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Monday, March 7, 2022

एक मध्यवर्गीय कुत्ता

 

आज पढ़िए व्यंगय विधा के गुरु हरिशंकर परसाई का लेख "एक मध्यवर्गीय कुत्ता" जोकि मध्यवर्ग की धज्जियां उड़ाता है।  लेख का मकसद मध्यवर्गीय अवसरवादिता और स्वार्थ को दिखाना है। कैसे मध्यवर्ग अपने हित के लिए किसी का भी सगा हो जाता है और दूसरे पल उसके खिलाफ भी। 

"दूसरे की छतरी छीन कर खुद को भीगने से बचाना मध्यवर्ग का पैदाइशी गुण है।"

कमजोर के सामने बलशाली बनने का ढोंग और अपने से तगड़े के सामने मरीयल बिल्ली की तरह घिग्गी बांधे खड़ा हो जाना यह मध्यवर्ग है। मुझे इस लेख में सबसे खूबसूरत बात मार्क ट्वेन का कथन लगा जिसे शुरू में ही लिखकर आपका ध्यान आकर्षित करने की और लेख के प्रति रूचि पैदा कराने की कोशिश करता हूँ


" यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं कटेगा। कुत्ते और इंसान में यही मूल अंतर है।"


● हरिशंकर परसाई :: :: :: एक मध्यमवर्गीय कुत्ता :: व्यंग्य

व्यंग्य

एक मध्यमवर्गीय कुत्ता

हरिशंकर परसाई


मेरे मित्र की कार बँगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, 'इनके यहाँ कुत्ता तो नहीं है?' मित्र ने कहा, 'तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!' मैंने कहा, 'आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूँ।'

कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते। वहाँ जाओ तो मेजबान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से 'नमस्ते' हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी - 'क्यों यहाँ आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहाँ से!'

फिर कुत्ते का काटने का डर नहीं लगता - चार बार काट ले। डर लगता है उन चौदह बड़े इंजेक्शनों का जो डॉक्टर पेट में घुसेड़ता है। यूँ कुछ आदमी कुत्ते से अधिक जहरीले होते हैं। एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था। मैंने कहा, 'इन्हें कुछ नहीं होगा। हालचाल उस कुत्ते का पूछो और इंजेक्शन उसे लगाओ।'

एक नए परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया। मैं उनके बँगले पर पहुँचा तो फाटक पर तख्ती टँगी दीखी - 'कुत्ते से सावधान!' मैं फौरन लौट गया।

कुछ दिनों बाद वे मिले तो शिकायत की, 'आप उस दिन चाय पीने नहीं आए।' मैंने कहा, 'माफ करें। मैं बँगले तक गया था। वहाँ तख्ती लटकी थी - 'कुत्ते से सावधान। 'मेरा ख्याल था, उस बँगले में आदमी रहते हैं। पर नेमप्लेट कुत्ते की टँगी हुई दीखी।' यूँ कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है। मार्क ट्वेन ने लिखा है - 'यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा।' कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतर है।


बँगले में हमारे स्नेही थे। हमें वहाँ तीन दिन ठहरना था। मेरे मित्र ने घंटी बजाई तो जाली के अंदर से वही 'भौं-भौं' की आवाज आई। मैं दो कदम पीछे हट गया। हमारे मेजबान आए। कुत्ते को डाँटा - 'टाइगर, टाइगर!' उनका मतलब था - 'शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं हैं। तू इतना वफादार मत बन।'


कुत्ता ज़ंजीर से बँधा था। उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था। मैं उससे काफी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया। मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है। लगता ऐसा ही है। मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूँ। चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो। उस बँगले में मेरी अजब स्थिति थी। मैं हीनभावना से ग्रस्त था - इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं! वह मुझे हिकारत की नजर से देखता।

शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे। नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था। मैंने देखा, फाटक पर आकर दो 'सड़किया' आवारा कुत्ते खड़े हो गए। वे सर्वहारा कुत्ते थे। वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते। फिर यहाँ-वहाँ घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते। पर यह बँगलेवाला उन पर भौंकता था। वे सहम जाते और यहाँ-वहाँ हो जाते। पर फिर आकर इस कु्ते को देखने लगते। मेजबान ने कहा, 'यह हमेशा का सिलसिला है। जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं।'


मैंने कहा, 'पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए। यह पट्टे और जंजीरवाला है। सुविधाभोगी है। वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं। इसकी और उनकी बराबरी नहीं है। फिर यह क्यों चुनौती देता है!'

