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Wednesday, August 5, 2020

प्रेमचंद : एक वैचारिकी


इससे पूर्व के लेख में लेखक (दिनकर) के व्यक्तित्व और कृतित्व पर जानकारी प्रदान करने की कोशिश गई थी जिससे कि पाठक वर्ग को उनके जीवन के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानकारी हासिल हो सके। लेख में दिनकर जी के निजी जीवन से लेकर उनके साहित्यिक जीवन तक, उनके साहित्यिक जीवन से प्राप्त यश की जानकारी तक, उन्हें प्राप्त सम्मानों की जानकारी, वह जिस भी पद पर आसीन रहे और उनके पारिवारिक जीवन के बारे में जिस भी प्रकार की जानकारी दी गयी थी वह सभी उस लेख के शीर्षक के बिल्कुल अनुकूल ही थी परन्तु आज इस लेख में यह कोशिश की गई है कि प्रेमचंद के निजीजीवन और साहित्यिक जीवन के केवल उन पहलुओं और घटनाओं को ही अभिव्यक्त करने की कोशिश की जाए जिससे अधिकांश पाठक वर्ग अछूते रह जाते हैं। या इसे यों भी समझ सकते हैं कि केवल उन ही जानकारियों को पाठकों तक पहुँचाया जाए जिसे सामान्य स्तर पर पढ़ने वाला पाठक वर्ग हासिल नहीं कर पाता है। प्रेमचंद के निजी जीवन और उनके साहित्यिक जीवन के उन मार्मिक प्रसंगों के साथ ही उनके जीवन में नित्य आने वाले बदलावों, उनके जीवन में चल रही कश-म-कश, उन पर पड़ने वाले मुख्य तौर के राजनीतिक, सामाजिक प्रभाव आदि का वर्णन करना ही इस लेख का उद्देश्य है। इस लेख के माध्यम से प्रेमचंद जी के व्यक्तित्व को एक नए ढंग से वर्णित किया जा रहा है। जिसमें कुछ हदतक उनकी वैचारिकी को अधिक महत्व देने की कोशिश की गई है। मेरे निजी विचार से किसी भी लेखक को समझने के लिए ज्यादा जरूरी होता है कि उस पर लिखी आलोचनाओं, समीक्षाओं, उनके संस्मरणों और उनके पत्रों को पढ़ने से हम उस लेखक के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा और अच्छी सी जानकारी हासिल कर सकते हैं व उस लेखक को गहराई से भी समझ सकते हैं। उस लेखक पर लिखी "जीवनी" का भी उसके व्यक्तित्व को खंगालने में कारगर सहयोग होता है इसलिए इस लेख में प्रस्तुत जानकारियों के लिए इन्ही विधाओं और शेष सामग्रियों का प्रयोग किया गया है, जिससे कि प्रेमचंद के बारे में ज्यादा से ज्यादा और विश्वसनीय जानकारी प्राप्त हो सके। लेख की शुरुआत प्रेमचंद  के एक सामान्य परिचय से की जा रही है।
वैसे तो प्रेमचंद के बारे में हिंदी ही नहीं हिन्दीतर क्षेत्रों के भी कई पाठकों के पास भी कुछ न कुछ जानकारी अवश्य रहती होगी, चाहे वह उनके निजी जीवन से जुड़ी जानकारी हो या उनके साहित्यिक जीवन से जुड़ी। उनके तमाम प्रसंगों में से कुछ-कुछ या बहुत प्रसिद्ध प्रसंगों का परिचय, हिंदी के साथ हिन्दीतर पाठकों -लेखकों-आलोचकों आदि के पास भी रहता होगा, फिर भी इस मंच के माध्यम से हम प्रेमचंद के जीवन के बारे में एक छोटी सी जानकारी साझा करने की कोशिश कर रहे हैं। आशा करते हैं कि पाठकों को दी गयी जानकारी से उनको साहित्यिक मदद के साथ उनके ज्ञानवर्धन में भी यह लेख कुछ हदतक सहायता भी प्रदान करेगा। 



  प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 ई.वाराणसी जिले के लमही गाँव में हुआ था। इनका वास्तविक नाम "धनपत राय" था लेकिन इनकी प्रसिद्धि प्रेमचंद नाम से हुई। इसी नाम से अधिकांश साहित्यप्रेमी इन्हें जानते हैं। इस नाम के पीछे भी एक कथा है जो यों है कि "जब इनकी उर्दू से प्रकाशित प्रथम कहानी संग्रह "सोजे वतन" छपी थी तो उसमें संकलित कहानियाँ अंग्रेजी राज के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक रूप में विद्रोह का बिगुल फूँक रही थी। उसमें राष्ट्रीय चेतना के स्वर गूँज रहे थे। देश की जनता में राष्ट्रीय चेतना का संचार कराने वाले तत्व इस संग्रह में मौजूद थे। लेकिन जैसे ही इस संग्रह की चर्चा चारों ओर फैलना शुरू ही हुई थी कि उसी समय अंग्रेजी सरकार के कानों तक भी इसकी गूंज पहुँची और सरकार ने इसके प्रकाशन पर रोक लगवा दी थी। इसके साथ ही उस समय तक इस संग्रह की जितनी भी प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी थी उन सबको जलावा देने का फैसला भी सुना दिया था साथ ही, आगे से इस प्रकार के सरकार विरोधी रचना लिखने पर प्रेमचंद के हाथ तक कटवा देने की धमकी दे दी गयी थी। परंतु दिनकर की ही तरह प्रेमचंद भी अपने देश की गुलामी को अपनी आँखों से देख रहे थे और पीड़ित जनता के दुख-दर्द को देखकर भी अनदेखा करना उन्हें प्रिय न था। वह अपने देश और जनता को स्वाधीनता दिलाने के लिए कार्यरत थे। सामाजिक सुधार उनके लेखन का आधार था, इसे किसी भी कीमत पर रोकना उनके लिए मुश्किल था इसलिए उनके एक मित्र "दयानारायण निगम" ने उन्हें "प्रेमचंद" नाम सुझाया जिसके आधार पर वह नए लेखन की शुरुआत कर सकते थे। इस नए नाम के माध्यम से वह जिस भी तरह के साहित्य की रचना कर सकते थे। प्रेमचंद ठहरे लेखक आदमी उन्हें यह तरकीब सुनकर अच्छी लगी उसके साथ-साथ अपनी समस्या का समाधान मिलने की भी खुशी महसूस हुई। उसके बाद से उन्होंने हिंदी में लेखन आरम्भ कर था।

प्रेमचंद का साहित्यिक जीवन 1901 से ही शुरू हो चुका था जब वह उर्दू में लिखा करते थे। उन्होंने हिंदी में लिखने से पहले उर्दू में लगभग 3 उपन्यास लिख दिए थे और कई कहानियाँ भी लिख चुके थे। रामविलास शर्मा इनकी प्रथम रचना एक नाट्य कृति को मानते हैं जोकि अप्रकाशित ही रही थी। इसके बारे में वह कहते हैं "यह नाटक इनके मामा के प्रेम और उस प्रेम के फलस्वरूप चमारों की पिटाई पर लिखी गया था"..।

 प्रेमचंद के हिंदी में लेखन शुरू करने पर उनकी सबसे पहली कहानी "बड़े घर की बेटी" जमाना पत्रिका, 1910 में छपी थी। कुछ आलोचक "पंच परमेश्वर" जो 1916 में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी उसे भी इनकी प्रथम हिंदी कहानी मानते हैं। हिंदी साहित्य में इनकी प्रसिद्धि का कारण इनके "सेवासदन" उपन्यास से शुरू हुई थी जो उर्दू से अनुवादित था। उर्दू में इस उपन्यास का नाम "बाजार-ए-हुस्न" था। इसके बाद "रंगभूमि" लिखकर इन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी पकड़ को और मजबूती दी साथ ही इस उपन्यास के लिए "मंगला पारितोषिक सम्मान" भी पाया।

प्रेमचंद ने न केवल हिंदी कहानियों में अपना कौशल दिखाया बल्कि उपन्यासों में भी कालजयी उपन्यास लिख कर हिंदी साहित्य के लिए अमर हो गए। इनकी अक्षयकीर्ति का आधार स्तम्भ इनका सबसे लोकप्रिय और सबसे चर्चित उपन्यास "गोदान" है जिसका प्रकाशन 1936 में हुआ था। इस उपन्यास को हिंदी में किसान जीवन पर अब तक का सबसे महान ग्रँथ साबित होने का गौरव प्राप्त है। इन्होंने साहित्य के अतिरिक्त फ़िल्म की पटकथा लेखन में भी अपना सहयोग दिया परंतु इस क्षेत्र में प्रेमचंद ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहे। मात्र 3 साल तक ही हिंदी सिनेमा के लिए इन्होंने कार्य किया बाद में अपनी रुचि और मन के विपरीत फिल्मों के विषयवस्तु को देखकर इनके हृदय को बड़ा क्षोभ हुआ और जैनेंद्र जी को एक पत्र में वहाँ (बम्बई) का वर्णन करके यह वापस अपने अड्डे पर लौट आये। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी प्रेमचंद ने अपना सराहनीय योगदान दिया जैसे हंस, माधुरी और जागरण जैसी पत्रिकाओं का सम्पादन करके केवल हिंदी साहित्य की रचनाओं और उसके विषयवस्तु को ही दुरुस्त नहीं किया बल्कि हिंदी साहित्यकारों को भी इन्होंने सही दिशानिर्देश देने का कार्य किया।

प्रेमचंद का अंतिम निबन्ध "महाजनी सभ्यता" , अंतिम व्याख्यान "साहित्य का उद्देश्य" और अंतिम उपन्यास "मंगलसूत्र" था जोकि वह पूरा न कर सके थे और आधे-अधूरे में ही 1936 में उनकी मृत्यु हो गयी थी। भारत सरकार ने इनके साहित्यिक योगदान से प्रभावित होकर इनके नाम से 30 रुपए का डाक टिकट भी निकाला था। अपने 30 साल के साहित्यिक जीवन से उन्होंने हिंदी और उर्दू दोनों ही साहित्य को परिष्कृत किया और उसे एक नया स्वर दिया। इससे पूर्व तक का साहित्य केवल रीतिकालीन वृतियों से जूझ कर चल रहा था, छूट-पुट स्तर पर सामाजिक लेखन भी परस्पर चल रहा था लेकिन साहित्य को समाज से जोड़कर उसे गति प्रदान करने का कार्य जो प्रेमचंद ने किया वह उससे पहले तक नहीं किया गया था। हिंदी साहित्य प्रेमचंद के इस परिश्रम के लिए सदैव ऋणी रहेगा।



