हिंदी भाषा का विकास:-
● आधुनिककाल में खड़ीबोली का साहित्यिक विकास :-
खड़ीबोली का प्राचीनतम रूप- खड़ीबोली जिसे आज हम हिंदी के नाम से जानते हैं उसका प्राचीनतम साहित्यिक रूप शुक्लानुसार लगभग 11वी शती (राजा मुंज एयर भोज के समय) से होने लगता है परन्तु इससे पूर्व नाथों के साहित्य में भी इसका छुटपुट रूप देखने को मिल जाएगा। खड़ीबोली में कार्य करने और उसे साहित्य की भाषा में अग्रसर करने में अमीर खुसरो का योगदान अहम माना जाता है जिसे उन्होंने हिंदुई, हिंदवी, हिन्दुवी आदि नाम दिए । दक्खिन के अनेक कवियों ने इसे दक्षिण में फैलाया जब मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली से देवगिरि (दौलताबाद) में अपनी राजधानी को ले जाता है उसे साथ में हजारों की संख्या में उत्तर भारत के निवासी दक्षिण में जा बसते हैं और वहाँ जाकर इस भाषा का प्रचार प्रसार और साहित्य लिखना आरंभ करते हैं। इसी प्रकार से शिवाजीके दरबार में "गुरु रामदास" मुख्य थे। शुरुआती आधुनिक काल में "रामप्रसाद निरंजनी" का "भाषा योगवाशिष्ठ" का योगदान भी अहम माना गया है और गुजरात में "प्राणनाथ " ने खड़ीबोली को आंशिक रूप से फैलाया।
यह सब होते हुए भी खड़ीबोली शब्द का सबसे पहला प्रयोग फोर्ट विलियम कॉलेज में हुआ। इसकी स्थापना 1800 में हुई जिसके संस्थापक (मार्किस वेलेजली) थे। कॉलेज में खड़ीबोली के प्रचार प्रसार का श्रेय वहाँ के पहले हिंदी विभागाध्यक्ष "जॉन गिलक्राइस्ट" को दिया जाता है। 18वी शती में जब वह कलकत्ता पहुँचे तब उन्होंने शुरू में हिंदी का पठन पाठन शुरू किया और 1800 में जब उनकी नियुक्ति कॉलेज में हुई तो उन्होंने ऐसी भाषा का प्रयोग करने पर बल दिया जिससे उनका वर्चस्व का भी बना रहे और भाषाई आधार पर संपर्क भी कायम रहे। तब उन्होंने लल्लूलाल और सदलमिश्र जी को कॉलेज के हिंदी विभाग में शिक्षकों के रूप में नियुक्त किया जिससे कि अंग्रेजी अफसर उचित रूप से खड़ीबोली सीख सके।
● जॉन गिलक्राइस्ट ने अपने पत्रों में खड़ीबोली का इस्तेमाल 3 बार किया है जो इस तरह है:-
1 "इन कहानियों में से कई खड़ीबोली या हिंदुस्तानी के शुद्ध हिंदवी ढंग की है"...। (हिंदी स्टोरी टेलर भाग 2)
2 "ठेठ खड़ीबोली में हिंदुस्तानी के व्याकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता और अरबी-फारसी का प्रायः पूर्ण त्याग रहता है"...। (दि ओरियन्टल फेब्युलिस्ट)
3 "मुझे खेद है कि ब्रज की तरह खड़ीबोली को सम्मान नहीं मिला"।
यहाँ एक बात ध्यातव्य है कि जॉन गिलक्राइस्ट खड़ीबोली, हिंदी, हिंदुस्तानी में कन्फ्यूज़ थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि कौन सी खड़ीबोली है और कौन सी हिंदुस्तानी। क्योंकि जहाँ वह अरबी फारसी के शब्दों के बहिष्कार की बात कर रहे हैं वहीं वह हिंदुस्तानी भाषा का भी नाम दे रहे हैं जबकि हिंदुस्तानी भाषा में अरबी-फारसी के कई शब्द होते हैं।
कम्पनी द्वारा खड़ीबोली के प्रचार प्रसार करने हेतु गिलक्राइस्ट के काम में कई भाधा पहुँचाई गई क्योंकि इससे कम्पनी को लग रहा था कि कहीं उनका वर्चस्व कम न हो जाये। कम्पनी द्वारा इस प्रतिक्रिया से क्षुब्ध होकर सर गिलक्राइस्ट ने 1804 में पद से त्याग दे दिया और इंग्लैंड में जाकर वहाँ के फोर्ट विलियम कॉलेज में 1806 तक अध्यक्ष रहे और मृत्युपर्यन्त तक हिंदुस्तानी की सेवा में लगे रहे।
●भारत का फोर्ट विलियम कॉलेज 1854 और इंग्लैंड के 1857 में बंद हो गया ।
इसी तरह लल्लूलाल ने "प्रेमसागर" में और सदलमिश्र ने "नास्कितोपाख्यान" में भी खड़ीबोली शब्द का इस्तेमाल किया है।
