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Monday, December 28, 2020

हिंदी भाषा : भाग 7

हिंदी भाषा का विकास :

 

                                (लिपि)

● कामताप्रसाद गुरु के अनुसार :- "लिखित भाषा में मूल ध्वनियों के लिए जो चिन्ह मान लिया गया है वह भी वर्ण है परन्तु वह जिस रूप में लिखें जाते हैं वह लिपि कहलाता है"..।

● लिपि का विकास :- चित्रलिपि - प्रतिलिपि - भावलिपि - ध्वनिलिपि..।

● ध्वनिलिपि के 2 रूप हैं :- 

1 अक्षरात्मक लिपि - भारत की सारी लिपियाँ इसी रूप में है।

2 वर्णात्मक - रोमनलिपि वर्णात्मक रूप में है।


● भारत की प्राचीन लिपियाँ सिंधुघाटी लिपि, खरोष्ठी लिपि और ब्राह्मी लिपि है। ब्राह्मी लिपि की उत्तरी शैली से ही "देवनागरी लिपि" निकली है।

A "सिंधुघाटी लिपि" का प्राचीन नमूना हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता की शिलाओं पर मिलता हैं।

B "खरोष्ठी लिपि" का प्राचीन नमूना पंजाब के मानेसर और अशोक के अभिलेखों में मिलता है। यह दाएँ से बाएँ की तरफ लिखी जाती है। इसे ब्राह्मी लिपि का प्राचीन रूप भी कहा जाता है।

C "ब्राह्मी लिपि" के प्रचीन नमूने बस्ती जिले के पिपराला के स्तूप में मिलता है। यह बाएँ से दांएँ की और लिखी जाती है।इसके अर्थ और उतपत्ति के भी विभिन्न मत हैं। कोई इसे भारत से उत्पन्न मानता है तो कोई इसे विदेशी।


● ब्राह्मी लिपि के निर्माण सम्बंधी मत :-

1 यह ब्रह्मा द्वारा बनाई गई है।

2 ब्रह्म वेद(ज्ञान) की रक्षा के लिए बनाई गयी थी।

3 ब्राह्मणों द्वारा निर्मित लिपि।

4 चीनी विश्वकोश द्वारा यह किसी ब्रह्म ऋषि के आधार पर बनाई गई है।


◆ ब्राह्मी लिपि के भारत में उत्तपन्न होने पर मत :-

1. भोलानाथ तिवारी के अनुसार  "हडप्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता से निकली"..।

2. राजबलि पांडेय के अनुसार "सिंधुघाटी सभ्यता से उतपन्न"..।

3. कनिघम व डाउनसन के अनुसार  "आर्यो की पुरानी चित्रलिपि से विकसित..।


◆ ब्राह्मी लिपि के विदेश में उतपन्न होने पर मत :-

1. डॉ वुलर के अनुसार "उत्तरी सामी से विकसित"..।

2. जेम्स पिपेस के अनुसार "यूनानी से उतपन्न"..।


●देवनागरी लिपि के नामकरण पर अनेक मत:-

1पाटलिपुत्र को नागर और चन्द्रगुप्त को देव कहने से देवनागरी नाम पड़ा।

2 गुजरात के नागर ब्राह्मणों के नाम पर पड़ा।

3 "धीरेंद्र वर्मा" के अनुसार मध्ययुग के स्थापत्य की एक शैली का नाम नागर होने से "नागरी" नाम पड़ा।

4 सर्वप्रथम 7-8वी शती गुजरात के राजा "जयभट्ट" के एक शिलालेख में मिलता है।


 ●लिपि सुधार सम्बन्धी सुझाव:-

1. सर्वप्रथम बम्बई राज्य के "महादेव गोविंद रनाडे" ने लिपि सुधार समिति गठित की और सुधार का प्रस्ताव पेश किया।

2. महाराष्ट्र साहित्य परिषद पुणे ने लिपि सुधार योजना बनाई।

3. बालगंगाधर तिलक ने अपने पत्र "केसरी" 1904 में देवनागरी लिपि के सुधार की बात कही।

4. सावरकर बन्धुओ ने 12 खड़ी की शुरुआत की।

5. श्यामसुंदर दास ने पंचम वर्ण के साथ पर "अनुस्वार" (.) के प्रयोग पर बल दिया।

6. हिंदी साहित्य के इंदौर अधिवेशन 1935 में  "नागरीलिपि सुधार समिति" की स्थापना गाँधी के सभापतित्व में हुई।

