(उपन्यास)
हिंदी साहित्य लोचन
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।
1. प्रेमचंद :-
प्रेमचंद का कथा साहित्य गाँधी के सत्य-अहिंसा की जीवन प्रणाली का प्रबल समर्थक है। उनमें आर्य समाज की तार्किकता, गाँधी की विनयशीलता और तिलक की तेजस्विता का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने नशाखोरी दूर करना, स्त्रियों की उन्नति, अस्पृश्यता निवारण, दहेज प्रथा खत्म करना, बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य-सफाई, किसान-मजदूरों के लिए बहुत सा काम किया है।
प्रेमचंद के उपन्यास कला की महत्ता हजारीप्रसाद जी सिद्ध करते हुए कहते हैं कि" यदि आपको उत्तर भारत की सारी जनता के आचार विचार, भाषा, भाव, रहन-सहन, आशा-आकांशा, दुख-सुख और सूझबूझ जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद के उपन्यासों से उत्तम परिचायक कहीं ओर नहीं मिलेगा"...।
विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार ' प्रेमचंद के उपन्यासों में सभी वर्ग सिमट आये हैं। इन पर गाँधी का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है परन्तु गोदान तक आते आते उनका यह गाँधीवादी प्रभाव व आदर्श रूप टूटता हुआ नजर आता है और वह उससे मुक्त होकर मूलतः यथार्थवादी बन जाते हैं इसलिए गोदान अंततः दुखांत उपन्यास है..।'
● प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यास :-
• "सेवासदन" 1918 में प्रकाशित उपन्यास में वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ कथानक को दिखाया गया है। विश्वनाथ त्रि. के अनुसार प्रेमचंद का ऐसा मत है कि " सवर्ण वर्ग में स्त्रियों का ज्यादा शोषण होता है क्योंकि वहाँ पुरुषों पर आर्थिक स्थिति से निर्भर रहना पड़ता है। मुख्यतः इस रचना में वैश्यावृत्ति की समस्या को उभारा गया है।
इस उपन्यास की महिला पात्र "सुमन" है जिसके माध्यम से पहली बार हिंदी उपन्यास में स्त्री का पुरुषों पर आश्रित होना यह बात समझती है और उसके विरुद्ध खड़ी होती है।
बच्चन सिंह इसे "हिंदी का बेहतरीन नॉवेल" की संज्ञा देते हैं।
• "प्रेमाश्रम" 1922 और "रंगभूमि" 1925 में किसान जीवन को उभारा है कि 'वह अपनी जमीन के लिए कितनी आत्मीयता रखता है। ब्रिटिश साम्राज्य, बड़े व्यापारी, जमींदार आदि किसानों को तरह-तरह की यातना देकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देते हैं। और यह किसानी जीवन किस तरह से मजदूर बनकर अंततः मृत्यु को प्राप्त हो जाता है जिसका जीता जागता प्रमाण "गोदान" 1936 में और उसका मुख्य पात्र (नायक) "होरी" है।
"प्रेमाश्रम" गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित है जिसमें हृदय परिवर्तन के साथ रामराज्य स्थापित करने की कल्पना भी शामिल हैं। बच्चन सिंह के अनुसार "प्रेमाश्रम" हिंदी का पहला "राजनीतिक उपन्यास" है और इस पर बोल्शेविक क्रांति का भी प्रभाव है...।
"रंगभूमि" का "सूरदास" पूँजीपतियों से सीधा संघर्ष करता है।
• "कायाकल्प" 1926 में अलौकिक और अतिरंजनापूर्ण परम्परा से जुड़े प्रसंगों को दिखाया है जैसे बाबाओं के चमत्कार, पूर्वजन्म की कल्पना, वृद्धा को तरुणी में बदली करना आदि।
• "निर्मला" 1927 में अनमेल विवाह की समस्या को लेकर खड़ा हुआ है।
• "गबन" 1930 में गहनों की चोरी के माध्यम से मध्यवर्ग की स्थितियों की कमजोरियों का पर्दाफाश किया है। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बाद भी झूठे ऐशो आराम, टीम टाम दिखाना इस वर्ग की कमजोरी है।