रात को हम बाहर ही सोए। जंजीर से बँधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था। अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता। आखिर यह उनके साथ क्यों भौंकता है? यह तो उन पर भौंकता है। जब वे मोहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाज में आवाज मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे साथ हूँ।

मुझे इसके वर्ग पर शक होने लगा है। यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है। मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते। उनका रोब ही निराला! मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना। आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे। लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे। कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी। वे बैठे रहते या घूमते रहते। फाटक खुला होता, तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे. बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट।


यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज में आवाज भी मिलाता है। कहता है - 'मैं तुममें शामिल हूँ। 'उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी - यह चरित्र है इस कुत्ते का। यह मध्यवर्गीय चरित्र है। यह मध्यवर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है। तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है। हमारी आहट पर वह भौंका नहीं,

थोड़ा-सा मरी आवाज में गुर्राया। आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं। थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया। मैंने मेजबान से कहा, 'आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है।'मेजबान ने बताया, 'आज यह बुरी हालत में है. हुआ यह कि नौकर की गफलत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया। वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही। दोनों ने इसे घेर लिया। इसे रगेदा। दोनों इस पर चढ़ बैठे। इसे काटा। हालत खराब हो गई। नौकर इसे बचाकर लाया। तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है। डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाउँगा।'

मैंने कुत्ते की तरफ देखा। दीन भाव से पड़ा था। मैंने अंदाज लगाया। हुआ यों होगा -

यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा। उन कुत्तों पर भौंका होगा। उन कुत्तों ने कहा होगा - 'अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता। ढोंग रचता है। ये पट्टा और जंजीर लगाए है। मुफ्त का खाता है। लॉन पर टहलता है। हमें ठसक दिखाता है। पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है। संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौंकेगा। हममें से है तो निकल बाहर। छोड़ यह पट्टा और जंजीर। छोड़ यह आराम। घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा। धूल में लोट।' यह फिर भौंका होगा। इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे। यह कहकर - 'अच्छा ढोंगी। दगाबाज, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं।'

इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिला।

कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिंतन कर रहा है।

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Sunday, January 16, 2022

विकलांग श्रद्धा का दौर और हिंदी व्यंग्य

 ' विकलांग श्रद्धा का दौर ' और हिंदी व्यंग्य 


'विकलांग श्रद्धा का दौर' विषय पर चर्चा करने से पूर्व हमें इस विषय की शैलीगत विशेषता के बारे में जानना अनिवार्य है। शीर्षक ही अपने आप में सन्देश दे रहा है कि कहीं-न-कहीं कोई विसंगतिबोध छुपा है। मालूम पड़ता है कि कहीं कोई अनमेल स्थिति पनप रही है, कोई अनमेचिंग सी चीज है। जो अपने आप में एक दर्द, एक टीस लिए हुए है। सम्भव हो कि, लंबे समय से कुछ ऐसा घट रहा है जिसकी अपेक्षा नहीं की गई थी। पूरा का पूरा समाज ही भ्रष्ट हो गया हो, विश्वास की अर्थी उठ गई हो या उसकी टाँग टूट गयी है। उसके हाथ को लकवा मार गया हो या फिर मुँह में कैंसर हो गया है, या और कोई रोग। तब ऐसी स्थिति में सबसे पहले साहित्य जिस शैली या विधा को जम्म देता है वह 'व्यंग्य' कहलाती है। इसीलिए चाहिए कि व्यंग्य को समझा जाए।

व्यंग्य पर वेसे तो कई परिभाषाएँ या वर्णन दिए जा सकते हैं और उसके विस्तार में इजाफा किया जा सकता है। पर अगर एक बात में व्यंग्य को नत्थी किया जाए तो वह काव्यशास्त्र के वक्रोक्ति सिद्धान्त से जुड़ा हुआ दिखता है जिसका अर्थ है 'टेढ़ा कहना या टेढ़ा अर्थ'। इसका जिक्र कथाकार "अमृतराय" जी ने भी किया है - "व्यंग्य का प्रधान उपजीव्य वक्रोक्ति है, जो व्यंजना का ही एक अंग है। जिस साहित्य में व्यंजन नहीं वह कितना ठस होगा।"   (व्यंग्य क्यों -अमृतराय)

