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Thursday, March 25, 2021

भक्तिकाल भाग : 13

   

कृष्ण काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि


                             (नंददास)

● श्रीकृष्ण जी की लीलाओं का जीवंत वर्णन करने और उन्हें जन जन तक पहुँचाने में वल्लभाचार्य का योगदान अविस्मरणीय है। इसे हिंदी साहित्य के अंतर्गत कोई भी इसे ओझल नहीं कर सकता। जिस तरह भक्ति आंदोलन के सूत्र को सर्वप्रथम शंकराचार्य आदि दक्षिण के दार्शनिकों, विद्वानों ने समस्त भारत तक प्रचारित करने में अपना विशिष्ट योगदान दिया था, ठीक उसी प्रकार से कृष्ण काव्य को भी यह गति वल्लभाचार्य ने प्रदान की थी। इन्हीं के सुपुत्र विठ्ठलनाथ हुए। वह भी कृष्ण लीला के अनन्य प्रवर्तकों में गिने जाते थे। इन्हीं के द्वारा स्थापित कृष्ण कवियों व भक्तों की एक मंडली थी जिसे हिंदी साहित्य के अंतर्गत "अष्टछाप" के नाम से जाना जाता है। इस मंडली में वल्लभाचार्य और विठ्ठलनाथ दोनों आचार्यों के ही चार-चार शिष्य थे। जिसमें सभी कृष्ण भक्ति व उनकी लीलाओं का गुणगान करने में फनकार कहे जाते थे।  इसी मंडली में जो सबसे छोटे कवि या भक्त गिने जाते हैं उन्हीं का नाम "नंददास" था, जिसका वर्णन यहाँ किया जा रहा है।

• नंददास सूर के समकालीन थे। कुछ विद्वानों ने इन्हें तुलसी के भाई होने का दावा भी किया है परंतु आचार्य शुक्लानुसार इस धारणा के पश्चात इसका खंडन किया गया और अंततः यह सिद्ध हो गया कि नन्ददास तुलसी के किसी भी रूप में भाई नहीं लगते थे। यह अप्रमाणिक हो चुका है।

वल्लभाचार्य के पौत्र "गोकुलनाथ" द्वारा रचित भक्तिकालीन कवियों का जीवन परिचयात्मक ग्रन्थ जिसे "252 वैष्णवो की वार्ता" के नाम से जाना जाता है, इसमें लिखा है कि "नंददास का कृष्णोपासक होना तुलसी को अच्छा नही लगा और उन्होंने उलहाना लिख के भेज दिया। सो एक दिन नंददास के मन में आयी कि जैसे तुलसी ने रामकथा लिखी वैसे ही हम भी लिखेंगे।"

• नंददास गोकुल में एक स्त्री पर मोहित हो गए थे। इस कारण वह सांसारिक मोहमाया में बंध गये थे और भक्ति परम्परा से तब तक उचित रूप से नहीं जुड़ पाए थे। कुछ ही दिन बाद विट्ठलनाथ से जब इनका सम्पर्क हुआ तब ये उस मोह से टूटे और अंततः कृष्ण भक्त बने। उसी समय से कृष्ण लीलाओं को अपनी भक्ति के पद में ढाल कर यह रचनाएँ करने लगे। तरह तरह के कवित्त, सवैये, दोहे आदि छंद गढ़ना इनकी वृति का अंग बन गया था।


● नन्ददास की कुछ महत्वपूर्ण रचनाएँ और उनका कथ्य :

1. "रासपंचाध्यायी" रोला छंद में लिखी है। 

2. "मानमंजरी" अमरकोश पर आधारित शब्दकोश।

3. "विरहमंजरी" कृष्ण के वियोग में ब्रज का वियोग।

4. "रूपमंजरी" कृष्ण व इंदुमती का प्रेमाख्यान।

5. "रस मंजरी नायिका भेद वर्णन।

6. "श्याम सगाई" राधाकृष्ण की सगाई।

7. "भँवरगीत" दर्शन,विवेक बुद्धि , तर्कज्ञान व कृष्ण का योग 


● बच्चन सिंह द्वारा नन्ददास पर कहे गए मुख्य कथन :

1. बच्चन सिंह के अनुसार "सूर के भ्रमरगीत में उद्धव-गोपी संवाद कम है जबकि नन्ददास के भ्रमरगीत में उद्धव-गोपी का शास्त्रार्थ हुआ है - कथोपकथन शैली में।"

2. बच्चन सिंह के अनुसार "सूर का भ्रमरगीत मुक्तक काव्य है तो नंददास में शास्त्र का अनुसरण है।"

3. बच्चन सिंह कहते हैं " सूर की गोपियाँ सरल-सहज हैं और नंददास की पण्डित।"


                            (मीरा)

● कृष्ण काव्य के अंतर्गत मीराबाई का नाम ठीक उसी आदर और महत्ता के साथ लिया जाता है जैसे दक्षिण में अंडाल नामक स्त्री का, सन्त साहित्य में सहजोबाई और सूफी साहित्य में राबिया का लिया जाता है।

मीराबाई का कृष्ण जी के प्रति प्रेम और समर्पण भाव एक कथा का आधार तत्व है। ऐसी किवदंती है कि मीराबाई जी ने बाल्यकाल में अपनी माता जी से एक प्रश्न किया था कि उनका पति कौन है या उनका प्रेम किसके लिए होना चाहिए आदि। कुछ ऐसा ही एक प्रश्न किया था जिसके उत्तर में उनकी माता जी ने कृष्ण जी की मूर्ति को ही उनके पति के रूप में बता दिया था। ततपश्चात मीरा तभी से कृष्ण जी के प्रति इतनी दीवानी हो गयी, उन पर इतनी मोहित हो गयी और उनके प्रेम में ऐसे खोई की जीवन भर वह उससे निकल नहीं पाई। इस प्रेम के कारण उन्हें अपने ही परिवार से कठिन से कठिन कष्ट झेलने पड़े, तमाम तरह के दर्द सहने पड़े। समाज ने भी उन्हें प्रताड़ित करने और उल्हाना देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

मीरा के पति की मृत्यु के बाद उनके परिवार के लोगों द्वारा जहरीले सर्प से डसवाने, जहर देकर मृत्यु के घाट उतारना आदि तरीके आजमाए गए।  

• मीराबाई ये मेड़तिया के रतनसिंह की पुत्री, और उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज की पत्नी थी।

घर से तरह तरह की यातना मिलने के कारण दुखी होकर इन्होंने तुलसी को लिखा था कि:-

"स्वस्ति श्री तुलसी कुल भुषन हरण गोसाई

बारहि बार प्रणाम करहु, अब हरहु समुदाई।

"मेरे माता पिता के सन हौ, हरिभक्तों सुखदाई

हमको कहाँ उचित करिबो, सो लिखिये समझाई।


जिसपर तुलसी कहते हैं :-

" जाके प्रिय न राम वैदेही

सो नर तजिय, कोटि बैरी सम ,जद्दपि परम् स्नेही।

अर्थात यदि अपना कोई प्रिय हो और वह दुख दे तो उसे त्याग देना चाहिए, अर्थात घर-बार छोड़कर चले जाओ और भगवान की भक्ति करो।

• मीरा की भक्ति "माधुर्य भाव" की है। इन पर सूफियों का भी प्रभाव माना गया है। उनकी प्रेम साधना "स्वकीया की पद्धति" पर आधारित है। इस सम्प्रदाय में भक्त अपने को पत्नी और ईश्वर को पति रूप में देखता है। सन्तमत से जुड़ी हुई इसकी भी अवधारणा है।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार मीरा का काव्य सूर द्वारा विस्तार में चित्रित गोपियों की विरहोंमुक्ता का " detail " या ब्यौरा है....।

● विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार "मीरा का काव्य मध्यकालीन नारी का जीवंत बिम्ब है"..।

