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Saturday, February 20, 2021

भक्तिकाल भाग 6

 

                         (सूफ़ीकाव्य)

जिस भक्तिआन्दोलन के निर्गुणमत की एक शाखा "सन्त काव्यधारा" मानी जाती है ठीक उसी तरह से उसकी दूसरी शाखा "सूफी काव्यान्दोलन" के नाम से जानी जाती है। इसमें ईश्वरीय प्रेमतत्व को प्रधानता दी गयी जहाँ पर भक्त अपने ईश्वर से प्रेम के आधार पर उसे प्राप्त करने की कोशिशें करता है। जिसके लिए वह तमाम तरह के पड़ावों को पार करता हुआ आगे बढ़ता है। जिसमें पशु-पक्षी, पर्वत-पहाड़, ईश्वर द्वारा परीक्षा पास करना और अंततः अपने प्रेमी-प्रेमिका से मिल जाना है। इस काव्यधारा में लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम की तरफ़ अग्रसर हुआ जाता और इन सूफी कवियों का मकसद ही प्रेम के माध्यम से ईश्वरीय तत्व को प्राप्त कर मोक्ष को पाना था। इन सूफीकवियो ने भारतीय लोककथाओं को अपनी कथा का आधार बनाया लेकिन साथ ही इस्लाम का प्रचार करना व फ़ारसी मसनवी शैली को अपनाना भी इनके ध्येय का एक भाग था।

"फ़ारसी मसनवी शैली" प्रेमाख्यान में नायक आत्महत्या कर लेता है और खलनायक नायिका से प्रेम कर लेता है जोकि भारतीय प्रेमाख्यान परम्परा का हिस्सा नहीं है। इसके अतिरिक्त नायक-नायिका का आपसी प्रेम पाने के लिए विभिन्न तरह की परीक्षाओं को पास करना, प्राकृतिक आपदाओं को पार करना, ईश्वरिय परीक्षा को पास करना आदि भारतीय प्रेमाख्यान परम्परा के तत्व हैं और अंततः नायक-नायिका का आपस में मिल जाना भी भारतीय परंपरा के अंग है। इन सब तथ्यों से सिद्ध होता है कि सूफ़ीकाव्य परम्परा ज्यादात्तर भारतीय तत्वों से घुला मिला है।  

फ़ारसी मसनवी शैली केवल गुरु की महत्ता, ईश्वर की स्तुति, शाहेक्त की प्रशंसा, आत्म परिचय आदि का वर्णन करना जैसी क्रियाओं का द्योतक है।

फ़ारसी शैली के प्रेमाख्यान दुखांत होते हैं जबकि भारतीय परंपरा के प्रेमाख्यान सुखांत। 

इस भक्ति आंदोलन के अन्य नाम प्रेममार्गी शाखा, प्रेमाश्रयी शाखा, प्रेमाख्यान काव्यपरंपरा, रोमांसिक काव्यधारा आदि हैं।


● सूफी शब्द का अर्थ व परिभाषा:-   

1. सुफ़्फ़ा :- मुस्लिमों के तीर्थ स्थान "मदीना" के सामने बने "चबूतरे" को सुफ़्फ़ा कहा जाता था और उस पर बैठने वाले फकीरों को सूफी कहा जाता था।

2.  सफा :- इसका अर्थ होता है "शुद्ध या पवित्र"..। अर्थात जो लोग पवित्र और अच्छे उपदेश देते थे वह सूफी कहलाए।

3. सोफिया:- इसका अर्थ होता है "ज्ञानी-विद्वान पुरुष"..।अर्थात इस्लाम में जो महात्मा लोग ज्ञान की बातें करते हों वह सूफी हैं।

4.  सूफ:- इसका अर्थ होता है "ऊन"..। जो लोग सफेद ऊन का चोगा पहनकर, जिनका आचरण अच्छा होता था ज्ञान की बातें करते थे, जो पवित्र होते थे उन्हें "सूफी" कहा जाता था। ज़्यादातर यही मत स्वीकार्य है।

5.  बच्चन जी का मत है  कि "सादा जीवन जीने वाले सूफी ऊनी चोगा पहना करते थे और वैभवशाली जीवन के विरोधी थे"।

● सूफी मत का स्त्रोत :- सूफीमत इस्लाम धर्म का अंग है जिसमें इस्लाम की कट्टरता का विरोध है और कोमलता व मधुरता के विकास का रूप है। इन सूफियों का प्रेम इश्क मजाजी (लौकिक प्रेम) से इश्क हकीकी (अलौकिक प्रेम) तक पहुचता है। 

सूफियों का आदि मत "शामी जातियों" की आदम प्रवृतियों में मिलता है, जहाँ शामियों में मूर्ति-चुम्बन की परिपाटी सूफियों में "बोस" और "वस्ल" में मिलती है।

● भारत में सूफी मत का प्रचार :- भारत में सूफी मत का प्रचार 9-10वी शती के आसपास से शुरू हो जाता है जिसका प्रमाण शुक्ल जी अपने इतिहास में नाथों के संदर्भ में भी करते हैं। किंतु भारत में पूरी तरह से सूफीमत को फैलाने का श्रेय "ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती" को जाता है। 

आईने अकबरी में सूफीमत के 15 सम्प्रदाय बताये है परंतु प्रसिद्ध 5 ही है जो निम्नांकित हैं :-

1. कादरी- "अब्दुल कादरी" इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे और इस सम्प्रदाय की प्रसिद्धि देख कर सिकन्दर लोदी ने अपनी पुत्री की शादी इनके साथ कर दी थी।

