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Sunday, January 3, 2021

आदिकाल : भाग 1

 आदिकालीन साहित्य


             (आदिकालीन सिद्ध साहित्य)


● बौद्ध धर्म के पतन के बाद उसके नेता और उस सम्प्रदाय को चलाने वाले महात्माओं ने बौद्ध धर्म के नियमों को अपने अनुसार ढालने के चक्कर में उसे और बुरी तरह जर्जर कर दिया और वह वाममार्ग 'अर्थात टेढे मार्ग" की तरफ ले गए। जिससे तमाम तरह के कुसंस्कार इस सम्प्रदाय का हिस्सा बनने लगे। और धीरे-धीरे यह सम्प्रदाय अन्य छोटे-छोटे सम्प्रदायों में बटने लग गया। इन्हीं में से एक सम्प्रदाय का नाम वज्रयान था जिसमें से सिद्ध-योगी निकले थे। इन सिद्ध योगियों ने तंत्र-मंत्र ,स्त्री उपभोग, मद्यपान, मांस-भक्षण का सेवन शुरू किया और महासुखवाद कि परिभाषा को बदल कर उसे "सहवास सुख" से जोड़कर अपने सम्प्रदाय को चरम तक पहुँचाया। इसी कारण ये सम्प्रदाय जनता को लोकप्रिय नहीं हुआ। बल्कि इसने समाज को कुसंस्कारों से ग्रसित कर दिया और अपने सम्प्रदाय का डर कायम किया।

• हजारीप्रसाद जी के अनुसार वज्रयान शब्द का अर्थ कठोर, शत्रु-विनाश, वज्रपाणि (जोकि यक्षों के देवता का हथियार था), अमरत्व, और बाद में यह बौद्ध धर्म के शून्यवाद से जुड़ गया था। जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती थी।

• बच्चन सिंह व शुक्लानुसार सहजयान वज्रयान से आगे की सीढ़ी है, जहाँ योगी अपनी सारी इन्द्रियो को नियंत्रित करके सभी साधनात्मक पड़ावों को पार करके सिद्ध कहलाता था। ये सिद्ध योगी पहले तो अपने शरीर को कष्ट देकर मजबूत कर लेते थे फिर उसी तरह का सहज जीवन जीते थे। और शेष योगियो को भी इसी का उपदेश देते थे। जिससे कि प्रत्येक परिस्थिति में ये सिद्धयोगी उसका डटकर सामना कर सके।

• "बच्चन सिंह" के अनुसार ये मुख्यता छोटी जाती के होते थे। कुछ इनमे ब्राह्मण व क्षत्रिय भी होते थे। ये जात पात, आडम्बर, धर्मादि को नही मानते थे, कौल कापालिक थे। इनका छोटी स्त्रियों के साथ सम्पर्क में आना और शूद्रों के साथ रहना ब्राह्मणवाद का खंडन ही करता है।

ये मुख्यतः निरीश्वरवादी होते थे और इनके अड्डे पूर्वी भारत के बंगाल, बिहार, आसाम तक फैले रहते थे।

● शुक्ल व बच्चन सिंह के अनुसार सरहपा नालन्दा के छात्र के साथ अध्यापक भी थे। नालंदा में प्रवेश पाना कठिन होता था। उसके लिए कड़ी तपस्या करनी पड़ती थी। इसके अलावा सरहपा ने विक्रमशिला विश्विद्यालय में भी अध्धयन किया था।

● योग साधनात्मक प्रतीकों वाली भाषा को संध्याभाषा कहा जाता था। जिसका प्रयोग सिद्ध-नाथ दोनों तरह के योगी करा करते थे। इसका प्रतीकार्थ समझकर ही मूल अर्थ को समझा जा सकता था। कुछ इस तरह का प्रयोग कबीर की उलटबांसियों में भी हुआ है।

• "विश्वनाथ त्रिपाठी" के अनुसार सहजयान के प्रवर्तक सरहपा हैं- 

• शुक्लानुसार इनकी संख्या 84 बताई गई है। सरहपा के अन्य नाम हैं:- सरोजवज्र, सरहपाद, राहुलवज्र,आदि।

•इनमे कण्हपा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता था और लुइपा को सर्व-शिक्षित।     

• शुक्लानुसार इनमे 'पा' शब्द को आदरणीय माना जाता था जिसके लिए यह हर सिद्ध योगी के नाम के बाद इस का प्रयोग करते थे।                