                                 

                           (रसखान)

●कृष्ण काव्य परम्परा में मियाँ सैयद इब्राहिम रसखान का नाम भी बड़े आदर से लिया जाता है। ये दिल्ली के पठान सरदार थे। एक दिन इन्होंने किसी को कहते हुये सुना कि "भगवान से ऐसा प्रेम करना चाहिए कि जैसा रसखान का उस बनिये के लड़के के साथ है। उस उक्ति से मर्माहत होकर रसखान गोकुल चले गए और आचार्य विट्ठलनाथ से दीक्षा ली।

कहते हैं कि जिस स्त्री पर यह मोहित हुये थे वह बहुत ही मानवती थी और इनका अनादर किया करती थी। एक दिन यह (रसखान) श्रीमद्भागवत का फारसी तर्जुमा (सार अनुवाद) पढ़ रहे थे। उसमें गोपियों के अनन्य और अलौकिक प्रेम को पढ़ इन्हें ध्यान हुआ कि जब प्रेम ही करना है तो क्यों न कृष्ण जी के प्रति ही प्रेम रूपी मन लगाय जाए। बस बात सोची ही थी कि वृंदावन चले गए और कृष्ण भक्त बन गए।


इसी बात का उल्लेख रसखान अपनी " प्रेमवाटिका " में कहते हैं कि :-

" तोरि मानिनी तें, हियो फोरि मोहनी मान

प्रेमदेव की छबहि लखि, भय मियाँ रसखान।


● कृष्णभक्ति धारा का प्रवाह कहिये या भक्ति काव्य में चित्रित कृष्ण का मोहक व्यक्तित्व, जिसके कारण सैयद इब्राहिम जैसे मुसलमान रसखान हो गए। रसखान आदि की भक्ति पर रीझकर "भारतेंदु" लिखते हैं:- 

" इन मुसलमान हरिजन पर कोटिन हिन्दुन वारिये"....।


• रसखान ने कृष्ण जी के प्रति अपने प्रेम भाव और समर्पण भाव को इस कदर उकेरा और उसमें इतना गूढ़ मर्म व्यक्त किया, रस को आलोकित किया कि इनके पद एकदम मीठे मीठे से लगते थे। इतने मधुर पद सुनने की इच्छा सभी लोगों की रहती थी। जिस पर इनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि रसखान ने प्रेम के ऐसे सुंदर पद लिखे की जनसाधारण भी कहता था कि " कोई रसखान सुनाओ...।

• रसखान ब्रह्म को तभी मिलने की आशा बताते हैं जब वह वशीभूत हो जाए  :-  

"ब्रह्म में ढूँढयो पुरानन गानन,

विदरिचा सुनी,चौगुने चायन"..।

• रसखान ने कृष्ण का लीलागान गेयपदों में नहीं, सवैयों में किया है।

• बच्चन सिंह के अनुसार" रसखान पहले ऐसे कवि हैं जिन्होंने कवित्त और सवैयों में कृष्णभक्ति को दिखाया। ये किसी भी धार्मिक सम्प्रदाय में।दीक्षित नहीं हुए थे।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

Monday, March 15, 2021

भक्तिकाल भाग - 12

    

                         (कृष्णकाव्य)

● शास्त्रों के अनुसार विष्णु भगवान के अवतारों में से एक अवतार कृष्ण जी भी थे। जिनके  2 रूप प्रचलित हैं  : लोकरक्षक व लोकरंजक।

लोकरक्षक महाभारत और गीता के सम्बंध में कहा जाता है। साथ ही जब जब कृष्ण भगवान ने संसार को किसी भी मुसीबत से बचाया हो, दानवों से युद्ध किया हो, दुष्टों का नाश किया हो आदि। वहीं लोकरंजन का अर्थ कृष्ण जी की बाललीलाओं से जुड़ा है। उनके बाल्यकाल में मथुरा, वृंदावन में अपनी मैया के साथ, गाँव की गोपियों के साथ और अपने सहपाठियों के साथ की गयी नटखट पन्तियाँ, खेलकूद, माखन खाना और गोपियों के वस्त्र चोरी करके भाग जाना और फिर कृष्ण जी की शिकायत यशोदा माँ तक पहुँचना आदि प्रसंग कृष्ण जी के लोकरंजन रूप को वर्णित करते हैं।


● कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख :- 

कृष्ण के रूप सौन्दर्य का वर्णन और प्रचार देश के कई हिस्सों में हुआ। कुछ जगहों पर नगर की लड़कियाँ खुद को कृष्ण के मंदिर में दान कर देती थी और श्रीनाथ जी के साथ उनका विवाह कर दिया जाता था। दक्षिण की "आंडाल" नामक स्त्री इसी तरह की थी।

इसी संदर्भ में अंडाल कहती है कि :-"अब मैं पूर्ण यौवन को प्राप्त हो गई हूँ और कृष्ण के अतिरिक्त अब कोई भी मेरा स्वामी नही हो सकता".....।

• हिंदी साहित्य के अंतर्गत कृष्ण काव्य का सबसे श्रेष्ठ कवि या प्रस्तोता अगर किसी को कहा जा सकता है तो वह महान वात्सल्य रस के सम्राट "सूरदास" ही कहे जा सकते हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में कृष्णा के बालपन के मधुर प्रसंगों को वर्णित किया है। कृष्ण - दाऊ के बीच नोकझोक, मैया यशोदा के साथ नटखटपन, गोपियों के साथ खेलना कूदना और उन्हें तंग करना, चोरी छिपे माखन खाना और गोपियों की पानी की मटकियाँ फोड़ देना, अपने बालपन के सखाओ के साथ मटरगसती करना इत्यादि। सूरदास द्वारा कृष्ण जी के लीलारूप का वर्णन इनकी रचित "सूरसागर " में और उसके मुख्य भाग "भ्रमरगीत सार " में उल्लिखित है।

                                                      

                          (सूरदास)


● सूरदास के सम्बंध में एक घटना मुख्य प्रचलित है जोकि उनके नेत्रहीन होने से जुड़ी है। कोई उन्हें जन्म से ही नेत्रविहीन समझता है तो कोई उन्हें जन्म के पश्चात कुछ वर्षों बाद नेत्र खोने के मैटल को लेकर चलता है। 

इस सन्दर्भ में एक घटना देख सकते हैं । एक बार सूर कुँए में गिर गए थे तो 6 दिन तक वही पड़े रहे ,बाद में भगवान ने उन्हें दर्शन दिया और उनकी आँख लौट आयी। इसके बाद ईश्वर कहते हैं की "तू सब विद्याओ में गुणी होगा और शत्रुओं का नाश होगा"..।

तिस पर सूर कहते हैं कि "अब मैंने आपके दर्शन कर लिए हैं, अब और कुछ देखने की लालसा नही"..। तब भगवान ने उन्हें पहले जैसा ही बना दिया।

सूर "साहित्यलहरी" में भी कहते हैं :-

" प्रबल दछिन विप्रकुल तें सत्रु ह्वैहै नास...।

कृष्ण ने वरदान दिया था कि शत्रुओं का नाश होगा।


• सूरदास ने खुद को चन्द्रबरदाई के वंश का बताया है।

• "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार सूरदास की लोकप्रियता का कारण उनका  साहित्यिक- क्षेत्र में गृहस्थ जीवन से और परिवार से जुड़े रहना है....। शायद सूर कृष्ण के बालपन से ज्यादा प्रभावित थे , बजाय उनके वयस्क जीवन के। विशेषकर महाभारत के कृष्ण चरित्र से प्रभावित नहीं थे। क्योंकि शायद सूर को हिंसा का क्षेत्र प्रिय न रहा हो।

सूर कृष्ण को लोकरंजन रूप में ज्यादा पसन्द करते है बजाय लोकरक्षक के।

• "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार परिवार को सीमित रखने के कारण उन्होंने बाह्य जीवन के संघर्षों के चित्रण कम किया है, गृहस्थ जीवन की तन्मयता अधिक है। 

