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Saturday, January 16, 2021

आदिकाल भाग -2


आदिकालीन साहित्य

                     

                          ( जैन साहित्य)


●आदिकालीन जैन-साहित्य मूलतः धर्म, आस्था , लोक कथाओं, मिथकों आदि पर रचित काव्य है जोकि सिद्ध, नाथ, रासो आदि में सबसे ज्यादा प्रमाणिक काव्य माना गया है। इस साहित्य का मूलतः स्थान पश्चिमोत्तर भारत का माना जाता है।इन्होंने पुराण काव्य की भी रचना की है जैसे:-


(अपभ्रंश में )

स्वयम्भू - पउम चरिउ

पुष्पदंत - आदिपुराण (महापुराण)

विमलसुरी - पउम चरियम            


●इनकी कवियों की काव्य परम्परा कुछ इस तरह से है :-

जोइन्दु > स्वयम्भू > देवसेन > पुष्पदंत > रोड़ा कवि > मुनिरामसिंह > अब्दुर्रहमान > हेमचन्द्र > मेरुतुंग > लक्ष्मीधर ।


● "जोइन्दु" का जन्म 6ठी शती के आसपास माना जाता है  जिन्हें "दोहा शैली" का प्रथम प्रयोक्ता माना जाता है। इनकी दो प्रसिद्ध रचना है:- परमात्म प्रकाश और योगसार

● "स्वयम्भू" को अपभ्रंश का वाल्मीकि और व्यास कहा जाता है। इन्होंने एक प्रबन्धग्रन्थ "पउम चरिउ" की रचना की थी जिसको पूरा उनके पुत्र त्रिभुवन ने किया था। यह महाकाव्य रामकथा पर आधारित है।

डॉ रामकुमार वर्मा इन्हें अपभ्रंश भाषा के प्रथम कवि मानते हैं। और राहुल जी इन्हें अपनी पुस्तक "हिंदी-काव्यधारा" में 8वी शती का सबसे बड़ा कवि मानते हैं। परंतु रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस बात पर यह विवाद खड़ा किया है कि यह अपभ्रंश के कवि है न कि हिंदी के।

● डॉ नगेन्द्र "देवसेन" को हिंदी का प्रथम कवि मानते हैं। इन्होंने 933ई. में "श्रावकाचार" नामक एक ग्रन्थ की रचना की थी जिसमें श्रावक धर्म के बारे में लिखा है।

इनके शिष्य माइल धवल की रचना "द्रव्य-प्रकाश-स्वभाव" पहले अपभ्रंश में थी और अब हिंदी में मौजूद है।

● जिस "पुष्य या पुंड" कवि को शिवसिंह सेंगर ने 7वी शती का बताया है हजारीप्रसाद जी उन्हें 9शती का बताते हैं परंतु इनका सर्वमान्य समय 10वी शती ही माना गया है जोकि शुक्ल जी भी मानते हैं। ये मान्यआखेट के प्रतापी राजा कर्ण के सभाकवि थे।

इनकी रचना "महापुराण" में 63 महापुरुषों की कथा कही गयी है।यह रचना भी रामकथा पर आधारित है।

पुष्पदन्त को "अपभ्रंश का भवभूति" कहा जाता है। ये अपने-आप को अभिमान-मेरु, कवितिलक, काव्यरत्नाकर, आदि संज्ञा से सम्मानित करते हैं। 

● "रोड़ा कवि" को 10वी शती का बड़ा कवि माना जाता है जिनकी रचना "राउरवेल" एक तरह की गद्य-पद्य मिश्रित अपभ्रंश-मैथिली की श्रृंगारिक रचना है। जिमसें एक राजा के अन्तःपुर(ह्रदय) में बसने वाली कई रानियो का वर्णन है।

● "मुनिराम सिंह" को 11वी शती का मुख्य कवि कहा जाता है जिनकी रचना "पाहुड दोहा" है। यह एक रहस्यवादी कवि थे।