• "कर्मभूमि" 1933 में आया उपन्यास प्रेमाश्रम की अगली मंजिल है जिसमें न केवल किसान बल्कि छात्र, मजदूर, मध्यवर्ग, हिन्दू-मुस्लिम, गरीब-धनी सभी वर्ग के लोग शामिल हैं। 1930 कि असहयोग आंदोलन में विभिन्न वर्गों , जातियों, धर्मो के लोगों की सम्मिलिति थी। 1928 में किसान-मजदूर पार्टी की स्थापना हो चुकी थी और इसी वर्ष बारडोली का लगान-बन्दी आंदोलन भी शुरू हो चुका था। इस देशव्यापी आंदोलन की औपन्यासिक अभिव्यक्ति "कर्मभूमि" में हुई है।
• "गोदान" 1936 में प्रेमचंद गाँधीवाद से मुक्त हो जाते हैं क्योंकि उन्हें अब लगता है कि केवल आदर्शवाद से काम नहीं चलेगा, समाज को बदलने के लिए यथार्थ को दिखाना आवश्यक है। देश के किसानों से सीधा साक्षात्कार "गोदान" भारतीय किसानों का मर्मस्पर्शी, करुण और त्रासद दस्तावेज़ बन जाता है।
"गोदान" किसान जीवन का इतना मर्मस्पर्शी और यथार्थवादी उपन्यास होने का प्रथम उपन्यास नहीं है। इससे पूर्व उड़ीसा के फ़कीरमोहन सेनापति ने 1847 में "छमाड आठ गुंठ" (छह बीघा जमीन) में किसान जीवन समस्या उठायी थी।
प्रेमचंद में किसानी जीवन को दिखाने के लिए किसानी भाषा का प्रयोग किया है।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "तुलसीदास की पारिवारिक इकाई की अवधारणा गोदान के होरी में भी दिखती है जो मरजाद के कारण अतिवादी नहीं होता"..। परन्तु हम देखें तो यही अतिवादी या विद्रोही प्रवृति का न होना उसकी दुर्गति का कारण बन जाती है क्योंकि प्रेमचंद खुद भी इस बात को महसूस कर चुके थे कि अब केवल आदर्श की लाठी के सहारे समस्याओं का निवारण नहीं किया जा सकता। कुछ ठोस कदम भी उठाने होंगे। इसके आगे चतुर्वेदी कहते हैं कि "गोदान का रचना संतुलन ऐसा बेजोड़ है कि उसमें अनवरत संघर्ष, करुणा, सहानुभूति और ट्रैजिक अंत के बावजूद कहीं किसी एक के प्रति कड़वाहट नहीं आती, गहरा असंतोष उमड़ता- घुमड़ता है तंत्र के प्रति"...।
रामस्वरूप के अनुसार गोदान में "गाँधी और मार्क्स को जैसे प्रेमचंद ने फेंट कर मिलाया है"..।
विश्वनाथ त्रि. के अनुसार "प्रेमचंद की भाषा न तो किताबी उर्दू है और न ही किताबी हिंदी है, वह सहज हिंदी भाषा है"...।
2. विशम्भरनाथ कौशिक :-
" भिखरिणी" 1929 में अंतरजातीय विवाह की समस्या उठायी है।"जस्सो" और "रामनाथ" के प्रेम की स्मृति को सँजोया है।
3. शिवपूजन सहाय :-
"देहाती दुनिया" 1926 में लेखक कहते हैं:- " मैं ऐसी ठेठ देहात का रहने वाला हूँ, जहाँ इस युग की नई सभ्यता का धुँधला प्रकाश ही आता है।जहाँ केवल 2 ही चीजें प्रत्यक्ष देखने में आती है- अज्ञानता का घोर अंधकार और दरिद्रता का तांडव नृत्य"..। (भूमिका से)
4. भगवतीप्रसाद वाजपेयी :-
"पतिता की साधना" 1936 बालविधवा "नन्दा" के जीवन पर आधारित है। विधवा विवाह का समर्थन करना ही कथा का उद्देश्य है।
5. सियारामशरण गुप्त :-
"अंतिम आकांशा" 1932 में गाँधीवादी दर्शन "हृदय परिवर्तन" से प्रभावित उपन्यास है।
6. प्रतापनारायण श्रीवास्तव)
"विश्वास की वेदी" , "वंचना" , "व्यावर्तन" उपन्यासों में चीनी आक्रमण और उसके विश्वासघात की कथा पर आधारित है।
"बयालीस" 1947 जनक्रांति 1942 से जुड़ा है।
"विहान" 1857 की क्रांति को केंद्र में रखकर लिखा है।
"बेकसी का माजरा" 1957 में अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफ़र को केंद्र बनाकर स्वतंत्रता संग्राम को दिखाया गया है।
7. अमृतलाल नागर :-
" बूंद और समुन्द्र" 1956 में अहिंसावादी, मानवतावादी आदि पूरी तरह से गांधी दर्शन का प्रभाव दिखाया है। जहाँ वह कहते हैं:- "सुख-दुख में व्यक्ति का व्यक्ति से अटूट सम्बन्ध बना रहे - जैसे बूँद से बूँद जुड़ी रहती है और लहरों से लहरें , जिससे समुन्द्र बनता है"।
"शतरंज के मोहरे" 1959 में अवध की नवाबी के हरासोन्मुखी काल का वर्णन है।
" अमृत और विष" 1966 में मानव जीवन के गुण-दोष को दिखाया गया है।
"अग्निगर्भा " 1983 में दहेज की समस्या को दिखाया है.