● सूरदास की मृत्यु पर विट्ठलनाथ ने कहा था :-

"पुष्टिमार्ग को जहाज जात है, जो कछू हो सो ले लियो"..। 

● "सूरसागर" में भागवत के दशम स्कंध का संक्षेप में वर्णन है - जिसके बारे में शुक्ल कहते हैं कि  :-"यह इतनी प्रगल्भ और काव्यपूर्ण है कि आगे के आने वाले कवियो की श्रृंगारिक और वात्सल्य उक्तियाँ जूठी सी जान पड़ती है"......।

●" नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा  "नंदुलारे जी" द्वारा सम्पादन किया हुआ सूरसागर ही अभी तक सबसे प्रमाणिक है और इसी से सब सहायता लेते हैं। जिसमे 5000 पद संकलित हैं। 12 स्कंध है।

•  सूरदास की महत्वपूर्ण रचनाएँ :-               

सूरसारावली- 1544

सूरसागर    - 1546 इसमें 4936 पद 12 स्कंध हैं

साहित्यलहरी - 1550 नायिकाभेद ग्रँथ 

● शुक्ल, मिश्रबन्धु, नंदुलारे वाजपेयी के अनुसार साहित्य लहरी और सूरसारावली" प्रामाणिक और बच्चन सिंह के अनुसार अप्रमाणिक है।

                                                              

● सूरदास पर कहे गए कथन:-

1.  शुक्लानुसार "जिस प्रकार से रामभक्तो में तुलसी का स्थान सबसे ऊपर है उसी तरह से सूर का स्थान भी कृष्ण भक्तो में सबसे ऊपर है"..।

2. शुक्लानुसार "श्रृंगार और वात्सल्य के क्षेत्र में जहाँ तक इनकी दृष्टि पहुची है वहाँ तक किसी और कि नही"...।

3. शुक्लानुसार "कृष्णचरित के गान में गीतकाव्य की जो धारा पूरब में जेयदेव और विद्यापति ने बहाई थी उसी का अवलम्ब ब्रज में सूर ने किया है".।

4. शुक्लानुसार "सूर का सबसे मर्मस्पर्शी और वाग्वेदग्ध्यपूर्ण अंश "भ्रमरगीत" है। गोपियों की वचन वक्रता अत्यंत मनोहारिणी है"..।

5. शुक्लानुसार "सूर के श्रृंगारी पदों की बहुत कुछ रचना "विद्यापति" के आधार पर की गई है व जगह जगह दृष्टिकूट वाले पद मिलते हैं। यह भी विद्यापति का अनुकरण है..। 

6. शुक्लानुसार सूरदास पर जयदेव और चंडीदास का प्रभाव भी है।

7. हजारीप्रसाद के अनुसार ये "ब्रज के प्रथम कवि" थे।                                                          

8 . बच्चन सिंह के अनुसार सूर का काव्य किसी चली आती हुई गीत परम्परा का चाहे मौखिक ही रही हो, पूर्ण विकास से प्रतीत होता है"..।

9. "बच्चन सिंह" के अनुसार सूरसागर में सबसे अधिक पद बाललीला के हैं। इस पर वल्लभ मत का प्रभाव है। इसी का एक अंश "भ्रमरगीत सागर" है।  

10.  बच्चन सिंह के अनुसार " सूर का भ्रमरगीत वियोग श्रृंगार का सर्वोच्च शिखर है। विरह की इतनी वैविध्यपूर्ण मानसिक दशाएँ शायद कहीं न मिले। पूरा भ्रमरगीत वक्रोक्ति से भरा है"..।

11. बच्चन सिंह के अनुसार "उद्धव का संदेश जले पर नमक छिड़कने का काम करता है"..।

12.  बच्चन सिंह के अनुसार " भ्रमरगीत सार के बहाने निर्गुणमत की धज्जियां उड़ाने में सूर ने कोई कमी नहीं की"...।

13. बच्चन सिंह के अनुसार " भ्रमरगीत में गोपियों के विरह का कोलाहल और व्यंग बाण है तो दूसरी ओर राधा के मौत की तरह मौन का ठंडा सन्नाटा"..।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

Friday, March 12, 2021

भक्तिकाल भाग - 11

 

रामकाव्य के अन्य कवि 

   

                                 (रहीम)


हिंदी साहित्य में नीतिकाव्य की श्रेणी में गिने जाने वाले श्रेष्ठ कवियों में "अब्दुर्रहीम खानेखाना" का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। ये दानी और परोकारी ऐसे थे कि अपने समय के कर्ण माने जाते थे। 

आचार्य शुक्लानुसार "जिस मनुष्य में करोड़ो रूपये दान कर दिए और जिसके पास से कोई विमुख नही गया उसका पीछा याचको से कैसे छूट सकता था। इन्हें दुख तब होता था जब कोई मदद के लिए आता और यह कर न पाते थे। इस पर कवि दोहे से अपने अनुभव को  साझा करते हैं :-  

"तबही लों जीवो भला, देबो होय न धीम

जग में रहिबो कुचित गती, उचित न होय रहीम।


विपद पड़ने पर यदि कोई इनका साथ नही देता था और कोई याचक इनके द्वारे आ खड़ा होता था तब यह उन्हें ये दोहा लिख के रीवा नरेश के पास भेज देते थे:-

"चित्रकूट में रमे रहे, रहिमन अवध नरेस

जापर विपदा परती है, सो आवत यहि देस।

• "बच्चन सिंह" के अनुसार रहीम अपने अंतिम दिनों में दरिद्रता के शिकार हो गए थे और इनकी भी कथा निराला के समान "दुख ही जीवन की कथा रही" सी हो गयी थी।

• शुक्लानुसार "तुलसी के वचनो के समान रहीम के वचन भी हिंदी भाषी भूभाग में सर्वसाधारण के मुँह पर रहते हैं"..। 

• शुक्लानुसार "रहीम का ह्रदय द्रवीभूत होने के लिए कल्पना की उड़ान की उपेक्षा नहीं रखता। वह संसार के सच्चे और प्रत्यक्ष व्यवहारों में ही द्रवीभूत होने के लिए पर्याप्त स्वरूप में है"..।


● उनके काव्य में 3 तरह की काव्यभाषा का प्रयोग मिलता है...  (हिंदी, संस्कृत, फारसी) 

रहीम के दोहे "सूक्तिशैली" में लिखे गए हैं। अर्थात सीधेपन में। 


● उनके कृतित्व का प्रधान अंश -


दोहे          (ब्रज में) 

बरवै         (अवधी में)   

मदनाष्टक  (खड़ीबोली में)


● रहीम पर कहे गए कथन:-

1.  शुक्लानुसार "जीवन की परिस्थितियों के मार्मिक रूप को ग्रहण करने की जिसमें सच्ची परख होगी वही जनता का प्रतिनिधि कवि बनेगा...। आगे कहते हैं कि "उनमें भारतीय प्रेमजीवन की सच्ची झलक है"..।

2.  शुक्लानुसार " रहीम के दोहे वृन्द और गिरधर के पद्यों के समान कोरे नहीं हैं"..।                                                      

3.  शुक्लानुसार "रहीम काव्य हिंदी की खिचड़ी है और "खेट कौतुकम" फ़ारसी की खिचड़ी"....।

4. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार " हिन्दू-मुस्लिम के समरस होने के जातीय कवि होने का गौरव प्राप्त है उन्हें......." ।        

5.  बच्चन सिंह के अनुसार "रहीम न तो जायसी की तरह सूफी, न रसखान की तरह वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित हुए, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति से गहरा अनुराग था"..।                                                     