2. चिश्ती -      ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती।

3. सुहरावर्दी-  बहरिया जकरिया

4. नक्शबंदी-  अहमद फारुखी 17वी शती

5. शतारी 

● सूफी मान्यतायें :- "मानव" सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, उसमें जड़ अंश (नफस) भी है और (रूह) आध्यत्मिक अंश भी। इसी जड़ अंश को ख़त्म करना मानव का लोकधर्म है तभी (रूह) ईश्वर से मिलने के लायक हो पाएगी। यह वृति मानव में सुप्तावस्था में होती जिसे जगाना मानव का धर्म है। इसे गुरु या पीर की सहायता से जगाया जा सकता है।

"फना" मानवीय गुणों का नाश होना और "बका" ईश्वरीय गुणों को समाहित करना सूफी काव्य की एक प्रक्रिया है।। जिससे मानव को शैतान के शिकंजे से छुड़ाया जाता है।

सूफी काव्य में ईश्वर को पत्नी और साधक को पति के रूप में देखा जाता है जोकि सन्तकाव्यधारा से विपरीत है।


● ईश्वर आराधना व उसके पड़ाव में भक्त की दशा :-

पहला पड़ाव - शरीयत (कर्मकांड)  - नासुत

दूसरा पड़ाव - तरीकत (उपासना) - मलकत

तीसरा पड़ाव - मारिफ़त (आरिफ़) - जबरुत

चौथा पड़ाव - हकीकत (परमतत्व) - लाहूत...

अंततः "हाल" की दशा में भक्त पहुँच कर ईश्वर से मिल पाता है (मोक्ष की प्राप्ति)...।


● सूफ़ीकाव्य पर शुक्ल जी का मत:- 

1. "प्रेममार्गी सुफिकवियो की प्रेमगाथा वास्तव ने साहित्य कोटि के भीतर आती है। इस शाखा के सभी कवियों ने कल्पित कहानियों के द्वारा प्रेममार्ग का महत्व दिखाया। इन साधको ने लौकिक प्रेम के द्वारा अलौकिक प्रेम को प्राप्त करने की कोशिश की है। इनकी कथाओं का विषयवस्तु साधारण होता है और जैसे किसी राजकुमार का किसी राजकुमारी के प्रेम में पागल हो जाना और घर बार सब छोड़ कर उसे ढूंढने निकल जाना, यही "प्रेम की पीर" है"..।

2. "हमारा अनुमान है कि सूफीकवियो ने जो कहानियां ली हैं वे सब हिंदुओं के घरों में कई दिनों से चली आ रही थी। जिसमें कुछ हेरफेर करके इन सूफी कवियों ने अपनी रचनाओं को पेश कर दिया है। इनकी कहानियों का मार्मिक आधार भारतीय प्रेमाख्यान ही है। जिसमें मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षी, नदी-झील आदि भी शामिल हो जाते हैं"..।

3. "सूफियों ने प्रेमसम्बन्धो में खंडन-मंडन की बुद्धि को किनारे रखकर मनुष्य के हृदय को स्पर्श करने का ही प्रयत्न किया है। जिससे उनका प्रभाव हिंदुओं और मुसलमान पर समान भाव से मिलता है। बीच-बीच में रहस्यवाद परोक्ष की ओर जो मधुर संकेत मिलते हैं वे बड़े ही ह्र्दयग्राही हैं और इनका रहस्यवाद मार्मिक व स्वाभाविक था"..।

4. "अपना भावनात्मक रहस्यवाद लेकर सूफी जब भारत में आए तब उन्हें यहाँ केवल साधनात्मक रहस्यवाद योगियों और तांत्रिको में मिला"..।

                                                         

● बच्चन सिंह का मत सूफ़ीकाव्य पर:-

1. "सूफियों का प्रमुख क्षेत्र हिंदी भाषा-भाषी था"..।

2. "हिंदी सूफ़ीकाव्य की मूलभूत विशेषता यह है कि वे पूर्णतः भारतीय है। उन्हें यहाँ की धरती, ऋतुओं, पहाड़ो, आदि से प्रेम था".....।

3. "सूफ़ीकाव्य तो दखिनी हिंदी में भी लिखा गया पर उनके स्त्रोत विदेशी हैं (ईरानी)"...।

4. "सूफ़ीकाव्य की शैली तो मसनवी है पर भाषा, छंद, विधान, रूढ़ियाँ सब भारतीय हैं'...।

5.  "सामन्तवाद के विरुद्ध दूसरा आंदोलन सूफियों का ही था"...।

6. "11वी शती के फ़ारसी काव्य में रहस्यवाद का प्रवेश होता है। इसी समय से सूफी काव्य की रचना होने लगी थी। इनका रहस्यवाद एक प्रगतिशील तत्व था ,जो ईश्वर के सामने सबको बराबर समझता था। भारत में आने से पहले ही सूफीसंत भारतीय वेदांत और बौद्धधर्म से परिचित हो चुके थे। इसलिए इनका प्रभाव इनकी रचनाओं पर स्वतः दिखता है और यह जनता के हृदय में बस पाए"..।

7 "सूफियों ने सन्तो की तरह न तो कितेब को स्वीकार किया और न ही इस्लाम की कट्टरता को। इन्होंने आपसी भाईचारे की शिक्षा दी, सामंती शोषण के विरुद्ध थे, एकता पर बल देना जैसी बातों पर इनका मत टिका हुआ था इसलिए आये रोज़ इनकी इस्लाम के कट्टर मौलवियों से विवाद होता रहता था। "शेख अलाई" जैसे क्रांतिकारी सूफी को इस्लामशाह ने कत्ल कर दिया था। दाराशिकोह की भी यही गति हुई थी। उसी शोषण वृति के विरुद्ध सूफ़ीकाव्य आंदोलन खड़ा हुआ था"..।

8 "हिंदी का सूफ़ीकाव्य पारसी सूफ़ीकाव्य तथा इस्लाम से प्रेरणा लेकर भी भारतीय था"...।

9 "कोरी दृष्टि से देखने पर कोई इसे इस्लाम का प्रचारक कहता है तो कोई इसे अभारतीय"...।

