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Tuesday, April 27, 2021

रीतिकाल भाग - 4

 


●  रीतिकाल की प्रथम व अंतिम रचना:-

प्रथम रचना "रस विलास"- चिन्तामणि 

अंतिम रचना " रसरंग" ग्वाल कवि


● रीतिकाल के अन्य कवि:-


1. चिंतामणि :- शुक्लानुसार हिंदी रीतिग्रन्थकारो की शुरुआत चिंतामणि से होती है और इन्हीं को रीतिकाल का "प्रथम कवि" माना है।  इनके आश्रयदाता "मकरंदशाह" थे जोकि शिवाजी के पितामह थे। ये तिकवांपुर के रहने वाले थे। इन्होंने अपने कुछ गर्न्थो में अपना नाम "मणिमाला" रखा है।

2. मतिराम :-  शुक्लानुसार "मतिराम" की सबसे बड़ी विशेषता है कि "उसकी सरलता अत्यंत स्वाभाविक है, न तो उसमें भावों की कृत्रिमता है और न ही भाषा की"..। 

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार " मतिराम का काव्य मितकथन और प्रगल्भ का सन्धि -बिंदु है"...।

• बच्चन सिंह के अनुसार इस युग में 2 मतिराम थे। एक "रसराज" वाले और दूसरे "अलंकार पंचाशिका" वाले। इनका "ललित ललाम" अलंकार ग्रँथ है जिसमें 60 छंदों में राजप्रशस्ति का वर्णन है।

3. महाराज जसवंत सिंह :- शुक्लानुसार "जसवंत सिंह" ने अपने "भाषा भूषण" की रचना जयदेव के "चन्द्रलोक" के आधार पर की है परन्तु अलंकार को अनिवार्य नहीं माना है। 

• शुक्लानुसार "भाषाभूषण" की रचना आचार्य रूप में हुई है न कि कवि रूप में।

4. कुलपति मिश्र :-  शुक्लानुसार "कुलपति मिश्र" का "रस रहस्य" मम्मट के "काव्य प्रकाश का छायानुवाद" है। परन्तु इसमें भाषा और वाक्य के दुरूहता की कमी है। 

5.रसलीन :- इनका पूरा नाम सैयद गुलाम नवी था। इनकी मुख्य रचना "अंगदर्पण" में काव्य के अंगों का वर्णन है।

• शुक्लानुसार अंगदर्पण :- "इस छोटे से ग्रँथ को पढ़कर रस का विषय जानने के लिए और ग्रँथ पढ़ने की आवश्यकता नहीं"..।

6.  भिखारीदास :- इन्होंने अपना "काव्यनिर्णय" में सोमवंश के पृथ्वीसिंह के भाई "हिंदुपति सिंह" को अपना आश्रयदाता बनाया है। यह अलंकार ग्रँथ है।

• शुक्लानुसार "यह काव्यांग निरूपण के सर्वप्रधान कवि थे। जिन्होंने छंद, अलंकार, रस, रीति, गुण, दोष आदि सब पर विचार किया है, परन्तु इनके लक्षण कुछ गड़बड़ है और कहीं कहीं अपर्याप्त भी"...।

शुक्लानुसार आचार्यत्व के सम्बंध में यह भी देव के समान ही हैं परन्तु इन्हें सच्चा आचार्य नहीं माना जा सकता।

• "रस सारांश" इन्होंने देव के जातिविलास के समकक्ष लिखी है, जिसमें नाइन, धोबी, कुम्हारिन आदि का वर्णन है। 

• रीतिकाल में नितांत जड़वादी काव्य-परम्परा चलने पर उस युग के काव्य-सौंदर्य में खलल पड़ती है जिसे ध्यान में रखते हुए बच्चन सिंह कहते हैं :- यदि भिखारीदास की परंपरा चली होती तो हिंदी का अपना काव्यशास्त्र बन गया होता"...।

7.  सुखदेव मिश्र :- इनके "अध्यात्म प्रकाश" में ब्रह्मज्ञान की बाते कहीं हैं। राजा "राजसिंह" ने इन्हें कविराज की उपाधि दी थी।

8.  सुरति मिश्र:- इन्होंने बिहारी सतसई, रसिकप्रिया और कविप्रिया की टीका लिखी है।

9. प्रतापसाहि :- इनकी "व्यंग्यार्थ कौमुदी" व्यंजना के उदाहरण के संग्रह है। इनके आश्रयदाता चरखारी के "विक्रमसाहि" थे। 

• शुक्ल जी ने इन्हें आचार्य मानते हुए कहा है " यदि हम आचार्यत्व की दृष्टि से देखे तो यह मतिराम, श्रीपति और दास से कुछ 20 ही बैठते हैं"..।

शुक्लानुसार "पद्माकर की अनुप्रासयोजना रुचिकर सीमा से बाहर जा सकती है परन्तु इनकी नहीं"..।

"सीख सिखाई न मानती है, बस ही बस सखिन के आवे" पँक्ति को शुक्ल ने ध्वनि और व्यंग्यार्थ के रूप में देखा है जिसका विरोध करते हुए बच्चन सिंह इसे नायक-नायिका भेद बताते हैं।

10.  ब्रजवासी दास:- यह वल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी थे। इन्होंने तुलसी के मानस के अनुकरण में दोहों-चौपाइयों में "ब्रज विलास" की रचना की है। जिसकी कथा सूरसागर के ग्रँथ से ली गयी है जिसमें सूर के कई पद सीधे-सीधे उठा लिए गए हैं।

इसमें कृष्ण के जन्म से लेकर मथुरागमन तक का वर्णन है।

11.  सूदन :- इन्होंने सूरत, भरतपुर के राजा "सुजान सिंह"         (सूरजमल) पर पराक्रम चरित को दिखाते हुए "सुजानचरित" लिखा था। इस ग्रँथ में 1745 से लेकर 1753 ई. तक का वर्णन है। यह कथा काल्पनिक न होकर ऐतिहासिक है।

12. बेनी बंदीजन :- इनका "टिकतराय प्रकाश" महाराज टिकतराय के आश्रय में रहकर लिखा गया था।