● रामकाव्य के अन्य कवि:- 

1. "कृष्णदास पयहारी" - रामानंद के शिष्यों में अनंतादास हुए जिनके शिष्य कृष्णदास पयहारी और उनके शिष्य अग्रदास थे। इनके शिष्य नाभादास हुए। 

कृष्णदास पयहारी ने रामभक्ति शाखा में "तपसी शाखा" की स्थापना कर राजस्थान में नाथपंथियों को हटाकर वहाँ गद्दी स्थापित की जिसे "उत्तर तोताद्री" भी कहा जाता है।

2. " अग्रदास"- ये रामभक्ति शाखा में "रसिक सम्प्रदाय" के प्रवर्तक हैं। यह भी रामानंद की शिष्य परम्परा के कृष्णदास पयहारी के शिष्य थे।

इनकी गद्दी जयपुर के पास रैवात में है। इसका एक अन्य नाम "अग्रअली" सम्प्रदाय भी है।

शुक्लानुसार इनकी रामध्यानमंजरी ही ध्यानमंजरी है। 

3." सेनापति भी केशव की ही भांति भक्तिकाल और रीतिकाल की संधि रेखा पर स्थित है। केशव की भांति सेनापति भी "रामभक्त कवि" है।

4. नाभादास  :- इनका भक्तमाल 1585 में और उसकी टीका प्रियादास 1712 ने लिखी थी। इस ग्रन्थ में 200 भक्तो का वर्णन है 316 छपय्यो में वर्णित है। इस ग्रँथ का उद्देश्य भक्ति का प्रचार करना था परन्तु कालांतर में जाकर यह हिंदी साहित्य इतिहासकारो के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रँथ बन गया।

ये अग्रदास के शिष्य थे। नाभादास को कुछ लोग डोम या क्षत्रिय भी कहते हैं।

(शिष्य परम्परा) रामानंद - अनंतादास- कृष्णदास- अग्रदास- नाभादास"

                                                                                      5. जीवाराम - यह रामभक्तिधारा की एक शाखा है। "त्तसुखी सम्प्रदाय" में ईश्वर और नायिका के बीच सखी भाव होता है। जिसकी स्थापना मानस के प्रसिद्ध टीकाकार जीवाराम ने की थी।

6. रामचरणदास - "स्वसुखी सम्प्रदाय" इसमें ईश्वर और नायिका के बीच पत्नी भाव होता है। जिसकी स्थापना रामचरणदास में की थी।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

Tuesday, March 9, 2021

भक्तिकाल भाग :- 10


                     ( तुलसीदास )


● वैष्णव धर्म :-  रामभक्ति शाखा या कृष्ण भक्ति शाखा को समझने से पूर्व हमें वैष्णव धर्म को समझना होगा क्योंकि राम और कृष्ण विष्णु के ही 2 भिन्न भिन्न युग में पैदा होने वाले अवतार हैं। वैष्णव धर्म में ही विष्णु के इन दोनों रूपों का विशद वर्णन किया गया है।

भागवत धर्म का उदय ईसा से 4-5 शती पूर्व हो चुका था। वैदिक विष्णु "भागवत धर्म" में स्वीकृत विष्णु ईसा से 5 हजार वर्ष पूर्व के हैं। भागवत धर्म का पुनर्गठन ईसा की दूसरी शती में हुआ। विष्णु पूजा को अंग्रेज विद्वान "वार्थ" भी प्रचीन मानता है।

पुराणों में वैष्णव भक्ति के अवतारी रूप राम व कृष्ण के चरित्र व लीलाओं का विस्तृत उपलब्ध है जिसने परवर्ती काव्य के लिए आधारभूमि तैयार की ।


                         (रामभक्ति शाखा)


● आलवार भक्तों में "शठकोप" को रामभक्ति का प्रथम कवि माना है। इनकी पुस्तक "सहस्त्रगीति" में राम की उपासना है।

                        

                            (तुलसी)


● तुलसीदास जी के सम्पूर्ण चरित को समझने के लिए 3 पुस्तकों से मदद मिल सकती है जोकि तुलसीदास की रचनाओं के अतिरिक्त भी ऐसी पुस्तकें हैं जिसके माध्यम से हम तुलसीदास जी को उचित रूप से समझ सकते हैं :-

1. मूल गोंसाई चरित - बेनी माधवदास।

2. तुलसी चरित - रघुवरदास।

3. "मर्यादा" पत्रिका।


तुलसीदास जी रामानुजाचार्य के "श्रीसम्प्रदाय" और "विशिष्टताद्वैतवाद" से प्रभावित थे।

"शुक्लानुसार" तुलसी रामोपासक वैष्णव थे, पर स्मार्त वैष्णव। उनकी भक्ति "दास्य भाव" की थी।

"शुक्लानुसार" तुलसीदास जी में योगमार्ग और भक्तिमार्ग का पार्थक्य स्पष्ट शब्दों में है। वह ईश्वर को घट के भीतर नहीं बाहर (जगत) में देखते हैं।

तुलसीदास उपासना के दोनों रूपों सगुण और निर्गुण को मानते है, पर वह ईश्वर को किसी रहस्य- छिपाव के लिए अनिवार्य नही मानते।  तभी वह कहते हैं:-

"अन्तरजमहिहु तें बड़ बाहिरजामी है राम जो नाम लिखे"...।

● "शुक्लानुसार" जो भक्तिमार्ग श्रद्धा के अवयव को छोड़कर केवल प्रेम को ही लेकर चलेगा, उसका धर्म से लगाव न रह जाएगा"..।

●"बच्चन सिंह" का मत है कि तुलसीदास का वर्णाश्रम सम्बन्धी मत विडम्बना से घिरा हुआ है क्योंकि जहाँ वह एक ओर वर्णाश्रम की स्थापना करना चाहते हैं,  वहीं दूसरी ओर अपनी दुर्गति के कारण जांति पांति का विरोध करते हुए कहते हैं " धूत कहौ अवधूत कहौ", राजपूत कहौ जुलाहा कहौ..।

जिस वर्णाश्रम की वकालत तुलसी ने उम्र भर की उसी का वह खुद शिकार होने लगे थे।

●"बच्चन सिंह" के अनुसार "मानस का 7वां सोपान उत्तरकाण्ड है जहाँ पर तुलसी की मूल विचारधारा दिखाई पड़ती है"..। इस मानस के भी 2 पक्ष हैं। 

1. वैचारिक पक्ष - वर्णाश्रम का समर्थन

2. हृदयलोक - भक्तिमार्ग का समर्थन और वर्णाश्रम का विरोध 


● रामचरितमानस के बारे में तथ्य :- 

रामचरितमानस की रचना 1574 में हुई थी। मानस को तुलसी ने सबसे पहले "रसखान" को सुनाया था और इसकी प्रथम टीका "रामचरणदास" ने लिखी थी। मानस को रचने में 2 वर्ष और 7 महीने लगे जिसका किष्किंधाकांड काशी में रचा गया।

 अयोध्याकांड को मानस का हृदयस्थल कहा जाता है। इस पर शुक्लजी कहते हैं कि " चित्रकूट की सभा एक आध्यात्मिक घटना है"..।

मानस में रचनाकौशल, प्रबन्धपटुता, सहृदयता सब गुणों का समाहार है।

"बच्चन सिंह" के अनुसार तुलसी के मानस पर आध्यत्म रामायण (माधवदास) का प्रभाव है।

मानस की रचना स्वान्तः सुखाए, लोकमंगल के लिए की।

"बच्चन सिंह" के अनुसार "मानस की नींव ग्रास्थिक जीवन पर रखी गयी है"..। आगे कहते हैं कि " चित्रकूट सभा मानस का गंभीरतम प्रकरण है"..।

 "रामविलास शर्मा" के अनुसार रामचरितमानस में तुलसी की करुणा समाजोंमुख है, विनयपत्रिका में आत्मोन्मुख"..।