10 "शुरू-शुरू में सूफी इस्लाम के प्रचारक अवश्य थे किंतु उसके साथ ही मुल्लावाद के विरोधी भी"..।

11 "ईश्वर स्तुति, शाहेक्त की प्रशंसा, गुरु वंदना, आत्म परिचय एक ही छंद में प्रयोग आदि मसनवी शैली मानी जाती है। मूल कथा कई खण्डों में विभक्त होती है"..।

12 "हिंदी सूफियों की ज़मीन भारतीय है जबकि दखिनी हिंदी में लिखे सूफ़ीकाव्य की जमीम ईरानी है"..। 

13 "हिंदी सूफियो की कथाएँ यहां लोकप्रचलित कहानियो पर आधारित है और  दक्षिणी हिंदी के कवियों के कथानक ईरानी काव्य में प्रयुक्त लोक कथाएं है। उनका रंग इस्लामी और ढंग ईरानी है"..।

14 " हिंदी सूफियों ने अपने जनपद की रीति-नीति, मौसम, छंद, आदि को इस ढंग से अपनाया है कि उनके काव्य पूर्णतः भारतीय बन गए हैं।इन कवियों में सर्वश्रेष्ठ कवि जायसी हैं"..।

15 "सूफियों के मतानुसार मुहम्मद साहब को ईश्वर से दो प्रकार की वाणियो प्राप्त हुई थी "इल्म-ए-सकीना"..।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

Friday, February 12, 2021

भक्तिकाल भाग : 5


संत काव्यधारा :-


● संतकाव्य धारा से जुड़े अन्य भक्तकवि :-

1. रैदास :- सन्त रैदास का जन्म 1388 ई. काशी में हुआ था। यह भक्ति आंदोलन के प्रमुख दार्शनिक, विचारक व कबीर के गुरु रामानंद की शिष्य परम्परा में से एक थे। रैदास प्रसिद्ध कृष्ण भक्त मीरा के गुरु माने जाते हैं। सिख धर्म के  "आदिग्रन्थ " में इनके 40 पदों का संकलन मिलता है।

जहाँ तक इनकी जाति के बारे में कहा जाता है तो ये जाति से  "चमार" थे और इनके पूर्वज भी मुर्दा पशुओं को ढोते थे जिसके आज भी कुछ साक्ष्य मिलते हैं। इनकी जाति की पुष्टि के लिए निम्न पंक्तियों को पेश किया जा सकता है:-

"जात भी ओछी,करम भी ओछा,ओछा करम हमारा

नीचे से फिर ऊंचा कीन्हा,कह रैदास खलास चमारा।


"जाके कुटुंब सब ढोर ढोंवत, 

फिरन्हि अजहुँ बानारासी आसपासा...।


• "बच्चन सिंह" के अनुसार "कबीर की विचारधारा के केंद्र में हिन्दू- मुसलमान का शोषित- पीड़ित वर्ग था, तो रैदास के विचार- केंद्र में चमारों और सवर्णो- हिंदुओ का भेदभाव"....।

 

2. नानक :- सिख धर्म के संस्थापक  "गुरु नानक" जी का जन्म 1469 पंजाब के तलवंडी ग्राम में हुआ था। ये जाति से बनिए थे। इनके जन्मस्थान को "ननकाना साहब" भी कहा जाता है जोकि अब पाकिस्तान में है। इनके पिता का नाम "कालू मेहता" जो शकरपुर में कारिंदा थे और इनकी माता का नाम "तृप्ता" था। इनकी पत्नी का नाम "सुलक्षणी" था और इनके दो बेटे श्रीचंद और लक्ष्मीचंद थे।  

"श्रीचंद"  का सम्प्रदाय ही आगे चलकर "उदासी सम्प्रदाय" बहुत प्रसिद्ध हुआ जोकि वैरागी मत को मानने पर बल देता है। 

नानक साहब व्यक्त्वि से शांत-स्वभाव के थे और हिंदू-मुस्लिम भेदभाव पर, आडम्बरो और वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते रहते थे।

इनकी रचनाओं में "शांत रस" अधिक देखा जाता है।

• "बच्चन सिंह" के अनुसार ये खत्री वंश में पैदा हुए थे। खत्री शब्द क्षत्रिय का अपभ्रंश है। बणियो का पेशा अपना लेने के कारण खत्री भी बनिये हो गए।             

"बच्चन सिंह" के अनुसार नानक साहब का भक्ति की तरफ आकर्षित होने के पीछे एक घटना है जिसे जानना आवश्यक है:-"एक बार वह किसी मोदीखाने में काम करते हुए भक्ति में इतने लीन हो गए थे कि उन्होंने मुफ्त में ही किसी व्यक्ति को समान दे दिया। जिसके कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और उनके लिए यह भक्ति के लिए यह सुनहरा अवसर साबित हुआ"...।                           

आदिग्रन्थ के अंतर्गत "महला" नामक प्रकरण से इनकी बानियों का संकलन है।


3.  गुरुअंगद :- यह सिख धर्म के द्वितीय गुरु हैं। इनका जन्म 1504 ई.में हुआ था। आदिग्रन्थ में इनके पद संकलित है।

4. धर्मदास :- इनका जन्म 1518 ई. राजस्थान के बाधवगढ़ में हुआ था। ये कबीरपंथ से जुड़े हुए थे और कबीर की राजस्थानी शाखा की गद्दी पर 20 साल तक विराजमान थे। जाति से यह भी बनिये थे और बाल्यावस्था से भक्ति के बीज इनके हृदय में अंकुरित हो गए थे। कबीर से दीक्षा लेकर यह निर्गुणमत की तरफ अग्रसर हए थे।

5. दादू :- इनका जन्म 1544 ई. गुजरात अहमदाबाद में हुआ था। इनकी जाति के बारे में एकमत्ता नहीं है।  कोई इन्हें "गुजराती ब्राहाम्ण" मानता है तो कोई "धुनिया, कोई मोची"..। 