अर्थात 1803 में खड़ीबोली शब्द का इस्तेमाल 5 बार हुआ था।
1805 में सदलमिश्र ने अपने ग्रँथ "रामचरित्र" में खड़ीबोली का इस्तेमाल का उल्लेख किया है :- " अब इस पोथी को भाषा करने का कारण सिद्ध है कि मिस्टर जॉन गिलक्राइस्ट साहब ने ठहराया और एक दिन आज्ञा दी कि आध्यात्म रामायण को ऐसी बोली में करो जिसमें अरबी-फ़ारसी न आवे। तब मैं इसको खड़ीबोली में कहने लगा और 1805 में यह ग्रँथ पूरा होता है।
इससे यह सिद्ध होता है कि "खड़ीबोली" नाम का श्रेय फोर्ट विलियम कॉलेज को दिया जाता है और यह भाषा व्यापक रूप में आगरा से लेकर पटना तक व नीचे महाराष्ट्र के कुछ हिस्से तक फैली थी।
●इसी समय दो अन्य साहित्यकार जोकि फोर्ट विलियम कॉलेज से बाहर थे वह भी उसी प्रकार की भाषा में लिख रहे थे जिसका उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं। जिनके नाम थे :-
1 "सदासुखलाल" :- उर्दू के अच्छे लेखक होते हुए भी इन्होंने खड़ीबोली के उस रूप को ही महत्व दिया जिसमें पंडिताऊपन और अन्य बोलियों का चित्रण न हों।
2 "इंशा अल्लाह खां" - इन्होंने "रानी केतकी की कहानी" ऐसी ठेठ भाषा में लिखी जिसमें ध्यान रखा गया कि हिंदी के अतिरिक्त किसी बाहर की बोली का पुट न हो"..।
इंशा ने इस बारे में स्पष्ट कहा है कि " एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढ़ी की कोई कहानी ऐसी होनी चाहिए कि हिंदवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो । यहाँ भाखापन का अर्थ "ब्रज" भाषा से है।
●19वी शती की प्रारंभिक भाषा में तुकबंदी, लयात्मकता, अलंकारम्यता, नाना प्रकार के प्रयोग, अनेक बोलियों के शब्दों का मिश्रण मिलता है फिर भी सामूहिक प्रयास से ब्रजभाषा के समक्ष खड़ीबोली अंततः खड़ी हो गयी है। यह ठीक है कि खड़ीबोली का परिनिष्ठित या मानक रूप स्थिर नहीं हो सका पर इसका विस्तार खूब हुआ और फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के प्रश्रय के कारण ही इसे यह मान्यता प्राप्त हुई।
●1802 में सिविल सेवा के अधिकारी "विलियम बटरवर्थ बेली" ने हिंदुस्तानी और हिंदी का एक ही अर्थ में प्रयोग किया। उनको हिंदुस्तान में कारवाई के लिए "हिंदी जबान" शीर्षक निबन्ध पर 1500 रुपये नकद और मैडल प्राप्त हुआ
एक बात ध्यान देने योग्य है कि "हिंदी के लिए गौरव की बात यह हुई कि उस समय की संपर्क भाषा खड़ीबोली थी और आगरा व्यापारिक केंद्र होने के कारण वहाँ की खड़ीबोली पढ़ाने के लिए मुंशी रखे गए जिससे इस भाषा के तहत देश में सुचारू रूप से शासन चलाया जा सके"..। यह सही मायने में खड़ीबोली का विकास ही तो था।
●फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रथम 4 अध्यक्ष :-
1 जॉन गिलक्राइस्ट 1800 से 1804 तक
2 कैप्टन माउंट 1806 से 1808 तक
3 कैप्टन टेलर 1808 से 1823 तक।
कैप्टन टेलर ने ही 1815 में सर्वप्रथम हिंदी का आधुनिक रूप में इस्तेमाल किया।
4 कैप्टन विलियम प्राइस 1823 से 1831तक।
कैप्टन प्राइस ने सर गिलक्राइस्ट के मत की आलोचना इस संदर्भ में की कि "राजभाषा फ़ारसी थी जबकि उसके प्रयोक्ता बहुत कम थे। विलियम प्राइस के बदौलत ही पहली बार 1816 के अध्यादेश में भाषायी तौर पर अनेक परिवर्तन हुए जिसके फलस्वरूप 1825 में पहली बार हिंदी और हिंदुस्तानी के भेद को मिटाकर हिंदी के प्रयोग पर बल दिया।
●19वी शती के मध्य में 2 साहित्यकार हुए जिन्होंने हिंदी को आगे बढ़ाने का कार्य किया।
1 शिवप्रसाद सितारे हिंद - हिंदी -उर्दू को समीप लाने के चक्कर में उर्दू को ही भर दिया। उनका मत था कि " हम लोगों को जहाँ तक बन पड़े उन शब्दों को लेना चाहिए जो आमफ़हम में प्रचलित हो"..। इनके प्रयास से भाषा में से पंडिताऊपन तो ख़त्म हुआ पर वर्तनी में एकरूपता नहीं आ सकी। 2-2 रुप चल रहे थे जैसे उनने - उन्ने, उसके उस्के आदि। इससे भाषा बिगड़ गई थी।
