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Friday, February 5, 2021

भक्तिकाल भाग : 3

                                                     

                         (भक्तिकाल)


भक्तिकालीन साहित्य पर चल रही तथ्यात्मक जानकारी में यह क्रम जारी है। जिसके अंतर्गत आज कुछ अन्य जानकारी देने की कोशिश की जा रही है। आशा करते हैं कि आपके लिए यह जानकारी लाभदायक सिद्ध होगी।

 भक्तिकाल में लिखे साहित्य पर आज जिस विषय की हम चर्चा कर रहे हैं वह निर्गुण काव्यधारा व उसकी एक शाखा "सन्त काव्यधारा" का परिचय भर है। जिसकी विस्तृत चर्चा हम आगे आने वाले अपने अन्य लेखों में करेंगे। फिलहाल निर्गुण काव्यधारा व सन्त काव्यधारा का एक सामान्य परिचय देकर यहाँ इस विषय का श्रीगणेश किया जा रहा है। लेकिन इस भक्ति परम्परा का किस प्रकार से उत्तर भारत में आना सम्भव हुआ और हिंदी के प्रथम भक्तिकालीन कवि "नामदेव" जिन्हें निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म दोनों ही मान्यताओं का प्रवर्तक माना जाता है। उनके बारे में भी इन लेख में विशेष जानकारी दी जाएगी। कृपया करके आप इस जानकारी को अपने व अपने साथियों तक भी पहुँचाये और हमारे लक्ष्य को बढ़ावा देने में हमारा सहयोग करें।


● भक्तिकाल को दी गयी संज्ञा :-

ग्रियर्सन         -   स्वर्णकाल 

हजारीप्रसाद   -   लोक जागरण 

रामविलास शर्मा -  लोक जागरण काल


● जिस भक्तिआन्दोलन की शुरुआत दक्षिण से हुई थी उसे अब अपने विकास क्रम को बढ़ाने का अवसर धीरे-धीरे मिल रहा था। इसी क्रम में सबसे पहले दक्षिण से वो मध्य-देश की तरफ़ आगे बढ़ी जहाँ "महाराष्ट्र" के "वारकरी सम्प्रदाय" ने भक्ति के प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया। वारकरी सम्प्रदाय के शुरुआती भक्तों में सबसे पहले "नामदेव" का नाम लिया जाता है। जहाँ से होती हुई रामानंद द्वारा भक्ति-परम्परा को उत्तर भारत में लाया गया और कबीर ने भक्तिआन्दोलन को चर्मोत्कर्ष पर पहुँचाया। आगे चलकर भक्त कवियों द्वारा वह पूरे भारत में व्यापक स्तर पर फैली। जिसकी पुष्टि इस पंक्ति से देखी जा सकती है:-

"भक्ति द्राविड़ उपजी लाए रामानन्द

प्रकट किया कबीर ने चहुमुखी खंड"..।

• शुक्लानुसार उत्तर भारत में भक्ति को प्रसारित करने में नामदेव का नाम उल्लेखनीय है। 

● नामदेव:- हिंदी साहित्य में दक्षिण से शुरू हुई भक्तिआन्दोलन की परम्परा महाराष्ट्र में नामदेव द्वारा चलाई गई। इनका जन्म 1267 ई. के आसपास है। ये जाति से दर्जी थे बाद में विष्णु भगवान के भजन करते हुए अपने दिन बिताने लगे। इनकी रचनाएँ हिंदू-मुसलमान दोनों के लिए सामान्य भाव से दिखती है। अर्थात इन पर सगुण और निर्गुण दोनों मतों का बराबर प्रभाव है।

नामदेव के समय "ज्ञानदेव" नामक भक्तकवि हुए जो खुद को गोरखनाथ की परंपरा का बताते थे। इन्होंने ने ही नामदेव को निर्गुणमत का दर्शन दिया और ईश्वर के सर्वव्यापक होने का परिचय कराया। साथ ही मोह-माया के बंधन से निकालने में मदद की। ज्ञानदेव इन्हें निर्गुणमत के अनुसार परिपक्व नहीं मानते थे। एक बार नामदेव की परीक्षा के लिए ज्ञानदेव की बहन "मुक्ताबाई" द्वारा एक संत मण्डली बुलाई गई। सभी संत एक पंगत में बैठ गए और एक कुम्हार द्वारा बारी-बारी से सभी के सिर पर हथौड़े से प्रहार किया गया। जिसमें नामदेव कमजोर पाए गए....।

नामदेव को ज्ञानदेव द्वारा निर्गुणमत की तरफ प्रवृत करने के तरह-तरह से प्रयत्न किए गये।       