कुछ विद्वानों ने माना है कि ये साबरमती नदी के पास बाल्यावस्था में पड़े हुए मिले थे जिसे एक ब्राह्मण ने पाला-पोसा। ये "दादू पंथ के प्रवर्तक" थे और राजस्थान में इनके नाम से शाखा भी प्रचलित है जिसे "परब्रह्म सम्प्रदाय" या कबीर-पंथ की "राजस्थानी शाखा" भी कहा जाता है। यह सन्त काव्यधारा के रहस्यवादी सन्त मान्य जाते हैं।

• चन्द्रिकाप्रसाद त्रिपाठी  और क्षितिजमोहन सेन के अनुसार दादू मुसलमान थे और इनका नाम "दाऊद" था। इनकी दयालुता के कारण भी "दादूदयाल" कहा जाता था।

ये कबीर के पुत्र "कमाल" के शिष्य के साथ कबीरपंथ के अनुयायी भी थे। इनकी प्रसिद्ध रचना "हरड़ेवाणी" है जिसे पहले उनके दो शिष्य "सन्तदास" और "जगन्नाथ दास" ने सम्पादन किया था जिसका पुनः सम्पादन "रज्जब" ने किया।

6. गुरु अर्जुनदेव :- इनका जन्म 1563 में हुआ था और ये सिख धर्म के पांचवें गुरु थे। इन्होंने "आदिग्रन्थ" का सम्पादन किया था और आदिग्रन्थ की प्रस्तुति का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। जिसमें इनके भी 6000 पद शामिल हैं। जीवन के अंतिम दिनों में जहाँगीर ने इन्हें कैद कर लिया था और तरह-तरह की अमानुषिक यातनाएं दी।

7. रज्जब :- इनका जन्म 1567 ई. में हुआ था और ये राजस्थान के रहने वाले थे। ये दादू के शिष्य थे और इनकी दो टूक कहने वाली शैली कबीर की याद दिलाती है।        

"हजारीप्रसाद" जी इनके बारे में एक प्रसंग उल्लेख करते हैं:-"रज्ज्बदास निश्चय ही दादू के शिष्यों में से सबसे अधिक कवित्व लेकर उतपन्न हुए थे और उनकी कविताएं भावापन्न सहज थी, साथ ही इस्लामी प्रभाव के शब्द भी हैं"....। 

8. मलूकदास :- इनका जन्म 1574 ई.में इलाहाबाद के कड़ा ग्राम में हुआ था। इनके बारे में कई तरह के चमत्कार माने जाते हैं जैसे डूबते हुए जहाज को बचा लेना और रुपयों को गंगा के माध्यम से इलाहाबाद भेज दिया था।

9. सुन्दरदास :- इनका जन्म 1596 ई. राजस्थान के धोसा में हुआ था और ये जाति से बनिये थे। ये सन्त काव्यधारा में सबसे ज्यादा साक्षर, गौरवर्ण, सुंदर और बालब्रह्मचारी थे। ये श्रृंगार रस के परम विरोधी थे इसी से सम्बंधित उन्होंने केशव की "रसिकप्रिया" और नंददास की "रसमंजरी" की निंदा की थी। जिसकी पंक्ति प्रसिद्ध है:-

"रसिकप्रिया रसमंजरी और सिंगारहि जान

चतुराई करि बहुविधि विषय बनाई आन"...।


ये दादू के शिष्य थे जिनसे इन्होंने 6 से लेकर 10 वर्ष तक दीक्षा ली और फिर उनकी मृत्योपरांत काशी में "जगजीवनदास" से 30 वर्ष तक अध्ययन किया। ये एकलौता ऐसे सन्त थे जिन्होंने "लोकधर्म की उपेक्षा" नहीं की। इनकी प्रसिद्ध रचना "सुन्दरविलाप" है जोकि एक तरह का रामकाव्य है।

व्यर्थ की तुकबन्दी और उटपटांग भाषा इन्हें अरुचिकर थी जिससे जुड़ी ये पंक्ति देख सकते हैं:-

"बोलिए तब जब बोलिए होए

ना तो मुख मौन गहिये चुप होए रहिये"...।


10. गुरु गोविंदसिंह :-  ये सिख धर्म के 10वे गुरु थे जिनके शौर्य की गाथा सर्वव्यापक है। ये लगातार मुगलो (औरंगजेब) के शोषण-वृति के विरुद्ध लड़ते रहते थे जिसके बदले इन्होंने अपने 4 बेटों की कुर्बानी देने में बिल्कुल भी झिझक नहीं समझी। इन घटनाओं के बाद इन्होंने अपने सैनिक शिविर के रूप में "खालसा पंथ" की स्थापना की जिसमें सबसे पहले दीक्षित होने वाले 5 व्यक्तियों को  "पंच-पियारे" के नाम से जाना गया। जिन्हें गोविंद सिंह जी ने अपनी संतान के रूप में स्वीकारा।

अपने बाद इन्होंने सिख धर्म से गुरु परम्परा को खत्म करके "आदिग्रन्थ" को ही सिख धर्म के लिए हमेशा के लिए गुरु की उपाधि दे दी। ये वीर , श्रृंगार और हास्य रस की कविता लिखते थे।


11. अक्षर अनन्य :-  इनका जन्म मध्यप्रदेश में हुआ था वहाँ पर पृथ्वीचंद के दीवान थे। ये ज्ञानाश्रयी शाखा के "आध्यात्मिक कवि" के साथ छत्रसाल के गुरु भी थे। इन्होंने दुर्गा सप्तशती का हिंदी अनुवाद भी किया है।