इन्होंने भंडौवो का इस्तेमाल करके इस नाम से एक संग्रह निकाला था। इस तरह की रचना हास्य/व्यंग्य के लिए लिखी जाती है। फ़ारसी में इस तरह की रचना "हजो" और अंग्रेजी में "सटायर" कही जाती है।

13. लाल कवि :- इन्होंने महाराज छत्रसाल की आज्ञा से उनकी जीवनी "छत्रप्रकाश" नाम से लिखी थी। यह "नागरीप्रचारिणी सभा" से प्रकाशित हुआ है।

14. दूलह :- इनका "कविकुल कंठाभरण" अलंकार ग्रँथ।

एक कवि ने इनपर प्रसन्न होकर यहाँ तक कह दिया था कि " और बराती सकल कवि, दूलह दूलहराय"..।

15. आलम :-  इनके आश्रयदाता का नाम औरंगजेब के पुत्र "मुजमशाह " था। आलम नाम से 2 कवि हुए हैं। एक "माधवानल कामकन्दला" वाले तो दूसरे "आलमकेलि" वाले परन्तु आगे चलकर भक्तिकालीन और रीतिकालीन आलम में अंतर स्पष्ट हो गया था। 

ये "शेख" नाम की रँगरेजिन पर फ़िदा थे जिनके कारण ये आगे चलकर मुसलमान हो गए थे और इनसे निकाह भी कर लिया था। बाद में उनके चक्कर में फंस कर मुसलमान हुए और विवाह किया। इनके पुत्र का नाम "जहान" था।

• बच्चन सिंह ने आलम का पूरा नाम "आलमशेख" बताया है और रँगरेजिन का अन्य नाम बताया है।

आलम ने एक बार रँगरेजिन को एक पगड़ी रँगने को दी जिसकी खूट में एक काग़ज रह गया जिसमें लिखा था कि  :-

"कनक छरी सी कामिनी काहे को कटी छीन"

वापस में रँगरेजिन का ये जवाब आया कि :-

"कटि को कंचन काटि बिधि कुचन मध्य धरि दीन।

16.  बोधा :- ये "सुभान" नामक वैश्य पर मरते थे। सुभान के 6 महीने वियोग से ये पूरी तरह से टूट चुके थे और उसी की प्रतिक्रिया में "विरहवारिश" नामक ग्रन्थ की रचना की। 

जब ये 6 महीने बाद लौटकर आये तो अपने "आश्रयदाता पन्ना सिंह" को इस ग्रँथ के पद सुनाकर उनके खुश होने से इन्हें अपनी प्रेमिका मिल गयी थी।

17.  ठाकुर :- ये बुंदेलखंड वाले जाति के कायस्थ थे। इनकी कभी कभी पद्माकर से नोक झोंक हो जाया करती थी।

एक बार पद्माकर बोले :"ठाकुर कविता तो अच्छी करते हो पर पद कुछ हल्के पड़ते हैं। जिस पर ठाकुर कहने लगे कि " तभी तो हमारी कविता उड़ी उड़ी सी लगती है "...।

रीतिकालीन कवियों में यह कमी थी कि वह सच्चे कवि न होकर केवल बने बनाये उदाहरण को लेकर कुछ-कुछ बक दिया करते थे और उनकी कविताएँ ढेले फेंकने सी प्रतीत होती थी। इसी भाव को लक्षित करते हुए ठाकुर कहते हैं :-

"डेल बनाए आय मेलत सभा के बीच

लोगन कवित्त कीबो खेल करि जानो है'..।


• एक बार हिम्मतबहादुर से नोक झोंक होने पर इन्होंने अपनी तलवार निकाल ली थी और कहा था कि :-


"सेवक सिपाही हम उन राजपूतन के

दान युद्ध जुरिबे में, नेकु जे न मुरके"...।


जिसपर हिम्मत बहादुर ने कहा कि हम आपको जाँच रहे थे कि आप सचमुच के वीर हैं या बस ऐसे ही।

                               

• शुक्लानुसार "ठाकुर ठसक" लाला भगवान दीन ने लिखी थी, और बच्चन सिंह के अनुसार लाला जी ने इसका सम्पादन किया था।

• बच्चन सिंह के अनुसार "ठाकुर की भाषा तो बोलचाल के निकट आ गयी थी"..।

18.  जिस प्रकार लक्षण ग्रँथ लिखने वाले अंतिम कवि पद्माकर है उसी प्रकार समूची श्रृंगार परम्परा के अंतिम कवि "द्विजदेव" थे।  

19. बच्चन सिंह के अनुसार "ग्वाल" अंतिम शास्त्र कवि हैं।

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

Friday, April 23, 2021

रीतिकाल भाग - 3

   

                             (भूषण)

● ये चित्रकूट के राजा "सोलंकी" के आश्रय में रहते थे और इन्होंने ही "कविराज भूषण" की उपाधि दी थी। यह वीर रस के कवि थे। ऐसा माना जाता है कि एक बार महाराज "छत्रसाल" ने इनकी पालकी में कंधा लगाया था जिसपर यह कहते हैं कि  :-  "सिवा को बखानो कि बखानो छत्रसाल को"....।

• "शुक्लानुसार" शिवराज भूषण, शिवाबावनी, और छत्रसाल दशक केवल आश्रयदाता की प्रशंसा ही नही करता बल्कि "हिन्दू जाति के गौरव की भी रक्षा" भी करता है। इसलिए शुक्ल इन्हें "हिन्दू जाति का प्रतिनिधि कवि" कहते हैं।

"शुक्लानुसार" शिवराज भूषण अच्छा अलंकार ग्रँथ नहीं है।

"शुक्लानुसार" भूषण की "भाविक छवि" रचना, एक नए अलंकार के रूप में दिखती है। "भाविक" का सम्बन्ध समय/काल से होता है तो "भाविक छवि" का स्थान/देश से..।

"शुक्लानुसार" अलंकार के सम्बंध में "भूषण का उदाहरण सबसे गड़बड़ है"...।

• "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार इनकी वीररस की कविताएँ आदिकाल के वीरगाथा की याद दिला देती है।

• "गणपतिचन्द गुप्त" ने इनका मूल नाम "मनीराम या पतिराम" माना है। 

• "विश्वनाथप्रसाद मिश्र" ने इनका मूल नाम "घनश्याम" माना है।


                                (देव)