 प्रेमचंद ने जिस समय उर्दू में "नवाबराय" नाम से साहित्य लिखना शुरू किया था उस समय साहित्य में 2 प्रकार के उपन्यासों की लहर थी। एक ओर तो तिलस्मी-एय्यारी, रोमांटिक और मनोरंजन सम्बन्धी उपन्यास लिखे जाते थे तो वहीं दूसरी ओर सामाजिक उपन्यास लिखे जाते थे। प्रेमचंद जी ने पहले मार्ग को छोड़कर साहित्य के दूसरे मार्ग पर चलना स्वीकार किया जिसमें समाज को नया चेहरा दिखाने का कार्य किया। वह समझते थे कि देश में चल रहे स्वाधीनता आंदोलनों को आधार बनाकर लेखन करना, देश और समाज दोनों के लिए हितकर साबित होगा और ऐसा हुआ भी। प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से रीतिकालीन प्रवृति को त्याज्य बताते हुए ऐसे साहित्य का बहिष्कार करने पर बल दिया। वह मानते थे कि आने वाला युग किसानों-दलितों-मजदूरों-दीनहीन दुखियों का है। समाज की रफ़्तार सीधे-सीधे उसके दूरगामी दर्शन हमें करा रही है। हिंदुस्तान इस हवा से बच नहीं सकता इसलिए हमें भी उसी तरह का साहित्य लिखना होगा"...।  इसी से सम्बंधित अपने "उपन्यास का विषय" नामक लेख में प्रेमचंद कहते हैं " मगर आजकल कुकर्म, हत्या, चोरी, डकैती से भरे उपन्यासों की बाढ़ सी आ गयी है। साहित्य के इतिहास में ऐसा कोई समय न था जब, ऐसे कुरुचिपूर्ण उपन्यासों की इतनी भरमार हो"..  । इसी निबन्ध में वह आगे जोड़ते हुए कहते हैं कि " जिन्हें जगत गति नहीं व्याप्ति वे जासूसी, तिलिस्मी चीजें लिखा करते हैं"...। 

                      (कुछ विचार, प्रेमचंद, 1939, पृ 99)


प्रेमचंद द्वारा साहित्य का अर्थ बदल देने, उसे रोमांस, जादू-टोने से बाहर निकालकर सामान्य जनता के लिए सुलभ बनाने , उसका आधार जनता को बनाने जनता की समस्याओं व उसके अधिकारों को साहित्य में उठाये जाने की बात का समर्थन राजेंद्र यादव भी करते हैं। राजेन्द्र यादव कहते हैं " प्रेमचंद हमारे यात्रा, संघर्ष और स्वप्न चित्रों को प्रस्तुत करने वाले सबसे बड़े कथाकार हैं। उन्होंने आनंद, मोक्ष और सत्यम-शिवम-सुंदरम के लिए कहानी लिखने की परंपरा को तोड़ा और उन्हें सामाजिक समस्याओं से जोड़ा"...।


 इसी समय के आसपास इनका उर्दू में प्रकाशित कहानी संग्रह " सोजे वतन" 1908 में प्रकाशित हुआ जोकि सरकार की कुरीतियों और उसके शोषण के विरुद्ध भारतीय जनता में स्वाधीनता की लहर फूँकने का कार्य करता हुआ सा प्रतीत हो रहा था। इस रचना से अंग्रेज़ो के विरुद्ध बगावत की ध्वनि गूँज रही थी जिससे सरकार बेखबर थी, लेकिन समय पर किसका प्रतिबंध रह सकता है। जैसे ही ब्रिटिश सरकार को इसकी सूचना मिली उसने इस रचना पर प्रतिबंध लगवा दिया और इसकी प्रकाशित 600 प्रतियों को जलवा दिया था। 

इसी के बाद से प्रेमचंद ने तय किया कि वह हिंदी में लेखन शुरू करेंगे और उन्होंने अपने मित्र "दयानारायण निगम" के कहने पर अपना नाम बदलकर प्रेमचंद रख लिया था। प्रेमचंद ने जिस समय से हिंदी में लिखना शुरू किया था वह समय पहले महायुद्ध का समय था जब नरसंहार के काले बादल सभी और मंडरा रहे थे। ऐसे समय में विश्वभर में मानवतावादी विचारकों और मतों की बहुतायत संख्या में बढ़ोतरी हुई थी उन्हीं में से हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचंद भी थे।
 
प्रेमचंद नाम के बाद सबसे पहले उन्होंने सरस्वती के तत्कालीन सम्पादक महावीरप्रसाद जी के पास अपनी पहली कहानी "पंचों में ईश्वर" भेजी जिसे जून 1916 में "पंच परमेश्वर" के नाम से प्रकाशित किया गया। इस कहानी के माध्यम से तत्कालीन ग्रामीण न्याय व्यवस्था पर पंचायत की स्थिति का यथार्थ चित्रण दिखाया गया है। पंचों के द्वारा न्याय जैसे मूल्यों की रक्षा कराने में प्रेमचंद सफल हुए हैं। 



 प्रेमचंद पर गाँधीवादी मूल्यों का बडा गहरा प्रभाव था। उनकी किसी भी रचना पर गाँधी का प्रभाव स्वतः देखा जा सकता है। न केवल वह गाँधी जी के मार्ग पर चलते थे बल्कि वह तो अपने आप को "गाँधी जी का कुदरती चेला" तक कह चुके थे। जहाँ एक ओर वह ब्रिटिश सरकार के मुलाजिम थे तो वहीं नौकरी के समय के पश्चात वह अपनी मर्जी के मालिक थे। वह जो चाहे कर सकते थे। उनके स्वाभिमान पर उनका पूर्ण आधिपत्य था। एक ऐसा ही वाकिया उनके स्कूली जीवन में शिक्षक के तौर पर हुआ था जब वह स्कूल पढ़ाकर अपने घर की दलान में बैठे आराम कर रहे थे तो वहाँ से गुजरते हुए अंग्रेजी अफसर को उन्होंने सलाम नहीं किया जिस पर उस अफसर ने उन्हें खरी-खोटी सुनाई और अपने मालिक होने का घमंड जताने लगा। प्रेमचंद भी बहुत चपल मनुष्य थे। वह जानते थे कि इन सरकारी मुलाजिमों से कैसे निपटना है और किस तरह से इनके आगे झुकना नहीं है। उत्तर में प्रेमचंद कहते हैं कि " माफ कीजिएगा साहब, लेकिन अपने कार्य के बाद मैं अपने घर का बादशाह हूँ। आपने जो मुझे कहा वह अच्छा नहीं किया और इस पर मैं आप पर केस भी कर सकता हूँ"..। यह सुनकर अंग्रेजी अफसर चुपचाप वहाँ से चला जाता है।

 प्रेमचंद न सिर्फ अंग्रेजी अफसरों से लगातार संघर्ष करते दिखते थे बल्कि एक ऐसा समय भी आया जब गाँधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी की तिलांजलि दे दी थी और स्वतंत्र रूप से लेखन करने लगे। 



एक ओर प्रेमचंद की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पहलुओं से जुड़ी रचनाओं और घटनाओं पर जहाँ गाँधीवादी दर्शन का प्रभाव प्रबल रूप से देखने को मिलता है तो वहीं उनकी राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत रचनाओं व घटनाओं में तिलक की ओजस्विता भी देखने में मनोरम लगती है।



 प्रेमचंद पर जहाँ पाश्चातय चिंतकों में लियो टॉलस्टॉय, रोमा रोला, मैक्सिम गोर्की और विक्टर ह्यूगो का विशेष प्रभाव रहा है तो वहीं भारतीय सरजमीं के तिलक और गाँधी उनके रोम-रोम में समाए हुए हैं। उनसे अछूता उनका साहित्य नहीं है। इन सभी विद्वानों का उनके जीवन और साहित्य पर विशेष प्रभाव रहा है।

कहानियों की प्रेरणा उन्हें रवींद्रनाथ ठाकुर से मिली। उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर से न ही केवल प्रेरणा ली बल्कि उनकी शैली को भी अपनाया है। उसमें प्रेमचंद जी की मैलिकता यह थी कि उस शैली का विकास और उसको नया रंग-रूप और नई पहचान प्रेमचंद खुद देते हैं।

नाटकों की रचना करने से प्रेमचंद घबराते थे क्योंकि वह मनाते थे "रंगमंच के अभाव में नाटक अपना महत्व खो देता है"..। भारत में वैसे भी हिंदी और उर्दू नाटक-रंगमंच की कमी है जिसके कारण अच्छे नाटक नहीं खेले जा सकते। पारसी रंगमंच का प्रयोग करने से प्रेमचंद बचते हुए नजर आए हैं क्योंकि वह आशिकीमिजाज और मनोरंज हेतु ही इस्तेमाल किये जाते हैं। वहाँ से समाज के लिए किसी भी तरह की प्रेरणा और सन्देश दे पाना मुश्किल जान पड़ता है। इसलिए नाटक लिखने की कोशिश से भी डरता हूँ। एक और बात परेशान करती है जिसके कारण मैं नाटक नहीं लिखता हूँ और वह है आर्थिक सक्षमता का मजबूत न होना।     
 
                (प्रेमचंद जी के पत्र,इंद्रनाथ मदान 1934) 



जीवन जीने की जिजीविषा को प्रेमचंद अपने साहित्य में बखूबी निभाते हुए दिखे हैं। इस जिजीविषा में गाँधीवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। न हार मानने वाले मूल्यों की कीमत गाँधी जी बहुत अच्छे से समझते थे, उन्हें पता था कि स्वराज के लिए जनता का सक्रिय रहना कितना आवश्यक है। इसी की बदौलत हमें स्वराज मिल सकता है इसलिए गाँधी जी अपने भाषणों में, अपनी वार्तालाप में ऐसे वाक्यों और शब्दों का प्रयोग करते थे जिससे कि सामने वाले का मनोबल न टूटे। इसी विचार की अवधारणा प्रेमचंद अपने उपन्यास "रंगभूमि" जोकि 1925 में प्रकाशित हुआ था, के नायक "सूरदास" के माध्यम से दिखाते हैं जब उसकी झोपड़ी जला दी जाती है। प्रेमचंद कहते हैं "सूरदास भले ही दृश्यअंकन में असमर्थ है परन्तु वह अकेले ही सत्य के लिए जी सकता है और जीतने का साहस रखता है। सूरदास और मिठुआ के बीच हो रही बातचीत से प्रेमचंद उसी जिजीविषा को समाज में बनाए रखने की कोशिश करते हैं और सूरदास के माध्यम से कहते हैं "कोई हमारे घर को हजार बार क्या, सौ लाख बार जलाएंगे तो हम सौ लाख बार घर बनाएंगे"। 

आगे वह कहते हैं "हम हारे तो क्या मैदान से भागे तो नहीं, रोये तो नहीं, धांधली तो नहीं की। ज़रा दम ले लेने दो, हार- हारककर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे और एक-न-एक दिन हमारी जीत जरूर होगी जरूर होगी"..।