● अन्य जानकारी :- 

1. सन्तमत में "सहजोबाई और बावरी साहिबा" महिला सन्त साधिका थी।

2. विश्नोई सम्प्रदाय जम्भनाथ का है।

3. निरंजनी, साध, दादू, जसनामी, लालदासी आदि कबीरपंथ की ही शाखाएं हैं।

4. जगजीवनदास का "सत्यनामी" सम्प्रदाय है।


गुरु           शिष्य

दादू          रज्जब

रैदास       मीरा

दादू         सुंदरदास

कमाल     दादू


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

Thursday, February 11, 2021

भक्तिकाल भाग : 4

                 

                            (कबीर)


कबीरदास निर्गुणमत के प्रथम संतकवि कहलाते हैं और इन्हें ही हिंदी में रामानंद के बाद भक्ति आन्दोलन के प्रचार का बड़ा दार्शनिक माना जाता है। इनका व्यक्तित्व निर्भीक रूप , फक्कड़पन, दो टुकपन, पवित्र मन से लबरेज़ था। इनका जन्म 1398 ई. काशी में हुआ था। 

इनके जन्म के सम्बंध में कई अफवाएँ और विवाद भी है। कोई इन्हें हिन्दू मानता है तो कोई इन्हें मुस्लिम, कोई कहता है कि ये एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे और लोकलाज के डर से लहरतारा नामक तालाब में छोड़ दिया था, जो नीरू और नीलिमा नामक एक मुस्लिम दम्पत्ति को प्राप्त हुए और उन्होंने ही कबीरदास का पालन पोषण किया। कोई इन्हें जाति से जुलाहा, बुनकर कहता है तो कोई फकीर कहता था जो गोरखनाथ या भरथरी के नाम पर मांग कर अपना गुजारा करते थे।

वहीं एक तरफ "पुरुषोत्तम अग्रवाल" अपनी पुस्तक "अकथ कहानी प्रेम की" का हवाला देते हुए मानते हैं कि "कबीर ब्राह्मणी के गर्भ से नहीं जन्मे,अपितु वे जन्म से ही जुलाहा थे, निमन्जाति के"...।

इनकी मृत्यु को लेकर भी विवाद रहे हैं। हिन्दू इन्हें जलाना चाहते थे तो मुस्लिम इन्हें दफनाना। इसी संदर्भ में एक अफवाह ये भी है कि इनका शव अंतर्धान होकर एक फूल का रूप ले लेता है जिसे आधा हिन्दू लेकर जला देते हैं और आधा मुस्लिम लेकर दफना देते हैं। कबीर के साथ हुई इस ज्यात्ति पर बच्चन सिंह कहते हैं कि " मज़हबी झगड़ा मुर्दे को लेकर ही होता है"...। 

शुक्लानुसार "कबीर ने चलती बोली में अपनी बात कहीं पर वह बोली बेठिकाने की थी"..।                       

• इनके जन्म के साथ ही इनके "दार्शनिक गुरु" के मत में भी एकमत्ता नहीं है। मुसलमानों के अनुसार इनके गुरु सूफी फ़कीर "शेख तकी" थे जो सिकन्दर के भी पीर गुरु थे। ऐसा भी माना जाता है कि एक बार पंचगंगा घाट से रामानन्द जी रात्रि में आ रहे थे तो अचानक इनका पैर कबीर पर पड़ गया और उनके मुँह से "राम" शब्द निकल गया था। तभी से कबीर के लिए यही गुरुमंत्र हो गया और उन्होंने रामानन्द को अपना गुरु स्वीकार लिया।  

रामानन्द के राम विशिष्ट ईश्वर का रूप हैं तो कबीर के राम सामान्य मानव-रूपी बहुरिया, पिता, भरतार, माँ, ज़िद्दी बालक हैं।

• कबीर अपने पुत्र "कमाल" से संतुष्ट नही थे। उनका व्यवहार पसंद नहीं आता था जिसके कारण लोक में प्रचलित ये पंक्ति सर्वविदित है:-

"बुडा वंश कबीर का,उपजा पूत कमाल"...।


● कबीर की मृत्यु के बाद 2 सम्प्रदाय प्रचलित थे :-

धर्मदासी शाखा - छतीसगढ़ में कबीर की गद्दी।

सुरतगोपाली शाखा - काशी की शाखा।

राजस्थानी शाखा - दादूदयाल की राजस्थानी गद्दी।


● कबीरदास पर कहे गए कथन :-

1. बच्चन सिंह के अनुसार " हिंदी भक्तिकाव्य का प्रथम क्रांतिकारी पृरस्कर्ता कबीर है".।  

2. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "विलक्षण है कि कबीर में जैसा बोलियों का सम्मिश्रण है वैसा ही मनोदशाओ का भी"..।

3. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "कबीर बड़े कवि तब बनते हैं जब वे अपने अंतर्जगत का वैविध्य संधान करते हैं और उसी से जीवन की विरासत सिरजते हैं"...। अधिक मर्मस्थलों की पहचान कबीर में नही दिखाई देती"...।

4. बच्चन सिंह के अनुसार "नाना विरोधों को समेटकर वे ऐसा मार्ग निकाल रहे थे जिस पर चलकर हिन्दू जाति को सुरक्षा का अनुभव कर सके"...। 

5. बच्चन सिंह के अनुसार "कालक्रम के अनुसार से निर्गुण काव्यधारा से ही भक्तिकाल का प्रारंभ होता है।इसके प्रवर्तक कबीर ही हैं"...। 

6. बच्चन सिंह के अनुसार "वे एक ऐसे धर्म की स्थापना करना चाहते थे जिसमें न कोई हिंदू हो और न कोई मुस्लिम, न कोई मौलवी न कोई पुरोहित, न कोई शेख न ब्राह्मण सब मनुष्य हो। यह क्रांतिकारी कदम था नाकि सुधारवाद"...।