● ये इटावा के रहने  वाले थे और इनका पूरा नाम "देवदत्त" था। 

शुक्लानुसार देव ने अपने ग्रँथों के लिए सबकुछ संस्कृत की "रस तरंगिणी" से उठा लिया है। इसके आगे वह कहते हैं कि "रीतिकाल में सबसे अधिक ग्रँथ लिखने वाले भी यही हैं"...।

शुक्लानुसार ये आचार्य और कवि दोनों रूप में हैं।

"भावविलास" की रचना इन्होंने 16 की उम्र में कर दी थी। इस रचना को औरंगजेब के पुत्र को सुनाया था जो कविता के प्रेमी थे।

• बच्चन सिंह के अनुसार "बद्धरीति में देव सबसे अधिक प्रतिभाशाली और व्युत्पत्ति युक्त कवि थे"..।

"बच्चन सिंह" के अनुसार देव रीतिग्रन्थकार के साथ ही एक मुक्तप्रेमी भी थे। इसी को लक्ष्य करते हुए वह कहते हैं :- "उनमें एक फकीराना मिजाज भी था जो उन्हें भोग के प्रति उदास बना देता है"..।

"बच्चन सिंह" ने देव को रीतिबद्ध और रीतिमुक्त का "मध्यकवि" माना है। 

"बच्चन सिंह" के अनुसार "देव शास्त्र में केशव की तरह क्लासिक और काव्य में घनानंद की तरह स्वछंद"..।

"भवानी विलास" भावानीदत्त वैश्य के नाम पर लिखी गई है। 

"कुशल विलास" कुशलसिंह के नाम पर और "जातिविलास" अनेक जातियों की स्त्रियों से सम्बंधित लिखी है। 

"सुखसागर तरंग" कवित्तों का संग्रह है।


●अभिधा, लक्षणा शब्दशक्ति पर निरूपण करते हुए कहते हैं :-  

 "अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लक्षिणा हीन

 अधम व्यंजना रस विरस, उलट कहत प्रवीन


                          (पद्माकर)

● इन्हें जयपुर के नरेश "प्रतापसिंह" के यहाँ "कविराज शिरोमणि" की उपाधि मिली थी। 

• पद्माकर के काव्य में मधुर कल्पना को देखकर शुक्ल ने इनकी तुलना बिहारी से करते हुए कहा है "ऐसा सर्वप्रिय कवि इस काल के भीतर बिहारी को छोड़ कर कोई दूसरा नही हुआ".....।

इन्होंने ने अपना "जगद्वविनोद" महाराज प्रतापसिंह के पुत्र जगतसिंह के नाम पर और "हिम्मत बहादुर विरुदावली" हिम्मत बहादुर से सम्बंधित लिखा है ।

"प्रबोध पचास" भक्ति और विराग का ग्रँथ है।

"गंगालहरी" की रचना कानपुर में की थी

                                                                

                          (घनानन्द)

● ये जाति के कायस्थ थे। घनानंद रीतिमुक्त काव्यधारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। एकबार नादिरशाह के कहने पर घनानंद ने कविता न सुनाकर अपनी प्रेमिका के कहने पर सुना दी थी तब नादिरशाह खुश भी हुए और नाराज भी। इसी पर नादिरशाह ने घनानंद को राज्य से बाहर निकाल देने का आदेश दिया था। इस पर अपनी प्रेमिका "सुजान" नामक वैश्य के साथ न आने पर घनानंद वियोग के कारण "निम्बार्क सम्प्रदाय" में चले गए थे।

एक बार नादिरशाह के सिपाही इनसे कुछ माल लूटने आये थे और जब सिपाहियों द्वारा माल माँगा तो इन्होंने 3 बार अपने हाथ से उनपर धूल लेकर उन पर फेंक दिया था। जिस पर गुस्सा होकर उन सैनिकों ने इनका हाथ ही काट डाला। कहते हैं कि मरते समय घनानन्द ने यह कविता अपने रक्त से लिखी थी :-

"बहुत दिनांन की अवधि आसपास परे

खरे अरबरन भरे हैं उठि जान को।


इन्होंने अपनी कविताओं में लगातार अपनी प्रेमिका "सुजान" को कृष्ण के प्रतीक रूप में याद किया है। साथ ही प्रेम के संयोग और वियोग दोनों रूपों को दिखाया है परन्तु इनका मन वियोग में ज्यादा रमा है।  इस विशेषता को देखते हुए शुक्ल जी कहते हैं :-

" घनानंद ने न तो बिहारी की तरह विरहताप को बाहरी मापा है, न बाहरी उछलकूद दिखाई है"..। 

घनानंदजी उन विरल कवियों में है जो भाषा की व्यंजकता बढाते हैं। इसी पर शुक्ल कहते हैं :-

" अपनी भावनाओं के अनूठे रूपरंग की व्यंजना के लिए भाषा का ऐसा बेधडक प्रयोग करनेवाला हिंदी के पुराने कवियों में दूसरा नहीं हुआ"..।

शुक्लानुसार " प्रेममार्ग का ऐसा जबाँदानी रखने वाला ब्रजभाषा का और कोई कवि नही हुआ"....।

एक अन्य स्थान पर शुक्ल कहते हैं " इनकी सी विशुद्ध, सरस और शक्तिशाली ब्रजभाषा लिखने वाला हिंदी में और कोई नहीं हुआ"..।

              

"विरहलीला" रचना ब्रज भाषा में पर फारसी लिपि में लिखी है।

• विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने "घनानंद ग्रन्थावली" का सम्पादन किया है।

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

Tuesday, April 20, 2021

रीतिकाल भाग - 2

 

                            (केशव )


● ये ओरछा नरेश रामसिंह के भाई "इंद्रजीत" के आश्रय में रहते थे। इन्होंने काव्य के सब अंगों का निरूपण शास्त्रीय पद्धति पर किया है। इसी पर शुक्ल कहते हैं " इसमें संदेह नहीं कि काव्यरीति का सम्यक समावेश पहले-पहल केशव ने ही किया"..।


