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Friday, October 16, 2020

हिंदी भाषा भाग :- 3

हिंदी भाषा का विकास:- 


● आधुनिककाल में खड़ीबोली का साहित्यिक विकास :-


खड़ीबोली का प्राचीनतम रूप-  खड़ीबोली जिसे आज हम हिंदी के नाम से जानते हैं उसका प्राचीनतम साहित्यिक रूप शुक्लानुसार लगभग 11वी शती  (राजा मुंज एयर भोज के समय) से होने लगता है परन्तु इससे पूर्व नाथों के साहित्य में भी इसका छुटपुट रूप देखने को मिल जाएगा। खड़ीबोली में कार्य करने और उसे साहित्य की भाषा में अग्रसर करने में अमीर खुसरो का योगदान अहम माना जाता है जिसे उन्होंने हिंदुई, हिंदवी, हिन्दुवी आदि नाम दिए । दक्खिन के अनेक कवियों ने इसे दक्षिण में फैलाया जब मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली से देवगिरि (दौलताबाद) में अपनी राजधानी को ले जाता है उसे साथ में हजारों की संख्या में उत्तर भारत के निवासी दक्षिण में जा बसते हैं और वहाँ जाकर इस भाषा का प्रचार प्रसार और साहित्य लिखना आरंभ करते हैं। इसी प्रकार से शिवाजीके दरबार में "गुरु रामदास" मुख्य थे। शुरुआती आधुनिक काल में "रामप्रसाद निरंजनी" का "भाषा योगवाशिष्ठ" का योगदान भी अहम माना गया है और गुजरात में "प्राणनाथ " ने खड़ीबोली को आंशिक रूप से फैलाया।

यह सब होते हुए भी खड़ीबोली शब्द का सबसे पहला प्रयोग फोर्ट विलियम कॉलेज में हुआ। इसकी स्थापना 1800 में हुई जिसके संस्थापक (मार्किस वेलेजली) थे। कॉलेज में खड़ीबोली के प्रचार प्रसार का श्रेय वहाँ के पहले हिंदी विभागाध्यक्ष "जॉन गिलक्राइस्ट" को दिया जाता है। 18वी शती में जब वह कलकत्ता पहुँचे तब उन्होंने शुरू में हिंदी का पठन पाठन शुरू किया और 1800 में जब उनकी नियुक्ति कॉलेज में हुई तो उन्होंने ऐसी भाषा का प्रयोग करने पर बल दिया जिससे उनका वर्चस्व का भी बना रहे और भाषाई आधार पर संपर्क भी कायम रहे। तब उन्होंने लल्लूलाल और सदलमिश्र जी को कॉलेज के हिंदी विभाग में शिक्षकों के रूप में नियुक्त किया जिससे कि अंग्रेजी अफसर उचित रूप से खड़ीबोली सीख सके।


● जॉन गिलक्राइस्ट ने अपने पत्रों में खड़ीबोली का इस्तेमाल 3 बार किया है जो इस तरह है:- 

1 "इन कहानियों में से कई खड़ीबोली या हिंदुस्तानी के शुद्ध हिंदवी ढंग की है"...। (हिंदी स्टोरी टेलर भाग 2)

2 "ठेठ खड़ीबोली में हिंदुस्तानी के व्याकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता और अरबी-फारसी का प्रायः पूर्ण त्याग रहता है"...। (दि ओरियन्टल फेब्युलिस्ट)

3 "मुझे खेद है कि ब्रज की तरह खड़ीबोली को सम्मान नहीं मिला"।


यहाँ एक बात ध्यातव्य है कि जॉन गिलक्राइस्ट खड़ीबोली, हिंदी, हिंदुस्तानी में कन्फ्यूज़ थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि कौन सी खड़ीबोली है और कौन सी हिंदुस्तानी। क्योंकि जहाँ वह अरबी फारसी के शब्दों के बहिष्कार की बात कर रहे हैं वहीं वह हिंदुस्तानी भाषा का भी नाम दे रहे हैं जबकि हिंदुस्तानी भाषा में अरबी-फारसी के कई शब्द होते हैं। 

कम्पनी द्वारा खड़ीबोली के प्रचार प्रसार करने हेतु गिलक्राइस्ट के काम में कई भाधा पहुँचाई गई क्योंकि इससे कम्पनी को लग रहा था कि कहीं उनका वर्चस्व कम न हो जाये। कम्पनी द्वारा इस प्रतिक्रिया से क्षुब्ध होकर सर गिलक्राइस्ट ने 1804 में पद से त्याग दे दिया और इंग्लैंड में जाकर वहाँ के फोर्ट विलियम कॉलेज में 1806 तक अध्यक्ष रहे और मृत्युपर्यन्त तक हिंदुस्तानी की सेवा में लगे रहे।


●भारत का फोर्ट विलियम कॉलेज 1854 और इंग्लैंड के 1857 में बंद हो गया ।


इसी तरह लल्लूलाल ने "प्रेमसागर" में और सदलमिश्र ने "नास्कितोपाख्यान" में भी खड़ीबोली शब्द का इस्तेमाल किया है। 

अर्थात 1803 में खड़ीबोली शब्द का इस्तेमाल 5 बार हुआ था।


1805 में सदलमिश्र ने अपने ग्रँथ "रामचरित्र" में खड़ीबोली का इस्तेमाल का उल्लेख किया है :- " अब इस पोथी को भाषा करने का कारण सिद्ध है कि मिस्टर जॉन गिलक्राइस्ट साहब ने ठहराया और एक दिन आज्ञा दी कि आध्यात्म रामायण को ऐसी बोली में करो जिसमें अरबी-फ़ारसी न आवे। तब मैं इसको खड़ीबोली में कहने लगा और 1805 में यह ग्रँथ पूरा होता है। 

इससे यह सिद्ध होता है कि "खड़ीबोली" नाम का श्रेय फोर्ट विलियम कॉलेज को दिया जाता है और यह भाषा व्यापक रूप में आगरा से लेकर पटना तक व नीचे महाराष्ट्र के कुछ हिस्से तक फैली थी।


●इसी समय दो अन्य साहित्यकार जोकि फोर्ट विलियम कॉलेज से बाहर थे वह भी उसी प्रकार की भाषा में लिख रहे थे जिसका उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं। जिनके नाम थे :- 


1 "सदासुखलाल" :- उर्दू के अच्छे लेखक होते हुए भी इन्होंने खड़ीबोली के उस रूप को ही महत्व दिया जिसमें पंडिताऊपन और अन्य बोलियों का चित्रण न हों।

2 "इंशा अल्लाह खां" - इन्होंने "रानी केतकी की कहानी" ऐसी ठेठ भाषा में लिखी जिसमें ध्यान रखा गया कि हिंदी के अतिरिक्त किसी बाहर की बोली का पुट न हो"..। 

इंशा ने इस बारे में स्पष्ट कहा है कि " एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढ़ी की कोई कहानी ऐसी होनी चाहिए कि हिंदवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो । यहाँ भाखापन का अर्थ "ब्रज" भाषा से है।


●19वी शती की प्रारंभिक भाषा में तुकबंदी, लयात्मकता, अलंकारम्यता, नाना प्रकार के प्रयोग, अनेक बोलियों के शब्दों का मिश्रण मिलता है फिर भी सामूहिक प्रयास से ब्रजभाषा के समक्ष खड़ीबोली अंततः खड़ी हो गयी है। यह ठीक है कि खड़ीबोली का परिनिष्ठित या मानक रूप स्थिर नहीं हो सका पर इसका विस्तार खूब हुआ और फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के प्रश्रय के कारण ही इसे यह मान्यता प्राप्त हुई।

●1802 में सिविल सेवा के अधिकारी "विलियम बटरवर्थ बेली" ने हिंदुस्तानी और हिंदी का एक ही अर्थ में प्रयोग किया। उनको हिंदुस्तान में कारवाई के लिए "हिंदी जबान" शीर्षक निबन्ध पर 1500 रुपये नकद और मैडल प्राप्त हुआ  


एक बात ध्यान देने योग्य है कि "हिंदी के लिए गौरव की बात यह हुई कि उस समय की संपर्क भाषा खड़ीबोली थी और आगरा व्यापारिक केंद्र होने के कारण वहाँ की खड़ीबोली पढ़ाने के लिए मुंशी रखे गए जिससे इस भाषा के तहत देश में सुचारू रूप से शासन चलाया जा सके"..। यह सही मायने में खड़ीबोली का विकास ही तो था।


●फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रथम 4 अध्यक्ष :-

1 जॉन गिलक्राइस्ट 1800 से 1804 तक

2 कैप्टन माउंट 1806 से 1808 तक

3 कैप्टन टेलर 1808 से 1823 तक। 

कैप्टन टेलर ने ही 1815 में सर्वप्रथम हिंदी का आधुनिक रूप में इस्तेमाल किया।


4 कैप्टन विलियम प्राइस 1823 से 1831तक। 

कैप्टन प्राइस ने सर गिलक्राइस्ट के मत की आलोचना इस संदर्भ में की कि "राजभाषा फ़ारसी थी जबकि उसके प्रयोक्ता बहुत कम थे। विलियम प्राइस के बदौलत ही पहली बार 1816 के अध्यादेश में भाषायी तौर पर अनेक परिवर्तन हुए जिसके फलस्वरूप 1825 में पहली बार हिंदी और हिंदुस्तानी के भेद को मिटाकर हिंदी के प्रयोग पर बल दिया।