7. शुक्लानुसार "प्रतिभा उनमें प्रखर थी इसमें कोई संदेह नहीं"...।

8. शुक्लानुसार "कबीर ने जिस प्रकार एक निराकार ईश्वर के लिए भारतीय वेदांत का पल्ला पकड़ा ,उसी तरह उस निराकार ईश्वर की भक्ति के लिए सूफियो का प्रेमतत्व लिया और अपना निर्गुणपंथ धूमधाम से निकाला"...।

9. शुक्लानुसार "इसमे कोई संदेह नही की कबीर ने ठीक मौके पर जनता के उस बड़े भाग को संभाला जो नाथपंथियो के प्रभाव से प्रेमभाव और भक्तिरस से शून्य और शुष्क पड़ता जा रहा था। उनके द्वारा यह बहुत ही आवश्यक कार्य हुआ"...। निम्न श्रेणी की जनता में आत्मगौरव का भाव जगाया...और उनका निर्गुणपंथ चल निकला जिसमें आगे चलकर दादू , मलूकदास आदि जुड़ गए"...।

10. शुक्लानुसार "कबीर तथा अन्य निर्गुणपंथी संतो के द्वारा अंतस्साधना में रागात्मिक भक्ति और ज्ञान का योग तो हुआ पर कर्म दशा वही रही जो नाथपंथियो के यहाँ थी। इन संतो के ईश्वर ज्ञानस्वरूप और प्रेमस्वरूप ही रहे ,धर्मस्वरूप न हो पाए"...।

11. शुक्लानुसार "भक्ति की निष्पत्ति श्रद्धा व प्रेम से होती है जोकि कबीर में नहीं दिखती। इसी संदर्भ में शुक्ल जी कहते हैं "कबीर का ज्ञानपक्ष तो रहस्य व गुह्य की भावना से विकृत मिलेगा पर सूफियो से जो प्रेमतत्व उन्होंने लिया वह सूफियो के यहाँ चाहे कामवासना से ग्रसित हो परन्तु निर्गुनपन्थ में आवृत मिलेगा जो प्रशंसा की बात है"...।

12. शुक्लानुसार "तात्विक दृष्टि से न तो हम इन्हें पूरे अद्वेतवादी कह सकते हैं न एकेश्वरवादी"...।

13. शुक्लानुसार "कबीरदास ने अपनी झाड़-फटकार के द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों के कट्टरपन को दूर करने का प्रयास किया वह अधिकतर चिढ़ानेवाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नहीं'...।


●कबीर पर लिखी पुस्तकें :-

बीजक : यह "धर्मदास" द्वारा लिखी गयी पुस्तक जिसमें कबीर के दोहों आदि का संकलन है। इसे तीन भागों में बाँटा गया है। 

रमैनी-  (रामायण)    चौपाई दोहा- ब्रजभाषा में

सबद-  (शब्द)          गेयपद- ब्रजभाषा में

साखी- (साक्षी)        दोहे- सधुक्कड़ी भाषा में


कबीर ग्रंथावली    श्यामसुंदर दास 

कबीर                 हजारीप्रसाद 


● कबीर की भाषा पर कहे गए कथन :-

सधुक्कड़ी भाषा -   शुक्ल

पंचमेल की खिचड़ी- श्यामसुंदर दास (कई भाषाओं का मिश्रण)

वाणी के डिक्टेटर-    हजारीप्रसाद (लोक के शब्दों पर पकड़ होने के कारण कहा)


● अन्य जानकारी :-

1. कबीर की बानियों का सबसे पहला पता "गुरुग्रन्थ साहिब" में मिलता है।

2. कबीर के समय लोदियों का जमाना था।

3. कबीर पर नामदेव का प्रभाव है।

4. कबीर शब्द अरबी का है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

Friday, February 5, 2021

भक्तिकाल भाग : 3

                                                     

                         (भक्तिकाल)


भक्तिकालीन साहित्य पर चल रही तथ्यात्मक जानकारी में यह क्रम जारी है। जिसके अंतर्गत आज कुछ अन्य जानकारी देने की कोशिश की जा रही है। आशा करते हैं कि आपके लिए यह जानकारी लाभदायक सिद्ध होगी।

 भक्तिकाल में लिखे साहित्य पर आज जिस विषय की हम चर्चा कर रहे हैं वह निर्गुण काव्यधारा व उसकी एक शाखा "सन्त काव्यधारा" का परिचय भर है। जिसकी विस्तृत चर्चा हम आगे आने वाले अपने अन्य लेखों में करेंगे। फिलहाल निर्गुण काव्यधारा व सन्त काव्यधारा का एक सामान्य परिचय देकर यहाँ इस विषय का श्रीगणेश किया जा रहा है। लेकिन इस भक्ति परम्परा का किस प्रकार से उत्तर भारत में आना सम्भव हुआ और हिंदी के प्रथम भक्तिकालीन कवि "नामदेव" जिन्हें निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म दोनों ही मान्यताओं का प्रवर्तक माना जाता है। उनके बारे में भी इन लेख में विशेष जानकारी दी जाएगी। कृपया करके आप इस जानकारी को अपने व अपने साथियों तक भी पहुँचाये और हमारे लक्ष्य को बढ़ावा देने में हमारा सहयोग करें।


● भक्तिकाल को दी गयी संज्ञा :-

ग्रियर्सन         -   स्वर्णकाल 

हजारीप्रसाद   -   लोक जागरण 

रामविलास शर्मा -  लोक जागरण काल


● जिस भक्तिआन्दोलन की शुरुआत दक्षिण से हुई थी उसे अब अपने विकास क्रम को बढ़ाने का अवसर धीरे-धीरे मिल रहा था। इसी क्रम में सबसे पहले दक्षिण से वो मध्य-देश की तरफ़ आगे बढ़ी जहाँ "महाराष्ट्र" के "वारकरी सम्प्रदाय" ने भक्ति के प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया। वारकरी सम्प्रदाय के शुरुआती भक्तों में सबसे पहले "नामदेव" का नाम लिया जाता है। जहाँ से होती हुई रामानंद द्वारा भक्ति-परम्परा को उत्तर भारत में लाया गया और कबीर ने भक्तिआन्दोलन को चर्मोत्कर्ष पर पहुँचाया। आगे चलकर भक्त कवियों द्वारा वह पूरे भारत में व्यापक स्तर पर फैली। जिसकी पुष्टि इस पंक्ति से देखी जा सकती है:-