प्रेमचंद भी गाँधी जी की तरह धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिक सद्भावना में विश्वास रखते थे। वह किसी भी मनुष्य को जाति-धर्म- सम्प्रदाय से ऊपर मानते थे। उनकी नजर में मनुष्य की कद्र काफी थी। इसी का परिणाम था कि प्रेमचंद ने 1927 में हिंदी और उर्दू साहित्य के विकास के लिए "हिंदुस्तानी एकेडमी" की शुरुआत की। एक सच्चे राष्ट्रवाद की परिभाषा देने में यह कृत्य सराहनीय था क्योंकि कोई भी राष्ट्र वहाँ की विविधताओं से पूर्ण होता है और जब तक सभी दल, समुदाय, वर्ग, सम्प्रदाय के लोगों को अपने राष्ट्र में स्थान नहीं दिया जाएगा तबतक आप एक भावी राष्ट्र की कल्पना करने में असफल रहेंगे।

अपनी "जेल" कहानी में लगातार जुलूस निकालने और सड़कों पर उतरने जैसी घटनाओं को दिखाकर प्रेमचंद समाज के जिन्दे होने का अहसास कराते हैं। वह यह मनाते है कि यदि समाज ने अपनी सक्रियता दिखाना बंद कर दिया तो वह निष्क्रिय पड़ जाएगा जिसका परिणाम स्वराज पर पड़ सकता है। एक तरफ जहाँ गाँधी जी राजनीतिक रूप से समाज को चेतन अवस्था में लाने और देशहित के लिए समाज को प्रोत्साहित कर रहे थे वहीं प्रेमचंद अपनी कलम के माध्यम से जनता और अपने पाठक वर्ग को जिलाये रखने का कार्य कर रहे थे। इस आधार पर दोनों बुद्धिजीवियों को एक ही कर्तव्य मार्ग पर अग्रसर होते हुए देख सकते हैं, केवल अंतर इतना है कि दोनों का क्षेत्र भिन्न है परन्तु ध्येय एक।



अपने अंतिम उपन्यास "मंगलसूत्र" में प्रेमचंद खुद को एक मजदूर रूप में रख कर लिख रहे थे। वह एक साधारण जीवन जीने वाले व्यक्ति थे और मानते थे कि, यदि सामने वाले की भावनाओ से परिचित होना है तो स्वयं को भी उसी के अनुरूप ढालना होगा। वह कहते हैं" मैं मजदूर हूँ, जिस दिन कुछ न लिखूँ उस दिन मुझे रोटी खाने का अधिकार नहीं"...।

प्रेमचंद का किसान वह किसान है जो कुछ बीघा जमीन होने के बावजूद उस पर मजदूरों-सी खेती करता है और जीवन भर लगान से मुक्त नहीं हो पाता। अपनी बुनियादी जरुरतों तक को पूरा करने में उसे सैकड़ों बार सोचना पड़ता है। चाहे गर्मी हो चाहे ठंड, वह उससे मुक्ति पाने वाले संसाधनों के अभाव में ही अपनी जिंदगी को निकाल देता है। ऐसे किसानों के प्रति प्रेमचंद के दिल में गहरी सहानुभूति है और सम्मानीय भाव भी। प्रेमचंद किसान और मजदूरों को किसी अफसर से भी बड़ा कर्मठ और परिश्रमी मानते हैं। अपनी कहानी "पूस की रात" के पात्र "हल्कू" पर पड़े लगान के बोझ का ऐसा मार्मिक वर्णन करते हैं कि वह लगातार मेहनत-मजदूरी करने के बाद भी अपने लिए एक कम्बली तक नहीं ले सकता। जमींदार का सैना आता है और उसके रखे पैसे भी लेके चला जाता है। हल्कू और मुन्नी की बातचीत दृष्टव्य है"

हल्कू- " मुन्नी सैना आया है लाओ जो रुपये रखे हैं उसे दे दे। 

मुन्नी- "पूस की रात कैसे कटेगी ?

हल्कू-अरे दे दे बला हटेगी। कम्बल के लिए दूसरा उपाय सोचूंगा।

मुन्नी-  मैं कहती हूँ तुम खेती क्यों नहीं छोड़ देते, मर मरकर काम करो। बाकी ही चुकाने के लिए हमारा जन्म हुआ है?..."



प्रेमचंद जी से विवाह होने की घटना शिवरानी देवी विशेष रुप से बताती हैं जहाँ उन्होंने (प्रेमचंद) शायद पहली मर्तबा सामाजिक बन्धनों के विरुद्ध अपने व्यक्तित्व की झलक दिखलाई थी। जिस समय विवाह जैसे विषयों पर अपने मतों को स्पष्ट रूप से रखना अपने आप में ही दूभर कार्य होता था या जिस समय प्रेमविवाह की अनुमति नहीं थी तब उन्होंने मेरे पिता से सीधे तौर पर मुझसे विवाह करने का प्रस्ताव पेश किया और अपने परिवार आदि के सदस्यों से राय-मशवरा तक न लेकर विवाह के लिए अपनी दिलेरी दिखाना मुझे (शिवरानी देवी) को बहुत लुभाया। (पृ 14)


प्रेमचंद पर्दाप्रथा का विरोध करते हुए अपनी पत्नी से कहते हैं कि " मैं तुमसे कहता हूँ, पर्दा छोड़ क्यों नहीं देती? लौंडे की बीवी नहीं हो।xxxxx दस वर्ष के बाद चाची का लिहाज करने की कोई आवश्यकता नहीं।

इस पर शिवरानी देवी कहती हैं "मुझसे बेहयाई नहीं होगी।

प्रेमचंद- अगर तुमसे बेहयाई नहीं होती तो रोजाना एक न एक पंसाखे उड़ा करेंगे।

शिवरानी - आप भला तो जग भला। जब आप लौंडे नहीं हैं तो इस तरह की बातें ही क्यों सुनते हैं? और अगर सुनते हैं तो उन पर ध्यान क्यों देते हैं?

              

शिवरानी देवी अपने दाम्पत्य जीवन के उन मनोरम प्रसंगों की चर्चा विशेष रूप से करती हैं जहाँ थोड़ी नोकझोंक भी है और थोड़ा सा मन मुटाव भी। पर इस मन मुटाव में भी एक प्रेम छिपा हुआ है, एक चिंता छुपी है जो थोड़े से समय के लिए रहती है। उसके बाद वह चिंता भी प्रेम में तब्दील हो जाती है। ऐसे ही कुछ मधुर प्रसंगों को शिवरानी देवी ने अपनी कृति "प्रेमचंद:घर में" में उठाया है। जहाँ एक बार प्रेमचंद को शराब की लत लग जाने से शिवरानी देवी को जहाँ एक ओर उनकी सेहत की चिंता के साथ उनके प्रति सहानुभूति भी होती थी, तो वहीं अपनी सहानुभूति को कभी-कभार रूठकर भी अभिव्यक्त करती थी। उस रूठेपन में भी पति के प्रति प्रेम और चिंता का भाव होता था। 1924 में भी एक ऐसा ही वाकिया घटा था जब प्रेमचंद के शराब पीकर घर आने पर दोनों मिया-बीवी के बीच कुछ मन मुटाव हुआ। ठीक उसी के 3-4 दिन बाद फिर से प्रेमचंद जब शराब पीकर घर आये थे तो उस रात उनकी तबीयत भी कुछ खराब हो गयी थी। देर रात्रि दो बार उन्हें कै भी हुई थी। परन्तु उन्हें सबक सिखाने के उद्देश्य से शिवरानी देवी उनकी सेवा करने के लिए उठती नहीं। अगले दिन सुबह जब दोनों के बीच रात की घटना पर बात होने लगती तो प्रेमचंद कहते " रात को मेरी हालत बहुत खराब थी।तुम कहाँ थी?

शिवरानी देवी कहती " मैं ऐसे बुरे फेर में नहीं पड़ती, उसी दिन आपको बता दिया था।

प्रेमचंद उन्हें कहते कि तुम बहुत कड़े दिल की हो।

शिवरानी देवी जवाब में कहती "आज आपने समझा?
 
इस बात से प्रभावित होकर उस दिन से मैंने शराब नहीं पी। (पृ 103)



प्रेमचंद अपने स्वाभिमान की रक्षा करना जानते थे और यह भी अच्छे से समझते थे कि यदि साहित्य की सेवा करनी है, देश की सेवा करनी है तो स्वतंत्र रूप से लेखन करना होगा। किसी भी तरह के बन्धन में बन्ध कर मौलिक लेखन नहीं किया जा सकता।  भावी भविष्य को आधार बनाकर लेखन करने के लिए जिस साहस की आवश्यकता थी वह प्रेमचंद में खूब भरी हुई थी इसलिए उन्होंने सरकारी पिट्ठू होने का विरोध किया और खुद को जनता के लिए समर्पित कर दिया। लगभग सन 1929 के आसपास प्रेमचंद को गवर्नर साहब (सरकार) की तरफ से "रायसाहबी" मिलने का अवसर मिला था जिसका अर्थ यह होता कि, वह सरकार के इशारे पर नाचते, उनके मुलाजिम हो जाते और उन्हीं के कहने पर लेखन भी करते। अर्थात उनका मौलिक चिंतन, उनकी लेखन- कला कहीं मिट्टी पलीद होती नजर आती और वह खुलकर जनता की सेवा नहीं कर पाते।  प्रेमचंद कहते कि "साहब बहादुर मुझे रायसाहबी देना चाहते हैं"। तब शिवरानी देवी पूछती हैं कि "केवल रायसाहबी ही देंगे या और कुव्ह भी? तिसपर प्रेमचंद कहते हैं कि "हाँ अवश्य और कुछ भी देंगे परन्तु तब जनता का आदमी न रहूँगा एक पिट्ठू हो जाऊँगा"..।अपनी पत्नी को रायसाहबी के लिए मिला हुआ पत्र दिखाने और उनसे सलाह मशविरा करने के बाद शिवरानी देवी कहती कि " यह तो बहुत महँगा सौदा है। प्रेमचंद कहते हैं कि यदि जनता की रायसाहबी मिले तो कर लूँगा, गवर्मेंट की रायसाहबी की इच्छा नहीं। (पृ 161)


प्रेमचंद ने सभी तरह की कुरीतियों पर, विकृतियों पर, सभी तरह के अनाचारों पर इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार, जाति व्यवस्था, नशाखोरी, सूदखोरी, अत्यधिक लगान वसूली, धोखाधड़ी, धर्म-आडम्बर, साम्प्रदायिक सद्भावना से लेकर न्यायव्यवस्था तक और सत्य-अहिंसा जैसे गाँधीवादी मूल्यों को हमेशा अपने लेखन में मुख्यतः उभारा है और अपनी लेखनी चलाई है। वह लेखक में निष्पक्षता के गुण देखने के समर्थक थे। एक अच्छे लेखक का नजरिया जनता का प्रतिनिधित्व करना होना चाहिए न कि सरकार और पूंजीपतियों की जूतियाँ सीधी करना। यदि वह डर कर लेखन करेगा तो अपने विचारों को जनता तक नहीं पहुँचा पायेगा। लेखक के स्वतंत्र व्यक्तित्व पर विचार करते हुए प्रेमचंद कहते हैं कि " लेखक को पब्लिक और गवर्नमेंट अपना गुलाम समझती है। आखिर लेखक भी कोई चीज है। वह सभी की मर्जी के मुताबिक लिखे तो लेखक कैसा ? यदि गवर्नमेंट के जेल में डालने की धमकी से और जनता के द्वारा मार डालने की धमकी से लेखक डरने लगे तो क्या लिखना बंद कर दें ?  ऐसा ही कुछ उनके एक लेख को लेकर विवाद हुआ था जोकि "आज" नामक पत्रिका में छपा था। इसके विरोध में काशी में हिंदूसभा के कई सदस्य और कुछ कॉंग्रेसी भी विरोध में आये थे। लगातार उन्हें उनके लेखन के लिए धमकियां मिलती थी और कई बार तो ये हत्या करने तक भी पहुँच जाया करती थी। लेकिन फिर भी प्रेमचंद अपनी बात पर अडिग रहे और लगातार क्रांतिकारी लेखन को बढ़ाते रहे।


