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Tuesday, May 18, 2021

आधुनिक काल भाग- 5

  

                           (छायावाद)


"हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "छायावाद" के नाम से भी जाना जाता है। आज हम इसी के बारे में यहाँ कुछ विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। खासतौर छायावाद पर कहे गए कथन । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी। 

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● नामकरण :-   

पोस्ट की शुरुआत छायावाद के नामकरण को लेकर की जा रही है। छायावाद नाम को लेकर अनेक विद्वानों में एकमतता नहीं है।  "हिंदी साहित्य लोचन" hindisahityalochan के मंच पर आप समझ सकेंगे कि छायावाद नाम के पीछे विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न क्यों हैं।

1. "बच्चन सिंह" ने छायावाद को "स्वछंदतावाद" नाम देते हुए उसके पीछे के कारणों को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार "आधुनिक काल का साहित्य लिखते समय छायावाद नाम बाधक सिद्ध हुआ क्योंकि उससे केवल पद्य की रचनाओं को ही स्वीकारा गया है, पर इसी काल में गद्य को छायावादी गद्य का नाम नहीं दिया गया। इतिहास की अपनी विवशता होती है कि प्रवृति के आधार उसे काल का नामकरण करना होता है। लिहाज़ा इस युग का एक ही नाम हो सकता है " स्वछंदतावाद"..। 

इससे 2 समस्याएँ हल हो जाएंगी।

• इस युग के गद्य-पद्य के लिए एक ही नाम हो जाएगा।

• अन्य भारतीय साहित्यों और भारतीयेतर साहित्यों के स्वछंदतावादी से जुड़ जाता है।

2. आचार्य शुक्ल ने आधुनिक काल के किसी भी समय विशेष को किसी नाम-विशेष में न वर्गीकृत करते हुए उसके उत्थान रूप में देखा है। फलतः आचार्य शुक्ल ने छायावाद के स्थान पर "तृतीय उत्थान" नाम दिया है।


● छायावाद का अर्थ :-

1. चतुर्वेदी के अनुसार "महाकवि जयशंकर प्रसाद" ने छाया शब्द का अर्थ " मोती के भीतर छाया की जैसी तरलता" से निकाला है। इसका अर्थ - चमक, आब, कांति आदि से जोड़कर देखा जा सकता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि "छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है"..।

2. शुक्लानुसार सामान्य अर्थ में छायावाद का अर्थ हुआ" प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करने वाली छाया के रुप में अप्रस्तुत का कथन। इस शैली के भीतर किसी वस्तु या वर्ण्य का वर्णन किया जा सकता है।

• शुक्लानुसार एक अन्य रूप से भी छायावाद शब्द का अर्थ दो अर्थों में किया जाना चाहिए :-

1.  रहस्यवाद, जहाँ कवि उस अनन्त व अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकत कविताएँ लिखता है। 

2.  प्रयोग के काव्यशैली/ पद्धतिविशेष के व्यापक अर्थ में है। 1885 में फ्रांस में रहस्यवाद कवियों का एक दल खड़ा हुआ जो प्रतीकवाद कहलाया। व अपनी रचनाओं में अप्रस्तुत प्रतीकों का इस्तेमाल किया करते थे। 

उनके अनुसार न केवल छायावादी कविताओं में यह लक्षण देखे गए बल्कि अन्य प्रकार की रचनाओं में भी यह लक्षण देखे गए। 


● हिंदी में सर्वप्रथम " प.मुकुटधर पांडेय" ने जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका में सँ 1920 में "हिंदी में छायावाद " शीर्षक से चार किस्तों में एक लेख प्रकाशित करवाया। परन्तु इससे पहले छायावाद नाम आ चुका था। और अपने इस लेख में छायावाद की 5 विशेषता भी बताई हैं : वैयक्तिकता, स्वातंत्र्य, रहस्यवादिता, शैलीगत विशेषता आदि।

