(जीवनी)
प्रस्तुत ब्लॉग में हिंदी साहित्य की गद्य विधा "जीवनी" के बारे में एक संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। इस ब्लॉग में कोशिश की जा रही है कि हिंदी की मुख्य जीवनियों के बारे में जितनी अधिक जानकारी हो सके वह प्राप्त कराई जा सके। वैसे तो किसी भी जीवनी के बारे में एक अच्छी जानकारी तब ही मिल पाती जब हम उस जीवनी के कुछ संवादों को, कुछ प्रसंगो को कुछ पात्रों आदि की चर्चा करके पाठकों तक जानकारी मुहैया कराएं परन्तु साहित्येतिहास, प्रतियोगी पुस्तकों व अन्य पुस्तकों के माध्यम से जो भी जानकारी जुटाई गई है उसे यहाँ पेश करने की कोशिश की जा रही है। वैसे मुख्य- मुख्य जीवनियों के परिचय भर से भी कई बार परीक्षा के लिहाज़ से यह जानकारी बेहतर साबित हो जाती है, उसी को ध्यान में रखते हुए यह जानकारी साझा की जा रही है।
●जीवनी शब्द "जीवन" से बना है जिसमें "ई" प्रत्यय लगाकर इस शब्द को पूरा किया गया है। इस शब्द का अर्थ होता है "किसी व्यक्ति के जीवन चरित्र का चित्रण करना"..। यह चित्रण उसके किसी ख़ास, प्रिय, विशेष, बहुत करीबी व्यक्ति द्वारा किया जाता है क्योंकि ऐसा समझा जाता है कि, किसी के भी जीवन के बारे में उस व्यक्ति के बाद जिसके पास सबसे ज्यादा जानकारी रहती है वह उसके सगे-सम्बन्धियों, मित्रगण आदि लोगों के पास ही होती है। उन्हें ही सही मायने में जीवनी चरितनायक के बारे में इतनी गूढ़ जानकारी रह सकती है जिसके तहत एक जीवनी का निर्माण किया जा सकता है। जीवनी को अंग्रेजी में "बायोग्राफी" कहते हैं।
● जीवनी साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है। प्रायः जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रतिष्ठित व्यक्तियोँ की जीवनियाँ लिखी जाती हैं क्योंकि उनका जीवन भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है। हिंदी में जीवनी लेखन का आरम्भ विलम्ब से हुआ क्योंकि गद्य विधा की शुरुआत भी हिंदी में काफी लंबे समय बाद हुई। इस विधा के माध्यम से हम किवदंतियों व भ्रामक तथ्यों से पाठक वर्ग को सचेत कर सकते हैं और जीवनी चरितनायक के मित्रों, परिजनों आदि से आवश्यक जानकारी प्राप्त करके हम साहित्य व पाठक वर्ग को दुरुस्त कर सकते हैं। साहित्य में इस विधा की वृद्धि 19वीं शती के उत्तरार्ध से हुई परंतु इसे जो त्वरित गति मिली वह द्विवेदी युग के बाद मिली। द्विवेदीयुग के बाद से भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर जीवनियाँ लिखी गयी और साहित्य में एक नई विधा को और दृढ़ किया गया। इस विधा ने प्रस्तुत लेखक के निजी जीवन के बारे में भी जानने का मौका दिया जिससे पाठक वर्ग अछूता ही रह जाता है। आज हिंदी साहित्य में सैंकड़ो जीवनियाँ लिखी जा चुकी हैं और समय के प्रवाह में इस विधा में निरन्तर नए नए बदलावों के साथ इस विधा को एक नई दृष्टि देने में भी हमारे जीवनीकारों ने अहम भूमिका निभाई है।