नामदेव को बराबर "ज्ञानदेव" कहा करते थे कि "बिनु गुरु होई न ज्ञान"...। इसी पंक्ति से सम्बन्धी एक घटना द्रष्टव्य है:- "एक बार स्वयं विठोवा (ईश्वर) एक फकीर का वेश धरकर आये थे परंतु नामदेव उन्हें पहचान नहीं पाए थे। बाद में पता चलने पर उन्हें पछतावा हुआ। तब कहीँ जाकर उन्होंने नागनाथ नामक शिव के स्थान पर जाकर "खेचरनाथ" से दीक्षा ली। इस सम्बंध में प्रस्तुत पंक्ति है:-

"मन मेरी सुई,तन तेरा धागा

खेचर जी के चरण पर नामा सिंपी लागा"...।


नामदेव की भक्ति के अनेक चमत्कार देखे गए हैं:- जैसे विठोबा की मूर्ति को दूध पिलाना, शिव मंदिर का इनकी तरफ घूम जाना आदि। इनके महामात्य ने यह सिद्ध कर दिया कि:-

"जाति-पांति पूछे नहीं कोई

हरि को भजे सो हरि का होई".।


• इनके हिंदी पद सगुण-निर्गुण दोनों तरह के मत के हैं। जिसमें सगुणमत के पद ब्रज या परिनिष्ठित काव्यभाषा में और निर्गुणमत क सधुक्कड़ी भाषा में।

इसके बाद यह भक्तिआन्दोलन मुख्य रूप से निर्गुणमत और सगुणमत में व्यापक स्तर पर फैलने लगता है जिसकी चर्चा आगे होगी।


● उत्तर भारत में यानी हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रों में भक्तिआन्दोलन की शुरुआत, जिसे रामानन्द लेकर आये थे वह सबसे पहले कबीरदास के निर्गुणमत से शुरू हुई। जिसकी पुष्टि सभी विद्वानों सहित आचार्य शुक्ल भी मानते हैं कि "निर्गुणमार्ग के निर्दिष्ट प्रवर्तक कबीरदास ही थे"....(पृ67).। 

इस निर्गुणमत के सम्बंध में दो मार्गो का बाहर आना दिखता है। एक ज्ञानमार्गी और दूसरा प्रेममार्गी। दोनों मतों के अपने अलग-अलग सिद्धान्त और दर्शन है। इसी तरह से सगुणमत में भी राम-कृष्ण भक्त रहे हैं। 

भक्तिआन्दोलन के इन चार दर्शनों को बारी-बारी समझने की हमें आवश्यकता है जिसमें सबसे पहले निर्गुणमत का ज्ञानमार्गी मत आता है। तो आइए जानते हैं निर्गुणमत और ज्ञान मार्गी शाखा क्या थी और कैसे इसने समाज में एक नई दिशा दी।


                       (निर्गुण काव्यधारा)

● निर्गुणमत :- "निर्गुण" शब्द का सबसे पहले उल्लेख उपनिषद में मिलता है। "श्वेताश्वर उपनिषद" के अनुसार यह विशिष्ट देवता के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है जो सर्वभूत, सर्वव्यापी है। अर्थात जहाँ ईश्वर के सभी जगह होने के सम्बन्ध में मान्यता हो और उसे सभी गुणों से ऊपर माना जाता हो। जिसका ईश्वर किसी मूर्तिरूप आदि में न होकर के सभी जगह है। इसी संदर्भ में "बच्चन सिंह" का मत हैं :-

"कहना न होगा कि निर्गुणमत धारा का अजस्त्र प्रवाह हिन्दू देश में ही देखा गया....।इतिहास में पहली बार इस वर्ग ने (हिन्दू व मुस्लिम दोनों ) अपनी आत्माभिव्यक्ति के लिए गीत गाये"....।  

• "मुक्तिबोध" के अनुसार "निर्गुण भक्तिमार्ग जातिवादी विरोधी आंदोलन सफल नहीं हो सका। उसका मूल कारण यह है कि भारत में उस समय पुरानी समाज रचना को समाप्त करने वाली पूंजीवादी क्रांतिकारी शक्तियाँ विकसित नहीं हुई थी"....। 

• "शुक्लानुसार" सन्तमत की रचनाएँ साहितियक नहीं है केवल फुटक्ल दोहे हैं। जिनकी भाषा और शैली अव्यवस्थित और उटपटांग है। कबीर आदि को छोड़कर बाकी सभी संतो ने ज्ञानमार्ग की सुनी-सुनाई बातें का ही पिष्टपेषण किया है तथा हठयोग की बातों का भद्दा तुक मिला दिया है"...।                                      