" वेणीमाधव दास के "मूलगोसांई चरित" के अनुसार जब केशव तुलसी से मिलने गए तो तुलसी ने केशव को "प्राकृत-कवि"  कह दिया था । जिसका उत्तर देने के लिए केशव ने 1 ही रात में रामचन्द्रिका की रचना कर दी। इसी कारण उनकी रामचन्द्रिका व कवि के लिए "हृदयहीन" कहा जाता है।    

• बच्चन सिंह के अनुसार "भाषा की कमी भी इसी जल्दबाज़ी का ही परिणाम है"..।

• शुक्लानुसार इनके काव्यशास्त्र सम्बन्धी मतों और उनके प्रयोगों के कारण पहली बार हिंदी में संस्कृत साहित्य की एक संक्षिप्त उद्धरणी हुई। इन्होंने पाठकों को काव्यनिरूपण की उस पूर्वदशा का वर्णन कराया जो भामह और उदभट के समय थी। उसका नहीं जो आंनदवर्धन, मम्मट, विश्वनाथ के समय चल रही थी।

● केशव को शुक्ल जी ने, काव्य में अलंकारों का प्रधान स्थान समझते हुए "चमत्कारवादी कवि" या "अलंकारवादी" कहा है।

● केशव की रचनाएँ :-

अलंकार के लिए "कविप्रिया" रची

रस के लिए "रसिकप्रिया" रची


● केशव ने रूपक के 3 भेद दण्डी से लिये हैं :-

1. अद्भुत रूपक   

2. विरुद्ध रूपक   

3. रूपक रूपक

● शुक्लानुसार केशव पर कहे गए कथन:-

1. " केशव को कवि हृदय नहीं मिला था । एक कवि में जो सहृदयता और भावुकता होनी चाहिए वो इनमें नहीं थी".....।

2. " केशव उक्तिवैचित्रय और शब्दक्रीड़ा के कवि थे, जीवन के नाना गम्भीर और मार्मिक प्रसंगों का उन्हें अनुभव नही था"...।

3. " दृश्यों की स्थानगत विशेषता केशव की रचनाओं में ढूँढना व्यर्थ ही है"...।

• काव्य में क्लिष्टता के कारण इन्हें "कठिन काव्य का प्रेत" कहा जाता है। 

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "कवि ने रामचन्द्रिका में छन्द-वैविध्य के लिए जितना यत्न किया है उससे भाषा उतनी ही उपेक्षित हुई है"...।

● बच्चन सिंह के अनुसार "रामचन्द्रिका में प्रबन्ध के सारे तत्व मौजूद हैं, परन्तु आंतरिक तत्व टूटा हुआ है"...।

• रामचन्द्रिका पर "हनुमन्न नाटक" और "प्रसन्नराघव" का प्रभाव पड़ा है।

        

                           (बिहारी)

● यह महाराज "जयसिंह" के दरबारी कवि थे। एक बार जब महाराज अपनी छोटी रानी के साथ प्रेम में लीन थे तब वह राजकाज देखने के लिए महल से बाहर ही नहीं निकलते थे जिस पर बिहारी ने यह दोहा कहा था :-

"नहि पराग नहि मधुर मधु, नहि विकास यहि काल

अली कली ही सों बंध्यो, आगे कौन हवाल"...।


इस दोहे के बाद महाराज ने इन्हें बहुत मान दिया और हर दोहे पर अशर्फियाँ देने लगे।

● शुक्लानुसार बिहारी सतसई पर आज तक जितनी भी टीकाएँ लिखी गई हैं उनमें से सबसे प्रभावी और सरस टीका "प.जगन्नाथ" ने लिखी है।

• बिहारी सतसई पर "आर्या सप्तशती" और "गाथा सप्तशती" का प्रभाव है। परन्तु सतसई को पदम् सिंह शर्मा ने विस्तार दिया है। जिस पर शुक्ल कहते हैं " बिहारी ने गृहीत भावों को अपनी प्रतिभा के बल से किस प्रकार एक स्वतंत्र और कहीं-कहीं अधिक सुंदर रूप दे दिया है...।

● बच्चन सिंह ने "बिहारी" को रीतिग्रन्थकारो में रखने पर शुक्ल का खंडन करते हुए उन्हें मुक्तकों का प्रयोक्ता कहा है और रीतिग्रन्थकारों में उनकी गणना को अवैज्ञानिक बताया है।

इसके आगे सिंह जी कहते हैं कि शुक्लानुसार बिहारी के दोहों को देखकर उन्हें "हाँथीदांत पर कढ़े बैलबुटे" कह देना गलत है क्योंकि बैलबुटे हस्तकौशल है और हस्तकौशल कला नहीं होती। हस्तकौशल में हाथ की सफाई होती है, जबकि सतसई रचनात्मक कृति है"..।

● बिहारी पर शुक्लानुसार कहे गए कथन :-

1. "श्रृंगार रस के गर्न्थो में जितनी ख्याति इन्हें मिली है वह और किसी को नही। इनका एक-एक दोहा हिंदी साहित्य में रतन के समान है".....।

2. "मुक्तक कविता ने जो गुण होना चाहिए वह इनके दोहों में चरम पर पहुँचा है".....।

3. "यदि प्रबन्ध एक वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है"....।

4. "जिस कवि में कविता की समाहार शक्ति जितनी होगी वह मुक्तक में उतना ही सफल होगा"....।

5. "बिहारी की भाषा चलती होने पर भी साहित्यिक है"...।

6. बिहारी के दोहों-पदों में फ़ारसी शब्दो के प्रयोग पर शुक्ल कहते हैं " बिहारी जैसे उत्कृष्ट कवि भी फ़ारसी भावों से नहीं बच सके पर उन्होंने उन फ़ारसी भावों को अपनी देसी साँचे में ढाल लिया जिससे वह खटकते क्या लक्ष्य भी नही होते"..।

7. बच्चन सिंह के अनुसार बिहारी इस युग के प्रतिनिधि कवि थे।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018                                          

Monday, April 12, 2021

रीतिकाल भाग - 1


● नामकरण व समय सीमा:-

उत्तरमध्यकाल (रीतिकाल) :- शुक्ल 1700 -1900 सं

श्रृंगार काल - विश्वनाथप्रसाद मिश्र

अलंकृत काल - मिश्र बन्धु

रीतिकाल- बच्चन सिंह

रीतिकाव्य - जॉर्ज ग्रियर्सन

कलाकाल - रमाशंकर शुक्ल "रसाल"