● रामचंद्र तिवारी के अनुसार जीवनी लिखने के लिए कुछ शर्तें व मुख्य तत्व हैं जिनके आभाव में जीवनी अपनी पूर्णतः को प्राप्त नहीं हो सकती। वह कहते हैं कि " जीवनी लिखने के लिए चरितनायक के सम्बंध में पूरी जानकारी आपेक्षित है। चरितनायक के प्रति पूज्यभाव या प्रशंसात्मक दृष्टिकोण होने के कारण प्रायः उसके जीवन के वे प्रसंग छोड़ दिए जाते हैं जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से समान महत्व दिया जाना चाहिए। हर मनुष्य के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब वह देवता होता है और ऐसे भी क्षण आते हैं जब उसके अंदर की पशुता बाहर आ जाती है। जीवनी लेखक के लिए आवश्यक है कि वह तटस्थ भाव से स्थितियों का चित्रण करें"..। जीवनी लेखन उस समय कठिन हो जाता है जब अपने ही किसी परिजन जैसे पति-पिता-पुत्र-पुत्री आदि के बारे में लिखनी हो, तब जीवनीकार उतना तटस्थ रह पाने में उतना स्वतंत्र नहीं रह पाता है । परन्तु इस विधा की माँग तटस्थता पर ही टिकी है।
●वैसे तो भारत में जीवनी लेखन प्राचीन काल से ही चला आ रहा है जैसे अशोक के अभिलेखों से उसका पता चलना, बाबरनामा, हुमायूँनामा, अकबरनामा कुछ इसी तरह के उदाहरण हैं। परंतु हिंदी साहित्य में इसकी शुरुआत 16वी शती से होती है जब नाभादास द्वारा "भक्तमाल" की रचना हुई थी। इस कृति में हिंदी के कई लेखकों का वर्णन किया गया है। इसके बाद गोकुलनाथ कृत "84 और 252 वैष्णव की वार्ता" भी जीवनीपरक रचना रही है। जिसमें कई व्यक्तियों के जीवन पर आधारित विवरण दिया गया है। यह विद्या आधुनिक युग में अपनी जड़ों को विकसित करती है।
● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार आधुनिक काल के आरम्भ में अर्थात 19वी शती के समय में रची जा रही जीवनी के नायकों के लिए प्रायः महाकाव्योचित गुण आवश्यक समझे जाते थे। जीवनियों का प्रस्तुतिकरण पहले प्रकाशकीय स्तर पर आरम्भ होता था। जहाँ किसी भी जीवनीपरक कृति पर लेखक का नाम न रहकर उसके प्रकाशक का नाम लिखा रहता था।
तत्कालीन शताब्दी में कलकत्ता व बनारस में कुछ ऐसे प्रकाशक थे जो निम्न तरह की पुस्तकें छापा करते थे। इनमें आदर्श वृत जीवनियाँ भी हुआ करती थी जिन्हें जनसाधारण को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता था। उसके पीछे किसी तरह के कलात्मक रूप देने की आवश्यकता वह नहीं समझते थे। प्रकाशकीय दृष्टि से तैयार होने के कारण कई बार इन पुस्तकों पर लेखकों के नाम नहीं हुआ करते थे।
इस समय रची जा रही जीवनियों के नायक अधिकांशतः पौराणिक, ऐतिहासिक व समसामयिक चरित्रों पर आधारित हुआ करते थे। इसे यों भी समझ सकते हैं कि, उन्हीं चरित्रों पर जीवनियाँ लिखी जाती थी जो समाज में एक प्रेरणा स्रोत का कार्य करते हों। जिनसे समाज को किसी भी प्रकार का लाभ होता हो, जो एक भावी समाज की निर्मित में योगदान दे सकते हों। जिनसे समाज में एक सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती हो और उनसे युवाओं को, महिलाओं को साथ ही अन्य लोगों को भी एक प्रोत्साहन मिलता है। जैसे "कार्तिकप्रसाद खत्री" विरचित "शिवाजी का जीवन चरित, मीराबाई का चरित्र, अहिल्याबाई का जीवन चरित्र" आदि।