●19वी शती के मध्य में 2 साहित्यकार हुए जिन्होंने हिंदी को आगे बढ़ाने का कार्य किया।


1 शिवप्रसाद सितारे हिंद - हिंदी -उर्दू को समीप लाने के चक्कर में उर्दू को ही भर दिया। उनका मत था कि " हम लोगों को जहाँ तक बन पड़े उन शब्दों को लेना चाहिए जो आमफ़हम में प्रचलित हो"..। इनके प्रयास से भाषा में से पंडिताऊपन तो ख़त्म हुआ पर वर्तनी में एकरूपता नहीं आ सकी। 2-2 रुप चल रहे थे जैसे उनने - उन्ने, उसके उस्के आदि। इससे भाषा बिगड़ गई थी।

इनकी "राजा भोज का सपना" सरकारी नीति का पक्ष लेती नजर आती है और "इतिहास तिमिरनाशक" की उर्दू भाषा का काफ़ी विरोध हुआ ।


2 वहीं दूसरी ओर लक्ष्मण सिंह विशुद्ध हिंदी के पक्षधर थे और उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानते थे। इस सम्बंध में वह कहते भी हैं - " हमारे मत में हिंदी और उर्दू 2 न्यारी-न्यारी बोलियाँ हैं। हिंदी यहाँ के हिन्दू बोलते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमान और पारसी पढ़े हुए।परन्तु यह आवश्यक नहीं कि अरबी-फारसी के बिना हिंदी न बोली जाए और न हम उस भाषा को हिंदी कहते हैं जिसमें अरबी फ़ारसी के शब्द आए"। 


इसी तरह दयानंद सरस्वती, नवीनचंद्र राय, अम्बिका दत्त व्यास जी ने भी हिंदी के लिए कार्य किया।


● भारतेंदु ने लक्ष्मण सिंह और सितारे हिंद की हिंदी के बीच से नई हिंदी निकाली जिसमें न तो भाषा की पंडिताऊपन था और न ही उर्दू के बहुतेरे शब्द। उन्होंने साधु शैली का निर्णय किया और उस हिंदी को "नए चाल की हिंदी " 1873 में संज्ञा दी।

आचार्य शुक्ल इस सम्बंध में कहते हैं कि " जब भारतेंदु अपनी मँझी हुई परिष्कृत भाषा सामने लाए तो हिंदी बोलनेवाली जनता को गद्य के लिए खड़ीबोली का प्राकृत साहित्यिक रूप मिल गया और भाषा के स्वरूप का प्रश्न न रह गया। भाषा का स्वरूप स्थिर हो गया"..।


●"राष्ट्रभाषा" - शादिक अर्थ है "समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त होने वाली भाषा" (जनभाषा)। जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन-जन के विचार विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है। इसका क्षेत्र व्यापक होता है।

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सर्वप्रथम विचार "राजाराम मोहन राय" का था। इसी सम्बन्ध में न केवल भारतवासियों ने बल्कि बाहरी विदेशियों ने भी भारत की हिंदी भाषा को यहाँ की राष्ट्रभाषा बनाने का पुरज़ोर समर्थन किया 


●अंग्रेज़ो द्वारा हिंदी का प्रचार व समर्थन:-

1 जब भी किसी देश को एकता के सूत्र में बाँध कर रखने की बात हो या देश के बड़े हिस्से में प्रशानिक काम करने की बात हो, बड़े स्तर पर जनता से परिचित होना हो और अपनी बात उन तक पहुंचानी हो तो उस देश में एक ऐसी भाषा की जरूरत पड़ती है जोकि देश के लगभग सभी हिस्सों में नहीं तो एक बड़े भूभाग में जरूर उसका उपयोग किया जाता हो। जिसे सामान्य भाषा में राष्ट्रभाषा भी कहा जाता है। इसकी उपयोगिता से देश की संस्कृति, सामाजिक-राजनीतिक, व्यावहारिक संप्रभुता बनी रहती है। इस  नजर से हिंदुस्तान में "हिंदी" ही केवल एक भाषा है जिसे इतने बड़े रूप में प्रयोग किया जा सकता है। और ऐसा ही कुछ रुख़ अंग्रेज़ो ने भी अपनाया था जब उन्हें प्रशासनिक स्तर पर और जनता से संपर्क बनाने के लिए किसी भाषा की जरूरत पड़ रही थी। 

शुरुआत में अंग्रेजी कार्य व प्रशासन फारसी में होता था उसी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था फिर धीरे-धीरे उन्हें इस भाषाई समस्या का परिचय प्राप्त हुआ कि बड़ी मात्रा में जनता से संपर्क नहीं साधा जा रहा है। उन्होंने अवलोकन किया कि किसी ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाए जिसमें यह सारी कमी पूरी हो जाये । तब उन्हें केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा लगी जिससे उनकी भाषाई कमी को पूरा किया जा सकता है और इसी की कमी को पूरा करने के लिए 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना भी कराई गई थी और उसमें भी हिंदी विभाग को खोला गया था। जिससे कि अंग्रेजी अफसर हिंदी सीख सके और जनता से सीधा संपर्क साधने में कुछ हदतक सफलता भी प्राप्त कर सकें। इसी क्रम में हिंदी भाषा सीखाने के लिए भाखा मुंशी सदलमिश्र और लल्लू लाल की नियुक्ति हुई। अंग्रेज अफसरों ने इस भाषा की मुक्तकंठ से तारीफ़ भी की जिनमेँ प्रसिद्ध हैं:-


●"सी.टी.मेटकाफ" :- 1806ई.में अपने शिक्षा गुरु जान गिलक्राइस्ट को लिखा कि- "भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता से लेकर लाहौर तक, कुमाऊँ से लेकर नर्मदा तक....मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है"..।(हिंदी)

● ईसाई धर्म प्रचारको ने 1813 में विल्फोर्स एक्ट के पास होने के बाद से अपने धार्मिक ग्रँथ बाइबिल और अन्य धार्मिक छोटी छोटी पुस्तकें और पैम्फलेट हिंदी में बाँटने शुरू किया। इससे हिंदी का प्रचार तो हुआ ही परन्तु सही मायने में वह अपने धर्म का प्रचार करके भारत में अपनी पकड़ को मजबूत बना रहे थे।

●"विलियम कैरी" :- 1816ई. में लिखा - हिंदी किसी एक प्रदेश की भाषा न होकर सारे देश मे सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है"...।

●प्रथम 4 दशकों में सिविल सर्विस के अधिकारियों में जो हिंदी-हिंदुस्तानी की जो लहर उमड़ रही थी उसे रोकने के लिए मैकाले की नीति लायी गयी बावजूद उसके 1851 तक भारत में अंग्रेजी 2 % मात्र रह गयी थी। खुद अंग्रेज ही अंग्रेजी भाषा का विरोध कर रहे थे और अकाट्य तर्क दे रहे थे। इसके एवज में वह हिंदी का समर्थन कर रहे थे। 

इसी में एक मुख्य नाम इंग्लैंड के "फेड्रिक पिन्काट" का आता है जिनका कम्पनी से संग्राम 1868 में शुरू हुआ जब वह मात्र 32 साल की उम्र में थे। 1888 में श्रीधर पाठक को लिखे पत्र में वह स्पष्ट करते हैं कि " 20 साल पहले मैं एकमात्र यूरोपियन था जिसने सरकार पर हिंदी के बारे में दबाव डाला और 10 साल बाद इस नियम के बनाने में सफल रहा कि भारत जाने वाले अंग्रेजों को हिंदी की परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा"..।

ऐसी स्थिति में सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा और उन्होंने 1881 में सेक्रेटरी को सिविल सर्विस कमीशन को भेजा और भारतीय भाषा के ज्ञान को अनिवार्य रूप से सीखने के लिए मंजूर कर दिया। इसके साथ 1882 में यह व्यवस्था भी की गई कि मद्रास जाने वाले अधिकारियों को विशेष पुरुस्कार दिए जाएँ। इस भारतीय भाषाओं में हिंदुस्तानी मुख्य भाषा थी।


●1878 में ग्रिफिथ ने एक रिपोर्ट में कहा कि " इस देश की भाषा हिंदी है"..। उसमें इस घोषणा के साथ भारतीय आर्यभाषाओं को महत्व देने में हिंदी प्रथम स्थान पर थी। इसी के अलावा उन्होंने कल्पना भी की " यदि कोई भविष्य बताने का साहस करे तो वह यह भी कह सकता है कि भविष्य में उत्तर भारत की जो भाषा राजकाज या साहित्य की बनेगी वह अरबी-फ़ारसी से कम प्रभावित होगी, साथ ही उसमें वर्तमान हिंदी की अपेक्षा संस्कृत तथा प्राकृत के शब्द भी कम रहेंगे"..।

●1886 में लन्दन से प्रकाशित "हॉब्सन जाब्सन कोश" में हिंदुस्तानी को भारत की राष्ट्रभाषा कहा 

●"जॉन ग्रियर्सन" :- हिंदी आम बोलचाल की महाभाषा है'...।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Tuesday, October 13, 2020

हिंदी भाषा भाग:- 2

 