 

● रीतिकाल का प्रथम कवि:-

शुक्ल - चिंतामणि

नगेंद - केशव


● रीतिकाल का आगमन :- 

1. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार "रीतिकाव्य का विवेचन" नगेन्द्र ने "ग्राहस्थिक" रूप में माना है।   

2. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार रीतिकाल की विशेषता "ऐहिकता" है। रीतिकाल में कवि ने "मनुष्य और ईश्वर" को मनुष्य रूप में ही चित्रित किया है। 

चतुर्वेदी जी को प्रतीत होता है कि भक्तिकाल और रीतिकाल के बीच जो अंतर है उसे भिखारीदास स्पष्ट करते हैं :-

"आगे के कवि रीझिहें तो कविताई न तौ

राधिका-कन्हाई सुमिरन को बहानो है"

3. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार रीतिकाल में  राधा- कृष्ण अपने वास्तविक रूप से हटकर दांपत्य और रूप-सौंदर्य की श्रेणी से आ जुड़े थे। प्रेम- भक्ति की संपृक्त अनुभूति से भक्ति क्रमशः क्षीण पड़ती जा रही थी और श्रृंगार का रूप केंद्र में आता जा रहा था। भक्तिकाल के " रीतिकाल" में रूपांतरण की यही प्रक्रिया थी....। अर्थात भक्ति का स्वरूप बदलकर अब रिश्ते (दाम्पत्य/प्रेम) और रूप- सौन्दर्य की डोर से आ जुड़ा था।

4. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार :- " भाषा के स्तर पर रीतिकाल का कवि या तो पूरी तरह सफल हुआ है या केवल एक कलाबाज़ बनकर रह गया है"...।

● बचन्न सिंह के अनुसार :- 

1. भक्तिकाल के अंतिम दिनों में प्रगतिशील पक्ष बहुत कुछ क्षरित हो गया था।

2. मधुरोपासक कृष्ण भक्तों ने अपनी सीमा को संकीर्ण करके राधाकृष्ण को कुंज-क्रीड़ा तक सीमित कर दिया था।

3. वृंदावन से गोस्वामियों ने परकीया प्रेमशास्त्र पर मुहर लगा दी थी।

4. मर्यादावादी रामोपासक के रसिक सम्प्रदाय ने मर्यादा का महल ढहा दिया था।


● "नगेंद" ने रीतिबद्ध वर्ग को आचार्य कवि और काव्य-कवि 2 वर्गों में विभाजित किया है।

"बचन्न सिंह" द्वारा रीतिकाल ने रीतिबद्ध, रीतिमुक्त को अवैज्ञानिक बताते हुए कहा है कि आलम, ठाकुर, बोधा आदि रीतिमुक्त कवि भी रीति से बंधे थे। केवल उन्होंने छंद के रूप में मुक्तक को चुना। इस बात की पुष्टि के लिए वह छंदमुक्त और मुक्तछंद वाला तर्क देते हैं।

● लक्षण ग्रँथ :- जहाँ काव्यशात्रीय परम्परा के तहत किसी नियम-सिद्धान्त-काव्यांग आदि में बन्ध कर उसके लक्षणों को सिद्ध किया जाए या विवेचित किया जाए।

● लक्ष्य ग्रँथ:- अपने किसी आश्रयदाता, गुरु, परिजन, मित्रादि पर ग्रँथ लिखना। 


● रीतिकाल में काव्यशात्रीय परम्परा की शुरुआत:-

1. "शुक्लानुसार" रीति निरूपण की शुरुआत "करनेस" के श्रुतिभूषण, भूपभूषण और करुणाभरण से तथा "मोहनलाल मिश्र" के श्रृंगार सागर से होती है।

2. "नगेंद्र" के अनुसार रीतिनिरूपण की शुरुआत "कृपारम" के हिततरंगिणी से होती है।

3. परन्तु शुक्लानुसार "केशव" ने ही सबसे पहले काव्यरीति का सम्यक समावेश किया। 

आगे चलकर वह पुनः लिखते हैं :- पर हिंदी में रीतिग्रन्थों की अविरल और अखंडित परम्परा का प्रवाह केशव की कविप्रिया के 50 वर्ष बाद चला पर एक भिन्न आदर्श को लेकर, केशव के आदेश को लेकर नहीं"..। 

इस मत का विरोध करते हुए "नगेन्द्र" कहते हैं कि " उस युग के प्रवर्तक केशव ही हैं। चिंतामणि को यह अधिकार देना अन्याय है क्योंकि यह केवल संयोग था कि उनके उपरांत रीतिकाव्य की धारा अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित हुई"..।

4. "जगदीश गुप्त" भी शुक्ल का विरोध करते हुए केशव को रीतिकाल का प्रवर्तक मानते हैं।

इन सब मतों को देखने के बाद "बच्चन सिंह" का मत है कि" रुई न सूत जोहलन से मटकअल "..। यदि शुक्ल जी को ध्यान से समझा जाता तो विद्वानों को यूँ हवा में मुक्का मारने की आवश्यकता नहीं होती।

शुक्ल का समर्थन करते हुए बच्चन सिंह कहते हैं:- "शुक्ल की दृष्टि काव्यशात्रीय विकास परम्परा पर थी न कि प्रवर्तक पर"..। प्रवर्तक धर्म,दर्शन, के क्षेत्र में होते हैं। इस आधार पर चिंतामणि से ही रीतिकाव्य परम्परा का आरंभ मानना चाहिए।

"बच्चन सिंह" के अनुसार "रीतिकालीन काव्यशात्रीय परम्परा पर भानुदत्त की रसमंजरी रीतिकवियो के लिए एक "मॉडल" बन गयी थी"...।


● रीतिकालीन कवि/आचार्यो पर कहे गए शुक्ल के कथन:-

1. आचार्यत्व के लिए जिस सूक्ष्म विवेचन या पर्यालोचन शक्ति की अपेक्षा होती है उसका विकास नहीं हुआ था।