इस युग में जीवनीकारों की दृष्टि आदर्श और शिक्षाप्रद हुआ करती थी।
साहित्यिक ढंग की जीवनियाँ या ठीक-ठीक ढंग की जीवनियाँ 20वीं शताब्दी से ही लिखी गयी।
● जीवनी सम्बन्धी महत्वपूर्ण परिभाषाएँ:-
1 "बाबू गुलाबराय के अनुसार " जीवनी घटनाओं का अंकन नहीं वरन चित्रण है.. वह साहित्य की विधा है और उसमें साहित्य और काव्य के सभी गुण है..। वह मनुष्यों के अंदर और बाहरी स्वरूप का कलात्मक निरूपण है"...।
2 "राजपाल हिंदी कोष के अनुसार " जीवनी को जीवन कथा या जिंदगीनामा कहा गया है..।
● हिंदी साहित्य की कुछ महत्वपूर्ण जीवनियाँ व उनके बारे में संक्षिप्त परिचय:-
1 "माखनलाल चतुर्वेदी" नामक जीवनी माखनलाल चतुर्वेदी पर लिखी गयी है जो 1960 में आई थी। इसके लेखक "जैमिनी कौशिक बरुआ" जी हैं। इस कृति में जीवनीकार ने बहुत से अंश चरितनायक के मुँह से ही कहलवाए हैं। इस कारण इस कृति में जीवनीपन कुछ कम सा हो गया है। कहने का अर्थ है कि "जीवनी के लिए चाहिए कि जीवनीकार अपनी मेहनत से उस लेखक के बारे में वह सभी जानकारी खोजे जिसके आधार पर एक साहित्यिक जीवनी लिखी जा सकती है। यदि उसके स्थान पर लेखक जीवनी चरितनायक से ही ज्यादातर कथन हु-ब-हु रख दे तो वह इस विधा के नियमों का उल्लंघन करता हुआ प्रतीत होगा और एक उत्कृष्ट जीवनी लिखने में नाकामयाब रहेगा।
(जैमिनी कौशिक बरुआ)
2 "कलम का सिपाही" नामक जीवनी 1962 में महान कथाकार प्रेमचंद के सुपुत्र "अमृतराय" ने लिखी है। यह कृति अमृतराय द्वारा अपने पिता कथा सम्राट प्रेमचंद पर लिखी गयी है। यह 650 पृष्ठों की विशालकाय रचना है। इस सम्पूर्ण जीवनी का एक विशिष्ट पक्ष यह है कि "युग की प्रवृति के अनुसार यहाँ महान और उदात्त घटनाओं पर बल न देकर लेखक ने सामान्य मनुष्य जीवन की ही रचना का यत्न किया गया है। इस रूप में "कलम का सिपाही" एक बड़े लेखक की जीवनी होने की पूरी तरह योग्यता रखती है।
इस रचना की निर्मित के लिए प्रेमचंद के पत्र, संस्मरण, उनके व्याख्यान, लेखन व निजी अनुभव को आधार बनाया है।
इस कृति पर 1963 में साहित्य अकादमी भी मिला है।
(अमृतराय)
3 "कलम का मजदूर" नामक जीवनी प्रेमचंद पर "मदन गोपाल" द्वारा 1964 में लिखी गयी थी। यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी जिसे बाद में मदन गोपाल ने हिंदी में प्रकाशित किया था। इस कृति में भी प्रेमचंद के निजी व साहित्यिक जीवन का विवेचन किया गया है।
(मदनगोपाल)
4 "निराला की साहित्य साधना" नामक जीवनी 3 भागों में प्रकाशित छायावादी काव्यस्तम्भ "निराला" पर आधारित है, जिसे हिंदी के अग्रणी आलोचक "रामविलास शर्मा" द्वारा रचा गया है। 1969 में इसका पहला भाग आया था जिसमें निराला के जीवन पर प्रकाश डाला गया है। इस भाग में 15 अध्याय हैं। इसका दूसरा भाग 1972 व तीसरा भाग 1976 में आया था।