"भक्ति द्राविड़ उपजी लाए रामानन्द

प्रकट किया कबीर ने चहुमुखी खंड"..।

• शुक्लानुसार उत्तर भारत में भक्ति को प्रसारित करने में नामदेव का नाम उल्लेखनीय है। 

● नामदेव:- हिंदी साहित्य में दक्षिण से शुरू हुई भक्तिआन्दोलन की परम्परा महाराष्ट्र में नामदेव द्वारा चलाई गई। इनका जन्म 1267 ई. के आसपास है। ये जाति से दर्जी थे बाद में विष्णु भगवान के भजन करते हुए अपने दिन बिताने लगे। इनकी रचनाएँ हिंदू-मुसलमान दोनों के लिए सामान्य भाव से दिखती है। अर्थात इन पर सगुण और निर्गुण दोनों मतों का बराबर प्रभाव है।

नामदेव के समय "ज्ञानदेव" नामक भक्तकवि हुए जो खुद को गोरखनाथ की परंपरा का बताते थे। इन्होंने ने ही नामदेव को निर्गुणमत का दर्शन दिया और ईश्वर के सर्वव्यापक होने का परिचय कराया। साथ ही मोह-माया के बंधन से निकालने में मदद की। ज्ञानदेव इन्हें निर्गुणमत के अनुसार परिपक्व नहीं मानते थे। एक बार नामदेव की परीक्षा के लिए ज्ञानदेव की बहन "मुक्ताबाई" द्वारा एक संत मण्डली बुलाई गई। सभी संत एक पंगत में बैठ गए और एक कुम्हार द्वारा बारी-बारी से सभी के सिर पर हथौड़े से प्रहार किया गया। जिसमें नामदेव कमजोर पाए गए....।

नामदेव को ज्ञानदेव द्वारा निर्गुणमत की तरफ प्रवृत करने के तरह-तरह से प्रयत्न किए गये।       

नामदेव को बराबर "ज्ञानदेव" कहा करते थे कि "बिनु गुरु होई न ज्ञान"...। इसी पंक्ति से सम्बन्धी एक घटना द्रष्टव्य है:- "एक बार स्वयं विठोवा (ईश्वर) एक फकीर का वेश धरकर आये थे परंतु नामदेव उन्हें पहचान नहीं पाए थे। बाद में पता चलने पर उन्हें पछतावा हुआ। तब कहीँ जाकर उन्होंने नागनाथ नामक शिव के स्थान पर जाकर "खेचरनाथ" से दीक्षा ली। इस सम्बंध में प्रस्तुत पंक्ति है:-

"मन मेरी सुई,तन तेरा धागा

खेचर जी के चरण पर नामा सिंपी लागा"...।


नामदेव की भक्ति के अनेक चमत्कार देखे गए हैं:- जैसे विठोबा की मूर्ति को दूध पिलाना, शिव मंदिर का इनकी तरफ घूम जाना आदि। इनके महामात्य ने यह सिद्ध कर दिया कि:-

"जाति-पांति पूछे नहीं कोई

हरि को भजे सो हरि का होई".।


• इनके हिंदी पद सगुण-निर्गुण दोनों तरह के मत के हैं। जिसमें सगुणमत के पद ब्रज या परिनिष्ठित काव्यभाषा में और निर्गुणमत क सधुक्कड़ी भाषा में।

इसके बाद यह भक्तिआन्दोलन मुख्य रूप से निर्गुणमत और सगुणमत में व्यापक स्तर पर फैलने लगता है जिसकी चर्चा आगे होगी।


● उत्तर भारत में यानी हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रों में भक्तिआन्दोलन की शुरुआत, जिसे रामानन्द लेकर आये थे वह सबसे पहले कबीरदास के निर्गुणमत से शुरू हुई। जिसकी पुष्टि सभी विद्वानों सहित आचार्य शुक्ल भी मानते हैं कि "निर्गुणमार्ग के निर्दिष्ट प्रवर्तक कबीरदास ही थे"....(पृ67).। 

इस निर्गुणमत के सम्बंध में दो मार्गो का बाहर आना दिखता है। एक ज्ञानमार्गी और दूसरा प्रेममार्गी। दोनों मतों के अपने अलग-अलग सिद्धान्त और दर्शन है। इसी तरह से सगुणमत में भी राम-कृष्ण भक्त रहे हैं। 

भक्तिआन्दोलन के इन चार दर्शनों को बारी-बारी समझने की हमें आवश्यकता है जिसमें सबसे पहले निर्गुणमत का ज्ञानमार्गी मत आता है। तो आइए जानते हैं निर्गुणमत और ज्ञान मार्गी शाखा क्या थी और कैसे इसने समाज में एक नई दिशा दी।


                       (निर्गुण काव्यधारा)

● निर्गुणमत :- "निर्गुण" शब्द का सबसे पहले उल्लेख उपनिषद में मिलता है। "श्वेताश्वर उपनिषद" के अनुसार यह विशिष्ट देवता के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है जो सर्वभूत, सर्वव्यापी है। अर्थात जहाँ ईश्वर के सभी जगह होने के सम्बन्ध में मान्यता हो और उसे सभी गुणों से ऊपर माना जाता हो। जिसका ईश्वर किसी मूर्तिरूप आदि में न होकर के सभी जगह है। इसी संदर्भ में "बच्चन सिंह" का मत हैं :-