7 "नागरीलिपि सुधार समिति" का निर्माण 1947 आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में हुआ। इस समिति की 9 बैठक हुई जिसकी रिपोर्ट 1949 में पेश की।

8 सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 1953 की "लिपि सुधार परिषद" का गठन हुआ।

9 शिक्षा मंत्रालय के देवनागरी लिपि सम्बन्धी प्रकाशन 

• मानक देवनागरी वर्णमाला (1966)  

• हिंदी वर्तनी का मानकीकरण (1967) 

• देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण (1983)


●देवनागरी लिपि का हिंदी भाषा में अधिकृत लिपि के रूप में विकास:-

देवनागरी लिपि को आधिकारिक स्थान मिलने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। इसके लिए न सिर्फ अंग्रेज़ो ने बल्कि हमारे देश के लोगों ने भी पूरा पूरा समर्थन भी दिया और उसकी आधिकारिक स्वीकृति के लिए तत्पर रहे। अंग्रेज़ो द्वारा हिंदी का फ़ारसी लिपि में प्रचार करना सही मायने में उर्दू का प्रचार था क्योंकि उनका सारा कार्यालयी काम फारसी में होता था और एक दम से नई लिपि को लाना और सीखना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता था। इसलिए वह फ़ारसी के समर्थन में ही रहते थे। लेकिन कुछ समय बाद से उनकी तरफ से देवनागरी लिपि के प्रयोग के लिए भी प्रयास होने लगे और लंबे समय बाद 1900 में मदनमोहन मालवीय जी के अथक प्रयासों से अदालती भाषा और राजकाज की भाषा के लिए देवनागरी लिपि को भी साथ अपनाया गया।

1. फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रथम अध्यक्ष "जॉन गिलक्राइस्ट" के समय में 3 तरह की शैलियाँ बोली जाती थी।  दरबारी या फारसी शैली, हिंदुस्तानी शैली, हिंदवी शैली। फारसी शैली इनके लिए दुरूह (मुश्किल) थी क्योंकि प्रयोगकर्ता सीमित थे। हिंदवी को यह गँवारु भाषा मानते थे इसलिए उन्होंने हिंदुस्तानी का चयन किया। वैसे सही दृष्टि से यह उर्दू का ही प्रचार था क्योंकि इस भाषा में अरबी फारसी की शब्दावली बहुत थी।

2. "कैप्टन विलियम प्राइस" की नियुक्ति फोर्ट विलियम कॉलेज, हिंदी विभाग के लिए 1823 में हुई थी और उन्होंने ही सबसे पहले नागरी लिपि में लिखने पर बल दिया। इन्होंने जॉन गिलक्राइस्ट द्वारा भाषा सम्बन्धी भ्रांति को दूर किया।

3. अदालत सम्बन्धी विज्ञप्ति (1837) :- 1830 ई. में अदालत ने देशी भाषाओं को भी अदालत में मंजूरी दे दी। वास्तव में इस विज्ञप्ति के इस्तेमाल के बाद से ही अदालतों में देशी भाषाओं को सम्मान मिला। परन्तु लिपि के आधार पर फ़ारसी ही कायम थी। देवनागरी लिपि के लिए न केवल अदालत बल्कि शिक्षा क्षेत्र से भी उसे हटाने के लिए आंदोलन होने लगे और आगे चलकर हिंदी और उर्दू के 2 भेद हो गए। जिसे बढ़ाने में केवल उर्दू के समर्थक ही मुसलमान ही नहीं थे बल्कि अंग्रेज़ो ने भी इस विवाद को बढ़ाने में कली कसर नहीं छोड़ी। जो आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम के समय में साम्प्रदायिक रूप लेने लगा और दंगे होने लगे जिसका प्रभाव आजतक बना है। 

इस विज्ञप्ति के दैरान हिंदी का प्रचार तो हुआ परन्तु उसकी लिपि को स्वीकारा नहीं गया बल्कि विरोध भरपूर तरीके से हुआ।

4. सितारे हिंद का लिपि सम्बन्धी प्रतिवेदन :- सर्वप्रथम "शिवप्रसाद सितारे हिन्द" ने नागरी लिपि के लिए 1868 में लिपि सम्बन्धी "मेमोरेण्डम कोर्ट कैरेक्टर इन द अपर प्रोविन्स ऑफ इंडिया" से आरम्भ हुआ।