तुलसी ने मानस, विनयपत्रिका व कवितावाली में कलिकाल का वर्णन किया है। "कलिकाल का अर्थ"  16-17वी शती में फैली महामारी व अकाल से लिया है।

बच्चन सिंह के अनुसार मानस का कलिकाल सैद्धांतिक वर्णन है किंतु परवर्ती ग्रँथों में सारा देश ही कलिकाल के जबड़े में फँसा हुआ दिखाई देता है। इसका प्रतिनिधित्व काशी करता है"..।


● तुलसीदास की अन्य रचनाएँ :- 

तुलसी की प्रथम रचना "वैराग्य संदीपनी" है। कुछ लोगों ने रामलला नहछू को भी माना है। अंतिम रचना "कवितावाली" या उसका परिशिष्ट "हनुमानबहुक"।

बच्चन सिंघ के अनुसार "हनुमान बाहुक" में मृत्यु पीड़ा की चीख दिखती है।

"रामाज्ञा प्रश्न" एक ज्योतिष ग्रँथ है। अपने मित्र गंगाराम ज्योतिषी के कहने पर काशी गंगा घाट पर की थी।

"गीतावली" की रचना तुलसी ने सूर के कहने पर की थी । सूर की गोपियाँ जिस तरह से हिंडोला खेलती हैं, वही करते राम भी दिखाए गई हैं। बस इतना फर्क है कि सीता की सखियों और नगर की नारियों का राम के प्रति उपासना भाव की प्रकट होता है।

"बरवै रामायण" तुलसीदास ने अपने मित्र रहीम के कहने पर रची थी।

"विनयपत्रिका" तुलसी की सबसे उत्तम गीतिकाव्य है।



● तुलसी की भाषा में पड़ने वाले प्रभाव :-

1. वीरगाथाकाल की छपय्य पद्धति।

2. विद्यापति और सूर की गीत पद्धति 

3. गंग आदि भाट की कवित्त-सवैया पद्धति।

4. कबीर की नीति सम्बन्धी पद्धति।

5. ईश्वरदास की चौपाई पद्धति 


"शुक्लानुसार" तुलसी का ब्रज और अवधी पर समान अधिकार था। वह कहते हैं " तुलसी ने हिंदी की सब प्रकार की  काव्य शैली के ऊपर अपना ऊँचा स्थान प्रतिष्ठित किया है"..।

"रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार "तुलसी भाखा में काव्यरचना करके लोक में प्रसिद्ध होते हैं और संस्कृत में करके पंडितो में"...।

अर्थात तुलसी संस्कृत में 'सनातम धर्म की शास्त्रीय परंपरा के प्रति' निष्ठावान हैं, और देसीभाषा में 'लोक के प्रति' निष्ठावान दिखाई देते हैं।


● तुलसी के सम्बंध में कहे गए कथन :

1.  नाभादास - कलिकाल का सबसे बड़ा कवि

2.  गोल्डस्मिथ- मुगलकाल का सबसे महान व्यक्ति

3.  ग्रियर्सन- बुद्धदेव के बाद सबसे बड़ा लोकनायक

4.  रामविलास शर्मा - जातीय कवि

5.  अमृतलाल नागर- मानस का हंस

6.  "बच्चन सिंह" के अनुसार "कबीर का भक्ति आंदोलन अगर विद्रोहमूलक है तो तुलसी का प्रतिरोधात्मक "...। आगे कहते हैं " उनकी मूल विचारधारा वर्णाश्रम धर्म की पोषिका है जो इस देश की सामंती व्यवस्था का मूलाधार है"..।

7.  शुक्लानुसार "तुलसी की भक्ति धर्म और ज्ञान दोनों की रसानुभूति कराती है"..। वह कवि और उपदेशक दोनों रुप में आते हैं।

8.  शुक्लानुसार "गोस्वामी जी की प्रतिभा का प्रखर प्रकाश 150 वर्षो तक ऐसा छाया रहा के रामभक्ति का कोई भी कवि उनके आगे टिक न सका".....।

9.  शुक्लानुसार " भारतीय जनता अगर प्रतिनिधि कवि किसी को कह सकते हैं तो इन्ही महानुभाव को"....।

10.  हजारीप्रसाद के अनुसार "लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो। उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चेश्टा है"....।

11. रामस्वरूपचतुर्वेदी के अनुसार" कबीर ऊपर से अक्खड़ परन्तु अंदर से भोले हैं, परन्तु तुलसी ऊपर से विनयी और अंदर से जटिल और व्यवहार-कुशल है".....।              

12.  रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "तुलसी की प्रतिभा इसी मेँ है कि उन्होंने भक्त और रचनाकार की भूमिका का सफल निर्वाह किया है......।  


● मानस के चारों वक्ताओं का वर्णन :-

काकभुशुंङी - गरुड़ संवाद (उपासना घाट)

तुलसी - सन्त संवाद (प्रप्तिघाट)

शिव पार्वती संवाद (प्रथम वक्ता) (ज्ञानघाट/राजघाट)

याज्ञवल्क्य भारद्वाज (पंचायती घाट)


● तुलसी को अलंकार योजना की संज्ञा :-

शुक्ल - अनुप्रास का बादशाह

उदयभानू सिंह - उत्प्रेक्षा का बादशाह  

भगवानदीन व बच्चन सिंह - रूपकों का बादशाह


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

Sunday, March 7, 2021

भक्तिकाल भाग : 9

 

सूफीकाव्य पर अन्य जानकारी


1. सूफ़ीकाव्य के अंतर्गत  आने वाली रचना "सत्यवती कथा" जिसके रचनाकार ईश्वरदास हैं, उन्हें शुक्ल जी ने सूफ़ीकाव्य में नहीं रखा है।

2. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार पदमावती के प्रति रत्नसेन का प्रेम "साधनात्मक" है और नागमती का प्रेम रत्नसेन के प्रति "ग्रास्थिक"।

3.  पद्मावत की हस्तलिखित प्रत्तियां ज़्यादातर फारसी में लिखी है।

4.  "गौरीशंकर ओझा" ने पद्मावती की कथा को कल्पना प्रसूत माना है।

5.  "विजयदेवनारायण साही" ने जायसी को शुद्ध सूफीकवि माना है।

6. गोरा-बादल की वीरतापूर्ण कथा पद्मावत का एक अन्य मुख्य प्रसंग है।

7.  बच्चन सिंह के अनुसार "कासिमशाह" की रचना घटिया और जायसी का अनुकरण है।

8.  सूफ़ीकाव्य में 5 चौपाई के बाद दोहा रखने पर "कडवक" शैली बनती है जिसे ज्यादात्तर सूफी कवियों ने अपनाया है। इसमें मृगावती, मधुमालती, इंद्रावती, सत्यवती कथा, चंदायन, माधवानल कामकंदला आदि आते हैं।

9.  चौपाई के बाद दोहा रखकर "कडवक शैली" पद्मावत और चित्रावली में अपनाई है।

10.  शुक्ल जी ने सूफ़ीकाव्य परम्परा में "इंद्रावती" को अंतिम कथा माना है जोकि समस्त सूफ़ीकाव्य परम्परा में एकलौती अखंडित काव्य है।

11. भक्तों में आंडाल, संतो में सहजोबाई और सूफियो में राबिया नामक महिला कवि रही है।