इनकी "राजा भोज का सपना" सरकारी नीति का पक्ष लेती नजर आती है और "इतिहास तिमिरनाशक" की उर्दू भाषा का काफ़ी विरोध हुआ ।
2 वहीं दूसरी ओर लक्ष्मण सिंह विशुद्ध हिंदी के पक्षधर थे और उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानते थे। इस सम्बंध में वह कहते भी हैं - " हमारे मत में हिंदी और उर्दू 2 न्यारी-न्यारी बोलियाँ हैं। हिंदी यहाँ के हिन्दू बोलते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमान और पारसी पढ़े हुए।परन्तु यह आवश्यक नहीं कि अरबी-फारसी के बिना हिंदी न बोली जाए और न हम उस भाषा को हिंदी कहते हैं जिसमें अरबी फ़ारसी के शब्द आए"।
इसी तरह दयानंद सरस्वती, नवीनचंद्र राय, अम्बिका दत्त व्यास जी ने भी हिंदी के लिए कार्य किया।
● भारतेंदु ने लक्ष्मण सिंह और सितारे हिंद की हिंदी के बीच से नई हिंदी निकाली जिसमें न तो भाषा की पंडिताऊपन था और न ही उर्दू के बहुतेरे शब्द। उन्होंने साधु शैली का निर्णय किया और उस हिंदी को "नए चाल की हिंदी " 1873 में संज्ञा दी।
आचार्य शुक्ल इस सम्बंध में कहते हैं कि " जब भारतेंदु अपनी मँझी हुई परिष्कृत भाषा सामने लाए तो हिंदी बोलनेवाली जनता को गद्य के लिए खड़ीबोली का प्राकृत साहित्यिक रूप मिल गया और भाषा के स्वरूप का प्रश्न न रह गया। भाषा का स्वरूप स्थिर हो गया"..।
●"राष्ट्रभाषा" - शादिक अर्थ है "समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त होने वाली भाषा" (जनभाषा)। जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन-जन के विचार विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है। इसका क्षेत्र व्यापक होता है।
हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सर्वप्रथम विचार "राजाराम मोहन राय" का था। इसी सम्बन्ध में न केवल भारतवासियों ने बल्कि बाहरी विदेशियों ने भी भारत की हिंदी भाषा को यहाँ की राष्ट्रभाषा बनाने का पुरज़ोर समर्थन किया
●अंग्रेज़ो द्वारा हिंदी का प्रचार व समर्थन:-
1 जब भी किसी देश को एकता के सूत्र में बाँध कर रखने की बात हो या देश के बड़े हिस्से में प्रशानिक काम करने की बात हो, बड़े स्तर पर जनता से परिचित होना हो और अपनी बात उन तक पहुंचानी हो तो उस देश में एक ऐसी भाषा की जरूरत पड़ती है जोकि देश के लगभग सभी हिस्सों में नहीं तो एक बड़े भूभाग में जरूर उसका उपयोग किया जाता हो। जिसे सामान्य भाषा में राष्ट्रभाषा भी कहा जाता है। इसकी उपयोगिता से देश की संस्कृति, सामाजिक-राजनीतिक, व्यावहारिक संप्रभुता बनी रहती है। इस नजर से हिंदुस्तान में "हिंदी" ही केवल एक भाषा है जिसे इतने बड़े रूप में प्रयोग किया जा सकता है। और ऐसा ही कुछ रुख़ अंग्रेज़ो ने भी अपनाया था जब उन्हें प्रशासनिक स्तर पर और जनता से संपर्क बनाने के लिए किसी भाषा की जरूरत पड़ रही थी।
शुरुआत में अंग्रेजी कार्य व प्रशासन फारसी में होता था उसी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था फिर धीरे-धीरे उन्हें इस भाषाई समस्या का परिचय प्राप्त हुआ कि बड़ी मात्रा में जनता से संपर्क नहीं साधा जा रहा है। उन्होंने अवलोकन किया कि किसी ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाए जिसमें यह सारी कमी पूरी हो जाये । तब उन्हें केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा लगी जिससे उनकी भाषाई कमी को पूरा किया जा सकता है और इसी की कमी को पूरा करने के लिए 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना भी कराई गई थी और उसमें भी हिंदी विभाग को खोला गया था। जिससे कि अंग्रेजी अफसर हिंदी सीख सके और जनता से सीधा संपर्क साधने में कुछ हदतक सफलता भी प्राप्त कर सकें। इसी क्रम में हिंदी भाषा सीखाने के लिए भाखा मुंशी सदलमिश्र और लल्लू लाल की नियुक्ति हुई। अंग्रेज अफसरों ने इस भाषा की मुक्तकंठ से तारीफ़ भी की जिनमेँ प्रसिद्ध हैं:-