जिस टेढ़े कहने की कला को व्यंग्य विधा के साथ जोड़कर देखा जाता है यह टेढ़ा कहना भी अपने आप में रोमांच से भरा हुआ है और बहुत हदतक साहस भरा भी। क्योंकि जहाँ सीधी बात कहना लोगों को न-गवार लग जाता है ,वहीं उसके स्थान पर किसी को टोन कसना, ताना मारना या तंज कसना सभी बातों का निचोड़ 'टेढ़ा कहना' यह सबसे खतरनाक होता है। जैसे किसी का टेढ़ा देखना किसी को गड़ सकता है और बदले में वह यह कह दे ' क्या देख रहा है बे, या क्या घूर रहा है बे'। ठीक ऐसे ही टेढ़ा कहना भी अपने आप में जोखिम भरा कार्य है। परंतु समाज को बदलने के लिए ऐसे जोखिमों को उठाना ही हम बुद्धिजीवियों का दायित्व है। नहीं तो समाज से आदर्श और न्याय का मूल्य जाता रहेगा। इसी सिलसिले में यहाँ व्यंग्य सम्बन्धी कुछ विचार पेश किये जा रहे हैं। उम्मीद है कि व्यंग्य जैसी विधा को समझने और समझाने में यह सफल होगा।


•  व्यंग्य असंगति, अनमेलपन और अंतर्विरोध से पैदा होता है। इसके अतिरिक्त समाज में फैले पाखंड , दिखावटीपन व दोहरे मापदंड जैसी क्रियाओं में भी व्यंग्य उभर सकता है। जहाँ भी अन्याय, विद्रूपता , शोषणवृति, तानाशाही व सत्ता के दम्भ, उसके घमंड और अहम भाव की शंका दिखती है वहाँ भी व्यंग्य ज्वालामुखी की माफ़िक फट जाता है। इसके अलावा शोषक और शोषित तथा राजा व प्रजा के टकराने आदि से भी व्यंग्य का जन्म होता है। इसका मूल उद्गम स्त्रोत 'समाज में व्याप्त विसंगति' है।

"व्यंग्य समाज की वस्तुगत परिस्थितियों में निहित असंगतियों की भाषा में अभिव्यक्त है।" यह सत्य है कि व्यंग्य की उत्तपत्ति सीधी-सपाट भाषा में सहज नहीं। उसके लिए कुछ उठापटक, कुछ अनमेलपन, कुछ धुँआधार सामग्री चाहिए ही । कुछ तो मसाला चाहिए जिससे उन असंगतियों को समाज के सामने पेश किया जाए और समाज उससे जुड़ सके। यहाँ सीधी सपाट भाषा का अर्थ वाक्य को सीधे रूप में कहने से न होकर परिस्थिति या स्थिति विशेष को सपाट कहने से है।

• "व्यंग्य लेखकों की प्रतिभा से पैदा नहीं होता" :-

भले ही व्यंग्य लेखकों की प्रतिभा से पैदा न होता हो परन्तु वह उससे अछूता भी नहीं। व्यंग्य पैदा होने में केवल समाज में व्याप्त विसंगतियाँ ही कारगर नहीं होती। उसकी निर्मित में कलम की शक्ति का अपना एक अलग महत्व है। इसे आसानी से समझने के लिए हम व्यंग्य का माध्य, समाज में व्याप्त विसंगति और माध्यम के लिए लेखन/कलाकारी जिसमें चित्रकारी से लेकर लिपिबद्ध रूप भी शामिल है को ले सकते हैं।  ('व्यंग्य कहाँ से आता है से…।'- वीरभारत तलवार)