8. विष्णु प्रभाकर :-
" अर्धनारीश्वर" 1992 में समाज के लगभग सभी वर्गों की स्त्रियों को बलात्कार- सहित उनकी यातनाओ को दिखाया गया है"।
9. उदयशंकर भट्ट :-
"सागर लहरें और मनुष्य" 1956 में बम्बई के बरसोवा क्षेत्र के मछुआरों का जीवन दिखाया गया है।
10. प्रसाद :-
"कंकाल" 1929 में आया लेखक का उपन्यास सामाजिक विकृतियों को उभारने में सफल हुआ है।
"तितली " 1934 में बच्चन सिंह के अनुसार किन्ही अंशो में प्रेमचंद की परंपरा का उपन्यास है। यह एक आदर्शपरक रचना है जिसमें ढहती हुई सामंती व्यवस्था, जमींदारी प्रथा की दुर्बलता, ग्रामीण समाज किस सरलता और स्वार्थ वृति, सम्मिलित कुटुंब की विकृतियां, त्यौहार के उत्सव चित्र आदि है, परंतु यह कथा गौण है। मुख्य कथा भारतीय जीवन दृष्टि को लेकर चलने वाली तितली और पश्चिमी दृष्टि को लेकर चलने वाली शिला की टकराहट है। इसमें भारतीय नारी जीवन की विजय होती है।
बच्चन सिंह के अनुसार " तितली कामायनी की श्रद्धा है और शैला चन्द्रगुप्त मौर्य की कार्नेलिया...।"
तितली शैला से कहती है " तुम धर्म के बाहरी आवरण में ढंककर हिन्दू स्त्री बन गई हो किंतु उसकी संस्कृति की मूल शिक्षा भूल रही हो। हिन्दू स्त्री का श्रद्धापूर्ण समर्पण उसकी साधना का प्राण है...।"
11. भगवतीचरण वर्मा :-
"चित्रलेखा" 1934 में पाप और पुण्य की समस्या और उसके समाधान को लेकर उतरा है। इसमें भोग को सर्वथा अनैतिक और त्याग को सर्वथा नैतिक नहीं माना है। कहा गया है कि" न ही कोई चीज पाप ह और न ही कोई चीज पुण्य। परिस्थितियों से ही एक कृत्य किसी को पाप और किसी को पुण्य लग सकता है"..।
"टेढ़े-मेढ़े रास्ते"1946 उपन्यास में गांधी,आतंकवाद, साम्यवाद को टेढ़े मेढे रास्ते पर चलते दिखाया है।
" सामर्थ्य और सीमा" 1962 में मनुष्य की सीमा को प्रकृति के सामने असमर्थ दिखाया गया है। नियतिवाद की अवधारणा दिखाना ही इस उपन्यास का उद्देश्य है।
" प्रश्न और मरीचिका" 1973 में आज के शासनतंत्र से कुछ समाधान नही निकल पा रहा है। क्या यह केवल 1 मरीचिका भर है ?
12. हजारीप्रसाद द्विवेदी :-
"हजारीप्रसाद के सभी उपन्यास रोमानी भाव के रहे हैं।
"बाणभट्ट की आत्मकथा" 1946 में हर्षकालीन उत्तर भारत का सांस्कृतिक जीवन दिखाया गया है।
"अनामदास का पोथा" में ऋषि रैक्व और जाबाला का विवाह जातीय मर्यादा तोड़कर कराया गया है जिससे कि स्वछंद मानवतावादी दृष्टिकोण को सामने लाया जाए।
बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 - 6-7 वी शती
चारुचंद्रलेखा 1963 - 12-13 वी शती
पुनर्नवा 1973 - 4थी शती
अनामदास का पोथा 1976 - ओपनिशिदिक युग
13. आचार्य चतुरसेन शास्त्री :-
"वैशाली की नगरवधू" 1948 में महावीर स्वामी, बुद्ध, और वासुदेव सभी एक साथ उपस्थित है,भारतीय सँस्कृति के संश्लिष्ट रूप को दिखाता है।
"सोमनाथ" 1955 में चालुक्य वंश द्वारा मंदिर की निर्मिति महमूद गजनवी द्वारा उस पर आक्रमण कर उसे लूटे जाने की कथा है जिसमें गजनवी को कोमल हृदय के रूप में दिखाया है।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।
8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।
9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी
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