2. हिंदी में लक्षणग्रँथ की परिपाटी पर रचना करने वाले जो सैकड़ो कवि हुए वह आचार्य की कोटि में नहीं आ सकते। वास्तव में वह केवल कवि भर थे।

3. अपनी ओर से उन्होंने न तो अलंकार क्षेत्र में कोई मौलिक कार्य किया और न रस क्षेत्र में।

4. इन रीतिग्रन्थकारों के कर्ता भावुक, सहृदय और निपुण कवि थे। उनका उद्देश्य कविता करना था, काव्यांग निरूपण नहीं।

5. उनके बड़े भारी काम से यह जरूर हुआ कि रसों और अलंकारों के बहुत सरस और हृदयग्राही उदाहरण अत्यंत प्रचुर परिणाम में प्रस्तुत हुए।

6. जिस रस को उन्होंने लिया उसका पूरा आवेश उनमें था, पर भाषा उनकी अनेक स्थलों पर सदोष है। इसका कारण ब्रज और अवधी दोनों प्रकार के कवियों का अपनी इच्छानुसार मिश्रण करना है।

7. रीतिकालीन कवियों के द्वारा अरबी-फारसी शब्दो का कम इस्तेमाल करने पर उनकी प्रशंसा करते हुए शुक्ल कहते हैं " अपनी भाषा की सरसता का ध्यान रखने वाले उत्कृष्ट कवियों ने ऐसे शब्दों को बहुत ही कम स्थान दिया"...।

8. रीतिकाल के सम्बंध में शुक्ल एक बात कहते हैं कि" इस युग में एक बड़े भारी अभाव की पूर्ति हो जानी चाहिए थी, पर वह नहीं हुई"..।

9. रीतिकाल के कवियों का प्रिय छंद "कवित" और "सवैये" है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018             

Thursday, April 1, 2021

भक्तिकाल भाग : 14

 

भक्तिकाल के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य, सम्प्रदाय व भक्तिकाल : एक अंत


● कृष्णकाव्य के अन्य कवि:-

1. बच्चन सिंह के अनुसार परमानन्ददास का "परमानंद सागर" सूरसागर की पद्धति पर लिखा है।

2. नरोत्तम स्वामी"- इनका "सुदामाचरित" ग्रन्थ बहुत प्रसिद्ध है। जिसमे दरिद्रता को दिखाया गया है।

सुदामाचरित की ये पंक्ति बहुत ही प्रसिद्ध है :-  

" सीस पगा न झगा तन पे प्रभु, 

जाने को एहि बसे केहि ग्रामा।

धोती फ़टी सी, लटी दुपटी अरु

पाय उपानह को नही समाना।    (दरिद्रता का चित्र)

• इन्होंने एक अन्य ग्रन्थ " ध्रुवचरित" खण्डकाव्य भी लिखा है।

 3. हितहरिवंश के राधा वल्लभ सम्प्रदाय में राधाकृष्ण का नित्यविहार दर्शन हुआ है। 

नित्य विहार के 4 तत्व हैं- कृष्ण, राधा, सहचरी, वृंदावन। 

• हितहरिवंश की रचना "हित चौरासी" में 84 पद हैं जिसकी टीका "प्रेमदास" ने लिखी थी।

4. भक्ति काल में न केवल कवि ही रचनाये या पंक्तियाँ लिखते बल्कि उनके आश्रयदाता और शासको ने भी लिखा है। कुछ इसी तरह से अकबर की एक प्रसिद्ध वक्ती यहाँ स्मरण आती है :-

"जाको जस है जगत में जगत सराहे जाहि

ताको जीवन सफल है, कहत अकबर साहि...।

5. गंग कवि  :- ये अकबर के दरबारी कवि थे। ऐसा कहा जाता है कि किसी राजा या नवाब के आदेश से इन्हें हाथी से चिरवा डाला था। और उसी समय मरने पर इन्होंने ने ये पंक्ति कहि थी :-

"कबहुँ न भडुआ रन चढ़े, कबहुँ न बाजे बम्ब

सकल सभाहि प्रणाम करि,बिदा होत कवि गंग।

कहते हैं कि एक बार रहीम ने इन्हें इनके 1छपय्य के लिए 36 लाख रुपये दे दिए थे। वह छपय्य ये था:-

"चकित भँवर रहि गयो गमन, नहि करत कमलवन

अहि फन मनि नहिं लेत,तेज नहिं बहुत पवन घन।

6. होलराय :-  इन्होंने अकबर से कुछ जमीन पाकर अपना होलपुर नगर बसाया था। तुलसीजी ने अपना लोटा इन्हें दिया था जिस पर इन्होने कहा था :

"लोटा तुलसीदास का लाख टके को मोल....।

जिसपर चट तुलसी उत्तर देते हैं:-

"मोल तोल कुछ है नही, लेउ राय कवि होल...। 

7. पुहकर कवि  :- ऐसा माना जाता है कि एक बार जहाँगीर ने इन्हें कैद करके जेलखाने में डाल दिया था। तब वही रहते हुए इन्होंने "रसरत्न " नामक ग्रन्थ की रचना कर दी थी जिससे प्रसन्न होकर जहाँगीर ने इन्हें मुक्त कर दिया था।


●भक्तिकाल के मुख्य सम्प्रदाय और उनके प्रवर्तक:-

(1) "शंकराचार्य" - इनका जन्म 8वी शती केरल में हुआ था। यह निर्गुण ब्रह्म को मानते थे। इनका सिद्धान्त "अद्वेतवाद" पर टिका था जहाँ ईश्वर सभी गुणों रूपों से ऊपर है। 

(2) "रामानुजाचार्य" - इनका जन्म 11वी शती कांचीपुरम में हुआ था। इनके गुरु का नाम कांचीचूर्ण था जोकि जाति के शुद्र थे । यह सगुण ब्रह्म में विश्वास करते थे। इनका मत "विशिष्टतावाद" पर टिका था, जहाँ ईश्वर को विशेष रूप में देखा गया है।

• " शंकराचार्य के अद्वेतवाद का विरोध रामानुजाचार्य ने किया और कहा कि "जीवन और जगत अलग अलग संस्था है , यथार्थ है"..।