12. शुक्ल जी ने सूफी काव्य को साहित्य कोटि में रखा है।


● पद्मावत के प्रतीक चिन्ह :-

चित्तौड़ -        शरीर का

रत्नसेन -        मन का

पद्मावती -       बुद्धि का

नागमती -       संसार

राघवचेतन -    शैतान का

अलाउद्दीन -    माया का

तोता -            गुरु का

सिंघलदीप -    हृदय का


● प्रथम सूफी रचना विद्वानों के अनुसार  :-

हंसावली            नगेन्द्र और गनपतिचन्द्र गुप्त

चंदायन              रामकुमार वर्मा

मृगावती             शुक्ल

सत्यवती कथा    हजारीप्रसाद


● सूफ़ीकाव्य नायक नायिका :-

मधुमालती - मनोहर व मधुमालती और  ताराचंद व प्रेमा

पदमावत -  रत्नसेन, पद्मावत व नागमती

सत्यवती कथा - ऋतुवर्ण व सत्यवती

चित्रावली - सुजानकुमार व चित्रावली और कँवलावती

मृगावती - राजकुमार व मृगावती और रुक्मिणी

ज्ञानदीप - ज्ञानदीप व देवयानी

इंद्रावती - राजकुमार व इंद्रावती

हंसाजवाहिर - हंस व जवाहिर

● ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शब्द पर विवाद :-

"बच्चन सिंह" शुक्ल जी द्वारा भक्तिकाल के दिए गए नामों पर विवाद खड़ा करते हैं और कहते हैं कि "क्या ज्ञानाश्रयी कवियों में प्रेम नहीं ? प्रेममार्गी कहने से सूफियो असूफियो में भेद नहीं दिखता ? इस वर्गीकरण के स्थान पर संतकाव्य और सूफ़ीकाव्य कहना ज़्यादा तर्कसंगत है"....।   


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

Friday, March 5, 2021

भक्तिकाल भाग : 8


                        सूफ़ीकाव्य


● अन्य सूफ़ी प्रेमकाव्य :-


1. हंसावली :- प्रस्तुत रचना सूफी कवि "असायत" की मानी गई है जोकि 1370 ई. में आई थी। इस रचना का स्त्रोत "विक्रम बैताल" की कथा है। इसमें पाटन की राजकुमारी हंसावली की कहानी है।

2. चंदायन :- इसकी रचना 1379 ई.में मुल्ला दाऊद ने की थी। रामकुमार वर्मा इसे "हिंदी का प्रथम सूफ़ीकाव्य" मानते हैं। डॉ माताप्रसाद गुप्त ने इस ग्रँथ को "लोरकथा" या "लोरकहा" कहा है। परमेश्वरी लाल ने "चंदायन" नाम से इसका संपादन किया था।

इस ग्रँथ में 5 अर्धलियो या चौपाई के बाद दोहा रखकर "कडवक" की शैली बनाई है। इसका नायक "लोर" और नायिका "चंदा" है।  यह अवधी भाषा का प्रथम उपलब्ध ग्रँथ माना जाता है। इसमें भारतीय काव्यपरंपरा और फ़ारसी मसनवी शैली का प्रयोग किया है।

3. सत्यवती कथा :-  इसकी रचना ईश्वरदास ने 1501 ई. में की थी। इसमें "सत्यवती" और "ऋतुवर्ण" की कथा चलती है जिसमें नायिका नायक को शाप दे देती है, जिसके कारण वो कोढ़ी हो जाता है । ततपश्चात कुछ समय बाद नायिका को नायक से प्रेम हो जाता है और वो उसकी सेवा तनमन से करने लगती है। इसके बाद सत्यवती ऋतुवर्ण के सुंदर शरीर के लिए देवताओं से याचना करती है जिसमें वो सफल होती है और दोनों साथ में रहना शुरू कर देते हैं।

इस ग्रँथ में भी 5-5 चौपाई के बाद दोहा रखकर "कडवक" की शैली अपनायी है। इसमें 58 दोहों पर कथा का समापन है।

• शुक्ल के अनुसार अवधी की सबसे पुरानी रचना ईश्वरदास की " सत्यवती कथा" है।   

4. मृगावती :- कुतुबन की यह रचना 1503 ई. में आई थी। जिसमें एक नायक और दो नायिकाओ की रचना करके रचनाकार ने विशेष प्रकार की रचना सूफ़ीकाव्य में प्रदान की है। कुतुबन "शेख बुरहान" के शिष्य थे और बादशाह जौनपुर के आश्रित कवि।

• शुक्ल जी इसे "प्रथम सूफ़ीकाव्य" मानते हैं।

मुख्य नायक "रूपमुरारी" और नायिका "मृगावती" है व उपनायिका रुक्मिणी है ।

• इस कथा की नायिका उड़ने की कला जानती है।

5. "मधुमालती:- इसकी रचना मंझन ने 1545ई. में की थी। इसमें नायक-नायिका के अतिरिक्त उपनायक और उपनायिका का भी ज़िक्र किया गया है। इसका मुख्य नायक "मनोहर" और नयिका "मधुमालती" है। जिसमें करनेस नगर के राजा सूरजभान के पुत्र मनोहर को सोते हुए रातोंरात अप्सराएं मधुमालती के चित्रसारी में रख आती है और दोनों के साक्षात्कार होते ही दोनों एक दूसरे पर मोहित हो जाते हैं। और बाद में दोनों का विवाह हो जाता है।

उपनायक "ताराचंद" और नायिका "प्रेमा" है।

यह अवधी भाषा में लिखा हुआ काव्य है जोकि 5 अर्धलियो के बाद दोहा रखकर "कडवक" बनाया गया है।


• सूफ़ीकाव्य के अंतर्गत पहली बार किसी काव्य में "बहुपत्नीवाद" का अभाव रहा है। 

6. चित्रावली :- इसकी रचना 1613 ई. में उसमान ने की थी। ये गाजीपुर के रहने वाले थे और शाह "निजामुद्दीन चिश्ती" की शिष्य परम्परा में "हाजीबाबा" के शिष्य थे। अपनी रचना के शुरुआत में फ़ारसी मसनवी शैली का प्रयोग किया है।

• शुक्लानुसार चित्रावली में कवि में पूरी तरह से "पद्मावत का अनुसरण" किया है।


कथा में नेपाल के राजा धरणीधर के पुत्र "सुजानकुमार",  "चित्रावली" का चित्र देखकर  मोहित हो जाता है और नायिका भी नायक को देखकर उस पर मोहित हो जाती है। कथा के अगले चरणों मे नायक अंधा हो जाता है और एक वनमानुष के अंजन देने से नायक की आँखे वापस आ जाती है। उसके पश्चात नायक-नायिका विवाह कर लेते है।

कुछ दिनों बाद सारंगढ़ की कँवलावती भी सुजानकुमारा से प्रेम करने के पश्चात उससे विवाह कर लेती है अंततः दोनों रानियो के साथ नायक बहुत दिनों तक राज्य करता है।

• उसमान ने भी जायसी की तरह 7-7 चौपाई पर दोहा रखकर "कडवक" अपनाया है।

7. रसरत्न :-  इसकी रचना "पूहकर" नामक कवि ने की थी जोकि अकबर के दरबारी "दुर्गावास" के प्रपौत्र थे।

नायक सोम और नायिका रम्भा के प्रेम का चित्रण है।

8. ज्ञानदीप :- 1619 ई.में आई यह रचना "शेखनबी" की मानी जाती है। जिसमें राजा ज्ञानदीप और रानी देवयानी की कथा कही गई है।  शेखनबी जहँगीर के समय थे।

 इसमें नायक की खोज के लिए स्वयंवर होता था।

• शेखनबी ने मुस्लिम होते हुए भी वैदिक मार्ग की प्रशंसा की थी। 

9. इंद्रावती :- इसकी रचना नूर मुहम्मद ने 1744 ई. में की थी। जिसमें कालिंजर के राजा "राजकुंवर" और आजमपुर की रानी "इंद्रावती" की कहानी है। इसकी रचना भी 5-5 चौपाई पर 1 दोहा रखकर "कडवक" की रचना की है।

• अपनी इस रचना के लिए उन्हें कई बार ये तक सुनने को मिलता था की "तुम मुसलमान होकर भी हिंदी की रचना क्यों करते हो?....।

