजीत" के आश्रय में रहते थे। इन्होंने काव्य के सब अंगों का निरूपण शास्त्रीय पद्धति पर किया है। इसी पर शुक्ल कहते हैं " इसमें संदेह नहीं कि काव्यरीति का सम्यक समावेश पहले-पहल केशव ने ही किया"..।
" वेणीमाधव दास के "मूलगोसांई चरित" के अनुसार जब केशव तुलसी से मिलने गए तो तुलसी ने केशव को "प्राकृत-कवि" कह दिया था । जिसका उत्तर देने के लिए केशव ने 1 ही रात में रामचन्द्रिका की रचना कर दी। इसी कारण उनकी रामचन्द्रिका व कवि के लिए "हृदयहीन" कहा जाता है।
• बच्चन सिंह के अनुसार "भाषा की कमी भी इसी जल्दबाज़ी का ही परिणाम है"..।
• शुक्लानुसार इनके काव्यशास्त्र सम्बन्धी मतों और उनके प्रयोगों के कारण पहली बार हिंदी में संस्कृत साहित्य की एक संक्षिप्त उद्धरणी हुई। इन्होंने पाठकों को काव्यनिरूपण की उस पूर्वदशा का वर्णन कराया जो भामह और उदभट के समय थी। उसका नहीं जो आंनदवर्धन, मम्मट, विश्वनाथ के समय चल रही थी।
● केशव को शुक्ल जी ने, काव्य में अलंकारों का प्रधान स्थान समझते हुए "चमत्कारवादी कवि" या "अलंकारवादी" कहा है।
● केशव की रचनाएँ :-
अलंकार के लिए "कविप्रिया" रची
रस के लिए "रसिकप्रिया" रची
● केशव ने रूपक के 3 भेद दण्डी से लिये हैं :-
1. अद्भुत रूपक
2. विरुद्ध रूपक
3. रूपक रूपक
● शुक्लानुसार केशव पर कहे गए कथन:-
1. " केशव को कवि हृदय नहीं मिला था । एक कवि में जो सहृदयता और भावुकता होनी चाहिए वो इनमें नहीं थी".....।
2. " केशव उक्तिवैचित्रय और शब्दक्रीड़ा के कवि थे, जीवन के नाना गम्भीर और मार्मिक प्रसंगों का उन्हें अनुभव नही था"...।
3. " दृश्यों की स्थानगत विशेषता केशव की रचनाओं में ढूँढना व्यर्थ ही है"...।
• काव्य में क्लिष्टता के कारण इन्हें "कठिन काव्य का प्रेत" कहा जाता है।
● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "कवि ने रामचन्द्रिका में छन्द-वैविध्य के लिए जितना यत्न किया है उससे भाषा उतनी ही उपेक्षित हुई है"...।
● बच्चन सिंह के अनुसार "रामचन्द्रिका में प्रबन्ध के सारे तत्व मौजूद हैं, परन्तु आंतरिक तत्व टूटा हुआ है"...।
• रामचन्द्रिका पर "हनुमन्न नाटक" और "प्रसन्नराघव" का प्रभाव पड़ा है।
(बिहारी)
● यह महाराज "जयसिंह" के दरबारी कवि थे। एक बार जब महाराज अपनी छोटी रानी के साथ प्रेम में लीन थे तब वह राजकाज देखने के लिए महल से बाहर ही नहीं निकलते थे जिस पर बिहारी ने यह दोहा कहा था :-
"नहि पराग नहि मधुर मधु, नहि विकास यहि काल
अली कली ही सों बंध्यो, आगे कौन हवाल"...।
इस दोहे के बाद महाराज ने इन्हें बहुत मान दिया और हर दोहे पर अशर्फियाँ देने लगे।
● शुक्लानुसार बिहारी सतसई पर आज तक जितनी भी टीकाएँ लिखी गई हैं उनमें से सबसे प्रभावी और सरस टीका "प.जगन्नाथ" ने लिखी है।
• बिहारी सतसई पर "आर्या सप्तशती" और "गाथा सप्तशती" का प्रभाव है। परन्तु सतसई को पदम् सिंह शर्मा ने विस्तार दिया है। जिस पर शुक्ल कहते हैं " बिहारी ने गृहीत भावों को अपनी प्रतिभा के बल से किस प्रकार एक स्वतंत्र और कहीं-कहीं अधिक सुंदर रूप दे दिया है...।
● बच्चन सिंह ने "बिहारी" को रीतिग्रन्थकारो में रखने पर शुक्ल का खंडन करते हुए उन्हें मुक्तकों का प्रयोक्ता कहा है और रीतिग्रन्थकारों में उनकी गणना को अवैज्ञानिक बताया है।
इसके आगे सिंह जी कहते हैं कि शुक्लानुसार बिहारी के दोहों को देखकर उन्हें "हाँथीदांत पर कढ़े बैलबुटे" कह देना गलत है क्योंकि बैलबुटे हस्तकौशल है और हस्तकौशल कला नहीं होती। हस्तकौशल में हाथ की सफाई होती है, जबकि सतसई रचनात्मक कृति है"..।
● बिहारी पर शुक्लानुसार कहे गए कथन :-
1. "श्रृंगार रस के गर्न्थो में जितनी ख्याति इन्हें मिली है वह और किसी को नही। इनका एक-एक दोहा हिंदी साहित्य में रतन के समान है".....।
2. "मुक्तक कविता ने जो गुण होना चाहिए वह इनके दोहों में चरम पर पहुँचा है".....।
3. "यदि प्रबन्ध एक वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है"....।
4. "जिस कवि में कविता की समाहार शक्ति जितनी होगी वह मुक्तक में उतना ही सफल होगा"....।
5. "बिहारी की भाषा चलती होने पर भी साहित्यिक है"...।
6. बिहारी के दोहों-पदों में फ़ारसी शब्दो के प्रयोग पर शुक्ल कहते हैं " बिहारी जैसे उत्कृष्ट कवि भी फ़ारसी भावों से नहीं बच सके पर उन्होंने उन फ़ारसी भावों को अपनी देसी साँचे में ढाल लिया जिससे वह खटकते क्या लक्ष्य भी नही होते"..।
7. बच्चन सिंह के अनुसार बिहारी इस युग के प्रतिनिधि कवि थे।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018