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Monday, March 1, 2021

भक्तिकाल भाग - 7

 

                         (जायसी)


भक्तिकाल में समस्त  सूफीकवियों में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि "जायसी" ही हुए हैं। इनकी प्रसिद्धि का कारण इनकी अक्षय-कीर्ति "पद्मावत" रचना है। 

जायसी का जन्म 1492 ई. अवध प्रांत के "जायस" में हुआ था और मृत्यु अमेठी में। अमेठी के राज-दरबार में इनका बहुत मान-सम्मान था और जीवन के अंतिम दिनों में यह अमेठी के ही जंगल में रहने लगे गए थे। इनके गुरु का नाम "शेख मोहिंदी" था जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी थी परंतु "सैयद अशरफ" ने इनको (जायसी) मार्ग दिखाया था। ये सिकन्दर लोदी से लेकर बाबर, शेरशाह सूरी और जहाँगीर तक के समकालीन थे।

ये शक्ल से कुरूप थे जिस पर एक बार शेरशाह सूरी हंस दिए थे जिस पर जायसी ने कहा " मोहिका हँसेसि कि हँसेसि कोरहिं"...। इस पर शेरशाह का मोह उतर गया था। 

"बच्चन सिंह" जायसी के इस कथन पर कहते हैं कि" ऐसा उत्तर वो ही दे सकता है जो शरीर से तो कुरूप हो परंतु गुणों से भरा हो"...।

ये एक आँख से काने भी थे। इस पर विजयदेवनारायण साही "जायसी" की इस पंक्ति का यह अर्थ कहते हैं" :-

सुख भा सोच एक दुख मानो

ओहि बिनु जिवन मरन के जानो"....।

अर्थात जायसी की आँखे किसी से लड़ गयी थी। आँखे लड़े बिना कोई बड़ा तो क्या छोटा भी कवि नहीं बन सकता। गनीमत हुई कि एक आँख बच गयी। वहीं दूसरी ओर जायसी खुद ही अपने को काना कहते हैं :-

" मुहम्मद बाई दिसि तजि एक सरवन एक आँखि"...।


• जायसी के काव्य पर लोग मुग्ध थे। पर इसके लिए उन्होंने गर्वोक्ति न करके विनम्रता ही प्रकट की है -

"हों सब कबिन्ह करे पिछलेगा, 

किछु कहि चला तलब देइ डगा"..।

फिर भी वह कहते हैं, डंके की चोट कहते हैं। पर लगता है कुरूपता का दर्द उन्हें बराबर सालता रहा -" 

एक नैन जस दरपन ओ तेहि निर्मल भाऊ

सब रूपवंत पाँव गहि मुख जोवन्ही कइ चाउ"..।

सभी रूपवंत उत्सुकतापूर्वक उनसे कुछ सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं। रूपवंत का उल्लेख कवि के अपने क्षोभ का द्योतक है।

● विजयदेवनारायण साही ने अपनी पुस्तक "जायसी" में स्वीकारा है कि वह सूफी न होकर शुद्ध कवि थे"..। वह उन्हें प्रच्छन्न रूप से इस्लाम का प्रचारक मानते हैं।


● इनकी रचनाएँ हैं 

1. "आखिरी कलाम" जिसमें बाबर की प्रशँसा और कयामत का वर्णन किया गया है। जोकि 1528 ई. में लिखी थी।

2. "अखरावट" यह एक तरह का वर्णमाला है जिसमें शब्द निरूपण किया गया है।

3. "पद्मावत" यह जायसी का कीर्तिस्तंभ है। जोकि 1540 ई. में आया था। इसमें 57 खण्ड है और 2 भागों में बंटा है। इसका पहला भाग- "रत्नसेन और पद्मावती के मिलन तक की कथा" , दूसरा भाग- "राघवचेतन का अलाउद्दीन से मिल जाने से लेकर अंत तक"..है।  इसमें शेरशाह सूरी का वर्णन भी है।

इस भव्य और प्रसिद्ध महाकाव्य में चितौड़ के राजा रत्नसेन और सिंघल की राजकुमारी पद्मावती के प्रेमप्रसंग को बहुत ही मार्मिक रूप से और अपनी विशिष्ट कला के माध्यम से रचा है। इसी के अतिरिक्त दूसरी तरफ रत्नसेन की पहली पत्नी नागमती के विरह वर्णन को एक नया आयाम देकर "बारामासा" का विशद उदाहरण पेश किया है। जिसने हिंदी साहित्य में अभी तक के सबसे उत्कृष्ट बारहमासा का परिचय दिया है।  

इसके अलावा "प्रेम की पीर" की व्यंजना करने में भी इस कृति का कोई सानी नहीं।

बच्चन सिंह के अनुसार जायसी ने इस ग्रन्थ को लोक से ग्रहण किया था। यह काव्य का अपना कमाल है कि काल्पनिक सत्य ऐतिहासिक सत्य हो गया।