देश की गुलामी और उससे मुक्ति के लिए प्रेमचंद सबसे ज्यादा युवाओं की माँग को जरूरी मानते हैं। उनका मानना है कि जिस भी कार्य को सफल बनाना है उसमें युवाओं की भागेदारी होना अनिवार्य है, क्योंकि यही एक वर्ग है जो सबसे ज्यादा भागा दौड़ी कर सकता है और कम समय में ज्यादा से ज्यादा काम जल्द ही निपटा सकता है। देश गुलामी को झेल रहा है जिसके लिए चाहिए कि जल्द से जल्द इस गुलामी से निपटा जाए और उसमें युवाओं की भागेदारी होना आवश्यक है। लेकिन जब अपने देश के इन युवाओं को जिन पर आने वाला भविष्य आधारित है, उन्हें समय खराब करते देख और फिजूलखर्ची करते प्रेमचंद देखते हैं तो दुखी होते हैं और उन्हें देश की चिंता होती है। ऐसी ही एक घटना होती है जिसका वर्णन शिवरानी देवी प्रेमचंद की जीवनी में करती हैं। 

 "काशी विश्विद्यालय में जलसा" 1933 की घटना है जहाँ प्रेमचंद सभापति के रूप में एक गल्प-सम्मेलन में गए थे । प्रेमचंद जी की मीटिंग ढाई बजे से शुरू होनी थी तब तक वह अपनी पत्नी के साथ विश्विद्यालय के छात्रावास के निकट ही एक नहर के पास जाकर अपनी थकान मिटाने लगे। छात्रावास के पास ही कुछ युवती और युवकों को टहलते हुए, हँसी ठठ्ठाकर करते हुए देखकर प्रेमचंद जी को थोड़ा सा बुरा लगा और चिंतित स्वर में बोले " यह गुलाम देश कब सुधरेगा, समझ नहीं आता। यहाँ नकल करने की आदत यहाँ तक है कि अपने को नकल करने पर ही विद्वान समझ बैठते हैं और वह भी पूरी नकल नहीं करते आधी अधूरी ही कर छोड़ते हैं। खराबियों की नकल तो ये झट कर लेते हैं अच्छाईयों की तरफ झाँकते तक नहीं"। 

जिसपर शिवरानी देवी उनसे सवालात करने लगती हैं " इस वक्त आपकी आलोचना से क्या लाभ? यदि अंग्रेज़ो की तरह रहेंगे तभी तो आजादी पाएंगे"।  

प्रेमचंद कहते हैं " विलासिता आजादी की दुश्मन है"..। यदि तुम (शिवरानी देवी) अंग्रेज़ो के भोगविलासी जीवन को आजादी से जोड़कर देखती हो तो मैं तुम्हे बता दूं कि उन्होंने ये विलासिता अपने आजाद होने के बाद शुरू की है। जब वह गुलाम थे तो पशुओं से भी ज्यादा मेहनत करते थे और उसी का परिणाम है कि आज वह आजाद है और हम गुलाम। आगे प्रेमचंद कहते हैं " आजादी मिलती है तप से, त्याग से और बलिदान से, तुम्हारे यहाँ तो उसका उल्टा हो रहा है xxxxx  इसी कारण दिनरात हम गुलामी की तरफ जा रहे हैं। 

शिवरानी देवी उन युवकों को बच्चा बताती है जिस पर प्रेमचंद कहते हैं कि "तुम इन्हें बच्चा कहती हो ? आज के युग में उम्र ही कितनी होती है ? लड़कियों का हवाला देते हुए प्रेमचंद कहते हैं कि " लड़कियों को तो देखो तितली की तरह फुदक रही हैं। ये यहाँ क्या गुण सीखेंगी, रही सही माता पिता के गुण भी खो देंगी। इसी कारण माता पिता को शादी के लिए ज्यादा कीमत देनी पड़ती है। दुसरो के घर जाएंगी तो इतना पैसा उड़ाने को नहीं मिलेगा, तो इनका जीवन दूभर हो जाएगा।  इसके उत्तर में शिवरानी देवी कहती है कि " ये ग्रेजुएट होकर कुछ कमाना सीख जाएंगी जिसपर प्रेमचंद कहते हैं कि "जो दूसरों के पैसों को पानी की तरह बहा रही हैं तब वह अपने पैसे दूसरों के लिए क्या छोड़ सकेंगी?..।  

इस बात पर शिवरानी देवी "सुदर्शन" की एक कहानी का हवाला देती हुई कहती है कि "उसमें पिता के द्वारा पुत्र की परीक्षा ली जाती है जहाँ पुत्र अंततः विजयी होता है और अपने द्वारा कमाए गए पैसे की भी अहमियत समझता है और दूसरों के पेसों की भी। प्रेमचंद का मत था कि "यह जो पुत्र था वह लड़कपन में ही सम्भल गया था और यह जो युवक युवती है वह जवानी की गंदी आदतों में पड़े हैं।  कुछ दिनों बाद राष्ट्र की बागडोर इन्ही के हाथों आनी है तब ये सिरफिरे आफत मचाएंगे।  (पृ 222 से 226 तक)




प्रेमचंद ईश्वर और आस्था के सवाल पर भी अलग दृष्टिकोण रखते हैं। कई जगह वह उसे आस्था और नियतिवाद से न जोड़कर यथार्थ से जोड़ते हुए देखते हैं। उनका मानना है कि जब मनुष्य के कर्म अच्छे हों तो उसे बुरे फल की प्राप्ति क्यों हो?। मनुष्यों के कर्मो के अनुकूल फल की प्राप्ति न होने के परिणामस्वरूप प्रेमचंद अपने विचारों को ईश्वरीय सत्ता से सवालिया ढंग से जुड़ते हुए उन पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर देते हैं और उनकी सत्ता को नकार देते हैं। 1935 में जब जैनेंद्र जी की माता का देहांत हुआ था तो प्रेमचंद जी और उनकी पत्नी को भी काफी दुख हुआ था। उस घटना से वह भी भीतर तक प्रभावित और आहत हो गए थे। प्रेमचंद और शिवरानी देवी की आपसी बातचीत और जैनेंद्र जी की माता के दयालु स्वभाव पर चर्चा करने के बाद प्रेमचंद इस नतीजे पर पहुँचे की "अब ईश्वर पर विश्वास नहीं होता, और न ही उसके कर्मो पर, न उसकी माया पर। जितने भी तरह के मिथक, किवदंतियाँ और जिन भी मान्यताओं को समाज ने निर्मित किया है उन पर भी विश्वास नहीं होता क्योंकि यदि वह सही मायने में अपने आश्रितों का परम- पिता है तो वह उन्हें दुख क्यों देता है ? उनसे अन्याय क्यों करवाता है ? यदि सचमुच ईश्वर है तो उसे दुखियों को दुख देने में मजा आता है ? अगर ऐसा ही ईश्वर बेरहम है तो उसे ईश्वर कहने का जी नहीं चाहता"..।

 इस पर शिवरानी जी कहती हैं कि "सभी अपने कर्मो का भोगते हैं"..।

बदल में प्रेमचंद जी का तर्क होता है कि "ऐसा माना जाता है कि बिना ईश्वर के हम पलक भी नहीं झपका सकते तो वह हमसे अन्याय क्यों करवाता है ? जो अच्छा है वही हमसे करवाये। कुछ नहीं यह सब धोखेबाजी है, बस अपने को धोखे में डालने के लिए प्रपंच रचा गया है। और जब हम प्रत्यक्षतः कोई बुरा कार्य नहीं करते हैं तो, लोग कहते हैं पिछले जन्म में कोई बुरा कार्य किया होगा और उस पर मैं कहता हूँ यह सब गोरखधंधा है "...। (पृ 326 से 329)


प्रेमचंद अपने लेखन कला में जहाँ शुरुआती समय में आदर्श और नैतिकता को मूलरूप से लेकर चलते थे वहीं अपने जीवन के अंतिम सालों में उन्हें अनुभव होने लगा था कि अब केवल आदर्शों और नैतिकता की आधारशिला पर लेखन नहीं हो सकता। न ही इस ढाँचे के बूते एक भावी भविष्य की कल्पना की जा सकती है। बाद के वर्षों में सत्य को दिखाना ही उनका परम् लक्ष्य हो गया था इसलिए अंतिम सालों में "कर्मभूमि", जैसे उपन्यास को लिखकर उसमें असहयोग आंदोलन की पुष्टि की गई है। उनका मानना था कि अब समस्याओं का समाधान जमीनी स्तर की सच्चाई दिखा कर ही किया जा सकता है। इसलिए वह यथार्थवाद की तरफ रुख अपनाते है। उन्होंने अपनी अंतिम कहानियों में जैसे "कफ़न" में असंवेदनशील समाज के जर्जर चित्र को उधेड़कर रख दिया है। प्रेमचंद का यथार्थवाद सबसे ज्यादा और प्रभावी रूप से गोदान में खुलकर आता है जहाँ नियतिवाद की विफलता ही होरी की मृत्यु है। होरी के चरित्र के माध्यम से समूचे भारतीय किसानों की स्थिति का मार्मिक और विश्वसनीय चित्रण किया गया है। जहाँ होरी के द्वारा ईश्वरीय न्याय और ईश्वर पर आश्रित रहकर भी उसका उद्धार नहीं होता इसलिए जीवन के अंतिम दिनों में प्रेमचंद ईश्वर के प्रति अपने विश्वास को कमजोर होता पाते हैं । 

