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Sunday, August 30, 2020

आदिकालीन वीरगाथात्मक साहित्य व जन्मकाल

 


            (आदिकालीन वीरगाथात्मक साहित्य)


●रासो साहित्य:-

रासो साहित्य मूलतः वह साहित्य है,जिसमें अनेक राजाओ-महाराजाओ की पद-प्रतिष्ठा का,उनके शौर्य-वीरता का वर्णन उनके आश्रयदाताओं द्वारा किया गया है। जिसका मकसद उनके कीर्तिमानों को और अपनी चाटुकारिता के साथ कवियों द्वारा अपनी सेवाभाव व एकनिष्ठता का परिचय देना भी था। यह कार्य भाटो और चारण कवियों द्वारा किया जाता था साथ ही यह चारण-भाट कवि समय-समय पर अपने राजाओं के साथ युद्धस्थल पर भी जाया करते थे।

●रासो साहित्य मूलतः पश्चिमोत्तर भारत के वीरों और उनके जीवन घटनाओं पर आधारित है, जिसमें कुछ राजाओं का वर्णन साहित्य में उनके शौर्य और वीरता को प्रमाणिक रूप से दिखाने के लिए हुआ था। साथ ही साथ ऐतिहासिक तथ्यों व अतीत की स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए भी। परंतु वर्तमान में इस तरह का साहित्य बहुत कम मात्रा में शेष रह गया है। जो भी रासो साहित्य आज हमारे सामने उपलब्ध है वह या तो अप्रामाणिक सिद्ध हुआ या तो अर्धप्रमाणिक या फिर कहीं लुप्त हो गया।

●आचार्य शुक्ल के अनुसार वीरगाथात्मक काव्य को ध्यान में रख़ते हुए ही उन्होंने आदिकालीन साहित्य को वीरगाथाकाल की संज्ञा दी है क्योंकि मुख्य-रूप तत्कालीन साहित्य वीररस से पूर्ण साहित्य के रूप में ही उपलब्ध हुआ है।


● वीरगाथा का अर्थ :- रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत है कि वीर के साथ "गाथा" का विशिष्ट अर्थ है जिसके साथ "शौर्य-शिवैलरी" के तत्व जुड़ने से यह नाम उस समय के लिए अनुकूल बैठता है क्योंकि उस समय रासो साहित्य ही एकमात्र ऐसा साहित्य था जिसमें शुद्ध रूप से हिंदी के तत्व दिखते थे"....

सम्पूर्ण रासो साहित्य वीर और श्रृंगार के युग्म से बना है। चाहे वह पृथ्वीराज रासो हो या बीसलदेव। 


                                      

●रासो शब्द को लेकर विद्वानों में बहस है कि इसकी उतपत्ति कैसे हुई है, जोकि इस प्रकार है:-

शुक्ल                         रसायण से

गार्सा द तांसी              राजसूय से

नरोत्तम स्वामी             रासक से

चतुर्वेदी                       राउस से

हजारीप्रसाद                रासक (उपरूपक से)

गनपतिचन्द्र                 रासक-रास-रासा-रासु-रासो


परन्तु ज्यादात्तर मत "रासक" शब्द हजारीप्रसाद जी के साथ सहमत है।


●पृथ्वीराज रासो के सम्बंध में कहे गए कथन:-

1 बच्चन सिंह के अनुसार  "रासो काव्य की मूल प्रकृति में सामंतो और राजाओं के शौर्य और विकास का अतिरंजित चित्र दिखता है"...।

2 रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "रासो साहित्य में शिष्ट के साथ लोक के तत्व भी जुड़े हुए हैं"...। 

3रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार :- "पृथ्वीराज रासो में पाठ और बीसलदेव रासो में गेय शैली का प्रयोग है"...।                                    

4 विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार हजारीप्रसाद ने पृथ्वीराज रासो के लिए कहा है :- " पृथ्वीराज रासो मुख्यतः शुक-शुकी संवाद में लिखा गया है"....।                       

5 बच्चन सिंह के अनुसार  "यह एक राजनीतिक महाकाव्य है, दूसरे शब्दों में राजनीतिक-माहकाव्यात्मक त्रासदी"...।

6 "पृथ्वीराज रासो हिंदी की अपनी महाकाव्य परम्परा की बड़ी उपयुक्त प्रस्तावना है"...।

7 इन सभी रासो में जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध रासो है वह "पृथ्वीराज रासो" है जिसे आचार्य शुक्ल हिंदी का "प्रथम महाकाव्य" कहते हैं और इसके रचनाकार (चंद) को "हिंदी का प्रथम कवि" मानते हैं।

                                                          

●पृथ्वीराज रासो की रचना पृथ्वीराज के मित्र चन्दबरदाई ने 1343ई.के आसपास की थी जिसमें 69 सर्ग और 2500 पृ हैं। इसमें बहुत से मुख्य प्रसंग हैं जैसे:-संयोगिता स्वयम्बर, कैमास वध, मुहम्मद गौरी युद्ध आदि।

रासो को पूरा चन्दबरदाई के पुत्र जल्हण ने किया था।

पृथ्वीराज चौहान दिल्ली के अंतिम हिंदू राजा थे। इस रासो में चौपाई, छप्पय, रोला, दोहा आदि छन्दों का प्रयोग हुआ है।


●रासो की प्रमाणिकता पर बहुत से सवाल विद्वानों ने इस तरह उठाये हैं:-

प्रमाणिक:-       मिश्रबन्धुओ, श्यामसुंदर दास

अप्रमाणिक:-    शुक्ल,डॉ वुलर,गौरीशंकर ओझा

अर्धप्रमाणिक:-  हजारी,मुनिजिन विजय


सुप्रसिद्ध विद्वत सभा royal Asiatic society of bangal ने पृथ्वीराज रासो का आरम्भ किया था। रासो के कुछ थोड़े ही अंश प्रकाशित हुए थे कि डॉ वूलर को "पृथ्वीराज विजय" नामक रचना खंडित अंशो में मिली गई। इस पुस्तक के अध्ध्यन के बाद डॉ वूलर "पृथ्वीराज विजय" को ज्यादा प्रमाणिक मानते हैं। उनका मानना है कि "पृथ्वीराजकालीन अभिलेखों से पृथ्वीराज विजय की घटनाएं तो मेल खा जाती हैं परंतु रासो की नही"..। 

डॉ वुलर का पत्र सभा द्वारा छापा गया और रासो का प्रकाशन बंद करना पड़ा। 

                                         


●"बीसलदेव रासो" को नरपति नाल्ह ने लिखा था जिसे हिंदी का प्रथम बारहमासा वर्णन का काव्य माना जाता है जोकि "गेय शैली" में लिखा एक विरह काव्य है। इसमें परमार के राजा "विग्रहराज चतुर्थ" का विवाह भोजराज की पुत्री "राजमती" से होता है ।

शुक्लानुसार यह काव्य 100 छंदों में बंटा है और बच्चन सिंह के अनुसार 125 छन्दों में। इसकी रचना 1212 वी. संवत तक मानी जाती है जिसके पक्ष में शुक्ल और हजारी दोनों सहमत हैं परंतु मोतीलाल मेनारिया का मत है कि यह 1546-60 तक का हो सकता है।


●यह 4 खण्डों में बंटा है:- 

1नायक-नायिका का विवाह।

2 नायिका का नायक पर व्यंग्य कसना जिससे नायक रूठकर नायिका को छोड़कर उड़ीसा चला जाता है और 12वर्ष तक वही रहता है।

3 नायिका का विरह वर्णन। (बारहमासा का वर्णन)

4 नायक-नायिका का पुनर्मिलन।

शुक्ल और बच्चन सिंह मानते हैं कि यह कोई वीरकाव्य न होकर एक लघुखंड है। इसमें श्रृंगार रस प्रधान है।



●"खुमाण रासो" के रचनाकार "दलपति विजय" माने जाते हैं । शुक्लानुसार, बच्चन सिंह व मोतीलाल मेनारिया इसकी रचना 17वी शती  मानी जाती है।

इसका नायक मेवाड़ का दिव्तीय खुमाण राजा था। ये वीर रस की रचना मानी जाती है जिसकी प्रमाणिकता का पर संदेह है। इसमें 5000 छंद है। 


●"हम्मीर रासो" के रचयिता "शार्गन्धर" माने जाते हैं जोकि हम्मीर देव के सभाकवि और हम्मीर देव के वंश में राघवदेव के पौत्र थे।

इसमें शार्गन्धर ने रणथंभौर के राजा हम्मीरदेव के युद्धों और उनकी वीरता का वर्णन किया है। इसकी रचना 1357ई. में हुई थी। ये वीर रस का बड़ा ही सुंदर रासो काव्य माना जाता है। इसकी एक प्रसिद्ध पंक्ति है जिसमें स्वाभिमान की झलक दिखती है और क्षत्रिय धर्म का पालन करना भी दिखता है:-

एक अन्य पंक्ति बहु प्रसिद्ध है:-

"ढोला मारिया ढिल्ली महं मुच्छिउ मैच्छ सरीर

पुर जजिल्ला मन्त्रिवर चलिअ वीर हम्मीर"...।

अर्थात दिल्ली में ढोल बजाया जिससे सभी म्लेच्छ मूर्छित हो गए और मन्त्रिवर जज्जल के पीछे वीर हम्मीर चले आ रहे हैं।

बच्चन सिंह के अनुसार "कुंडलिया छंद" का प्रथम प्रयोक्ता "शार्गन्धर" था।


●"परमाल रासो" के रचनाकार "जगनिक" द्वारा रचित यह ग्रँथ बड़ा ही मार्मिक-वीरगाथात्मक रासो काव्य है जिसमें राजा "परमाल" के शौर्य को बड़ी ही बखूबी दिखाया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें आल्हा-ऊदल नामक दो वीरों की गाथा का व उनके शौर्य का बड़ा ही जीवंत वर्णन लोकभाषा में किया गया है। शुक्ल इसे 12वी शती का मानते हैं।

परमाल रासो का "आल्हाखंड" 52 छोटी-छोटी लड़ाईयों का खंडकाव्य है जो गेय शैली में लिखा गया है। इसे आज भी लोकसमाज में बड़ी वीरता के साथ उन वीर-सपूतों को याद करते हुए गाया जाता है। 

बच्चन सिंह के अनुसार आल्हखंड में ऊदल द्वारा अपने बाप की मृत्यु का बदला मांडो से लिया था।

                                                

आल्हाखंड को 1865 में फरुखाबाद के तत्कालीन न्यायाधीश "चार्ल्स इलियट" ने अनेक भाटो और चारणों से संपादित करवाया था।

बच्चन सिंह के अनुसार परमाल रासो में "विलायत" शब्द के इस्तेमाल से यह काव्य अंग्रेजों के समय का पता चलता है

                                              

●हेमचंद्र का "कुमारपाल चरित" भी एक तरह का वीर रस का काव्य है जिसमें गुजरात के राजा सोलंकी सिद्धराज जयसिंह के भतीज़े कुमारपाल के शौर्य का वर्णन है।


●बच्चन सिंह के अनुसार मधुकर सिंह का "जयमयंक जसचन्द्रिक" और भट्ट केदार का "जयचंद प्रकाश "12वी शती के दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जिस में जयचंद के शौर्य और वीरता का वर्णन है। 

                                                

●"कीर्तिलता व कीर्तिपताका" में  विद्यापति ने तिरहुत के राजा कीर्तिसिंह के शौर्य व उनके वीरता का नमूना दिया है जिसमें वह अपने राज्य व प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करते हैं, जिसमें अपने पिता की मृत्यु का भी बदला लिया जाता है। इस लड़ाई में इब्राहिम शाह उनकी सहायता करते हैं और कीर्तिसिंह असलान को मौत के घाट उतार देते हैं।

कीर्तिलता व कीर्तिपताका में युद्ध, बाजार आदि का वर्णन है।

  


                   (जन्मकाल व रचना)


जोइन्दु -    6ठी शती - परमात्म प्रकाश और योगसार

स्वयम्भू-    8वी शती - पउमचरिउ और रिठनेमिचरिउ

सरहपा-     769ई.- दोहकोष

लुइपा-       773ई. 

शबरपा-     780ई.- चर्यापद

कण्हपा-     820ई. दोहकोष

डोमभीपा-  840ई.- डोम्भीपगीतिका

गोरखनाथ- 9वी शती

देवसेन-      933ई.- श्रावकाचार



पुष्पदन्त-          10वी शती - महापुराण(आदिपुराण)     

                       उत्तरपुराण और यसधर चरिउ


धनपाल-      10वी शती- भविषयतकहा

रोड़ा कवि-   10वी शती- राउरवेल


मुनिराम सिंह-  11वी शती- पाहुड दोहा,                

                 विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार 12वी शती


कुशलाभ-ढोला मारू रा दुहा- 11वी शती

अब्दुर्रहमान-सन्देशरासक-   12वी शती


जिनदत्त सूरी-  12वी शती-  उपदेशरसायन रास

शालीभद्र सूरी- 1184ई.- भारतेश्वर बाहुबली रास

जगनिक-       1173ई.- परमाल रासो

भट्ट केदार-     12वी शती- जयचंद प्रकाश

मधुकर कवि-  12वी शती-जयमयंक जसचन्द्रिका

दामोदर शर्मा- 12वी शती-उक्ति-व्यक्ति प्रकरण

नरपति नाल्ह- 1212ई.- बीसलदेव रासो

अमीर खुसरो- 1255ई.- दो सूखने, खालिकबारी

ज्योतिश्वर ठाकुर- 13-14वी शती- वर्णरत्नाकर

हेमचंद्र-             13-14वी शती- शब्दानुशासन

आसगु-             13वी शती- चनदनबाला रास

चन्दबरदाई-       1343ई.- पृथ्वीराज रासो

शार्गन्धर-          1357ई.- हम्मीर रासो

लक्ष्मीधर-         14वी शती - प्राकृत पैंगलम

नलसिंह-           16वी शती- विजयपाल रासो

दलपति विजय-  1729ई.- खुमाण रासो


अज्ञात -         मुंज रासो

सुमितिगुणी-  नेमिनाथ रास

शेख निसार-  यूसुफ जुलेखा



सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास , रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, 2108 संस्करण।

3 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण , 2018।

4 हिंदी साहित्य सम्वेदना और विकास , रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वां संस्करण, 2018

5 हिंदी साहित्य का इतिहास, विजेन्द्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन, 1996 संस्करण।

6 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।




Thursday, August 27, 2020

आदिकाल

आदिकाल पर संक्षिप्त व तथ्यात्मक जानकारी  




●आदिकालीन साहित्य के संदर्भ में विश्वनाथ त्रिपाठी का मत  :-" इस काल में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश में भी रचनाएं हो रही थी साथ-साथ अपभ्रंश के केंचुल को छोड़ती हुई हिंदी भी अपना रूप ग्रहण कर रही थी"....। 


1 (हिंदी का प्रथम कवि)


चन्दबरदाई            शुक्ल

अब्दुर्रहमान          हजारीप्रसाद

स्वयम्भू                रामकुमार वर्मा

सरहपा                 राहुल सांकृत्यायन

शालीभद्र सूरी       गनपतिचन्द्र गुप्त

गोरखनाथ            मिश्रबन्धु

देवसेन                 डॉ नगेन्द्र

  


2 (आदिकालीन सिद्ध शिष्य परम्परा)

769ई.      773ई.     780ई.       820ई.

सरहपा      लुइपा     शबरपा       कण्हपा


●लुइपा के दो और शिष्य थे- उड़ीसा के राजा दारिकपा और वहाँ के मंत्री गोणिपा।



3 (आदिकालीन नाथयोगी शिष्य परम्परा)

आदिनाथ(शिव)-जलंधरनाथ-मत्स्येन्द्रनाथ-गोरखनाथ-गेंगीनाथ-निवृत्तिनाथ-चर्पटनाथ



4 (आदिकालीन गद्य साहित्य)

1 उद्योतन सूरी - "कुवलयमाला कथा" 773 ई. में रची गयी थी।


2  ज्योतिश्वर ठाकुर - "वर्णरत्नाकर" 13-14वी शती के आसपास लिखी गई थी। ये गद्य-पद्य मिश्रित मैथिली और अपभ्रंश भाषा मे लिखी है। जिसमें 8 कल्लोल हैं और नगर,नायिका,नखशिख वर्णन,ऋतु वर्णन आदि का वर्णन है।  

                                                  

3 रोड़ा कवि-   "राउरवेल" हिंदी की प्रथम चम्पू और श्रृंगारिक काव्य है जोकि मैथिली-अपभ्रंश में लिखी है। इसमें नखशिख वर्णन के साथ नायिका वर्णन भी है। इसकी रचना 10वी शती में की गयी थी।


4 दामोदर शर्मा-  "उक्ति-व्यक्ति प्रकरण"  एक तरह का व्याकरण ग्रन्थ है जिसकी रचना 12वी शती में हुई थी।इसकी रचना "काशी नरेश गोपीचन्द" के राजकुमारो को वहां की स्थानीय भाषा सीखाने के लिए की गई थी। दामोदर शर्मा गोपीचन्द के सभाकवि थे। 5 प्रकरण में बंटे होने से इसका नाम "प्रकरण" पड़ा।

                                                   

5 लक्ष्मीधर :- "प्राकृत पैंगलम" रचना एक तरह का छंदशास्त्र है जिसमें कई राजाओं, जैसे हम्मीर, बब्बर, जज्जल, विद्याधर आदि का वर्णन है। इसके अतिरिक्त 900ई. से लेकर 1400ई. तक के आसपास की कई घटनाओं का भी वर्णन किया है जिसकी प्रमाणिकता बच्चन सिंह के साथ सुनीतिकुमार चटर्जी भी करते हैं। इसका एक अन्य नाम पिंगल-सूत्र भी है।

इसकी टीका वंशीधर ने लिखी थी।

 


5 (आदिकालीन श्रृंगारिक साहित्य)


1 बीसलदेव रासो              नरपति नाल्ह 1212 ई.