शुक्लानुसार "सन्तमत के वचनों से जनता की चित्तवृत्ति में ऐसे घोर विकार की आशंका है जिससे समाज विश्रृंखल हो जाएगा".....।


●निर्गुणमत के दो मार्गों के नाम :- ज्ञानमार्गी और प्रेममार्गी।

●ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्य नाम व नामकर्ता :-

1. ज्ञानाश्रयी :- शुक्ल

2. संतकाव्य :-  बच्चन सिंह, गनपतिचन्द्र, रामस्वरूप चतुर्वेदी ,रामकुमार वर्मा

3. निर्गुणभक्ति :-  हजारीप्रसाद

    

                        (सन्तकाव्यधार)                                                

सन्त काव्यधारा का एक अन्य नाम ज्ञानाश्रयी शाखा भी है। क्योंकि इस सिद्धांत को मानने वाले महात्मा लोग ईश्वर की भक्ति व उनकी लीला के पीछे तर्क ,ज्ञान- विज्ञान आदि को आधार बताते थे। इस मत के लोग अपनी बातों को सिद्ध करने के लिए व ईश्वर से मनुष्य का सम्बन्ध जोड़ते हुए या अन्य किसी भी तरह से मनुष्य व ईश्वर से जुड़ी क्रियाकलापों के होने के पीछे किसी ठोस तर्क को आधार मानकर ही चलते थे। इसलिए इस काव्यधारा का एक अन्य नाम ज्ञानाश्रयी शाखा भी है।

"ज्ञानाश्रयी शाखा" से सामान्य अर्थ यह है कि ज्ञान के माध्यम से, तर्क आदि के आधार पर ईश्वर की स्तुति करना, रीति-रिवाज़ों पर विश्वास करना। समाज को संचालित करने वाली गतिविधियों पर ध्यान देना, लोककल्याण के लिए तार्किक आधार पर कार्य करना और समाज को सजग करना। इसी शाखा के अंतर्गत संत कवियो का ज़िक्र किया जाता है जिसमें कबीर सबसे ज़्यादा प्रभावी और लोकप्रिय हुए हैं।


●संत का अर्थ और उसका काव्य :-  

सन्तरूपी परमतत्व का साक्षात्कार कर लेने वाले व्यक्ति को "सन्त" कहा जाता है।

पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने  "शांत" शब्द से संत की उत्तपत्ति मानी है। इसका अर्थ "निवृतिमार्गी -वैरागी" होता है।

• संतकाव्य का सामान्य अर्थ है "संतो द्वारा रचा गया काव्य। लेकिन जब हिंदी में संतकाव्य की बात की जाती है तो उसका अर्थ निर्गुणोपासक ज्ञानमार्गियो के लिए प्रयोग किया जाता है"....। 

• "बच्चन सिंह" के अनुसार "समूचा संतसाहित्य नाथपंथियो से प्रभावित था"...।

बच्चन सिंह के अनुसार "14वी शती में महाराष्ट्र के वारकरी समुदाय के भक्तों के लिए संत कहा जाने लगा और बाद में वारकरी के अनुयायियों के लिए भी संत शब्द का प्रयोग किया जाने लगा"...।

●सन्त काव्यधारा के प्रथम कवि व उनके प्रस्तोता :-  

1. कबीर -  आचार्य शुक्ल, रामस्वरूप चतुर्वेदी, हजारीप्रसाद।

2. नामदेव - गनपतिचन्द्र गुप्त , रामकुमार वर्मा ।


● संतकाव्य का दार्शनिक आधार :-  

शंकराचार्य व उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित अद्वेतदर्शन, नाथों द्वारा गुरु की महत्ता की स्वीकृति, योगमार्ग, शून्यवाद, इस्लाम से मूर्तिपूजा का खंडन व एकेश्वरवाद, सूफियो से प्रेमभाव व दाम्पत्य जीवन के प्रतीक, सिध्दों से उलटबांसियों का प्रयोग और वैदिक परम्पराओ-आडम्बरों का खंडन मनन, रामानन्द से वर्णाश्रम का विरोध व शूद्रों के लिए भक्ति मार्ग प्रशस्त करना साथ ही बौद्ध-वैष्णव धर्म से अहिंसा का पाठ लेना ...यह सभी दार्शनिक आधार सन्त काव्यधारा के अंग है जिसके तहत ही यह साहित्यिक मत कार्य करता है। इन सभी मतों के द्वारा हम पूर्णरूप से सन्त काव्यधारा व उसकी विशेषताओं को समझ सकते हैं। सम्पूर्ण सन्त काव्यधारा इसी दार्शनिक तत्व पर आधारित है।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018 

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