भक्तिकाल के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य, सम्प्रदाय व भक्तिकाल : एक अंत
● कृष्णकाव्य के अन्य कवि:-
1. बच्चन सिंह के अनुसार परमानन्ददास का "परमानंद सागर" सूरसागर की पद्धति पर लिखा है।
2. नरोत्तम स्वामी"- इनका "सुदामाचरित" ग्रन्थ बहुत प्रसिद्ध है। जिसमे दरिद्रता को दिखाया गया है।
सुदामाचरित की ये पंक्ति बहुत ही प्रसिद्ध है :-
" सीस पगा न झगा तन पे प्रभु,
जाने को एहि बसे केहि ग्रामा।
धोती फ़टी सी, लटी दुपटी अरु
पाय उपानह को नही समाना। (दरिद्रता का चित्र)
• इन्होंने एक अन्य ग्रन्थ " ध्रुवचरित" खण्डकाव्य भी लिखा है।
3. हितहरिवंश के राधा वल्लभ सम्प्रदाय में राधाकृष्ण का नित्यविहार दर्शन हुआ है।
नित्य विहार के 4 तत्व हैं- कृष्ण, राधा, सहचरी, वृंदावन।
• हितहरिवंश की रचना "हित चौरासी" में 84 पद हैं जिसकी टीका "प्रेमदास" ने लिखी थी।
4. भक्ति काल में न केवल कवि ही रचनाये या पंक्तियाँ लिखते बल्कि उनके आश्रयदाता और शासको ने भी लिखा है। कुछ इसी तरह से अकबर की एक प्रसिद्ध वक्ती यहाँ स्मरण आती है :-
"जाको जस है जगत में जगत सराहे जाहि
ताको जीवन सफल है, कहत अकबर साहि...।
5. गंग कवि :- ये अकबर के दरबारी कवि थे। ऐसा कहा जाता है कि किसी राजा या नवाब के आदेश से इन्हें हाथी से चिरवा डाला था। और उसी समय मरने पर इन्होंने ने ये पंक्ति कहि थी :-
"कबहुँ न भडुआ रन चढ़े, कबहुँ न बाजे बम्ब
सकल सभाहि प्रणाम करि,बिदा होत कवि गंग।
कहते हैं कि एक बार रहीम ने इन्हें इनके 1छपय्य के लिए 36 लाख रुपये दे दिए थे। वह छपय्य ये था:-
"चकित भँवर रहि गयो गमन, नहि करत कमलवन
अहि फन मनि नहिं लेत,तेज नहिं बहुत पवन घन।
6. होलराय :- इन्होंने अकबर से कुछ जमीन पाकर अपना होलपुर नगर बसाया था। तुलसीजी ने अपना लोटा इन्हें दिया था जिस पर इन्होने कहा था :
"लोटा तुलसीदास का लाख टके को मोल....।
जिसपर चट तुलसी उत्तर देते हैं:-
"मोल तोल कुछ है नही, लेउ राय कवि होल...।
7. पुहकर कवि :- ऐसा माना जाता है कि एक बार जहाँगीर ने इन्हें कैद करके जेलखाने में डाल दिया था। तब वही रहते हुए इन्होंने "रसरत्न " नामक ग्रन्थ की रचना कर दी थी जिससे प्रसन्न होकर जहाँगीर ने इन्हें मुक्त कर दिया था।
●भक्तिकाल के मुख्य सम्प्रदाय और उनके प्रवर्तक:-
(1) "शंकराचार्य" - इनका जन्म 8वी शती केरल में हुआ था। यह निर्गुण ब्रह्म को मानते थे। इनका सिद्धान्त "अद्वेतवाद" पर टिका था जहाँ ईश्वर सभी गुणों रूपों से ऊपर है।
(2) "रामानुजाचार्य" - इनका जन्म 11वी शती कांचीपुरम में हुआ था। इनके गुरु का नाम कांचीचूर्ण था जोकि जाति के शुद्र थे । यह सगुण ब्रह्म में विश्वास करते थे। इनका मत "विशिष्टतावाद" पर टिका था, जहाँ ईश्वर को विशेष रूप में देखा गया है।
• " शंकराचार्य के अद्वेतवाद का विरोध रामानुजाचार्य ने किया और कहा कि "जीवन और जगत अलग अलग संस्था है , यथार्थ है"..।
