• व्याकरणिक संसोधन के साथ
क़िस्सा काशीनाथ सिंह और "काशी नामा"...
एक बार विजय मोहन सिंह से मेरी बहुत बहस हुई थी। मैंने उनसे स्पष्ट कहा था। जब तक संस्मरणों में यथार्थ के नाम पर गली गलियारों में दी जाने वाली गालियां जीवित रहेंगी भारतीय सभ्य समाज में तब तक भारतीय स्त्री को पितॄ सत्ता द्वारा दी गई झूठी प्रतिष्ठा को जीना पड़ेगा। हम 'हंस' मे प्रकाशित हो रहे संस्मरण को लेकर बात कर रहे थे । उन-सा स्वाभिमानी जीनियस हिंदी साहित्य में दुर्लभ है। क्योंकि अधिकांश गालियाँ स्त्री को ही संबोधित हैं, स्त्री को लेकर ही हैं। यह गलियारी जीवंतता पितॄ सत्ता को यह अधिकार देती है कि देहरी के भीतर अपनी मां बहन की इज्जत करें, उसकी प्रतिष्ठा के लिए खून की नदियाँ बहा दे और देहरी के बाहर अपने क्रोध और क्षोभ को व्यक्त करने के लिए उसे गाली बना ले।
यह बातचीत निर्माण अपार्टमेंट मयूर विहार एक्सटेंशन में रह रहे विजय मोहन के जी साथ तब की है, जब वह मयूर विहार एक्सटेंशन में रह रहे थे और उषा गांगुली काशीनाथ सिंह के संस्मरण, पांडे कौन कुमति तोहे लागीं, पर काशीनामा शीर्षक से नाटक की पटकथा तैयार कर रही थी। हम दोनों गालियों को लेकर चर्चा कर रहे थे। आदरणीय नामवर जी का भी कहना था इसके बिना बनारस, बनारस नहीं लगेगा। नाटक में जान नहीं आ पाएगी। काशी जी भी कहानी में किसी प्रकार के परिवर्तन के लिए तैयार नहीं थे। उषा ने कहा मैं नाटक छोड़ दूँगी मगर गालियों का इस्तेमाल नहीं करूंगी। काशी जी की अव्यक्त इच्छा थी कि उषा जी यह नाटक अवश्य करें।
तय हुआ। आखरी फैसला करने से पहले विजय मोहन जी से परामर्श कर लिया जाए। यह मेरा सुझाव था और उषा तैयार हो गई। मैं स्वयं गालियों के पक्ष में नहीं थी न कभी रही हूँ।
काशीनाथ जी के लिए उषा गांगुली का नाम भी बहुत महत्वपूर्ण था।
विजय मोहन सिंह ने सारी बात सुनते हुए सिर्फ एक वाक्य कहा- नाटक कौन कर रहा है ? उषा जी कर रही हैं ना ! काशी ने तो संस्मरण लिखा है नाटक नहीं। और
'पांडे कौन कुमति तोहे लागी' ,- काशीनाथ सिंह का 'काशीनामा', हो गया।...
गालियाँ नाटक से बहिष्कृत हो गई।
काशीनामा ने अप्रतिम सफलता पाई। स्वयं उषा के बनाए कई प्रतिमानों को तोड़ दिया। काशी के अस्सी घाट पर जब काशीनामा आरंभ होता है तो सुशील भारती की बुलंद आवाज जब नाटक को उठाती है तो काशी का आकाश गुंजायमान हो उठता है और दर्शक नाटक के सम्मोहन में कैद।
उषा गाँगुली रचित 'काशीनामा' के बारे में
(चित्रा मुद्गल जी की दीवार से....)
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