2 राउरवेल                       रोड़ा कवि 10वी शती

3 विद्यापति की पदावली    विद्यापति 14वी शती

4 सन्देशरासक               अब्दुर्रहमान 12वी शती

      


 6 (आदिकालीन लौकिक साहित्य)

●जिस भी साहित्य में लोक समाज, लोकभाषा, लोकसंस्कृति, लोकगीत, लोकसंगीत, मिथकों आदि का मुखर रूप से प्रयोग हुआ होता है।उसे लौकिक साहित्य कहते हैं। यह साहित्य पूरी तरह से सामान्य जनजीवन से जुड़ा होता है। इसमें साहित्य की परिनिष्ठिता और उसकी नियमावली न के बराबर होती है। इसके कुछ उदाहरण आप देख सकते हैं।

1 सम्पूर्ण रास काव्य परम्परा

2 खुसरों की पहेलियां, ढ़कोसला, मुकरियाँ



7 (आदिकालीन परिनिष्ठित साहित्य)


1 विजयपाल रासो - नलसिंघ   

2 हम्मीर रासो  - शार्गंधर

3 कीर्तिलता   - विद्यापति     

4 कीर्तिपताका - विद्यापति...।  (शुक्लानुसार)



8 (आदिकालीन प्रबन्ध साहित्य)


1 पृथ्वीराज रासो - 1250ई. - चन्दबरदाई

2 पउम चरिउ - 8वी शती - स्वयंभू

3 महापुराण - 10वी शती- पुष्पदंत


9 (आदिकालीन खण्डकाव्य)


1 बीसलदेव रासो- नरपति नाल्ह 1212 संवत

2 सन्देशरासक- अब्दुर्रहमान 12वी शती

3 कीर्तिलता- विद्यापति -14वी शती

4 कीर्तिपताका - 14वीं शती

5 जयचंद प्रकाश -  भट्ट केदार 12शती

6 जयमयंक जसचन्द्रिका-  मधुकर कवि 12वी शती 


10 (आदिकालीन साहित्य में प्रथम प्रयोक्ता)


1 दोहा का प्रथम प्रयोक्ता - जोइन्दु

2 दोहा-चौपाई का प्रथम प्रयोक्ता-  सरहपा

3 प्रथम रास परम्परा का प्रयोक्ता-  जिनदत्त सूरी  (उपदेशरसायन रास में)


4 हिंदी का प्रथम रास काव्य परम्परा का प्रयोक्ता-   शालीभद्र सूरी (भारतेश्वर बाहुबली रास में)


5 कुंडलिया का प्रथम प्रयोक्ता -  शार्गंधर


6 प्रथम भारतीय भाषा मे लिखने वाला इस्लामिक लेखक (अब्दुर्रहमान का संदेशरासक अवधी में )

7 कडवक का प्रथम प्रयोक्ता

8 बारहमासा का प्रथम प्रयोक्ता- नरपति नाल्ह  (बारहमासा में)                   

9 श्रृंगार और नखशिख का प्रथम प्रयोक्ता- रोड़ाकवि   (राउरवेल में)

10 प्रथम व्याकरणिक ग्रन्थ- उक्ति-व्यक्ति प्रकरण- (दामोदर शर्मा)

11 पध्दडिया बंध का प्रथम प्रयोक्ता - चतुर्मुख (स्वयम्भू के अनुसार)

                                              

पध्दडिया-अहिलल्ल-कडवक एक ही तरह के छंद हैं।



सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018





Monday, August 24, 2020

संस्मरण और उनके रचनाकार:भाग 2

 


संस्मरण और उनके रचनाकार:भाग 2



1 अजित कुमार - बच्चन निकट से 1968

                        निकट मन में -1992

                       अंधेरे के जुगनू - 2002

                       कविवर बच्चन के साथ - 2009

                      दिल्ली हमेशा दूर - 2011

                      निकट मन मे वन में दूर - 2012

                      जिनके संग जिया - 2015

 

2 विष्णु प्रभाकर-  सृजन के सेतु - 1990

                         साहित्य के स्वप्न - 2002

                         हम इनके ऋणी हैं

                         हमारे पथ प्रदर्शक

                         यादों की छाँव में


3 अमृतराय - जिंदगी हमेशा याद रहेगी- 1992

4 प्रकाशवती पाल - लाहौर से लखनऊ - 1994

5 गिरिराज किशोर- सप्तवर्णी- 1994


6 दूधनाथ सिंह - लौट आओ धार - 1995

                        एक शमशेर और भी - 2012

                       सबको अमर देखना चाहता हूँ - 2017


7 रामदरश मिश्र - स्मृतियों का छंद - 1995

                       अपने अपने रास्ते - 2000


8 रवींद्र कालिया - सृजन के सहयात्री - 1996

                         मेरे हमकलम - 2015


9 देवेंद्र सत्यार्थी - यादों का काफिला - 2000

10 विद्यानिवास मिश्र- चिड़िया रैन बसेरा - 2002

11 कृष्णबिहारी मिश्र - नेह के नाते - 2002


12 मनोहरश्याम जोशी- लखनऊ मेरा लखनऊ 2002

                 रघुवीर सहाय:रचनाओं के बहाने 2003


13 रामकमल राय- स्मृतियों का शुक्ल पक्ष - 2003

14 विवेकी राय- आँगन के वंदनवार- 2003

                     मेरे सुहृदय श्रधेय - 2005


15 विश्वनाथ त्रिपाठी - नंगातलाई का गाँव - 2004

          व्योमकेश दरवेश (हजारीप्रसाद पर) - 2010

          गंगा स्नान करने चलोगे - 2012

           गुरुजी की खेतीबाड़ी- 2015


16 कांतिकुमार जैन- लौटकर आना नहीं होगा- 2002

                           तुम्हारा परसाई - 2004 

                          जो कहूँगा सच कहूँगा - 2006

                         अब तो बात फैल गयी- 2007

महागुरु मुक्तिबोध:जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर - 2014

                    लौट जाती है उधर भी नजर - 2017


17 केशवचंद्र वर्मा - सुमिरन के बहाने- 2005

18 मुद्राराक्षस- कालातीत - 2009

19 चन्द्रकान्ता - मेरे भोजपत्र - 2009


20 अचला नागर- अमृतलाल नागर: बाबूजी बेटाजी एन्ड कम्पनी 2009


21 सुमन केसरी - जे.एन. यू. में नामवर सिंह- 2010

22 नासिर शर्मा- यादों के गलियारे से - 2010

23 ममता कालिया- कल परसो बरसो - 2011


24 प्रेम रघुवंशी -टिगरिया का लोक देवता: भवानीप्रसाद मिश्र                                                                                2011


25 नीलाभ अश्क- ज्ञानरंजन के बहाने - 2012

26 नरेंद्र कोहली- स्मृतियों के गलियारे से - 2012

27 बलराम- माफ करना यार - 2012

28 ओम थानवी- अपने अपने अज्ञेय- 2012

29 शैलेंद्र सागर- फिर रहगुज़र याद आया- 2013

30 राजी सेठ- जहाँ से उजास- 2013

31 मृदुला गर्ग- कृति से कृतिकार - 2013

32 विमलचंद पांडे- ई इलाहाबाद है भैया- 2013


33 मैत्रयी पुष्पा- वो सफर था कि मुकाम: राजेंद्र यादव 2016


34 बालमुकुंद गुप्त- हरिऔध का संस्मरण


35 फणीश्वरनाथ रेणु- समय की शिला पर

36 गोरापन्त शिवानी- वातायन


सम्पर्क सूत्र - 9582452338

                   रोहित कुमार (नेट क्वालीफाई)

Saturday, August 22, 2020

संस्मरण और उनके रचनाकार : प्रथम भाग

 संस्मरण और उनके रचनाकार



1 महावीरप्रसाद द्विवेदी-  अनुमोदन के अंत - 1905

                                   सभा की सभ्यता - 1907

2 पदम् सिंह -                पदम् पराग, प्रबन्ध मंजरी

3 श्रीराम शर्मा-               शिकार - 1936

                                   बोलती प्रतिमा - 1937

                                   जंगल के जीव - 1949


4  मन्मथनाथ गुप्त - क्रांतिकारी का संस्मरण - 1937


5 रामवृक्ष बेनीपुरी -  लालतारा - 1938

                            माटी की मूरतें - 1946

                            गेंहूँ और गुलाब - 1950

                           जंजीर और दीवारें - 1955


6 राधिकारमणप्रसाद सिंह - टूटा तारा - 1940


7 महादेवी वर्मा - अतीत के चलचित्र - 1941

                       स्मृति की रेखाएँ - 1943

                       पथ के साथी - 1956

                       मेरा परिवार - 1972

                       स्मृति चित्र - 1973

                        संस्मरण- 1983


8 रामनरेश त्रिपाठी - 30 दिन मालवीय जी के साथ - 1942


9 शिवपूजन सहाय - वे दिन वे लोग - 1946

                            बच्चन पत्रों में - 1970


10 सत्यजीवन वर्मा -  एक भारतीय एलबम - 1949

11 ओंकार शरद -   लंका महराजिन - 1950


12 बनारसीदास चतुर्वेदी - संस्मरण, हमारे आराध्य, रेखाचित्र,                                      सेतुबंध, (सभी) -1952

                                  प्रेमचंद जी के साथ 2 दिन 


13 मोहन राकेश - आख़िरी चट्टान - 1953


14 कन्हैयालाल मिश्र - जिंदगी मुस्काई -1953

                               दीप जला शंख बजे - 1959

                               माटी हो गयी सोना - 1959

                               क्षण बोले कण मुस्काए - 1963

                               जियें तो ऐसे जियें - 1975

                              अनुशासन की राह में - 1977


15 जगदीशचंद्र माथुर - जिन्होंने जीना जाना - 1954

                               दस तस्वीरें - 1963


16 राहुल सांकृत्यायन - बचपन की स्मृतियां - 1955

                                असहयोग के दिन - 1956

                                जिनका मैं कृतज्ञ हूँ - 1957


17 उपेन्द्रनाथ अश्क - मंटो मेरा दुश्मन - 1956

                             ज्यादा अपनी कम पराई - 1959


18 इन्द्रविद्या वाचस्पति - मैं इनका ऋणी हूँ - 1959


19 विनोदशंकर व्यास - प्रसाद और उनके समकालीन 1960


20 दिनकर -    वट पीपल- 1961

                    लोक देवता नेहरू - 1965


21 हरिवंशराय बच्चन -  नए-पुराने झरोखें - 1962

22 माखनलाल चतुर्वेदी - समय के पाँव - 1962

23 निर्मल वर्मा -           चीड़ों पर चाँदनी - 1964

24  नगेन्द्र -                 चेतना के बिंब - 1967

25 पुन्नालाल बख्शीजी - अंतिम अध्याय - 1972

26 अनिता राकेश -      चंद सतरे और - 1975

27 कमलेशवर -         मेरे हमदम मेरे दोस्त - 1975


28 रामनाथ सुमन -मैंने समृति के द्वीप जलाए - 1976

29 कृष्णा सोबती- हम-हशमत - 1977 

30 शंकरदयाल सिंह - कुछ ख्यालों-कुछ ख्वाबों में - 1978

31 भगवतीचरण वर्मा -अतीत के गर्त से - 1979

                              हम खण्डहर के वासी


32 सुलोचना रांगेय राघव - पुनः - 1979

33 अमृतलाल नागर - जिनके साथ जिया - 1981


34 राजेन्द्र यादव -  औरों के बहाने - 1981

                          वे देवता नहीं - 2000


35 प्रतिभा अग्रवाल - सृजन का सुख-दुख - 1981

36 अज्ञेय - स्मृतिलेखा - 1982


37 रामेश्वर शुक्ल "अंचल"- युगपुरुष - 1983


38 पद्मा सचदेवा -दिवानाखाना - 1984

                         मितवाघर - 1995

                         अमराई -2000

                        लता मंगेशकर: कहाँ से लाऊँ - 2012

                        बारह दरी -2016


39 कमलकिशोर गोयनका -हजारीप्रसाद: कुछ संस्मरण 1988

40 काशीनाथ सिंह - याद हो कि न याद हो - 1992

                            आछे दिन पाछे भए - 2004

                            घर का जोगी जोगड़ा - 2006



सन्दर्भ सूची- 

1 हिंदी का गद्य साहित्य - रामचंद्र तिवारी - विश्विद्यालय प्रकाशन - वारणसी - 12वां संस्करण , 2018



Thursday, August 20, 2020

संस्मरण

                            (संस्मरण)


● संस्मरण शब्द "स्मृ" धातु में "सम" उपसर्ग एवं "ल्युट" प्रत्यय लगाने से बना है। इसका सामान्य अर्थ होता है :- "स्मरण करना, याद करना"..।अर्थात ऐसी पुस्तक या ऐसी कृति, जहाँ लेखक द्वारा अपने जीवन के उन महत्वपूर्ण लम्हों को पुनः जीने की इच्छा से उसे एक लिखित दस्तावेज का रुप दे दिया जाता है जिसका प्रयोग वह कभी-भी करके उन्हें दोबारा साकार कर  सकता है। अंग्रेजी में इसे "मेमोरिस" कहते हैं।


 संस्मरण लेखक, बीते समय को वर्तमान में स्मृति के सहारे प्रस्तुत करता है। यह साहित्य की नई विधा है जिसकी शुरुआत पत्रिकाओं के माध्यम से हुई थी और उसका विकास भी वहीं हुआ था। शुरुआत में लेखकों, पत्रकारों आदि की स्मृति से जुड़े प्रसंगों को पत्रों में प्रकाशित किया जाता था जिसे आने वाले समय में एक स्वतंत्र विधा का नाम दे दिया गया और इससे एक नई विधा " संस्मरण" का उदय हुआ।



●संस्मरण की परिभाषा :-


 "हिंदी साहित्य कोष" के अनुसार :- " संस्मरण लेखक जो स्वयं देखता और अनुभव करता है उसी का वर्णन करता है। उसमें उसकी सम्वेदना, निजी अनुभव होते हैं और स्मृति ही संस्मरण का रूप है"..।


"रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार :- "अकाल्पनिक गद्य-वृत की धारणा सबसे पहले संस्मरण में ही देखी जा सकती है"..। 



● हिंदी साहित्य में संस्मरण की शुरुआत व विकास क्रम :-


हिंदी साहित्य में संस्मरण की शुरुआत "महावीर प्रसाद द्विवेदी" और "बालमुकुंद गुप्त" से मानी जाती है जब उनके संस्मरण "सरस्वती" में प्रकाशित होते थे। इसी प्रकार से, धीरे-धीरे यह विधा अपना विकास करती गयी और हिंदी साहित्य को इस विधा ने ढेरों संस्मरणकार और उनके संस्मरण दिए।



हिंदी के आरम्भिक संस्मरण लेखकों में "पदम् सिंह" शर्मा का नाम प्रमुख है। हिंदी में संस्मरण को कला-रूप की प्रतिष्ठा उन्हीं के माध्यम से मिलती है।



●हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण संस्मरणों का संक्षिप्त परिचय :-



(1)●"ठकुरी बाबा" नामक संस्मरण "महादेवी वर्मा" के "स्मृति के रेखाएं" 1943 में संकलित है। यह संस्मरण एक साहित्यकार की साहित्य सेवा के बदले उसे मिले परिणाम पर आधारित है। लेखिका का मत है कि साहित्यकार हमेशा लोक कल्याण के लिए तत्पर रहता है परंतु उसे लोगों से धोखा ही मिलता है। साहित्यकार की क्या स्थिति होनी चाहिए , उसे किस तरह का सम्मान मिलना चाहिए इत्यादि सवालों को लेखिका ने पाठक वर्ग पर ही छोड़ दिया है।

  

                                                   

(2) ●"माटी की मूरतें" नामक संस्मरण "रामवृक्ष बेनीपुरी" का 1946 में प्रकाशित हुआ था जिसमें लेखक ने "रजिया, सरजू भैया, मंगर, बालगोबिन भगत" आदि का वर्णन करके अपने जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को पाठक वर्ग के समक्ष रखा है।


                                                


(3) ● "अंतिम अध्याय" नामक संस्मरण "पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी" का 1972 में आया था जिसमें लेखक के नौ संस्मरण संकलित हैं। लेखक की आत्मा ठेठ ग्रामीण होने के साथ साथ "महादेवी" की भाँति अत्यंत सामान्य नारी पात्रों का स्मृयांकन से भी जुड़ी है। इसी संग्रह में संकलित " छतीसगढ़ की आत्मा" उनका प्रमुख संस्मरण है।

 


(4) ● "चंद सतरे और" नामक संस्मरण "अनिता राकेश" जी का 1975 में आया था। इसमें "मोहन राकेश" से पहले, उनके साथ और उनके बाद के 3 साल की जीवन-यात्रा को संस्मरणात्मक शैली में लिखा गया है। यह पुस्तक मोहन राकेश के व्यक्तित्व और साहित्य को भी समझने के लिहाज़ से अच्छी है।



(5) ●" हम-हशमत" नामक संस्मरण "कृष्णा सोबती" का 1977 में आया था जोकि एक लंबी जीवनचित्र कथा है। जिसमें स्थितियों और व्यक्तियों का जीवंत चित्रण किया गया है।  


देखा जाए तो संस्मरण से जो अर्थ निकाला जाता है उस दृष्टि से यह कृति कुछ अलग अर्थ रखती है। लेखिका ने अपनी इस कृति में "नामवर सिंह" और "अशोक वाजपेयी" जी को बहुत सम्मान दिया है। 


"नामवर" जी के बारे में लेखिका कहती हैं कि " नामवर के सुसंस्कृत साबुत व्यक्तिव में हिंदी साहित्य के नायक और प्रतिनायक की एक छवि एक साथ देखी जा सकती है"..।   


"अशोक वाजपेयी" जी के बारे में लेखिका कहती हैं कि " अशोक के पास सबदे घना और गुणात्मक रूप है, सजग चेतना का स्नायुतन्त्र जो उसकी अंतः क्रियाओँ की नाक की सीध थामे है"..।


इस में हशमत स्वयं लेखिका ही है।

                                                    


(6) ● " कुछ ख्यालों में कुछ ख्वाबों में" नामक संस्मरण "शंकरदयाल सिंह" का 1978 में आया था।  यह एक विशिष्ट कृति है जिसमें संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्त, शब्द-चित्र सभी कुछ समाहित है। इस कृति में प्रतुत व्यक्तियों के जीवन और उनके मानसिक द्वंद को भी दिखाया गया है।

                                              


(7) ●" पुनः" नामक संस्मरण "सुलोचना रांगेय राघव" जी का 1979 में आया था। इसमें लेखिका ने अपने पति "रांगेय राघव" के रचना संघर्ष और उनकी मृत्यु के बाद लेखिका को किस तरह की त्रासदियां झेलनी पड़ी उसका वर्णन किया है। यह दर्द सजीव के साथ अजीब भी है। यह प्रथम कृति है जिसमें रांगेय राघव का जीवन इतने प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत हुआ है।

                                        


(8) ●"सृजन का सुख-दुख" नामक संस्मरण "प्रतिभा अग्रवाल" का 1981 में आया था। इसमें लेखिका ने अपने रंगमंचीय अनुभवों को सजीव कर दिया है। लेखिका का सम्बंध भारतेंदु के परिवार से है।


                                               


(9) ●"स्मृतिलेखा" नामक संस्मरण "अज्ञेय" का 1982 में आया था । इसमें लेखक ने जिन रचनाकारों का चयन किया है, उनसे वह कहीं बहुत गहरे प्रभावित रहे हैं। विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में " स्मृतिलेखा ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है, पर स्मृति का विशिष्ट सर्जनात्मक उपयोग है। समकालीन साहित्य के इतिहास को एक नया चौखट इस लेख से मिलता है और इस दृष्टि से यह इतिहास-रचना को नया आयाम देता है। यह इसकी गौण उपलब्धि थी, इसकी विशिष्ट उपलब्धि इस बात में है कि "बस आप लेखक में ये देखिए कि, लेखक, लेखक को कैसे देखता है: देखने पे आपकी आँखे मन हो जाएंगी"...।



(10 ●" आदमी से आदमी तक" नामक संस्मरण "भीमसेन त्यागी" का 1982 में आया था ।इसमें दिल्ली के निकट  खुली ज़िन्दगी व्यतीत करने वाले राजस्थानी गाड़िया लोहारों का रेखांकन किया गया है। लेखक ने इसे "शब्द चित्र" कहा है। संस्मनण के पात्र "हरिपाल" ने प्रत्येक शब्द चित्र को रेखा चित्र में प्रस्तुत करके लेखक के मन्तव्य को पूर्ण कर दिया है। लेखक ने गाड़िया लोहारों की जिस औघड़ जिंदगी का चित्रण किया है उसमें उसी के शब्दों में कहें तो- अटूट श्रम था, कठोर संघर्ष था, गजब का भोलापन था और जिंदगी को जीने की अदम्य लालसा भी"..। निःसन्देह लेखक के शब्द-चित्रों में यह जिंदगी अपने प्रामाणिक रूप में पहली बार साकार हुई है। इस दृष्टि से यह कृति हिंदी रेखा-चित्रों की परंपरा में एक सर्वथा नवीन प्रयोग है।

                                                 


(11) ●" युगपुरुष" नामक संस्मरण "रामेश्वर शुक्ल" "अंचल" का 1983 में आया था जिसमें दिखाए गए पुरूषों के जीवन के साथ उनके युग को भी एक नया आकार दिया गया है।

                                                    


(12) ●" याद हो कि न याद हो" नामक संस्मरण "काशीनाथ सिंह" का 1992 में आया था जिसमें लेखक के घनिष्ठ मित्र, लेखक आदि तो हैं ही साथ में बनारस शहर के "अस्सी चौराहे" का भी वर्णन बखूबी किया है। यह शहर भी इन साहित्यकारों की तरह हँसता बोलता जीवित है। इसमें पिछले कुछ दशकों के साहित्य-सृजन का सांस्कृतिक परिवेश भी डाल दिया गया है। लेखक की व्यंग्य शैली भी इस कृति की शोभा बढ़ा रही है।


                                              


(13) ●" सप्तवर्णी" नामक संस्मरण "गिरिराज किशोर" का 1994 में आया था जिसमें IIT कानपुर कुलसचिव के पद से उन्हें 1979 में निलंबित कर दिया गया था जहाँ एक लंबे समय के बाद वह अपनी लड़ाई में जीतते हैं।


वह प्रोयोद्योकि के क्षेत्र में रचनात्मकता लाना चाहते थे परंतु जैसे सप्तवर्णी की शाखाओं को काट दिया जाता है ,उसी तरह से इन कार्य को भी रोक दिया गया। लेखक ने इसी को सप्तवर्णी संहार कहा है...। 


इसी के अतिरिक्त इसमें "अज्ञेय" के जयजानकी जीवनयात्रा का वृत और अंत में 6 सितंबर 1965 से 1 अक्टूबर 1965 तक कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान युद्ध के समय की कुछ डायरियाँ भी जोड़ दी हैं।

                                                



(14) ●" लौट आओ धार" नामक संस्मरण "दूधनाथ सिंह" का 1995 में आया था जहाँ दूधनाथ सिंह घर से चुपचाप निकल जाते हैं और इधर उधर भटक कर बीमार पड़ने से लेकर मृत्यु तक अपने  प्रसंगों को दिखाते हैं। स्वयं लेखक कहते हैं " इसको कुछ भी कह सकते हैं। यह डायरी, संस्मरण, आत्मवाची गद्य, आलोचना, कथा-वृत सब कुछ है।