इनके सम्प्रदाय का नाम "श्री सम्प्रदाय" था जिसके आदिगुरु "रंगनाथ मुनि" थे। इन्हें रामभक्ति का प्रवर्तक माना जाता है। इन्हें लक्ष्मण या शेषनाग का रूप भी माना जाता है।
"तत्वमसि" का सूत्र इन्हीं (रामानुजाचार्य) ने दिया था जिसका अर्थ है कि "तू उसका सेवक है"..।
(3) निम्बार्काचार्य - इनका सम्प्रदाय कृष्णभक्ति से जुड़ा था। इस सम्प्रदाय को द्वैतवाद कहा जाता है।
विजेन्द्र स्नातक के अनुसार ये मैसूर के निम्बापुर गाँव में पैदा हुए थे। वैसे इनका मूल नाम नियमानन्द है। निम्बार्क नाम पड़ने के पीछे जो कथा है उसमें इनका किसी महाराज के साथ शास्त्रार्थ होने में इतना लीन होना की रात्रि का पता न चलना और बिना आहार के ही रह जाना था । जब इनके आहार करने के लिए पुनः सूर्य की किरणें उदय हुई और इन्होंने आहार किया। तभी से निम्बार्क नाम पड़ा अर्थात नीम के पेड़ पर सूर्य के दर्शन करानेवाला।
निम्बार्क बहुत ही सुंदर थे जिसके कारण इन्हें सुदर्शन के साथ कृष्ण का अवतार भी कहा जाता है।
• विजेन्द्र स्नातक के अनुसार इस सम्प्रदाय की सबसे बड़ी मूर्ति राजस्थान सलेमाबाद में है।
परशुराम देव जी को इस सम्प्रदाय के प्रचार का श्रेय है।
(4) "रामानन्द" - बच्चन सिंह के अनुसार निर्गुण भक्त कवियों में रामानंद का नाम विशेष रूप से लिया जाता था। परंतु रामभक्ति शाखा में नाभादास के अतिरिक्त किसी ने भी इन्हें याद नहीं किया। इनके सम्प्रदाय का नाम रामानंद सम्प्रदाय या वैरागी सम्प्रदाय था जहाँ राम को केंद्र में रखकर व विशेष रूप में देखा है।
इनके गुरु का नाम राघवानंद था। इनके एक अन्य शिष्य सेन भगत भी थे जिनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी आराधना से ईश्वर को नाई का रूप धरने के लिए मना लिया था।
• शुक्लानुसार रामानंद ने विष्णु के अनेक रूपों में से राम को आराध्य बनाकर समाज के सामने प्रस्तुत किया। इनका वर्णव्यवस्था सम्बन्धी मत महाभारत, पुराणों पर आधारित है।
शुक्लानुसार रामानंद वर्णाश्रम व्यवस्था का विरोध भक्ति के लिये करते हैं, परन्तु कर्मयोजना के लिए आवश्यक मानते हैं।
रामानंद की शिष्य परम्परा में 2 विरोधी भक्तिधारा के कवि हैं- तुलसी और कबीर। इसी विशेषता के आधार पर हजारीप्रसाद जी रामानंद को आकाशधर्मी गुरु व मध्ययुग की समग्र चिंता के गुरु मानते हैं।
• रामानंद ने कबीर के लिए कहा :-
" कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रमी पर दर्शनी"..।
• मीरा के लिए कहा :-
"निरंकुश अति निडर रसिक जस रसना गायों"..।
● रामानंद के 12 शिष्य :-अनंतनन्द, सुखानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद, भावानंद, पीपा, कबीर, सेन, धन्ना, रैदास, पद्मावती और सुरसुरी।