प्रेमचंद पर जितने भी विद्वानों का प्रभाव पड़ा है उनमें से मैक्सिम गोर्की मुख्य रूप से रहे हैं। उनका लेखन और व्यक्तित्व प्रेमचंद खुद से मिला जुला मानते थे और उन्हें भी जनता का सच्चा कथाकार समझते थे। जिसे देश और पीड़ित-असहाय-गरीब जनता की चिंता खाये रहती है। "1936 अगस्त का महीना था जब मैक्सिम गोर्की की मृत्यु की खबर पाकर प्रेमचंद जी गहरे अवसाद में कई दिनों तक डूबे रहे थे। गोर्की की मृत्यु से वह इतने आहत हुये थे कि लंबे समय तक वह विलाप ही करते रहते थे जिसे देखकर उनकी पत्नी शिवरानी भी रोने लगे जाती थी। उनकी मृत्यु पर उनके ऑफिस (शायद हंस पत्रिका का कार्यालय) में एक मीटिंग के लिए उन्हें शोकसभा में पढ़े जाने वाले भाषण की तैयारी करनी थी। उसी को लिखने में वह लगे थे। उन्हीं दिनों उनकी तबीयत भी काफी नाज़ुक रहा करती थी। लगातार पत्नी के मना करने के बावजूद वह भाषण लिखने में लगे रहते थे क्योंकि उनके लिए वह बहुत जरूरी कार्य था और उस कार्य में उनका मन भी रमा हुआ था। शिवरानी देवी द्वारा गोर्की के बारे में पूछने पर प्रेमचंद कहते कि "वह एक ऐसा लेखक था जिसे किसी जातीयता से नहीं नापा जा सकता। जैसे आज बहुत से लोग तुलसी, सूर, कबीर को जानते हैं ठीक उसी प्रकार से शिक्षा के प्रसार के साथ मैक्सिम गोर्की का नाम भी फैलेगा और लोग इन्हें भी पूजेंगे"। 

गोर्की की चर्चा वह कई दिनों तक करते रहे। उनका मानना था कि "उनकी जगह लेने वाला अब कोई नहीं रहा"..। उनके प्रति प्रेमचंद की असीम श्रद्धा थी। जब भी गोर्की की चर्चा होती तो उनके हृदय में गहरा आहत होता। 

साहित्य पर चर्चा करते हुए प्रेमचंद उसके कई पहलुओं को सामने रखते हैं और उस पर विस्तार से चर्चा करते हैं। उनका मत है कि साहित्य में वह सभी गुण होने आवश्यक हैं जो किसी भी समाज की मजबूती से जुड़े हों। उससे समाज का किसी भी तरह से लाभ हो रहा हो और उससे समाज में कुछ नयापन आने की संभावना दिखे। एक बेहतर कल की निर्मिति, साहित्य की जिम्मेदारी है उसके लिए उसे चाहिए कि वह ऐसे विषयों का चयन करें जोकि मानवजाति के लिए लाभदायक सिद्ध हो सके। साहित्य पर चर्चा करते हुए वह कहते हैं " साहित्य उसी रचना को कहा जायेगा जिसकी भाषा परिमार्जित हो, प्रौढ़ हो, जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने वालों का गुण हो, साहित्य में यह गुण तभी पूर्णरूप में उपस्थित रहता है जब उसमें जीवन की सच्चाइयों और अनुभूतियों को डाला गया हो। तिलिस्मी कहानियों, भूत-प्रेत की कथाओं आदि से भले ही हम प्रभावित हुए हों परन्तु अब उनमें हमारे लिए कम दिलचस्पी है"...।

प्रेमचंद साहित्य की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि " साहित्य जीवन की आलोचना है"..। उसकी विधा कोई भी हो उसमें जीवन की आलोचना और व्याख्या होनी चाहिए।

साहित्य क्या नहीं है इसकी परिभाषा देते हुए प्रेमचंद कहते हैं कि " जिस साहित्य में हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक बोध और मानसिक तेजी न आए, हममें शक्ति और तेजी न आए, कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता न उतपन्न करे वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं"...।
                               ("साहित्य का उद्देश्य" लेख से) 



जीवन में साहित्य का महत्व क्या और कितना है इस पर भी प्रेमचंद नजर फेरते हुए दिखे हैं। उनका मत सीधा और सपाट है कि साहित्य में जीवन को दिखाना अनिवार्य है। वह भी मानव जीवन की समस्याओं, उसके सुख-दुख, चिंताओं, माँगो, उसकी बुनियादी सुविधाओं, उसके साथ हो रहे अत्याचारों आदि का वर्णन करना एक साहित्यकार की पहचान होनी चाहिए जिसका आधार मानव जीवन पर टिका हो। इसी पर अपने मत रखते हुए प्रेमचंद कहते हैं  "साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है। उसकी अटरियाँ, मीनार और गुम्बद बनते हैं, लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी हुई है।xxxxx  जीवन परमात्मा की सृष्टि है, इसलिए वह अबोध, असीम और अगम्य है। साहित्य मनुष्य की सृष्टि है इसलिए वह सुबोध, सुगम और मर्यादित व सीमित है। उसके नियम कानून है जिसके तहत ही कोई साहित्यकार बन सकता है"..।

"परमात्मा अपने आप में कार्य के प्रति किसी तरह से जवाबदेह नहीं है परन्तु साहित्य जवाबदेह भी है और उसकी जिम्मेदारी भी है"

"जिस तरह से जीवन का उद्देश्य आनंद होता है या जीवन में आंदन लाने से होना चाहिए उसी प्रकार से साहित्य का उद्देश्य भी इसी जीवन के आनंद को दर्शाना है और यह सच्चा आनंद तब सफल होगा जब वह सत्य के नजदीक होगा और उसे दर्शाया जाएगा, तब जाकर ही वह साहित्य का उद्देश्य कहला पाएगा"। ("जीवन में साहित्य का स्थान" लेख से)




जिस तरह से गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा की समस्या से जूझते हुए हिंदी को पूरे राष्ट्र की भाषा बनाने का संकल्प लिया था और उनका मत था कि, इस देश की एक यही भाषा है जिसके तहत हम लोगों को आपस में जोड़ सकते हैं और आजादी पा सकते हैं। उन्हें इस बात का स्मरण था कि जब तक भाषाई स्तर पर देश में एकता स्थापित नहीं होगी तबतक देश को ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति नहीं मिल सकती इसलिए उनके लिए भाषा का मसला अहम रहा। इसी के समाधान के लिए उन्होंने असम से लेकर मद्रास और गुजरात तक "हिंदी प्रचार समिति" का निर्माण करवाया। गाँधी जी के इस विचार का पुरजोर समर्थन प्रेमचंद के लेखन में भी दिखता है जिसकी पुष्टि उनके द्वारा रचे साहित्य में उठाये गए मुद्दों और विषयों से पता चलती है। उन्होंने किसी भी वर्ग-समुदाय-सम्प्रदाय आदि की चिंताओं व समस्या को नहीं छोड़ा। उन्हें जिस भी विषय पर सुधार की आवश्यकता महसूस हुई चाहे वह हिंदी प्रदेश की समस्या हो या दक्षिण की, चाहे वह पूर्वांचल की समस्या हो या कच्छ के मैदानों की, उन्होंने उस पर कलम चलाई।  उन्होंने अपनी लेखनी को कभी भी किसी प्रदेश और भाषा में बंधना स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक में उनके साहित्य का सम्मान है और इसी सम्मान को पुष्ट करते हुए रामविलास शर्मा अपनी आलोचनात्मक कृति " प्रेमचंद और उनका युग" में इस बात को पेश करते हैं।

 "हंस के "प्रेमचंद स्मृति अंक" में श्री चन्द्रहास ने लिखा था- प्रेमचंद जी का स्वर्गवास उत्तर के हिंदी भाषियों को उतना न खटका होगा जितना कि दक्षिण के हिंदी प्रेमियों को" .।

वहीं एक ओर दक्षिण भारत की यात्रा का स्मरण करते हुए रामविलास शर्मा कहते हैं कि " मद्रास में एकरात अपने घर की सीढ़ियों पर बैठे हुए, एक तेलुगु कवि मित्र ने प्रेमचंद की एक कहानी से गद्य का रस लेते हुए लगभग एक पैराग्राफ सुना डाला। उन्हें प्रेमचंद के न जाने कितने पैराग्राफ कंठस्थ थे। दक्षिण में भी जहाँ भी लोग हिंदी जानते थे वहाँ प्रेमचंद को भी जानते थे"..।  

रामविलास शर्मा प्रेमचंद के व्यापक स्तर पर लिखे गए लेखन कला से प्रभावित होकर उनकी तुलना तुलसीदास से करते हुए उन्हें तुलसी के बाद का "सबसे बड़ा कलाकार" की पदवी से सम्मानित करते हैं जिनकी रचनाएँ अपनी ही भाषा के क्षेत्र में नहीं, सुदूर दक्षिण गाँवो में भी पहुँच गई थी"...।

हंस के उसी "प्रेमचंद स्मृति अंक" में मद्रास के हिंदी प्रचारक कवि ब्रजनंदन शर्मा ने लिखा था " मैं यह निस्संकोच होकर कह सकता हूँ कि प्रेमचंद जी का उपयोग दक्षिण में ज्यादा हुआ है। पर हिंदी भाषा-भाषी जनता ने अभी तक प्रेमचंद जी से पूरा लाभ नहीं लिया है"...। 



इसी के अतिरिक्त रामविलास शर्मा प्रेमचंद की महानता गिनाते हुए हिंदी के उन आलोचकों को उत्तर देते हुए प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन का महत्व गिनाते हैं, जो उन्हें उनके साहित्यिक जीवन में प्रयोग किये गए मनोवैज्ञानिक स्तर पर छिछला और सतही स्तर का बताते हैं। वे आलोचक जो उनके साहित्य पर पूँजीवादी सत्ता को न उखाड़ पाने में उन्हें असफल बताते हैं, जो उनके साहित्य के शिल्प पर प्रश्न उठाते हैं परन्तु स्वयं गहराई से न ही सोचते हैं और न ही उन्हें समग्रता की दृष्टि से देखते हैं, ऐसे आलोचकों को रामविलास शर्मा महान साहित्यकारों में नहीं गिनते है। 

प्रेमचंद की महान लेखकों में गिनती करने का कारण रामविलास शर्मा यह मानते हैं कि "उनका जनता से जुड़कर कार्य करना, उनकी सम्वेदनाओं को अपनी संवेदना मानना तथा उनकी समस्याओं को अपनी समस्या मानकर लेखन करना ही उनकी महानता को बताता है। इसके आगे रामविलास शर्मा कहते हैं कि "हिंदी के जिन दिग्गज आलोचकों ने प्रेमचंद की जिस महानता को नहीं सीखा और न ही देखा, वह उनका जनता-स्रोत था। जबतक आप जनता से जुड़कर साहित्य नहीं रचोगे आप महान लेखक नहीं बन सकते और न ही महान साहित्य की रचना कर सकते हो। इसके आगे वह सोवियत आलोचक "ब्रेसकोवनी" का हवाला देते हुए प्रेमचंद को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर का महान लेखक बताते हुए कहते हैं कि "जिस प्रकार से ब्रेसकोवनी अपने देश के लेनिन और स्टालिन के अथक प्रयासों के बाद वहाँ पर आई खुशहाली का वर्णन करते हैं ठीक इसी प्रकार से ब्रेसकोवनी प्रेमचंद के लिए भी इसी तरह की मान्यता रखते हैं। उनका मत है कि भले ही आज प्रेमचंद का भी गम्भीर अध्ययन किया जा सकता है"...। प्रस्तुत कथन का अर्थ रामविलास शर्मा इस रूप में लेते हैं कि प्रेमचंद उन लेखकों के रूप में हैं जिसे सारा हिंदुस्तान सम्मान की नजरों से देखता है, जिस पर दुनिया की शांति प्रेमी जनता गर्व करती है। जहाँ एक ओर सोवियत संघ के आलोचक उनकी मुक्त कंठ से प्रसंशा करते हैं वहीं हम भारतीय भी उनकी प्रसंशा करते थकते नहीं। उन्होंने जिन भी विशेषताओं को अपने साहित्य में दर्शाया है वह हमारी जनता की जातीय विशेषताएं हैं"..।
 