सत्ता हो या उसके बाहर के लोग उनके वादों, उनकी योजनाओं, सामाजिक-राजनीतिक विकास के मॉडल, साथ ही उनके एजेंड़े आदि से भी व्यंग्य पैदा होता है। क्योंकि कमोबेश यह उल्टी ही धारा में बहते नजर आते हैं। यह व्यंग्य न केवल शिक्षित समाज के गलियारों से होता हुआ गुजरता है बल्कि चौक-चुबारे , पान की गुमटियों, मोची की दुकान से लेकर चाय वाले की टपरी, रेहड़ी-पटरी वालो के पास, किराने की दुकान से लेकर सैलून तक पर इन व्यंग्यों का उद्गम होता है। बात-बात पर सरकार योजनाओं की दुहाई देती रहती है और अपने काम गिनाती रहती है। वहीं दूसरी ओर जनता भी सरकार के वादे और उनके काम गिनाती रहती है। केवल दोनों में अपनी-अपनी समझ और नैतिकता का फर्क होता है। एक तरफ सरकार यह कहती है कि 'हमने जनता के लिए दस हजार करोड़ का बजट पास किया है, तो वहीं जनता कहती है 'हाँ बजट तो पास किया, लेकिन वो अफसरों की तोंद बढ़ा रहा है।' यहाँ आम जनता तो उस सुख को देख तक नहीं पा रही। ऐसी स्थिति में राजा और प्रजा के बीच विसंगति-बोध का फ़र्क सीधा नज़र आता है और व्यंग्य का जन्म होता है। उदाहरण के लिए भारतेंदुयुग के श्रेष्ठ निबंधकार " बालमुकुंद गुप्त" जी याद किये जाने योग्य हैं। उनका प्रतिनिधि निबंध "शिवशम्भु के चिट्ठे" इस विसंगतिबोध का अच्छा नमूना है। ठीक राजा और प्रजा वाली बात वहाँ भी निबन्धकार ने दिखाई है। लॉर्ड कर्जन द्वारा दिल्ली में विक्टोरिया मेमोरियल बनवाया गया जोकि सामान्य जनता या निम्न जनता के लिए कोई जरूरी नहीं। यही काम कई बार सरकार करती है। कहने को तो काम होता है परंतु उसका लाभ कोई और ही उठाता नजर आता है।

जब सरकार केवल ऐसे काम गिनाए जिससे जनता का कोई सरोकार नहीं , तब जनता व्यंग्य को पैदा करने में कोई भूल नहीं करती। वो सहज ही कहीं-न-कहीं से फूट पड़ता है। ऐसे ही "वीरभारत तलवार" अपने एक लेख 'व्यंग्य कहाँ से आता है"' में इंदिरा सरकार के बहुचर्चित नारे 'गरीबी हटाओ' का ज़िक्र करते हैं। इसमें भी विसंगतिबोध की धीमी ही सही लेकिन बू जरूर आती है। सत्तर और अस्सी के दशक में देश दुर्दशा का शिकार हो रहा था उससे पाठक वर्ग अनभिज्ञ नहीं। देश की आर्थिक स्थिति और राजनीतिक स्थिति से निपटना तो फिर भी आसान है, लेकिन जब बोलने की आजादी ही बंद कर दी जाए तो सारे दरवाजे खुद-ब-खुद बंद हो जाते हैं। इंदिरा सरकार द्वारा प्रेस की आजादी पर रोक, अनियोजित आपातकाल की घोषणा, पत्रकारों और न जाने कितने सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, क्रांतिकारियों आदि को जेल में डलवा दिया जाना इसी विसंगति का उदाहरण है। जिससे आने वाले समय में चित्रों, कार्टूनों, साहित्यिक लेखों, अखबारों आदि में व्यंग्य पैदा हुआ। 2017 में आई "इंदु सरकार" नामक फ़िल्म इसी विषय पर आधारित है। जिसमे मुख्य भूमिका "कीर्ति कुल्हारी" की रही है। साथ सहायक कलाकार में "अनुपम खेर", "नील नितिन मुकेश" का नाम भी श्रेणीगत है। यह फ़िल्म 1975 जून माह में लगाये गए आपातकाल और उससे पनपी समस्याओं, विडम्बनाओं, दहशत के माहौल, लोकतंत्र की हत्या जैसे गम्भीर विषयों को छूती है। जिसका मकसद ऐसी सत्ता से मुक्ति पाना है जिसमें विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को खतरा हो और जन-सम्पर्क ख़तरे में आ चुका हो। इस संघर्ष से जूझती हुई कीर्ति कुल्हारी अंत तक आंदोलित रहती है और लोकतंत्र को जिलाये रखने के लिए सांगठनिक गतिविधियों में लिप्त रहती है। 