यह कृति न केवल निराला की रचनाओं को समझने के लिए आवश्यक है बल्कि निराला और छायावादी युग के पूरे संघर्ष और अंतर्विरोध को समझने में भी यह हमारी सहायता करती है। इसमें निराला की प्रतिभा को महिमामंडित करने या कम से कम न बिगड़ने देने के उद्देश्य से कुछ प्रंसगो को नजरअंदाज अवश्य कर दिया गया है, किंतु कृति की सार्थकता को देखते हुए यह अनवधानता क्षम्य है।
(रामविलास शर्मा)
5 " सुमित्रानंदन पंत: जीवनी और साहित्य" नामक जीवनी, छायावाद के प्रमुख कवि "पन्त" के जीवन पर आधारित है जिसे उनकी बहिन और दर्शनशास्त्र की विदुषी "शांति जोशी" द्वारा लिखा गया है। यह कृति दो खंडों में प्रकाशित है जिसका प्रथम भाग 1970 व दूसरा भाग 1976 में प्रकाशित हुआ था। इसमें पन्त के व्यक्तित्व व साहित्यिक जीवन का विवेचन किया गया है।
इसके अतिरिक्त "निराला सम्बन्धी जीवनी" में पन्त जी ने उनके व्यक्तित्व व साहित्यिक जीवन को अलग-अलग खंडों में प्रकाशित किया है परन्तु इस कृति में ऐसा नहीं है। इसमें पन्त जी के समग्र जीवन को एक ही खण्ड में रखा गया है जिसके कारण यह अपने विशालकाय रूप में प्रस्तुत हुई है जिसके चलते इस कृति को दो खंडों में प्रकाशित करना पड़ा है। इसके अतिरिक्त "निराला-पन्त प्रसंग में" रामविलास शर्मा द्वारा छेड़े गए सवालों के उत्तर देने की भी इस कृति में कोशिश की गई है।
प्रायः यह पूरी जीवनी चरितनायक के जीवित रहते ही पूरी कर दी गयी है जिससे यह सुलभता हुई कि प्रमाणों और तथ्यों की सही-सही जानकारी मिल सकी है।
(शांति जोशी)
6 " जिन्होंने जीना जाना" नामक जीवनी 1971 में "जगदीशचंद्र माथुर" द्वारा कुछ साहित्यकारों, राजनेताओं, कलाकारों की जीवन रेखाओं को एक साथ प्रस्तुत करके उनके चरित्र वैशिष्ट्य को उभारने की कोशिश में लिखी गई है। इस कृति में 7 साहित्यकारों, 2 राजनेताओं, 1 विचारक और 1 कलाकार व एक अभिनेत्री का चरित लेख प्रस्तुत किया गया है।
(जगदीशचंद्र माथुर)
7 "आवारा मसीहा" नामक जीवनी बंगाल के कथाकार "शरतचंद्र" पर आधारित है जिसे "विष्णु प्रभाकर" जी ने 1974 में पूरा किया था।
इस कृति की भूमिका में लेखक बताते हैं कि "श्रेष्ठ जीवनी लेखक काल, देश, व्यक्ति और घटना की सीमाओं को तोड़कर अनुभूतियों का सौंदर्य में विक्षेपण करता है। विशुद्ध कला और मानदंडों के बीच संतुलन और सामंजस्य का प्रणयन करता है"...। तभी जाकर कोई जीवनी अपनी सम्पूर्णता में सिद्ध होती है।
यह 400 पेजों की एक बड़ी रचना है। इस कृति में शरतचंद्र के उपन्यास श्रीकांत, चरित्रहीन, देवदास, सुभदा, पल्लीसमाज आदि का भी विवरण दिया गया है।
शरतचंद्र की प्रशंसा करते हुए विष्णु प्रभाकर जी कहते हैं" जिस प्रतिभा के बल और उन्होंने रवींद्र युग में बरगद के पेड़ के नीचे न केवल अपना स्थान बनाया बल्कि समूचे देश को अपनी ओर आकर्षित किया। यह क्या कम अभिनंदनीय है ?...।
