● नामकरण व समय सीमा:-
उत्तरमध्यकाल (रीतिकाल) :- शुक्ल 1700 -1900 सं
श्रृंगार काल - विश्वनाथप्रसाद मिश्र
अलंकृत काल - मिश्र बन्धु
रीतिकाल- बच्चन सिंह
रीतिकाव्य - जॉर्ज ग्रियर्सन
कलाकाल - रमाशंकर शुक्ल "रसाल"
● रीतिकाल का प्रथम कवि:-
शुक्ल - चिंतामणि
नगेंद - केशव
● रीतिकाल का आगमन :-
1. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार "रीतिकाव्य का विवेचन" नगेन्द्र ने "ग्राहस्थिक" रूप में माना है।
2. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार रीतिकाल की विशेषता "ऐहिकता" है। रीतिकाल में कवि ने "मनुष्य और ईश्वर" को मनुष्य रूप में ही चित्रित किया है।
चतुर्वेदी जी को प्रतीत होता है कि भक्तिकाल और रीतिकाल के बीच जो अंतर है उसे भिखारीदास स्पष्ट करते हैं :-
"आगे के कवि रीझिहें तो कविताई न तौ
राधिका-कन्हाई सुमिरन को बहानो है"
3. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार रीतिकाल में राधा- कृष्ण अपने वास्तविक रूप से हटकर दांपत्य और रूप-सौंदर्य की श्रेणी से आ जुड़े थे। प्रेम- भक्ति की संपृक्त अनुभूति से भक्ति क्रमशः क्षीण पड़ती जा रही थी और श्रृंगार का रूप केंद्र में आता जा रहा था। भक्तिकाल के " रीतिकाल" में रूपांतरण की यही प्रक्रिया थी....। अर्थात भक्ति का स्वरूप बदलकर अब रिश्ते (दाम्पत्य/प्रेम) और रूप- सौन्दर्य की डोर से आ जुड़ा था।
4. "रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार :- " भाषा के स्तर पर रीतिकाल का कवि या तो पूरी तरह सफल हुआ है या केवल एक कलाबाज़ बनकर रह गया है"...।
● बचन्न सिंह के अनुसार :-
1. भक्तिकाल के अंतिम दिनों में प्रगतिशील पक्ष बहुत कुछ क्षरित हो गया था।
2. मधुरोपासक कृष्ण भक्तों ने अपनी सीमा को संकीर्ण करके राधाकृष्ण को कुंज-क्रीड़ा तक सीमित कर दिया था।
3. वृंदावन से गोस्वामियों ने परकीया प्रेमशास्त्र पर मुहर लगा दी थी।
4. मर्यादावादी रामोपासक के रसिक सम्प्रदाय ने मर्यादा का महल ढहा दिया था।
● "नगेंद" ने रीतिबद्ध वर्ग को आचार्य कवि और काव्य-कवि 2 वर्गों में विभाजित किया है।
"बचन्न सिंह" द्वारा रीतिकाल ने रीतिबद्ध, रीतिमुक्त को अवैज्ञानिक बताते हुए कहा है कि आलम, ठाकुर, बोधा आदि रीतिमुक्त कवि भी रीति से बंधे थे। केवल उन्होंने छंद के रूप में मुक्तक को चुना। इस बात की पुष्टि के लिए वह छंदमुक्त और मुक्तछंद वाला तर्क देते हैं।
● लक्षण ग्रँथ :- जहाँ काव्यशात्रीय परम्परा के तहत किसी नियम-सिद्धान्त-काव्यांग आदि में बन्ध कर उसके लक्षणों को सिद्ध किया जाए या विवेचित किया जाए।
● लक्ष्य ग्रँथ:- अपने किसी आश्रयदाता, गुरु, परिजन, मित्रादि पर ग्रँथ लिखना।
● रीतिकाल में काव्यशात्रीय परम्परा की शुरुआत:-
1. "शुक्लानुसार" रीति निरूपण की शुरुआत "करनेस" के श्रुतिभूषण, भूपभूषण और करुणाभरण से तथा "मोहनलाल मिश्र" के श्रृंगार सागर से होती है।