● "अब्दुर्रहमान" द्वारा रचित "सन्देश रासक" एक तरह का गेय-विरह-खंडकाव्य है। जिसमें  विक्रमपुर की रानी के विरह का वर्णन है। इसमें 223 छंद हैं और इसे हिंदी का प्रथम अभारतीय या अवधी भाषा का इस्लामिक ग्रन्थ माना जाता है। इसकी रचना 12वी शती के आसपास हुई थी।


● "हेमचन्द्र" गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह केे सभाकवि थे। इन्होंने "शब्दानुशासन" की रचना 13-14वी शती के बीच की थी जोकि व्याकरण ग्रन्थ है। जिसमें संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश के दोहे और पद्ध शामिल हैं। ये उस समय के प्रसिद्ध जैन-आचार्य समझे जाते थे।

बच्चन सिंह के अनुसार इन्हें प्राकृत का पाणिनी भी कहा जाता है।

इन्होंने राजा जयसिंह के भतीजे "कुमारपाल" पर एक रचना लिखी थी जिसका नाम "कुमारपाल-प्रतिबोध" था। जिसमें उनके शौर्य और वीरता की गाथा लिखी गयी थी।

शब्दानुशासन की प्रसिद्ध पंक्ति द्रष्टव्य है:-

"भल्ला हुआ जो बहिनी मारिया गया म्हारा कंतु....."

                                                        

● "जैन-आचार्य मेरुतुंग" का ऐतिहासिक ग्रन्थ "प्रबन्ध-चिंतामणि" 14वी शती की प्रसिद्ध रचना है जिसमे राजाओं-महाराजाओ ,ऐतिहासिक कथानकों का वर्णन है।


● "लक्ष्मीधर" द्वारा रचित "प्राकृत-पैंगलम" एक तरह का छंद शास्त्र है जिसमे कई राजाओं का वर्णन है। इसमें राजा हम्मीर से लेकर विद्याधर, जज्जल, बब्बर आदि का ज़िक्र है। ये ग्रन्थ 900 से 1400ई. तक की घटनाओं को प्रस्तुत करता है। डॉ सुनीतिकुमार चटर्जी भी इन्हीं तथ्यों को स्वीकारती हैं। इसका एक अन्य नाम "पिंगल-सूत्र" भी है।


(रास ग्रन्थ)

● जैन आचार्यो द्वारा अनेक "रास ग्रन्थ" भी लिखे गए जिन्हें लौकिक साहित्य का दर्जा मिला। ये एक तरह के गेय काव्य थे जोकि शादी-विवाह, त्यौहार आदि में गाए जाते थे। जिनमें ये मुख्य रास-ग्रन्थ हैं:-

● "उपदेशरसायन रास" ये जिनदत्त सूरी द्वारा लिखा प्रथम जैन-रास ग्रन्थ है जिसका समय 1114ई. तक माना जाता है। इसमें नृत्य सम्बन्धित 150 पद्य शामिल हैं।

● "भारतेश्वर-बाहुबली रास" ये शालीभद्र सूरी द्वारा लिखा गया है। जोकि हिंदी भाषा का प्रथम रास ग्रन्थ माना जाता है। गनपतिचन्द्र इन्हें "हिंदी का प्रथम कवि" मानते हैं। इसमें 205 पद्य हैं और इसका सम्पादन मुनिजिन विजय ने किया था।

● "चंदनबाला रास" आसगु द्वारा रचित 35 छन्दों का लघु-खंडकाव्य है जोकि 13वी शती में आया था। इसका अन्य नाम "जीवदया-रास" भी है।

● "रेवंतगिरी रास" में तीर्थंकर रेवंतगिरी और नेमिनाथ की प्रतिमा व महत्व का वर्णन है। इसकी रचना विजयसेन सूरी में 13वी शती में की थी।

इन जैन कवियो ने फागु साहित्य की भी रचना की थी। ये एक तरह का "ऋतु वर्णन काव्य" होता था जिसमें "वसन्त ऋतु" का विशेष वर्णन होता था। इसका प्रसिद्ध उद्धरण जिनदत्त सूरी का "जिनचन्द सरिफाग" है।


सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018                                      


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