(काव्यशास्त्र)
हिंदी साहित्य लोचन
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर काव्यशास्त्र व महत्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय कथनों पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
(वामन व रीति सिद्धान्त)
● रीति का अर्थ, परिभाषा व स्वरूप :-
रीति शब्द मूल शब्द "री" में "कितन" धातु जुड़कर बना है। जिसका अर्थ होता है मार्ग, शैली, पद्धति इत्यादि। अर्थात किसी कार्य करने की शैली, कविता रचने की पद्धति या रचनात्मकता के लिए अपनाया गया मार्ग। क्योंकि किसी भी कार्य करने की एक विधि होती है जिसके तहत ही हम अपने कार्य को अंजाम तक पहुँचा पाते हैं। इसी को काव्यशास्त्र की भाषा में कविता रचने के लिए 'रीति' शब्द कहा जाता है।
• वामन से पूर्व रीति शब्द के लिए "मार्ग" शब्द का प्रयोग किया जाता था।
• रीति शब्द के स्थान पर अन्य नामों का प्रयोग :-
कुंतक ने रीति के स्थान पर "मार्ग" और आनंदवर्धन ने "संघटना" और मम्मट ने "वृति" शब्द का इस्तेमाल किया है।
● परिभाषा:- कोई भी कवि अपने व्यक्तित्व के आधार पर ही कविता करता है। मतलब की जिया तरह से रचनाकार का पालन-पोषण हुआ होगा, उसने समाज से, अपने आसपास के वातावरण से जो भी और जिस भी रूप में ग्रहण किया होगा उसकी बुनावट भी उसी रूप के अनुकूल हुई होगी। अर्थात उसका मन-मष्तिष्क उसी दिशा में कार्यरत होगा। तो इसी को आसान भाषा में हम रचनात्मकता से जोड़कर देखते हैं जिसकी निष्पत्ति रचनाकार के संस्कारो से होती है।
यदि रचनाकार कोमल भाव का होगा तो उसकी कविताओं के भाव भी कोमल ही होंगे और अगर उसके भाव कठोर होंगे तो कविता में भी इसी तरह के भावों की अभिव्यक्ति होगी। परन्तु साहित्य की दृष्टि में रीति सिद्धान कुछ अलग अर्थों में अपना स्वरूप रखता है।
आचार्यों का मत है कि 'साधारण शैली के स्थान पर विशिष्ट शैली से युक्त कविता की रचना करना ही रीति है।' अर्थात कुछ ऐसा जो कविता में नयापन ला दे। उसकी चमक-धमक को और गुना बढा दे। यदि कविता सीधेपन और अलंकार के अभाव में होगी तो उसका महत्व कम होता दिखेगा। इसलिए कविता में एक ताज़गी और विशेषपन रहना अनिवार्य है। इसी शैली को काव्यशास्त्र के अंतर्गत रीति कहा गया है।
● आचार्य वामन ने रीति सिद्धान्त की स्थापना 8वीं शती में करके इसे "काव्य की आत्मा" स्वीकारा (रीतिरात्मा काव्यस्य) और काव्य की परिभाषा देते हुए इसे "विशिष्ट पद रचना" कहा। अर्थात शब्दगुण और अर्थगुण के विशिष्ट प्रयोग से बने पद को काव्य कहते हैं।
● रीति को गुण सम्प्रदाय भी कहा जाता है। जिसके 2 भेद हैं:-
शब्द गुण 10
अर्थ गुण 10
● रीति के भेद:-
वामन के अनुसार "काव्यालंकार सूत्रवृति" में इन्होंने रीति की 3 शैलियाँ मानी है :-
(वैदर्भी, गौणी, पांचाली)
• कुंतक ने रीति को मार्ग का नाम देकर उसके 3 भेद किये हैं:-
1. सुकुमार मार्ग- रस , प्रसाद और माधुर्य गुण की कविता के लिए।
2. विचित्र मार्ग- अलंकार व ओजगुण की कविता के लिए।
3. मध्यम मार्ग- जहाँ सभी का समावेश हो जाता है।
• भोजराज ने 6 रीतियों का उल्लेख किया है :-
1वैदर्भी
2 गोणिया
3 पांचाली
4 लाटी
5 मागधी
6 अवन्ति
(आनंदवर्धन व ध्वनि सिद्धान्त)
● आचार्य "आनंदवर्धन" ने ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना 9वीं शती में करके अपने ग्रँथ "ध्वन्यालोक" में इसे काव्य की आत्मा के रूप में सर्वप्रथम विवेचित किया है। इस सिद्धान्त के माध्यम से आनंदवर्धन व्यंजना शब्द पर आधारित ध्वनि को एक विशिष्ट अर्थ में प्रयोग करना चाहते थे।
इन्होंने ध्वनि के 3 भेद बताते हुए उसे "वस्तु ध्वनि" "अलंकार ध्वनि" और "रस ध्वनि" में बांटा है।
● ध्वनि सिद्धान्त को आगे विकसित करने का कार्य "अभिनवगुप्त" द्वारा उसकी टीका "ध्वयनालोक लोचन" लिखकर किया गया है।
• भोजराज ने ध्वनि को "तातपर्य वृति" से जोड़कर दिखाया है।
• ध्वनि के शुद्ध भेदों की संख्या 51 बताई है जिसकी पुष्टि आचार्य विश्वनाथ के "साहित्य दर्पण" में भी की गई है।
● आधार व सहायक ग्रन्थ :-
1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।
2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
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