• हिंदी साहित्य लोचन आपको बताता है कि , शुक्लानुसार "मुकुटधर पांडेय" को छायावाद का 'प्रथम प्रयोक्ता' माना जाता है। यह "लोचनप्रसाद पांडेय" के अनुज थे।


● छायावाद के प्रवर्तक :-

शुक्ल - मैथिलीशरण गुप्त व मुकुटधर पांडेय

नंदुलारे वाजपेयी - सुमित्रानंदन पंत

प्रभाकर माचवे - माखनलाल चतुर्वेदी

इलाचन्द्र जोशी - जयशंकर प्रसाद।


● शुक्लानुसार छायावाद की पृष्ठभूमि:- 

"हिंदी साहित्य लोचन" आपसे साझा करना चाहता है कि किस प्रकार से छायावाद की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी। हिंदी साहित्य के अंतर्गत छायावाद का आगमन किन कारणों से हुआ था इसके बारे में तथ्यात्मक-वर्णनात्मक चर्चा करके हम आपतक इस जानकारी को प्रसारित करने की कोशिश करेंगे।

"रवींद्रनाथ ठाकुर" की उन कविताओं की धूम उठी जो अधिकतर पाश्चातय ढाँचे को आधार बनाकर चल रही थी, परन्तु इसाई संतो के छायाभास (फैंटामासा) तथा योरोपीय काव्यक्षेत्र में प्रवर्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद (सिम्बोलिज़्म) के अनुकरण पर रची जाने के कारण बंगला में ऐसी कविताएँ छायावादी कहलाई गई।

छायावाद नाम चल पड़ने का परिणाम यह हुआ कि बहुत से कवि रहस्यात्मक, अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्रय, वस्तुविन्यास की विश्रृंखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्पना को ही साध्य मानकर चले। शैली की इन्हीं दूरारूढ़ साधना में ही लीन हो जाने के कारण अर्थभूमि की ओर उनकी दृष्टि न रही। प्रणयवासना का यह उद्गार आध्यात्मिक पर्दे में ही छिपा रहता है। हृदय की सारी कामवासनाएँ, इंद्रियों की सुखविलास की मधुर और रमणीय समग्र के बीच एक बंधी हुई रूढ़ि पर व्यक्त होने लगी। इस प्रकार रहस्यवाद से सम्बन्ध न रखने वाली कविताएँ भी छायावादी कहलाने लगी।अतः छायावाद शब्द का प्रयोग रहस्यवाद तक ही न रहकर काव्यशैली के सम्बंध में भी प्रतीकवाद के अर्थ में होने लगा।

छायावादी की प्रथम कविता की दौड़ तो बंगभाषा की रहस्यमयी व कोमल सजीली कविताओं से हुई। पर उन कविताओं की बहुत कुछ गतिविधि अंग्रेजी वाक्य खंडों के अनुवाद द्वारा संघटित देख, अंग्रेजी कवियोँ से परिचित हिंदी कवि सीधे अंग्रेजी से ही तरह तरह के लाक्षणिक प्रयोग करके ज्यों-त्यों अनुवाद के जगह अपनी रचनाओं में जड़ने लगे।

छायावाद जहाँ तक आध्यात्मिक प्रेम लेकर चला है तबतक तो वह रहस्यवाद के अंतर्गत ही रहा। उसके आगे वह चित्रभाषा व प्रतीकवाद नाम की काव्यशैली के रूप में गृहीत होकर भी वह अधिकतर प्रेमगान ही करता रहा है। हर्ष की बात यह है कि अब कई कवि उस संकीर्ण क्षेत्र से बाहर आकर जगत,जीवन और मार्मिक पक्षों की ओर भी बढ़ रहे हैं।


● "हिंदी साहित्य लोचन" hindisahityalochan के मंच पर आप (छायावाद पर शुक्ल के मत) को देख सकते हैं :- 