● भक्ति के प्रचार और प्रसार के लिए जिस सुद्रढ़ आधार की आवश्यकता थी वह शंकराचार्य के नेतृत्व में 8 शती में ही शुरू हो चुकी थी। परन्तु उसमें बड़ा परिवर्तन करके रामानुजाचार्य ने उसे वैष्णव सम्प्रदाय से जोड़ दिया। कालांतर में रामानंद ने उसे और भी सरल और व्यापक बनाकर सभी जातियो के लिए ग्राह्य बना दिया और एक तरह से वर्णव्यवस्था पर प्रहार किया। जिसका स्प्ष्ट संकेत हम निर्गुनपन्थ पर भी देख सकते हैं।
● ऐसा माना जाता है कि एक बार रामानंद शेख तकी के साथ वाद-विवाद कर रहे थे और शेख सिकन्दर लोदी के गुरु थे। शेख तकी के हारने या रामानंद के आगे कमजोर पड़ने के कारण उन्होंने सिकन्दर से कह कर उन्हें जंजीर से बंधवा करके नदी में फेंकवा दिया था। जिस पर धर्मदास कहते हैं:-
"साह सिकन्दर जल में बोरे, बहुरि अग्नि परजारे"....।
● "श्री रामार्चन पद्धति " में रामानंद ने अपनी पूरी गुरु परम्परा दी है।
(5) "वल्लभाचार्य" - यह रामानंद और रामानुजाचार्य की भाँति भक्ति को जांति पांति से मुक्त करके सामान्य जनता तक नहीं पहुँचाना चाहते थे, बल्कि समूहबद्ध करना चाहते थे।
15-16वीं शती में वैष्णव धर्म का जो आंदोलन देश के एक छोर से दूसरे छोर तक रहा उसके प्रवर्तक वल्लभाचार्य थे।
शंकराचार्य ने केवल निर्गुण ब्रह्म की सत्ता स्वीकार की थी। वल्लभ ने ब्रह्म में सब धर्म माने और उसकी अनुकृति के लिए लीला क्षेत्र खोल दिया।अर्थात भक्ति का क्षेत्र विस्तार किया।
• इन्होंने जीव के 3 रूप बताए हैं:-
1 मर्यादा जीव
2 पुष्टि जीव
3 प्रवाह जीव
वल्लभाचार्य ने श्रीकृष्ण की जन्मभूमि पर पूरनमल खत्री के साथ मिलकर मंदिर बनवाया।
वल्लभाचार्य के भक्तिमार्ग का नाम पुष्टिमार्ग था जिसका अर्थ होता है कि जबतक ईश्वर द्वारा भक्त पर अनुकंपा या कृपा नहीं कि जाएगी तब तक वह परम सत्य को प्राप्त नहीं कर पाएगा और अपने जीवन को मोहमाया से मुक्त नहीं कर पाएगा। इसके लिए सेवक को 84 अक्षरों का एक पुष्टिमन्त्र याद करना होता था। वह उसके ज्ञान की प्राप्ति में लाभदायक होता था।
इस मार्ग में भोग, विलास और राग का पूरा स्थान था।
(6) " राधाबल्लभ सम्प्रदाय" - इसके प्रवर्तक हित हरिवंश थे जिसमें कृष्ण के वाम भाग में एक गद्दी पर "श्रीराधा" नाम लिखकर राधा की स्तुति की जाती है। यहाँ राधा को कृष्ण से उच्च स्थान दिया गया है।
इसमें निकुंज लीला या नित्य विहार लीला का दर्शन होता है। वृंदावन में इसका मुख्य मंदिर है।
इसका एक अंग त्तसुखि शाखा
(7)" सखी सम्प्रदाय/टट्टी सम्प्रदाय:- इसके प्रवर्तक हरिदास निरंजनी हैं।
विजेंद्र स्नातक के अनुसार इस सम्प्रदाय को टट्टी सम्प्रदाय मिश्रबन्धुओ ने कहा था
● अन्य जानकारी :-
" शंकराचार्य कट्टर समर्थक वर्णाश्रम के
" रामानुजाचार्य समर्थक और विरोधी दोनों
" रामानंद विरोधी थे। शूद्रों को शिक्षा दी।
" वल्लभाचार्य वर्णाश्रम के विरोधी के साथ सभी को समूहबद्ध करना चाहते थे।