इस कृति के नामकरण के सम्बंध में लेखक कहते हैं कि " मैं तो इस नाम के माध्यम से यही बताना चाहता था कि कैसे एक आवारा लड़का अंत में पीड़ित मानवता का मसीहा बन गया। आवारा और मसीहा दो ही शब्द हैं। दोनों में यही अंतर है कि "आवारा" के सामने दिशा नहीं होती, और जिस दिन उसे दिशा मिल जाती है उसी दिन वह "मसीहा" बन जाता है"...।
(विष्णु प्रभाकर)
8 "दिनकर एक सहज पुरुष" नामक जीवनी "शिवसागर मिश्र" द्वारा 1981 में "दिनकर" जी पर लिखी गयी है जिसमें उनके मानवीय पक्षों को उभारने की कोशिश की गई है। यह जीवनी आत्मकथात्मक शैली में लिखी है।
(शिवसागर मिश्र)
9 " मेरे बड़े भाई शमशेर" नामक जीवनी 1995 में शमशेर के छोटे भाई "तेजबहादुर सिंह" ने शमशेर के जीवन और लिखी है । इसमें उनकी प्रतिभा को बड़ी निष्ठा के साथ स्वीकार किया गया है- " जो सत्य के आवरण से सुरक्षित, झूठ से कोसों दूर, अत्यंत भावुक , निश्छल , कठिन परिस्थितियों में भी अडिग हँसने वाला व्यक्तित्व विशिष्ट था" ...।
(तेजबहादुर सिंह)
10 " महामना महापंडित" नामक जीवनी 1995 में राहुल सांकृत्यायन पर उनकी दूसरी पत्नी कमला सांकृत्यायन" द्वारा लिखी गयी है जिसमें उन कोमल व अंतरंग प्रसंगों का समावेश है जो इस जीवनी को अलग पहचान देती है। परन्तु राहुल जी के अंतिम दिनों के अवसाद और मानसिक द्वंद्व का उदघाटन इसमें नहीं है जो उनके लिए सांघातिक सिद्ध हुआ"...। शायद ऐसे प्रसंगों को छेड़कर लेखिका एक बार पुनः उन लम्हों को याद नहीं करना चाहती थी जिसने उनके जीवन में अवसाद के चित्र खींच दिए थे।
(कमला सांकृत्यायन)
11 "समय साम्यवादी" नामक जीवनी 1997 में राहुल सांकृत्यायन जी पर लिखी एक अन्य जीवनी है जिसे "विष्णुचन्द्र शास्त्री" ने लिखा है। यह 723 पृ का एक महाग्रन्थ है जिसमें उनके संघर्ष और विचारधारा को दिखाया गया है।
(विष्णुचन्द्र शास्त्री)
12 " प्यारे हरिश्चंद्र जु" 1997 में उनकी परिवार से संम्बंध रखने वाली भारतेंदु के फुफेरे भाई राधाकृष्ण दास की दौहित्र "प्रतिभा अग्रवाल" जी ने लिखी है जिसमें उन्हें एक युग प्रवर्त्तक के रूप में दिखाया है जिसे केंद्र में रखकर युग की जीवंत प्रतिमा खड़ी की है। यह वृत-प्रधान जीवन गाथा न होकर भारतेंदु के विराट व्यक्तित्व और उनके साथ जुड़े साहित्य संसार का राग-रस पूर्ण महाकाव्यात्मक आख्यान है।
(प्रतिभा अग्रवाल)
13 "रांगेय राघव:- एक अंतरंग परिचय" नामक जीवनी 1997 में रांगेय राघव जी की पत्नी "सुलोचना रांगेय राघव" द्वारा लिखी जीवनी है जिसमें रांगेय राघव जी की कथा कही है। यहाँ लेखिका अपनी बेटी को लिखे 2 पत्रों के माध्यम से कहती है कि " एक चित्रपट की भांति मेरे मानस पर तुम्हारे पिता के साथ बिताए हर क्षण की प्रतिछाया बनी हुई है और मैं चाहती हूँ कि एक- एक छायाओं को खोलकर तुम्हारे सामने रख दूँ...। इस जीवनी में लेखिका ने यही किया है। यह पूरी अंतरंग कथा भीगे नयनों से लिखी गयी है।