●अपभ्रंश और हिंदी का सम्बंध:-


1 संस्कृत में शब्द के 24 रूप होते हैं पर अपभ्रंश में शब्द के 2 ही रूप होते थे मूल और विकारी। उसी प्रकार से हिंदी में भी यही दो रूप लिए गए। "मूल रूप" साहित्यिक होता है और "विकारी रूप" देशभाषा का या बोलचाल का।

2 अपभ्रंश की तरह हिंदी में भी नपुंसक लिंग नहीं होता।

3 संस्कृत, पालि, प्राकृत भाषा संयोगात्मक भाषा है परन्तु अपभ्रंश वियोगात्मक भाषा है जो हिंदी के वियोगात्मक रूप से मेल खाती है।

4 अपभ्रंश में प्रयोग "तद्भव शब्दों" को हिंदी में स्वीकारा गया।


●अपभ्रंश के भेद:- 


(1) वैसे मोटे तौर पर यही वर्गीकरण माना जाता है।

अपभ्रंश                   आर्यभाषा

शोरसेनी  -         पश्चिम हिंदी, राजस्थानी, गुजराती

पैशाची  -             पंजाबी, लहन्दा

ब्राचड़  -              सिंधी

खस  -                पहाड़ी

अर्धमागधी  -       पूर्वी हिंदी

मागधी  -            बिहारी , बंगला, असमिया, उड़िया

महाराष्ट्र -            मराठी


● पहाड़ी और पंजाबी पर शौरसेनी अपभ्रंश का प्रभाव देखा जाता है। इस तथ्य को आप जरूर याद रखे क्योंकि कई जगह ये तथ्य दिए नहीं गए हैं और आने वाली परीक्षाओं में यह पूछा भी जा सकता है।


●अपभ्रंश का विस्तार:-


अपभ्रंश का विस्तार बहुत अधिक था। यह भाषा के रूप में उत्तरभारत से बंगाल, बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक स्वीकृत थी। महापंडित राहुल अपनी पुस्तक "हिंदी काव्यधारा" में कहते हैं - " जहाँ सरहपा और शबरपा बिहार-बंगाल के निवासी थे वहाँ अब्दुर्रहमान का जन्म मुल्तान में हुआ था। स्वयम्भू और कनकामर शायद अवधी और बुंदेली क्षेत्र युक्त प्रांत के थे तो हेमचन्द्र और सोमप्रभ सूरी गुजरात के। x x x इस प्रकार हिमालय से लेकर गोदावरी और सिंध से ब्रह्मपुत्र तक इस साहित्य के निर्माण में अपभ्रंश ने हाथ बटाया"..।

इससे सिद्ध होता है कि 11वी शती तक अपभ्रंश का प्रसार समस्त उत्तर भारत और दक्षिण में हो गया था। अपभ्रंश इस विस्तृत देश की जनभाषा थी।

●अपभ्रंश मुख्यतः प्राकृत शब्दकोश और देशी भाषाओं के व्याकरणिक ढाँचे को लेकर खड़ा हुआ। इसको "ग्रामभाषा" भी कहा गया।

●"अवहट्ट"- यह अपभ्रंश का परवर्ती रूप है जिसे "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की कड़ी कहा है। 

"अवहट्ट" अपभ्रंश और आधुनिक आर्यभाषाओं के बीच की कडी है जिसका समय 900ई. 1100ई. तक माना गया है परन्तु विद्यापति ने इस भाषा का प्रयोग14वी शती में भी किया है। विद्यापति ने इसे देसीभाषा का नाम देकर प्रयोग किया है क्योंकि उनके अनुसार यह मीठी और जनता की भाषा है।

 "देसिल बअना सब जन मिट्ठा

 तँ तैसन जम्पओ अवहट्ठा"

काफी समय तक इस भाषा को अपभ्रंश के अंतर्गत ही उसकी उपरूप की भाँति देखा जाता रहा और इस बात में कोई 2 राय नहीं है कि शुरुआत में इस भाषा में अपभ्रंश के ज्यादात्तर लक्षण दिखते थे परन्तु धीरे-धीरे यह कम होते गए और वह आधुनिक आर्य भाषाओं की तरफ बढ़ती गयी।

●सर्वप्रथम "बाबू सक्सेना राम" ने इस भाषारूप पर अपने ग्रन्थ "कीर्तिलता" में इसकी चर्चा की। उनके अनुसार कीर्तिलता की भाषा (अवहट्ठ) आधुनिक मैथिली और मध्यकालीन प्राकृत के बीच है। उसी ग्रन्थ में मैथिली अपभ्रंश की संज्ञा भी दी गयी है।

● "डॉ शिवप्रसाद सिंह" ने अपने ग्रँथ "कीर्तिलता और अवहट्ट" (1955) में बड़े विस्तार के साथ स्पष्ट किया है। उनके अनुसार शौरसेनी अपभ्रंश राजनीतिक और भाषा वैज्ञानिक कारणों से राष्टभाषा का रूप ले रहा था। उसी का परवर्ती रूप ईसा की 11वी शती से 14वी शती तक उत्तर भारत की साहित्यिक भाषा बना। यह अवहट्ट थोड़े प्रांतभेदों के अलावा सर्वत्र एक सा ही है। x x x "ईसा की 11वी शती से ईसा की 14वी शती तक के काल को हम अवहट्ट का काल मानते हैं" (पृ 24 व 31)

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि "कीर्तिलता की भाषा पर मैथिली का रंग अवश्य है परन्तु उसके मूल में शौरसेनी अपभ्रंश की प्रवृतियाँ है इसे कौन अस्वीकार कर सकता था"..।


(6) ● प्रारम्भिक हिंदी (पुरानी हिंदी)

मूलतः अपभ्रंश के परवर्ती रूप को ही पुरानी हिंदी माना गया है परन्तु इस पर भी कुछ विद्वानों के थोड़े भिन्न मत हैं। 

जहाँ एक ओर गुलेर जी अपभ्रंश के परवर्ती रूप को पुरानी हिंदी कहते हैं और जिनका मत सबसे ज्यादा प्रभावी और स्वीकार्य भी है। इसी मत की पुष्टि डॉ हरदेव बाहरी भी करते हैं कि "11वी शती की परवर्ती अपभ्रंश से पुरानी हिंदी का उदय माना जाता है"..। परन्तु आचार्य शुक्ल , राहुल जी और रामकुमार वर्मा इसे थोड़ा और पीछे ले जाकर अपभ्रंश से जोड़ देते हैं। 

आचार्य शुक्ल अपने इतिहास में कहते हैं :-"हिंदी काव्य भाषा के पुराने रूप का पता हमें विक्रम की 7वी शती के अंतिम चरण में लगता है"..। x x x देश भाषा मिश्रित अपभ्रंश अर्थात पुरानी हिंदी की कावयभाषा है'..(पृ 10, 12)

●सर्वप्रथम "पुरानी हिंदी" नामक विषय पर चर्चा गुलेरी जी ने अपने शोध आलेख 1921 में "पुरानी हिंदी" नामक से की थी। यह उनका आलेख शायद सरस्वती में छपा था और बाद में 1948 के समय "नागरी प्रचारिणी सभा" ने पुस्तकाकार कराके प्रकाशित कराया और तत्कालीन साहित्य मंत्री "आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र" ने अपने वक्तव्य में लिखा था कि - "विचार था कि इसमें उदधृत अपभ्रंश या अवहट्ट के अवतरणों की वैज्ञानिक टीका-टिप्पणी कराकर जोड़ दी जाए".।

●गुलेरी जी ने अपनी पुस्तक के वक्तव्य में कहा था " प्रायः यह समझा जाता रहा है कि उन्होंने "अपभ्रंश" को ही पुरानी हिंदी की संज्ञा दी। ऐसा नहीं है, उन्होंने अपभ्रंश के 2 रूप बताए हैं:-

पुरानी अपभ्रंश (प्रारंभिक अपभ्रंश)

पिछली अपभ्रंश (उत्तरकालीन अपभ्रंश)

"पुरानी अपभ्रंश संस्कृत और प्राकृत से मिलती है और पिछली पुरानी हिंदी से"...।

उनका तात्पर्य था कि आगे और व्यापक खोज होनी चाहिए जिससे निश्चित रूप से यह पता लगाया जा सके कि कहाँ तक के साहित्य को अपभ्रंश माना जाए और कहाँ से प्राप्त साहित्य को अपभ्रंश न कहकर "पुरानी हिंदी" कहा जाए। जहाँ से हिंदी आरंभ होती है, इसका निर्णय करना कठिन किंतु रोचक और बड़े महत्व का है। इन दो भाषाओं के समय और देश के विषय में कोई स्पष्ट रेखा खींची जा सकती "..।

●चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी ने पुरानी हिंदी और अस्तित्व में आती हुई आधुनिक आर्यभाषाओं के साथ देसीभाषाओं के आगमन पर नदी के रूपक को बाँधकर स्पष्ट करते हुए कहा है कि :- " बाँध से बचे हुए पानी की धाराएँ मिलकर नदी का रूप धारण कर रही थी।उनमें देशी की धाराएँ भी आकर मिलती गई। देशी और कुछ नहीं, बाँध से बचा हुआ पानी था जो नदी मार्ग पर चला आया। उसे भी कभी- कभी छानकर नहर में ले लिया जाता था। बाँध का जल भी रिसता-रिसता इधर मिलता आ रहा था। पानी बढ़ने से नदी की गति वेग से निम्नाभिमुखी हुई, उसका अपभ्रंश नीचे को बिखरना। अब सूत के नये किनारे और नियत गहराई नहीं रही"..(पुरानी हिंदी)..।


