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Thursday, March 25, 2021

भक्तिकाल भाग : 13

   

कृष्ण काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि


                             (नंददास)

● श्रीकृष्ण जी की लीलाओं का जीवंत वर्णन करने और उन्हें जन जन तक पहुँचाने में वल्लभाचार्य का योगदान अविस्मरणीय है। इसे हिंदी साहित्य के अंतर्गत कोई भी इसे ओझल नहीं कर सकता। जिस तरह भक्ति आंदोलन के सूत्र को सर्वप्रथम शंकराचार्य आदि दक्षिण के दार्शनिकों, विद्वानों ने समस्त भारत तक प्रचारित करने में अपना विशिष्ट योगदान दिया था, ठीक उसी प्रकार से कृष्ण काव्य को भी यह गति वल्लभाचार्य ने प्रदान की थी। इन्हीं के सुपुत्र विठ्ठलनाथ हुए। वह भी कृष्ण लीला के अनन्य प्रवर्तकों में गिने जाते थे। इन्हीं के द्वारा स्थापित कृष्ण कवियों व भक्तों की एक मंडली थी जिसे हिंदी साहित्य के अंतर्गत "अष्टछाप" के नाम से जाना जाता है। इस मंडली में वल्लभाचार्य और विठ्ठलनाथ दोनों आचार्यों के ही चार-चार शिष्य थे। जिसमें सभी कृष्ण भक्ति व उनकी लीलाओं का गुणगान करने में फनकार कहे जाते थे।  इसी मंडली में जो सबसे छोटे कवि या भक्त गिने जाते हैं उन्हीं का नाम "नंददास" था, जिसका वर्णन यहाँ किया जा रहा है।

• नंददास सूर के समकालीन थे। कुछ विद्वानों ने इन्हें तुलसी के भाई होने का दावा भी किया है परंतु आचार्य शुक्लानुसार इस धारणा के पश्चात इसका खंडन किया गया और अंततः यह सिद्ध हो गया कि नन्ददास तुलसी के किसी भी रूप में भाई नहीं लगते थे। यह अप्रमाणिक हो चुका है।

वल्लभाचार्य के पौत्र "गोकुलनाथ" द्वारा रचित भक्तिकालीन कवियों का जीवन परिचयात्मक ग्रन्थ जिसे "252 वैष्णवो की वार्ता" के नाम से जाना जाता है, इसमें लिखा है कि "नंददास का कृष्णोपासक होना तुलसी को अच्छा नही लगा और उन्होंने उलहाना लिख के भेज दिया। सो एक दिन नंददास के मन में आयी कि जैसे तुलसी ने रामकथा लिखी वैसे ही हम भी लिखेंगे।"

• नंददास गोकुल में एक स्त्री पर मोहित हो गए थे। इस कारण वह सांसारिक मोहमाया में बंध गये थे और भक्ति परम्परा से तब तक उचित रूप से नहीं जुड़ पाए थे। कुछ ही दिन बाद विट्ठलनाथ से जब इनका सम्पर्क हुआ तब ये उस मोह से टूटे और अंततः कृष्ण भक्त बने। उसी समय से कृष्ण लीलाओं को अपनी भक्ति के पद में ढाल कर यह रचनाएँ करने लगे। तरह तरह के कवित्त, सवैये, दोहे आदि छंद गढ़ना इनकी वृति का अंग बन गया था।


● नन्ददास की कुछ महत्वपूर्ण रचनाएँ और उनका कथ्य :

1. "रासपंचाध्यायी" रोला छंद में लिखी है। 

2. "मानमंजरी" अमरकोश पर आधारित शब्दकोश।

3. "विरहमंजरी" कृष्ण के वियोग में ब्रज का वियोग।

4. "रूपमंजरी" कृष्ण व इंदुमती का प्रेमाख्यान।

5. "रस मंजरी नायिका भेद वर्णन।

6. "श्याम सगाई" राधाकृष्ण की सगाई।

7. "भँवरगीत" दर्शन,विवेक बुद्धि , तर्कज्ञान व कृष्ण का योग 


● बच्चन सिंह द्वारा नन्ददास पर कहे गए मुख्य कथन :

1. बच्चन सिंह के अनुसार "सूर के भ्रमरगीत में उद्धव-गोपी संवाद कम है जबकि नन्ददास के भ्रमरगीत में उद्धव-गोपी का शास्त्रार्थ हुआ है - कथोपकथन शैली में।"

2. बच्चन सिंह के अनुसार "सूर का भ्रमरगीत मुक्तक काव्य है तो नंददास में शास्त्र का अनुसरण है।"

3. बच्चन सिंह कहते हैं " सूर की गोपियाँ सरल-सहज हैं और नंददास की पण्डित।"


                            (मीरा)

● कृष्ण काव्य के अंतर्गत मीराबाई का नाम ठीक उसी आदर और महत्ता के साथ लिया जाता है जैसे दक्षिण में अंडाल नामक स्त्री का, सन्त साहित्य में सहजोबाई और सूफी साहित्य में राबिया का लिया जाता है।