• बच्चन सिंह के अनुसार इनके पांच मकार माने जाते थे:- मद्य, मांस, मुद्रा, मत्स्य, मैथुन।                 

• बच्चन व शुक्लानुसार दोहा-चौपाई का प्रथम प्रयोक्ता सरहपा को माना जाता है।

• विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार पुरानी हिंदी का कवि सरहपा है जिसे राहुल सांकृत्यायन ने सर्वप्रथम मान्यता दी थी।                                        


●सिद्ध साहित्य पर कुछ पुस्तके प्राप्त है:-

1. पाश्चत्य विद्वान "बैंडल" ने सिद्ध साहित्य का सर्वप्रथम सम्पादन किया ।                        

2. 1917 में हरप्रसाद शास्त्री ने "बोधगान-ओ-दोहा" सम्पादन किया जोकि नेपाल से पांडुलिपि लेकर आये थे। इससे प्राचीन बंगला का पता चलता है।

3. 1928 में डॉ शमीदुल्ला ने " ले शा मिसतोस्क" नामक फ़्रेन्च ग्रन्थ का अनुवाद किया।

4. प्रबोधचन्द बागची ने तिलोपा, कण्हपा, सरहपा के दोहों का सम्पादन किया।

5. "हिंदी काव्यधारा" में राहुल सांकृत्यायन ने सिद्धो की रचनाओं का संकलन किया है जिनको वह तिब्बत से लेकर आये और सम्पादन किया।

                                                      

●सिद्धों की मुख्यतः दो प्रकार की रचनाएं होती थी:-

1. दोहा (दोहाकोष):- ये परिनिष्ठित अपभ्रंश में लिखे रहते थे जोकि उपदेश, विचार, तर्क आदि पर आधारित थे।

2. चर्यापद:- ये एक तरह के देसीभाषा में लिखे गीत होते थे जो विवाह, अनुष्ठानों में गाये जाते थे। इनकी भाषा को लोकभाषा भी कहा जाता था। इन गीतों की भाषा में पूर्वी बोलियों का जैसे मैथिली ,भोजपुरी का भी भाव आता था।

● सधुक्कड़ी भाषा:- बच्चन सिंह के अनुसार ये भाषा मूल रूप से खड़ीबोली के साथ किसी भी प्रादेशिक भाषा के इस्तेमाल को कहा जाता है। मसलन खड़ीबोली के साथ राजस्थानी का प्रयोग, भोजपूरी, मैथिली आदि का प्रयोग। जैसे कबीर, सिद्ध-नाथों की भाषा।

● सिद्ध-साहित्य में शिष्य परम्परा:-

769   सरहपा   

780 शबरपा

773 लुइपा

820 कण्हपा

840 डोम्भीपा


  


                   (आदिकालीन नाथ साहित्य)


● सिद्ध सम्प्रदाय की तरह ही नाथ सम्प्रदाय भी बौद्धधर्म की वज्रयान नामक एक शाखा से निकला है जो कि बौद्ध धर्म के विकृत होने के पश्चात समाज में पल्लवित हुआ था । सिद्ध योगियों की तुलना में नाथयोगी भी कुछ हदतक जात-पात का विरोध करना, बाह्य-आडम्बर, ढकोसला, धर्म की कुरीतियों पर प्रहार करना आदि कुछ बातों में उनसे समान रूप से मेल खाते नज़र आते हैं।  एक तरफ नाथपंथियों का एक रूप सिद्ध योगियों से मेल खाता दिखाई देता है तो वहीं स्त्री सुख , मोह माया, वीभत्स क्रीड़ा, मदपान,  माँस भक्षण आदि में वह उनसे कहीं बचते हुए पाए जाते हैं। जोकि नाथपंथियों का सामाजिक रूप से सम्बद्ध होने का परिचायक है

 इन नाथपंथी योगियों ने पतंजलि के "हठयोग" को अपनी साधना पद्धति का मार्ग बनाया था। जिसके माध्यम से यह अपने सम्प्रदाय को सामाजिक मोह-माया से व खुद को स्थिर करने में सफलता का साधन मानते थे और मोक्ष प्राप्त करने का तरीका भी। ये अपने आप को भरपूर कष्ट पहुँचा कर, तप आदि करके मजबूत बनाते थे जिससे कि नाथपंथी योगी हर परिस्थिति में खुद को उसके अनुकूल बना सके।