"जो घर जलावे आपनो चले हमारे साथ" (दिनकर सोनवलकर, व्यंग्य की भूमिका पृ 53) अर्थात अव्वल तो खुद के गिरेबान में झाँको, खुद को पहचानों, अपनी कमियों को, अपनी गलतियों को देखो तब दुसरो को गलत ठहराए। अपने अंदर छुपी बुराइयों को जलाएं, अपने घमंड को जलाएं, अपने अहम भाव को जलाए। इन सबको त्यागने के बाद ही आप निश्छल और पवित्र हो सकते हैं। समाज बदलने योग्य हो सकते हैं। जिस लोकतंत्र की बीन आज हर कोई बजाने में लगा है उसे सबसे पहले खुद को लोकतांत्रिक बनाना होगा। तब कहीं जाकर वह समाज का हित साध पायेगा। अपने आसपास के माहौल को, अपने परिवार को, अपने सगे-सम्बन्धियों को लोकतांत्रिक बनाओ। उनसे लड़ना सीखो, सही बात को कहना सीखो, गलत बात को काटना सीखो, तोड़ना सीखो। जब तक आप विरोध नहीं करेंगे तबतक आप चली आती हुई वर्जनाओं को दिशाहीन नहीं कर सकेंगे। एक उदाहरण के तौर पर हम समझ सकते हैं - प्रसिद्ध गीतकार व कॉमेडियन "वरुण ग्रोवर" ने अपने एक शो में कहा था कि " सबसे पहले अपने घर में डेमोक्रेसी लाओ।" उनका मतलब साफ है कि सबसे पहले अपने पास से शुरू करो तब कही जाकर कोई दूसरा आपकी बातों को ध्यान देने योग्य समझेगा, उस पर अमल करेगा या उससे प्रभावित होगा। 

आगे बढ़ते हुए अब शीर्षक पर चर्चा करनी चाहिए। यह शीर्षक ही अपने आप में एक चुनौती है। ऊपर से 'विकलांग श्रद्धा का दौर' जैसे गूढ़ विषय पर चर्चा करना अपने-आप में दिलचस्प भी। ऐसे दौर में जब संसार से विश्वास जाता दिख रहा है और फ़र्जी भावनाओं का बोलबाला है उसी पंक्ति में, यह विषय एक सफल प्रयोग सिद्ध होगा। आज सोसाइटी में जो लोग एक-दूसरे के प्रति शंकालु हो गए हैं इसकी शुरुआत आज से ही नहीं है। इसके गुणतत्व लंबे समय से चले आ रहे हैं। परन्तु प्रस्तुत विषय के वातावरण को ध्यान में रखते हुए यदि चर्चा की जाए तो यह सिलसिला भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात ही बड़ी तेज़ी से बढ़ता गया है। भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात बने वातावरण ने लोगों को एक-दूसरे के प्रति इस विशेष प्रकार के भाव (अविश्वास) से लाभान्वित होने के लिए मजबूर कर दिया था। सत्ता की तब्दीली और दंगो की आड़ में, व्यापक रूप से पलायन और मारकाट में, आगजनी और बदलते रिश्तों में व्याप्त अविश्वास आदि से मिली स्वतंत्रता के गहरे ज़ख्म को भरने के लिए जनता ने जिस मरहमपट्टी (नेताओं) पर विश्वास जताया था उन्होंने ही उसे कुरेदना शुरू कर दिया। सत्ता के लोभ का जो परिचय देश के तत्कालीन नेताओं और नौकरशाही ने दिया उससे जनता पूरी तरह निराश, हताश और टूट कर बिखर चुकी थी। एक दर्द अभी तक ठीक नहीं हुआ था कि उन्होंने उस पर दूसरा और बिठा डाला। जनता जिस गरीबी, जहालत, भुखमरी, आर्थिक-सामाजिक विसंगतिबोध से जूझ रही थी उसे हमारे नेताओं ने और बल देने का कुकृत्य किया। इस स्थिति में अमीर और अमीर होते गए और गरीब और गरीब। ऐसी स्थिति में देश के प्रधानमंत्री तक आरोपों-आक्षेपों के घेरे से बेदाग न रहे। इन सबका कारण किसी संतुलित और व्यापक स्तर पर योजना का क्रियान्वयन न होना होगा, जिसके आभाव में ऐसी परिस्थितियों का जन्म हुआ। भगतसिंह पर निर्मित अभिनेता "अजय देवगन" वाली फ़िल्म इस परिस्थिति के अनुकूल बैठती है, जहाँ उनका एक डायलॉग है। जब गाँधी जी 1929 में भारत के लिए 'डोमेमियम स्टेट्स' की माँग तत्कालीन वायसरॉय "लार्ड इरविन" से करते हैं। जहाँ भगतसिंह के गुट के कुछ लोग कांग्रेस और गाँधी जी पर भी भरोसा जताते हैं वहीं गुट के सरदार भगतसिंह कांग्रेस की मंशा पर शक जताते हुए कहते हैं :- " कॉंग्रेस का मकसद केवल सत्ता पाना है। उन्हें नहीं पता आजादी के बाद देश को किसकी जरूरत है। ऐसे हालात में अमीर और अमीर होते जायँगे और गरीब और गरीब..।" फ़िल्म में कही गई भगतसिंह की बात सच का आईना था। देश जिस उन्नति की आशा से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा था, वह विपरीत दिशा से अवन्नति के रास्ते पर चल निकला था। लोगों की आस्थाएँ विकलांग हो चुकी थी। पंगुपन समाज में पूरी तरह घुलमिल गया था। नकलीपने का बोलबाला सर चढ़कर ता-ता-धिन्ना कर रहा था। इस विकलांग होती हुई श्रद्धा (आस्था, विश्वास) पर लेखक बड़ी गहरी चोट करता है और यह निबंध इस बात का प्रतिनिधित्व करता है।