2. "नगेंद्र" के अनुसार रीतिनिरूपण की शुरुआत "कृपारम" के हिततरंगिणी से होती है।
3. परन्तु शुक्लानुसार "केशव" ने ही सबसे पहले काव्यरीति का सम्यक समावेश किया।
आगे चलकर वह पुनः लिखते हैं :- पर हिंदी में रीतिग्रन्थों की अविरल और अखंडित परम्परा का प्रवाह केशव की कविप्रिया के 50 वर्ष बाद चला पर एक भिन्न आदर्श को लेकर, केशव के आदेश को लेकर नहीं"..।
इस मत का विरोध करते हुए "नगेन्द्र" कहते हैं कि " उस युग के प्रवर्तक केशव ही हैं। चिंतामणि को यह अधिकार देना अन्याय है क्योंकि यह केवल संयोग था कि उनके उपरांत रीतिकाव्य की धारा अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित हुई"..।
4. "जगदीश गुप्त" भी शुक्ल का विरोध करते हुए केशव को रीतिकाल का प्रवर्तक मानते हैं।
इन सब मतों को देखने के बाद "बच्चन सिंह" का मत है कि" रुई न सूत जोहलन से मटकअल "..। यदि शुक्ल जी को ध्यान से समझा जाता तो विद्वानों को यूँ हवा में मुक्का मारने की आवश्यकता नहीं होती।
शुक्ल का समर्थन करते हुए बच्चन सिंह कहते हैं:- "शुक्ल की दृष्टि काव्यशात्रीय विकास परम्परा पर थी न कि प्रवर्तक पर"..। प्रवर्तक धर्म,दर्शन, के क्षेत्र में होते हैं। इस आधार पर चिंतामणि से ही रीतिकाव्य परम्परा का आरंभ मानना चाहिए।
"बच्चन सिंह" के अनुसार "रीतिकालीन काव्यशात्रीय परम्परा पर भानुदत्त की रसमंजरी रीतिकवियो के लिए एक "मॉडल" बन गयी थी"...।
● रीतिकालीन कवि/आचार्यो पर कहे गए शुक्ल के कथन:-
1. आचार्यत्व के लिए जिस सूक्ष्म विवेचन या पर्यालोचन शक्ति की अपेक्षा होती है उसका विकास नहीं हुआ था।
2. हिंदी में लक्षणग्रँथ की परिपाटी पर रचना करने वाले जो सैकड़ो कवि हुए वह आचार्य की कोटि में नहीं आ सकते। वास्तव में वह केवल कवि भर थे।
3. अपनी ओर से उन्होंने न तो अलंकार क्षेत्र में कोई मौलिक कार्य किया और न रस क्षेत्र में।
4. इन रीतिग्रन्थकारों के कर्ता भावुक, सहृदय और निपुण कवि थे। उनका उद्देश्य कविता करना था, काव्यांग निरूपण नहीं।
5. उनके बड़े भारी काम से यह जरूर हुआ कि रसों और अलंकारों के बहुत सरस और हृदयग्राही उदाहरण अत्यंत प्रचुर परिणाम में प्रस्तुत हुए।
6. जिस रस को उन्होंने लिया उसका पूरा आवेश उनमें था, पर भाषा उनकी अनेक स्थलों पर सदोष है। इसका कारण ब्रज और अवधी दोनों प्रकार के कवियों का अपनी इच्छानुसार मिश्रण करना है।
7. रीतिकालीन कवियों के द्वारा अरबी-फारसी शब्दो का कम इस्तेमाल करने पर उनकी प्रशंसा करते हुए शुक्ल कहते हैं " अपनी भाषा की सरसता का ध्यान रखने वाले उत्कृष्ट कवियों ने ऐसे शब्दों को बहुत ही कम स्थान दिया"...।
8. रीतिकाल के सम्बंध में शुक्ल एक बात कहते हैं कि" इस युग में एक बड़े भारी अभाव की पूर्ति हो जानी चाहिए थी, पर वह नहीं हुई"..।
9. रीतिकाल के कवियों का प्रिय छंद "कवित" और "सवैये" है।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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