●बच्चन सिंह के अनुसार पद्मावत की संरचना:- 

1. "दूसरे प्रेमाख्यानों में नायक-नायिका के मिलन के बाद कथा समाप्त हो जाती है परंतु इस कथा की शुरुआत ही यही से होती है और इसका समापन एक तरह की त्रासदी और मृत्योबोध में होता है"...।

2.  "यदि जायसी का उद्देश्य केवल सूफीवाद को स्थापित करना ही होता तो पद्मावती को पा लेने के बाद दोनों सूफी हो जाते"..। 

परन्तु "पद्मावत" की रचना, कवि का किसी धर्म-संस्कृति का प्रचार-प्रसार बिल्कुल नहीं था। यदि ऐसा होता तो श्याद इस्लामिक कथा, फ़ारसी के शब्द, कथानक का ज्यादातर अंश इस्लामिक मत को प्रश्रय देना होता ,जबकि इसके विपरीत भाषा और वाक्य-विन्यास के स्तर पर कवि की मौलिकता का प्रमाण ही प्रतीत होता है। इसके अलावा जनता तक अपनी बात पहुँचाने के लिए भी जायसी भारतीय जनमानस से जुड़ते हैं और वहीं की संस्कृति को अपनाते हैं नाकि इस्लामिक संस्कृति को। 

इसके अतिरिक्त फ़ारसी मसनवी शैली की बंधी हुई परिपाटी पर भी जायसी के कदम नहीं पड़ते, बल्कि उससे हटकर एक नई कला को वह अपने ग्रन्थ में प्रस्तुत करते हैं। जो विद्वानगण ये समझ बैठते हैं कि "पद्मावत" भारतीय प्रेमाख्यान परम्परा पर पूरा सटीक बैठता है तो वो भी बड़ी भूल करते हैं क्योंकि भारतीय प्रेमाख्यान काव्य-परम्परा में सुखांत और मिलन के काव्य लिखे गए हैं जबकि "पद्मावत" में अंततः नायिका का सती होना कहीं से भी सुखांत न होकर एक विशेषपन है। वह कवि की कलात्मकता है जिसमें कथा का समापन दुखांत में भी सुखांत की तरफ ही जाता हुआ दिखाई देता है।

3.  बच्चन सिंह के अनुसार "सिंघल कथा में सूफीवाद की जो जड़े दिखाई देती है वहाँ पर उल्लास की जगह अवसाद की छाया है"...।

4. "जायसी में मृत्युबोध की त्रासद अंतर्दृष्टि है। पद्मावत का प्रतिपाद्य पद्मिनी का सती होना नही है। सिंघल की फंतासी और दिल्ली-चित्तौड़ युद्ध, जिसे हिन्दू-तुर्क युद्ध भी कहा जाता है, वहीं पहुँचता है। पद्मावत का कार्य इस कथन पर है :-

छार उठाय लीन्ह एक मुठी

दीन्ह उड़ाई पिरिथमि झूठी।


अर्थात 'सिंघल-दिल्ली-चित्तौड़-वैभव सब इसी धरती पर है और सब झूठ है, सबकी परिणति केवल मृत्युबोध ही है। परंतु यह मृत्युबोध एक तरफ तो भौतिक है और एक तरह आध्यात्मिक। अर्थात जहाँ एक तरफ हम भौतिक सुख-सुविधाओं से मृत्यु को जीत सकते हैं वहीं दूसरी ओर पद्मावती का मृत्युबोध ईश्वरीय परिधि के अंतर्गत अपनी आस्था-विश्वास, अपने स्वाभिमान, स्त्रीत्व की रक्षा, परपुरुष की छाया से बचने के लिए सती होना एक प्रगतिशील कदम था। जो अभी तक शायद किसी भी सूफ़ीकाव्य में ही नहीं भारतीय प्रेमाख्यान काव्यपरंपरा में भी मिल पाना दुर्लभ है। यही साहस जायसी के ग्रन्थ को बाकी ग्रन्थों से विशिष्ट भी करता है और मौलिक भी बनाता है....। 

5.  जिस मृत्युबोध की तरफ सन्तकवियों ने भी प्रचार किया था उसी तरह का मृत्युबोध सूफियो में भी दिखता है। बस दोनों में मुख्यतः यह फर्क है कि संतो का मृत्युबोध मोक्ष को प्राप्त करने को लेकर चलता है वहीं जायसी का मृत्युबोध इसी धरती पर मिलता है। 

जब जायसी कहते हैं "मानुष प्रेम भय बैकुंठी"....। अर्थात मनुष्य प्रेम ही स्वर्गीय तत्व है। "इस प्रेमतत्व की स्थापना कबीर पहले ही कर चुके थे बस उसे राग के धरातल पर लाना बाकी था जो जायसी ने पुरा कर दिखाया"...।