"कहना न होगा कि निर्गुणमत धारा का अजस्त्र प्रवाह हिन्दू देश में ही देखा गया....।इतिहास में पहली बार इस वर्ग ने (हिन्दू व मुस्लिम दोनों ) अपनी आत्माभिव्यक्ति के लिए गीत गाये"....।  

• "मुक्तिबोध" के अनुसार "निर्गुण भक्तिमार्ग जातिवादी विरोधी आंदोलन सफल नहीं हो सका। उसका मूल कारण यह है कि भारत में उस समय पुरानी समाज रचना को समाप्त करने वाली पूंजीवादी क्रांतिकारी शक्तियाँ विकसित नहीं हुई थी"....। 

• "शुक्लानुसार" सन्तमत की रचनाएँ साहितियक नहीं है केवल फुटक्ल दोहे हैं। जिनकी भाषा और शैली अव्यवस्थित और उटपटांग है। कबीर आदि को छोड़कर बाकी सभी संतो ने ज्ञानमार्ग की सुनी-सुनाई बातें का ही पिष्टपेषण किया है तथा हठयोग की बातों का भद्दा तुक मिला दिया है"...।                                      

शुक्लानुसार "सन्तमत के वचनों से जनता की चित्तवृत्ति में ऐसे घोर विकार की आशंका है जिससे समाज विश्रृंखल हो जाएगा".....।


●निर्गुणमत के दो मार्गों के नाम :- ज्ञानमार्गी और प्रेममार्गी।

●ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्य नाम व नामकर्ता :-

1. ज्ञानाश्रयी :- शुक्ल

2. संतकाव्य :-  बच्चन सिंह, गनपतिचन्द्र, रामस्वरूप चतुर्वेदी ,रामकुमार वर्मा

3. निर्गुणभक्ति :-  हजारीप्रसाद

    

                        (सन्तकाव्यधार)                                                

सन्त काव्यधारा का एक अन्य नाम ज्ञानाश्रयी शाखा भी है। क्योंकि इस सिद्धांत को मानने वाले महात्मा लोग ईश्वर की भक्ति व उनकी लीला के पीछे तर्क ,ज्ञान- विज्ञान आदि को आधार बताते थे। इस मत के लोग अपनी बातों को सिद्ध करने के लिए व ईश्वर से मनुष्य का सम्बन्ध जोड़ते हुए या अन्य किसी भी तरह से मनुष्य व ईश्वर से जुड़ी क्रियाकलापों के होने के पीछे किसी ठोस तर्क को आधार मानकर ही चलते थे। इसलिए इस काव्यधारा का एक अन्य नाम ज्ञानाश्रयी शाखा भी है।

"ज्ञानाश्रयी शाखा" से सामान्य अर्थ यह है कि ज्ञान के माध्यम से, तर्क आदि के आधार पर ईश्वर की स्तुति करना, रीति-रिवाज़ों पर विश्वास करना। समाज को संचालित करने वाली गतिविधियों पर ध्यान देना, लोककल्याण के लिए तार्किक आधार पर कार्य करना और समाज को सजग करना। इसी शाखा के अंतर्गत संत कवियो का ज़िक्र किया जाता है जिसमें कबीर सबसे ज़्यादा प्रभावी और लोकप्रिय हुए हैं।


●संत का अर्थ और उसका काव्य :-  

सन्तरूपी परमतत्व का साक्षात्कार कर लेने वाले व्यक्ति को "सन्त" कहा जाता है।

पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने  "शांत" शब्द से संत की उत्तपत्ति मानी है। इसका अर्थ "निवृतिमार्गी -वैरागी" होता है।

• संतकाव्य का सामान्य अर्थ है "संतो द्वारा रचा गया काव्य। लेकिन जब हिंदी में संतकाव्य की बात की जाती है तो उसका अर्थ निर्गुणोपासक ज्ञानमार्गियो के लिए प्रयोग किया जाता है"....। 

• "बच्चन सिंह" के अनुसार "समूचा संतसाहित्य नाथपंथियो से प्रभावित था"...।

बच्चन सिंह के अनुसार "14वी शती में महाराष्ट्र के वारकरी समुदाय के भक्तों के लिए संत कहा जाने लगा और बाद में वारकरी के अनुयायियों के लिए भी संत शब्द का प्रयोग किया जाने लगा"...।

●सन्त काव्यधारा के प्रथम कवि व उनके प्रस्तोता :-  

1. कबीर -  आचार्य शुक्ल, रामस्वरूप चतुर्वेदी, हजारीप्रसाद।

2. नामदेव - गनपतिचन्द्र गुप्त , रामकुमार वर्मा ।


● संतकाव्य का दार्शनिक आधार :-  

शंकराचार्य व उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित अद्वेतदर्शन, नाथों द्वारा गुरु की महत्ता की स्वीकृति, योगमार्ग, शून्यवाद, इस्लाम से मूर्तिपूजा का खंडन व एकेश्वरवाद, सूफियो से प्रेमभाव व दाम्पत्य जीवन के प्रतीक, सिध्दों से उलटबांसियों का प्रयोग और वैदिक परम्पराओ-आडम्बरों का खंडन मनन, रामानन्द से वर्णाश्रम का विरोध व शूद्रों के लिए भक्ति मार्ग प्रशस्त करना साथ ही बौद्ध-वैष्णव धर्म से अहिंसा का पाठ लेना ...यह सभी दार्शनिक आधार सन्त काव्यधारा के अंग है जिसके तहत ही यह साहित्यिक मत कार्य करता है। इन सभी मतों के द्वारा हम पूर्णरूप से सन्त काव्यधारा व उसकी विशेषताओं को समझ सकते हैं। सम्पूर्ण सन्त काव्यधारा इसी दार्शनिक तत्व पर आधारित है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

एक मध्यवर्गीय कुत्ता

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