शुक्लानुसार "जब रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताओं की धूम उठी तब कई कवि रहस्यवाद और प्रतीकवाद/चित्रभाषा- वाद को ही एकांत ध्येय बनाकर कविताएँ करने लगे और उसमें लौकिक व अलौकिक प्रेम को ही लक्ष्य करके जब कविताएँ करने लगे तब छायावाद का नाम ग्रहण किया गया।

जब ऐसी कविताओं में रहस्य और अभिव्यंजना की नई धारा को जिंदा किया गया तो उसमें एक नई बात यह भी देखी गयी कि कल्पना का भी अतिशय प्रयोग होने लगा है। इस पर शुक्ल जी का प्रश्नावली शैली में मत है कि" यदि भावनाओ को भी कल्पना के सहारे दिखाया जाएगा तो वह अपनी शक्ति को खो देगी और तब उसकी वस्तुयोजना भी अस्वाभाविक लगेगी"..।

• शुक्लानुसार छायावाद का आगमन द्विवेदी युग की रूखी इतिवृत्तात्मक प्रतिक्रिया में हुआ था।

• शुक्लानुसार छायावाद का पहला या मूल अर्थों में हिंदी क्षेत्रों में प्रयोग करने वाली महादेवी ही हैं, प्रसाद, पन्त व निराला या अन्य कवि तो अपनी शैलियों से ही छायावादी कहलाये हैं।


● छायावाद की परिभाषाएँ :-

1. शुक्ल - छायावाद शब्द का प्रयोग 2 अर्थ में किया जा सकता है। एक तो 'रहस्यवाद' के अर्थ में जहाँ इसका सम्बंध काव्यवस्तु से है, अर्थात जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है...। और दूसरा 'प्रयोग काव्य-शैली' या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है।

2.  "बच्चन सिंह" के अनुसार शुक्ल जी ने छायावाद की असली परिभाषा यह दी है " आंतरिक प्रभाव-साम्य के आधार पर लाक्षणिक और व्यंजनात्मक पद्धति का प्रगल्भ और प्रचुर विकास छायावाद काव्य शैली की असली विशेषता है"..।

3. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार छायावाद का अर्थ " रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताओं के प्रभाव से आया हुआ मानकर इसका सम्बन्ध ईसाई संतो के फेंटसमाटा (छायाभास) व चित्रभाषा शैली से है। 

4. जयशंकर प्रसाद - जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगे तब हिंदी में उसे छायावाद का नाम दे दिया जाता है।

बच्चन सिंह के अनुसार प्रसाद ने अपने 2 लेखों "रहस्यवाद और यथार्थवाद" व "छायावाद" लिखे हैं। जिसमें से प्रथम में शुक्ल जी के रहस्यवाद में अभारतीयता देखना उन्हें अखरता है, वह इसका विरोध करते हैं। दूसरे लेख में वह छायावाद की निर्मुक्तिमुल्क परिभाषा देते हैं।

प्रसाद 'रहस्यवाद की सौंदर्य' को ही छायावाद मानते हैं। उनके अनुसार "यथार्थवाद दुखवादी है और छायावाद आनंदवादी। यथार्थवाद द्वैतावादी है और छायावाद अद्वैतवादी"..। आगे वह लिखते हैं " ध्वयनयात्मक, लाक्षणिक, सौंदर्यमय प्रतीक विधान ही छायावाद की विशेषता है।

5. महादेवी वर्मा - छायावाद तत्वतः प्रकृति के बीच जीवन का उद्गीथ है...। उसका मूल दर्शन सर्वात्मवाद का है।

6. नंदुलारे वाजपेयी - "मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म, किंतु व्यक्त सौंदर्य से आध्यात्मिक छाया का भान मेरे विचार से छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या हो सकती है"..।

 बच्चन सिंह इसे शुक्ल जी से मिलती हुई परिभाषा ही मानते हैं।

7. नगेंद्र - छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।

8. रामविलास शर्मा - छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह नहीं है।

9. नामवर सिंह - छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की अभिव्यक्ति है, जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से। 