प्रेमचंद के इसी साहसपूर्ण कार्य के लिए उनकी तुलना बंगला के रवि बाबू और शरत बाबू के बाद हिंदी में उत्कृष्ट लेखकों के रूप में की गई है।


आगे रामविलास शर्मा कहते हैं कि "प्रेमचंद हिंदुस्तानी जनता के उज्ज्वल भविष्य की पेशगी थे। हिंदी लेखक उस उज्ज्वल भविष्य को लाने में सहायक हों, हमारी संस्कृति और कला प्रेमचंद की जातीय परम्परा का अनुसरण करें और फली-फूले यही उद्देश्य के साथ इस पुस्तक को लिखा जा रहा है"...।(प्रेमचंद और उनका युग:-भूमिका से) 




प्रेमचंद नारी जीवन और उनकी समस्याओं पर विचार करते हुए लगातार यथार्थवादी होते जा रहे थे। उन्हें अब इस बात से कोई सरोकार न रहता था कि नारी अपने नारीत्व की सीमा में बंधकर, अपने पतिव्रता रूप में रहकर लगातार पुरुषप्रधान समाज में दमघोंटू जीवन यापन करे। वह अपने कथा साहित्य में ऐसी नारी पात्रों की रचना करने से सावधान रहते थे जो अपने पतियों को , प्रेमियों को या घर के अन्य पुरुष सदस्यों को खुलकर जवाब न दे, जो सामाजिक और सांस्कृतिक वर्जनाओं में बंधकर विरोधी न बने, किसी भी प्रकार का विद्रोह न करे। अब वह नारी को नए रूप में दिखाने लगे थे। "निर्मला" उपन्यास में कई स्त्री पात्र हैं जो पुरुषों से लगातार लोहा लेती नजर आती हैं। जैसे "कल्याणी" का पति "उदयभानु" के यह कहने पर की " वह और मर्द होंगे जो औरतों के इशारों पर नाचते होंगे"...। इसपर कल्याणी पलटवार करती हुई कहती है " तो ऐसी स्त्रियां भी और होंगी जो मर्दो की जूतियाँ सीधी किया करती होंगी"...। वहीं दूसरी ओर  "रंगलीबाई" जोकि दिल से तो कोमल भाव की है परन्तु अपने पति पर पूरा शासन रखती है और उसकी गलत नीतियों का खुलकर विरोध भी करती है। "भालचंद्र" जोकि रंगलीबाई का पति है वह दहेज जैसी कुप्रथा पर बहुत-सा दहेज माँगने की बात अपनी पत्नी के आगे रखता है, उसपर रंगलीबाई उसे फटकारते हुए कहती है कि " तुम बाप-पूत एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हो "..। 

कल्याणी और रंगलीबाई ऐसे नारी चरित्र हैं जो अपने व्यभिचारी पतियों के चरणों को आंसुओ से तर नहीं करती बल्कि उस अन्याय से प्रतिकार लेती हैं।प्रेमचंद अपने उपन्यासों में नए ढंग के नारी पात्रों की गढ़ना कर रहे हैं जो अन्याय और दुख को सहती तो हैं परंतु उसका खुलकर विरोध भी करती हैं।  यदि नारी के विरोध न करने और उसके घुट-घुट कर मर जाने को कुछ लोग सामाजिक बन्धनों की सुरक्षा समझते हैं तो वह भूल करते हैं और बदले में अपने सामंती सोच का परिचय देते हैं। वहीं दूसरी ओर "कर्मभूमि" की "सुखदा" अमरकांत को दलित स्त्री "मुन्नी" के साथ न्याय होने की माँग को लेकर दृढ़ हो जाती है। वह कहती है" अगर इसको फाँसी हो गयी तो मैं समझूँगी की संसार से न्याय उठ गया। xxxxx  जिन दुष्टों ने उसपर अत्याचार किया था उन्हें दंड मिलना चाहिए था। यदि मैं न्याय के पद पर होती तो उसे बेदाग छोड़ देती। ऐसी देवी की तो प्रतिमा बनाकर पूजना चाहिए।"....।  प्रेमचंद सुखदा के माध्यम से दिखाना चाहते हैं कि हिंदुस्तानी स्त्रियों को किसी अपराधी को दंड मिलने पर इतनी खुशी मिलती हैं कि पूछो ही मत। क्योंकि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के साथ अधिक अन्याय होता है। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि महिलाओं को बस में सफर करने से लेकर, बाजार में आने जाने से लेकर, घर-समाज में और स्कूल-कॉलेज में तक, कहीं भी आने जाने पर  कितनी ही बार अपमान की अनुभूति होती है और उन्हें इस पुरुष जाति पर कितना क्रोध आता है। क्योंकि लगातार उनको पुरुषों की दृष्टि से हीन समझा जाता है, वह अपनी दृष्टि से उसे नोचते हैं।

"मुन्नी" का उस गोरे अंग्रेज द्वारा ब्लात्कारा करने पर जब मुन्नी के साथ न्याय नहीं होता है तो सुखदा अपने क्रांतिकारी पति को फटकारती हुई पुरुष समाज पर सवाल उठती है विशेषतौर पर जो बड़ी-बड़ी बातों की दुहाई देते हैं और समाज में नारी उत्थान की बातों को लेकर चलते हैं लेकिन व्यावहारिक रूप में उसे अमल में लाने पर वह फिसड्डी साबित हो जाते हैं। सुखद कहती है " एक दिन जाकर सब लोग उसका पता क्यों नहीं लगाते, या स्पीच देकर ही अपने कर्तव्य से मुक्त हो गए"...।

कर्मभूमि के अमरकांत और गबन के रमानाथ में एक मूलभूत समानता देखी जा सकती है कि दोनों में ही दृढ़ता और विश्वास की कमी है। दोनों ही जगह नारी पात्र अपने पतियों को लगातार दृढ़ता और विश्वास के साथ मजबूत करती हुई नजर आती हैं। 

प्रेमचंद के नारी पात्र दिन-ब-दिन और मजबूती के साथ मुखर रूप से सामने आ रहे हैं। चाहे वह निर्मला के नारी पात्र हो या कर्मभूमि की सुखदा जो अमरकांत की तुलना में ज्यादा मजबूत और विश्वास से भरीपूरी है। अमरकांत में अभी वह मजबूती और परिपक्वता नहीं आयी है। वह अपने फैसलों को लेने में अभी लड़खड़ाता नजर आ रहा है, बशर्ते प्रेमचंद के नारी पात्र इस मामले में ज्यादा सम्बल है। इस तरह के पात्रों में सबसे लोकप्रिय पात्र प्रेमचंद के अंतिम पूर्ण उपन्यास "गोदान" के नारी पात्र धनिया, मालती, गोविंदी और कुछ कुछ जगह झुनिया भी हैं। गोदान के शुरू से लेकर अंत तक "धनिया" ही ऐसी नारी पात्र है जो लगातार संघर्ष करने के साथ साथ विद्रोही तेवर दिखाती हुई नजर आती है। पूरे उपन्यास में प्रेमचंद धनिया के माध्यम से ऐसी नारी पात्र की गढ़ना करते हैं जो इस पूरे विकृत समाज से जमकर विरोध करती है और ताल ठोककर अपनी बात के न केवल रखती है कई जगह उसमें सफल भी होती हुई नजर आती है। चाहे वह झुनिया को घर से न निकालना हो, पंचायतों को फटकारना हो, होरी के भाई हीरा को गाये की हत्या का दोषी ठहराना हो, हुकुमरानो की चापलूसी करने पर होरी को फटकारना हो आदि। कई ऐसे प्रसंग है जहाँ धनिया के अतिरिक्त कोई भी नारी पात्र इतना मजबूत दिखता नहीं है।  

गाय की मृत्यु के संदर्भ में जब होरी के घर की तलाशी लेने की कोशिश की जाती है तब होरी अपनी सामाजिक मर्यादा का ख्याल रखकर महाजनों से उसे बचा लेने की भीख माँगता है, जिसपर धनिया बिगड़ती है और होरी के साथ-साथ पंचों को भी फटकारती है। दरोगा जब होरी को लूटने की कोशिश करता है तो धनिया उसे भी आड़े हाथों लेती हुई कहती है " हाँ हमने ही अपनी गाय को मार दिया है देख लिया तुम्हारा न्याय"। धनिया के इस रूप को देखकर दरोगा भी उसके दिलेरीपन की दाद देता हुआ कहता है " वास्तव में बड़ी दिलेर औरत है...।(पृ 118) 

एक अन्य स्थल पर महाजनों को लताड़ती हुई धनिया कहती है" उस दिन कोई रुपए नहीं दे रहा था आज सबके रुपए ठनाठन निकल रहे हैं। xxxx उस पर भी सूरज चाहिए। जेल जाने से सूरज नहीं मिलेगा। सुराज मिलेगा धर्म से"..। (पृ 118)


प्रेमचंद जहाँ एक ओर पंच-परमेश्वर में बूढ़ी खाला जोकि जुम्मन की मौसी होती है, के माध्यम से न्याय व्यवस्था की पुष्टि करना चाहते हैं, और खाला के मुख से कहलाते हैं कि " क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?। न्याया व्यवस्था को समाज में कायम रखना चाहते हैं वहीं अपने अंतिम उपन्यास तक आते आते वह उसी न्याय व्यवस्था और पंचायत की काली करतूतों का पर्दाफाश करते हुए नजर आते हैं। इसके साथ ही पँचायत में चली आ रही शोषण वृति और लूट-खसोट जैसी जर्जर स्थिति को भी प्रेमचंद ने खोल कर रख दिया है जहाँ गरीब- दलित-शोषित जनता को लगातार लूटा जाता है। उनके अशिक्षित होने का लाभ उठाया जाता है और तरह-तरह से उनको आर्थिक चोटें पहुँचायी जाती है।

गोदान की "धनिया" ऐसी जर्जर पंचायत व्यवस्था की धज्जियां उड़ा देती है और अपने विद्रोही तेवर दिखाती है। झुनिया को अपने घर से न निकलने पर जब पंचों द्वारा होरी के परिवार पर 100 रूपए तावान लगा दिया जाता है तो उसका विरोध करती हुई धनिया कहती है " पंचों गरीब को सताकर सुख न पाओगे, इतना समझ लेना।(पृ 131)