 इसमें लेखक के शुरुआती वर्षों की धड़कन से छेड़छाड़ और अनेक लोगों की धुँधली और चमकती छवि है। यह एक रंगीन मौजेक है, गद्य का आंतरिक विकास है"...। 


इसकी कथावस्तु को जानने के लिए "शमशेर" की पंक्तियों को ध्यान से पढ़ना होगा :-


"लौट आओ धार

टूट मत ओ साँझ के पत्थर,

हृदय पर मौन लम्बी आह"...।

                                                    


(15) ●" स्मृतियों के छंद" नामक संस्मरण "रामदरश मिश्र" का 1995 में आया था जहाँ लेखक ने उन गुरुओं, मित्रों, साहित्यकारों आदि को याद किया है जिन्होंने उन पर अपने उजास की अमिट छाप छोड़ी है...।


                                                 

(16) ●" चिड़िया रैन बसेरा" नामक संस्मरण "विद्यानिवास मिश्र" का 2002 में आया था जहाँ उन्होंने अपने उन्हीं बसेरो को याद किया है जहाँ जहाँ वह बसते गए। दिल्ली, लखनऊ, रीवाँ, आगरा, अमेरिका आदि। लेखक स्वयं कहते हैं " मैंने अपने जीवन के तिथि क्रम में से यह कड़ियाँ नहीं लिखी। जो भी स्थान मेरे सामने आते गए वह संस्मरण की रील पर आते गए। एक तरह से सोचने पर ये सभी कड़ियाँ फ्लैश बैक हैं"...।


                                           


(17) ●" लखनऊ मेरा लखनऊ" नामक संस्मरण "मनोहर श्याम जोशी" जी का 2002 में आया था। जहाँ लेखक अपने लखनऊ शहर को पुनः जीने की कोशिश करते हैं। लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय में विज्ञान के विद्यार्थी थे और दिल्ली में अमृतलाल नागर के सम्पर्क में आने से वह हिंदी की तरफ बढ़ते हैं।


●" रघुवीर सहाय:रचनाओं के बहाने " नामक संस्मरण भी लेखक का दूसरा संस्मरण 2003 में आया था जहाँ लेखक ने "रघुवीर सहाय" के जीवन पर प्रकाश ही नहीं डाला बल्कि दिल्ली में होने वाली अपनी दोस्ती के किस्से भी शेयर किए हैं। यह कोई आलोचनात्मक पुस्तक न होकर केवल रघुवीर को पुनः याद करने का तरीका भर है"...। 


यह संस्मरण रघुवीर सहाय के मानसिक यात्रा को अधिक महत्व देता है। जैसे कि " जीवन के लंबे दौर तक सहाय जी के बनते बिगड़ते चित्र, टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक द्वारा "दिनमान" का सम्पादक बनाकर बाद में उन्हें निकाल देना जिससे सहाय जी को अंदर तक चोट पहुँचती है। साहित्य अकादमी भी उन्हें तब दिया जाता है जब वह बेरोजगार होते हैं और अंततः 30 दिसम्बर 1990 को उन्हें दिल का दौरा पड़ता है और उनकी मृत्यु हो जाती है। 


लेखक सहाय जी के बारे में कहता है " रघुवीर सहाय आखिरी दम तक रघुवीर ही था। ऐसा विचारक जो हर चीज की गहराईयों तक खो जाता था। जिसका स्वर मानवीय करुणा का था और संवादी स्वर साधारण व्यक्ति के रोज़मर्रापन पर टिका"..।

                                          



(18) ●" नगां तलाई का गाँव" नामक संस्मरण "विश्वनाथ त्रिपाठी" का 2004 में आया था जहाँ उन्होंने अपने गाँव "विस्कोहर" को याद किया है। अपनी कहानी "विस्कोहर की माटी" में भी अपने गाँव को याद किया है।

  


●" गुरुजी की खेती बाड़ी"  "विश्वनाथ त्रिपाठी" का दूसरा संस्मरण 2015 में आया था जहाँ लेखक ने अपने शिष्यों के प्रति समर्पण भाव रखा है जिसमें उनकी स्मृतियों को उकेरा गया है। यह हिंदी की प्रथम और विरल कृति है जिसमें एक गुरुजी द्वारा अपने शिक्षक जीवन और शिक्षकों के प्रति ऐसा भाव रखा है... ।                                          



(19) ●" अपने-अपने अज्ञेय" नामक संस्मरण "ओम थानवी " का 2012 में आया था जिसमें लेखक ने अज्ञेय की जन्म शताब्दी पर पुस्तक तैयार की है। इसमें अज्ञेय के निकट रहने वाले साहित्यकारों से भी संस्मरण लिखवाए गए हैं। इस कृति से अज्ञेय को अच्छे से समझा जा सकता है। 

                                                  


(20) ●" ज्ञानरंजन के बहाने" नामक संस्मरण "नीलाभ अश्क " का 2012 में आया था जहाँ लेखक ने एक ही पथ के 2 हरामियों की मित्रता के बारे में वर्णन किया है। उसके साथ ही उस समय की हलचल को बेबाकी से दिखाया है...। 


इसके साथ ही "पहल" नामक चर्चित पत्रिका के सम्पादक "ज्ञानरंजन" के व्यक्तित्व पर भी प्रकाश गिराया है।

                                                


                                               

(21) ●" जहाँ से उजास" नामक संस्मरण "राजी सेठ" का 2013 में आया था जहाँ अपने गुरुओं ,दर्शन शास्त्र के अध्यापक नंदकिशोर आचार्य को, जैनेंद्र, अज्ञेय, निराला आदि को याद किया है।

                                                        



(22) ●" कृति और कृतिकार" नामक संस्मरण "मृदुला गर्ग" का 2013 में आया था जहाँ अपनी यात्रा के सहयात्रियों के जीवन रंग को दिखाया है।

                                                        


(23) ●" फिर मुझे रहगुज़र याद आया" नामक संस्मरण "शैलेंद्र सागर" का  2013 में आया था जहाँ लेखक ने न केवल अपनी बात लिखी है बल्कि इसका नायक "रामपुर" नाम का गाँव जहाँ लेखक का बचपन गुजरा है, को भी मुख्य रूप से वर्णित किया है। 

                                                  



(24) ●" पकी जेठ का गुलमोहर" नामक संस्मरण "भगवान दास मोरवाल" का 2016 में आया था जहाँ बदलते आधुनिक-ग्रामीण समाज के बहाने समाजशास्त्र और मानवशास्त्री आख्यान लिखा है।


                                       

(25) ● "विशाल भारत" पत्र द्वारा जोकि बनारसीदास चतुर्वेदी के सम्पादकत्व में निकलता था उन्होंने "शहीद अंक" निकालकर देश के शहीद जवानों के प्रति सम्मानीय भाव प्रकट किया है।




● सन्दर्भ सूची:-


1 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास - रामस्वरूप चतुर्वेदी- लोकभारती प्रकाशन - 25वां संस्करण - 2018


2 हिंदी का गद्य साहित्य -रामचंद्र तिवारी- विश्विद्यालय प्रकाशन -वाराणसी- 12वाँ संस्करण - 2018


3 EPG पाठशाला वेबसाइट

4 संस्मरण विकिपीडिया



Sunday, August 16, 2020

जीवनी

 हिंदी साहित्य की गद्य विधा “जीवनी” पर एक संक्षिप्त नोट्स



हिंदी साहित्य की नेट/जे.आर.एफ  व अन्य प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछी जाने वाली महत्वपूर्ण जीवनियों व उनके रचनाकारों के नाम जोकि परीक्षा के लिहाज़ से भी पाठकों के लिए एकदम उचित व लाभदायक है। सम्भव है कि इन चुनिंदा रचनाओं में से आगामी परीक्षाओं में एक से दो प्रश्न आने की पूरी सम्भावन रहेगी जिससे कि पाठकों को कम समय में, इधर-उधर भटकने के स्थान पर एक ही मंच से इस विषय पर जानकारी मिल सकेगी । हमारा उद्देश्य भी कुछ इसी विचारधारा पर टिका है। हम अपने पाठकों की सुविधा हेतु व समय की बचत को भी ध्यान में रखते हुए सामग्री प्रदान कराने की कोशिश कर रहे हैं। आशा करते हैं कि ब्लॉग पर मिल रही सामग्रियाँ आपके ज्ञानवर्धन में किसी भी तरह से मदद कर रही होंगी। आप अपना सहयोग यूँही बनाये रखिये और हमारे साथ जुड़े रहने के लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद। आप समय-समय पर अपने सुझावों, सवालों, प्रतिक्रियाओं, किसी विषय पर आपको जानकारी चाहिए हों तो उसे भी बताकर आप अपना और ब्लॉग का भी प्रसार के साथ मदद भी करें जिससे कि अन्य पाठकों को भी लाभ मिल सके।


● हिंदी साहित्य की कुछ महत्वपूर्ण जीवनियाँ:-


1 नाभादास –   भक्तमाल – 1575

2 गोकुलनाथ – चौरासी वैष्णव की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णव की वार्ता- 17वी शती


3 कार्तिकप्रसाद खत्री – अहिल्याबाई का जीवन – 1887

                                शिवाजी का जीवन चरित्र – 1889


4 राधाकृष्ण दास – भारतेंदु हरिश्चंद्रका जीवन चरित्र – 1904

5 शिवनंदन सहाय – हरिश्चंद्र – 1905

6 गंगाप्रसाद गुप्त – दादा भाई नोरोजी – 1906

7 बालमुकुंद गुप्त – प्रतापनारायण मिश्र – 1907


8 श्यामसुंदर दास – कविता कोविंद (40 साहित्यकारों का जीवन चरित – 1909


9 रामचंद्र शुक्ल – बाबू राधाकृष्ण दास – 1913

10 मुकुन्दीलाल वर्मा – कर्मवीर गाँधी -1913

11 सम्पूर्णानन्द – धर्मवीर गाँधी – 1914

12 राजेंद्र प्रसाद – चम्पारण में गाँधी – 1919

                          बापू के कदमों में – 1950


13 रामदयाल तिवारी – गाँधी मीमांसा – 1921

14 महावीरप्रसाद द्विवेदी- सुकवि संकीर्तन – 1924

15 गणेशशंकर विद्यार्थी -  श्री गाँधी – 1931

16 सीताराम चतुर्वेदी - महामना मदनमोहन मालवीय – 1937


17 घनश्याम बिड़ला – बापू – 1940

                               मेरे जीवन में गाँधी – 1975


18 शिवरानी देवी – प्रेमचंद:घर में – 1944

19 काका कालेलकर – बापू की झांकियां – 1948

20 सुशीला नायर – बापू के कारावास की झांकियां – 1949

21 रामवृक्ष बेनीपुरी – जयप्रकाश नारायण – 1951


22 जगदीशपुर चन्द्र माथुर – जिन्होंने जीना जाना (12 लेखकों की कथा) – 1954


23 तेजबहादुर सिंह – मेरे बड़े भाई शमशेर – 1955

24 देवव्रत शास्त्री – गणेशशंकर विद्यार्थी – 1959

25 जैमिनी कौशिक बरुआ – माखनलाल चतुर्वेदी – 1960

26 अमृतराय – कलम का सिपाही – 1962


27 चंद्रशेखर शुक्ल – रामचंद्र शुक्ल:जीवनी और व्यक्तित्व – 1962


28  मदन गोपाल – कलम का मजदूर – 1964

29 जैनेन्द्र – अकाल पुरुष गाँधी – 1968


30 रामविलास शर्मा – निराला की साहित्य साधना – (3 भागों में  1969, 72, 76)


31 शांति जोशी – सुमित्रानंदन पंत:जीवनी और साहित्य – 1970


32 विष्णु प्रभाकर – आवारा मसीहा – 1974

33 अमृतलाल नागर – चैतन्य महाप्रभु – 1975


34 विष्णुचंद्र शास्त्री – अग्निसेतु (बंगाल के विद्रोही कवि नजरुल इस्लाम पर) – 1976

              समय साम्यवादी (राहुल सांकृत्यायन पर ) – 1997


35 शिवसागर मिश्र – दिनकर :एक महापुरुष – 1981


36 रामकमल राय – शिखरों से सागर तक (अज्ञेय पर) – 1986


37  शोभाकांत – बाबूजी (नागार्जुन पर) – 1991


38  सुलोचना रांगेय राघव -रांगेय राघव:एक अंतरंग परिचय – 1995


39कलमा सांकृत्यायन – महामना महापंडित राहुल सांकृत्यायन (राहुल जी की दूसरी पत्नी द्वार रचित) – 1997


40 प्रतिभा अग्रवाल – प्यारे हरिश्चंद्र जू – 1997

41 ज्ञानचंद जैन – कथाशेष (अमृतलाल नागर पर) – 1999

                                भारतेंदु: एक व्यक्ति चरित्र - 2004


42 बिंदु अग्रवाल – स्मृतियों के झरोखें से (भारतभूषण अग्रवाल पर) – 1999


43 महिमा मेहता – उत्सव पुरुष ( नरेश मेहता पर) -2003


44 कृष्णबिहारी मिश्र – कल्पतरु की उत्सव लीला (रामकृष्ण परमहंस पर) – 2004


45 कुमुद नागर – वटवृक्ष के छाया में (अमृतलाल नागर पर)- 2004


46  गायत्री कमलेश्वर – कमलेश्वर:मेरे हमसफ़र – 2005

47 विजयबहादुर सिंह – आलोचक के स्वदेश (नंदुलारे वाजपेयी पर) -2008

48 अखिलेश – मकबूल - 2011


49 नरेंद्र मोहन – मंटो जिंदा है (उर्दू साहित्यकार सआदत हसन “मंटो” पर) – 2012

50 अशोक वाजपेयी- कोलाज – 2012


● विदेशी व्यक्तित्वों पर लिखी कुछ महत्वपूर्ण जीवनियाँ:-


1रमाशंकर व्यास – नेपोलियन बोनापार्ट – 1883

2 गौरीशंकर ओझा – कर्नल जेम्स टॉड – 1902

3 नाथूराम प्रेमी – जॉन स्टुअर्ट मिल – 1912

4 शिवनारायण विद्रोही – कोलम्बस – 1917

5 बेनीप्रसाद – महात्मा सुकरात – 1917

6 सत्यव्रत – अब्राहम लिंकन – 1928

7 शिवकुमार शास्त्री – नेल्सन की जीवनी – 1928

8 चन्द्रशेखर शास्त्री – हिटलर महान – 1936

9 राहुल सांकृत्यायन – मार्क्स, लेनिन, स्टालिन – 1954


Thursday, August 13, 2020

जीवनी

                           (जीवनी)



प्रस्तुत ब्लॉग में हिंदी साहित्य की गद्य विधा "जीवनी" के बारे में एक संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। इस ब्लॉग में कोशिश की जा रही है कि हिंदी की मुख्य जीवनियों के बारे में जितनी अधिक जानकारी हो सके वह प्राप्त कराई जा सके। वैसे तो किसी भी जीवनी के बारे में एक अच्छी जानकारी तब ही मिल पाती जब हम उस जीवनी के कुछ संवादों को, कुछ प्रसंगो को कुछ पात्रों आदि की चर्चा करके पाठकों तक जानकारी मुहैया कराएं परन्तु साहित्येतिहास, प्रतियोगी पुस्तकों व अन्य पुस्तकों के माध्यम से जो भी जानकारी जुटाई गई है उसे यहाँ पेश करने की कोशिश की जा रही है। वैसे मुख्य- मुख्य जीवनियों के परिचय भर से भी कई बार परीक्षा के लिहाज़ से यह जानकारी बेहतर साबित हो जाती है, उसी को ध्यान में रखते हुए यह जानकारी साझा की जा रही है।


●जीवनी शब्द "जीवन" से बना है जिसमें "ई" प्रत्यय लगाकर इस शब्द को पूरा किया गया है। इस शब्द का अर्थ होता है "किसी व्यक्ति के जीवन चरित्र का चित्रण करना"..। यह चित्रण उसके किसी ख़ास, प्रिय, विशेष, बहुत करीबी व्यक्ति द्वारा किया जाता है क्योंकि ऐसा समझा जाता है कि, किसी के भी जीवन के बारे में उस व्यक्ति के बाद जिसके पास सबसे ज्यादा जानकारी रहती है वह उसके सगे-सम्बन्धियों, मित्रगण आदि लोगों के पास ही होती है। उन्हें ही सही मायने में जीवनी चरितनायक के बारे में इतनी गूढ़ जानकारी रह सकती है जिसके तहत एक जीवनी का निर्माण किया जा सकता है। जीवनी को अंग्रेजी में "बायोग्राफी" कहते हैं। 


● जीवनी साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है। प्रायः जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रतिष्ठित व्यक्तियोँ की जीवनियाँ लिखी जाती हैं क्योंकि उनका जीवन भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है। हिंदी में जीवनी लेखन का आरम्भ विलम्ब से हुआ क्योंकि गद्य विधा की शुरुआत भी हिंदी में काफी लंबे समय बाद हुई। इस विधा के माध्यम से हम किवदंतियों व भ्रामक तथ्यों से पाठक वर्ग को सचेत कर सकते हैं और जीवनी चरितनायक के मित्रों, परिजनों आदि से आवश्यक जानकारी प्राप्त करके हम साहित्य व पाठक वर्ग को दुरुस्त कर सकते हैं। साहित्य में इस विधा की वृद्धि 19वीं शती के उत्तरार्ध से हुई परंतु इसे जो त्वरित गति मिली वह द्विवेदी युग के बाद मिली। द्विवेदीयुग के बाद से भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर जीवनियाँ लिखी गयी और साहित्य में एक नई विधा को और दृढ़ किया गया। इस विधा ने प्रस्तुत लेखक के निजी जीवन के बारे में भी जानने का मौका दिया जिससे पाठक वर्ग अछूता ही रह जाता है। आज हिंदी साहित्य में सैंकड़ो जीवनियाँ लिखी जा चुकी हैं और समय के प्रवाह में इस विधा में निरन्तर नए नए बदलावों के साथ इस विधा को एक नई दृष्टि देने में भी हमारे जीवनीकारों ने अहम भूमिका निभाई है।


● रामचंद्र तिवारी के अनुसार जीवनी लिखने के लिए कुछ शर्तें व मुख्य तत्व हैं जिनके आभाव में जीवनी अपनी पूर्णतः को प्राप्त नहीं हो सकती। वह कहते हैं कि " जीवनी लिखने के लिए चरितनायक के सम्बंध में पूरी जानकारी आपेक्षित है। चरितनायक के प्रति पूज्यभाव या प्रशंसात्मक दृष्टिकोण होने के कारण प्रायः उसके जीवन के वे प्रसंग छोड़ दिए जाते हैं जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से समान महत्व दिया जाना चाहिए। हर मनुष्य के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब वह देवता होता है और ऐसे भी क्षण आते हैं जब उसके अंदर की पशुता बाहर आ जाती है। जीवनी लेखक के लिए आवश्यक है कि वह तटस्थ भाव से स्थितियों का चित्रण करें"..। जीवनी लेखन उस समय कठिन हो जाता है जब अपने ही किसी परिजन जैसे पति-पिता-पुत्र-पुत्री आदि के बारे में लिखनी हो, तब जीवनीकार उतना तटस्थ रह पाने में उतना स्वतंत्र नहीं रह पाता है । परन्तु इस विधा की माँग तटस्थता पर ही टिकी है।


●वैसे तो भारत में जीवनी लेखन प्राचीन काल से ही चला आ रहा है जैसे अशोक के अभिलेखों से उसका पता चलना, बाबरनामा, हुमायूँनामा, अकबरनामा कुछ इसी तरह के उदाहरण हैं। परंतु हिंदी साहित्य में इसकी शुरुआत 16वी शती से होती है जब नाभादास द्वारा "भक्तमाल" की रचना हुई थी। इस कृति में हिंदी के कई लेखकों का वर्णन किया गया है। इसके बाद गोकुलनाथ कृत "84 और 252 वैष्णव की वार्ता" भी जीवनीपरक रचना रही है। जिसमें कई व्यक्तियों के जीवन पर आधारित विवरण दिया गया है। यह विद्या आधुनिक युग में अपनी जड़ों को विकसित करती है।


● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार आधुनिक काल के आरम्भ में अर्थात 19वी शती के समय में रची जा रही जीवनी के नायकों के लिए प्रायः महाकाव्योचित गुण आवश्यक समझे जाते थे। जीवनियों का प्रस्तुतिकरण पहले प्रकाशकीय स्तर पर आरम्भ होता था। जहाँ किसी भी जीवनीपरक कृति पर लेखक का नाम न रहकर उसके प्रकाशक का नाम लिखा रहता था।