विकलांग श्रद्धा का दौर पर अपनी समझ प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में अव्वल तो उसके अर्थ और स्वरूप को समझना आवश्यक है। तब कहीं जाकर हम विकलांग श्रद्धा पर कुछ विचार कर सकेंगे।

विकलांग शब्द कोई स्वतंत्र शब्द न होकर एक संयुक्त शब्द है। जिसका निर्माण 'विकल' शब्द से हुआ है। विकल शब्द का अर्थ 'परेशान' होता है। अर्थात जहाँ परेशानियां व्याप्त हों, जहाँ मुसीबतें हो, आदि। इस शब्द में 'अंग' शब्द जोड़ने से 'विकलांग' शब्द बनता है। मतलब 'जिस अंग के इस्तेमाल में परेशानी आये।' शरीर का ऐसा भाग जो काम करने में परेशानी दे। इस व्याख्यमाला में विकलांग का अर्थ : - बेकाम आने वाला अंग, अंग से हीन, शरीर से हटा हुआ, अपनी स्वाभाविक, प्राकृतिक क्रिया से परे अंग आदि का होना है।

इसी तरह श्रद्धा का अर्थ हुआ - विश्वास, आस्था (ईश्वर, पूजनीय के प्रति)। इसका एक अर्थ 'इच्छा' भी होता है (लोग अपनी इच्छा अनुसार चंदा देते हैं, लोग अपनी श्रद्धानुसार दान-दछिना देते हैं, आरती की थाली में चढ़ावा देते हैं इत्यादि।)  श्रद्धा का सम्बन्ध पूजनीय व आराध्य से है। 

जब हम विकलांग और श्रद्धा को आपस में एक वाक्य के भीतर या विशेष अर्थ में देखते हैं तो उसका अर्थ व्यापकता और गूढ़ता में शामिल होता है। उसमें भी जब पूरे दौर या समय विशेष की चर्चा हो तो इस पर हमें बड़ी गम्भीरता के साथ विचरण करना चाहिए। एक-एक पहलू को बड़ी बारीकी के साथ देखना चाहिए क्योंकि छोटे-से-छोटा भाग भी अर्थ का अनर्थ कर सकता है, वाक्य का रूप ही बदल सकता है। फिलहाल तो समय और सामग्री का अभाव मुझे उस गूढ़ता और व्यापकता को प्राप्त कर सकने में अवरोध दे रहा है फिर भी अपनी समझ से जो भी में लिपिबद्ध कर सकता हूँ यहाँ कर रहा हूँ। उम्मीद है कि इस विषय पर वह खरा उतरने का कार्य करेगा। 