मीराबाई का कृष्ण जी के प्रति प्रेम और समर्पण भाव एक कथा का आधार तत्व है। ऐसी किवदंती है कि मीराबाई जी ने बाल्यकाल में अपनी माता जी से एक प्रश्न किया था कि उनका पति कौन है या उनका प्रेम किसके लिए होना चाहिए आदि। कुछ ऐसा ही एक प्रश्न किया था जिसके उत्तर में उनकी माता जी ने कृष्ण जी की मूर्ति को ही उनके पति के रूप में बता दिया था। ततपश्चात मीरा तभी से कृष्ण जी के प्रति इतनी दीवानी हो गयी, उन पर इतनी मोहित हो गयी और उनके प्रेम में ऐसे खोई की जीवन भर वह उससे निकल नहीं पाई। इस प्रेम के कारण उन्हें अपने ही परिवार से कठिन से कठिन कष्ट झेलने पड़े, तमाम तरह के दर्द सहने पड़े। समाज ने भी उन्हें प्रताड़ित करने और उल्हाना देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

मीरा के पति की मृत्यु के बाद उनके परिवार के लोगों द्वारा जहरीले सर्प से डसवाने, जहर देकर मृत्यु के घाट उतारना आदि तरीके आजमाए गए।  

• मीराबाई ये मेड़तिया के रतनसिंह की पुत्री, और उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज की पत्नी थी।

घर से तरह तरह की यातना मिलने के कारण दुखी होकर इन्होंने तुलसी को लिखा था कि:-

"स्वस्ति श्री तुलसी कुल भुषन हरण गोसाई

बारहि बार प्रणाम करहु, अब हरहु समुदाई।

"मेरे माता पिता के सन हौ, हरिभक्तों सुखदाई

हमको कहाँ उचित करिबो, सो लिखिये समझाई।


जिसपर तुलसी कहते हैं :-

" जाके प्रिय न राम वैदेही

सो नर तजिय, कोटि बैरी सम ,जद्दपि परम् स्नेही।

अर्थात यदि अपना कोई प्रिय हो और वह दुख दे तो उसे त्याग देना चाहिए, अर्थात घर-बार छोड़कर चले जाओ और भगवान की भक्ति करो।

• मीरा की भक्ति "माधुर्य भाव" की है। इन पर सूफियों का भी प्रभाव माना गया है। उनकी प्रेम साधना "स्वकीया की पद्धति" पर आधारित है। इस सम्प्रदाय में भक्त अपने को पत्नी और ईश्वर को पति रूप में देखता है। सन्तमत से जुड़ी हुई इसकी भी अवधारणा है।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार मीरा का काव्य सूर द्वारा विस्तार में चित्रित गोपियों की विरहोंमुक्ता का " detail " या ब्यौरा है....।

● विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार "मीरा का काव्य मध्यकालीन नारी का जीवंत बिम्ब है"..।

                                 

                           (रसखान)

●कृष्ण काव्य परम्परा में मियाँ सैयद इब्राहिम रसखान का नाम भी बड़े आदर से लिया जाता है। ये दिल्ली के पठान सरदार थे। एक दिन इन्होंने किसी को कहते हुये सुना कि "भगवान से ऐसा प्रेम करना चाहिए कि जैसा रसखान का उस बनिये के लड़के के साथ है। उस उक्ति से मर्माहत होकर रसखान गोकुल चले गए और आचार्य विट्ठलनाथ से दीक्षा ली।

कहते हैं कि जिस स्त्री पर यह मोहित हुये थे वह बहुत ही मानवती थी और इनका अनादर किया करती थी। एक दिन यह (रसखान) श्रीमद्भागवत का फारसी तर्जुमा (सार अनुवाद) पढ़ रहे थे। उसमें गोपियों के अनन्य और अलौकिक प्रेम को पढ़ इन्हें ध्यान हुआ कि जब प्रेम ही करना है तो क्यों न कृष्ण जी के प्रति ही प्रेम रूपी मन लगाय जाए। बस बात सोची ही थी कि वृंदावन चले गए और कृष्ण भक्त बन गए।


इसी बात का उल्लेख रसखान अपनी " प्रेमवाटिका " में कहते हैं कि :-

" तोरि मानिनी तें, हियो फोरि मोहनी मान

प्रेमदेव की छबहि लखि, भय मियाँ रसखान।


● कृष्णभक्ति धारा का प्रवाह कहिये या भक्ति काव्य में चित्रित कृष्ण का मोहक व्यक्तित्व, जिसके कारण सैयद इब्राहिम जैसे मुसलमान रसखान हो गए। रसखान आदि की भक्ति पर रीझकर "भारतेंदु" लिखते हैं:- 

" इन मुसलमान हरिजन पर कोटिन हिन्दुन वारिये"....।


• रसखान ने कृष्ण जी के प्रति अपने प्रेम भाव और समर्पण भाव को इस कदर उकेरा और उसमें इतना गूढ़ मर्म व्यक्त किया, रस को आलोकित किया कि इनके पद एकदम मीठे मीठे से लगते थे। इतने मधुर पद सुनने की इच्छा सभी लोगों की रहती थी। जिस पर इनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि रसखान ने प्रेम के ऐसे सुंदर पद लिखे की जनसाधारण भी कहता था कि " कोई रसखान सुनाओ...।

• रसखान ब्रह्म को तभी मिलने की आशा बताते हैं जब वह वशीभूत हो जाए  :-  

"ब्रह्म में ढूँढयो पुरानन गानन,

विदरिचा सुनी,चौगुने चायन"..।

• रसखान ने कृष्ण का लीलागान गेयपदों में नहीं, सवैयों में किया है।

• बच्चन सिंह के अनुसार" रसखान पहले ऐसे कवि हैं जिन्होंने कवित्त और सवैयों में कृष्णभक्ति को दिखाया। ये किसी भी धार्मिक सम्प्रदाय में।दीक्षित नहीं हुए थे।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

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