तत्कालीन शताब्दी में कलकत्ता व बनारस में कुछ ऐसे प्रकाशक थे जो निम्न तरह की पुस्तकें छापा करते थे। इनमें आदर्श वृत जीवनियाँ भी हुआ करती थी जिन्हें जनसाधारण को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता था। उसके पीछे किसी तरह के कलात्मक रूप देने की आवश्यकता वह नहीं समझते थे। प्रकाशकीय दृष्टि से तैयार होने के कारण कई बार इन पुस्तकों पर लेखकों के नाम नहीं हुआ करते थे। 


इस समय रची जा रही जीवनियों के नायक अधिकांशतः पौराणिक, ऐतिहासिक व समसामयिक चरित्रों पर आधारित हुआ करते थे। इसे यों भी समझ सकते हैं कि, उन्हीं चरित्रों पर जीवनियाँ लिखी जाती थी जो समाज में एक प्रेरणा स्रोत का कार्य करते हों। जिनसे समाज को किसी भी प्रकार का लाभ होता हो, जो एक भावी समाज की निर्मित में योगदान दे सकते हों। जिनसे समाज में एक सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती हो और उनसे युवाओं को, महिलाओं को साथ ही अन्य लोगों को भी एक प्रोत्साहन मिलता है। जैसे "कार्तिकप्रसाद खत्री" विरचित "शिवाजी का जीवन चरित, मीराबाई का चरित्र, अहिल्याबाई का जीवन चरित्र" आदि।


इस युग में जीवनीकारों की दृष्टि आदर्श और शिक्षाप्रद हुआ करती थी।


साहित्यिक ढंग की जीवनियाँ या ठीक-ठीक ढंग की जीवनियाँ 20वीं शताब्दी से ही लिखी गयी।



● जीवनी सम्बन्धी महत्वपूर्ण परिभाषाएँ:-


1 "बाबू गुलाबराय के अनुसार " जीवनी घटनाओं का अंकन नहीं वरन चित्रण है.. वह साहित्य की विधा है और उसमें साहित्य और काव्य के सभी गुण है..। वह मनुष्यों के अंदर और बाहरी स्वरूप का कलात्मक निरूपण है"...।


2 "राजपाल हिंदी कोष के अनुसार " जीवनी को जीवन कथा या जिंदगीनामा कहा गया है..।



● हिंदी साहित्य की कुछ महत्वपूर्ण जीवनियाँ व उनके बारे में संक्षिप्त परिचय:-



1 "माखनलाल चतुर्वेदी" नामक जीवनी माखनलाल चतुर्वेदी पर लिखी गयी है जो 1960 में आई थी। इसके लेखक "जैमिनी कौशिक बरुआ" जी हैं। इस कृति में जीवनीकार ने बहुत से अंश चरितनायक के मुँह से ही कहलवाए हैं। इस कारण इस कृति में जीवनीपन कुछ कम सा हो गया है। कहने का अर्थ है कि "जीवनी के लिए चाहिए कि जीवनीकार अपनी मेहनत से उस लेखक के बारे में वह सभी जानकारी खोजे जिसके आधार पर एक साहित्यिक जीवनी लिखी जा सकती है। यदि उसके स्थान पर लेखक जीवनी चरितनायक से ही ज्यादातर कथन हु-ब-हु रख दे तो वह इस विधा के नियमों का उल्लंघन करता हुआ प्रतीत होगा और एक उत्कृष्ट जीवनी लिखने में नाकामयाब रहेगा।

 

                                      (जैमिनी कौशिक बरुआ)



2 "कलम का सिपाही" नामक जीवनी 1962 में महान कथाकार प्रेमचंद के सुपुत्र "अमृतराय" ने लिखी है। यह कृति अमृतराय द्वारा अपने पिता कथा सम्राट प्रेमचंद पर लिखी गयी है। यह 650 पृष्ठों की विशालकाय रचना है। इस सम्पूर्ण जीवनी का एक विशिष्ट पक्ष यह है कि "युग की प्रवृति के अनुसार यहाँ महान और उदात्त घटनाओं पर बल न देकर लेखक ने सामान्य मनुष्य जीवन की ही रचना का यत्न किया गया है। इस रूप में "कलम का सिपाही" एक बड़े लेखक की जीवनी होने की पूरी तरह योग्यता रखती है।


इस रचना की निर्मित के लिए प्रेमचंद के पत्र, संस्मरण, उनके व्याख्यान, लेखन व निजी अनुभव को आधार बनाया है।


इस कृति पर 1963 में साहित्य अकादमी भी मिला है।


                                                         (अमृतराय)



3 "कलम का मजदूर" नामक जीवनी प्रेमचंद पर "मदन गोपाल" द्वारा 1964 में लिखी गयी थी। यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी जिसे बाद में मदन गोपाल ने हिंदी में प्रकाशित किया था। इस कृति में भी प्रेमचंद के निजी व साहित्यिक जीवन का विवेचन किया गया है।


                                                      (मदनगोपाल)




4 "निराला की साहित्य साधना" नामक जीवनी 3 भागों में प्रकाशित छायावादी काव्यस्तम्भ "निराला" पर आधारित है, जिसे हिंदी के अग्रणी आलोचक "रामविलास शर्मा" द्वारा रचा गया है। 1969 में इसका पहला भाग आया था जिसमें निराला के जीवन पर प्रकाश डाला गया है। इस भाग में 15 अध्याय हैं।  इसका दूसरा भाग 1972 व तीसरा भाग 1976 में आया था। 


यह कृति न केवल निराला की रचनाओं को समझने के लिए आवश्यक है बल्कि निराला और छायावादी युग के पूरे संघर्ष और अंतर्विरोध को समझने में भी यह हमारी सहायता करती है। इसमें निराला की प्रतिभा को महिमामंडित करने या कम से कम न बिगड़ने देने के उद्देश्य से कुछ प्रंसगो को नजरअंदाज अवश्य कर दिया गया है, किंतु कृति की सार्थकता को देखते हुए यह अनवधानता क्षम्य है।


                                                (रामविलास शर्मा)



5 " सुमित्रानंदन पंत: जीवनी और साहित्य" नामक जीवनी, छायावाद के प्रमुख कवि "पन्त" के जीवन पर आधारित है जिसे उनकी बहिन और दर्शनशास्त्र की विदुषी "शांति जोशी" द्वारा लिखा गया है। यह कृति दो खंडों में प्रकाशित है जिसका प्रथम भाग 1970 व दूसरा भाग 1976 में प्रकाशित हुआ था। इसमें पन्त के व्यक्तित्व व साहित्यिक जीवन का विवेचन किया गया है। 


इसके अतिरिक्त "निराला सम्बन्धी जीवनी" में पन्त जी ने उनके व्यक्तित्व व साहित्यिक जीवन को अलग-अलग खंडों में प्रकाशित किया है परन्तु इस कृति में ऐसा नहीं है। इसमें पन्त जी के समग्र जीवन को एक ही खण्ड में रखा गया है जिसके कारण यह अपने विशालकाय रूप में प्रस्तुत हुई है जिसके चलते इस कृति को दो खंडों में प्रकाशित करना पड़ा है। इसके अतिरिक्त "निराला-पन्त प्रसंग में" रामविलास शर्मा द्वारा छेड़े गए सवालों के उत्तर देने की भी इस कृति में कोशिश की गई है।


प्रायः यह पूरी जीवनी चरितनायक के जीवित रहते ही पूरी कर दी गयी है जिससे यह सुलभता हुई कि प्रमाणों और तथ्यों की सही-सही जानकारी मिल सकी है।


                                                      (शांति जोशी)



6 " जिन्होंने जीना जाना" नामक जीवनी 1971 में "जगदीशचंद्र माथुर" द्वारा कुछ साहित्यकारों, राजनेताओं, कलाकारों की जीवन रेखाओं को एक साथ प्रस्तुत करके उनके चरित्र वैशिष्ट्य को उभारने की कोशिश में लिखी गई है। इस कृति में 7 साहित्यकारों, 2 राजनेताओं, 1 विचारक और 1 कलाकार व एक अभिनेत्री का चरित लेख प्रस्तुत किया गया है।

                                             (जगदीशचंद्र माथुर)

  


7 "आवारा मसीहा" नामक जीवनी बंगाल के कथाकार "शरतचंद्र" पर आधारित है जिसे "विष्णु प्रभाकर" जी ने 1974 में पूरा किया था। 


इस कृति की भूमिका में लेखक बताते हैं कि "श्रेष्ठ जीवनी लेखक काल, देश, व्यक्ति और घटना की सीमाओं को तोड़कर अनुभूतियों का सौंदर्य में विक्षेपण करता है। विशुद्ध कला और मानदंडों के बीच संतुलन और सामंजस्य का प्रणयन करता है"...। तभी जाकर कोई जीवनी अपनी सम्पूर्णता में सिद्ध होती है।


यह 400 पेजों की एक बड़ी रचना है। इस कृति में शरतचंद्र के उपन्यास श्रीकांत, चरित्रहीन, देवदास, सुभदा, पल्लीसमाज आदि का भी विवरण दिया गया है।


शरतचंद्र की प्रशंसा करते हुए विष्णु प्रभाकर जी कहते हैं" जिस प्रतिभा के बल और उन्होंने रवींद्र युग में बरगद के पेड़ के नीचे न केवल अपना स्थान बनाया बल्कि समूचे देश को अपनी ओर आकर्षित किया। यह क्या कम अभिनंदनीय है ?...।


इस कृति के नामकरण के सम्बंध में लेखक कहते हैं कि " मैं तो इस नाम के माध्यम से यही बताना चाहता था कि कैसे एक आवारा लड़का अंत में पीड़ित मानवता का मसीहा बन गया। आवारा और मसीहा दो ही शब्द हैं। दोनों में यही अंतर है कि "आवारा" के सामने दिशा नहीं होती, और जिस दिन उसे दिशा मिल जाती है उसी दिन वह "मसीहा" बन जाता है"...।

                                                   (विष्णु प्रभाकर)



8 "दिनकर एक सहज पुरुष" नामक जीवनी "शिवसागर मिश्र" द्वारा 1981 में "दिनकर" जी पर लिखी गयी है जिसमें उनके मानवीय पक्षों को उभारने की कोशिश की गई है। यह जीवनी आत्मकथात्मक शैली में लिखी है।


                                                 (शिवसागर मिश्र)

 


9 " मेरे बड़े भाई शमशेर" नामक जीवनी 1995 में शमशेर के छोटे भाई "तेजबहादुर सिंह" ने शमशेर  के जीवन और लिखी है । इसमें उनकी प्रतिभा को बड़ी निष्ठा के साथ स्वीकार किया गया है- " जो सत्य के आवरण से सुरक्षित, झूठ से कोसों दूर, अत्यंत भावुक , निश्छल , कठिन परिस्थितियों में भी अडिग हँसने वाला व्यक्तित्व विशिष्ट था" ...।


                                                (तेजबहादुर सिंह)




10 " महामना महापंडित" नामक जीवनी 1995 में राहुल सांकृत्यायन पर उनकी दूसरी पत्नी  कमला सांकृत्यायन" द्वारा लिखी गयी है जिसमें उन कोमल व अंतरंग प्रसंगों का समावेश है जो इस जीवनी को अलग पहचान देती है। परन्तु राहुल जी के अंतिम दिनों के अवसाद और मानसिक द्वंद्व का उदघाटन इसमें नहीं है जो उनके लिए सांघातिक सिद्ध हुआ"...। शायद ऐसे प्रसंगों को छेड़कर लेखिका एक बार पुनः उन लम्हों को याद नहीं करना चाहती थी जिसने उनके जीवन में अवसाद के चित्र खींच दिए थे। 


                                            (कमला सांकृत्यायन)




11 "समय साम्यवादी" नामक जीवनी 1997 में राहुल सांकृत्यायन जी पर लिखी एक अन्य जीवनी है जिसे "विष्णुचन्द्र शास्त्री" ने लिखा है। यह 723 पृ का एक महाग्रन्थ है जिसमें उनके संघर्ष और विचारधारा को दिखाया गया है।


                                               (विष्णुचन्द्र शास्त्री)



12  " प्यारे हरिश्चंद्र जु" 1997 में उनकी परिवार से संम्बंध रखने वाली भारतेंदु के फुफेरे भाई राधाकृष्ण दास की दौहित्र "प्रतिभा अग्रवाल" जी ने लिखी है जिसमें उन्हें एक युग प्रवर्त्तक के रूप में दिखाया है जिसे केंद्र में रखकर युग की जीवंत प्रतिमा खड़ी की है। यह वृत-प्रधान जीवन गाथा न होकर भारतेंदु के विराट व्यक्तित्व और उनके साथ जुड़े साहित्य संसार का राग-रस पूर्ण महाकाव्यात्मक आख्यान है।

                                                (प्रतिभा अग्रवाल)




13 "रांगेय राघव:- एक अंतरंग परिचय" नामक जीवनी 1997 में रांगेय राघव जी की पत्नी "सुलोचना रांगेय राघव" द्वारा लिखी जीवनी है जिसमें रांगेय राघव जी की कथा कही है। यहाँ लेखिका अपनी बेटी को लिखे 2 पत्रों के माध्यम से कहती है कि " एक चित्रपट की भांति मेरे मानस पर तुम्हारे पिता के साथ बिताए हर क्षण की प्रतिछाया बनी हुई है और मैं चाहती हूँ कि एक- एक छायाओं को खोलकर तुम्हारे सामने रख दूँ...। इस जीवनी में लेखिका ने यही किया है। यह पूरी अंतरंग कथा भीगे नयनों से लिखी गयी है।


                                                 (सुलोचना राघव)



14 " स्मृतियों के झरोखे से" नामक जीवनी 1999 में भारतभूषण अग्रवाल पर उनकी पत्नी "बिंदु अग्रवाल" ने लिखी है जिसकी अंतिम पंक्तियों में वह कहती हैं" भारत जी का साहित्यिक व्यक्तित्व क्या था ये तो समय ही बताएगा पर मेरे लिए तो वह सब कुछ थे..। उन्होंने ही मुझे बड़े यत्नों से गढ़ा था....मैंने अपनी पूरी सच्चाई के साथ और आत्मतोष के साथ कुछ लिखने का प्रयास किया है"...। इस कृति में लेखिका ने एक पत्नी और सहृदय समीक्षक दोनों का दायित्व अच्छे से निभाया है।


                                                    (बिंदु अग्रवाल)




15 " कथाशेष" नामक जीवनी 1999 में अमृतलाल नागर पर उनके मित्र व साहित्यिक यात्री "ज्ञानचन्द्र जैन" ने लिखी है। जिसमें इस कथा को 4 भागों "परिचय" , "आरम्भिक साहित्यिक जीवन", "फिल्मी जीवन के सात वर्ष" व "साहित्य साधना के 4 दशक" नामों में बाँटा गया है। नागर जी के अछूते कोणों पर प्रकाश डालने वाली यह कृति पूरी तरह से विश्वनीय है।


                                                     (ज्ञानचंद जैन)



16  "उत्सव पुरुष: श्री नरेश मेहता" नामक जीवनी 2003 में उनकी पत्नी "महिमा मेहता" द्वारा लिखी गयी है। इस जीवनी की बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लेखिका और चरितनायक दोनों का ही चित्रण हुआ है जो विवाह के बाद से लेकर जीवन के अंतिम समय तक उनके जीवन को सँवारती हैं। इस कृति को पढ़कर हम श्री मेहता जी के जीवन-संघर्ष से तो परिचित होते ही हैं, उनके सर्जक व्यक्तित्व के अंतरंग क्षणों का साक्षात्कार भी करते हैं।


कृति में उनके जन्म स्थान व बालपन के किस्सों से लेकर उनके वैवाहिक जीवन व जिन परिस्थितियों में वह इलाहाबाद आकर रहे थे और उसके बाद किस तरह से नरेश मेहता जी ने खुद को पूरी तरह से रचनात्मक लेखन में लगा दिया था यह सभी प्रसंग इस कृति की शोभा बढ़ाते हैं। नरेश मेहता को प्राप्त सम्मानों का विवरण भी इन कृति में दिया गया है। 


22 नवम्बर 2000 की सुबह यों ही कागज पर कलम चलाते हुए आपने लिखा:-


क्या कोई यह भी जान पाएगा कि

किन परिस्थितियों, विषमताओं में

जीकर यहाँ तक पहुँचा?...।


ये नरेश मेहता के अंतिम शब्द थे। इसी दिन रात्रि में 11:30 पर आपकी अप्रत्याशित मृत्यु हो गयी जिसकी वजह डॉक्टर ने स्वाभाविक मृत्यु बताई।


                                                    (महिमा मेहता)




17 "वटवृक्ष की छाया में" नामक जीवनी 2004 में अमृतलाल नागर पर उनकी बेटी "कुमुद नागर" द्वारा उनकी स्मृतियों को संभालने के लिए लिखी गयी थी। श्री नागर जी के कुछ अछूते प्रसंगों को व रचनात्मक संघर्षों को सामने लाकर "कुमुद नागर" ने इस कृति को अत्यंत रोमांचक बना दिया है।


                                                      (कुमुद नागर)




●सन्दर्भ ग्रँथ:-


1 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन,  25वां संस्करण 2018..।


2 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचंद्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 12वां संस्करण 2018..।


3 EPG पाठशाला वेबसाइट।



Wednesday, August 5, 2020

प्रेमचंद : एक वैचारिकी


इससे पूर्व के लेख में लेखक (दिनकर) के व्यक्तित्व और कृतित्व पर जानकारी प्रदान करने की कोशिश गई थी जिससे कि पाठक वर्ग को उनके जीवन के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानकारी हासिल हो सके। लेख में दिनकर जी के निजी जीवन से लेकर उनके साहित्यिक जीवन तक, उनके साहित्यिक जीवन से प्राप्त यश की जानकारी तक, उन्हें प्राप्त सम्मानों की जानकारी, वह जिस भी पद पर आसीन रहे और उनके पारिवारिक जीवन के बारे में जिस भी प्रकार की जानकारी दी गयी थी वह सभी उस लेख के शीर्षक के बिल्कुल अनुकूल ही थी परन्तु आज इस लेख में यह कोशिश की गई है कि प्रेमचंद के निजीजीवन और साहित्यिक जीवन के केवल उन पहलुओं और घटनाओं को ही अभिव्यक्त करने की कोशिश की जाए जिससे अधिकांश पाठक वर्ग अछूते रह जाते हैं। या इसे यों भी समझ सकते हैं कि केवल उन ही जानकारियों को पाठकों तक पहुँचाया जाए जिसे सामान्य स्तर पर पढ़ने वाला पाठक वर्ग हासिल नहीं कर पाता है। प्रेमचंद के निजी जीवन और उनके साहित्यिक जीवन के उन मार्मिक प्रसंगों के साथ ही उनके जीवन में नित्य आने वाले बदलावों, उनके जीवन में चल रही कश-म-कश, उन पर पड़ने वाले मुख्य तौर के राजनीतिक, सामाजिक प्रभाव आदि का वर्णन करना ही इस लेख का उद्देश्य है। इस लेख के माध्यम से प्रेमचंद जी के व्यक्तित्व को एक नए ढंग से वर्णित किया जा रहा है। जिसमें कुछ हदतक उनकी वैचारिकी को अधिक महत्व देने की कोशिश की गई है। मेरे निजी विचार से किसी भी लेखक को समझने के लिए ज्यादा जरूरी होता है कि उस पर लिखी आलोचनाओं, समीक्षाओं, उनके संस्मरणों और उनके पत्रों को पढ़ने से हम उस लेखक के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा और अच्छी सी जानकारी हासिल कर सकते हैं व उस लेखक को गहराई से भी समझ सकते हैं। उस लेखक पर लिखी "जीवनी" का भी उसके व्यक्तित्व को खंगालने में कारगर सहयोग होता है इसलिए इस लेख में प्रस्तुत जानकारियों के लिए इन्ही विधाओं और शेष सामग्रियों का प्रयोग किया गया है, जिससे कि प्रेमचंद के बारे में ज्यादा से ज्यादा और विश्वसनीय जानकारी प्राप्त हो सके। लेख की शुरुआत प्रेमचंद  के एक सामान्य परिचय से की जा रही है।
वैसे तो प्रेमचंद के बारे में हिंदी ही नहीं हिन्दीतर क्षेत्रों के भी कई पाठकों के पास भी कुछ न कुछ जानकारी अवश्य रहती होगी, चाहे वह उनके निजी जीवन से जुड़ी जानकारी हो या उनके साहित्यिक जीवन से जुड़ी। उनके तमाम प्रसंगों में से कुछ-कुछ या बहुत प्रसिद्ध प्रसंगों का परिचय, हिंदी के साथ हिन्दीतर पाठकों -लेखकों-आलोचकों आदि के पास भी रहता होगा, फिर भी इस मंच के माध्यम से हम प्रेमचंद के जीवन के बारे में एक छोटी सी जानकारी साझा करने की कोशिश कर रहे हैं। आशा करते हैं कि पाठकों को दी गयी जानकारी से उनको साहित्यिक मदद के साथ उनके ज्ञानवर्धन में भी यह लेख कुछ हदतक सहायता भी प्रदान करेगा। 



