संत काव्यधारा :-
● संतकाव्य धारा से जुड़े अन्य भक्तकवि :-
1. रैदास :- सन्त रैदास का जन्म 1388 ई. काशी में हुआ था। यह भक्ति आंदोलन के प्रमुख दार्शनिक, विचारक व कबीर के गुरु रामानंद की शिष्य परम्परा में से एक थे। रैदास प्रसिद्ध कृष्ण भक्त मीरा के गुरु माने जाते हैं। सिख धर्म के "आदिग्रन्थ " में इनके 40 पदों का संकलन मिलता है।
जहाँ तक इनकी जाति के बारे में कहा जाता है तो ये जाति से "चमार" थे और इनके पूर्वज भी मुर्दा पशुओं को ढोते थे जिसके आज भी कुछ साक्ष्य मिलते हैं। इनकी जाति की पुष्टि के लिए निम्न पंक्तियों को पेश किया जा सकता है:-
"जात भी ओछी,करम भी ओछा,ओछा करम हमारा
नीचे से फिर ऊंचा कीन्हा,कह रैदास खलास चमारा।
"जाके कुटुंब सब ढोर ढोंवत,
फिरन्हि अजहुँ बानारासी आसपासा...।
• "बच्चन सिंह" के अनुसार "कबीर की विचारधारा के केंद्र में हिन्दू- मुसलमान का शोषित- पीड़ित वर्ग था, तो रैदास के विचार- केंद्र में चमारों और सवर्णो- हिंदुओ का भेदभाव"....।
2. नानक :- सिख धर्म के संस्थापक "गुरु नानक" जी का जन्म 1469 पंजाब के तलवंडी ग्राम में हुआ था। ये जाति से बनिए थे। इनके जन्मस्थान को "ननकाना साहब" भी कहा जाता है जोकि अब पाकिस्तान में है। इनके पिता का नाम "कालू मेहता" जो शकरपुर में कारिंदा थे और इनकी माता का नाम "तृप्ता" था। इनकी पत्नी का नाम "सुलक्षणी" था और इनके दो बेटे श्रीचंद और लक्ष्मीचंद थे।
"श्रीचंद" का सम्प्रदाय ही आगे चलकर "उदासी सम्प्रदाय" बहुत प्रसिद्ध हुआ जोकि वैरागी मत को मानने पर बल देता है।
नानक साहब व्यक्त्वि से शांत-स्वभाव के थे और हिंदू-मुस्लिम भेदभाव पर, आडम्बरो और वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते रहते थे।
इनकी रचनाओं में "शांत रस" अधिक देखा जाता है।
• "बच्चन सिंह" के अनुसार ये खत्री वंश में पैदा हुए थे। खत्री शब्द क्षत्रिय का अपभ्रंश है। बणियो का पेशा अपना लेने के कारण खत्री भी बनिये हो गए।
"बच्चन सिंह" के अनुसार नानक साहब का भक्ति की तरफ आकर्षित होने के पीछे एक घटना है जिसे जानना आवश्यक है:-"एक बार वह किसी मोदीखाने में काम करते हुए भक्ति में इतने लीन हो गए थे कि उन्होंने मुफ्त में ही किसी व्यक्ति को समान दे दिया। जिसके कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और उनके लिए यह भक्ति के लिए यह सुनहरा अवसर साबित हुआ"...।
आदिग्रन्थ के अंतर्गत "महला" नामक प्रकरण से इनकी बानियों का संकलन है।
3. गुरुअंगद :- यह सिख धर्म के द्वितीय गुरु हैं। इनका जन्म 1504 ई.में हुआ था। आदिग्रन्थ में इनके पद संकलित है।
4. धर्मदास :- इनका जन्म 1518 ई. राजस्थान के बाधवगढ़ में हुआ था। ये कबीरपंथ से जुड़े हुए थे और कबीर की राजस्थानी शाखा की गद्दी पर 20 साल तक विराजमान थे। जाति से यह भी बनिये थे और बाल्यावस्था से भक्ति के बीज इनके हृदय में अंकुरित हो गए थे। कबीर से दीक्षा लेकर यह निर्गुणमत की तरफ अग्रसर हए थे।
5. दादू :- इनका जन्म 1544 ई. गुजरात अहमदाबाद में हुआ था। इनकी जाति के बारे में एकमत्ता नहीं है। कोई इन्हें "गुजराती ब्राहाम्ण" मानता है तो कोई "धुनिया, कोई मोची"..।
कुछ विद्वानों ने माना है कि ये साबरमती नदी के पास बाल्यावस्था में पड़े हुए मिले थे जिसे एक ब्राह्मण ने पाला-पोसा। ये "दादू पंथ के प्रवर्तक" थे और राजस्थान में इनके नाम से शाखा भी प्रचलित है जिसे "परब्रह्म सम्प्रदाय" या कबीर-पंथ की "राजस्थानी शाखा" भी कहा जाता है। यह सन्त काव्यधारा के रहस्यवादी सन्त मान्य जाते हैं।
• चन्द्रिकाप्रसाद त्रिपाठी और क्षितिजमोहन सेन के अनुसार दादू मुसलमान थे और इनका नाम "दाऊद" था। इनकी दयालुता के कारण भी "दादूदयाल" कहा जाता था।