'विकलांग श्रद्धा का दौर' :- बात को लम्बा न खींचते हुए सीधे मुददे पर आता हूँ। समाज का ऐसा दौर जहाँ फर्जी , दिखावटी, कृत्रिम पूजनीय भाव व सम्मानीय भाव का चलन ज़ोर-शोर पर आ बैठा हो। जहाँ यह पहचान पाना मुश्किल हो जाये कि अमुक व्यक्ति का किसी दूसरे के प्रति आदर-सत्कार सच्चा है भी या नहीं। जहाँ यह समझ पाना मुश्किल हो जाये कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति जुड़ाव या लगाव किसी स्वार्थसिद्धि से पूर्ण तो नहीं ? कहीं वह केवल काम निकलने वाले के लिए, अपना उल्लू सीधा करवाने के लिए तो साथ नहीं ? कहीं यह केवल दिखावा या छलावा तो नहीं ? आदि। ऐसी परिस्थितियों में जब उस भावना में कुछ ऐंठन, कुछ टूटन या विकलांगता के गुण आ जाए जिससे उसकी नेचुरलटी को बनाये रखना मशक्कत का काम लगे, तब वहाँ विकलांग श्रद्धा के चिन्ह दिखते हैं। 

विकलांग श्रद्धा अपने आप में एक रोग है जिसमें फूहड़पन, तुच्छता, नीचता, शोऑफ, आदि इसके लक्षण हैं। जब व्यक्ति इन लक्षणों से ग्रसित हो जाए तब मान लेना चाहिए कि यह व्यक्ति असल नहीं, ऑथेंटिक नहीं। तब ऐसी स्थिति में उससे सावधान रहने की सबसे पहली शर्त है वरना यह घातक सिद्ध हो सकती है। जिस दिखावे की चर्चा ऊपर की गई है उसी का एक उदाहरण यहाँ पेश किया जा रहा है। लेखक कहता है कि  मेरे शहर में एक अध्यापक ने अपने नेमप्लेट पर आचार्य लिखवा लिया था। मैं तभी समझ गया कि इस फूहड़पन में महानता के लक्षण है। आचार्य बम्बईवासी हुए उन्होंने खुद को "भगवान रजनीश" बनना डाला। आजकल वह फूहड़ से शुरू होक मान्यता-प्राप्त भगवान हो गए हैं। मैं भी अगर नेमप्लेट पर 'पंडित' लिखवा लेता तो कभी का 'पंडितजी' कहलाने लगता। (विकलांग श्रद्धा के चिह्न)

वेसे तो आज तकनीकियों का इतना बोल-बाला है कि झटपट कोई न कोई जुगाड़ बन बैठता है। उसी दिशा में जब मनुष्य किसी भी अंग विशेष से विकलांग होता है तो उसकी एवज़ में वह पहले से ही जुगाड़ ढूँढ़कर रख लेता है। "अगर आपके मसूड़ों में दिक्कत है तो नकली मसूड़ा लगा लो। दाँत में कीड़ा लग गया है तो नकली दाँत लगवा लो।" दाँत वाली बात तो कुछ खास है। जैसे "बालकृष्ण भट्ट" और "प्रतापनारायण मिश्र" जी ने भी अपने लेखन में कहीं-कहीं कही है। उसी अर्थ में मैं भी कुछ फेंक रहा हूँ आप उठा लीजिएगा। 'नकली दाँत लगवाने की भी अपनी एक अलग कला है, स्वाद है, आर्ट है। इनकी वैराइटियों का भी खूब बोलबाला सर चढ़कर बोलता है और इतना बोलता है कि बस चुप होने का नाम ही नहीं लेता। बड़-बड़-बड़-बड़ बस बोलता रहता है। कोई सोने का दाँत लगवाता है तो किसी को चाँदी का दाँत रास आता है। किसी की जेब प्लास्टिक का दाँत ही अफोर्ड कर पाती है तो कोई सिंगल दाँत से ही काम चलाता है। अच्छा ! रिमूवेबल दाँत की भी चर्चा कम नहीं ।'