  प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 ई.वाराणसी जिले के लमही गाँव में हुआ था। इनका वास्तविक नाम "धनपत राय" था लेकिन इनकी प्रसिद्धि प्रेमचंद नाम से हुई। इसी नाम से अधिकांश साहित्यप्रेमी इन्हें जानते हैं। इस नाम के पीछे भी एक कथा है जो यों है कि "जब इनकी उर्दू से प्रकाशित प्रथम कहानी संग्रह "सोजे वतन" छपी थी तो उसमें संकलित कहानियाँ अंग्रेजी राज के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक रूप में विद्रोह का बिगुल फूँक रही थी। उसमें राष्ट्रीय चेतना के स्वर गूँज रहे थे। देश की जनता में राष्ट्रीय चेतना का संचार कराने वाले तत्व इस संग्रह में मौजूद थे। लेकिन जैसे ही इस संग्रह की चर्चा चारों ओर फैलना शुरू ही हुई थी कि उसी समय अंग्रेजी सरकार के कानों तक भी इसकी गूंज पहुँची और सरकार ने इसके प्रकाशन पर रोक लगवा दी थी। इसके साथ ही उस समय तक इस संग्रह की जितनी भी प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी थी उन सबको जलावा देने का फैसला भी सुना दिया था साथ ही, आगे से इस प्रकार के सरकार विरोधी रचना लिखने पर प्रेमचंद के हाथ तक कटवा देने की धमकी दे दी गयी थी। परंतु दिनकर की ही तरह प्रेमचंद भी अपने देश की गुलामी को अपनी आँखों से देख रहे थे और पीड़ित जनता के दुख-दर्द को देखकर भी अनदेखा करना उन्हें प्रिय न था। वह अपने देश और जनता को स्वाधीनता दिलाने के लिए कार्यरत थे। सामाजिक सुधार उनके लेखन का आधार था, इसे किसी भी कीमत पर रोकना उनके लिए मुश्किल था इसलिए उनके एक मित्र "दयानारायण निगम" ने उन्हें "प्रेमचंद" नाम सुझाया जिसके आधार पर वह नए लेखन की शुरुआत कर सकते थे। इस नए नाम के माध्यम से वह जिस भी तरह के साहित्य की रचना कर सकते थे। प्रेमचंद ठहरे लेखक आदमी उन्हें यह तरकीब सुनकर अच्छी लगी उसके साथ-साथ अपनी समस्या का समाधान मिलने की भी खुशी महसूस हुई। उसके बाद से उन्होंने हिंदी में लेखन आरम्भ कर था।

प्रेमचंद का साहित्यिक जीवन 1901 से ही शुरू हो चुका था जब वह उर्दू में लिखा करते थे। उन्होंने हिंदी में लिखने से पहले उर्दू में लगभग 3 उपन्यास लिख दिए थे और कई कहानियाँ भी लिख चुके थे। रामविलास शर्मा इनकी प्रथम रचना एक नाट्य कृति को मानते हैं जोकि अप्रकाशित ही रही थी। इसके बारे में वह कहते हैं "यह नाटक इनके मामा के प्रेम और उस प्रेम के फलस्वरूप चमारों की पिटाई पर लिखी गया था"..।

 प्रेमचंद के हिंदी में लेखन शुरू करने पर उनकी सबसे पहली कहानी "बड़े घर की बेटी" जमाना पत्रिका, 1910 में छपी थी। कुछ आलोचक "पंच परमेश्वर" जो 1916 में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी उसे भी इनकी प्रथम हिंदी कहानी मानते हैं। हिंदी साहित्य में इनकी प्रसिद्धि का कारण इनके "सेवासदन" उपन्यास से शुरू हुई थी जो उर्दू से अनुवादित था। उर्दू में इस उपन्यास का नाम "बाजार-ए-हुस्न" था। इसके बाद "रंगभूमि" लिखकर इन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी पकड़ को और मजबूती दी साथ ही इस उपन्यास के लिए "मंगला पारितोषिक सम्मान" भी पाया।

प्रेमचंद ने न केवल हिंदी कहानियों में अपना कौशल दिखाया बल्कि उपन्यासों में भी कालजयी उपन्यास लिख कर हिंदी साहित्य के लिए अमर हो गए। इनकी अक्षयकीर्ति का आधार स्तम्भ इनका सबसे लोकप्रिय और सबसे चर्चित उपन्यास "गोदान" है जिसका प्रकाशन 1936 में हुआ था। इस उपन्यास को हिंदी में किसान जीवन पर अब तक का सबसे महान ग्रँथ साबित होने का गौरव प्राप्त है। इन्होंने साहित्य के अतिरिक्त फ़िल्म की पटकथा लेखन में भी अपना सहयोग दिया परंतु इस क्षेत्र में प्रेमचंद ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहे। मात्र 3 साल तक ही हिंदी सिनेमा के लिए इन्होंने कार्य किया बाद में अपनी रुचि और मन के विपरीत फिल्मों के विषयवस्तु को देखकर इनके हृदय को बड़ा क्षोभ हुआ और जैनेंद्र जी को एक पत्र में वहाँ (बम्बई) का वर्णन करके यह वापस अपने अड्डे पर लौट आये। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी प्रेमचंद ने अपना सराहनीय योगदान दिया जैसे हंस, माधुरी और जागरण जैसी पत्रिकाओं का सम्पादन करके केवल हिंदी साहित्य की रचनाओं और उसके विषयवस्तु को ही दुरुस्त नहीं किया बल्कि हिंदी साहित्यकारों को भी इन्होंने सही दिशानिर्देश देने का कार्य किया।

प्रेमचंद का अंतिम निबन्ध "महाजनी सभ्यता" , अंतिम व्याख्यान "साहित्य का उद्देश्य" और अंतिम उपन्यास "मंगलसूत्र" था जोकि वह पूरा न कर सके थे और आधे-अधूरे में ही 1936 में उनकी मृत्यु हो गयी थी। भारत सरकार ने इनके साहित्यिक योगदान से प्रभावित होकर इनके नाम से 30 रुपए का डाक टिकट भी निकाला था। अपने 30 साल के साहित्यिक जीवन से उन्होंने हिंदी और उर्दू दोनों ही साहित्य को परिष्कृत किया और उसे एक नया स्वर दिया। इससे पूर्व तक का साहित्य केवल रीतिकालीन वृतियों से जूझ कर चल रहा था, छूट-पुट स्तर पर सामाजिक लेखन भी परस्पर चल रहा था लेकिन साहित्य को समाज से जोड़कर उसे गति प्रदान करने का कार्य जो प्रेमचंद ने किया वह उससे पहले तक नहीं किया गया था। हिंदी साहित्य प्रेमचंद के इस परिश्रम के लिए सदैव ऋणी रहेगा।



 प्रेमचंद ने जिस समय उर्दू में "नवाबराय" नाम से साहित्य लिखना शुरू किया था उस समय साहित्य में 2 प्रकार के उपन्यासों की लहर थी। एक ओर तो तिलस्मी-एय्यारी, रोमांटिक और मनोरंजन सम्बन्धी उपन्यास लिखे जाते थे तो वहीं दूसरी ओर सामाजिक उपन्यास लिखे जाते थे। प्रेमचंद जी ने पहले मार्ग को छोड़कर साहित्य के दूसरे मार्ग पर चलना स्वीकार किया जिसमें समाज को नया चेहरा दिखाने का कार्य किया। वह समझते थे कि देश में चल रहे स्वाधीनता आंदोलनों को आधार बनाकर लेखन करना, देश और समाज दोनों के लिए हितकर साबित होगा और ऐसा हुआ भी। प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से रीतिकालीन प्रवृति को त्याज्य बताते हुए ऐसे साहित्य का बहिष्कार करने पर बल दिया। वह मानते थे कि आने वाला युग किसानों-दलितों-मजदूरों-दीनहीन दुखियों का है। समाज की रफ़्तार सीधे-सीधे उसके दूरगामी दर्शन हमें करा रही है। हिंदुस्तान इस हवा से बच नहीं सकता इसलिए हमें भी उसी तरह का साहित्य लिखना होगा"...।  इसी से सम्बंधित अपने "उपन्यास का विषय" नामक लेख में प्रेमचंद कहते हैं " मगर आजकल कुकर्म, हत्या, चोरी, डकैती से भरे उपन्यासों की बाढ़ सी आ गयी है। साहित्य के इतिहास में ऐसा कोई समय न था जब, ऐसे कुरुचिपूर्ण उपन्यासों की इतनी भरमार हो"..  । इसी निबन्ध में वह आगे जोड़ते हुए कहते हैं कि " जिन्हें जगत गति नहीं व्याप्ति वे जासूसी, तिलिस्मी चीजें लिखा करते हैं"...। 

                      (कुछ विचार, प्रेमचंद, 1939, पृ 99)


प्रेमचंद द्वारा साहित्य का अर्थ बदल देने, उसे रोमांस, जादू-टोने से बाहर निकालकर सामान्य जनता के लिए सुलभ बनाने , उसका आधार जनता को बनाने जनता की समस्याओं व उसके अधिकारों को साहित्य में उठाये जाने की बात का समर्थन राजेंद्र यादव भी करते हैं। राजेन्द्र यादव कहते हैं " प्रेमचंद हमारे यात्रा, संघर्ष और स्वप्न चित्रों को प्रस्तुत करने वाले सबसे बड़े कथाकार हैं। उन्होंने आनंद, मोक्ष और सत्यम-शिवम-सुंदरम के लिए कहानी लिखने की परंपरा को तोड़ा और उन्हें सामाजिक समस्याओं से जोड़ा"...।


 इसी समय के आसपास इनका उर्दू में प्रकाशित कहानी संग्रह " सोजे वतन" 1908 में प्रकाशित हुआ जोकि सरकार की कुरीतियों और उसके शोषण के विरुद्ध भारतीय जनता में स्वाधीनता की लहर फूँकने का कार्य करता हुआ सा प्रतीत हो रहा था। इस रचना से अंग्रेज़ो के विरुद्ध बगावत की ध्वनि गूँज रही थी जिससे सरकार बेखबर थी, लेकिन समय पर किसका प्रतिबंध रह सकता है। जैसे ही ब्रिटिश सरकार को इसकी सूचना मिली उसने इस रचना पर प्रतिबंध लगवा दिया और इसकी प्रकाशित 600 प्रतियों को जलवा दिया था। 

इसी के बाद से प्रेमचंद ने तय किया कि वह हिंदी में लेखन शुरू करेंगे और उन्होंने अपने मित्र "दयानारायण निगम" के कहने पर अपना नाम बदलकर प्रेमचंद रख लिया था। प्रेमचंद ने जिस समय से हिंदी में लिखना शुरू किया था वह समय पहले महायुद्ध का समय था जब नरसंहार के काले बादल सभी और मंडरा रहे थे। ऐसे समय में विश्वभर में मानवतावादी विचारकों और मतों की बहुतायत संख्या में बढ़ोतरी हुई थी उन्हीं में से हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचंद भी थे।
 
प्रेमचंद नाम के बाद सबसे पहले उन्होंने सरस्वती के तत्कालीन सम्पादक महावीरप्रसाद जी के पास अपनी पहली कहानी "पंचों में ईश्वर" भेजी जिसे जून 1916 में "पंच परमेश्वर" के नाम से प्रकाशित किया गया। इस कहानी के माध्यम से तत्कालीन ग्रामीण न्याय व्यवस्था पर पंचायत की स्थिति का यथार्थ चित्रण दिखाया गया है। पंचों के द्वारा न्याय जैसे मूल्यों की रक्षा कराने में प्रेमचंद सफल हुए हैं। 



 प्रेमचंद पर गाँधीवादी मूल्यों का बडा गहरा प्रभाव था। उनकी किसी भी रचना पर गाँधी का प्रभाव स्वतः देखा जा सकता है। न केवल वह गाँधी जी के मार्ग पर चलते थे बल्कि वह तो अपने आप को "गाँधी जी का कुदरती चेला" तक कह चुके थे। जहाँ एक ओर वह ब्रिटिश सरकार के मुलाजिम थे तो वहीं नौकरी के समय के पश्चात वह अपनी मर्जी के मालिक थे। वह जो चाहे कर सकते थे। उनके स्वाभिमान पर उनका पूर्ण आधिपत्य था। एक ऐसा ही वाकिया उनके स्कूली जीवन में शिक्षक के तौर पर हुआ था जब वह स्कूल पढ़ाकर अपने घर की दलान में बैठे आराम कर रहे थे तो वहाँ से गुजरते हुए अंग्रेजी अफसर को उन्होंने सलाम नहीं किया जिस पर उस अफसर ने उन्हें खरी-खोटी सुनाई और अपने मालिक होने का घमंड जताने लगा। प्रेमचंद भी बहुत चपल मनुष्य थे। वह जानते थे कि इन सरकारी मुलाजिमों से कैसे निपटना है और किस तरह से इनके आगे झुकना नहीं है। उत्तर में प्रेमचंद कहते हैं कि " माफ कीजिएगा साहब, लेकिन अपने कार्य के बाद मैं अपने घर का बादशाह हूँ। आपने जो मुझे कहा वह अच्छा नहीं किया और इस पर मैं आप पर केस भी कर सकता हूँ"..। यह सुनकर अंग्रेजी अफसर चुपचाप वहाँ से चला जाता है।

 प्रेमचंद न सिर्फ अंग्रेजी अफसरों से लगातार संघर्ष करते दिखते थे बल्कि एक ऐसा समय भी आया जब गाँधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी की तिलांजलि दे दी थी और स्वतंत्र रूप से लेखन करने लगे। 



एक ओर प्रेमचंद की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पहलुओं से जुड़ी रचनाओं और घटनाओं पर जहाँ गाँधीवादी दर्शन का प्रभाव प्रबल रूप से देखने को मिलता है तो वहीं उनकी राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत रचनाओं व घटनाओं में तिलक की ओजस्विता भी देखने में मनोरम लगती है।



 प्रेमचंद पर जहाँ पाश्चातय चिंतकों में लियो टॉलस्टॉय, रोमा रोला, मैक्सिम गोर्की और विक्टर ह्यूगो का विशेष प्रभाव रहा है तो वहीं भारतीय सरजमीं के तिलक और गाँधी उनके रोम-रोम में समाए हुए हैं। उनसे अछूता उनका साहित्य नहीं है। इन सभी विद्वानों का उनके जीवन और साहित्य पर विशेष प्रभाव रहा है।

कहानियों की प्रेरणा उन्हें रवींद्रनाथ ठाकुर से मिली। उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर से न ही केवल प्रेरणा ली बल्कि उनकी शैली को भी अपनाया है। उसमें प्रेमचंद जी की मैलिकता यह थी कि उस शैली का विकास और उसको नया रंग-रूप और नई पहचान प्रेमचंद खुद देते हैं।

नाटकों की रचना करने से प्रेमचंद घबराते थे क्योंकि वह मनाते थे "रंगमंच के अभाव में नाटक अपना महत्व खो देता है"..। भारत में वैसे भी हिंदी और उर्दू नाटक-रंगमंच की कमी है जिसके कारण अच्छे नाटक नहीं खेले जा सकते। पारसी रंगमंच का प्रयोग करने से प्रेमचंद बचते हुए नजर आए हैं क्योंकि वह आशिकीमिजाज और मनोरंज हेतु ही इस्तेमाल किये जाते हैं। वहाँ से समाज के लिए किसी भी तरह की प्रेरणा और सन्देश दे पाना मुश्किल जान पड़ता है। इसलिए नाटक लिखने की कोशिश से भी डरता हूँ। एक और बात परेशान करती है जिसके कारण मैं नाटक नहीं लिखता हूँ और वह है आर्थिक सक्षमता का मजबूत न होना।     
 
                (प्रेमचंद जी के पत्र,इंद्रनाथ मदान 1934) 



जीवन जीने की जिजीविषा को प्रेमचंद अपने साहित्य में बखूबी निभाते हुए दिखे हैं। इस जिजीविषा में गाँधीवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। न हार मानने वाले मूल्यों की कीमत गाँधी जी बहुत अच्छे से समझते थे, उन्हें पता था कि स्वराज के लिए जनता का सक्रिय रहना कितना आवश्यक है। इसी की बदौलत हमें स्वराज मिल सकता है इसलिए गाँधी जी अपने भाषणों में, अपनी वार्तालाप में ऐसे वाक्यों और शब्दों का प्रयोग करते थे जिससे कि सामने वाले का मनोबल न टूटे। इसी विचार की अवधारणा प्रेमचंद अपने उपन्यास "रंगभूमि" जोकि 1925 में प्रकाशित हुआ था, के नायक "सूरदास" के माध्यम से दिखाते हैं जब उसकी झोपड़ी जला दी जाती है। प्रेमचंद कहते हैं "सूरदास भले ही दृश्यअंकन में असमर्थ है परन्तु वह अकेले ही सत्य के लिए जी सकता है और जीतने का साहस रखता है। सूरदास और मिठुआ के बीच हो रही बातचीत से प्रेमचंद उसी जिजीविषा को समाज में बनाए रखने की कोशिश करते हैं और सूरदास के माध्यम से कहते हैं "कोई हमारे घर को हजार बार क्या, सौ लाख बार जलाएंगे तो हम सौ लाख बार घर बनाएंगे"। 

आगे वह कहते हैं "हम हारे तो क्या मैदान से भागे तो नहीं, रोये तो नहीं, धांधली तो नहीं की। ज़रा दम ले लेने दो, हार- हारककर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे और एक-न-एक दिन हमारी जीत जरूर होगी जरूर होगी"..।



प्रेमचंद भी गाँधी जी की तरह धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिक सद्भावना में विश्वास रखते थे। वह किसी भी मनुष्य को जाति-धर्म- सम्प्रदाय से ऊपर मानते थे। उनकी नजर में मनुष्य की कद्र काफी थी। इसी का परिणाम था कि प्रेमचंद ने 1927 में हिंदी और उर्दू साहित्य के विकास के लिए "हिंदुस्तानी एकेडमी" की शुरुआत की। एक सच्चे राष्ट्रवाद की परिभाषा देने में यह कृत्य सराहनीय था क्योंकि कोई भी राष्ट्र वहाँ की विविधताओं से पूर्ण होता है और जब तक सभी दल, समुदाय, वर्ग, सम्प्रदाय के लोगों को अपने राष्ट्र में स्थान नहीं दिया जाएगा तबतक आप एक भावी राष्ट्र की कल्पना करने में असफल रहेंगे।

अपनी "जेल" कहानी में लगातार जुलूस निकालने और सड़कों पर उतरने जैसी घटनाओं को दिखाकर प्रेमचंद समाज के जिन्दे होने का अहसास कराते हैं। वह यह मनाते है कि यदि समाज ने अपनी सक्रियता दिखाना बंद कर दिया तो वह निष्क्रिय पड़ जाएगा जिसका परिणाम स्वराज पर पड़ सकता है। एक तरफ जहाँ गाँधी जी राजनीतिक रूप से समाज को चेतन अवस्था में लाने और देशहित के लिए समाज को प्रोत्साहित कर रहे थे वहीं प्रेमचंद अपनी कलम के माध्यम से जनता और अपने पाठक वर्ग को जिलाये रखने का कार्य कर रहे थे। इस आधार पर दोनों बुद्धिजीवियों को एक ही कर्तव्य मार्ग पर अग्रसर होते हुए देख सकते हैं, केवल अंतर इतना है कि दोनों का क्षेत्र भिन्न है परन्तु ध्येय एक।



अपने अंतिम उपन्यास "मंगलसूत्र" में प्रेमचंद खुद को एक मजदूर रूप में रख कर लिख रहे थे। वह एक साधारण जीवन जीने वाले व्यक्ति थे और मानते थे कि, यदि सामने वाले की भावनाओ से परिचित होना है तो स्वयं को भी उसी के अनुरूप ढालना होगा। वह कहते हैं" मैं मजदूर हूँ, जिस दिन कुछ न लिखूँ उस दिन मुझे रोटी खाने का अधिकार नहीं"...।

प्रेमचंद का किसान वह किसान है जो कुछ बीघा जमीन होने के बावजूद उस पर मजदूरों-सी खेती करता है और जीवन भर लगान से मुक्त नहीं हो पाता। अपनी बुनियादी जरुरतों तक को पूरा करने में उसे सैकड़ों बार सोचना पड़ता है। चाहे गर्मी हो चाहे ठंड, वह उससे मुक्ति पाने वाले संसाधनों के अभाव में ही अपनी जिंदगी को निकाल देता है। ऐसे किसानों के प्रति प्रेमचंद के दिल में गहरी सहानुभूति है और सम्मानीय भाव भी। प्रेमचंद किसान और मजदूरों को किसी अफसर से भी बड़ा कर्मठ और परिश्रमी मानते हैं। अपनी कहानी "पूस की रात" के पात्र "हल्कू" पर पड़े लगान के बोझ का ऐसा मार्मिक वर्णन करते हैं कि वह लगातार मेहनत-मजदूरी करने के बाद भी अपने लिए एक कम्बली तक नहीं ले सकता। जमींदार का सैना आता है और उसके रखे पैसे भी लेके चला जाता है। हल्कू और मुन्नी की बातचीत दृष्टव्य है"

हल्कू- " मुन्नी सैना आया है लाओ जो रुपये रखे हैं उसे दे दे। 

मुन्नी- "पूस की रात कैसे कटेगी ?