(7) ●हिंदी और हिन्दीतर बोलियों का परिचय:-


हिंदी शब्द की उतपत्ति:- हिंदी (नष्ट करना) +टू (दुष्ट) अर्थात हिन्दू का अर्थ "जो दुष्टों का विनाश करने वाला हो", "हीनो को दूषित करने वाला"। परन्तु ये मत कल्पना पर आधारित है।

भोलानाथ तिवारी के अनुसार "हिन्दू" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 7वी शती के अंतिम चरण के ग्रन्थ "निशीथचूर्णी" में मिलता है।

●"हिन्दू शब्द" फारसी है जो संस्कृत के सिंधु का फारसी रूपांतरण है। सिंधु शब्द का सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है। जहाँ उसका प्रयोग नदी के रूप में हुआ था। 

●500 ई.पू में ईरानियों का कब्जा सिंधु के आसपास के क्षेत्र पर था और सिंधु शब्द ईरानी में हिन्दू हो गया। क्योंकि उनकी भाषा व्याकरण में शायद "स" को "ह" पढा जाता था। यही हिन्दू शब्द आगे चलकर हिंदुस्थान, हिंदुस्तान आदि बना।

●हिन्द शब्द में "इक" प्रत्यय जुड़ने से हिन्दीक बना जिसका अर्थ था "हिन्द का"। कल्पांतर में "क" हटने और "ई" जुड़ने से हिंदी बना अर्थात हिन्द का वासी।

आगे चलकर यह भाषा "हिन्द की भाषा" के रूप में हुआ।

●ग्रीक के लोग सिंधु को "इंदोस" कहते थे उसी से वहाँ के निवासियों को "इन्दोई"तथा प्रदेश को "इंदिके" या "इंदिका" कहा। "इंदिका" शब्द जो अंग्रेज़ो के आने से "इंडिया" हो गया।

●किसी भी भारतीय प्राचीन ग्रन्थ में हिंदी शब्द का प्रयोग नहीं है। केवल कालकाचार्य के जैन महाराष्ट्री में हिंदुग शब्द का प्रयोग है।


(8) ●भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग:-


1 भाषा के सम्बंध में हिंदी का प्रयोग अरब और फारस से होता है।

2 ईरान के बादशाह "नौशेरवाँ" ने 6ठी शती में अपने दरबारी हकीम को "पंचतंत्र का अनुवाद" लिखने को कहा तब उन्होंने "जबान-ए-हिंदी" में उसे किया। उस हिंदी का अर्थ संस्कृत-पालि-प्राकृत भाषाओं के सम्बंध में था।

3 भारत के फ़ारसी कवि "ओफी" ने 1228 ई. में "हिंदवी" शब्द का प्रयोग भारत की मध्यदेश की देसीभाषाओ के लिए किया था।

4 तैमूरलंग के पोते "शरफुद्दीन यजदी" ने अपने ग्रँथ "जफरनामा" 1424 ई. में "हिंदी भाषा" का अर्थ "हिंदी" के लिए किया था।

5 धीरेंद्र वर्मा के "हिंदी साहित्य कोष" के अनुसार 13वी 14वी शती में देसीभाषाओ को हिन्दीक, हिन्दुई, हिंदी आदि नाम "अबुलहसन" ने दिया जो सबसे महत्वपूर्ण है।

6 भोलानाथ तिवारी और उदयनारायण तिवारी ने अबुलहसन के द्वारा प्रयुक्त "हिंदी" को सन्दिग्ध मानते हुए उसे भारतीय मुसलमानों और मध्यदेशीय भाषा के लिए इस्तेमाल माना है।

7 हिंदुवी या हिंदुई शब्द वस्तुतः हिंदवी का ही है जिसका अर्थ था हिंदुओ की भाषा जो आगे चलकर 18 शती तक हिंदुओ के लिए रूढ़ हो गई ।

8 "उर्दू" शब्द मूलतः तुर्की के है जिसका अर्थ है "शाही शिविर या खेमा" (दल)..।

9 प्रो. ताराचंद का कहना है कि उर्दु का शुरूआती रूप "मुसहफ़ी" में मिलता है।

10 हिंदी का नवीन लिखित अर्थ में प्रयोग सर्वप्रथम 1815 ई.फोर्ट विलियम कॉलेज में कैप्टन टेलर ने किया।


(9) ●हिंदी उपभाषाएँ और बोलियों का परिचय:- 

हिंदी भाषा भाषी क्षेत्र अम्बाला (हरियाणा) से लेकर पूर्णिया(पूर्णिया) और बद्रीनाथ(उत्तराखंड) से लेकर खण्डवा (मध्यप्रदेश) तक फैला है। इसके अंतर्गत9 राज्य - उत्तरप्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश,उत्तराखंड तथा 1 केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली भी आता है। इन राज्यों में देश की 43% जनसंख्या रहती है।

●सर्वप्रथम एक अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी जॉर्ज ग्रियर्सन ने 1889ई. में "मॉर्डन वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान" अपने साहित्य इतिहास में हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों का परिचय दिया था। बाद में ग्रियर्सन ने 1894 से 1927 तक के 33 वर्षों के अपने अध्धयन में "ए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया" नाम की भाषा आधारित पुस्तक निकाली। इसमें हिंदी की उपभाषाओं, बोलियों को उसके व्याकरणिक तथा शाब्दिक आधार पर उसका क्षेत्र को निर्धारित किया गया। 

इसके बाद "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने बंगला भाषा का उद्भव और विकास "origin and development og Bengali language" 1926 में लिखा। चटर्जी पहाड़ी भाषाओं को इसमें नहीं गिनते।

धीरेंद्र वर्मा "हिंदी भाषा का इतिहास" 1933 ई. का वर्गीकरण सुनीतिकुमार चटर्जी के आधार पर ही किया। केवल उसमें संशोधन के आधार पर पहाड़ी को जोड़ दिया गया।

इसके अलावा कई विद्वानों के अपने अलग अलग मत है हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों के बारे में जिस पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है। 

मुख्य तौर पर हिंदी की 5 उपभाषाएँ हैं और17 बोलियाँ ।


●पश्चिमी हिंदी उपभाषा की 5 बोलियाँ जोकि शौरसेनी अपभ्रंश से निकली हैं:

1 खड़ीबोली- इसका मूल नाम "कौरवी" है और साहित्यिक नाम खड़ीबोली। इसके मानक रूप को हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा और राजभाषा होने का गौरव प्राप्त है। इसे दिल्ली मेरठ के अतिरिक्त रामपुर,

सहारनपुर, मुरादाबाद,देहरादून,अम्बाला में भी बोला जाता है।

2 ब्रज- इस भाषा का सम्बंध मध्यकाल से ही रहा है जिसमें "कृष्णकाव्य" बहुत बड़ी मात्रा में लिखा गया है और "रीतिकालीन साहित्य" भी इसी भाषा में ज्यादातर लिखा गया है।  बंगाल में इसका नाम ब्रजबुलि पड़ा। 

मथुरा इसका केंद्र है।उसके अतिरिक्त मथुरा,वृंदावन, एटा,बदायूँ, बरेली, अलीगढ़, मैनपुरी में बोली जाती है।

3 हरियाणवी - इसे "देसवाली" ," जाटू" और ग्रियर्सन इसे "बाँगरू" कहते हैं। बाँगर का अर्थ उच्च भूमि होता है। यमुना के उच्च भूमि में कहे जाने के कारण नाम पड़ा। इसे जींद , हिसार , रोहतक , कुरुक्षेत्र, नरवाना, कैथल, करनाल आदि में बोला जाता है।

4 कन्नौजी- इसका नाम "कन्नौज नगर" के नाम पर पड़ा। इसके अन्य नाम "कन्नौजिया, कनउजी"भी हैं। इसके मुख्य क्षेत्र पीलीभीत, इटावा , कानपुर, फरुखाबाद, शाहजहाँपुर, हरदोई है। पीलीभीत और इटावा की बोली पर "ब्रज" का प्रभाव है। डॉ धीरेंद्र वर्मा इसे ब्रज की "पूर्वी उपबोली" भी कहते हैं।

5 बुंदेली- "बुंदेलखंड" की बोली होने के कारण नाम पड़ा है। बुंदेलखंड मुख्यतः बुंदेली राजपूतों का एरिया है। इसका मुख्य क्षेत्र चंबल,जबलपुर, रीवाँ, जालौन, झाँसी, हमीरपुर, ग्वालियर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर, सिवनी आदि में बोली जाती है।


●पूर्वी हिंदी उपभाषा की 3 बोलियाँ जोकि अर्धमागधी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 अवधी- इसका केंद्र "अयोध्या" है। इस भाषा के सबसे बड़े कवि "तुलसी" है और इसी की एक अन्य रूप "बैसवाड़ी" के कवि जायसी माने जाते हैं। इसको "कोशली" भी कहते हैं। इसके स्थान हैं- गोंडा, लखीमपुर, बहराइच, फैजाबाद, मिर्जापुर, फतेहपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, सीतापुर, जौनपुर आदि।