ये कबीर के पुत्र "कमाल" के शिष्य के साथ कबीरपंथ के अनुयायी भी थे। इनकी प्रसिद्ध रचना "हरड़ेवाणी" है जिसे पहले उनके दो शिष्य "सन्तदास" और "जगन्नाथ दास" ने सम्पादन किया था जिसका पुनः सम्पादन "रज्जब" ने किया।
6. गुरु अर्जुनदेव :- इनका जन्म 1563 में हुआ था और ये सिख धर्म के पांचवें गुरु थे। इन्होंने "आदिग्रन्थ" का सम्पादन किया था और आदिग्रन्थ की प्रस्तुति का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। जिसमें इनके भी 6000 पद शामिल हैं। जीवन के अंतिम दिनों में जहाँगीर ने इन्हें कैद कर लिया था और तरह-तरह की अमानुषिक यातनाएं दी।
7. रज्जब :- इनका जन्म 1567 ई. में हुआ था और ये राजस्थान के रहने वाले थे। ये दादू के शिष्य थे और इनकी दो टूक कहने वाली शैली कबीर की याद दिलाती है।
"हजारीप्रसाद" जी इनके बारे में एक प्रसंग उल्लेख करते हैं:-"रज्ज्बदास निश्चय ही दादू के शिष्यों में से सबसे अधिक कवित्व लेकर उतपन्न हुए थे और उनकी कविताएं भावापन्न सहज थी, साथ ही इस्लामी प्रभाव के शब्द भी हैं"....।
8. मलूकदास :- इनका जन्म 1574 ई.में इलाहाबाद के कड़ा ग्राम में हुआ था। इनके बारे में कई तरह के चमत्कार माने जाते हैं जैसे डूबते हुए जहाज को बचा लेना और रुपयों को गंगा के माध्यम से इलाहाबाद भेज दिया था।
9. सुन्दरदास :- इनका जन्म 1596 ई. राजस्थान के धोसा में हुआ था और ये जाति से बनिये थे। ये सन्त काव्यधारा में सबसे ज्यादा साक्षर, गौरवर्ण, सुंदर और बालब्रह्मचारी थे। ये श्रृंगार रस के परम विरोधी थे इसी से सम्बंधित उन्होंने केशव की "रसिकप्रिया" और नंददास की "रसमंजरी" की निंदा की थी। जिसकी पंक्ति प्रसिद्ध है:-
"रसिकप्रिया रसमंजरी और सिंगारहि जान
चतुराई करि बहुविधि विषय बनाई आन"...।
ये दादू के शिष्य थे जिनसे इन्होंने 6 से लेकर 10 वर्ष तक दीक्षा ली और फिर उनकी मृत्योपरांत काशी में "जगजीवनदास" से 30 वर्ष तक अध्ययन किया। ये एकलौता ऐसे सन्त थे जिन्होंने "लोकधर्म की उपेक्षा" नहीं की। इनकी प्रसिद्ध रचना "सुन्दरविलाप" है जोकि एक तरह का रामकाव्य है।
व्यर्थ की तुकबन्दी और उटपटांग भाषा इन्हें अरुचिकर थी जिससे जुड़ी ये पंक्ति देख सकते हैं:-
"बोलिए तब जब बोलिए होए
ना तो मुख मौन गहिये चुप होए रहिये"...।
10. गुरु गोविंदसिंह :- ये सिख धर्म के 10वे गुरु थे जिनके शौर्य की गाथा सर्वव्यापक है। ये लगातार मुगलो (औरंगजेब) के शोषण-वृति के विरुद्ध लड़ते रहते थे जिसके बदले इन्होंने अपने 4 बेटों की कुर्बानी देने में बिल्कुल भी झिझक नहीं समझी। इन घटनाओं के बाद इन्होंने अपने सैनिक शिविर के रूप में "खालसा पंथ" की स्थापना की जिसमें सबसे पहले दीक्षित होने वाले 5 व्यक्तियों को "पंच-पियारे" के नाम से जाना गया। जिन्हें गोविंद सिंह जी ने अपनी संतान के रूप में स्वीकारा।
अपने बाद इन्होंने सिख धर्म से गुरु परम्परा को खत्म करके "आदिग्रन्थ" को ही सिख धर्म के लिए हमेशा के लिए गुरु की उपाधि दे दी। ये वीर , श्रृंगार और हास्य रस की कविता लिखते थे।
11. अक्षर अनन्य :- इनका जन्म मध्यप्रदेश में हुआ था वहाँ पर पृथ्वीचंद के दीवान थे। ये ज्ञानाश्रयी शाखा के "आध्यात्मिक कवि" के साथ छत्रसाल के गुरु भी थे। इन्होंने दुर्गा सप्तशती का हिंदी अनुवाद भी किया है।
● अन्य जानकारी :-
1. सन्तमत में "सहजोबाई और बावरी साहिबा" महिला सन्त साधिका थी।
2. विश्नोई सम्प्रदाय जम्भनाथ का है।
3. निरंजनी, साध, दादू, जसनामी, लालदासी आदि कबीरपंथ की ही शाखाएं हैं।
4. जगजीवनदास का "सत्यनामी" सम्प्रदाय है।
गुरु शिष्य
दादू रज्जब
रैदास मीरा
दादू सुंदरदास
कमाल दादू
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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