इनकी एक अन्य रचना "अनुराग बासुरी" है जोकि 1764 ई.में आई थी। यह एक तरह का फारसी भाषा मे लिखा गया ग्रँथ है। इसमें शरीर, जीवात्मा और मनोवृतियों को लेकर अधिक पांडित्यपूर्ण रखने की कोशिश की है।

10 . हंसाजवाहिर :-  यह सूफीकवि "कासिमशाह" की रचना है, जिसमें राजा हंस और रानी जवाहिर की कथा कही है। इसमें भी जायसी का अनुसरण किया है।

11. "कथारूपमंजरी" :- इसकी रचना "जानकवि" ने की है। 

• डॉ नगेन्द्र के अनुसार यह "प्रथम रचना" है जिसे हिंदी में फ़ारसी के "लैला-मजनू" की रचना है।

12.  पूरे सूफी आख्यानों में केवल एक हिन्दू मिलता है जिसने प्रेमाख्यान काव्य लिखा । "सूरदास" नामक पंजाबी कवि ने "नल दमयंती" की रचना की थी।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

Monday, March 1, 2021

भक्तिकाल भाग - 7

 

                         (जायसी)


भक्तिकाल में समस्त  सूफीकवियों में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि "जायसी" ही हुए हैं। इनकी प्रसिद्धि का कारण इनकी अक्षय-कीर्ति "पद्मावत" रचना है। 

जायसी का जन्म 1492 ई. अवध प्रांत के "जायस" में हुआ था और मृत्यु अमेठी में। अमेठी के राज-दरबार में इनका बहुत मान-सम्मान था और जीवन के अंतिम दिनों में यह अमेठी के ही जंगल में रहने लगे गए थे। इनके गुरु का नाम "शेख मोहिंदी" था जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी थी परंतु "सैयद अशरफ" ने इनको (जायसी) मार्ग दिखाया था। ये सिकन्दर लोदी से लेकर बाबर, शेरशाह सूरी और जहाँगीर तक के समकालीन थे।

ये शक्ल से कुरूप थे जिस पर एक बार शेरशाह सूरी हंस दिए थे जिस पर जायसी ने कहा " मोहिका हँसेसि कि हँसेसि कोरहिं"...। इस पर शेरशाह का मोह उतर गया था। 

"बच्चन सिंह" जायसी के इस कथन पर कहते हैं कि" ऐसा उत्तर वो ही दे सकता है जो शरीर से तो कुरूप हो परंतु गुणों से भरा हो"...।

ये एक आँख से काने भी थे। इस पर विजयदेवनारायण साही "जायसी" की इस पंक्ति का यह अर्थ कहते हैं" :-

सुख भा सोच एक दुख मानो

ओहि बिनु जिवन मरन के जानो"....।

अर्थात जायसी की आँखे किसी से लड़ गयी थी। आँखे लड़े बिना कोई बड़ा तो क्या छोटा भी कवि नहीं बन सकता। गनीमत हुई कि एक आँख बच गयी। वहीं दूसरी ओर जायसी खुद ही अपने को काना कहते हैं :-

" मुहम्मद बाई दिसि तजि एक सरवन एक आँखि"...।


• जायसी के काव्य पर लोग मुग्ध थे। पर इसके लिए उन्होंने गर्वोक्ति न करके विनम्रता ही प्रकट की है -

"हों सब कबिन्ह करे पिछलेगा, 

किछु कहि चला तलब देइ डगा"..।

फिर भी वह कहते हैं, डंके की चोट कहते हैं। पर लगता है कुरूपता का दर्द उन्हें बराबर सालता रहा -" 

एक नैन जस दरपन ओ तेहि निर्मल भाऊ

सब रूपवंत पाँव गहि मुख जोवन्ही कइ चाउ"..।

सभी रूपवंत उत्सुकतापूर्वक उनसे कुछ सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं। रूपवंत का उल्लेख कवि के अपने क्षोभ का द्योतक है।

● विजयदेवनारायण साही ने अपनी पुस्तक "जायसी" में स्वीकारा है कि वह सूफी न होकर शुद्ध कवि थे"..। वह उन्हें प्रच्छन्न रूप से इस्लाम का प्रचारक मानते हैं।


● इनकी रचनाएँ हैं 

1. "आखिरी कलाम" जिसमें बाबर की प्रशँसा और कयामत का वर्णन किया गया है। जोकि 1528 ई. में लिखी थी।

2. "अखरावट" यह एक तरह का वर्णमाला है जिसमें शब्द निरूपण किया गया है।

3. "पद्मावत" यह जायसी का कीर्तिस्तंभ है। जोकि 1540 ई. में आया था। इसमें 57 खण्ड है और 2 भागों में बंटा है। इसका पहला भाग- "रत्नसेन और पद्मावती के मिलन तक की कथा" , दूसरा भाग- "राघवचेतन का अलाउद्दीन से मिल जाने से लेकर अंत तक"..है।  इसमें शेरशाह सूरी का वर्णन भी है।

इस भव्य और प्रसिद्ध महाकाव्य में चितौड़ के राजा रत्नसेन और सिंघल की राजकुमारी पद्मावती के प्रेमप्रसंग को बहुत ही मार्मिक रूप से और अपनी विशिष्ट कला के माध्यम से रचा है। इसी के अतिरिक्त दूसरी तरफ रत्नसेन की पहली पत्नी नागमती के विरह वर्णन को एक नया आयाम देकर "बारामासा" का विशद उदाहरण पेश किया है। जिसने हिंदी साहित्य में अभी तक के सबसे उत्कृष्ट बारहमासा का परिचय दिया है।  

इसके अलावा "प्रेम की पीर" की व्यंजना करने में भी इस कृति का कोई सानी नहीं।

बच्चन सिंह के अनुसार जायसी ने इस ग्रन्थ को लोक से ग्रहण किया था। यह काव्य का अपना कमाल है कि काल्पनिक सत्य ऐतिहासिक सत्य हो गया।


●बच्चन सिंह के अनुसार पद्मावत की संरचना:- 

1. "दूसरे प्रेमाख्यानों में नायक-नायिका के मिलन के बाद कथा समाप्त हो जाती है परंतु इस कथा की शुरुआत ही यही से होती है और इसका समापन एक तरह की त्रासदी और मृत्योबोध में होता है"...।

2.  "यदि जायसी का उद्देश्य केवल सूफीवाद को स्थापित करना ही होता तो पद्मावती को पा लेने के बाद दोनों सूफी हो जाते"..। 

परन्तु "पद्मावत" की रचना, कवि का किसी धर्म-संस्कृति का प्रचार-प्रसार बिल्कुल नहीं था। यदि ऐसा होता तो श्याद इस्लामिक कथा, फ़ारसी के शब्द, कथानक का ज्यादातर अंश इस्लामिक मत को प्रश्रय देना होता ,जबकि इसके विपरीत भाषा और वाक्य-विन्यास के स्तर पर कवि की मौलिकता का प्रमाण ही प्रतीत होता है। इसके अलावा जनता तक अपनी बात पहुँचाने के लिए भी जायसी भारतीय जनमानस से जुड़ते हैं और वहीं की संस्कृति को अपनाते हैं नाकि इस्लामिक संस्कृति को। 

इसके अतिरिक्त फ़ारसी मसनवी शैली की बंधी हुई परिपाटी पर भी जायसी के कदम नहीं पड़ते, बल्कि उससे हटकर एक नई कला को वह अपने ग्रन्थ में प्रस्तुत करते हैं। जो विद्वानगण ये समझ बैठते हैं कि "पद्मावत" भारतीय प्रेमाख्यान परम्परा पर पूरा सटीक बैठता है तो वो भी बड़ी भूल करते हैं क्योंकि भारतीय प्रेमाख्यान काव्य-परम्परा में सुखांत और मिलन के काव्य लिखे गए हैं जबकि "पद्मावत" में अंततः नायिका का सती होना कहीं से भी सुखांत न होकर एक विशेषपन है। वह कवि की कलात्मकता है जिसमें कथा का समापन दुखांत में भी सुखांत की तरफ ही जाता हुआ दिखाई देता है।