(सुलोचना राघव)
14 " स्मृतियों के झरोखे से" नामक जीवनी 1999 में भारतभूषण अग्रवाल पर उनकी पत्नी "बिंदु अग्रवाल" ने लिखी है जिसकी अंतिम पंक्तियों में वह कहती हैं" भारत जी का साहित्यिक व्यक्तित्व क्या था ये तो समय ही बताएगा पर मेरे लिए तो वह सब कुछ थे..। उन्होंने ही मुझे बड़े यत्नों से गढ़ा था....मैंने अपनी पूरी सच्चाई के साथ और आत्मतोष के साथ कुछ लिखने का प्रयास किया है"...। इस कृति में लेखिका ने एक पत्नी और सहृदय समीक्षक दोनों का दायित्व अच्छे से निभाया है।
(बिंदु अग्रवाल)
15 " कथाशेष" नामक जीवनी 1999 में अमृतलाल नागर पर उनके मित्र व साहित्यिक यात्री "ज्ञानचन्द्र जैन" ने लिखी है। जिसमें इस कथा को 4 भागों "परिचय" , "आरम्भिक साहित्यिक जीवन", "फिल्मी जीवन के सात वर्ष" व "साहित्य साधना के 4 दशक" नामों में बाँटा गया है। नागर जी के अछूते कोणों पर प्रकाश डालने वाली यह कृति पूरी तरह से विश्वनीय है।
(ज्ञानचंद जैन)
16 "उत्सव पुरुष: श्री नरेश मेहता" नामक जीवनी 2003 में उनकी पत्नी "महिमा मेहता" द्वारा लिखी गयी है। इस जीवनी की बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लेखिका और चरितनायक दोनों का ही चित्रण हुआ है जो विवाह के बाद से लेकर जीवन के अंतिम समय तक उनके जीवन को सँवारती हैं। इस कृति को पढ़कर हम श्री मेहता जी के जीवन-संघर्ष से तो परिचित होते ही हैं, उनके सर्जक व्यक्तित्व के अंतरंग क्षणों का साक्षात्कार भी करते हैं।
कृति में उनके जन्म स्थान व बालपन के किस्सों से लेकर उनके वैवाहिक जीवन व जिन परिस्थितियों में वह इलाहाबाद आकर रहे थे और उसके बाद किस तरह से नरेश मेहता जी ने खुद को पूरी तरह से रचनात्मक लेखन में लगा दिया था यह सभी प्रसंग इस कृति की शोभा बढ़ाते हैं। नरेश मेहता को प्राप्त सम्मानों का विवरण भी इन कृति में दिया गया है।
22 नवम्बर 2000 की सुबह यों ही कागज पर कलम चलाते हुए आपने लिखा:-
क्या कोई यह भी जान पाएगा कि
किन परिस्थितियों, विषमताओं में
जीकर यहाँ तक पहुँचा?...।
ये नरेश मेहता के अंतिम शब्द थे। इसी दिन रात्रि में 11:30 पर आपकी अप्रत्याशित मृत्यु हो गयी जिसकी वजह डॉक्टर ने स्वाभाविक मृत्यु बताई।
(महिमा मेहता)
17 "वटवृक्ष की छाया में" नामक जीवनी 2004 में अमृतलाल नागर पर उनकी बेटी "कुमुद नागर" द्वारा उनकी स्मृतियों को संभालने के लिए लिखी गयी थी। श्री नागर जी के कुछ अछूते प्रसंगों को व रचनात्मक संघर्षों को सामने लाकर "कुमुद नागर" ने इस कृति को अत्यंत रोमांचक बना दिया है।
(कुमुद नागर)
●सन्दर्भ ग्रँथ:-
1 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वां संस्करण 2018..।
2 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचंद्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 12वां संस्करण 2018..।
3 EPG पाठशाला वेबसाइट।