हल्कू-अरे दे दे बला हटेगी। कम्बल के लिए दूसरा उपाय सोचूंगा।

मुन्नी-  मैं कहती हूँ तुम खेती क्यों नहीं छोड़ देते, मर मरकर काम करो। बाकी ही चुकाने के लिए हमारा जन्म हुआ है?..."



प्रेमचंद जी से विवाह होने की घटना शिवरानी देवी विशेष रुप से बताती हैं जहाँ उन्होंने (प्रेमचंद) शायद पहली मर्तबा सामाजिक बन्धनों के विरुद्ध अपने व्यक्तित्व की झलक दिखलाई थी। जिस समय विवाह जैसे विषयों पर अपने मतों को स्पष्ट रूप से रखना अपने आप में ही दूभर कार्य होता था या जिस समय प्रेमविवाह की अनुमति नहीं थी तब उन्होंने मेरे पिता से सीधे तौर पर मुझसे विवाह करने का प्रस्ताव पेश किया और अपने परिवार आदि के सदस्यों से राय-मशवरा तक न लेकर विवाह के लिए अपनी दिलेरी दिखाना मुझे (शिवरानी देवी) को बहुत लुभाया। (पृ 14)


प्रेमचंद पर्दाप्रथा का विरोध करते हुए अपनी पत्नी से कहते हैं कि " मैं तुमसे कहता हूँ, पर्दा छोड़ क्यों नहीं देती? लौंडे की बीवी नहीं हो।xxxxx दस वर्ष के बाद चाची का लिहाज करने की कोई आवश्यकता नहीं।

इस पर शिवरानी देवी कहती हैं "मुझसे बेहयाई नहीं होगी।

प्रेमचंद- अगर तुमसे बेहयाई नहीं होती तो रोजाना एक न एक पंसाखे उड़ा करेंगे।

शिवरानी - आप भला तो जग भला। जब आप लौंडे नहीं हैं तो इस तरह की बातें ही क्यों सुनते हैं? और अगर सुनते हैं तो उन पर ध्यान क्यों देते हैं?

              

शिवरानी देवी अपने दाम्पत्य जीवन के उन मनोरम प्रसंगों की चर्चा विशेष रूप से करती हैं जहाँ थोड़ी नोकझोंक भी है और थोड़ा सा मन मुटाव भी। पर इस मन मुटाव में भी एक प्रेम छिपा हुआ है, एक चिंता छुपी है जो थोड़े से समय के लिए रहती है। उसके बाद वह चिंता भी प्रेम में तब्दील हो जाती है। ऐसे ही कुछ मधुर प्रसंगों को शिवरानी देवी ने अपनी कृति "प्रेमचंद:घर में" में उठाया है। जहाँ एक बार प्रेमचंद को शराब की लत लग जाने से शिवरानी देवी को जहाँ एक ओर उनकी सेहत की चिंता के साथ उनके प्रति सहानुभूति भी होती थी, तो वहीं अपनी सहानुभूति को कभी-कभार रूठकर भी अभिव्यक्त करती थी। उस रूठेपन में भी पति के प्रति प्रेम और चिंता का भाव होता था। 1924 में भी एक ऐसा ही वाकिया घटा था जब प्रेमचंद के शराब पीकर घर आने पर दोनों मिया-बीवी के बीच कुछ मन मुटाव हुआ। ठीक उसी के 3-4 दिन बाद फिर से प्रेमचंद जब शराब पीकर घर आये थे तो उस रात उनकी तबीयत भी कुछ खराब हो गयी थी। देर रात्रि दो बार उन्हें कै भी हुई थी। परन्तु उन्हें सबक सिखाने के उद्देश्य से शिवरानी देवी उनकी सेवा करने के लिए उठती नहीं। अगले दिन सुबह जब दोनों के बीच रात की घटना पर बात होने लगती तो प्रेमचंद कहते " रात को मेरी हालत बहुत खराब थी।तुम कहाँ थी?

शिवरानी देवी कहती " मैं ऐसे बुरे फेर में नहीं पड़ती, उसी दिन आपको बता दिया था।

प्रेमचंद उन्हें कहते कि तुम बहुत कड़े दिल की हो।

शिवरानी देवी जवाब में कहती "आज आपने समझा?
 
इस बात से प्रभावित होकर उस दिन से मैंने शराब नहीं पी। (पृ 103)



प्रेमचंद अपने स्वाभिमान की रक्षा करना जानते थे और यह भी अच्छे से समझते थे कि यदि साहित्य की सेवा करनी है, देश की सेवा करनी है तो स्वतंत्र रूप से लेखन करना होगा। किसी भी तरह के बन्धन में बन्ध कर मौलिक लेखन नहीं किया जा सकता।  भावी भविष्य को आधार बनाकर लेखन करने के लिए जिस साहस की आवश्यकता थी वह प्रेमचंद में खूब भरी हुई थी इसलिए उन्होंने सरकारी पिट्ठू होने का विरोध किया और खुद को जनता के लिए समर्पित कर दिया। लगभग सन 1929 के आसपास प्रेमचंद को गवर्नर साहब (सरकार) की तरफ से "रायसाहबी" मिलने का अवसर मिला था जिसका अर्थ यह होता कि, वह सरकार के इशारे पर नाचते, उनके मुलाजिम हो जाते और उन्हीं के कहने पर लेखन भी करते। अर्थात उनका मौलिक चिंतन, उनकी लेखन- कला कहीं मिट्टी पलीद होती नजर आती और वह खुलकर जनता की सेवा नहीं कर पाते।  प्रेमचंद कहते कि "साहब बहादुर मुझे रायसाहबी देना चाहते हैं"। तब शिवरानी देवी पूछती हैं कि "केवल रायसाहबी ही देंगे या और कुव्ह भी? तिसपर प्रेमचंद कहते हैं कि "हाँ अवश्य और कुछ भी देंगे परन्तु तब जनता का आदमी न रहूँगा एक पिट्ठू हो जाऊँगा"..।अपनी पत्नी को रायसाहबी के लिए मिला हुआ पत्र दिखाने और उनसे सलाह मशविरा करने के बाद शिवरानी देवी कहती कि " यह तो बहुत महँगा सौदा है। प्रेमचंद कहते हैं कि यदि जनता की रायसाहबी मिले तो कर लूँगा, गवर्मेंट की रायसाहबी की इच्छा नहीं। (पृ 161)


प्रेमचंद ने सभी तरह की कुरीतियों पर, विकृतियों पर, सभी तरह के अनाचारों पर इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार, जाति व्यवस्था, नशाखोरी, सूदखोरी, अत्यधिक लगान वसूली, धोखाधड़ी, धर्म-आडम्बर, साम्प्रदायिक सद्भावना से लेकर न्यायव्यवस्था तक और सत्य-अहिंसा जैसे गाँधीवादी मूल्यों को हमेशा अपने लेखन में मुख्यतः उभारा है और अपनी लेखनी चलाई है। वह लेखक में निष्पक्षता के गुण देखने के समर्थक थे। एक अच्छे लेखक का नजरिया जनता का प्रतिनिधित्व करना होना चाहिए न कि सरकार और पूंजीपतियों की जूतियाँ सीधी करना। यदि वह डर कर लेखन करेगा तो अपने विचारों को जनता तक नहीं पहुँचा पायेगा। लेखक के स्वतंत्र व्यक्तित्व पर विचार करते हुए प्रेमचंद कहते हैं कि " लेखक को पब्लिक और गवर्नमेंट अपना गुलाम समझती है। आखिर लेखक भी कोई चीज है। वह सभी की मर्जी के मुताबिक लिखे तो लेखक कैसा ? यदि गवर्नमेंट के जेल में डालने की धमकी से और जनता के द्वारा मार डालने की धमकी से लेखक डरने लगे तो क्या लिखना बंद कर दें ?  ऐसा ही कुछ उनके एक लेख को लेकर विवाद हुआ था जोकि "आज" नामक पत्रिका में छपा था। इसके विरोध में काशी में हिंदूसभा के कई सदस्य और कुछ कॉंग्रेसी भी विरोध में आये थे। लगातार उन्हें उनके लेखन के लिए धमकियां मिलती थी और कई बार तो ये हत्या करने तक भी पहुँच जाया करती थी। लेकिन फिर भी प्रेमचंद अपनी बात पर अडिग रहे और लगातार क्रांतिकारी लेखन को बढ़ाते रहे।


देश की गुलामी और उससे मुक्ति के लिए प्रेमचंद सबसे ज्यादा युवाओं की माँग को जरूरी मानते हैं। उनका मानना है कि जिस भी कार्य को सफल बनाना है उसमें युवाओं की भागेदारी होना अनिवार्य है, क्योंकि यही एक वर्ग है जो सबसे ज्यादा भागा दौड़ी कर सकता है और कम समय में ज्यादा से ज्यादा काम जल्द ही निपटा सकता है। देश गुलामी को झेल रहा है जिसके लिए चाहिए कि जल्द से जल्द इस गुलामी से निपटा जाए और उसमें युवाओं की भागेदारी होना आवश्यक है। लेकिन जब अपने देश के इन युवाओं को जिन पर आने वाला भविष्य आधारित है, उन्हें समय खराब करते देख और फिजूलखर्ची करते प्रेमचंद देखते हैं तो दुखी होते हैं और उन्हें देश की चिंता होती है। ऐसी ही एक घटना होती है जिसका वर्णन शिवरानी देवी प्रेमचंद की जीवनी में करती हैं। 

 "काशी विश्विद्यालय में जलसा" 1933 की घटना है जहाँ प्रेमचंद सभापति के रूप में एक गल्प-सम्मेलन में गए थे । प्रेमचंद जी की मीटिंग ढाई बजे से शुरू होनी थी तब तक वह अपनी पत्नी के साथ विश्विद्यालय के छात्रावास के निकट ही एक नहर के पास जाकर अपनी थकान मिटाने लगे। छात्रावास के पास ही कुछ युवती और युवकों को टहलते हुए, हँसी ठठ्ठाकर करते हुए देखकर प्रेमचंद जी को थोड़ा सा बुरा लगा और चिंतित स्वर में बोले " यह गुलाम देश कब सुधरेगा, समझ नहीं आता। यहाँ नकल करने की आदत यहाँ तक है कि अपने को नकल करने पर ही विद्वान समझ बैठते हैं और वह भी पूरी नकल नहीं करते आधी अधूरी ही कर छोड़ते हैं। खराबियों की नकल तो ये झट कर लेते हैं अच्छाईयों की तरफ झाँकते तक नहीं"। 

जिसपर शिवरानी देवी उनसे सवालात करने लगती हैं " इस वक्त आपकी आलोचना से क्या लाभ? यदि अंग्रेज़ो की तरह रहेंगे तभी तो आजादी पाएंगे"।  

प्रेमचंद कहते हैं " विलासिता आजादी की दुश्मन है"..। यदि तुम (शिवरानी देवी) अंग्रेज़ो के भोगविलासी जीवन को आजादी से जोड़कर देखती हो तो मैं तुम्हे बता दूं कि उन्होंने ये विलासिता अपने आजाद होने के बाद शुरू की है। जब वह गुलाम थे तो पशुओं से भी ज्यादा मेहनत करते थे और उसी का परिणाम है कि आज वह आजाद है और हम गुलाम। आगे प्रेमचंद कहते हैं " आजादी मिलती है तप से, त्याग से और बलिदान से, तुम्हारे यहाँ तो उसका उल्टा हो रहा है xxxxx  इसी कारण दिनरात हम गुलामी की तरफ जा रहे हैं। 

शिवरानी देवी उन युवकों को बच्चा बताती है जिस पर प्रेमचंद कहते हैं कि "तुम इन्हें बच्चा कहती हो ? आज के युग में उम्र ही कितनी होती है ? लड़कियों का हवाला देते हुए प्रेमचंद कहते हैं कि " लड़कियों को तो देखो तितली की तरह फुदक रही हैं। ये यहाँ क्या गुण सीखेंगी, रही सही माता पिता के गुण भी खो देंगी। इसी कारण माता पिता को शादी के लिए ज्यादा कीमत देनी पड़ती है। दुसरो के घर जाएंगी तो इतना पैसा उड़ाने को नहीं मिलेगा, तो इनका जीवन दूभर हो जाएगा।  इसके उत्तर में शिवरानी देवी कहती है कि " ये ग्रेजुएट होकर कुछ कमाना सीख जाएंगी जिसपर प्रेमचंद कहते हैं कि "जो दूसरों के पैसों को पानी की तरह बहा रही हैं तब वह अपने पैसे दूसरों के लिए क्या छोड़ सकेंगी?..।  

इस बात पर शिवरानी देवी "सुदर्शन" की एक कहानी का हवाला देती हुई कहती है कि "उसमें पिता के द्वारा पुत्र की परीक्षा ली जाती है जहाँ पुत्र अंततः विजयी होता है और अपने द्वारा कमाए गए पैसे की भी अहमियत समझता है और दूसरों के पेसों की भी। प्रेमचंद का मत था कि "यह जो पुत्र था वह लड़कपन में ही सम्भल गया था और यह जो युवक युवती है वह जवानी की गंदी आदतों में पड़े हैं।  कुछ दिनों बाद राष्ट्र की बागडोर इन्ही के हाथों आनी है तब ये सिरफिरे आफत मचाएंगे।  (पृ 222 से 226 तक)




प्रेमचंद ईश्वर और आस्था के सवाल पर भी अलग दृष्टिकोण रखते हैं। कई जगह वह उसे आस्था और नियतिवाद से न जोड़कर यथार्थ से जोड़ते हुए देखते हैं। उनका मानना है कि जब मनुष्य के कर्म अच्छे हों तो उसे बुरे फल की प्राप्ति क्यों हो?। मनुष्यों के कर्मो के अनुकूल फल की प्राप्ति न होने के परिणामस्वरूप प्रेमचंद अपने विचारों को ईश्वरीय सत्ता से सवालिया ढंग से जुड़ते हुए उन पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर देते हैं और उनकी सत्ता को नकार देते हैं। 1935 में जब जैनेंद्र जी की माता का देहांत हुआ था तो प्रेमचंद जी और उनकी पत्नी को भी काफी दुख हुआ था। उस घटना से वह भी भीतर तक प्रभावित और आहत हो गए थे। प्रेमचंद और शिवरानी देवी की आपसी बातचीत और जैनेंद्र जी की माता के दयालु स्वभाव पर चर्चा करने के बाद प्रेमचंद इस नतीजे पर पहुँचे की "अब ईश्वर पर विश्वास नहीं होता, और न ही उसके कर्मो पर, न उसकी माया पर। जितने भी तरह के मिथक, किवदंतियाँ और जिन भी मान्यताओं को समाज ने निर्मित किया है उन पर भी विश्वास नहीं होता क्योंकि यदि वह सही मायने में अपने आश्रितों का परम- पिता है तो वह उन्हें दुख क्यों देता है ? उनसे अन्याय क्यों करवाता है ? यदि सचमुच ईश्वर है तो उसे दुखियों को दुख देने में मजा आता है ? अगर ऐसा ही ईश्वर बेरहम है तो उसे ईश्वर कहने का जी नहीं चाहता"..।

 इस पर शिवरानी जी कहती हैं कि "सभी अपने कर्मो का भोगते हैं"..।

बदल में प्रेमचंद जी का तर्क होता है कि "ऐसा माना जाता है कि बिना ईश्वर के हम पलक भी नहीं झपका सकते तो वह हमसे अन्याय क्यों करवाता है ? जो अच्छा है वही हमसे करवाये। कुछ नहीं यह सब धोखेबाजी है, बस अपने को धोखे में डालने के लिए प्रपंच रचा गया है। और जब हम प्रत्यक्षतः कोई बुरा कार्य नहीं करते हैं तो, लोग कहते हैं पिछले जन्म में कोई बुरा कार्य किया होगा और उस पर मैं कहता हूँ यह सब गोरखधंधा है "...। (पृ 326 से 329)


प्रेमचंद अपने लेखन कला में जहाँ शुरुआती समय में आदर्श और नैतिकता को मूलरूप से लेकर चलते थे वहीं अपने जीवन के अंतिम सालों में उन्हें अनुभव होने लगा था कि अब केवल आदर्शों और नैतिकता की आधारशिला पर लेखन नहीं हो सकता। न ही इस ढाँचे के बूते एक भावी भविष्य की कल्पना की जा सकती है। बाद के वर्षों में सत्य को दिखाना ही उनका परम् लक्ष्य हो गया था इसलिए अंतिम सालों में "कर्मभूमि", जैसे उपन्यास को लिखकर उसमें असहयोग आंदोलन की पुष्टि की गई है। उनका मानना था कि अब समस्याओं का समाधान जमीनी स्तर की सच्चाई दिखा कर ही किया जा सकता है। इसलिए वह यथार्थवाद की तरफ रुख अपनाते है। उन्होंने अपनी अंतिम कहानियों में जैसे "कफ़न" में असंवेदनशील समाज के जर्जर चित्र को उधेड़कर रख दिया है। प्रेमचंद का यथार्थवाद सबसे ज्यादा और प्रभावी रूप से गोदान में खुलकर आता है जहाँ नियतिवाद की विफलता ही होरी की मृत्यु है। होरी के चरित्र के माध्यम से समूचे भारतीय किसानों की स्थिति का मार्मिक और विश्वसनीय चित्रण किया गया है। जहाँ होरी के द्वारा ईश्वरीय न्याय और ईश्वर पर आश्रित रहकर भी उसका उद्धार नहीं होता इसलिए जीवन के अंतिम दिनों में प्रेमचंद ईश्वर के प्रति अपने विश्वास को कमजोर होता पाते हैं । 

प्रेमचंद पर जितने भी विद्वानों का प्रभाव पड़ा है उनमें से मैक्सिम गोर्की मुख्य रूप से रहे हैं। उनका लेखन और व्यक्तित्व प्रेमचंद खुद से मिला जुला मानते थे और उन्हें भी जनता का सच्चा कथाकार समझते थे। जिसे देश और पीड़ित-असहाय-गरीब जनता की चिंता खाये रहती है। "1936 अगस्त का महीना था जब मैक्सिम गोर्की की मृत्यु की खबर पाकर प्रेमचंद जी गहरे अवसाद में कई दिनों तक डूबे रहे थे। गोर्की की मृत्यु से वह इतने आहत हुये थे कि लंबे समय तक वह विलाप ही करते रहते थे जिसे देखकर उनकी पत्नी शिवरानी भी रोने लगे जाती थी। उनकी मृत्यु पर उनके ऑफिस (शायद हंस पत्रिका का कार्यालय) में एक मीटिंग के लिए उन्हें शोकसभा में पढ़े जाने वाले भाषण की तैयारी करनी थी। उसी को लिखने में वह लगे थे। उन्हीं दिनों उनकी तबीयत भी काफी नाज़ुक रहा करती थी। लगातार पत्नी के मना करने के बावजूद वह भाषण लिखने में लगे रहते थे क्योंकि उनके लिए वह बहुत जरूरी कार्य था और उस कार्य में उनका मन भी रमा हुआ था। शिवरानी देवी द्वारा गोर्की के बारे में पूछने पर प्रेमचंद कहते कि "वह एक ऐसा लेखक था जिसे किसी जातीयता से नहीं नापा जा सकता। जैसे आज बहुत से लोग तुलसी, सूर, कबीर को जानते हैं ठीक उसी प्रकार से शिक्षा के प्रसार के साथ मैक्सिम गोर्की का नाम भी फैलेगा और लोग इन्हें भी पूजेंगे"। 