2 बघेली- "बघेल राजपूतों का क्षेत्र" और रीवाँ के आसपास का क्षेत्र बघेलखण्ड कहलाता है। यह बालाघाट, मांडला, फतेहपुर, जबलपुर, रीवाँ,बाँदा आदि में बोलते हैं।

3 छतीसगढ़ी- इसका मुख्य क्षेत्र "छत्तीसगढ़" है। बालाघाट के लोग इसे "खलोटी या खहलाटी" भी कहते हैं। यह रायपुर, बिलासपुर, खैरागढ़ आदि में बोली जाती है।


●बिहारी हिंदी उपभाषा की 3 बोलियों का परिचय जोकि मागधी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 भोजपुरी- कुछ लोग इसे "पुरबिया या भोजपुरिया" भी कहते हैं। यह सारन, चंपारन, मुज्जफरपुर, गाजीपुर, देवरिया,हरदी, गोरखपुर, आदि में बोली जाती है।

2 मगही- इस बोली को कुछ लोग "मागधी" भी कहते हैं। इसका क्षेत्र पटना, हजारीबाग, मुंगेर, भागलपुर, राँची है।

3 मैथिली-यह बिहारी हिंदी की सबसे "प्राचीन" भाषा है जिसका इस्तेमाल "विद्यापति" ने किया था। इसे "तिरहुतिया" भी कहा जाता है। इसका क्षेत्र दरभंगा, पूर्णिया, नेपाल का रौतहट, मोहतरी आदि में बोली जाती है।


●राजस्थानी उपभाषा की 4 बोलियाँ जो शौरसेनी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 मारवाड़ी- यह राजस्थानी की सर्वप्रमुख बोली है। "मारवाड़" की बोली होने के कारण यह मारवाड़ी कही जाती है। साहित्यिक मारवाड़ी को "डिंगल" भी कहा जाता है। यह पश्चिमी राजस्थानी है। इसका क्षेत्र मारवाड़, मेवाड़ ,बीकानेर, सिंध, जैसलमेर आदि है।

2 जयपुरी- ग्रियर्सन इसे मध्य पूर्वी राजस्थानी कहते हैं। इसे ढूंढाड़ी भाषा भी कहा जाता है। यह अलवर,किशनगढ़, अजमेर, आदि में बोली जाती है।

3 मेवाती- मेव लोगों के कारण इसे मेवाती कहा जाता है। मेवात इसका मुख्य क्षेत्र है। यह उत्तरी राजस्थानी है।यह वैसे पूरे अलवर की भाषा है और ब्रज क्षेत्र के जुड़ी भाषा है। भरतपुर और गुडग़ांव के पास भी बोली जाती है।

4 मालवी- मालव प्रदेश की मुख्य बोली है।मालवी को अवन्ति का विकसित रूप कहा जाता है क्योंकि पहले इस क्षेत्र की बोली को अवन्ति कहा जाता था।यह दक्षिणी राजस्थानी है। यह मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों जगह बोली जाती है जैसे इंदौर, उज्जैन, देवास,रतलाम,भोपाल, आदि।


●पहाड़ी हिंदी उपभाषा की 2 बोलियाँ जो "खस अपभ्रंश" से निकली हैं:-

1 कुमायूंनी - "कुमायूँ" इसका मुख्य क्षेत्र है। इसका संबन्ध कुर्मांचल से है। यह अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली,उत्तरकाशी के जिलों में बोली जाती है।

2 गढ़वाली- इसका मुख्य क्षेत्र "गढ़वाल" है। पहले का केदारखण्ड या उत्तराखंड बहुत से गढ़ो के कारण गढ़वाल कहा जाता था। इसके क्षेत्र हैं देहरादून, मुरादाबाद, टेहरी,बिजनौर, आदि।


●सिंधी- यह शब्द संस्कृत से निकला है जो सिंधु नदी से बना है। उसके आसपास के देश को सिंधु देश कहा गया और वहाँ की भाषा और उन्हें बोलने वालों को सिंधी कहा गया।

इसकी मुख्य 5 बोलियां हैं:- विचोली, थरेली, लासी, लाडी, सिराइकी। इसकी लिपि लंडा है।

●लहन्दा:- इसका अर्थ होता है पश्चिमी। इसके अन्य नाम मुल्तानी, जाटकी, पश्चिमी पंजाबी, हिन्दकी। इसकी भी लिपि "लंडा" ही है जो कश्मीर की शारदा लिपि की एक शाखा है।

●पंजाबी:- इसका अर्थ है पाँच नदियों का देश। इसकी भी लिपि लंडा थी जिसे "गुरु अंगद" ने बदलकर गुरुमुखी कर दिया था।

पंजाबी की मुख्य बोलियां हैं- दोआबी, डोगरी, माझी, राठी।

●गुजराती:- ये गुजरात प्रदेश की भाषा है जो "गुर्जर" के विकसित रूप गुजरात से बनी है। इसकी लिपि भी गुजराती है जिसमें शिरोरेखा नहीं लगती है।

●मराठी:- महाराष्ट्र प्रदेश की भाषा है जिसकी मुख्य बोलियाँ हैं:- कोंकणी, नागपुरी, कोष्टी, महारी।

इसकी लिपि देवनागरी है पर कुछ लोग "मोड़ी लिपि" का भी प्रयोग करते हैं।

●बांग्ला:- बंग+आल से बना है। यह बंगाल प्रदेश की भाषा है। इसकी लिपि देवनागरी की प्राचीन लिपि से विकसित है इसलिए भी इसे हिंदी की बोलियों में गिन लिया जाता है।

●असमिया:- ये "असम प्रदेश" की भाषा है जिसकी लिपि बंगला है। इसकी मुख्य बोली "विशनुपुरिया" है।

●उड़िया:- यह "उड़ीसा" की भाषा है।इसकी मुख्य बोलियां भत्री, गंजामी, सम्भलपुरी।

उड़िया भाषा बंगला से मिलती जुलती है किंतु इसकी लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली से विकसित है।


यहाँ पर जो भाषा और बोलियाँ है उनको हिंदी की भाषाओं और बोलियों के वर्गरूप में शामिल केवल इसलिए किया गया है क्योंकि यह भी हिंदी की ही परवर्ती अपभ्रंश से निकली है और लिपि-व्याकरण आदि के आधार पर इनमें समानता है।


(10)●हिंदी बोलियों के उपनाम:-

1 हरियाणवी :- बाँगरू, देसवाली,जाटभाषा, चमरवा।

2 अवधी:-       कौशली, बैसवाड़ी।

3 खड़ीबोली:-  कौरवी।

4 छतीसगढ़ी:-  खलटाही, लरिया।

5 बघेली:-        रीवाई।

6 डिंगल:-       भाटभाषा।

7 पिंगल:-        नागभाषा।

8 ब्रज -           बंगाल में इसे ब्रजबुलि कहा जाता है।

9 जयपुरी-       ढूंढाड़ी


(11)●बोलियों के नामकरण कर्ता :-

1 कौरवी-                   राहुल सांकृत्यायन

2 ब्रजबुलि-                ईश्वरचंद्र गुप्त

3 राजस्थानी,बिहारी-  ग्रियर्सन

4 डिंगल-                  बांकीदास

5 भोजपुरी-              रेमण्ड

6 मैथिली-                कोलब्रुक


12 ● बोली व उनकी विशेषता:-

A ओकरबहुला बोलियाँ - ब्रज, बुंदेली, कन्नौजी, मारवाड़ी, कुमाउनी, गढ़वाली, मालवी आदि।

B आकारबहुला बोलियाँ - कौरवी, दक्खिनी आदि

C इकारबहुला बोलियाँ - भोजपुरी

D उदासीन ओकारबहुला बोलियाँ - अवधी, बघेली ।


सहायक ग्रन्थ:-

1 हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2018।

2 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

3 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

4 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

5 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

Sunday, October 11, 2020

हिंदी भाषा भाग :-1


हिंदी साहित्य में भाषा का विकास :- 


 (1) ●विश्व की लगभग 3000 भाषाओं में से "हिंदी" भी एक है जो अपनी वियोगात्मक या विश्लिष्ट रूप में विशेषपन रखने वाली भाषा है। 


● ऐसा माना जाता है कि भारत की सभी भाषाओं का उद्गम स्थल "संस्कृत" भाषा ही है, जिसमें से एक "हिंदी" भाषा भी निःसृत हुई है। हिंदी भाषा संस्कृत से होती हुई पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और अपभ्रंश में भी उसके क्षेत्रीय आधार पर बंटे भेदों से निकलकर आधुनिक हिंदी के रूप में विकसित व स्थापित हुई है और उसी में से हिंदी की उपभाषाओं व उपबोलियों आदि का जन्म हुआ है। 


परन्तु समकालीन विद्वानों ने "हिंदी" की उतपत्ति "अपभ्रंश" से मानी है क्योंकि  अपभ्रंश वियोगात्मक भाषा थी और हिंदी को भी वियोगात्मक भाषा माना जाने से वह अपभ्रंश के सबसे निकट बैठती है। लिपि और व्याकरण के आधार पर भी अपभ्रंश ही एक ऐसी भाषा है जो वर्तमान हिंदी के सबसे नजदीक देखी जाती है। क्योंकि संस्कृत से यदि हिंदी की तुलना की जाती तो संस्कृत में शब्द ह 24 रूप और लिंग के आधार पर भी उसके 3 रूप दिखे जाते हैं परन्तु अपभ्रंश और हिंदी के साथ ऐसा नहीं है। यहाँ पर मूल व विकारी रूप के साथ स्त्रीलिंग व पुल्लिंग रूप ही प्रचलित हैं अतः "हिंदी" की जननी "अपभ्रंश" है।