इनके सम्प्रदाय का नाम "श्री सम्प्रदाय" था जिसके आदिगुरु "रंगनाथ मुनि" थे। इन्हें रामभक्ति का प्रवर्तक माना जाता है। इन्हें लक्ष्मण या शेषनाग का रूप भी माना जाता है।


"तत्वमसि" का सूत्र इन्हीं (रामानुजाचार्य) ने दिया था जिसका अर्थ है कि "तू उसका सेवक है"..।

(3) निम्बार्काचार्य - इनका सम्प्रदाय कृष्णभक्ति से जुड़ा था। इस सम्प्रदाय को द्वैतवाद कहा जाता है। 

विजेन्द्र स्नातक के अनुसार ये मैसूर के निम्बापुर गाँव में पैदा हुए थे। वैसे इनका मूल नाम नियमानन्द है। निम्बार्क नाम पड़ने के पीछे जो कथा है उसमें इनका किसी महाराज के साथ शास्त्रार्थ होने में इतना लीन होना की रात्रि का पता न चलना और बिना आहार के ही रह जाना था । जब इनके आहार करने के लिए पुनः सूर्य की किरणें उदय हुई और इन्होंने आहार किया। तभी से निम्बार्क नाम पड़ा अर्थात नीम के पेड़ पर सूर्य के दर्शन करानेवाला।

निम्बार्क बहुत ही सुंदर थे जिसके कारण इन्हें सुदर्शन के साथ कृष्ण का अवतार भी कहा जाता है।

• विजेन्द्र स्नातक के अनुसार इस सम्प्रदाय की सबसे बड़ी मूर्ति राजस्थान सलेमाबाद में है।

परशुराम देव जी को इस सम्प्रदाय के प्रचार का श्रेय है।

(4) "रामानन्द" - बच्चन सिंह के अनुसार निर्गुण भक्त कवियों में रामानंद का नाम विशेष रूप से लिया जाता था। परंतु रामभक्ति शाखा में नाभादास के अतिरिक्त किसी ने भी इन्हें याद नहीं किया। इनके सम्प्रदाय का नाम रामानंद सम्प्रदाय या वैरागी सम्प्रदाय था जहाँ राम को केंद्र में रखकर व विशेष रूप में देखा है।

इनके गुरु का नाम राघवानंद था। इनके एक अन्य शिष्य सेन भगत भी थे जिनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी आराधना से ईश्वर को नाई का रूप धरने के लिए मना लिया था।

• शुक्लानुसार रामानंद ने विष्णु के अनेक रूपों में से राम को आराध्य बनाकर समाज के सामने प्रस्तुत किया। इनका वर्णव्यवस्था सम्बन्धी मत महाभारत, पुराणों पर आधारित है।

शुक्लानुसार रामानंद वर्णाश्रम व्यवस्था का विरोध भक्ति के लिये करते हैं,  परन्तु कर्मयोजना के लिए आवश्यक मानते हैं।

रामानंद की शिष्य परम्परा में 2 विरोधी भक्तिधारा के कवि हैं- तुलसी और कबीर। इसी विशेषता के आधार पर हजारीप्रसाद जी रामानंद को आकाशधर्मी गुरु व मध्ययुग की समग्र चिंता के गुरु मानते हैं।


• रामानंद ने कबीर के लिए कहा :-

" कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रमी पर दर्शनी"..।

• मीरा के लिए कहा :-

"निरंकुश अति निडर रसिक जस रसना गायों"..। 


● रामानंद के 12 शिष्य :-अनंतनन्द, सुखानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद, भावानंद, पीपा, कबीर, सेन, धन्ना, रैदास, पद्मावती और सुरसुरी।

● भक्ति के प्रचार और प्रसार के लिए जिस सुद्रढ़ आधार की आवश्यकता थी वह शंकराचार्य के नेतृत्व में 8 शती में ही शुरू हो चुकी थी। परन्तु उसमें बड़ा परिवर्तन करके रामानुजाचार्य ने उसे वैष्णव सम्प्रदाय से जोड़ दिया। कालांतर में रामानंद ने उसे और भी सरल और व्यापक बनाकर सभी जातियो के लिए ग्राह्य बना दिया और एक तरह से वर्णव्यवस्था पर प्रहार किया।  जिसका स्प्ष्ट संकेत हम निर्गुनपन्थ पर भी देख सकते हैं।

● ऐसा माना जाता है कि एक बार रामानंद शेख तकी के साथ वाद-विवाद कर रहे थे और शेख सिकन्दर लोदी के गुरु थे। शेख तकी के हारने या रामानंद के आगे कमजोर पड़ने के कारण उन्होंने सिकन्दर से कह कर उन्हें जंजीर से बंधवा करके नदी में फेंकवा दिया था। जिस पर धर्मदास कहते हैं:-

"साह सिकन्दर जल में बोरे, बहुरि अग्नि परजारे"....।


● "श्री रामार्चन पद्धति " में रामानंद ने अपनी पूरी गुरु परम्परा दी है।

(5) "वल्लभाचार्य" - यह रामानंद और रामानुजाचार्य की भाँति भक्ति को जांति पांति से मुक्त करके सामान्य जनता तक नहीं पहुँचाना चाहते थे, बल्कि समूहबद्ध करना चाहते थे।

15-16वीं शती में वैष्णव धर्म का जो आंदोलन देश के एक छोर से दूसरे छोर तक रहा उसके प्रवर्तक वल्लभाचार्य थे।

शंकराचार्य ने केवल निर्गुण ब्रह्म की सत्ता स्वीकार की थी। वल्लभ ने ब्रह्म में सब धर्म माने और उसकी अनुकृति के लिए लीला क्षेत्र खोल दिया।अर्थात भक्ति का क्षेत्र विस्तार किया।

• इन्होंने जीव के 3 रूप बताए हैं:-   

1 मर्यादा जीव

2 पुष्टि जीव

3 प्रवाह जीव

वल्लभाचार्य ने श्रीकृष्ण की जन्मभूमि पर पूरनमल खत्री के साथ मिलकर मंदिर बनवाया।

वल्लभाचार्य के भक्तिमार्ग का नाम पुष्टिमार्ग था जिसका अर्थ होता है कि जबतक ईश्वर द्वारा भक्त पर अनुकंपा या कृपा नहीं कि जाएगी तब तक वह परम सत्य को प्राप्त नहीं कर पाएगा और अपने जीवन को मोहमाया से मुक्त नहीं कर पाएगा। इसके लिए सेवक को 84 अक्षरों का एक पुष्टिमन्त्र याद करना होता था। वह उसके ज्ञान की प्राप्ति में लाभदायक होता था।