10.  रामस्वरूप चतुर्वेदी - छायावाद मूलतः शक्ति काव्य है, पुनर्जागरण चेतना का व्यापक और सूक्ष्म रूप है और अपनी अर्थ प्रक्रिया में मानव व्यक्तित्व को गहरे स्तरों पर समृद्ध करता है।

11. सुमित्रानंदन पन्त - छायावाद काव्य न रहकर अलंकृत संगीत बन गया...। (विजेन्द्र स्नातक के अनुसार)

12.  रामकुमार वर्मा - प्रकृति का क्षेत्र ही इन कवियों की कविता का क्षेत्र है। ऐसी स्थिति में इन कविता को यदि प्रकृतिवाद कहा जाए तो गलत नहीं"..।

13. बच्चन सिंह - "छायावाद शब्द अपने आप में ही उलझा हुआ है। इसके स्थान और स्वछंदतावाद शब्द रख दिया जाए तो समस्या का हल हो जाएगा साथ ही बंगाल में किसी भी तरह की कविताओं को छायावादी कविता नहीं कहा गया। यह वाद किसी बाहरी परिवेश से प्रभावित नहीं बल्कि "अपनी ही जमीन का पौधा है"।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


"हिंदी साहित्य लोचन" sahitya hindi lochan.blogspot.com पर आने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आप इसी तरह से "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आते रहे और हिंदी साहित्य से सम्बंधित अन्य तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी यहाँ पाते रहें।

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आधुनिक काल भाग - 4


                      (द्विवेदी युग)


 "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "द्विवेदी युग" के नाम से भी जानी जाती है। आज हम इसी के बारे में यहाँ कुछ विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। उसमें भी खासतौर पर द्विवेदीयुगीन एमी महत्वपूर्ण कवियों की रचनाओं व उनके साहित्यिक कर्म के बारे में कुछ तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी साझा करने जा रहे हैं। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी। 

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1. कवि "जगन्नाथ दास" जिनका उपनाम 'रत्नाकर' था, इन्होंने अंग्रेजी कवि "पोप" के समालोचना सम्बन्धी प्रसिद्ध काव्य "एस्से ऑन क्रिटिसिज़्म" का अनुवाद 'समालोचनादर्श' नाम से किया है।

इनकी प्रसिद्ध कृति "गंगावतरण" जोकि 1927 में प्रकाशित हुई थी। उसमें गंगा के धरती पर उतरने और शिव द्वारा उन्हें संभालने के लिए सन्नद्ध होने का वर्णन ओजगुण में किया है। रचना में किये गए ओजगुण का वर्णन ऐसा है कि वह पाठकगण को आनंदित होने को बेकरार कर देता है।

"हिंदी साहित्य लोचन" अपने मंच पर यह स्पष्ट करना चाहता है कि, कवि रत्नाकर जी की अन्य महत्वपूर्ण रचना "उद्धव शतक" जोकि 1929 में आई थी उस पर बिहारी सतसई का अनुकरण नहीं है। स्वयं बच्चन सिंह के अनुसार "उद्धव शतक" में दुलारेलाल भार्गव की रचना  "दुलारे दोहावली" की तरह बिहारी सतसई की तरह अनुकृति नहीं है बल्कि उद्धव शतक की टेक्नीक और कसावट सतसई से ली गयी है"..।

कवि रत्नाकर "जकी" नाम से उर्दू में लिखते थे।

                                                          

2. द्विवेदीयुगीन अन्य महत्वपूर्ण कवि " नाथूराम शर्मा" जिनका उपनाम 'शंकर' था। इन्हें इनके साहित्यिक योगदान से प्रभावित होकर हिंदी साहित्य के बड़े-बुजुर्गों ने अथवा तत्कालीन विद्वानों ने इनको "कविता-कामिनी-कांत",  "भारतेंदु प्रज्ञ" , "साहित्य सुधाकर" आदि उपाधियों से नवाज़ा था। 