इन योगियों का निवास स्थान उत्तर-पश्चिमी भारत का मैदानी क्षेत्र होता था जोकि पंजाब, राजस्थान, गुजरात आदि तक फैला रहता था।  

"हजारीप्रसाद" के अनुसार सम्प्रदाय को अवधूत मत,  सिद्धमत, सिद्धमार्ग,  योगमार्ग, आदि नामों से भी जाना जाता है।

"शुक्ल" के अनुसार अपने कानों में छेद करके स्फटिक के बड़े-बड़े गोल-गोल कुंडल पहना करते थे जिसके कारण इन्हें कनफटे योगी भी कहा जाता था। 

नाथों का ईश्वरवादी होने से उन्हें जनता में ज्यादा लोकप्रिय माना गया क्योंकि ये सिद्धो की तरह वीभत्स कार्यों में लीन नहीं रहते थे और स्त्री को उपभोग की वस्तु भी नहीं मानते थे इस कारण नाथों को समाज मे ज़्यादा महत्व मिला।

"बच्चन सिंह" के अनुसार यह नाथपंथी योगी हमेशा ब्राह्मणों से शास्त्रार्थ करते रहते थे। कण्हपा से इनके संघर्ष की कथा सर्वविदित है।

● हजारीप्रसाद जी की पुस्तक "हिंदी साहित्य की भूमिका" के अनुसार सुरति-निरति, षटचक्र-भेदन, इला-पिंगला, शून्य-बिंदु, नाड़ी-भेदन आदि ये इनके साधनात्मक अंग होते थे जिनके माध्यम से यह तमाम तरह के योग करके शरीर को स्वस्थ करते थे। मूलाधार से होते हुए सहस्रदल में कमल खिलाने जैसे प्रतीकात्मक क्रियाएँ करते थे जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती थी। इन सिद्ध-नाथ योगियों की इसी प्रतीकात्मक भाषा को "संध्याभाषा" कहा जाता था। जिसे सामान्य व्यक्ति आसानी से नहीं समझ सकता है। इसके लिए उसे गहन अध्ययन की आवश्यकता जरूरी है।

ये लगातार यात्रा करते रहते थे जिससे कि इनकी भाषा में बहुत से शब्द आ गये थे। जिससे इनकी भाषा को भी संतो की तरह सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोक्ता माना जाता था। या इसे यूँ भी समझ सकते हैं कि इन नाथपंथी योगियों की इस भाषा प्रवृति का प्रभाव बाद में आने वाले उन संतो पर भी पड़ा जोकि अपनी भाषा प्रयोग के लिए "सधुक्कड़ी भाषा " जैसी संज्ञाओं से सम्मानित किए जाते थे। 


● हजारीप्रसाद के अनुसार गोरखनाथ के लिए 

1. "शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और महिमान्वित भारतवर्ष में कोई दूसरा नहीं हुआ"...।

2. "भक्तिआन्दोलन से पहले सबसे शक्तिशाली धार्मिक नेता  और धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का ही था".. ये अपने युग के सबसे बड़े नेता थे..।


● मिश्रबन्धुओ में गोरखनाथ को हिंदी का प्रथम गद्य लेखक माना है।

 ● इन योगियों की संख्या 9 मानी गयी है जोकि क्रमशः कुछ इस प्रकार है:- 

आदिनाथ (शिव), जलंधरनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ

गेंगीनाथ, निवृतिनाथ, चर्पटनाथ आदि।


● गोरखनाथ का अन्य विद्वानों के आधार पर जन्मकाल:-

845 ई. - राहुल सांकृत्यायन

9 वी शती - हजारीप्रसाद

11वी शती - पीताम्बर दत्त

13वी शती - शुक्ल व रामकुमार वर्मा

वेसे तो गोरखनाथ के समय को लेकर विद्वानों में एकमत नही है परंतु फिर भी उनका समय 9 शती के आसपास ही माना गया है। 

●नाथों पर लिखी गयी या उनकी प्राप्त पुस्तकें हैं:-

28 मिश्रबन्धुओ ने मानी।

9 हजारीप्रसाद ने मानी।

14 पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने मानी।


●महाराष्ट्र के वारकरी और उड़ीसा के पंचसखा सम्प्रदाय पर गोरख का स्पष्ट प्रभाव था।


सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

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