(2) भाषा :- भाषा "संस्कृत" के शब्द "भाष" धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है "व्यक्त वाणी"। भाषा उसे कहते हैं जो वाणी के रूप में अभिव्यक्त की जाती है। अर्थात जिसके माध्यम से हम अपने विचारों को आदान प्रदान करते हैं। यह और बात है कि समय के साथ भाषा का रंग-रूप भी बदला है और समाज में सामान्य तौर पर केवल मौखिक व लिखित भाषा को ही सबसे ज्यादा तरज़ीह दी जाती है परन्तु कुछ विशेष रूप में सांकेतिक भाषा का भी अपना दृढ़ अस्तिव है जिसके ऊपर कई लोग आश्रित हैं।


(3) भाषा की परिभाषा:- (भारतीय विद्वान)


1 "भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर भली भाँति प्रकट करता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टता समझ सकता है"...।                                                                                                      (कामताप्रसाद गुरु)


2 "भाषा निश्चित प्रयत्न के फलस्वरूप मनुष्य के मुख से निःसृत वह सार्थक ध्वनि-समष्टि है, जिसका विश्लेषण और अध्ययन हो सकें"..।                                                                                       (भोलानाथ तिवारी)


●(पश्चिमी विद्वान)


1 "भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते हैं जो अभिव्यंजना के लिए नियुक्त की जाती है"...।

                                                                (क्रोचे)


2 "ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है"..। 

                                                        (हेनरी स्वीट)


(4) ●भारत के प्रमुख रूप से 2 भाषा परिवार हैं:-


1 आर्यभाषा परिवार - समस्त उत्तर भारत की भाषाएँ ।

2 द्रविड़ भाषा परिवार- समस्त दक्षिण भारत की भाषाएँ।

भारत के भाषापरिवार में 4 भाषा परिवार हैं जैसे भारोपीय 73% , द्राविड़ 25%, ऑस्ट्रिक 1.3%, चीनी तिब्बती 0.7% बोलने वालों की सँख्या है।


(5) ●भारतीय आर्यभाषाएँ:- 


1 प्राचीन भारतीय आर्यभाषा:- 1500 ई.पू. से 500 ई.पू तक है जिसके दो भेद हैं:-

A- वैदिक संस्कृत- 1500ई.पू. से 1000ई.पू.तक।

B- लौकिक संस्कृत- 1000ई.पू.से 500ई.पू. तक।


●"वैदिक संस्कृत" में ही सभी प्राचीन भारतीय धार्मिक-पौराणिक-वेद-ब्राह्मण- उपनिषद-महाकाव्य आदि लिखे गए हैं। इसी को "वैदिक साहित्य" कहा गया।


●"लौकिक संस्कृत" में संस्कृत साहित्य के नाटक, काव्य ,शास्त्र , कालिदास के महाकाव्य व नाटक ,भरतमुनि का नाट्यशास्त्र, मुद्राराक्षस के महाकाव्य, काव्य, नाटक, पाणिनि का अष्टाध्यायी,आदि ग्रन्थ है।

2 मध्यकालीन आर्यभाषा :- इन सभी भाषाओं का प्रथम प्रमाणिक रूप अशोक के अभिलेखों से प्राप्त होता है। इसमें मुख्यतः निम्न भाषाओं को संकलित किया गया है:-

A- पालि-  प्रथम प्राकृत 500ई.पू. से लेकर 1 ई. तक।

B- प्राकृत- द्वितीय प्राकृत 1ई.से 500ई. तक।

C- अपभ्रंश -तृतीय प्राकृत 500 ई.से 1000ई. तक।

D- अवहट्ट - चतुर्थ प्राकृत 1100 से 1400ई.तक।


यहाँ पर प्रथम , द्वितीय "प्राकृत" इसलिए नाम दिया जा रहा है क्योंकि विद्वानों के अनुसार प्राकृत ही प्रथम "देसीभाषा" कहलाई जो संस्कृत से निकलकर लोक तक पहुँची थी। उसके बाद पालि, प्राकृत अपभ्रंश जोकि साहित्यिक नजरिये से इसी क्रमानुसार अस्तित्व में मानी गई हैं । फिर वह चाहे लोक की भाषा रही हो या साहित्य की, उसे प्रथम, दिव्तीय, तृतीय प्राकृत का नाम देकर उल्लेखित किया गया।


●"पालि"- प्रथम प्राकृत - पालि का अर्थ है"बुध वचन"। यह भारत की "प्रथम देशभाषा" है। सम्पूर्ण बौद्ध धर्म का साहित्य पालि भाषा में ही लिखा गया था। बौद्ध धर्म के "त्रिपिटक" पालि भाषा में ही लिखे गए हैं जिसमें जीवन और धर्म-कर्म आदि सम्बन्धी उपदेश दिए गए हैं।

"सूतपिटक"- बौद्ध भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी उपदेश।

"विनयपिटक"- जीवन यापन के उपदेश।

"अभिधम्मपिटक"- धर्म सम्बन्धी उपदेश।


●"प्राकृत" - दिव्तीय प्राकृत - (प्राक+ कृत= पहली सहज भाषा)..।

प्राकृत का सामान्य अर्थ :- सहज या स्वाभाविक होता है। जैन साहित्य का बहुत कुछ भाग प्राकृत में भी लिखा गया है।

प्राकृत के उत्तपत्ति के सम्बंध में 2 मत है:-


1 प्राकृत प्राचीन जनभाषा है:- "नामिसाधु" ने कहा है कि प्राक + कृत से बना है जिसका अर्थ है "पहले की बनी हुई भाषा"। जो मूल से चली आ रही है उसको प्राकृत कहते हैं। नामिसाधु में अपने "काव्यालंकार" में कहा है कि " सकल जगत के प्राणियों के व्याकरण आदि संस्कारों से रहित (इतर, हटके) सहजवचन व्यापार को प्रकृति कहते हैं। उससे उत्पन्न वही प्राकृत है। 


●"वाक्पतिराज" ने भी अपने ग्रँथ "गउड़बहो" में कहा है कि "जिस प्रकार जल सागर में ही मिलता है और वहीं से उत्पन्न होता है इसी प्रकार सभी भाषाएँ प्राकृत में मिलती है और यहीं से ही निकलर आगे बढ़ी हैं जिसमें से सभी आर्यभाषाएँ निकली हैं"।


2 प्राकृत की उत्पत्ति संस्कृत से:- जो मूल संस्कृत से आगत अर्थात निकली है वह प्राकृत है"..।      (हेमचंद्र)


●संस्कृत की विकृति प्राकृत है"...। (लक्ष्मीधर के "भाषाचंद्रिका" से)

अर्थात सभी मतों को देखने के बाद यह निश्चित हो जाता है कि वैदिक संस्कृत के अतिरिक्त उस समय जो भी संस्कृत बोली जाती थी ,जो जनभाषा के तौर पर प्रयोग की जाती थी वह प्राकृत थी। जो परिष्कृत-परिनिष्ठित संस्कृत नहीं थी, वेदों के अनुकूल नहीं थी उसे पंडितों ने, विद्वानों ने हीन भाषा माना और उसी मूल भाषा से निकली प्राकृतिक रूपी (सहजरूप में ) भाषा "प्राकृत" कहलाने का गौरव हासिल कर पाई। 

एक अर्थ यह भी हो सकता है कि जब किसी भाषा को समाज अपने कार्य व्यवहार के आधार पर प्रयोग करता है तब उसकी व्यापकता व प्रचार को देखते हुए उसे साहित्य की भाषा बनाने की कोशिश करता है। धीरे-धीरे उसे व्याकरणिक दृष्टि से परिमार्जित करना और मानक रूप देना शुरू किया जाता है और एक समय ऐसा भी आता है जब वह भाषा अपना पुराना अस्तित्व छोड़कर आगे बढ़ जाती है व साहित्यिक रूप अपना लेती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसका अस्तित्व ही मिट जाता है। लोक में उसका प्रयोग पहले की तरह कायम रहता है। ऐसा ही कुछ प्राकृत के साथ भी हुआ और बाकी अन्य आर्य भाषाओं के साथ भी।

यही प्राकृत भाषा आने वाले समय में अपने पूर्ण विकसित रूप में अभिव्यक्त हुई। और जब इस भाषा में साहित्य लिखा जाने लगा तो इसका साहित्यिक समय मूलतः 1ई.से 500ई. तक माना गया ।

अब सभी विद्वानों ने प्राकृत को संस्कृत से उत्पन्न भाषा मान लिया है। और "दिव्तीय प्राकृत" अर्थात प्राकृत को "साहित्यिक प्राकृत" भी मान लिया है।


●भरतमुनि ने अपने "नाट्यशास्त्र" में सर्वप्रथम प्राकृत भाषाओं के बारे में चर्चा की थी और उसके भेदों का वर्णन किया है:-