इनकी प्रसिद्ध रचना "गर्भरण्डा रहस्य" नामक एक प्रबन्धकाव्य है। जिसमें विधवाओं की बुरी परिस्थिति और देव मंदिरों पर हुए अनाचारों आदि का वर्णन दिखाने के उद्देश्य से लिखा है। 

नाथूराम शर्मा "शंकर" ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, रूढ़ि और पाखंड का विरोध करने जैसी कथावस्तु को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया है। तथा इन सबके प्रति व्यंग्य विनोद का भाव मिलता है। 

 जिस तरह से भारतेंदु युग में अम्बिकादत्त व्यास समस्यापूर्ति रचनाओं के लिए मशहूर थे ठीक उसी प्रकार से द्विवेदी युग में नाथूराम शंकर भी समस्यापूर्ति रचनाओं के लिए मशहूर थे।

3. "सत्यनारायण कवितरत्न" ने ब्रज में रचनाएँ की है जोकि रीतिकालीन शैली पर न होकर भक्तिकालीन कृष्णभक्तों जैसी प्रतीत होती है।

इन्होंने मैकाले की रचना "होरेशस" का पद्यबद्ध अनुवाद किया है।

4. "दुलारेलाल भार्गव" जोकि बिहारी परंपरा के कवि माने जाते हैं इन्हें इनकी "दुलारे दोहावली" पर टीकमगढ़ राज्य की ओर से 2000 रुपये का "देव पुरुस्कार" मिला था।

आचार्य शुक्ल इनके बारे में कहते हैं कि " बिहारी की प्रतिभा जिस ढाँचे की थी उसी ढाँचे की दुलारेलाल की भी है, इसमें कोई संदेह नहीं"...।

5. " हिंदी साहित्य लोचन"  आपको यहाँ बताना चाह रहा है कि हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के भीतर यदि किसी कवि ने पशुओं की दारुण स्थिति को समझा तो उनमें "लोचनप्रसाद पांडेय" जी का नाम रखा जा सकता है। इन्होंने न केवल उन मूक -असहाय पशुओं के दर्द को समझा बल्कि उनसे सम्बन्धी एक मार्मिक कृति का भी सृजन कर दिया। 

 "मृगी दुखमोचन" इसी तरह की रचना है, जिसमें इन्होंने खड़ीबोली के सवैयों में एक मृगी की अत्यंत दारुण परिस्थिति का वर्णन सरस भाषा में किया है। जिससे पशुओं तक पहुँचने वाली इनकी व्यापक और सर्वभूत दयापूर्ण काव्यदृष्टि का पता चलता है।


(द्विवेदीयुगीन वीररस के कवि)


"हिंदी साहित्य लोचन" जैसाकि अपनी पूर्ववर्ती पोस्टों में भी यह साझा कर चुका है कि यह एक तथ्यात्मक-वर्णनात्मक साहित्यिक मंच है। जिसके अंतर्गत कुछ विषयों व बिंदुओं पर लेखक अपने विचार भी समय समय रखता है। इसी क्रम में हम यहाँ वीर रस सम्बन्धी कुछ वर्णन करने जा रहे हैं। 

यदि आधुनिककाल के अंतर्गत वीररस अथवा ओजगुण का स्वर्णकाल अगर किसी युग को कहा जा सकता है तो वह द्विवेदी युग ही था। इस युग के सबसे अग्रणी वीररस अथवा ओजगुण के कवि महाकवि "मैथिलीशरण गुप्त" जी ही थे। जिनके साहित्यिक कर्म के लिए इन्हें हिंदी का प्रथम राष्ट्रकवि घोषित किया गया। इनसे प्रभावित होकर और तत्कालीन उपनिवेशवादी परिस्थितियों को देखकर अन्य कवि भी स्वतः ही वीररस के ऐसे-ऐसे छंद बुनने लगे जिनसे स्वाधीनता की सोंधी महक आ रहा थी।