●"सी.टी.मेटकाफ" :- 1806ई.में अपने शिक्षा गुरु जान गिलक्राइस्ट को लिखा कि- "भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता से लेकर लाहौर तक, कुमाऊँ से लेकर नर्मदा तक....मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है"..।(हिंदी)
● ईसाई धर्म प्रचारको ने 1813 में विल्फोर्स एक्ट के पास होने के बाद से अपने धार्मिक ग्रँथ बाइबिल और अन्य धार्मिक छोटी छोटी पुस्तकें और पैम्फलेट हिंदी में बाँटने शुरू किया। इससे हिंदी का प्रचार तो हुआ ही परन्तु सही मायने में वह अपने धर्म का प्रचार करके भारत में अपनी पकड़ को मजबूत बना रहे थे।
●"विलियम कैरी" :- 1816ई. में लिखा - हिंदी किसी एक प्रदेश की भाषा न होकर सारे देश मे सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है"...।
●प्रथम 4 दशकों में सिविल सर्विस के अधिकारियों में जो हिंदी-हिंदुस्तानी की जो लहर उमड़ रही थी उसे रोकने के लिए मैकाले की नीति लायी गयी बावजूद उसके 1851 तक भारत में अंग्रेजी 2 % मात्र रह गयी थी। खुद अंग्रेज ही अंग्रेजी भाषा का विरोध कर रहे थे और अकाट्य तर्क दे रहे थे। इसके एवज में वह हिंदी का समर्थन कर रहे थे।
इसी में एक मुख्य नाम इंग्लैंड के "फेड्रिक पिन्काट" का आता है जिनका कम्पनी से संग्राम 1868 में शुरू हुआ जब वह मात्र 32 साल की उम्र में थे। 1888 में श्रीधर पाठक को लिखे पत्र में वह स्पष्ट करते हैं कि " 20 साल पहले मैं एकमात्र यूरोपियन था जिसने सरकार पर हिंदी के बारे में दबाव डाला और 10 साल बाद इस नियम के बनाने में सफल रहा कि भारत जाने वाले अंग्रेजों को हिंदी की परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा"..।
ऐसी स्थिति में सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा और उन्होंने 1881 में सेक्रेटरी को सिविल सर्विस कमीशन को भेजा और भारतीय भाषा के ज्ञान को अनिवार्य रूप से सीखने के लिए मंजूर कर दिया। इसके साथ 1882 में यह व्यवस्था भी की गई कि मद्रास जाने वाले अधिकारियों को विशेष पुरुस्कार दिए जाएँ। इस भारतीय भाषाओं में हिंदुस्तानी मुख्य भाषा थी।
●1878 में ग्रिफिथ ने एक रिपोर्ट में कहा कि " इस देश की भाषा हिंदी है"..। उसमें इस घोषणा के साथ भारतीय आर्यभाषाओं को महत्व देने में हिंदी प्रथम स्थान पर थी। इसी के अलावा उन्होंने कल्पना भी की " यदि कोई भविष्य बताने का साहस करे तो वह यह भी कह सकता है कि भविष्य में उत्तर भारत की जो भाषा राजकाज या साहित्य की बनेगी वह अरबी-फ़ारसी से कम प्रभावित होगी, साथ ही उसमें वर्तमान हिंदी की अपेक्षा संस्कृत तथा प्राकृत के शब्द भी कम रहेंगे"..।
●1886 में लन्दन से प्रकाशित "हॉब्सन जाब्सन कोश" में हिंदुस्तानी को भारत की राष्ट्रभाषा कहा
●"जॉन ग्रियर्सन" :- हिंदी आम बोलचाल की महाभाषा है'...।
सहायक ग्रन्थ :-
1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।
2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।
3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।
4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना, 8वां संस्करण 2016।