मुख्य प्राकृत                     गौण प्राकृत

मागधी                           शाबरी

अवन्तिज़ा                      आभीरी

प्राच्या                           चाण्डाली

सुरसेनी(शौरसेनी)            सचरी

अर्धमागधी                     द्राविड़ी

बाह्लीक                        उदरजा

दाक्षिणात्य(महाराष्ट्री)      वनचेरी


ये जो प्राकृत के भेद दिए गए हैं वह स्थान विशेष व वहाँ की संस्कृति के आधार पर वर्गीकृत है क्योंकि यह सभी स्थान भारत के राज्य-प्रांत-जनपद आदि के आधार पर बाँटे गए हैं । जैसे-जैसे भाषा का विकास होता गया वैसे -वैसे उस भाषा का भी नाम इन स्थान विशेष के आधार पर बदलता गया। उदहारणस्वरूप:- पहले मागधी प्राकृत तो बाद में मागधी अपभ्रंश हुआ और इसी तरह ये क्रम आगे देखा जा सकता है :-  शौरसेनी प्राकृत, शौरसेनी अपभ्रंश आदि। 

विद्वान "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने भी कुछ इस तरह से भाषाई तर्क रखे हैं । भाषा का विकास तो होता गया परन्तु स्थान विशेष में कोई खासा परिवर्तन न होने के कारण उनका भाषाई नाम ही बदला। वर्तमान में जो भी हिंदी की बोलियाँ निकली वह इन्हीं अपभ्रंशों में से उपभाषा और बोली के रूप में निकली। इसलिए कुछ समकालीन विद्वानों ने हिंदी की पूर्वज भाषा को अपभ्रंश माना है नाकि संस्कृत को जिसका सम्बन्ध हम ऊपर स्पष्ट कर चुके हैं।

 

●हेमचन्द्र ने अपने "प्राकृत व्याकरण" में प्राकृत के 3 भेद बताएँ हैं:-

1आर्षी(अर्धमागधी)  2 पैशाची-चूलिका  3 अपभ्रंश।


हेमचन्द्र की चूलिका-पैशाची को "दंडी" ने "भूतभाषा' कहा है और "महाराष्ट्री" को सबसे अच्छी प्राकृत भाषा कहा है। 


●महाराष्ट्री को प्राकृत व्याकरणों में आदर्श , मानक प्राकृत माना गया है। इस प्राकृत का मूल स्थान महाराष्ट्र है।

●डॉ हार्नले के अनुसार महाराष्ट्री का अर्थ है "महान राष्ट्र की भाषा" अर्थात राजपुताना और मध्यदेश की भाषा। 

●राजशेखर ने प्राकृत को "मीठी" और संस्कृत को "कठोर" भाषा कहा है।


●"अपभ्रंश" - तृतीय प्राकृत : - अपभ्रंश मध्यकालीन और आधुनिक आर्यभाषाओं के "बीच की कड़ी" है इसलिए विद्वानों ने इसे "सन्धिकालीनभाषा" भी कहा है। वैसे तो इसका मूलतः साहित्यिक समय 500ई. से 1000ई. तक ही माना है परन्तु व्यापक स्तर पर इसका साहित्यिक समय 8वी से लेकर 14वी शती तक माना गया है। 

1000ई. के बाद आदिकालीन साहित्य में हिंदी के कुछ कुछ स्पष्ट रूप दिखने लगे गए थे परन्तु न उसे स्पष्ट हिंदी का काल कहा गया और न ही उसे पूर्णरूप से अपभ्रंश काल। वह दोनों की सन्धि था इसलिए इस भाषा को सन्धिकालीन भाषा भी कहा जाता है। उस समय के काव्यों में दोनों ही भाषाओं के रूप स्पष्ट थे।

मुख्य रूप से जब भी किसी काल विशेष में एक भाषा के अंर्तगत या उसके समक्ष किसी अन्य भाषा का आगमन शुरू हो जाता है या उसके लक्षण दिखने लगे जाते हैं और तत्कालीन साहित्य में उसे भी जगह मिलनी शुरू हो जाती है तो वह सन्धिकालीन भाषा का रूप धारण कर लेती है। 

इसे आसान भाषा में ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब रीतिकाल के अंतिम दिनों में ब्रज के साथ खड़ीबोली का भी आगमन शुरू हो चुका था तो तत्कालीन साहित्य में इस्तेमाल भाषा को भी सन्धिकालीन भाषा कहा जा सकता है जिसमें ब्रज के साथ खड़ीबोली के भी शब्द आ रहे थे और इसका प्रभाव द्विवेदी युग तक हमें दिखाई देता है। 


● अपभ्रंश की अन्य परिभाषा:- 

1 जब भाषा के सम्बंध में सुसंस्कृत रूप न रहकर पंडितों की नजरों में वह भाषा बिगड़ी हुई मानी जाती है तो उसे अपभ्रंश की संज्ञा दी जाती है। अर्थात अपभ्रंश वह भाषा होती है जो मूल रूप से बिगड़ी हुई हो और साहित्य के लिए स्वीकार्य न हो। परन्तु विद्यापति जैसे उत्कृष्ट कवि ने इस भाषा का भी प्रयोग किया व अन्य आदिकालीन कवियों ने भी।

2 अपभ्रंश का सर्वप्रथम प्रयोग पतंजलि के "महाभाष्य" में मिलता है जहाँ उसका इस्तेमाल "अपशब्द" के रूप में हुआ है।

3 अपभ्रंश के सबसे प्राचीन उदहारण भरतमुनि के "नाट्यशास्त्र" में मिलते हैं जहाँ "विभ्र्ष्ट" के रूप में इस भाषा का उपयोग हुआ है। साथ ही इन्होंने इसे "अभिरोक्ति" भी कहा है।

4 भर्तृहरि ने "संस्कारहीन शब्दों" को अपभ्रंश कहा है। इस प्रकार से असाधु शब्द ही अपभ्रंश कहलाये। अर्थात जब मूल शब्दों को तोड़-मरोडकर या उसे अपनी सुलभता के साथ, मुख-सुख के आधार पर शब्दों को देसीरूप में प्रयोग किया जाता है तब वह अपभ्रंश भाषा  कहलाती है।

5 कालिदास के "विक्रमोवर्षी" नाटक में भी निम्न वर्ग द्वारा प्रयोग भाषा को "अपभ्रंश" माना है।

6 आचार्य दंडी में अपने ग्रन्थ "काव्यादर्श" में अपभ्रंश को "अभीर" कहा है, अर्थात अभीरों की भाषा। इससे यही अर्थ निकलता है कि अभीरों (अहीर जाती) की भाषा जो गोवी, गाँवी, गोणि, गोपोतिलिका,असाधु, नाम से प्रचलित थी बाद में प्रचलन के कारण यह साहित्यिक रूप में आ गई होगी।

7 शुक्ल के अनुसार अपभ्रंश नाम से पहले पहल वलभी के राजा "धारसेन द्वितीय" के शिलालेख में मिलता है जिसमें उन्होंने अपने पिता "गुहसेन" 593ई. को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश का कवि माना है।

"जैन-सिद्ध योगियों की भाषा भी अपभ्रंश थी"। 

"जब प्राकृत बोलचाल न रही तभी से अपभ्रंश साहित्य का विकास मानना चाहिए"।

"प्राकृत की अंतिम अवस्था प्राकृताभास या अपभ्रंश कहलाती थी"।

8 भोलानाथ तिवारी और उदयनारायण तिवारी के अनुसार भाषा के अर्थ में अपभ्रंश शब्द का प्रथम प्रयोग "चंड" ने अपने "प्राकृत लक्षण" में 6ठी शती में किया है।

9 इसके अतिरिक्त अपभ्रंश भाषा का प्रारंभ कब से हुआ उसके लिए 3 मत हैं।

1 डॉ उदयनारायण तिवारी की पुस्तक "हिंदी भाषा का उद्गम और विकास" में 700ई. माना है।

2 नामवर सिंह ने "हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान" में भी 700ई. माना है।  

3 भोलानाथ तिवारी 500ई.मानते हैं।


10 अपभ्रंश के साथ देसी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। "स्वयंभू" ने "पउम चरिउ" की भाषा को "देसी भाषा" कहा है।

11 रुद्रट के "काव्यालंकार" में कहे एक सूत्र की नामिसाधु नामक विद्वान ने इस सूत्र के आधार पर प्राकृत के समानांतर ही अपभ्रंश की भी स्थापना मानी है।

प्राकृत के साथ ही अपभ्रंश की स्थापना यहाँ पर एक प्रश्न खड़ा कर देती है कि, यदि प्राकृत जोकि प्रथम सहजभाषा मानी गई है जिसका उद्गम संस्कृत से हुआ था और अपभ्रंश भी जनता की भाषा थी, जिसे (जनभाषा/लोकलभाषा/ बोलचाल की भाषा) प्रत्येक साहित्यिक भाषा के समानांतर देखा जा सकता है। इस आधार पर तो प्राकृत और अपभ्रंश में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है क्योंकि दोनों ही लोक की भाषाएं थी जिसका प्रयोग निम्न वर्ग के लोग, सामान्य लोग आदि करते थे। 

लेकिन इस अनसुलझे प्रश्न का उत्तर हजारीप्रसाद जी अपनी पुस्तक "हिंदी साहित्य की भूमिका" 1953 में देते हैं कि " यह बात स्मरण योग्य है कि यद्यपि प्राकृत में लिखे गए काव्यों के बाद ही अपभ्रंश भाषा में काव्य लिखे गए परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि प्राकृत नाम की कोई भाषा पहले बोली जाती थी और अपभ्रंश नाम की भाषा बाद में बोली जाती थी। असल में अपभ्रंश लोक में प्रचलित भाषा का नाम है जो नाना काल में नाना स्थान में नाना रूप में बोली जाती है" (17)..। 

