(काव्यशास्त्र)
हिंदी साहित्य लोचन
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर काव्यशास्त्र व महत्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय कथनों पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
● काव्यशास्त्र की बात करने से पूर्व हमें उस शब्द विशेष की जानकारी रखना अपेक्षित है जिसकी चर्चा यहाँ की जा रही है।
ध्यान देने पर पता चलता है कि, शास्त्र शब्द "शास" से बना है जिसका अर्थ शासन करना, निर्देश देना, शिक्षा देना। सरल भाषा में हम देख पाते हैं कि किसी भी कार्य करने की विधि या व्यवस्था को चलाने की जो लिखित, नियमावली व सिद्धान्तों के तहत की गई संरचना है, वह शास्त्र का रूप होती है। जिसके आधार पर हम अपने कार्य की सिद्धि करते हैं।
आपने अपने घर-परिवार व आसपास के वातावरण में भी महसूस किया होगा, सुना-समझा होगा कि समय-समय पर कहा जाता रहा है कि 'हमारे शास्त्रों में यह कहा गया है, वह कहा गया है, शास्त्रों के अनुसार ऐसे किया जाता है या वेसे किया जाता है।' इनका इस्तेमाल हम आज भी उसी रूप में करते हैं जिससे की हमारे काम अच्छी तरह से संपन्न हो सके। न किसी बाधा के और न किसी परेशानी के।
अपने शास्त्रों पर आस्था या विश्वास रखना किसी भी धर्म-जाति-समुदाय आदि का परिचय देना होता है की, आज भी उन गर्न्थो का क्या महत्व है हमारे जीवन में। उन ऋषियों-मुनियों-विद्वानों ने जो प्राचीन समय में दूरगामी दृष्टि रखते हुए जिन नियमों-व्यवस्थाओं को लिपिबद्ध किया उनका आज भी यथासंभव इस्तेमाल-प्रयोग हो रहा है।
शास्त्रियों द्वारा इन गर्न्थो की देन किसी भी स्वस्थ समाज की जडीबुटी साबित हो सकता है यदि आज भी हम उससे अपने सरोकारों को सिद्ध कर पाते हैं या उनकी प्रासंगिकता समझते हैं। अब ज्यादा लम्बी बात न खींचते हुए मैं हिंदी साहित्य में काव्यशास्त्र के रूप को रखने की कोशिश कर रहा हूँ।
• काव्यशास्त्र का अर्थ है "किसी भी काव्य को पूर्ण रूप देने की सिद्धान्तों व नियमों की लिखित सामग्री "..। अर्थात कविता के अनुशासन के लिए नियमावली व सैद्धान्तिकी व तर्क और वस्तुनिष्ठ से जुड़ा होना है।
• काव्य का अर्थ "कवि आत्मपरक अभिव्यक्ति है"..। उसमें उसके बिम्बमयी रसात्मकता का चित्रण किया जाता है। यह भावना से जुड़ी है।
● काव्य की परिभाषा चिंतकों के अनुसार :-
1. "शब्दार्थों सहितौ काव्यम"- भामह (काव्यालंकार)
2. "ननु शब्दार्थों काव्यम" -रुद्रट (काव्यालंकार)
3. "विशिष्ट पद रचना"- वामन (काव्यलांकर सूत्र वृति)
4. "शब्दार्थों सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनी" - कुंतक (व्रकोक्ति जीवितम)
5. "तद दोषों शब्दार्थों सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि" अर्थात दोषरहित, गुणसहित, अलंकारयुक्त, किंतु अलंकार रहित भी शब्द और अर्थ काव्य कहलाते हैं। - मम्मट
6. "वाक्यं रसात्मक काव्यम" - आचार्य विश्वनाथ
7. "रमणियार्थ प्रतिपादक शब्द काव्यम" - पं जगन्नाथ
8. "अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है"..।महावीर प्रसाद द्विवेदी
9. "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है उसी प्रकार से हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की बानी जो शब्द विधान करती है, उसे कविता कहते हैं"..। शुक्ल (चिंतामणि भाग -1)
10. "काव्य तो प्रकृत मानव अनुभतियों का नैसर्गिक कल्पना के सहारे ऐसा सौंदर्यमय चित्रण है, जो मनुष्यमात्र में स्वभावतः भावोच्छवास और सौंदर्य उतपन्न करता है"..। नंदुलारे वाजपेयी (आधुनिक साहित्य में)
11. "काव्य आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति है, जिसका सम्बन्ध विश्लेषण या विज्ञान से नहीं"..। प्रसाद (काव्यकला और अन्य निबन्ध से)
12. "काव्य कवि की भाव-प्रधान मानसिक प्रतिक्रियाओं की कल्पना के ढाँचे में ढली हुई श्रेय की प्रेयरूपा प्रभावोत्पादकता अभिव्यक्ति है। (गुलाबराय)
13. "ज्ञान राशि का संचित कोष ही कविता है"..। (नगेंद्र)
14. "कविता शासक और मृत्यु के समान है".।(प्लेटो)
15. "काव्य प्रकृति का अनुकरण है"..।(अरस्तु)
16. "काव्य उदात्त भाव की अभिव्यक्ति है"...।(लोंजाइनस)
17. "कला जीवन की आलोचना है"..।(मैथ्यू आर्नल्ड)
18" प्रबल मनोवेगों का उच्छलन है"..। (वर्ड्सवर्थ)
19. "कविता आत्माभिव्यक्ति की सहजानुभूति है"..। (क्रोचे)
20. "कविता कवि की अभिव्यक्ति नहीं उसके पलायन है"..। (इलियट)
21. "कविता छंदोंमयी रचना है"...। (जॉनसन)
22. " कविता सौंदर्य की लयात्मक सृष्टि है"..। (एडगर एलन पो)
आधार व सहायक ग्रन्थ :-
1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।
2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
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