इस मार्ग में भोग, विलास और राग का पूरा स्थान था। 


(6) " राधाबल्लभ सम्प्रदाय" - इसके प्रवर्तक हित हरिवंश थे जिसमें कृष्ण के वाम भाग में एक गद्दी पर "श्रीराधा" नाम लिखकर राधा की स्तुति की जाती है। यहाँ राधा को कृष्ण से उच्च स्थान दिया गया है।

इसमें निकुंज लीला या नित्य विहार लीला का दर्शन होता है। वृंदावन में इसका मुख्य मंदिर है। 

इसका एक अंग त्तसुखि शाखा

(7)" सखी सम्प्रदाय/टट्टी सम्प्रदाय:- इसके प्रवर्तक हरिदास निरंजनी हैं।

 विजेंद्र स्नातक के अनुसार इस सम्प्रदाय को टट्टी सम्प्रदाय मिश्रबन्धुओ ने कहा था 


● अन्य जानकारी :-

" शंकराचार्य कट्टर समर्थक वर्णाश्रम के

 " रामानुजाचार्य समर्थक और विरोधी दोनों

 " रामानंद विरोधी थे। शूद्रों को शिक्षा दी।

 " वल्लभाचार्य वर्णाश्रम के विरोधी के साथ सभी को समूहबद्ध करना चाहते थे।

● अष्टछाप की स्थापना 1565 में वल्लभाचार्य के पुत्र विठलनाथ ने की थी। जिसमें अपने पिता के 4 शिष्यों, सूरदास, परमामनन्द दास, कुम्भनदास, व कृष्णदास के साथ अपने 4 शिष्यों नंददास, चतुर्भुजदास, छीत स्वामी और गोविंद स्वामी को जोड़कर इस मंडली की स्थापना की थी जो राधा-कृष्ण के पद बाँचा करती थी।

इस मंडली के सबसे श्रेष्ठ व बड़े कवि सूरदास थे और सबसे छोटे कवि नंददास थे।

● 3 मुख्य सम्प्रदाय - 

श्री सम्प्रदाय - रामानुजाचार्य

ब्रह्म सम्प्रदाय - मध्वाचार्य

रुद्र सम्प्रदाय- विष्णु स्वामी



● भक्तिकाल का अंत :- एक परिचय

शुक्लानुसार "सगुणोपासक भक्त भगवान के सगुण और निर्गुण रूप को मानता है परंतु भक्ति के लिए सगुण रूप ही स्वीकारता है, निर्गुण मार्ग ज्ञानाश्रयी के लिए छोड़ देता है"..। 

शुक्लानुसार "इस प्रकार देश में सगुण और निर्गुण के नाम से भक्तिकाव्य की 2 शाखाएँ विक्रम की 15वीं शती से चल रही थी। भक्ति के उत्थान काल के भीतर हिंदी भाषा की कुछ विस्तृत रचना पहले कबीर की ही मिलती है। आठ पहले निर्गुणमत के संतो का उल्लेख उचित ठहरता है"..।

श्यामसुंदर दास के अनुसार जिस युग में कबीर, जायसी, तुलसी, सूर जैसे रससिद्ध कवियों और महात्माओं की दिव्य वाणी उनके अंतः करणों से निकलकर देश के कोने-कोने में फैली थी। उस साहित्य के इतिहास को समग्रतः भक्तियुग कहते हैं। निश्चित ही वह हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग था"..।

हजारीप्रसाद जी के अनुसार " समस्त भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है। इसी का नाम भक्ति साहित्य है। यह एक नई दुनिया है"..।

रामविलास शर्मा के अनुसार " सगुणवादी भी सन्त है और निर्गुणवादी भी । जिस तरह से निर्गुणभक्त प्रगतिशील है उसी तरह से सगुणभक्त भी"..। आगे कहते हैं कि " वर्णाश्रम के समर्थक तुलसी भी उतने ही प्रगतिशील है जितने की वर्णाश्रम भंजक कबीर".।

बच्चन सिंह के अनुसार " जहाँ कबीर खुद को निर्गुण-सगुण से ऊपर मानते हुए कहते हैं " हम निर्गुण तुम सरगुण जाना".. वहीं तुलसी भी सगुनहिं-अगुनाही कछू नहीं भेदा"..। यह अभेद केवल ज्ञान का स्तर है"...।

बच्चन सिंह के अनुसार " सामाजिक दृष्टि से देखने पर कबीर आदि संतो और सूफियों के भक्ति आंदोलन को प्रतिवादात्मक और कृष्ण-रामभक्त आंदोलन को प्रतिरोधक या यथास्थितिवादात्मक आंदोलन कह सकते हैं"..। इसके सम्बन्ध में आगे कहते हैं कि " पहले आंदोलन का स्वर शोषित पीड़ित का स्वर है तो दूसरे का यथास्थितिवाद। पहले आंदोलन की सीमा उसका रहस्यवाद है तो दूसरे की ब्राह्मणवाद"..।

बच्चन सिंह के अनुसार " भक्त कवियों ने जीवन मे रस घोलने का काम किया और कुंद होती हुई संवेदना को नया जीवन दिया। उसमें नयी संस्कृति की निर्माणार्थ एक संघर्षरत प्रैक्सिस भी है जिसे सांस्कृतिक राजनीति से सम्बन्ध किया जा सकता है"..।

बच्चन सिंह के अनुसार " भक्ति साहित्य को अपभ्रंश और संस्कृत को छोड़कर नव्य आर्यभाषा का प्रयोग किया जो हिंदी जाति के गठन का मूल आधार है"..।

 ● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

एक मध्यवर्गीय कुत्ता

  आज पढ़िए व्यंगय विधा के गुरु हरिशंकर परसाई का लेख "एक मध्यवर्गीय कुत्ता" जोकि मध्यवर्ग की धज्जियां उड़ाता है।  लेख का मकसद मध्यवर्...