इसी कड़ी में आगे :- 'अगर दाँतो से रुख़ में कोई दुःख दिख रहा हो तो चमकदारनुमा, पतली -सी एल्मुनियम की तार खिंचवा लीजिए, तब देखिए क्या झटपट रौनक आपके रुख़ का नक्शा बदल देती है। आपकी टाँग दुरुस्त नहीं तो लोहे की रॉड लगवा लो। प्लास्टिक का पैर आपको मार्केट में यूँ बिखरा पड़ा मिल जाएगा। उस पर "रीबॉक" , " नाइकी" के शू डालिये फिर देखिए आपकी क्या टौर बनती है। फ़िल्म "शोले" के ठाकुर की तरह अगर आपका भी हाथ नहीं है तो चिंता मत कीजिये, अब गब्बर से बदला लेना हुआ और भी आसान। नकली हाथ लगाइए और दो लगाइए उस ससुर के नाती गब्बर को।

सलमान खान के अभिनय की कितनी भी आलोचना कर लूँ कम-से-कम अपने इस विषय के लिए मुझे वहाँ से कुछ मसाला तो मिला। "जय हो" मूवी की उस लड़की से भी आप प्रेरणा ले सकते हैं जिसका एक हाथ लकड़ी का था।


मनुष्यों के कृत्रिम अंगों की जरूरतों व निर्माण में आज विज्ञान इतना आगे बढ़ गया है कि स्त्री-पुरुषों के गुप्तांगों पर भी उसका ध्यान एकदम टिका हुआ है। तकनीकी विकास के मामले में "चीन" और "जापान" जहाँ अव्वल देशों की सूची में हैं वहीं कृत्रिम अंगों के निर्माण में भी वह कुछ पीछे नहीं। ये अलग बात हो सकती है कि विकलांग लोगों का सम्बंध इनसे है भी या नहीं। 


अंततः इन सबसे यह अर्थ निकालना चाहिए कि , 'समाज में फैली श्रद्धा (आस्था) की हवा में कुछ धूलकण, गैसीय पदार्थ आदि भी आ घुला है जिससे वह दुर्गंधित हो गयी है। अब श्रद्धा की सुगन्धित हवा की जगह स्वार्थ की बदबूदार हवा ने ले ली है जो पूरे समाज को नाक-मुँह बंद करने पर मजबूर कर रही है। जहाँ श्रद्धा का अर्थ अपने पूजनीय, आराध्य लोगों के प्रति सम्मान की भावना व विश्वास का विषय था, अब केवल वह कार्यपूर्ति का नमूना बन गया है। कहीं-कहीं वह मात्र औपचारिकता का सिम्बल बन गया है। इस संदर्भ में लेखक बताते हैं कि  एक बार अचानक ही एक सज्जन ने मेरे पैर आकर छू लिए थे। तभी मैंने बाकियों से कहा "तिलचट्टों, देखों मैं श्रधेय बन गया, तुम घिसते रहो कलम।"...पर तभी उसने मेरा पानी उतार दिया। उसने कहा "अपना तो नियम है कि गौ, ब्राह्मण, कन्या के चरण जरूर छूते हैं।" यानी उसने मुझे लेखक नहीं माना बाह्मन माना।

एक जगह पुस्तकीय शीर्षक निबंध में लेखक अपने श्रधेय बनने की इच्छा को मार देता है और विकलांग श्रद्धा का एक उदाहरण देता है। वह कहते हैं : "डॉक्टरेट अध्ययन और ज्ञान से नहीं, आचार्य-कृपा से मिलती है। आचार्यों की कृपा से इतने 'डॉक्टरेट' हो गए हैं कि बच्चे खेल-खेल में पत्थर फेंकते हैं तो किसी डॉक्टर को लगता है। एक बार चौराहे पर यहाँ पथराव हो गया। पाचँ घायल अस्पताल में भर्ती हुए और वे पाँचो हिंदी के 'डॉक्टर' थे। नर्स अस्पताल के डॉक्टर को पुकारती: 'डॉक्टर साहब' , तो बोल पड़ते थे ये हिंदी के डॉक्टर।"


रोहित कुमार 'खोजकर्ता'

दर्शन निष्णात

हैदराबाद विश्वविद्यालय

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