5. बंगाल गवर्नर ऐशले का आदेश पत्र (1870)  :- इस पत्र के आधार पर देवनागरी लिपि का समर्थन किया गया था जिसमें कहा गया था कि अदालत की भाषा ऐसी हो कि जिस हिंदुस्तानी को पूर्णता फारसी नहीं आती उसके लिए भी ऐसी भाषा का प्रयोग हो जो कम से कम बोली जाती हो। वह उसको समझ भी पाता हो। और 1873 में बंगाल सरकार ने पटना, भागलपुर, और छोटा नागपुर डिवीजनों के लिए ऐसी भाषाओं के इस्तेमाल के लिए पत्र जारी किया।

1881 तक मध्यप्रदेश और बिहार जैसे प्रांतों में भी देवनागरी लिपि और हिंदी को सरकारी आज्ञा मिली। उत्तरप्रदेश में नागरी आंदोलन को बड़ा सम्बल मिला।

6. मेरठ के प.गौरीदत्त ने देवनागरी के प्रचार के लिए कई पत्र निकाले जैसे - 1874 "नागरी प्रकाश", 1888 में "देवनागरी गजट" , 1891 में "देवनागर" , "देवनागरी प्रचारक" 1892 आदि।

7. अधुनिक हिंदी साहित्य की चाहे कोई सी भी विधा हो, कोई आंदोलन हो, किसी तरह की जन जागरूकता सम्बन्धी बात हो , पत्रकारिता से जुड़ी कोई बात हो या देवनागरी लिपि के प्रयोग के लिए किये गए प्रयास, उन सभी में भारतेंदु हरिश्चन्द्र का सहयोग अविस्मरणीय माना जाता रहा है। ठीक इसी तरह से 1882 में शिक्षा आयोग के प्रश्न पत्र का जवाब देते हुए भारतेंदु कहते हैं कि " सभी सभ्य देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग होता है। और यहाँ पर न उस भाषा को बोला जाता है जो न तो यहाँ की प्रजा की बोली है और न ही अदालत के शासकों की मातृभाषा"..।

8. प्रतापनारायण मिश्र ने "हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तानी" का नारा दिया।

9. नागरी प्रचारिणी सभा व मदनमोहन मालवीय :-  1893 काशी में नागरी लिपि और हिंदी भाषा के संवर्धन के लिए इस संस्था की स्थापना की थी। सर्वप्रथम कचहरी में हिंदी और देवनागरी लिपि के प्रवेश को ही अपना मुख्य काम माना। सभा ने "नागरी कैरेक्टर" नामक पुस्तक अंग्रेजी में तैयार की जिसमें भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि की अनुपयुक्तता पर प्रकाश डाला गया था।

1898 ई. में मालवीय जी के नेतृत्व में 17 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल द्वारा लेफ्टिनेंट गवर्नर एंटोनी मैकडानल को याचिका या मेमोरियल दिया।

मालवीय जी ने एक स्वतंत्र पुस्तक 1897 में "कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजुकेशन इन नार्थ- वेस्टर्न प्रोविंसेज" निकाली जिसका बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। उसी समय 1898 में तत्कालीन लेफ्टिनेंट गर्वनर काशी आने पर मालवीय जी के नेतृत्व में सभा द्वारा हजारों हस्ताक्षरों द्वारा एक मेमोरेंडम पास करवाया तब जाकर अंततः 18 अप्रैल 1900 में देवनागरी लिपि को और हिंदी को भी अदालत का आधिकारिक दर्जा प्राप्त हुआ।  परन्तु इसके बाद भी एक बड़ी लड़ाई जीतनी थी। हाँ खुशी की बात यह थी कि राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए अब एक राष्ट्रीय भाषा मिल चुकी थी।

10. शारदा चरणमित्र :- ये देवनागरी लिपि के प्रथम प्रचारक थे। कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश "शारदा चरण" ने अगस्त 1907 में "एक लिपि विस्तार परिषद" का गठन किया। इसी के अतिरिक्त 1907 में "देवनागर" पत्र निकाल कर भारत की सभी भाषाओं के साहित्य को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करने का उपक्रम रचा। इस पत्र से प्रोत्साहन पाकर भिन्न भिन्न भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखा जाने लगा। 

11. नेहरू रिपोर्ट : 1928 में आई नेहरू रिपोर्ट के अनुसार हिंदी या हिंदुस्तानी जो भी भाषा बोली जाती है वह देश की राजभाषा होगी। परन्तु सही मायने में यह द्वैत की स्थिति थी और विवादस्पद भी।

12. हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर 1949 को मिला जिसके अनुच्छेद343 (1) में स्पष्ट लिखा है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी और देवनागरी लिपि"..। 1800 से 1949 तक के 150 साल के लंबे प्रयास के बाद हिंदी को संवैधानिक रूप से स्वीकृति मिली।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

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