गोर्की की चर्चा वह कई दिनों तक करते रहे। उनका मानना था कि "उनकी जगह लेने वाला अब कोई नहीं रहा"..। उनके प्रति प्रेमचंद की असीम श्रद्धा थी। जब भी गोर्की की चर्चा होती तो उनके हृदय में गहरा आहत होता। 

साहित्य पर चर्चा करते हुए प्रेमचंद उसके कई पहलुओं को सामने रखते हैं और उस पर विस्तार से चर्चा करते हैं। उनका मत है कि साहित्य में वह सभी गुण होने आवश्यक हैं जो किसी भी समाज की मजबूती से जुड़े हों। उससे समाज का किसी भी तरह से लाभ हो रहा हो और उससे समाज में कुछ नयापन आने की संभावना दिखे। एक बेहतर कल की निर्मिति, साहित्य की जिम्मेदारी है उसके लिए उसे चाहिए कि वह ऐसे विषयों का चयन करें जोकि मानवजाति के लिए लाभदायक सिद्ध हो सके। साहित्य पर चर्चा करते हुए वह कहते हैं " साहित्य उसी रचना को कहा जायेगा जिसकी भाषा परिमार्जित हो, प्रौढ़ हो, जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने वालों का गुण हो, साहित्य में यह गुण तभी पूर्णरूप में उपस्थित रहता है जब उसमें जीवन की सच्चाइयों और अनुभूतियों को डाला गया हो। तिलिस्मी कहानियों, भूत-प्रेत की कथाओं आदि से भले ही हम प्रभावित हुए हों परन्तु अब उनमें हमारे लिए कम दिलचस्पी है"...।

प्रेमचंद साहित्य की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि " साहित्य जीवन की आलोचना है"..। उसकी विधा कोई भी हो उसमें जीवन की आलोचना और व्याख्या होनी चाहिए।

साहित्य क्या नहीं है इसकी परिभाषा देते हुए प्रेमचंद कहते हैं कि " जिस साहित्य में हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक बोध और मानसिक तेजी न आए, हममें शक्ति और तेजी न आए, कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता न उतपन्न करे वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं"...।
                               ("साहित्य का उद्देश्य" लेख से) 



जीवन में साहित्य का महत्व क्या और कितना है इस पर भी प्रेमचंद नजर फेरते हुए दिखे हैं। उनका मत सीधा और सपाट है कि साहित्य में जीवन को दिखाना अनिवार्य है। वह भी मानव जीवन की समस्याओं, उसके सुख-दुख, चिंताओं, माँगो, उसकी बुनियादी सुविधाओं, उसके साथ हो रहे अत्याचारों आदि का वर्णन करना एक साहित्यकार की पहचान होनी चाहिए जिसका आधार मानव जीवन पर टिका हो। इसी पर अपने मत रखते हुए प्रेमचंद कहते हैं  "साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है। उसकी अटरियाँ, मीनार और गुम्बद बनते हैं, लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी हुई है।xxxxx  जीवन परमात्मा की सृष्टि है, इसलिए वह अबोध, असीम और अगम्य है। साहित्य मनुष्य की सृष्टि है इसलिए वह सुबोध, सुगम और मर्यादित व सीमित है। उसके नियम कानून है जिसके तहत ही कोई साहित्यकार बन सकता है"..।

"परमात्मा अपने आप में कार्य के प्रति किसी तरह से जवाबदेह नहीं है परन्तु साहित्य जवाबदेह भी है और उसकी जिम्मेदारी भी है"

"जिस तरह से जीवन का उद्देश्य आनंद होता है या जीवन में आंदन लाने से होना चाहिए उसी प्रकार से साहित्य का उद्देश्य भी इसी जीवन के आनंद को दर्शाना है और यह सच्चा आनंद तब सफल होगा जब वह सत्य के नजदीक होगा और उसे दर्शाया जाएगा, तब जाकर ही वह साहित्य का उद्देश्य कहला पाएगा"। ("जीवन में साहित्य का स्थान" लेख से)




जिस तरह से गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा की समस्या से जूझते हुए हिंदी को पूरे राष्ट्र की भाषा बनाने का संकल्प लिया था और उनका मत था कि, इस देश की एक यही भाषा है जिसके तहत हम लोगों को आपस में जोड़ सकते हैं और आजादी पा सकते हैं। उन्हें इस बात का स्मरण था कि जब तक भाषाई स्तर पर देश में एकता स्थापित नहीं होगी तबतक देश को ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति नहीं मिल सकती इसलिए उनके लिए भाषा का मसला अहम रहा। इसी के समाधान के लिए उन्होंने असम से लेकर मद्रास और गुजरात तक "हिंदी प्रचार समिति" का निर्माण करवाया। गाँधी जी के इस विचार का पुरजोर समर्थन प्रेमचंद के लेखन में भी दिखता है जिसकी पुष्टि उनके द्वारा रचे साहित्य में उठाये गए मुद्दों और विषयों से पता चलती है। उन्होंने किसी भी वर्ग-समुदाय-सम्प्रदाय आदि की चिंताओं व समस्या को नहीं छोड़ा। उन्हें जिस भी विषय पर सुधार की आवश्यकता महसूस हुई चाहे वह हिंदी प्रदेश की समस्या हो या दक्षिण की, चाहे वह पूर्वांचल की समस्या हो या कच्छ के मैदानों की, उन्होंने उस पर कलम चलाई।  उन्होंने अपनी लेखनी को कभी भी किसी प्रदेश और भाषा में बंधना स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक में उनके साहित्य का सम्मान है और इसी सम्मान को पुष्ट करते हुए रामविलास शर्मा अपनी आलोचनात्मक कृति " प्रेमचंद और उनका युग" में इस बात को पेश करते हैं।

 "हंस के "प्रेमचंद स्मृति अंक" में श्री चन्द्रहास ने लिखा था- प्रेमचंद जी का स्वर्गवास उत्तर के हिंदी भाषियों को उतना न खटका होगा जितना कि दक्षिण के हिंदी प्रेमियों को" .।

वहीं एक ओर दक्षिण भारत की यात्रा का स्मरण करते हुए रामविलास शर्मा कहते हैं कि " मद्रास में एकरात अपने घर की सीढ़ियों पर बैठे हुए, एक तेलुगु कवि मित्र ने प्रेमचंद की एक कहानी से गद्य का रस लेते हुए लगभग एक पैराग्राफ सुना डाला। उन्हें प्रेमचंद के न जाने कितने पैराग्राफ कंठस्थ थे। दक्षिण में भी जहाँ भी लोग हिंदी जानते थे वहाँ प्रेमचंद को भी जानते थे"..।  

रामविलास शर्मा प्रेमचंद के व्यापक स्तर पर लिखे गए लेखन कला से प्रभावित होकर उनकी तुलना तुलसीदास से करते हुए उन्हें तुलसी के बाद का "सबसे बड़ा कलाकार" की पदवी से सम्मानित करते हैं जिनकी रचनाएँ अपनी ही भाषा के क्षेत्र में नहीं, सुदूर दक्षिण गाँवो में भी पहुँच गई थी"...।

हंस के उसी "प्रेमचंद स्मृति अंक" में मद्रास के हिंदी प्रचारक कवि ब्रजनंदन शर्मा ने लिखा था " मैं यह निस्संकोच होकर कह सकता हूँ कि प्रेमचंद जी का उपयोग दक्षिण में ज्यादा हुआ है। पर हिंदी भाषा-भाषी जनता ने अभी तक प्रेमचंद जी से पूरा लाभ नहीं लिया है"...। 



इसी के अतिरिक्त रामविलास शर्मा प्रेमचंद की महानता गिनाते हुए हिंदी के उन आलोचकों को उत्तर देते हुए प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन का महत्व गिनाते हैं, जो उन्हें उनके साहित्यिक जीवन में प्रयोग किये गए मनोवैज्ञानिक स्तर पर छिछला और सतही स्तर का बताते हैं। वे आलोचक जो उनके साहित्य पर पूँजीवादी सत्ता को न उखाड़ पाने में उन्हें असफल बताते हैं, जो उनके साहित्य के शिल्प पर प्रश्न उठाते हैं परन्तु स्वयं गहराई से न ही सोचते हैं और न ही उन्हें समग्रता की दृष्टि से देखते हैं, ऐसे आलोचकों को रामविलास शर्मा महान साहित्यकारों में नहीं गिनते है। 

प्रेमचंद की महान लेखकों में गिनती करने का कारण रामविलास शर्मा यह मानते हैं कि "उनका जनता से जुड़कर कार्य करना, उनकी सम्वेदनाओं को अपनी संवेदना मानना तथा उनकी समस्याओं को अपनी समस्या मानकर लेखन करना ही उनकी महानता को बताता है। इसके आगे रामविलास शर्मा कहते हैं कि "हिंदी के जिन दिग्गज आलोचकों ने प्रेमचंद की जिस महानता को नहीं सीखा और न ही देखा, वह उनका जनता-स्रोत था। जबतक आप जनता से जुड़कर साहित्य नहीं रचोगे आप महान लेखक नहीं बन सकते और न ही महान साहित्य की रचना कर सकते हो। इसके आगे वह सोवियत आलोचक "ब्रेसकोवनी" का हवाला देते हुए प्रेमचंद को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर का महान लेखक बताते हुए कहते हैं कि "जिस प्रकार से ब्रेसकोवनी अपने देश के लेनिन और स्टालिन के अथक प्रयासों के बाद वहाँ पर आई खुशहाली का वर्णन करते हैं ठीक इसी प्रकार से ब्रेसकोवनी प्रेमचंद के लिए भी इसी तरह की मान्यता रखते हैं। उनका मत है कि भले ही आज प्रेमचंद का भी गम्भीर अध्ययन किया जा सकता है"...। प्रस्तुत कथन का अर्थ रामविलास शर्मा इस रूप में लेते हैं कि प्रेमचंद उन लेखकों के रूप में हैं जिसे सारा हिंदुस्तान सम्मान की नजरों से देखता है, जिस पर दुनिया की शांति प्रेमी जनता गर्व करती है। जहाँ एक ओर सोवियत संघ के आलोचक उनकी मुक्त कंठ से प्रसंशा करते हैं वहीं हम भारतीय भी उनकी प्रसंशा करते थकते नहीं। उन्होंने जिन भी विशेषताओं को अपने साहित्य में दर्शाया है वह हमारी जनता की जातीय विशेषताएं हैं"..।
 
प्रेमचंद के इसी साहसपूर्ण कार्य के लिए उनकी तुलना बंगला के रवि बाबू और शरत बाबू के बाद हिंदी में उत्कृष्ट लेखकों के रूप में की गई है।


आगे रामविलास शर्मा कहते हैं कि "प्रेमचंद हिंदुस्तानी जनता के उज्ज्वल भविष्य की पेशगी थे। हिंदी लेखक उस उज्ज्वल भविष्य को लाने में सहायक हों, हमारी संस्कृति और कला प्रेमचंद की जातीय परम्परा का अनुसरण करें और फली-फूले यही उद्देश्य के साथ इस पुस्तक को लिखा जा रहा है"...।(प्रेमचंद और उनका युग:-भूमिका से) 




प्रेमचंद नारी जीवन और उनकी समस्याओं पर विचार करते हुए लगातार यथार्थवादी होते जा रहे थे। उन्हें अब इस बात से कोई सरोकार न रहता था कि नारी अपने नारीत्व की सीमा में बंधकर, अपने पतिव्रता रूप में रहकर लगातार पुरुषप्रधान समाज में दमघोंटू जीवन यापन करे। वह अपने कथा साहित्य में ऐसी नारी पात्रों की रचना करने से सावधान रहते थे जो अपने पतियों को , प्रेमियों को या घर के अन्य पुरुष सदस्यों को खुलकर जवाब न दे, जो सामाजिक और सांस्कृतिक वर्जनाओं में बंधकर विरोधी न बने, किसी भी प्रकार का विद्रोह न करे। अब वह नारी को नए रूप में दिखाने लगे थे। "निर्मला" उपन्यास में कई स्त्री पात्र हैं जो पुरुषों से लगातार लोहा लेती नजर आती हैं। जैसे "कल्याणी" का पति "उदयभानु" के यह कहने पर की " वह और मर्द होंगे जो औरतों के इशारों पर नाचते होंगे"...। इसपर कल्याणी पलटवार करती हुई कहती है " तो ऐसी स्त्रियां भी और होंगी जो मर्दो की जूतियाँ सीधी किया करती होंगी"...। वहीं दूसरी ओर  "रंगलीबाई" जोकि दिल से तो कोमल भाव की है परन्तु अपने पति पर पूरा शासन रखती है और उसकी गलत नीतियों का खुलकर विरोध भी करती है। "भालचंद्र" जोकि रंगलीबाई का पति है वह दहेज जैसी कुप्रथा पर बहुत-सा दहेज माँगने की बात अपनी पत्नी के आगे रखता है, उसपर रंगलीबाई उसे फटकारते हुए कहती है कि " तुम बाप-पूत एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हो "..। 

कल्याणी और रंगलीबाई ऐसे नारी चरित्र हैं जो अपने व्यभिचारी पतियों के चरणों को आंसुओ से तर नहीं करती बल्कि उस अन्याय से प्रतिकार लेती हैं।प्रेमचंद अपने उपन्यासों में नए ढंग के नारी पात्रों की गढ़ना कर रहे हैं जो अन्याय और दुख को सहती तो हैं परंतु उसका खुलकर विरोध भी करती हैं।  यदि नारी के विरोध न करने और उसके घुट-घुट कर मर जाने को कुछ लोग सामाजिक बन्धनों की सुरक्षा समझते हैं तो वह भूल करते हैं और बदले में अपने सामंती सोच का परिचय देते हैं। वहीं दूसरी ओर "कर्मभूमि" की "सुखदा" अमरकांत को दलित स्त्री "मुन्नी" के साथ न्याय होने की माँग को लेकर दृढ़ हो जाती है। वह कहती है" अगर इसको फाँसी हो गयी तो मैं समझूँगी की संसार से न्याय उठ गया। xxxxx  जिन दुष्टों ने उसपर अत्याचार किया था उन्हें दंड मिलना चाहिए था। यदि मैं न्याय के पद पर होती तो उसे बेदाग छोड़ देती। ऐसी देवी की तो प्रतिमा बनाकर पूजना चाहिए।"....।  प्रेमचंद सुखदा के माध्यम से दिखाना चाहते हैं कि हिंदुस्तानी स्त्रियों को किसी अपराधी को दंड मिलने पर इतनी खुशी मिलती हैं कि पूछो ही मत। क्योंकि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के साथ अधिक अन्याय होता है। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि महिलाओं को बस में सफर करने से लेकर, बाजार में आने जाने से लेकर, घर-समाज में और स्कूल-कॉलेज में तक, कहीं भी आने जाने पर  कितनी ही बार अपमान की अनुभूति होती है और उन्हें इस पुरुष जाति पर कितना क्रोध आता है। क्योंकि लगातार उनको पुरुषों की दृष्टि से हीन समझा जाता है, वह अपनी दृष्टि से उसे नोचते हैं।

"मुन्नी" का उस गोरे अंग्रेज द्वारा ब्लात्कारा करने पर जब मुन्नी के साथ न्याय नहीं होता है तो सुखदा अपने क्रांतिकारी पति को फटकारती हुई पुरुष समाज पर सवाल उठती है विशेषतौर पर जो बड़ी-बड़ी बातों की दुहाई देते हैं और समाज में नारी उत्थान की बातों को लेकर चलते हैं लेकिन व्यावहारिक रूप में उसे अमल में लाने पर वह फिसड्डी साबित हो जाते हैं। सुखद कहती है " एक दिन जाकर सब लोग उसका पता क्यों नहीं लगाते, या स्पीच देकर ही अपने कर्तव्य से मुक्त हो गए"...।

कर्मभूमि के अमरकांत और गबन के रमानाथ में एक मूलभूत समानता देखी जा सकती है कि दोनों में ही दृढ़ता और विश्वास की कमी है। दोनों ही जगह नारी पात्र अपने पतियों को लगातार दृढ़ता और विश्वास के साथ मजबूत करती हुई नजर आती हैं। 

प्रेमचंद के नारी पात्र दिन-ब-दिन और मजबूती के साथ मुखर रूप से सामने आ रहे हैं। चाहे वह निर्मला के नारी पात्र हो या कर्मभूमि की सुखदा जो अमरकांत की तुलना में ज्यादा मजबूत और विश्वास से भरीपूरी है। अमरकांत में अभी वह मजबूती और परिपक्वता नहीं आयी है। वह अपने फैसलों को लेने में अभी लड़खड़ाता नजर आ रहा है, बशर्ते प्रेमचंद के नारी पात्र इस मामले में ज्यादा सम्बल है। इस तरह के पात्रों में सबसे लोकप्रिय पात्र प्रेमचंद के अंतिम पूर्ण उपन्यास "गोदान" के नारी पात्र धनिया, मालती, गोविंदी और कुछ कुछ जगह झुनिया भी हैं। गोदान के शुरू से लेकर अंत तक "धनिया" ही ऐसी नारी पात्र है जो लगातार संघर्ष करने के साथ साथ विद्रोही तेवर दिखाती हुई नजर आती है। पूरे उपन्यास में प्रेमचंद धनिया के माध्यम से ऐसी नारी पात्र की गढ़ना करते हैं जो इस पूरे विकृत समाज से जमकर विरोध करती है और ताल ठोककर अपनी बात के न केवल रखती है कई जगह उसमें सफल भी होती हुई नजर आती है। चाहे वह झुनिया को घर से न निकालना हो, पंचायतों को फटकारना हो, होरी के भाई हीरा को गाये की हत्या का दोषी ठहराना हो, हुकुमरानो की चापलूसी करने पर होरी को फटकारना हो आदि। कई ऐसे प्रसंग है जहाँ धनिया के अतिरिक्त कोई भी नारी पात्र इतना मजबूत दिखता नहीं है।  

गाय की मृत्यु के संदर्भ में जब होरी के घर की तलाशी लेने की कोशिश की जाती है तब होरी अपनी सामाजिक मर्यादा का ख्याल रखकर महाजनों से उसे बचा लेने की भीख माँगता है, जिसपर धनिया बिगड़ती है और होरी के साथ-साथ पंचों को भी फटकारती है। दरोगा जब होरी को लूटने की कोशिश करता है तो धनिया उसे भी आड़े हाथों लेती हुई कहती है " हाँ हमने ही अपनी गाय को मार दिया है देख लिया तुम्हारा न्याय"। धनिया के इस रूप को देखकर दरोगा भी उसके दिलेरीपन की दाद देता हुआ कहता है " वास्तव में बड़ी दिलेर औरत है...।(पृ 118) 

एक अन्य स्थल पर महाजनों को लताड़ती हुई धनिया कहती है" उस दिन कोई रुपए नहीं दे रहा था आज सबके रुपए ठनाठन निकल रहे हैं। xxxx उस पर भी सूरज चाहिए। जेल जाने से सूरज नहीं मिलेगा। सुराज मिलेगा धर्म से"..। (पृ 118)


प्रेमचंद जहाँ एक ओर पंच-परमेश्वर में बूढ़ी खाला जोकि जुम्मन की मौसी होती है, के माध्यम से न्याय व्यवस्था की पुष्टि करना चाहते हैं, और खाला के मुख से कहलाते हैं कि " क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?। न्याया व्यवस्था को समाज में कायम रखना चाहते हैं वहीं अपने अंतिम उपन्यास तक आते आते वह उसी न्याय व्यवस्था और पंचायत की काली करतूतों का पर्दाफाश करते हुए नजर आते हैं। इसके साथ ही पँचायत में चली आ रही शोषण वृति और लूट-खसोट जैसी जर्जर स्थिति को भी प्रेमचंद ने खोल कर रख दिया है जहाँ गरीब- दलित-शोषित जनता को लगातार लूटा जाता है। उनके अशिक्षित होने का लाभ उठाया जाता है और तरह-तरह से उनको आर्थिक चोटें पहुँचायी जाती है।

गोदान की "धनिया" ऐसी जर्जर पंचायत व्यवस्था की धज्जियां उड़ा देती है और अपने विद्रोही तेवर दिखाती है। झुनिया को अपने घर से न निकलने पर जब पंचों द्वारा होरी के परिवार पर 100 रूपए तावान लगा दिया जाता है तो उसका विरोध करती हुई धनिया कहती है " पंचों गरीब को सताकर सुख न पाओगे, इतना समझ लेना।(पृ 131)

मालती को प्रेमचंद नए युग की महिलाओं के प्रतिनिधि के रूप में दिखाते हुए मालती के मुख से कहते हैं " नई युग की महिलाएँ मर्दो का सहारा नहीं चाहती बल्कि उन्हें बराबर चुनौती देती हैं और हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं"...।