मालती को प्रेमचंद नए युग की महिलाओं के प्रतिनिधि के रूप में दिखाते हुए मालती के मुख से कहते हैं " नई युग की महिलाएँ मर्दो का सहारा नहीं चाहती बल्कि उन्हें बराबर चुनौती देती हैं और हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं"...।

रामविलास शर्मा के अनुसार गोदान की मुख्य समस्या "कर्ज की समस्या है" जिससे उपन्यास का लगभग कोई भी पात्र अछूता नहीं है। विशेष तौर पर गरीबों, दलितों पर इस समस्या का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। किसानों की दुर्गति का तो कारण ही कर्ज रहा है। इसी समस्या से जूझते हुए होरी कहता है कि " कर्ज वह मेहमान है जो एक बार गला पड़ जाए तो जीवन भर नहीं जाता"..। प्रेमचंद अपने जीवन के अंतिम दिनों में खुद भी कर्जो से मुक्त नहीं थे। उन्हें भी आर्थिक तंगी ने झिंझोर कर रख दिया था इसलिए भी गोदान में कर्ज की समस्या इतनी स्वाभाविकता और दृढ़ता के साथ उभर कर सामने आई है। गोदान के अंतिम पृष्ठों  की रचना करने के समय बम्बई से प्रेमचंद जैनेंद्र जी को एक पत्र लिखते हैं " कर्जदार हो गया था, कर्ज पटा दूँगा मगर कोई लाभ नहीं। गोदान के अंतिम पृष्ठ लिखने बाकी हैं परन्तु वहाँ मन नहीं जाता। सोचता हूँ यहाँ से छुट्टी पाकर अपने पुराने अड्डे पर आ जाऊं। वहाँ धन नहीं है मगर संतोष है। यहाँ तो जान पड़ता है कि जीवन नष्ट कर रहा हूँ"..। 
                                    (हंस-मई-1939, पृ 100)

इसी तरह होरी का भाई "शोभा" भी कहता है " न जाने इन महाजनों से कभी गला छूटेगा की नहीं"..।(गोदान पृ 187)

प्रेमचंद इससे पहले भी किसानी जीवन पर 2 बड़े-बड़े उपन्यास लिख चुके थे। "प्रेमाश्रम" में किसानों की बेदखली और लगान में इजाफा किया जाता है और "रंगभूमि" में किसानी जीवन के नारकीय जीवन का स्तर और बढ़ जाता है। "कर्मभूमि" में बढ़ते हुए आर्थिक संकट और किसानों की लगानबन्दी की लड़ाई चल रही है। परन्तु कर्ज की सबसे बड़ी और त्रासद पूर्ण छवि गोदान में जाकर पूर्ण होती है। जहाँ इसी कर्ज के चलते होरी का पूरा परिवार न केवल नारकीय जीवन जीने को मजबूर हो जाता है बल्कि एक किसान (होरी) अपने सबसे सम्बल हथियारों गाय-बैल तक को खो देता है और अपने पुश्तैनी घर को भी नीलाम कर चुका होता है। एक समय पर जो अपने ही 5 बीघा जमीन का मालिक होता है, वहीं कर्ज का फंदा उसे उसी की जमीन पर मजदूर बनाकर अंततः उसी जमीन पर उसकी मौत का कारण भी बन जाता है।

वैसे तो गोदान को किसानी जीवन पर अभी तक का हिंदी में सबसे बड़ा ग्रँथ माना जाता है और प्रेमचंद की कीर्ति स्तम्भ का आधार भी इसी कृति को  दिया जाता है। बावजूद उसके इस कृति में प्रेमचंद के सबसे ज्यादा व्यक्तित्व की झलक दिखाई दी है। इसमें उनके किसानी समस्याओ, पूंजीवाद के विरुद्ध के रवैये, नारी समस्याओ से लेकर उन्हें सम्बल बनाने तक कि कथा, कर्ज से मुक्ति की कामना और उससे होने वाली मुसीबतों का वर्णन, मजदूरों से लेकर मिल मालिकों तक का षड्यंत्र, नारी के विद्रोही स्वर की सबसे ऊँची ध्वनि भी इसी उपन्यास में देखने को मिलती है। सब मिला जुलाकर इस समूचे उपन्यास में प्रेमचंद की वैचारिकता सबसे ज्यादा खुलकर मुखर हुई है इसी कारण प्रेमचंद की जितनी भी कृतियां रही हैं उनमें सबसे ज्यादा गोदान को ही उनके व्यक्तित्व को समझने में सहायक माना गया है।

नियतिवाद का जितना खुलकर विरोध गोदान में किया गया है उतना प्रेमचंद के किसी उपन्यास में नहीं  किया गया। होरी के माध्यम से नियतिवादी मनुष्यों की क्या स्थिति होती है उसका जीता जागता उदहारण होरी का चरित्र है। अपने जीवन के अंतिम वर्षो में प्रेमचंद भी आदर्श की भूमि को तिलांजलि देकर यथार्थ की भूमि पर चलने लगे थे। प्रतीत होता है कि होरी में प्रेमचंद अपनी छवि दिखा रहे हों। प्रेमचंद ने 1930 के बाद के साहित्य में यथार्थ के सबसे ज्यादा और प्रभावी रूप से दर्शन कराए हैं। चाहे वह "कफ़न" कहानी हो, या "कर्मभूमि और गोदान" जैसे उपन्यास। होरी पूरी जिंदगी अपनी तकदीर को ही कोसता रहता है और सोचता है कि उसके कर्मो का ही फल है कि उसके साथ ये सब हो रहा है। वहीं दूसरी और प्रेमचंद "गोबर" और "धनिया" जैसे पात्र रखकर नियतिवाद के सामने उसको चुनौती देने का कार्य करते हैं। जहाँ वह किसी की गुलामी नहीं सहना चाहते और न ही ईश्वर के भरोसे रहना चाहते हैं। अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने के प्रमाण प्रेमचंद के इन पात्रों में दिखते हैं।

प्रेमचंद "रायसाहब" जैसे पात्रों के माध्यम से बताना चाहते हैं कि इन जैसे जमींदारों से विशेष सावधान रहने की आवश्यकता है जो ऐसे सिंह हैं, जो गुर्राने और गरजने की जगह मीठी बोली बोलकर अपना शिकार मारते हैं। गोदान की प्रतुत पंक्तियों में इस बात को अच्छे से समझा जा सकता है " सिंह का काम तो शिकार करना है, अगर वह गुर्राने और गरजने के बदले मीठी बोली बोलने लगे तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता है"...। 

प्रेमचंद रायसाहब के माध्यम से गाँव के ऐसे जमींदारों के चरित्र को उभारने में सफल हुए हैं जो ऊपर से तो मानवतावादी हैं परन्तु अंदर से उनमें अभी भी पशुता शेष है। इसे समझने के लिए "गोदान" की पंक्तियों को थोड़ा ध्यान से समझना होगा। "जहाँ एक ओर तो रायसाहब किसानों और होरी के प्रति, अपनी प्रजा के प्रति सहानुभूति रखते हैं और यहाँ तक कह देते हैं कि " मैं उस आदमी को आदमी नही समझता जो देश के लिए उद्योग और बलिदान न दे"...। वहीं होरी के जाते ही असामियों को उनकी औकात याद दिलाते हुए कहते हैं कि "चलो मैं इन दुष्टों को ठीक करता हूँ। जब कभी खाने को नहीं दिया तो आज यह नई क्यों ? xxxx एक आने रोज पर मंजूरी मिलेगी जो हमेशा मिलती है;, इस मंजूरी में काम करना होगा, चाहे सीधे करें या टेढ़े"...। 

होरी जैसे पात्रों के सामने रायसाहब जैसे जमींदार अपना ऐसा व्यवहार इसलिए दिखाते हैं कि वह होरी जैसे कमजोर आदमियों की नस को पहचानते हैं। वह जानते हैं कि किस आदमी के आगे कैसे पेश आना है। यदि वह यह भी न कर सके तो काहे के जमींदार और मालिक।

अपनी पुस्तक "प्रेमचंद और उनका युग" के "सम्पादक- विचारक और समालोचक" शीर्षक में रामविलास शर्मा "हंस" के द्विवेदी अभिनंदनांक में सम्पादकीय कलम से जो शब्द महावीरप्रसाद जी के  लिए लिखे गए थे वह बहुत कुछ बढ़-घट कर प्रेमचंद के लिए भी हो गए हैं। इस सम्बंध में रामविलास शर्मा  कहते हैं"

"स्वभाव से अत्यंत सिद्ध-प्रतिज्ञ और हृदय से परम् कोमल, ये हमारे अपने हैं, इस बात को हिंदी जगत उसी दिन मान गया था जब ये सरस्वती में थे। उन दिनों ये हम सबको पिता की तरह शासित किया करते थे और माता की तरह प्यार! ये हेनरी गलतियों पर फटकारते थे, उन्हें प्रेम पूर्वक सुधार देते थे और हमारी सफलता पर हमें प्रेम के मोदक भी खिलाते थे। इन्होंने ने हमें ठोक ठोककर पढ़ाया और पुचकार पुचकार कर आगे बढ़ाया"...। इस लेख को प्रेमचंद ने 1933 में प्रकाशित किया था जब वह स्वयं चोटी के लेखक हो चुके थे। बावजूद उसके महावीरप्रसाद जी को गुरु की नजरों से देखते और उस समय भी बराबर उनसे प्रेरणा लेते और अपना मार्ग प्रशस्त करते। 

ठीक इसी प्रकार से प्रेमचंद भी अन्य साहित्यकारों को फटकारते, समझाते-बुझाते,बराबर प्रेरणा देते और उनका मार्गदर्शन करते थे।  उनके समझाने और डाँटने का तरीका थोड़ा अलग था। इसका एक नमुम देखिए जब वह कथाकार "सुदर्शन" को डाँटते हैं  " मैं तो समझता था आप फ़ारग-उल-बाल होकर अदब की ज़्यादा खिदमत करेंगे, मगर मेरा ख्याल गलत निकला। अब महीनों गुज़र गए आपके लेख ही अख़बार में प्रकाशित नहीं होते। xxxxxx कुछ-न-कुछ तो लिखते रहिए। इससे अच्छा तो वह तंगदस्ती अच्छी थी जो आपसे कुछ लिखवाती रहती थी"..। यह बात 1927 की होगी जब प्रेमचंद हंस के सम्पादक नहीं थे। परंतु वह किसी को फटकारने और सलाह-मशविरा देने, प्रेरणा देने के लिए खुद को किसी तरह के औदे पर विराजमान होना जरूरी नहीं समझते थे। वह एक युग निर्माता के साथ-साथ अच्छे साहित्यकार भी थे इसलिए किसी अच्छे साहित्यकार को चुप देखकर वह बिगड़ जाते थे। इससे पता चलता है कि प्रेमचंद समाज और साहित्य के लिए कितने संवेदनशील थे। उन्हें सदैव समाज और समाज में रहने वालों की चिंता खाई रहती थी। वह हमेशा ही समाज में व्याप्त समस्याओं पर विचार-विमर्श करते रहते थे और अन्य साहित्यकारों व पत्रकारों को भी इसके लिए जोड़े रहते थे। 