इन छंदों का एक ही उद्देश्य था। अतीत के उन महापुरुषों को याद करना जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना बलिदान दे दिया। उनकी गाथाओं को पुनः नए सिरे से रचकर वर्तमान भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाना। इसी क्रम में हम यहाँ कुछ द्विवेदीयुगीन वीररस के कवियों का वर्णन करने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के कथानकों को ओजगुण का केंद्र बनाया। इतिहास के ऐसे पात्रों व घटनाओं का चयन किया जिनकी गाथा सुन जनता में एक नई ऊर्जा का संचार हो सकता था और अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ वह उठ सकने की हिम्मत जुटा सकते थे। ऐसी गाथाएँ उन्हें एक आत्मबल देती थी।

6. द्विवेदीयुगीन कवि "वियोगी हरि" के "वीर सतसई" में भारत के अनेक वीरों की प्रशस्तियाँ लिखी गयी हैं जिस के लिए इन्हें प्रयाग के हिंदी साहित्य सम्मेलन में 1200 रुपये का पुरस्कार मिला था।

7. लोचनप्रसाद पांडेय ने चितौड़ के भीमसेन के अपूर्व स्वत्व तर्ज की कथा नंददास के रास पंचाध्यायी के ढंग पर की है। इन्हें "काव्य-विनोद" व "साहित्य-वाचस्पति" की उपाधि प्राप्त थी।

8. "गयाप्रसाद शुक्ल" भी द्विवेदीयुगीन वीर रस के अग्रणी कवियों में गणनीय हैं। यह श्रृंगारिक कविताएँ 'स्नेही' नाम से और राष्ट्रीय कविताएं 'त्रिशूल' नाम से लिखते थे। 

9.  वीररस की कविताओं का बोलबाला ऐसा चला कि उससे ब्रज जैसी मधुर भाषा वाले कवि भी अछूते न रहे। "लाला भगवानदीन" जो पहले ब्रज में लिखा करते थे, बाद में "लक्ष्मी" के सम्पादक होने के पश्चात खड़ीबोली में भी रचनाएँ करने लगे। खड़ीबोली में इन्होंने वीरों के चरित्र को लेकर जोशीली कविताएँ लिखी जैसे - "वीर क्षत्राणी, वीर बालक, वीर पंचरत्न"..।

10. "श्यामनारायण पांडेय" की सर्वश्रेष्ठ कृति "हल्दीघाटी का जौहर" नामक महाकाव्य है जिसमें 17 सर्गो का विभाजन दिया हुआ है। इसमें मुगलकालीन मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के वीरतापूर्ण और साहस से लबरेज़ रूप को बड़ी ही खूबसूरती के साथ दर्शाया है। इसका कथानक "महाराणा प्रताप" के नेतृत्व वाली सेना और मुगलों की तरफ से  आमेर के राजा "मान सिंह " के युद्ध पर आधारित है। इस कृति पर इन्हें देव पुरुस्कार मिला है।

वीर रस को लेकर पांडेजी की कलम यहीं ही नहीं रुकी। इसके आगे भी इन्होंने अपनी इस शैली को जारी रखा। आगे चलकर "त्रेता के दो वीर" नामक एक छोटा सा काव्य लिखा है जिसमें "लक्ष्मण व मेघनाद युद्ध" के कई प्रसंग लेकर दोनों वीरों का महत्व चित्रित किया गया है। यह रचना हरिगीतिका तथा संस्कृत के कई वर्णवृतों में रची गयी है।


● द्विवेदी युग पर कहे गए कथन:-

1. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार" यह साहित्य में पहला प्रयास था जब रीतिकालीन वृत्तियों का इतना विरोध हुआ और उसे जनाश्रय तक जोड़ा गया"..।

2.  रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार भारतेंदु युग में प्रतीक रूप में खड़ीबोली का प्रयोग किया जा रहा था , द्विवेदी युग में क्रमश पूरे कविता की भाषा बन जाती है।



● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


"हिंदी साहित्य लोचन" sahitya hindi lochan.blogspot.com पर आने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आप इसी तरह से "हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आते रहे और हिंदी साहित्य से सम्बंधित अन्य तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी यहाँ पाते रहें।


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