रामविलास शर्मा के अनुसार गोदान की मुख्य समस्या "कर्ज की समस्या है" जिससे उपन्यास का लगभग कोई भी पात्र अछूता नहीं है। विशेष तौर पर गरीबों, दलितों पर इस समस्या का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। किसानों की दुर्गति का तो कारण ही कर्ज रहा है। इसी समस्या से जूझते हुए होरी कहता है कि " कर्ज वह मेहमान है जो एक बार गला पड़ जाए तो जीवन भर नहीं जाता"..। प्रेमचंद अपने जीवन के अंतिम दिनों में खुद भी कर्जो से मुक्त नहीं थे। उन्हें भी आर्थिक तंगी ने झिंझोर कर रख दिया था इसलिए भी गोदान में कर्ज की समस्या इतनी स्वाभाविकता और दृढ़ता के साथ उभर कर सामने आई है। गोदान के अंतिम पृष्ठों  की रचना करने के समय बम्बई से प्रेमचंद जैनेंद्र जी को एक पत्र लिखते हैं " कर्जदार हो गया था, कर्ज पटा दूँगा मगर कोई लाभ नहीं। गोदान के अंतिम पृष्ठ लिखने बाकी हैं परन्तु वहाँ मन नहीं जाता। सोचता हूँ यहाँ से छुट्टी पाकर अपने पुराने अड्डे पर आ जाऊं। वहाँ धन नहीं है मगर संतोष है। यहाँ तो जान पड़ता है कि जीवन नष्ट कर रहा हूँ"..। 
                                    (हंस-मई-1939, पृ 100)

इसी तरह होरी का भाई "शोभा" भी कहता है " न जाने इन महाजनों से कभी गला छूटेगा की नहीं"..।(गोदान पृ 187)

प्रेमचंद इससे पहले भी किसानी जीवन पर 2 बड़े-बड़े उपन्यास लिख चुके थे। "प्रेमाश्रम" में किसानों की बेदखली और लगान में इजाफा किया जाता है और "रंगभूमि" में किसानी जीवन के नारकीय जीवन का स्तर और बढ़ जाता है। "कर्मभूमि" में बढ़ते हुए आर्थिक संकट और किसानों की लगानबन्दी की लड़ाई चल रही है। परन्तु कर्ज की सबसे बड़ी और त्रासद पूर्ण छवि गोदान में जाकर पूर्ण होती है। जहाँ इसी कर्ज के चलते होरी का पूरा परिवार न केवल नारकीय जीवन जीने को मजबूर हो जाता है बल्कि एक किसान (होरी) अपने सबसे सम्बल हथियारों गाय-बैल तक को खो देता है और अपने पुश्तैनी घर को भी नीलाम कर चुका होता है। एक समय पर जो अपने ही 5 बीघा जमीन का मालिक होता है, वहीं कर्ज का फंदा उसे उसी की जमीन पर मजदूर बनाकर अंततः उसी जमीन पर उसकी मौत का कारण भी बन जाता है।

वैसे तो गोदान को किसानी जीवन पर अभी तक का हिंदी में सबसे बड़ा ग्रँथ माना जाता है और प्रेमचंद की कीर्ति स्तम्भ का आधार भी इसी कृति को  दिया जाता है। बावजूद उसके इस कृति में प्रेमचंद के सबसे ज्यादा व्यक्तित्व की झलक दिखाई दी है। इसमें उनके किसानी समस्याओ, पूंजीवाद के विरुद्ध के रवैये, नारी समस्याओ से लेकर उन्हें सम्बल बनाने तक कि कथा, कर्ज से मुक्ति की कामना और उससे होने वाली मुसीबतों का वर्णन, मजदूरों से लेकर मिल मालिकों तक का षड्यंत्र, नारी के विद्रोही स्वर की सबसे ऊँची ध्वनि भी इसी उपन्यास में देखने को मिलती है। सब मिला जुलाकर इस समूचे उपन्यास में प्रेमचंद की वैचारिकता सबसे ज्यादा खुलकर मुखर हुई है इसी कारण प्रेमचंद की जितनी भी कृतियां रही हैं उनमें सबसे ज्यादा गोदान को ही उनके व्यक्तित्व को समझने में सहायक माना गया है।

नियतिवाद का जितना खुलकर विरोध गोदान में किया गया है उतना प्रेमचंद के किसी उपन्यास में नहीं  किया गया। होरी के माध्यम से नियतिवादी मनुष्यों की क्या स्थिति होती है उसका जीता जागता उदहारण होरी का चरित्र है। अपने जीवन के अंतिम वर्षो में प्रेमचंद भी आदर्श की भूमि को तिलांजलि देकर यथार्थ की भूमि पर चलने लगे थे। प्रतीत होता है कि होरी में प्रेमचंद अपनी छवि दिखा रहे हों। प्रेमचंद ने 1930 के बाद के साहित्य में यथार्थ के सबसे ज्यादा और प्रभावी रूप से दर्शन कराए हैं। चाहे वह "कफ़न" कहानी हो, या "कर्मभूमि और गोदान" जैसे उपन्यास। होरी पूरी जिंदगी अपनी तकदीर को ही कोसता रहता है और सोचता है कि उसके कर्मो का ही फल है कि उसके साथ ये सब हो रहा है। वहीं दूसरी और प्रेमचंद "गोबर" और "धनिया" जैसे पात्र रखकर नियतिवाद के सामने उसको चुनौती देने का कार्य करते हैं। जहाँ वह किसी की गुलामी नहीं सहना चाहते और न ही ईश्वर के भरोसे रहना चाहते हैं। अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने के प्रमाण प्रेमचंद के इन पात्रों में दिखते हैं।

प्रेमचंद "रायसाहब" जैसे पात्रों के माध्यम से बताना चाहते हैं कि इन जैसे जमींदारों से विशेष सावधान रहने की आवश्यकता है जो ऐसे सिंह हैं, जो गुर्राने और गरजने की जगह मीठी बोली बोलकर अपना शिकार मारते हैं। गोदान की प्रतुत पंक्तियों में इस बात को अच्छे से समझा जा सकता है " सिंह का काम तो शिकार करना है, अगर वह गुर्राने और गरजने के बदले मीठी बोली बोलने लगे तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता है"...। 

प्रेमचंद रायसाहब के माध्यम से गाँव के ऐसे जमींदारों के चरित्र को उभारने में सफल हुए हैं जो ऊपर से तो मानवतावादी हैं परन्तु अंदर से उनमें अभी भी पशुता शेष है। इसे समझने के लिए "गोदान" की पंक्तियों को थोड़ा ध्यान से समझना होगा। "जहाँ एक ओर तो रायसाहब किसानों और होरी के प्रति, अपनी प्रजा के प्रति सहानुभूति रखते हैं और यहाँ तक कह देते हैं कि " मैं उस आदमी को आदमी नही समझता जो देश के लिए उद्योग और बलिदान न दे"...। वहीं होरी के जाते ही असामियों को उनकी औकात याद दिलाते हुए कहते हैं कि "चलो मैं इन दुष्टों को ठीक करता हूँ। जब कभी खाने को नहीं दिया तो आज यह नई क्यों ? xxxx एक आने रोज पर मंजूरी मिलेगी जो हमेशा मिलती है;, इस मंजूरी में काम करना होगा, चाहे सीधे करें या टेढ़े"...। 

होरी जैसे पात्रों के सामने रायसाहब जैसे जमींदार अपना ऐसा व्यवहार इसलिए दिखाते हैं कि वह होरी जैसे कमजोर आदमियों की नस को पहचानते हैं। वह जानते हैं कि किस आदमी के आगे कैसे पेश आना है। यदि वह यह भी न कर सके तो काहे के जमींदार और मालिक।

अपनी पुस्तक "प्रेमचंद और उनका युग" के "सम्पादक- विचारक और समालोचक" शीर्षक में रामविलास शर्मा "हंस" के द्विवेदी अभिनंदनांक में सम्पादकीय कलम से जो शब्द महावीरप्रसाद जी के  लिए लिखे गए थे वह बहुत कुछ बढ़-घट कर प्रेमचंद के लिए भी हो गए हैं। इस सम्बंध में रामविलास शर्मा  कहते हैं"

"स्वभाव से अत्यंत सिद्ध-प्रतिज्ञ और हृदय से परम् कोमल, ये हमारे अपने हैं, इस बात को हिंदी जगत उसी दिन मान गया था जब ये सरस्वती में थे। उन दिनों ये हम सबको पिता की तरह शासित किया करते थे और माता की तरह प्यार! ये हेनरी गलतियों पर फटकारते थे, उन्हें प्रेम पूर्वक सुधार देते थे और हमारी सफलता पर हमें प्रेम के मोदक भी खिलाते थे। इन्होंने ने हमें ठोक ठोककर पढ़ाया और पुचकार पुचकार कर आगे बढ़ाया"...। इस लेख को प्रेमचंद ने 1933 में प्रकाशित किया था जब वह स्वयं चोटी के लेखक हो चुके थे। बावजूद उसके महावीरप्रसाद जी को गुरु की नजरों से देखते और उस समय भी बराबर उनसे प्रेरणा लेते और अपना मार्ग प्रशस्त करते। 

ठीक इसी प्रकार से प्रेमचंद भी अन्य साहित्यकारों को फटकारते, समझाते-बुझाते,बराबर प्रेरणा देते और उनका मार्गदर्शन करते थे।  उनके समझाने और डाँटने का तरीका थोड़ा अलग था। इसका एक नमुम देखिए जब वह कथाकार "सुदर्शन" को डाँटते हैं  " मैं तो समझता था आप फ़ारग-उल-बाल होकर अदब की ज़्यादा खिदमत करेंगे, मगर मेरा ख्याल गलत निकला। अब महीनों गुज़र गए आपके लेख ही अख़बार में प्रकाशित नहीं होते। xxxxxx कुछ-न-कुछ तो लिखते रहिए। इससे अच्छा तो वह तंगदस्ती अच्छी थी जो आपसे कुछ लिखवाती रहती थी"..। यह बात 1927 की होगी जब प्रेमचंद हंस के सम्पादक नहीं थे। परंतु वह किसी को फटकारने और सलाह-मशविरा देने, प्रेरणा देने के लिए खुद को किसी तरह के औदे पर विराजमान होना जरूरी नहीं समझते थे। वह एक युग निर्माता के साथ-साथ अच्छे साहित्यकार भी थे इसलिए किसी अच्छे साहित्यकार को चुप देखकर वह बिगड़ जाते थे। इससे पता चलता है कि प्रेमचंद समाज और साहित्य के लिए कितने संवेदनशील थे। उन्हें सदैव समाज और समाज में रहने वालों की चिंता खाई रहती थी। वह हमेशा ही समाज में व्याप्त समस्याओं पर विचार-विमर्श करते रहते थे और अन्य साहित्यकारों व पत्रकारों को भी इसके लिए जोड़े रहते थे। 


प्रेमचंद शिक्षा के महत्व को स्वीकार भी करते हैं और उसकी माँग की पूर्ति के लिए कर्म भी करते हैं। उन लोगों की तरह नहीं जो केवल मुँह से शिक्षा और राष्ट्र हित की बात कहते हैं। प्रेमचंद ऐसे विषयों पर खुलकर सामने आते हैं, साथ ही अन्य लोगों से अपील करते हैं कि वह भी बढ़-चढ़कर अपनी सहभागिता प्रदर्शित करें। प्रेमचंद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समाज की देखभाल करते हैं और अपने देश की जरूरतों पर भी ध्यान रखते हैं। शिक्षा के महत्व को समझते हुए उसके प्रमाण के तौर पर वह एक आँकडा रखकर अपने देश के पूंजीपतियों से सवाल करते हैं और " सोवियत रूस में प्रकाशन" टिप्पणी में प्रेमचंद 1927 तक के आंकड़े देते हुए कहते हैं कि " रूस की जनसँख्या 12 लाख के आसपास है और वहाँ 6 करोड़ तक पुस्तकें हैं । फिर हिंदुस्तान की गुलामी और यहाँ की उदासीन जनता को देखते हुए कहते हैं कि " यहाँ 1930 में अंग्रेजी में 2332, हिंदुस्तानी भाषाओं में 24825 पुस्तकें निकली हैं"...। प्रेमचंद यहाँ यह दिखाना चाहते हैं कि किसी भी देश की उन्नति के लिए वहाँ की शिक्षित जनता का होना कितना अनिवार्य है। जिस देश की जनता लगभग 25 करोड़ के आसपास हो वहाँ पुस्तकों की सँख्या लाख में भी नहीं है और जहाँ कुछ लाखों की जनसँख्या है वहाँ करोड़ो में पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। इसका मुख्य दोषी प्रेमचंद जनता को नहीं मानते बल्कि उस बड़े तबगे को मानते हैं जो सम्पत्तिशाली होकर भी शिक्षा के प्रति ऐसी विरक्ति अपना रहे हैं। जब तक इस वर्ग का पैसा शिक्षा के लिए खर्च नहीं होगा तबतक किसी भी देश की उन्नति में आने वाली बाधाएं यूँही बरकरार रहेगी। क्योंकि आर्थिक आधार का मजबूत होना किसी भी व्यवस्था के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। यदि आपके पास धन की कमी है तो आप चाह कर भी अच्छी शिक्षा नहीं ले सकते। अब चाहे उस धन का बंदोबस्त सरकार करे, कोई संस्था करे या स्वयं पाठक वर्ग करे परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में पूँजी को निवेश करना अनिवार्य है। 
               
            

वैसे तो प्रेमचंद के कथा साहित्य में कोई भी ऐसा विषय नहीं बचा होगा जिस पर प्रेमचंद की कलम न चली हो। चाहे वह विषय सामाजिक हों या राजनीतिक, राष्ट्रवाद से जुडे हों या महिलाओं के सम्मान और उनकी स्थितियों से, चाहे वह धार्मिक आडम्बरों पर प्रहार करने से जुड़े हों या भारतीय संस्कारो की सुरक्षा करने से। सभी तरह के विषयों को प्रेमचंद ने अपने साहित्य में जगह दी है। इसलिए वैश्विक स्तर पर उनका प्रसार प्रचार हुआ और वह समूचे जनमानस के हृदयपटल पर छाये रहे। बावजूद उसके अगर प्रेमचंद को किसी एक वर्ग के साथ जोड़कर देखा जाए तो, वह मुख्य रूप से किसानों से जुड़ते हुए नजर आएंगे। अपने सबसे प्रसिद्ध उपन्यास "गोदान" जिसे कृषक-जीवन का महाग्रन्थ कहा जाता है, इस आधार पर भी प्रेमचंद को किसानी जीवन से जुड़ा हुआ माना जाना चाहिए। अपने इस उपन्यास में प्रेमचंद ने जितनी गहराई तक किसानी जीवन को उभारा और उसकी समस्याओं की तह तक जाकर वहाँ से यथार्थ को दिखने में सफलता पाई है उतनी शायद किसी साहित्यकार को नहीं मिली हो। प्रेमचंद के किसानों-मजदूरों-दलितों पर लिखे गए साहित्य को याद करते हुए अपने  "प्रेमचंद और अमर्त्य सेन" नामक लेख में शम्भूनाथ जी कहते हैं " भले ही अमर्त्य सेन और प्रेमचंद दोनों अलग अलग युग के बुद्धिजीवी हैं परन्तु दोनों के कार्यों में बराबर समानता देखने को मिल जाएगी। दोनों ने ही गरीबों, किसानों, दलितों के लिए अपना लेखन न्यौछावर कर दिया है। 1919 में प्रेमचंद किसानी जीवन के हालातों पर और उनकी समस्याओं पर ध्यान दिलाते हुए उनके महत्व को स्वीकार करते हुए कहते हैं" क्या यह शर्म की बात नहीं है कि जिस देश में 90% किसान हो वहाँ कोई भी किसान सभा, किसान विद्यालय, किसान आंदोलन, उनके लिए कॉलेज, यूनिवर्सिटी नहीं हो? आज तक जो भी स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी खोली गई है वह किसके लिए? ...।  इस सवाल से न केवल वह किसानी जीवन को अपने साहित्य का आधार बनाना चाहते हैं बल्कि उन गरीबों को भी अपने साहित्य में स्थान देते हैं जिन्हें विकास की मुख्यधारा से वंचित किया जा रहा है। इस वर्ग के लिए प्रेमचंद के हृदय में विशेष सम्मान है।



अपने कथा संग्रह "प्रेम-द्वादशी" की भूमिका में प्रेमचंद कहते हैं " हमने उपन्यास और गल्प का कलेवर यूरोप से लिया है परन्तु हमें यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसका कलेवर भारतीय आत्मा में सुरक्षित रहे"..।

रेणु प्रेमचंद को इकलौता ऐसा कथाकार मानते हैं जो न केवल कलम से बल्कि काया से भी स्वाधीनता आंदोलन में भागीदारी लिया करते थे। इस बात की पुष्टि कई आलोचक और स्वयं उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने भी उन पर लिखी जीवनी  "प्रेमचंद:घर में" में कर चुकी हैं।



 प्रेमचंद के लेखन से प्रभावित होकर मन्नू भंडारी BBC हिंदी में प्रकाशित विनोद वर्मा के साथ हुए साक्षात्कार " रचना दृष्टि की प्रासंगिकता-मन्नू भंडारी" में मन्नू भंडारी बताती हैं कि " साहित्य और साहित्य के हर दृष्टि के प्रति यानी चाहे राजनीतिक, सामाजिक,पारिवारिक सभी को उन्होंने जिस तरह अपनी रचना में समेटा और खासकर एक आम आदमी को, एक किसान को, दलित को वह अपने आप मे एक उदाहरण था। साहित्य में दलित विमर्श की शुरुआत प्रेमचंद जी से ही हुई"...।



एक अन्य जानकारी जोड़ते हुए हम यह बताना चाहते हैं कि वैसे तो कथाकार सम्राट प्रेमचंद और महाकवि प्रसाद दोनों औपचारिक रूप से एक दूसरे से लंबे समय तक मिले नहीं थे, हाँ लेकिन दोनों एक-दूसरे का नाम अवश्य जानते थे। दोनों एक दूसरे के लेखन से भी परिचित थे। भले ही प्रेमचंद, प्रसाद के लेखन पर कभी-काल आलोचना भी कर देते थे और यहाँ तक कह चुके थे कि "साहित्य में कुछ लोगों ने गड़े मुर्दे उखाड़ने का जिम्मा उठा रखा है"..। बावजूद उसके प्रेमचंद उनकी प्रसंशा भी करते रहते थे। साहित्य में उनके योगदान का महत्व भी स्वीकारते थे। हिंदी साहित्य के इन दोनों महानुभावों का परिचय एक डॉक्टर की दुकान पर शायराना अंदाज़ में हुआ था जहाँ प्रेमचंद कहते हैं 

"काबा में, कलीसा में, बुतखाने में या दिल में 
है होश मुझे इतना तुझको कहीं देखा है।

जवाब में प्रसाद कहते हैं" इस कक्ष में प्रवेश करते ही परिचित से जाने कब के, तुम लगे उसी क्षण हमको"...।


प्रेमचंद को दी गयी उपाधियाँ :-

1 कलम का सिपाही- उनके सुपुत्र अमृतराय द्वारा।
2 कलम का मजदूर- लेखक मदन गोपाल द्वारा।

3 स्वाधीनता आंदोलन का कथाकार- आलोचक रामविलास शर्मा द्वारा।


सन्दर्भ सूची:-

1 प्रेमचंद:घर में, शिवरानी देवी, सरस्वती प्रेस, बनारस प्रकाशक, 1944..।

2 कुछ विचार - प्रेमचंद - प्रथम संस्करण -1939 -उस्मानिया विश्विद्यालय पुस्तकालय, वॉल्यूम 1- सरस्वती प्रेस- बनारस।

3 प्रेमचंद और उनका युग, रामविलास शर्मा, मेहरचंद मुंशीराम प्रकाशक, मुद्रक नेशनल प्रिंटिंग वर्क्स, 1952..।

4 प्रेमचंद:एक विवेचना, इंद्रनाथ मदान, राजकमल प्रकाशन।

5 गोदान, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2018..।

6 NCERT द्वारा प्रेमचंद पर रेडियो फीचर की प्रस्तुति।

7 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचंद्र तिवारी, पृ-190, विश्विद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।

8 प्रेमचंद और अमर्त्य सेन, शम्भूनाथ, हिंदी समय वेबसाइट।

9 साहित्य ही बन गया था आजादी की लड़ाई की मशाल, जनचौक वेबसाइट।

10 साहित्य कोष-भाग -2, डॉ हरदेव बाहरी, पृ 357, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी।

11 रचना दृष्टि की प्रासंगिकता- मन्नू भंडारी, साक्षात्कार, BBC मूल से 7/08/2007..।

12 प्रेमचंद विकिपीडिया।


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