प्रेमचंद शिक्षा के महत्व को स्वीकार भी करते हैं और उसकी माँग की पूर्ति के लिए कर्म भी करते हैं। उन लोगों की तरह नहीं जो केवल मुँह से शिक्षा और राष्ट्र हित की बात कहते हैं। प्रेमचंद ऐसे विषयों पर खुलकर सामने आते हैं, साथ ही अन्य लोगों से अपील करते हैं कि वह भी बढ़-चढ़कर अपनी सहभागिता प्रदर्शित करें। प्रेमचंद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समाज की देखभाल करते हैं और अपने देश की जरूरतों पर भी ध्यान रखते हैं। शिक्षा के महत्व को समझते हुए उसके प्रमाण के तौर पर वह एक आँकडा रखकर अपने देश के पूंजीपतियों से सवाल करते हैं और " सोवियत रूस में प्रकाशन" टिप्पणी में प्रेमचंद 1927 तक के आंकड़े देते हुए कहते हैं कि " रूस की जनसँख्या 12 लाख के आसपास है और वहाँ 6 करोड़ तक पुस्तकें हैं । फिर हिंदुस्तान की गुलामी और यहाँ की उदासीन जनता को देखते हुए कहते हैं कि " यहाँ 1930 में अंग्रेजी में 2332, हिंदुस्तानी भाषाओं में 24825 पुस्तकें निकली हैं"...। प्रेमचंद यहाँ यह दिखाना चाहते हैं कि किसी भी देश की उन्नति के लिए वहाँ की शिक्षित जनता का होना कितना अनिवार्य है। जिस देश की जनता लगभग 25 करोड़ के आसपास हो वहाँ पुस्तकों की सँख्या लाख में भी नहीं है और जहाँ कुछ लाखों की जनसँख्या है वहाँ करोड़ो में पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। इसका मुख्य दोषी प्रेमचंद जनता को नहीं मानते बल्कि उस बड़े तबगे को मानते हैं जो सम्पत्तिशाली होकर भी शिक्षा के प्रति ऐसी विरक्ति अपना रहे हैं। जब तक इस वर्ग का पैसा शिक्षा के लिए खर्च नहीं होगा तबतक किसी भी देश की उन्नति में आने वाली बाधाएं यूँही बरकरार रहेगी। क्योंकि आर्थिक आधार का मजबूत होना किसी भी व्यवस्था के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। यदि आपके पास धन की कमी है तो आप चाह कर भी अच्छी शिक्षा नहीं ले सकते। अब चाहे उस धन का बंदोबस्त सरकार करे, कोई संस्था करे या स्वयं पाठक वर्ग करे परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में पूँजी को निवेश करना अनिवार्य है। 
               
            

वैसे तो प्रेमचंद के कथा साहित्य में कोई भी ऐसा विषय नहीं बचा होगा जिस पर प्रेमचंद की कलम न चली हो। चाहे वह विषय सामाजिक हों या राजनीतिक, राष्ट्रवाद से जुडे हों या महिलाओं के सम्मान और उनकी स्थितियों से, चाहे वह धार्मिक आडम्बरों पर प्रहार करने से जुड़े हों या भारतीय संस्कारो की सुरक्षा करने से। सभी तरह के विषयों को प्रेमचंद ने अपने साहित्य में जगह दी है। इसलिए वैश्विक स्तर पर उनका प्रसार प्रचार हुआ और वह समूचे जनमानस के हृदयपटल पर छाये रहे। बावजूद उसके अगर प्रेमचंद को किसी एक वर्ग के साथ जोड़कर देखा जाए तो, वह मुख्य रूप से किसानों से जुड़ते हुए नजर आएंगे। अपने सबसे प्रसिद्ध उपन्यास "गोदान" जिसे कृषक-जीवन का महाग्रन्थ कहा जाता है, इस आधार पर भी प्रेमचंद को किसानी जीवन से जुड़ा हुआ माना जाना चाहिए। अपने इस उपन्यास में प्रेमचंद ने जितनी गहराई तक किसानी जीवन को उभारा और उसकी समस्याओं की तह तक जाकर वहाँ से यथार्थ को दिखने में सफलता पाई है उतनी शायद किसी साहित्यकार को नहीं मिली हो। प्रेमचंद के किसानों-मजदूरों-दलितों पर लिखे गए साहित्य को याद करते हुए अपने  "प्रेमचंद और अमर्त्य सेन" नामक लेख में शम्भूनाथ जी कहते हैं " भले ही अमर्त्य सेन और प्रेमचंद दोनों अलग अलग युग के बुद्धिजीवी हैं परन्तु दोनों के कार्यों में बराबर समानता देखने को मिल जाएगी। दोनों ने ही गरीबों, किसानों, दलितों के लिए अपना लेखन न्यौछावर कर दिया है। 1919 में प्रेमचंद किसानी जीवन के हालातों पर और उनकी समस्याओं पर ध्यान दिलाते हुए उनके महत्व को स्वीकार करते हुए कहते हैं" क्या यह शर्म की बात नहीं है कि जिस देश में 90% किसान हो वहाँ कोई भी किसान सभा, किसान विद्यालय, किसान आंदोलन, उनके लिए कॉलेज, यूनिवर्सिटी नहीं हो? आज तक जो भी स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी खोली गई है वह किसके लिए? ...।  इस सवाल से न केवल वह किसानी जीवन को अपने साहित्य का आधार बनाना चाहते हैं बल्कि उन गरीबों को भी अपने साहित्य में स्थान देते हैं जिन्हें विकास की मुख्यधारा से वंचित किया जा रहा है। इस वर्ग के लिए प्रेमचंद के हृदय में विशेष सम्मान है।



अपने कथा संग्रह "प्रेम-द्वादशी" की भूमिका में प्रेमचंद कहते हैं " हमने उपन्यास और गल्प का कलेवर यूरोप से लिया है परन्तु हमें यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसका कलेवर भारतीय आत्मा में सुरक्षित रहे"..।

रेणु प्रेमचंद को इकलौता ऐसा कथाकार मानते हैं जो न केवल कलम से बल्कि काया से भी स्वाधीनता आंदोलन में भागीदारी लिया करते थे। इस बात की पुष्टि कई आलोचक और स्वयं उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने भी उन पर लिखी जीवनी  "प्रेमचंद:घर में" में कर चुकी हैं।



 प्रेमचंद के लेखन से प्रभावित होकर मन्नू भंडारी BBC हिंदी में प्रकाशित विनोद वर्मा के साथ हुए साक्षात्कार " रचना दृष्टि की प्रासंगिकता-मन्नू भंडारी" में मन्नू भंडारी बताती हैं कि " साहित्य और साहित्य के हर दृष्टि के प्रति यानी चाहे राजनीतिक, सामाजिक,पारिवारिक सभी को उन्होंने जिस तरह अपनी रचना में समेटा और खासकर एक आम आदमी को, एक किसान को, दलित को वह अपने आप मे एक उदाहरण था। साहित्य में दलित विमर्श की शुरुआत प्रेमचंद जी से ही हुई"...।



एक अन्य जानकारी जोड़ते हुए हम यह बताना चाहते हैं कि वैसे तो कथाकार सम्राट प्रेमचंद और महाकवि प्रसाद दोनों औपचारिक रूप से एक दूसरे से लंबे समय तक मिले नहीं थे, हाँ लेकिन दोनों एक-दूसरे का नाम अवश्य जानते थे। दोनों एक दूसरे के लेखन से भी परिचित थे। भले ही प्रेमचंद, प्रसाद के लेखन पर कभी-काल आलोचना भी कर देते थे और यहाँ तक कह चुके थे कि "साहित्य में कुछ लोगों ने गड़े मुर्दे उखाड़ने का जिम्मा उठा रखा है"..। बावजूद उसके प्रेमचंद उनकी प्रसंशा भी करते रहते थे। साहित्य में उनके योगदान का महत्व भी स्वीकारते थे। हिंदी साहित्य के इन दोनों महानुभावों का परिचय एक डॉक्टर की दुकान पर शायराना अंदाज़ में हुआ था जहाँ प्रेमचंद कहते हैं 

"काबा में, कलीसा में, बुतखाने में या दिल में 
है होश मुझे इतना तुझको कहीं देखा है।

जवाब में प्रसाद कहते हैं" इस कक्ष में प्रवेश करते ही परिचित से जाने कब के, तुम लगे उसी क्षण हमको"...।


प्रेमचंद को दी गयी उपाधियाँ :-

1 कलम का सिपाही- उनके सुपुत्र अमृतराय द्वारा।
2 कलम का मजदूर- लेखक मदन गोपाल द्वारा।

3 स्वाधीनता आंदोलन का कथाकार- आलोचक रामविलास शर्मा द्वारा।


सन्दर्भ सूची:-

1 प्रेमचंद:घर में, शिवरानी देवी, सरस्वती प्रेस, बनारस प्रकाशक, 1944..।

2 कुछ विचार - प्रेमचंद - प्रथम संस्करण -1939 -उस्मानिया विश्विद्यालय पुस्तकालय, वॉल्यूम 1- सरस्वती प्रेस- बनारस।

3 प्रेमचंद और उनका युग, रामविलास शर्मा, मेहरचंद मुंशीराम प्रकाशक, मुद्रक नेशनल प्रिंटिंग वर्क्स, 1952..।

4 प्रेमचंद:एक विवेचना, इंद्रनाथ मदान, राजकमल प्रकाशन।

5 गोदान, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2018..।

6 NCERT द्वारा प्रेमचंद पर रेडियो फीचर की प्रस्तुति।

7 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचंद्र तिवारी, पृ-190, विश्विद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।

8 प्रेमचंद और अमर्त्य सेन, शम्भूनाथ, हिंदी समय वेबसाइट।

9 साहित्य ही बन गया था आजादी की लड़ाई की मशाल, जनचौक वेबसाइट।

10 साहित्य कोष-भाग -2, डॉ हरदेव बाहरी, पृ 357, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी।

11 रचना दृष्टि की प्रासंगिकता- मन्नू भंडारी, साक्षात्कार, BBC मूल से 7/08/2007..।

12 प्रेमचंद विकिपीडिया।


2 comments:

  1. बेहतरीन पोस्ट।।।प्रेमचंद के साहित्य को समग्रता में समेटने का प्रयास किया गयाहै। अनछुए पहलू इस पोस्ट को और अधिक पठनीय बना देते हैं।

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  2. शुक्रिया आपका और आपके कमेंट का। इससे ब्लॉगर को प्रोत्साहन मिलता है। उम्मीद करता हूँ आगे भी आपको ऐसे ही पठनीय व अच्छे पोस्ट शेयर करता रहूँगा । 😊🙏

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