● अष्टछाप की स्थापना 1565 में वल्लभाचार्य के पुत्र विठलनाथ ने की थी। जिसमें अपने पिता के 4 शिष्यों, सूरदास, परमामनन्द दास, कुम्भनदास, व कृष्णदास के साथ अपने 4 शिष्यों नंददास, चतुर्भुजदास, छीत स्वामी और गोविंद स्वामी को जोड़कर इस मंडली की स्थापना की थी जो राधा-कृष्ण के पद बाँचा करती थी।
इस मंडली के सबसे श्रेष्ठ व बड़े कवि सूरदास थे और सबसे छोटे कवि नंददास थे।
● 3 मुख्य सम्प्रदाय -
श्री सम्प्रदाय - रामानुजाचार्य
ब्रह्म सम्प्रदाय - मध्वाचार्य
रुद्र सम्प्रदाय- विष्णु स्वामी
● भक्तिकाल का अंत :- एक परिचय
शुक्लानुसार "सगुणोपासक भक्त भगवान के सगुण और निर्गुण रूप को मानता है परंतु भक्ति के लिए सगुण रूप ही स्वीकारता है, निर्गुण मार्ग ज्ञानाश्रयी के लिए छोड़ देता है"..।
शुक्लानुसार "इस प्रकार देश में सगुण और निर्गुण के नाम से भक्तिकाव्य की 2 शाखाएँ विक्रम की 15वीं शती से चल रही थी। भक्ति के उत्थान काल के भीतर हिंदी भाषा की कुछ विस्तृत रचना पहले कबीर की ही मिलती है। आठ पहले निर्गुणमत के संतो का उल्लेख उचित ठहरता है"..।
श्यामसुंदर दास के अनुसार जिस युग में कबीर, जायसी, तुलसी, सूर जैसे रससिद्ध कवियों और महात्माओं की दिव्य वाणी उनके अंतः करणों से निकलकर देश के कोने-कोने में फैली थी। उस साहित्य के इतिहास को समग्रतः भक्तियुग कहते हैं। निश्चित ही वह हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग था"..।
हजारीप्रसाद जी के अनुसार " समस्त भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है। इसी का नाम भक्ति साहित्य है। यह एक नई दुनिया है"..।
रामविलास शर्मा के अनुसार " सगुणवादी भी सन्त है और निर्गुणवादी भी । जिस तरह से निर्गुणभक्त प्रगतिशील है उसी तरह से सगुणभक्त भी"..। आगे कहते हैं कि " वर्णाश्रम के समर्थक तुलसी भी उतने ही प्रगतिशील है जितने की वर्णाश्रम भंजक कबीर".।
बच्चन सिंह के अनुसार " जहाँ कबीर खुद को निर्गुण-सगुण से ऊपर मानते हुए कहते हैं " हम निर्गुण तुम सरगुण जाना".. वहीं तुलसी भी सगुनहिं-अगुनाही कछू नहीं भेदा"..। यह अभेद केवल ज्ञान का स्तर है"...।
बच्चन सिंह के अनुसार " सामाजिक दृष्टि से देखने पर कबीर आदि संतो और सूफियों के भक्ति आंदोलन को प्रतिवादात्मक और कृष्ण-रामभक्त आंदोलन को प्रतिरोधक या यथास्थितिवादात्मक आंदोलन कह सकते हैं"..। इसके सम्बन्ध में आगे कहते हैं कि " पहले आंदोलन का स्वर शोषित पीड़ित का स्वर है तो दूसरे का यथास्थितिवाद। पहले आंदोलन की सीमा उसका रहस्यवाद है तो दूसरे की ब्राह्मणवाद"..।
बच्चन सिंह के अनुसार " भक्त कवियों ने जीवन मे रस घोलने का काम किया और कुंद होती हुई संवेदना को नया जीवन दिया। उसमें नयी संस्कृति की निर्माणार्थ एक संघर्षरत प्रैक्सिस भी है जिसे सांस्कृतिक राजनीति से सम्बन्ध किया जा सकता है"..।
बच्चन सिंह के अनुसार " भक्ति साहित्य को अपभ्रंश और संस्कृत को छोड़कर नव्य आर्यभाषा का प्रयोग किया जो हिंदी जाति के गठन का मूल आधार है"..।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018