अर्थात प्राकृत और अपभ्रंश को एक ही रूप में देखा जा सकता है। इस तरह की भाषा हमेशा थी, है और आगे भी रहेगी क्योंकि जब भी किसी काल विशेष में कोई साहित्यिक भाषा होती है तो उसके समानांतर सामान्य रूप से एक आम बोलचाल की भाषा भी प्रचलन में रहती है जिसे इस्तेमाल करने के लिए किसी विशेष नियमों की आवश्यकता नहीं होती।  जिसे जनता अपनी समझ और विचारों के आदान प्रदान के लिए इस्तेमाल करते हैं, वह भाषा प्रत्येक काल की अपभ्रंश कहलाएगी। यह भाषा तबतक अस्तित्व में रहेगी जब तक इस धरती पर मनुष्य जाति है। क्योंकि प्रत्येक साहित्यिक भाषा के समानांतर एक लोकल भाषा भी चलती है। इसलिए साहित्यिक भाषा को मानक रूप दिया जाता है और अन्य को लोकल या जनभाषा।


12 जब अपभ्रंश  काव्य में प्रयुक्त हुई तब वह अपभ्रंश कहलाई अन्यथा आम जनता में वह देशभाषा कहलाई क्योंकि साहित्यिक भाषा में शब्दों का चयन सीमित और व्याकरणिक आधार पर होता है, देशभाषा में किसी भी शब्द को इस्तेमाल कर सकने की छूट रहती है। किसी तरह के व्याकरणिक नियम की आवश्यकता नहीं होती।


● अपभ्रंश के अन्य नाम :- विभ्र्ष्ट, अभीर, अवहन्स, अवहट्ट, अवहत्थ, औहट, अवहत आदि हैं। परन्तु साहित्य के स्तर पर इसका अर्थ अलग महत्व रखता है।जैसे - प्राकृत से निकलने वाली भाषा का साहित्य।


सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास ,रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2018।

2 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

3 हिंदी साहित्य की भूमिका, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, 10वां संस्करण ,2019।

4 हिंदी साहित्य और सम्वेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वां संस्करण, 2018।

5 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचन्द्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन, बनारस, 12वां संस्करण , 2018।

6 हिंदी भाषा ,कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन , इलाहाबाद, संस्करण 2010।

Tuesday, October 6, 2020

यात्रा वृतांत भाग -2



 अन्य गद्य विधा (यात्रा साहित्य)


1 कमलेश्वर- खण्डित यात्राएँ 1975

                 कश्मीर:रात के बाद 1997

                आँखों देखा पाकिस्तान 2006


2 गोविंद मिश्र- धुंधभरी सुर्ख 1979

                    दरख्तों के पार शाम 1980

                   परतों के बीच 1997


3 विष्णु प्रभाकर- ज्योतिपुंज हिमालय 1982

                        हम सफर मिलते रहे 1996


4 अजित कुमार- सफ़री झोले में 1985

                       यहाँ से कहीं भी 1996


5 राजेन्द्र अवस्थी- हवा में तैरते हुए 1986


6 रामदरश मिश्र - तना हुआ इंद्रधनुष 1990

                        भोर का सपना 1993

                        पड़ोस की खुशबू 1999


7 मंगलेश डबराल- एक बार आयोबा 1991

8 सीतेश आलोक- लिबर्टी के देश में 1997

9 वल्लभ डोभाल- आधीरात का सफर 1998

10 हिमांशु जोशी- यातना शिविर में 1998


11 रमेशचंद्र शाह- एक लंबी छांह 2000

                         देश देशांतर 2016


12 कृष्णदत्त पालीवाल- जापान में कुछ दिन 2003

13 नरेश मेहता- कितना अकेला आकाश 2003

14 नासिरा शर्मा- जहाँ फ़व्वारे लहू रोते हैं 2003


15 मनोहरश्याम जोशी- पश्चिम जर्मनी पर नजर 2006

                              क्या हाल है चीन के 2006


16 असगर वजाहत- चलते तो अच्छा था 2008

                             रास्ते की तलाश 2008

                        पाकिस्तान का मतलब क्या 2008


17 निर्मला जैन- दिल्ली:शहर दर शहर 2009

18 महेश दर्पण- पुश्किन के देश में 2010

19 राजेश कुमार व्यास- कश्मीर से कन्याकुमारी 2013

20 कृष्णा सोबती- बुद्ध का कमण्डल:लद्दाख 2014

21 फूलचंद माधव - मोहाली से मेलबोर्न 2015

22 महेश कटारे- देश विदेश दरवेश 2016

23 ज्ञानरंजन - कबाड़खाना

24 पंकज बिष्ट- खरामा खरामा 2012

25 पदम् सचदेवा- मैं कहती आँखिन देखी

 

सहायक ग्रन्थ:-

1  हिंदी साहित्य और सम्वेदना का विकास , रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वा संस्करण 2018

2 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचंद्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन बनारस, 12वा संस्करण2018

3 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरिएंट ब्लैकस्वान, 2018 संस्करण







Friday, October 2, 2020

यात्रा वृतांत -भाग 1

 


हिंदी साहित्य की अन्य गद्य विधा (यात्रा साहित्य)



1 बालकृष्ण भट्ट - गया यात्रा 1894

2 प्रतापनारायण मिश्र - विलायत यात्रा 1897

3 भारतेंदु - सरयू पार की यात्रा 1899

               लखनऊ की यात्रा 1889


4 गदाधर ठाकुर - चीन में 13 मास 1902

5 सत्यदेव परिव्राजक - अमेरिका दिग्दर्शन 1911

                               मेरी जर्मन यात्रा 1926

                             यूरोप की सुखद स्मृतियाँ 1937


6 शिवप्रसाद गुप्त - पृथ्वी प्रदक्षिणा 1914


7 राहुल सांकृत्यायन - 

लंका यात्रावली 1927   मेरी यूरोप यात्रा 1932

जापान की यात्रा 1935  मेरी तिब्बत यात्रा 1937

मेरी लद्दाख यात्रा 1939  तिब्बत में सवा वर्ष 1939

रूस में 25 मास 1944   किन्नर देश में 1948

घुमक्कड़शास्त्र 1949    यात्रा के पन्ने  1952

एशिया के दुर्गम खण्डों में 1956 

चीन में कम्यून 1959   

चीन में क्या देखा 1960


8 कन्हैयालाल मिश्र - हमारी जापान यात्रा 1931

                             इराक यात्रा 1940


9 सेठ गोविंददास - हमारा प्रधान उपनिवेश 1938

                          सुदूर दक्षिण पूर्व 1951

                         पृथ्वी परिक्रमा 1954


10 सत्यनारायण- आवारे की यूरोप यात्रा 1940

                        युद्धयात्रा 1940

                        यूरोप के झरोखें


11काका कालेलकर - हिमालय की यात्रा 1948

                               सूर्योदय के देश 1955


12 यशपाल - लोहे की दीवार के दोनों ओर 1953

                    राहबीती 1957

                   स्वर्गोद्यान बिना साँप 1975


13 रामवृक्ष बेनीपुरी - पैरों में पंख बाँधकर 1952

                            उड़ते चलो-उड़ते चलो 1954


14 मोहन राकेश - आखिरी चट्टान 1953

15 मुनिकांत सागर - खोज की पगडंडियाँ 1953

                            खंडहरों का वैभव 1953


16 विद्यानिधि - शिवालिक की घाटियों में 1953

17 धर्मवीर भारती - यात्रा चक्र 1955

                         ठेले पर हिमालय 1958


18 भगवतशरण उपाध्याय - कलकत्ता से पेकिंग 1955

                                    सागर लहरों पर 1959


19अज्ञेय - अरे यायावर याद रहेगा 1957

                एक बूंद सहसा उछली 1960


20 ब्रजकिशोर नारायण नंदन से लंदन 1957

21भुवनेश्वरप्रसाद भुवन- आँखों देखा यूरोप 1959

22 यशपाल जैन - रूस में 46 दिन 1960

23 गोपालप्रसाद व्यास- अरबों के देश में 1960


24 दिनकर- देश विदेश 1957

                मेरी यात्राएँ 1970


25 निर्मल वर्मा - चीड़ों पर चाँदनी 1964

26 प्रभाकर माचवे- गोरी की नजरों में 1964


27 नगेन्द्र- तंत्रालोक से यंत्रालोक तक 1968

             अप्रवासी की यात्राएँ 1971


28 बलराज साहनी - रूसी सफरनामा 1971

29 शंकरदयाल सिंह- गाँधी के देश से लेनिन के देश में 1973

30 श्रीकांत वर्मा- अपोलो का रथ 1975


सहायक ग्रन्थ:-

1  हिंदी साहित्य और सम्वेदना का विकास , रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वा संस्करण 2018

2 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचंद्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन बनारस, 12वा संस्करण2018

3 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरिएंट ब्लैकस्वान, 2018 संस्करण


एक मध्यवर्गीय कुत्ता

  आज पढ़िए व्यंगय विधा के गुरु हरिशंकर परसाई का लेख "एक मध्यवर्गीय कुत्ता" जोकि मध्यवर्ग की धज्जियां उड़ाता है।  लेख का मकसद मध्यवर्...