3.  बच्चन सिंह के अनुसार "सिंघल कथा में सूफीवाद की जो जड़े दिखाई देती है वहाँ पर उल्लास की जगह अवसाद की छाया है"...।

4. "जायसी में मृत्युबोध की त्रासद अंतर्दृष्टि है। पद्मावत का प्रतिपाद्य पद्मिनी का सती होना नही है। सिंघल की फंतासी और दिल्ली-चित्तौड़ युद्ध, जिसे हिन्दू-तुर्क युद्ध भी कहा जाता है, वहीं पहुँचता है। पद्मावत का कार्य इस कथन पर है :-

छार उठाय लीन्ह एक मुठी

दीन्ह उड़ाई पिरिथमि झूठी।


अर्थात 'सिंघल-दिल्ली-चित्तौड़-वैभव सब इसी धरती पर है और सब झूठ है, सबकी परिणति केवल मृत्युबोध ही है। परंतु यह मृत्युबोध एक तरफ तो भौतिक है और एक तरह आध्यात्मिक। अर्थात जहाँ एक तरफ हम भौतिक सुख-सुविधाओं से मृत्यु को जीत सकते हैं वहीं दूसरी ओर पद्मावती का मृत्युबोध ईश्वरीय परिधि के अंतर्गत अपनी आस्था-विश्वास, अपने स्वाभिमान, स्त्रीत्व की रक्षा, परपुरुष की छाया से बचने के लिए सती होना एक प्रगतिशील कदम था। जो अभी तक शायद किसी भी सूफ़ीकाव्य में ही नहीं भारतीय प्रेमाख्यान काव्यपरंपरा में भी मिल पाना दुर्लभ है। यही साहस जायसी के ग्रन्थ को बाकी ग्रन्थों से विशिष्ट भी करता है और मौलिक भी बनाता है....। 

5.  जिस मृत्युबोध की तरफ सन्तकवियों ने भी प्रचार किया था उसी तरह का मृत्युबोध सूफियो में भी दिखता है। बस दोनों में मुख्यतः यह फर्क है कि संतो का मृत्युबोध मोक्ष को प्राप्त करने को लेकर चलता है वहीं जायसी का मृत्युबोध इसी धरती पर मिलता है। 

जब जायसी कहते हैं "मानुष प्रेम भय बैकुंठी"....। अर्थात मनुष्य प्रेम ही स्वर्गीय तत्व है। "इस प्रेमतत्व की स्थापना कबीर पहले ही कर चुके थे बस उसे राग के धरातल पर लाना बाकी था जो जायसी ने पुरा कर दिखाया"...।

अर्थात मनुष्यों के साथ प्रेम के साथ रहना, समानता का व्यवहार करना, जातिभेद को खत्म करने जैसे ठोस कदम ही सही मायने में स्वर्ग प्राप्त करने के बराबर है। जीवन के उस पार क्या है या क्या होगा वो किसी को नही पता इसलिए जायसी भी जीवन के इसी पार स्वर्ग को देखने के लिये कहते हैं। और यह इतिहास की माँग भी थी। कि हिन्दू-मुस्लिम एकता का भाव भी सुदृढ़ करना उस समय की माँग थी।

6. "जायसी का प्रेम मृत्युंजय प्रेम है...... जो व्यक्तिक प्रेम है"..। उसमें भी वह सामाजिक है। इसके लिए राग में विराग और विराग में राग का होना आवश्यक है"..।

अर्थात जब तक जीवन मे संघर्ष नहीं होगा, संवेदनशीलता नहीं होगी , जमीनी भाव नहीं आएगा तब तक हम न ही जीवन को समझ पाएँगे और न ही मृत्यु को। क्योंकि भौतिक सुख-सुविधाओं के चक्कर में पड़ कर हम आलसी और जड़ हो जाते हैं जिससे हमारी भावनाएँ कुंद हो जाती है। और हमारा मन-मष्तिष्क काम करना बंद कर देता है। इसलिए जायसी राग-विराग के विशेष मिश्रण की बात मृत्युबोध के संदर्भ में करते हैं।

● बच्चन सिंह की एक बात ज्यादातर सही बैठती है कि "वृद्धावस्था में लिखा गया "पद्मावत" उनके आने मृत्युबोध से मिलकर एक सीमा पर आत्म चरित्तात्मक हो जाता है"..। 

जायसी का मृत्युबोध के सम्बंध में बच्चन सिंह के दिए गए मत ऐसे लगते हैं जैसे जायसी के जीवन पर जितने भी आघात हुए हो, या जितनी भी उनके साथ ज़्यादती हुई हैं , उन्होंने अपने समय में जिस अंधाकारमय मध्यकाल को देखा था, उन सबसे प्रभावित होकर उन्होंने इसी धरती पर जीवन-मृत्यु और स्वर्ग-नरक की कल्पना कर दी है। जो कुछ भी करना है ,पाना है वो इसी धरती पर करना है क्योंकि इस लोक के बाद क्या है ? कोई नही जानता। जायसी की इतनी व्यापक दृष्टि का अर्थ लगाया जा सकता है कि वह समानता जैसे मूल्य पर कितना बल देते होंगे। ठीक इसी तरह आधुनिक काल के हरिवंशराय बच्चन भी जीवन को इसी पार (लौकिक सन्दर्भ में) देखते हैं।

7. "पद्मावत है और रहेगा"...। इसको बच्चन सिंह कुछ इस तरह से कहते हैं कि "फूल मरे पै मरे न बासु"...। और जायसी मृत्युंजय बन गए"..।

8. "जीवन के विरुद्ध मृत्यु और मृत्यु के विरुद्ध जीवन के संघर्ष का नाम "पद्मावत" है"..।

9. "विरह की आँच में पककर ही संयोग खरा होता है"..।

10. "पद्मावत के प्रति रतनसेन का प्रेम साधनात्मक और नागमती का रत्नसेन के प्रति ग्राहस्थिक है"..।


● पद्मावत की भाषा व लोक का प्रभाव :- 

बारहमासा में अवध जनपद की संस्कृति,  विभिन्न महीनों की विशेषता, हर महीने के उत्सव-त्योहार के बीच मूर्तिमान और विरह-वेदना प्रगाढ़ हो उठती है।

जायसी अपने शब्दों का चयन गॉव-छप्परों-झोंपड़ियों- उत्सवों- सामान्य स्त्री-पुरुषों के चारों ओर बिखरे हुए से लेते हैं। 

पद्मावत 7-7 चौपाई पर एक दोहा रखकर "कडवक शैली" में लिखी है।


• बच्चन सिंह के अनुसार "जायसी की अवधी "अवधी की अर्घान है"...।


●पद्मावत पर कहे गए कथन :-

1. हरदेव बाहरी के अनुसार  "पद्मावत पर प्राकृत की रत्नशेखर कथा का प्रभाव है"..।

2. विजयदेवनारायण साही के अनुसार "पद्मावत हिंदी में अपने ढंग की अकेली ट्रैजिक कृति है"...।

3. बच्चन सिंहके अनुसार "जायसी ने कथा को लोक से ग्रहण किया था। यह काव्य का अपना कमाल है कि काल्पनिक सत्य ऐतिहासिक सत्य हो गया"..।

4. शुक्ल के अनुसार "प्रेमगाथा की परंपरा में पद्मावत सबसे प्रौढ़ और सरस है'..।

5. शुक्ल के अनुसार " पद्मावत में प्रेमगाथा की परंपरा पूरी प्रौढता को प्राप्त मिलती है। यह उस समय जी सबसे अधिक प्रसिद्ध ग्रँथ है। इसमें कल्पना और इतिहास का प्रेम है"..।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

एक मध्यवर्गीय कुत्ता

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