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Friday, April 23, 2021

रीतिकाल भाग - 3

   

                             (भूषण)

● ये चित्रकूट के राजा "सोलंकी" के आश्रय में रहते थे और इन्होंने ही "कविराज भूषण" की उपाधि दी थी। यह वीर रस के कवि थे। ऐसा माना जाता है कि एक बार महाराज "छत्रसाल" ने इनकी पालकी में कंधा लगाया था जिसपर यह कहते हैं कि  :-  "सिवा को बखानो कि बखानो छत्रसाल को"....।

• "शुक्लानुसार" शिवराज भूषण, शिवाबावनी, और छत्रसाल दशक केवल आश्रयदाता की प्रशंसा ही नही करता बल्कि "हिन्दू जाति के गौरव की भी रक्षा" भी करता है। इसलिए शुक्ल इन्हें "हिन्दू जाति का प्रतिनिधि कवि" कहते हैं।

"शुक्लानुसार" शिवराज भूषण अच्छा अलंकार ग्रँथ नहीं है।

"शुक्लानुसार" भूषण की "भाविक छवि" रचना, एक नए अलंकार के रूप में दिखती है। "भाविक" का सम्बन्ध समय/काल से होता है तो "भाविक छवि" का स्थान/देश से..।

"शुक्लानुसार" अलंकार के सम्बंध में "भूषण का उदाहरण सबसे गड़बड़ है"...।

• "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार इनकी वीररस की कविताएँ आदिकाल के वीरगाथा की याद दिला देती है।

• "गणपतिचन्द गुप्त" ने इनका मूल नाम "मनीराम या पतिराम" माना है। 

• "विश्वनाथप्रसाद मिश्र" ने इनका मूल नाम "घनश्याम" माना है।


                                (देव)

● ये इटावा के रहने  वाले थे और इनका पूरा नाम "देवदत्त" था। 

शुक्लानुसार देव ने अपने ग्रँथों के लिए सबकुछ संस्कृत की "रस तरंगिणी" से उठा लिया है। इसके आगे वह कहते हैं कि "रीतिकाल में सबसे अधिक ग्रँथ लिखने वाले भी यही हैं"...।

शुक्लानुसार ये आचार्य और कवि दोनों रूप में हैं।

"भावविलास" की रचना इन्होंने 16 की उम्र में कर दी थी। इस रचना को औरंगजेब के पुत्र को सुनाया था जो कविता के प्रेमी थे।

• बच्चन सिंह के अनुसार "बद्धरीति में देव सबसे अधिक प्रतिभाशाली और व्युत्पत्ति युक्त कवि थे"..।

"बच्चन सिंह" के अनुसार देव रीतिग्रन्थकार के साथ ही एक मुक्तप्रेमी भी थे। इसी को लक्ष्य करते हुए वह कहते हैं :- "उनमें एक फकीराना मिजाज भी था जो उन्हें भोग के प्रति उदास बना देता है"..।

"बच्चन सिंह" ने देव को रीतिबद्ध और रीतिमुक्त का "मध्यकवि" माना है। 

"बच्चन सिंह" के अनुसार "देव शास्त्र में केशव की तरह क्लासिक और काव्य में घनानंद की तरह स्वछंद"..।

"भवानी विलास" भावानीदत्त वैश्य के नाम पर लिखी गई है। 

"कुशल विलास" कुशलसिंह के नाम पर और "जातिविलास" अनेक जातियों की स्त्रियों से सम्बंधित लिखी है। 

"सुखसागर तरंग" कवित्तों का संग्रह है।


●अभिधा, लक्षणा शब्दशक्ति पर निरूपण करते हुए कहते हैं :-  

 "अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लक्षिणा हीन

 अधम व्यंजना रस विरस, उलट कहत प्रवीन


                          (पद्माकर)

● इन्हें जयपुर के नरेश "प्रतापसिंह" के यहाँ "कविराज शिरोमणि" की उपाधि मिली थी। 

• पद्माकर के काव्य में मधुर कल्पना को देखकर शुक्ल ने इनकी तुलना बिहारी से करते हुए कहा है "ऐसा सर्वप्रिय कवि इस काल के भीतर बिहारी को छोड़ कर कोई दूसरा नही हुआ".....।

इन्होंने ने अपना "जगद्वविनोद" महाराज प्रतापसिंह के पुत्र जगतसिंह के नाम पर और "हिम्मत बहादुर विरुदावली" हिम्मत बहादुर से सम्बंधित लिखा है ।

"प्रबोध पचास" भक्ति और विराग का ग्रँथ है।

"गंगालहरी" की रचना कानपुर में की थी

                                                                

                          (घनानन्द)

● ये जाति के कायस्थ थे। घनानंद रीतिमुक्त काव्यधारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। एकबार नादिरशाह के कहने पर घनानंद ने कविता न सुनाकर अपनी प्रेमिका के कहने पर सुना दी थी तब नादिरशाह खुश भी हुए और नाराज भी। इसी पर नादिरशाह ने घनानंद को राज्य से बाहर निकाल देने का आदेश दिया था। इस पर अपनी प्रेमिका "सुजान" नामक वैश्य के साथ न आने पर घनानंद वियोग के कारण "निम्बार्क सम्प्रदाय" में चले गए थे।

एक बार नादिरशाह के सिपाही इनसे कुछ माल लूटने आये थे और जब सिपाहियों द्वारा माल माँगा तो इन्होंने 3 बार अपने हाथ से उनपर धूल लेकर उन पर फेंक दिया था। जिस पर गुस्सा होकर उन सैनिकों ने इनका हाथ ही काट डाला। कहते हैं कि मरते समय घनानन्द ने यह कविता अपने रक्त से लिखी थी :-

"बहुत दिनांन की अवधि आसपास परे

खरे अरबरन भरे हैं उठि जान को।


इन्होंने अपनी कविताओं में लगातार अपनी प्रेमिका "सुजान" को कृष्ण के प्रतीक रूप में याद किया है। साथ ही प्रेम के संयोग और वियोग दोनों रूपों को दिखाया है परन्तु इनका मन वियोग में ज्यादा रमा है।  इस विशेषता को देखते हुए शुक्ल जी कहते हैं :-

" घनानंद ने न तो बिहारी की तरह विरहताप को बाहरी मापा है, न बाहरी उछलकूद दिखाई है"..। 

घनानंदजी उन विरल कवियों में है जो भाषा की व्यंजकता बढाते हैं। इसी पर शुक्ल कहते हैं :-

" अपनी भावनाओं के अनूठे रूपरंग की व्यंजना के लिए भाषा का ऐसा बेधडक प्रयोग करनेवाला हिंदी के पुराने कवियों में दूसरा नहीं हुआ"..।

शुक्लानुसार " प्रेममार्ग का ऐसा जबाँदानी रखने वाला ब्रजभाषा का और कोई कवि नही हुआ"....।

एक अन्य स्थान पर शुक्ल कहते हैं " इनकी सी विशुद्ध, सरस और शक्तिशाली ब्रजभाषा लिखने वाला हिंदी में और कोई नहीं हुआ"..।

              

"विरहलीला" रचना ब्रज भाषा में पर फारसी लिपि में लिखी है।

• विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने "घनानंद ग्रन्थावली" का सम्पादन किया है।

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

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