अर्थात मनुष्यों के साथ प्रेम के साथ रहना, समानता का व्यवहार करना, जातिभेद को खत्म करने जैसे ठोस कदम ही सही मायने में स्वर्ग प्राप्त करने के बराबर है। जीवन के उस पार क्या है या क्या होगा वो किसी को नही पता इसलिए जायसी भी जीवन के इसी पार स्वर्ग को देखने के लिये कहते हैं। और यह इतिहास की माँग भी थी। कि हिन्दू-मुस्लिम एकता का भाव भी सुदृढ़ करना उस समय की माँग थी।

6. "जायसी का प्रेम मृत्युंजय प्रेम है...... जो व्यक्तिक प्रेम है"..। उसमें भी वह सामाजिक है। इसके लिए राग में विराग और विराग में राग का होना आवश्यक है"..।

अर्थात जब तक जीवन मे संघर्ष नहीं होगा, संवेदनशीलता नहीं होगी , जमीनी भाव नहीं आएगा तब तक हम न ही जीवन को समझ पाएँगे और न ही मृत्यु को। क्योंकि भौतिक सुख-सुविधाओं के चक्कर में पड़ कर हम आलसी और जड़ हो जाते हैं जिससे हमारी भावनाएँ कुंद हो जाती है। और हमारा मन-मष्तिष्क काम करना बंद कर देता है। इसलिए जायसी राग-विराग के विशेष मिश्रण की बात मृत्युबोध के संदर्भ में करते हैं।

● बच्चन सिंह की एक बात ज्यादातर सही बैठती है कि "वृद्धावस्था में लिखा गया "पद्मावत" उनके आने मृत्युबोध से मिलकर एक सीमा पर आत्म चरित्तात्मक हो जाता है"..। 

जायसी का मृत्युबोध के सम्बंध में बच्चन सिंह के दिए गए मत ऐसे लगते हैं जैसे जायसी के जीवन पर जितने भी आघात हुए हो, या जितनी भी उनके साथ ज़्यादती हुई हैं , उन्होंने अपने समय में जिस अंधाकारमय मध्यकाल को देखा था, उन सबसे प्रभावित होकर उन्होंने इसी धरती पर जीवन-मृत्यु और स्वर्ग-नरक की कल्पना कर दी है। जो कुछ भी करना है ,पाना है वो इसी धरती पर करना है क्योंकि इस लोक के बाद क्या है ? कोई नही जानता। जायसी की इतनी व्यापक दृष्टि का अर्थ लगाया जा सकता है कि वह समानता जैसे मूल्य पर कितना बल देते होंगे। ठीक इसी तरह आधुनिक काल के हरिवंशराय बच्चन भी जीवन को इसी पार (लौकिक सन्दर्भ में) देखते हैं।

7. "पद्मावत है और रहेगा"...। इसको बच्चन सिंह कुछ इस तरह से कहते हैं कि "फूल मरे पै मरे न बासु"...। और जायसी मृत्युंजय बन गए"..।

8. "जीवन के विरुद्ध मृत्यु और मृत्यु के विरुद्ध जीवन के संघर्ष का नाम "पद्मावत" है"..।

9. "विरह की आँच में पककर ही संयोग खरा होता है"..।

10. "पद्मावत के प्रति रतनसेन का प्रेम साधनात्मक और नागमती का रत्नसेन के प्रति ग्राहस्थिक है"..।


● पद्मावत की भाषा व लोक का प्रभाव :- 

बारहमासा में अवध जनपद की संस्कृति,  विभिन्न महीनों की विशेषता, हर महीने के उत्सव-त्योहार के बीच मूर्तिमान और विरह-वेदना प्रगाढ़ हो उठती है।

जायसी अपने शब्दों का चयन गॉव-छप्परों-झोंपड़ियों- उत्सवों- सामान्य स्त्री-पुरुषों के चारों ओर बिखरे हुए से लेते हैं। 

पद्मावत 7-7 चौपाई पर एक दोहा रखकर "कडवक शैली" में लिखी है।


• बच्चन सिंह के अनुसार "जायसी की अवधी "अवधी की अर्घान है"...।


●पद्मावत पर कहे गए कथन :-

1. हरदेव बाहरी के अनुसार  "पद्मावत पर प्राकृत की रत्नशेखर कथा का प्रभाव है"..।

2. विजयदेवनारायण साही के अनुसार "पद्मावत हिंदी में अपने ढंग की अकेली ट्रैजिक कृति है"...।

3. बच्चन सिंहके अनुसार "जायसी ने कथा को लोक से ग्रहण किया था। यह काव्य का अपना कमाल है कि काल्पनिक सत्य ऐतिहासिक सत्य हो गया"..।

4. शुक्ल के अनुसार "प्रेमगाथा की परंपरा में पद्मावत सबसे प्रौढ़ और सरस है'..।

5. शुक्ल के अनुसार " पद्मावत में प्रेमगाथा की परंपरा पूरी प्रौढता को प्राप्त मिलती है। यह उस समय जी सबसे अधिक प्रसिद्ध ग्रँथ है। इसमें कल्पना और इतिहास का प्रेम है"..।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

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